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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

विहरन् सर्वतो मुक्तो न क्वचित् परिषज्जते ।

रजश्च हि तमश्च त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम् ॥ १०८ ॥

‘तुम सर्वत्र विचरते हुए भी सबसे मुक्त हो। कहीं भी तुम्हारी आसक्ति नहीं है। तुमने

अपनी इन्द्रियोंको जीत लिया है; इसलिये रजोगुण और तमोगुण तुम्हारा स्पर्श नहीं कर

सकते ॥ १०८ ॥

निष्प्रीतिं नष्टसंतापमात्मानं त्वमुपाससे ।

सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् ॥ १०९ ॥

‘जो हर्षसे रहित, संतापसे शून्य, सम्पूर्ण भूतोंका सुहृद्, वैररहित और शान्तचित्त है,

उस आत्माकी तुम उपासना करते हो ॥ १०९ ॥

दृष्ट्वा त्वां मम संजाता त्वय्यनुक्रोशिनी मतिः ।

नाहमेतादृशं बुद्धं हन्तुमिच्छामि बन्धने ॥ ११० ॥

‘तुम्हें देखकर मेरे मनमें दयाका संचार हो आया है। मैं ऐसे ज्ञानी पुरुषको बन्धनमें

रखकर उसका वध करना नहीं चाहता ॥ ११० ॥

आनृशंस्यं परो धर्मो ह्यनुक्रोशश्च मे त्वयि ।

मोक्ष्यन्ते वारुणाः पाशास्त्वेमे कालपर्ययात् ॥ १११ ॥

‘किसीके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव न करना सबसे बड़ा धर्म है। तुम्हारे ऊपर मेरा पूर्ण

अनुग्रह है। कुछ समय बीतनेपर तुम्हें बाँधनेवाले ये वरुणदेवताके पाश अपने आप ही तुम्हें

छोड़ देंगे ॥ १११ ॥

प्रजानामपचारेण स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ।

यदा श्वश्रूं स्नुषा वृद्धां परिचारेण योक्ष्यते ॥ ११२ ॥

पुत्रश्च पितरं मोहात् प्रेषयिष्यति कर्मसु ।

ब्राह्मणैः कारयिष्यन्ति वृषलाः पादधावनम् ॥ ११३ ॥

शूद्राश्च ब्राह्मणीं भार्यामुपयास्यन्ति निर्भयाः ।

वियोनिषु विमोक्ष्यन्ति बीजानि पुरुषा यदा ॥ ११४ ॥

संकरं कांस्यभाण्डैश्च बलिं चैव कुपात्रकेः ।

चातुर्वर्ण्यं यदा कृत्स्नममर्यादं भविष्यति ॥ ११५ ॥

एकैकस्ते तदा पाशः क्रमशः परिमोक्ष्यते ।

‘महान् असुर! जब प्रजाजनोंका न्यायके विपरीत आचरण होने लगेगा, तब तुम्हारा

कल्याण होगा। जब पतोहू बूढ़ी साससे अपनी सेवा-टहल कराने लगेगी और पुत्र भी

मोहवश पिताको विभिन्न प्रकारके कार्य करनेके लिये आज्ञा प्रदान करने लगेगा, शूद्र

ब्राह्मणोंसे पैर धुलाने लगेंगे तथा वे निर्भय होकर ब्राह्मण जातिकी स्त्रीको अपनी भार्या

बनाने लगेंगे, जब पुरुष निर्भय होकर मानवेतर योनियोंमें अपना वीर्य स्थापित करने लगेंगे,

जब काँसेके पात्रमें ऊँच जाति और नीच जातिके लोग एक साथ भोजन करने लगेंगे एवं

अपवित्र पात्रोंद्वारा देवपूजाके लिये उपहार अर्पित किया जायगा, सारा वर्णधर्म जब मर्यादाशून्य हो जायगा, उस समय क्रमशः तुम्हारा एक-एक पाश (बन्धन) खुलता जायगा।।

अस्मत्तस्ते भयं नास्ति समयं प्रतिपालय।
सुखी भव निराबाधः स्वस्थचेता निरामयः॥ ११६॥
'हमारी ओरसे तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम समयकी प्रतीक्षा करो और निर्बाध, स्वस्थचित्त एवं रोगरहित हो सुखसे रहो'॥ ११६॥

तमेवमुक्त्वा भगवान्छतक्रतुः
प्रतिप्रयातो गजराजवाहनः।
विजित्य सर्वानसुरान् सुराधिपो
ननन्द हर्षेण बभूव चैकराट्॥ ११७॥
बलिसे ऐसा कहकर गजराजकी सवारीपर चलनेवाले भगवान् शतक्रतु इन्द्र अपने स्थानको लौट गये। वे समस्त असुरोंपर विजय पाकर देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए थे और एकच्छत्रसम्राट् होकर हर्षसे प्रफुल्लित हो उठे थे॥ ११७॥

महर्षयस्तुष्टुवुरञ्जसा च तं
वृषाकपिं सर्वचराचरेश्वरम्।
हिमापहो हव्यमुवाह चाध्वरे
तथामृतं चार्पितमीश्वरोऽपि हि॥ ११८॥
उस समय महर्षियोंने सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी इन्द्रका भलीभाँति स्तवन किया। अग्निदेव यज्ञमण्डपमें देवताओंके लिये हविष्य वहन करने लगे और देवेश्वर इन्द्र भी सेवकोंद्वारा अर्पित अमृत पीने लगे॥ ११८॥

द्विजोत्तमैः सर्वगतैरभिष्टुतो
विदीप्ततेजा गतमन्युरीश्वरः।
प्रशान्तचेता मुदितः स्वमालयं
त्रिविष्टपं प्राप्य मुमोद वासवः॥ ११९॥
सर्वत्र पहुँचनेकी शक्ति रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उद्दीप्त तेजस्वी और क्रोधशून्य हुए देवेश्वर इन्द्रकी स्तुति की; फिर वे इन्द्र शान्तचित्त एवं प्रसन्न हो अपने निवासस्थान स्वर्गलोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करने लगे॥ ११९॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादे
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि-वासवसंवादविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२७॥

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२२८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना

युधिष्ठिर उवाच

पूर्वरूपाणि मे राजन् पुरुषस्य भविष्यतः ।
पराभविष्यतश्चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजन्! पितामह! जिस पुरुषका उत्थान या पतन होनेवाला होता है, उसके पूर्व लक्षण कैसे होते हैं? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति ।
भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। जिस मनुष्यका उत्थान या पतन होनेको होता है, उसका मन ही उसके पूर्व लक्षणोंको प्रकट कर देता है ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
श्रिया शक्रस्य संवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥
इस विषयमें लक्ष्मीके साथ जो इन्द्रका संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण यहाँ दिया जाता है। युधिष्ठिर! तुम ध्यान देकर उसे सुनो ॥ ३ ॥

महत्तस्तपसो व्युष्ट्या पश्यँल्लोकौ परावरौ ।
सामान्यमृषिभिर्गत्वा ब्रह्मलोकनिवासिभिः ॥ ४ ॥
ब्रह्मेवामितदीप्तौजाः शान्तपाप्मा महातपाः ।
विचचार यथाकामं त्रिषु लोकेषु नारदः ॥ ५ ॥
एक समयकी बात है, महातपस्वी एवं पापरहित नारदजी अपनी इच्छाके अनुसार तीनों लोकोंमें विचरण करते थे। वे अपनी बड़ी भारी तपस्याके प्रभावसे ऊँचे और नीचे दोनों प्रकारके लोकोंको देख सकते थे तथा ब्रह्मलोक-निवासी ऋषियोंके समान होकर ब्रह्माजीकी ही भाँति अमित दीप्ति और ओजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४-५ ॥

कदाचित् प्रातरुत्थाय पिस्पृक्षुः सलिलं शुचि ।
ध्रुवद्वारभवां गङ्गां जगामावततार च ॥ ६ ॥

एक दिन वे प्रातःकाल उठकर पवित्र जलमें स्नान करनेकी इच्छासे ध्रुवद्वारसे प्रवाहित हुई गङ्गाजीके तटपर गये और उसके भीतर उतरे ॥ ६ ॥
सहस्रनयनश्चापि वज्री शम्बरपाकहा ।
तस्या देवर्षिजुष्टायास्तीरमभ्याजगाम ह ॥ ७ ॥
इसी समय शम्बरासुर और पाक नामक दैत्यका वध करनेवाले वज्रधारी सहस्रलोचन इन्द्र भी देवर्षियोंद्वारा सेवित गङ्गाजीके उसी तटपर आये ॥ ७ ॥
तावाप्लुत्य यतात्मानौ कृतजप्यौ समासतः ।
नद्याः पुलिनमासाद्य सूक्ष्मकाञ्चनवालुकम् ॥ ८ ॥
पुण्यकर्मभिराख्याता देवर्षिकथिताः कथाः ।
चक्रतुस्तौ तथाऽऽसीनौ महर्षिकथितास्तथा ॥ ९ ॥
फिर उन दोनोंने गङ्गाजीमें गोते लगाकर मनको एकाग्र करके संक्षेपसे गायत्रीजपका कार्य पूर्ण किया। इसके बाद सूक्ष्म सुवर्णमयी बालुकासे भरे हुए सुन्दर गङ्गातटपर आकर वे दोनों बैठ गये और पुण्यात्मा पुरुषों, देवर्षियों तथा महर्षियोंके मुखसे सुनी हुई कथाएँ कहने-सुनने लगे ॥ ८-९ ॥
पूर्ववृत्तव्यपेतानि कथयन्तौ समाहितौ ।
अथ भास्करमुद्यन्तं रश्मिजालपुरस्कृतम् ॥ १० ॥
पूर्णमण्डलमालोक्य तावुत्थायोपतस्थतुः ।
दोनों एकाग्रचित्त होकर प्राचीन वृत्तान्तोंकी चर्चा कर ही रहे थे कि किरणजालसे मण्डित भगवान् भास्करका उदय हुआ। सूर्यदेवका सम्पूर्ण मण्डल देख उन दोनोंने खड़े होकर उनका उपस्थान किया ॥ १० १/२ ॥
अभितस्तूदयन्तं तमर्कमर्कमिवापरम् ॥ ११ ॥
आकाशे ददृशे ज्योतिरुद्यतार्चिःसमप्रभम् ।
तयोः समीपं तं प्राप्तं प्रत्यदृश्यत भारत ॥ १२ ॥
उदित होते हुए सूर्यके पास ही आकाशमें उन्हें द्वितीय सूर्यके समान एक दिव्य ज्योति दिखायी दी, जो प्रज्वलित अग्निशिखाके समान प्रकाशित हो रही थी। भारत! वह ज्योति क्रमशः उन दोनोंके समीप आती दिखायी दी ॥ ११-१२ ॥
तत् सुपर्णार्कचरितमास्थितं वैष्णवं पदम् ।
भाभिरप्रतिमं भाति त्रैलोक्यमवभासयत् ॥ १३ ॥
वह प्रभापुञ्ज भगवान् विष्णुका एक विमान था, जो अपनी दिव्य प्रभासे तीनों लोकोंको प्रकाशित करता हुआ अनुपम जान पड़ता था। सूर्य और गरुड़ जिस आकाशमार्गसे चलते हैं, उसीपर वह भी चल रहा था ॥
तत्राभिरूपशोभाभिरप्सरोभिः पुरस्कृतम् ।
बृहतीमंशुमत्प्रख्यां बृहद्भानोरिवार्चिषम् ॥ १४ ॥

नक्षत्रकल्पाभरणां तां मौक्तिकसमस्रजम् ।
श्रियं ददृशतुः पद्मां साक्षात् पद्मदलस्थिताम् ॥ १५ ॥
उस विमानमें उन दोनोंने कमलदलपर विराजमान साक्षात् लक्ष्मीदेवीको देखा, जो पद्माके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन्हें बहुत-सी परम शोभामयी सुन्दरी अप्सराएँ आगे किये खड़ी थीं। लक्ष्मीदेवीकी आकृति विशाल थी। वे अंशुमाली सूर्यके समान तेजस्विनी थीं और प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाके समान जाज्वल्यमान हो रही थीं। उनके आभूषण नक्षत्रोंके समान चमक रहे थे। मोती-जैसे रत्नोंके हार उनके कण्ठदेशकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १४-१५ ॥
सावरुह्य विमानाग्रादङ्गनानामनुत्तमा ।
अभ्यागच्छत् त्रिलोकेशं देवर्षिं चापि नारदम् ॥ १६ ॥
अङ्गनाओंमें परम उत्तम लक्ष्मीदेवी उस विमानके अग्रभागसे उतरकर त्रिभुवनपति इन्द्र और देवर्षि नारदके पास आयीं ॥ १६ ॥
नारदानुगतः साक्षान्मघवांस्तामुपागमत् ।
कृताञ्जलिपुटो देवीं निवेद्यात्मानमात्मना ॥ १७ ॥
चक्रे चानुपमां पूजां तस्याश्चापि स सर्ववित् ।
देवराजः श्रियं राजन् वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥
आगे-आगे नारदजी और उनके पीछे साक्षात् इन्द्रदेव हाथ जोड़े हुए देवीकी ओर बढ़े। उन्होंने स्वयं ही देवीको आत्मसमर्पण करके उनकी अनुपम पूजा की। राजन्! तत्पश्चात् सर्वज्ञ देवराजने लक्ष्मीदेवीसे इस प्रकार कहा ॥ १७-१८ ॥

शक्र उवाच
का त्वं केन च कार्येण सम्प्राप्ता चारुहासिनि ।
कुतश्चागम्यते सुभ्रु गन्तव्यं क्व च ते शुभे ॥ १९ ॥
इन्द्र बोले— चारुहासिनि! तुम कौन हो? और किस कार्यसे यहाँ आयी हो? सुन्दर भौंहोंवाली देवि! तुम्हारा शुभागमन कहाँसे हुआ है? और शुभे! तुम्हें जाना कहाँ है? ॥ १९ ॥

श्रीरुवाच
पुण्येषु त्रिषु लोकेषु सर्वे स्थावरजङ्गमाः ।
ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मना ॥ २० ॥
लक्ष्मीने कहा— इन्द्र! तीनों पुण्यमय लोकोंके समस्त चराचर प्राणी मुझे प्राप्त करनेकी इच्छासे परम उत्साहपूर्वक प्रयत्न करते रहते हैं ॥ २० ॥
साहं वै पङ्कजे जाता सूर्यरश्मिविबोधिते ।
भूत्यर्थं सर्वभूतानां पद्मा श्रीः पद्ममालिनी ॥ २१ ॥

मैं समस्त प्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके तापसे खिले हुए कमलमें प्रकट हुई हूँ। मेरा नाम पद्मा, श्री और पद्ममालिनी है ॥ २१ ॥ अहं लक्ष्मीरहं भूतिः श्रीश्चाहं बलसूदन । अहं श्रद्धा च मेधा च संनतिर्विजितिः स्थितिः ॥ २२ ॥ अहं धृतिरहं सिद्धिरहं त्विड् भूतिरेव च । अहं स्वाहा स्वधा चैव संस्तुतिर्नियतिः स्मृतिः ॥ २३ ॥ बलसूदन! मैं ही लक्ष्मी हूँ। मैं ही भूति हूँ और मैं ही श्री हूँ। मैं श्रद्धा, मेधा, संनति, विजिति, स्थिति, धृति, सिद्धि, कान्ति, समृद्धि, स्वाहा, स्वधा, संस्तुति, नियति और स्मृति हूँ ॥ २२-२३ ॥ राज्ञां विजयमानानां सेनाग्रेषु ध्वजेषु च । निवासे धर्मशीलानां विषयेषु पुरेषु च ॥ २४ ॥ युद्धमें विजय पानेवाले राजाओंकी सेनाओंके अग्रभागमें फहरानेवाले ध्वजाओंपर और स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंके निवासस्थानमें, उनके राज्य और नगरोंमें भी मैं सदा निवास करती हूँ ॥ २४ ॥ जितकाशिनि शूरे च संग्रामेष्वनिवर्तिनि । निवसामि मनुष्येन्द्रे सदैव बलसूदन ॥ २५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1509)

⬅ विषय-सूची (TOC)

देवर्षि एवं देवराजको भगवती लक्ष्मीका दर्शन

बलसूदन! संग्रामसे पीछे न हटनेवाले तथा विजयसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर नरेशके शरीरमें भी मैं सदा ही मौजूद रहती हूँ ॥ २५ ॥
धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि ।
प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥ २६ ॥
नित्य धर्माचरण करनेवाले, परम बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, विनयी तथा दानशील पुरुषमें भी मैं सदा ही निवास करती हूँ ॥ २६ ॥
असुरेष्ववसं पूर्वं सत्यधर्मनिबन्धना ।
विपरीतांस्तु तान् बुद्ध्वा त्वयि वासमरोचयम् ॥ २७ ॥
सत्य और धर्मसे बँधकर पहले मैं असुरोंके यहाँ रहती थी। अब उन्हें धर्मके विपरीत देखकर मैंने तुम्हारे यहाँ रहना पसंद किया है ॥ २७ ॥

शक्र उवाच

कथंवृत्तेषु दैत्येषु त्वमवात्सीर्वरानने ।
दृष्ट्वा च किमिहागास्त्वं हित्वा दैतेयदानवान् ॥ २८ ॥
**इन्द्रने कहा—**सुमुखि! दैत्योंका आचरण पहले कैसा था? जिससे तुम उनके पास रहती थी और अब क्या देखा है, जो उन दैत्यों और दानवोंको छोड़कर यहाँ चली आयी हो? ॥ २८ ॥

श्रीरुवाच

स्वधर्ममनुतिष्ठत्सु धैर्यादचलितेषु च ।
स्वर्गमार्गाभिरामेषु सत्त्वेषु निरता ह्यहम् ॥ २९ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! जो अपने धर्मका पालन करते, धैर्यसे कभी विचलित नहीं होते और स्वर्गप्राप्तिके साधनोंमें सानन्द लगे रहते हैं, उन प्राणियोंके भीतर मैं सदा निवास करती हूँ ॥ २९ ॥
दानाध्ययनयज्ञेज्यापितृदैवतपूजनम् ।
गुरूणामतिथीनां च तेषां सत्यमवर्तत ॥ ३० ॥
पहले दैत्यलोग दान, अध्ययन और यज्ञ-यागमें संलग्न रहते थे। देवता, गुरु, पितर और अतिथियोंकी पूजा करते थे। उनके यहाँ सत्यका भी पालन होता था ॥ ३० ॥
सुसम्पृष्टगृहाश्वासन् जितस्त्रीका हुताग्नयः ।
गुरुशुश्रूषका दान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ३१ ॥
वे अपना घर-द्वार झाड़-बुहारकर साफ रखते थे। अपनी स्त्रीके मनको प्यारसे जीत लेते थे। प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे। वे गुरुसेवी, जितेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यवादी थे ॥ ३१ ॥
श्रद्दधाना जितक्रोधा दानशीलानसूयवः ।

भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः ॥ ३२ ॥ उनमें श्रद्धा थी। वे क्रोधको जीत चुके थे। वे दानी थे। दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं रखते थे और ईर्ष्यारहित थे। वे स्त्री, पुत्र और मन्त्री आदिका भरण-पोषण करते थे ॥ ३२ ॥ अमर्षेण न चान्योन्यं स्पृहयन्ते कदाचन । न च जातूपतप्यन्ति धीराः परसमृद्धिभिः ॥ ३३ ॥ अमर्षवश कभी एक-दूसरेके प्रति लाग-डाँट नहीं रखते थे। सभी धीर स्वभावके थे। दूसरोंकी समृद्धियोंसे उनके मनमें कभी संताप नहीं होता था ॥ ३३ ॥ दातारः संगृहीतार आर्याः करुणवेदिनः । महाप्रसादा ऋजवो दृढभक्ता जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥ वे दान देते, कर आदिके द्वारा धन-संग्रह करते तथा आर्य-जनोचित आचार-विचारसे रहते थे। वे दया करना जानते थे। वे दूसरोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले थे। वे सभी सरल स्वभावके और दृढ़तापूर्वक भक्ति रखनेवाले थे। उन सबने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पायी थी ॥ ३४ ॥ संतुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रियवादिनः । यथार्हमानार्थकरा ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥ ३५ ॥ वे अपने भृत्यों और मन्त्रियोंको संतुष्ट रखते थे। कृतज्ञ और मधुरभाषी थे। सबका समुचित रूपसे सम्मान करते, सबको धन देते, लज्जाका सेवन करते और व्रत एवं नियमोंका पालन करते थे ॥ ३५ ॥ नित्यं पर्वसु सुस्नाताः स्वनुलिप्ताः स्वलंकृताः । उपवासतपःशीलाः प्रतीता ब्रह्मवादिनः ॥ ३६ ॥ सदा ही पर्वोंपर विशेष स्नान करते, अपने अंगोंमें चन्दन लगाते और सुन्दर अलंकार धारण करते थे। स्वभावसे ही उपवास और तपमें लगे रहते थे। सबके विश्वासपात्र थे और वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे ॥ नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगेशयाः । रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन् ॥ ३७ ॥ दैत्य कभी प्रातःकाल सोये नहीं रहते थे। उनके सोते समय सूर्य नहीं उगते थे; अर्थात् वे सूर्योदयसे पहले ही जाग उठते थे। वे रातमें कभी दही और सत्तू नहीं खाते थे ॥ ३७ ॥ कल्यं घृतं चान्ववेक्षन् प्रयता ब्रह्मवादिनः । मङ्गल्यान्यपि चापश्यन् ब्राह्मणांश्चाप्यपूजयन् ॥ ३८ ॥ वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते, सबेरे उठकर घीका दर्शन करते, वेदोंका पाठ करते, अन्य मांगलिक वस्तुओंको देखते और ब्राह्मणोंकी पूजा करते थे ॥ ३८ ॥ सदा हि वदतां धर्मं सदा चाप्रतिगृह्णताम् ।

अर्धं च रात्र्याः स्वपतां दिवा चास्वपतां तथा ॥ ३९ ॥ सदा धर्मकी ही चर्चामें लगे रहते और प्रतिग्रहसे दूर रहते थे। रातके आधे भागमें ही सोते थे और दिनमें नहीं सोते थे ॥ ३९ ॥ कृपणानाथवृद्धानां दुर्बलातुरयोषिताम् । दयां च संविभागं च नित्यमेवान्वमोदताम् ॥ ४० ॥ कृपण, अनाथ, वृद्ध, दुर्बल, रोगी और स्त्रियोंपर दया करते तथा उनके लिये अन्न और वस्त्र बाँटते थे। इस कार्यका वे सदा अनुमोदन किया करते थे ॥ ४० ॥ त्रस्तं विषण्णमुद्विग्नं भयार्तं व्याधितं कृशम् । हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासयन्ति ते ॥ ४१ ॥ त्रस्त, विषादग्रस्त, उद्विग्न, भयभीत, व्याधिग्रस्त, दुर्बल और पीड़ितको तथा जिसका सर्वस्व लुट गया हो, उस मनुष्यको वे सदा ढाढ़स बँधाया करते थे ॥ ४१ ॥ धर्ममेवान्ववर्तन्त न हिंसन्ति परस्परम् । अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ॥ ४२ ॥ वे धर्मका ही आचरण करते थे। एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे। सब कार्योंमें परस्पर अनुकूल रहते और गुरुजनों तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें दत्तचित्त थे ॥ ४२ ॥ पितॄन् देवातिथींश्चैव यथावत् तेऽभ्यपूजयन् । अवशेषाणि चाश्नन्ति नित्यं सत्यतपोधृताः ॥ ४३ ॥ पितरों, देवताओं और अतिथियोंकी विधिवत् पूजा करते थे तथा उन्हें अर्पण करनेके पश्चात् बचे हुए अन्नको ही प्रसादरूपमें पाते थे। वे सभी सत्यवादी और तपस्वी थे ॥ ४३ ॥ नैकेऽश्नन्ति सुसम्पन्नं न गच्छन्ति परस्त्रियम् । सर्वभूतेष्ववर्तन्त यथाऽऽत्मनि दयां प्रति ॥ ४४ ॥ वे अकेले बढ़िया भोजन नहीं करते थे। पहले दूसरोंको देकर पीछे अपने उपभोगमें लाते थे। परायी स्त्रीसे कभी संसर्ग नहीं रखते थे। सब प्राणियोंको अपने ही समान समझकर उनपर दया रखते थे ॥ ४४ ॥ नैवाकाशे न पशुषु वियोनौ च न पर्वसु । इन्द्रियस्य विसर्गं ते रोचयन्ति कदाचन ॥ ४५ ॥ वे आकाशमें, पशुओंमें, विपरीत योनिमें तथा पर्वके अवसरोंपर वीर्यत्याग करना कदापि अच्छा नहीं मानते थे ॥ ४५ ॥ नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा । उत्साहोऽथानहंकारः परमं सौहृदं क्षमा ॥ ४६ ॥ सत्यं दानं तपः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्रेषु चानभिद्रोहः सर्वं तेष्वभवत् प्रभो ॥ ४७ ॥

प्रभो! नित्य दान, चतुरता, सरलता, उत्साह, अहंकारशून्यता, परम सौहार्द, क्षमा, सत्य, दान, तप, शौच, करुणा, कोमल वचन, मित्रोंसे द्रोह न करनेका भाव—ये सभी सद्गुण उनमें सदा मौजूद रहते थे ।। ४६-४७ ।।

निद्रा तन्द्रीरसम्प्रीतिरसूयाथानवेक्षिता ।
अरतिश्च विषादश्च स्पृहा चाप्यविशन्न तान् ।। ४८ ।।
निद्रा, तन्द्रा (आलस्य), अप्रसन्नता, दोषदृष्टि, अविवेक, अप्रीति, विषाद और कामना आदि दोष उनके भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे ।। ४८ ।।

साहमेवंगुणेष्वेव दानवेष्ववसं पुरा ।
प्रजासर्गमुपादाय नैकं युगविपर्ययम् ।। ४९ ।।
इस प्रकार उत्तम गुणोंवाले दानवोंके पास सृष्टिकालसे लेकर अबतक मैं अनेक युगोंसे रहती आयी हूँ ।। ४९ ।।

ततः कालविपर्यासे तेषां गुणविपर्ययात् ।
अपश्यं निर्गतं धर्मं कामक्रोधवशात्मनाम् ।। ५० ।।
किंतु समयके उलट-फेरसे उनके गुणोंमें विपरीतता आ गयी। मैंने देखा, दैत्योंमें धर्म नहीं रह गया है। वे काम और क्रोधके वशीभूत हो गये हैं ।। ५० ।।

सभासदां च वृद्धानां सतां कथयतां कथाः ।
प्राहासन्नभ्यसूयंश्च सर्ववृद्धान् गुणावराः ।। ५१ ।।
जब बड़े-बूढ़े लोग उस सभामें बैठकर कोई बात कहते हैं, तब गुणहीन दैत्य उनमें दोष निकालते हुए उन सब वृद्ध पुरुषोंकी हँसी उड़ाया करते हैं ।। ५१ ।।

युवानश्च समासीना वृद्धानपि गतान् सतः ।
नाभ्युत्थानाभिवादाभ्यां यथापूर्वमपूजयन् ।। ५२ ।।
ऊँचे आसनोंपर बैठे हुए नवयुवक दैत्य बड़े-बूढ़ोंके आ जानेपर भी पहलेकी भाँति न तो उठकर खड़े होते हैं और न प्रणाम करके ही उनका आदर-सत्कार करते हैं ।। ५२ ।।

वर्तयत्येव पितरि पुत्रः प्रभवते तथा ।
अमित्रभृत्यतां प्राप्य ख्यापयन्त्यनपत्रपाः ।। ५३ ।।
बापके रहते ही बेटा मालिक बन बैठता है। वे शत्रुओंके सेवक बनकर अपने उस कर्मको निर्लज्जतापूर्वक दूसरोंके सामने कहते हैं ।। ५३ ।।

तथा धर्मादपेतेन कर्मणा गर्हितेन ये ।
महतः प्राप्नुवन्त्यर्थांस्तेषां तत्राभवत् स्पृहा ।। ५४ ।।
धर्मके विपरीत निन्दित कर्मद्वारा जिन्हें महान् धन प्राप्त हो गया है, उनकी उसी प्रकार धनोपार्जन करनेकी अभिलाषा बढ़ गयी है ।। ५४ ।।

उच्चैश्चाभ्यवदन् रात्रौ नीचैस्तत्राग्निरज्वलत् ।
पुत्राः पितॄनत्यचरन् नार्यश्चात्यचरन् पतीन् ।। ५५ ।।

दैत्य रातमें जोर-जोरसे हल्ला मचाते हैं और उनके यहाँ अग्निहोत्रकी आग मन्दगतिसे जलने लगी है। पुत्रोंने पिताओंपर और स्त्रियोंने पतियोंपर अत्याचार आरम्भ कर दिया है ॥ ५५ ॥

मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् ।
गुरुत्वान्नाभ्यनन्दन्त कुमारान् नान्वपालयन् ॥ ५६ ॥
दैत्य और दानव गुरुत्व होते हुए भी माता-पिता, वृद्ध पुरुष, आचार्य, अतिथि और गुरुजनोंका अभिनन्दन नहीं करते हैं। संतानोंके लालन-पालनपर भी ध्यान नहीं देते हैं ॥ ५६ ॥

भिक्षां बलिमदत्त्वा च स्वयमन्नानि भुञ्जते ।
अनिष्ट्वाऽसंविभज्याथ पितृदेवातिथीन् गुरून् ॥ ५७ ॥
देवताओं, पितरों, गुरुजनों तथा अतिथियोंका यजन-पूजन और उन्हें अन्नदान किये बिना, भिक्षादान और बलिवैश्वदेव-कर्मका सम्पादन किये बिना ही दैत्यलोग स्वयं भोजन कर लेते हैं ॥ ५७ ॥

न शौचमनुरुद्ध्यन्त तेषां सूदजनास्तथा ।
मनसा कर्मणा वाचा भक्ष्यमासीदनावृतम् ॥ ५८ ॥
दैत्य तथा उनके रसोइये मन, वाणी और क्रियाद्वारा शौचाचारका पालन नहीं करते हैं। उनका भोजन बिना ढके ही छोड़ दिया जाता है ॥ ५८ ॥

विप्रकीर्णानि धान्यानि काकमूषिकभोजनम् ।
अपावृतं पयोऽतिष्ठदुच्छिष्टाश्चास्पृशन् घृतम् ॥ ५९ ॥
उनके घरोंमें अनाजके दाने बिखरे रहते हैं और उन्हें कौए तथा चूहे खाते हैं। वे दूधको बिना ढके छोड़ देते हैं और घीको जूठे हाथोंसे छू देते हैं ॥ ५९ ॥

कुद्दालं दात्रपिटकं प्रकीर्णं कांस्यभाजनम् ।
द्रव्योपकरणं सर्वं नान्ववैक्षत् कुटुम्बिनी ॥ ६० ॥
दैत्योंकी गृहस्वामिनियाँ घरमें इधर-उधर बिखरे हुए कुदाल, दराँती (या हँसुआ), पिटारी, काँसेके बर्तन तथा अन्य सब द्रव्यों और सामानोंकी देख-भाल नहीं करती हैं ॥ ६० ॥

प्राकारागारविध्वंसान्न स्म ते प्रतिकुर्वते ।
नाद्रियन्ते पशून् बद्ध्वा यवसेनोदकेन च ॥ ६१ ॥
उनके गाँवों और नगरोंकी चहारदिवारी तथा घर गिर जाते हैं; परंतु वे उसकी मरम्मत नहीं कराते हैं। दैत्यलोग पशुओंको घरमें बाँध देते हैं, किंतु चारा और पानी देकर उनकी सेवा नहीं करते हैं ॥ ६१ ॥

बालानां प्रेक्षमाणानां स्वयं भक्ष्यमभक्षयन् ।
तथा भृत्यजनं सर्वमसंतर्प्य च दानवाः ॥ ६२ ॥

छोटे बच्चे आशा लगाये देखते रहते हैं और दानवलोग खानेकी चीजें स्वयं खा लेते हैं। सेवकों तथा अन्य सब कुटुम्बीजनोंको भूखे छोड़कर अपने खा लेते हैं ।। ६२ ।। पायसं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुलीः । अपाचयन्नात्मनोऽर्थे वृथा मांसान्यभक्षयन् ।। ६३ ।। खीर, खिचड़ी, मांस, पूआ और पूरी आदि भोजन वे सिर्फ अपने खानेके लिये बनवाते हैं तथा वे व्यर्थ ही मांस खाया करते हैं ।। ६३ ।। उत्सूर्यशायिनश्चासन् सर्वे चासन् प्रगेनिशाः । अवर्तन् कलहाश्चात्र दिवारात्रं गृहे गृहे ।। ६४ ।। अब वे सूर्योदय होनेतक सोने लगे हैं। प्रातःकालको भी रात ही समझते हैं। उनके घर-घरमें दिन-रात कलह मचा रहता है ।। ६४ ।। अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह । आश्रमस्थान् विधर्मस्थाः प्राद्विषन्त परस्परम् ।। ६५ ।। दानवोंके यहाँ अनार्य वहाँ बैठे हुए आर्य पुरुषकी सेवामें उपस्थित नहीं होते हैं। अधर्मपरायण दैत्य आश्रमवासी महात्माओंसे तथा आपसमें भी द्वेष रखते हैं ।। ६५ ।। संकराश्चाभ्यवर्तन्त न च शौचमवर्तत । ये च वेदविदो विप्रा विस्पष्टमनृचश्च ये ।। ६६ ।। निरन्तरविशेषास्ते बहुमानावमानयोः । अब उनके यहाँ वर्णसंकर संतानें होने लगी हैं। किसीमें पवित्रता नहीं रह गयी है। जो वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण हैं और जो स्पष्ट ही वेदकी एक ऋचा भी नहीं जानते हैं, उन दोनोंमें वे दैत्यलोग कोई अन्तर या विशेषता नहीं समझते हैं और न उनका मान या अपमान करनेमें ही कोई अन्तर रखते हैं ।। ६६ १/२ ।। हारमाभरणं वेषं गतं स्थितमवेक्षितम् ।। ६७ ।। असेवन्त भुजिष्या वै दुर्जनाचरितं विधिम् । वहाँकी दासियाँ सुन्दर हार एवं अन्य आभूषण पहनकर मनोहर वेष धारण करतीं और दुराचारिणी स्त्रियोंकी भाँति चलती-फिरती, खड़ी होती और कटाक्ष करती हैं। साथ ही वे उस कुकृत्यको अपनाती हैं, जिसका आचरण दुराचारीजन करते हैं ।। ६७ १/२ ।। स्त्रियः पुरुषवेषेण पुंसः स्त्रीवेषधारिणः ।। ६८ ।। क्रीडारतिविहारेषु परां मुदमवाप्नुवन् । क्रीडा, रति और विहारके अवसरोंपर वहाँकी स्त्रियाँ पुरुषवेष धारण करके और पुरुष स्त्रियोंका वेष बनाकर एक-दूसरेसे मिलते और बड़े आनन्दका अनुभव करते हैं ।। ६८ १/२ ।। प्रभवद्भिः पुरा दायानर्हेभ्यः प्रतिपादितान् ।। ६९ ।। नाभ्यवर्तन्त नास्तिक्याद् वर्तन्तः सम्भवेष्वपि ।

कितने ही दानव पूर्वकालमें अपने पूर्वजोंद्वारा सुयोग्य ब्राह्मणोंको दानके रूपमें दी हुई जागीरें नास्तिकताके कारण उनके पास रहने नहीं देते हैं यद्यपि वे अन्य सम्भव उपायोंसे जीवन-निर्वाह कर सकते हैं तथापि उस दिये हुए दानको छीन लेते हैं ।। ६९ १/३ ।।
मित्रेणाभ्यर्थितं मित्रमर्थसंशयिते क्वचित् ।। ७० ।।
वालकोट्यग्रमात्रेण स्वार्थेनाघ्नत तद् वसु ।
कहीं धनके विषयमें संशय उपस्थित होनेपर अर्थात् यह धन न्यायतः मेरा है या दूसरेका, यह प्रश्न खड़ा होनेपर यदि उस धनका अधिकारी व्यक्ति अपने किसी मित्रसे प्रार्थना करता है कि वह पंचायतद्वारा इस मामलेको निपटा दे तो वह मित्र अपने बालकी नोकके बराबर स्वार्थके लिये भी उसकी उस सम्पत्तिको चौपट कर देता है ।। ७० १/३ ।।
परस्वादानरुचयो विपणव्यवहारिणः ।। ७१ ।।
अदृश्यन्तार्यवर्णेषु शूद्राश्चापि तपोधनाः ।
दानवोंके यहाँ जो व्यापारी हैं, वे सदा दूसरोंका धन ठग लेनेका ही विचार रखते हैं तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंमें शूद्र भी मिलकर तपोधन बन बैठे हैं ।। ७१ १/३ ।।
अधीयतेऽव्रताः केचिद् वृथा व्रतमथापरे ।। ७२ ।।
कुछ लोग ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किये बिना ही वेदोंका स्वाध्याय करते हैं, कुछ लोग व्यर्थ (अवैदिक) व्रतका आचरण करते हैं ।। ७२ ।।
अशुश्रूषुर्गुरोः शिष्यः कश्चिच्छिष्यसखो गुरुः ।
शिष्य गुरुकी सेवा करना नहीं चाहता। कोई-कोई गुरु भी ऐसा है जो शिष्योंको दोस्त बनाकर रखता है ।।
पिता चैव जनित्री च श्रान्तौ वृत्तोत्सवाविव ।। ७३ ।।
अप्रभुत्वे स्थितौ वृद्धावन्नं प्रार्थयतः सुतान् ।
जब पिता और माता उत्सवशून्यकी भाँति थक जाते हैं, तब घरमें उनकी कोई प्रभुता नहीं रह जाती। वे दोनों बूढ़े दम्पति बेटोंसे अन्नकी भीख माँगते हैं ।। ७३ १/३ ।।
तत्र वेदविदः प्राज्ञा गाम्भीर्ये सागरोपमाः ।। ७४ ।।
कृष्यादिष्वभवन् सक्ता मूर्खाः श्राद्धान्यभुञ्जत ।
वहाँ जो वेदवेत्ता ज्ञानी तथा गम्भीरतामें समुद्रके समान पुरुष हैं, वे तो खेती आदि कार्योंमें संलग्न हो गये हैं और मूर्खलोग श्राद्धान्न खाते फिरते हैं ।। ७४ १/३ ।।
प्रातः प्रातश्च सुप्रश्नं कल्पनं प्रेषणक्रियाः ।। ७५ ।।
शिष्यानप्रहितास्तेषामकुर्वन् गुरवः स्वयं ।

गुरुलोग प्रतिदिन प्रातःकाल जाकर शिष्योंसे पूछते हैं कि आपकी रात सुखसे बीती है न? इसके सिवा वे उन शिष्योंके वस्त्र आदि ठीकसे पहनाते और उनकी वेश-भूषा सँवारते हैं तथा उनकी ओरसे कोई प्रेरणा न होनेपर भी स्वयं ही उनके संदेशवाहक दूत आदिका कार्य करते हैं ।। ७५ १/२ ।।

श्वश्रूश्वशुरयोरग्रे वधूः प्रेष्यानशासत ।। ७६ ।। अन्वशासच्च भर्तारं समाहूयाभिजल्पति । सास-ससुरके सामने ही बहू सेवकोंपर शासन करने लगी है। वह पतिको भी आदेश देती है और सबके सामने पतिको बुलाकर उससे बात करती है ।। ७६ १/२ ।।

प्रयत्नेनापि चारक्षच्चित्तं पुत्रस्य वै पिता ।। ७७ ।। व्यभजच्चापि संरम्भाद् दुःखवासं तथावसत् । पिता विशेष प्रयत्नपूर्वक पुत्रका मन रखते हैं। वे उनके क्रोधसे डरकर सारा धन पुत्रोंको बाँट देते हैं और स्वयं बड़े कष्टसे जीवन बिताते हैं ।। ७७ १/२ ।।

अग्निदाहेन चौरैर्वा राजभिर्वा हृतं धनम् ।। ७८ ।। दृष्ट्वा द्वेषात् प्राहसन्त सुहृत्सम्भाविता ह्यपि । जिन्हें हितैषी और मित्र समझा जाता था, वे ही लोग जब अपने सम्बन्धीके धनको आग लगने, चोरी हो जाने अथवा राजाके द्वारा छिन जानेसे नष्ट हुआ देखते हैं, तब द्वेषवश उसकी हँसी उड़ाते हैं ।। ७८ १/२ ।।

कृतघ्ना नास्तिकाः पापा गुरुदाराभिमर्शिनः ।। ७९ ।। अभक्ष्यभक्षणरता निर्मर्यादा हतत्विषः । दैत्यगण कृतघ्न, नास्तिक, पापाचारी तथा गुरुपत्नीगामी हो गये हैं। जो चीज नहीं खानी चाहिये, वे भी खाते और धर्मकी मर्यादा तोड़कर मनमाने आचरण करते हैं। इसीलिये वे कान्तिहीन हो गये हैं ।। ७९ १/२ ।।

तेष्वेवमादीनाचारानाचरत्सु विपर्यये ।। ८० ।। नाहं देवेन्द्र वत्स्यामि दानवेष्विति मे मतिः । देवेन्द्र! जबसे इन दैत्योंने ये धर्मके विपरीत आचरण अपनाये हैं, तबसे मैंने यह निश्चय कर लिया है कि अब इन दानवोंके घरमें नहीं रहूँगी ।। ८० १/२ ।।

तन्मां स्वयमनुप्राप्तामभिनन्द शचीपते ।। ८१ ।। त्वयार्चितां मां देवेश पुरो धास्यन्ति देवताः । शचीपते! देवेश्वर! इसीलिये मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ आयी हूँ। तुम मेरा अभिनन्दन करो। तुमसे पूजित होनेपर मुझे अन्य देवता भी अपने सम्मुख स्थापित (एवं सम्मानित) करेंगे ।। ८१ १/२ ।।

यत्राहं तत्र मत्कान्ता मद्विशिष्टा मदर्पणाः ।। ८२ ।।

सप्त देव्यो जयाष्टम्यो वासमेष्यन्ति तेऽष्टधा । जहाँ मैं रहूँगी, वहाँ सात देवियाँ और निवास करेंगी, उन सबके आगे आठवीं जया देवी भी रहेंगी। ये आठों देवियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं, मुझसे भी श्रेष्ठ हैं और मुझे आत्मसमर्पण कर चुकी हैं ॥ ८२ १/२ ॥

आशा श्रद्धा धृतिः शान्तिर्विजितिः संनतिः क्षमा ॥ ८३ ॥ अष्टमी वृत्तिरेतासां पुरोगा पाकशासन । पाकशासन! उन देवियोंके नाम इस प्रकार हैं—आशा, श्रद्धा, धृति, शान्ति, विजिति, संनति, क्षमा और आठवीं वृत्ति (जया)। ये आठवीं देवी उन सातोंकी अग्रगामिनी हैं ॥ ८३ १/२ ॥

ताश्चाहं चासुरांस्त्यक्त्वा युष्मद्विषयमागताः ॥ ८४ ॥ त्रिदशेषु निवत्स्यामो धर्मनिष्ठान्तरात्मसु । वे देवियाँ और मैं सब-के-सब उन असुरोंको त्यागकर तुम्हारे राज्यमें आयी हैं। देवताओंकी अन्तरात्मा धर्ममें निष्ठा रखनेवाली है; इसलिये अब हमलोग इन्हींके यहाँ निवास करेंगी ॥ ८४ १/२ ॥

इत्युक्तवचनां देवीं प्रीत्यर्थं च ननन्दतुः ॥ ८५ ॥ नारदश्चात्र देवर्षिर्वृत्रहन्ता च वासवः । (भीष्मजी कहते हैं—) लक्ष्मीदेवीके इस प्रकार कहनेपर देवर्षि नारद तथा वृत्रहन्ता इन्द्रने उनकी प्रसन्नताके लिये उनका अभिनन्दन किया ॥ ८५ १/२ ॥

ततोऽनलसखो वायुः प्रववौ देववर्त्मसु ॥ ८६ ॥ इष्टगन्धः सुखस्पर्शः सर्वेन्द्रियसुखावहः । उस समय देवमार्गोंपर मनोरम गन्ध और सुखद स्पर्शसे युक्त तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको आनन्द प्रदान करनेवाले वायुदेव, जो अग्निदेवताके मित्र हैं, मन्दगतिसे बहने लगे ॥ ८६ १/२ ॥

शुचौ वाभ्यर्थिते देशे त्रिदशाः प्रायशः स्थिताः ॥ ८७ ॥ लक्ष्मीसहितमासीनं मघवन्तं दिदृक्षवः ॥ ८८ ॥ उस परम पवित्र एवं मनोवाञ्छित प्रदेशमें राजलक्ष्मीसहित इन्द्रदेवका दर्शन करनेके लिये प्रायः सभी देवता उपस्थित हो गये ॥ ८७-८८ ॥

ततो दिवं प्राप्य सहस्रलोचनः श्रीयोपपन्नः सुहृदा महर्षिणा । रथेन हर्यश्वयुजा सुरर्षभः सदः सुराणामभिसत्कृतो ययौ ॥ ८९ ॥

तत्पश्चात् सहस्रनेत्रधारी सुरश्रेष्ठ इन्द्र लक्ष्मीदेवी तथा अपने सुहृद् महर्षि नारदके साथ हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर स्वर्गलोककी राजधानी अमरावतीमें आये और देवताओंसे सत्कृत हो उनकी सभामें गये ॥ ८९ ॥

अथेङ्गितं वज्रधरस्य नारदः श्रियश्च देव्या मनसा विचारयन् । श्रियै शशंसामरदृष्टपौरुषः शिवेन तत्रागमनं महर्षिभिः ॥ ९० ॥ उस समय अमरोंके पौरुषको प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदजीने अन्य महर्षियोंके साथ मिलकर वज्रधारी इन्द्र और लक्ष्मीदेवीके संकेतपर मन-ही-मन विचार करके वहाँ लक्ष्मीजीके शुभागमनकी प्रशंसा की और उनका पदार्पण सम्पूर्ण लोकोंके लिये मंगलकारी बताया ॥ ९० ॥

ततोऽमृतं द्यौः प्रववर्ष भास्वती पितामहस्यायतने स्वयम्भुवः । अनाहता दुन्दुभयोऽथ नेदिरे तथा प्रसन्नाश्च दिशश्चकाशिरे ॥ ९१ ॥ तदनन्तर निर्मल एवं प्रकाशपूर्ण आकाशमण्डल स्वयम्भू ब्रह्माजीके भवनमें अमृतकी वर्षा करने लगा। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं तथा सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ एवं प्रकाशित दिखायी देने लगीं ॥ ९१ ॥

यथर्तु सस्येषु ववर्ष वासवो न धर्ममार्गाद् विचचाल कश्चन । अनेकरत्नाकरभूषणा च भूः सुघोषघोषा भूवनौकसां जये ॥ ९२ ॥ लक्ष्मीजीके स्वर्गमें पधारनेपर इन्द्रदेव ऋतुके अनुसार संसारमें लगी हुई खेतीको सींचनेके लिये समयपर वर्षा करने लगे। कोई भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होता था तथा अनेक समुद्रोंसे विभूषित हुई पृथ्वी उन समुद्रोंकी गर्जनाके रूपमें त्रिभुवनवासियोंकी विजयके लिये मानो सुन्दर जयघोष करने लगी ॥ ९२ ॥

क्रियाभिरामा मनुजा मनस्विनो बभुः शुभे पुण्यकृतां पथि स्थिताः । नरामराः किन्नरयक्षराक्षसाः समृद्धिमन्तः सुमनस्विनोऽभवन् ॥ ९३ ॥ उस समय मनस्वी मानव पुण्यवानोंके मंगलमय पथपर स्थित हो सत्कर्मोंसे परम सुन्दर शोभा पाने लगे तथा देवता, किन्नर, यक्ष, राक्षस और मनुष्य समृद्धिशाली एवं उदारचेता हो गये ॥ ९३ ॥

न जात्वकाले कुसुमं कुतः फलं पपात वृक्षात् पवनेरितादपि । रसप्रदाः कामदुघाश्च धेनवो न दारुणा वाग् विचचार कस्यचित् ॥ ९४ ॥ उन दिनों अकाल मृत्युकी तो बात ही क्या है, प्रचण्ड पवनके वेगपूर्वक हिलानेसे भी किसी वृक्षसे असमयमें फूलतक नहीं गिरता था; फिर फल कहाँसे गिरेगा? सभी धेनुएँ दुग्ध आदि रस देती थीं। वे इच्छानुसार दुग्ध दिया करती थीं। किसीके मुखसे कभी कोई कठोर वचन नहीं निकलता था ॥ ९४ ॥

इमां सपर्यां सह सर्वकामैः श्रियश्च शक्रप्रमुखैश्च देवतैः । पठन्ति ये विप्रसदःसमागताः समृद्धकामाः श्रियमाप्नुवन्ति ते ॥ ९५ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले इन्द्र आदि देवताओंद्वारा की हुई लक्ष्मीजीकी इस पूजा-अर्चाके प्रसंगको जो लोग ब्राह्मणोंकी सभामें आकर पढ़ते हैं, उनकी सारी कामनाएँ सम्पन्न होती हैं और वे लक्ष्मी भी प्राप्त कर लेते हैं ॥ ९५ ॥

त्वया कुरूणां वर यत् प्रचोदितं भवाभवस्येह परं निदर्शनम् । तदद्य सर्वं परिकीर्तितं मया परीक्ष्य तत्त्वं परिगन्तुमर्हसि ॥ ९६ ॥ कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने जो अभ्युदय-पराभवका लक्षण पूछा था, वह सब मैंने आज यह उत्तम दृष्टान्त देकर बता दिया। तुम्हें स्वयं सोच-विचारकर उसकी यथार्थताका निश्चय करना चाहिये ॥ ९६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्री-वासवसंवादो नाम अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें लक्ष्मी और इन्द्रका संवादात्मक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२८ ॥

२२९-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपराक्रमः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! कैसे शील, किस तरहके आचरण, कैसी विद्या और कैसे पराक्रमसे युक्त होनेपर मनुष्य प्रकृतिसे परे अविनाशी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

मोक्षधर्मेषु नियतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं तत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो पुरुष मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर मोक्षोपयोगी धर्मोंके पालनमें संलग्न रहता है, वही प्रकृतिसे परे अविनाशी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है ॥ २ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
जैगीषव्यस्य संवादमसितस्य च भारत ॥ ३ ॥
भारत! इस विषयमें भी जैगीषव्य और असित-देवल मुनिका संवादरूप यह पुरातन इतिहास उदाहरणके तौरपर प्रस्तुत किया जाता है ॥ ३ ॥

जैगीषव्यं महाप्रज्ञं धर्माणामागतागमम् ।
अक्रुध्यन्तमहृष्यन्तमसितो देवलोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
एक बार सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले शास्त्रवेत्ता, महाज्ञानी और क्रोध एवं हर्षसे रहित जैगीषव्य मुनिसे असित-देवलने इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥

देवल उवाच

न प्रीयसे वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यसे ।
का ते प्रज्ञा कुतश्चैषा किं ते तस्याः परायणम् ॥ ५ ॥
**देवल बोले—**मुनिवर! यदि आपको कोई प्रणाम करे, तो आप अधिक प्रसन्न नहीं होते और निन्दा करे तो भी आप उसपर क्रोध नहीं करते, यह आपकी बुद्धि कैसी है? कहाँसे प्राप्त हुई है? और आपकी इस बुद्धिका परम आश्रय क्या है? ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

इति तेनानुयुक्तः स तमुवाच महातपाः ।