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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

तदस्य चेतनामाशु हरत्यभ्रमिवानिलः ॥ ६ ॥ इन दोनोंमेंसे एक-न-एककी प्राप्ति तो होती ही है; अतः जो भी सुख या दुःख उपस्थित होता है, वही मनुष्यके ज्ञानको उसी प्रकार हर लेता है, जैसे हवा बादलको उड़ा ले जाती है ॥ ६ ॥

अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः । इत्येभिर्हेतुभिस्तस्य त्रिभिश्चिक्तं प्रसिच्यते ॥ ७ ॥ इसीसे 'मैं कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ और कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ' ये अहंकारकी तीन धाराएँ मनुष्यके चित्तको सींचने लगती हैं ॥ ७ ॥

सम्प्रसक्तमना भोगान् विसृज्य पितृसंचितान् । परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥ ८ ॥ फिर वह मनुष्य भोगोंमें आसक्तचित्त होकर क्रमशः बाप-दादोंकी रखी हुई कमाईको उड़ाकर कंगाल हो जाता है और दूसरोंके धनको हड़प लेना अच्छा मानने लगता है ॥ ८ ॥

तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् । प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥ ९ ॥ जैसे व्याधे अपने बाणोंद्वारा मृगोंको आगे बढ़नेसे रोकते हैं, उसी प्रकार मर्यादा लाँघकर अनुचितरूपसे दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाले उस मनुष्यको राजालोग दण्डद्वारा वैसे कुमार्गपर चलनेसे रोकते हैं ॥ ९ ॥

ये च विंशतिवर्षा वा त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः । परेण ते वर्षशतान्न भविष्यन्ति पार्थिव ॥ १० ॥ राजन्! जो बीस या तीस वर्षकी उम्रवाले मनुष्य चोरी आदि कुकर्मोंमें लग जाते हैं, वे सौ वर्षतक जीवित नहीं रह पाते ॥ १० ॥

तेषां परमदुःखानां बुद्ध्या भेषज्यमाचरेत् । सर्वप्राणभृतां वृत्तं प्रेक्षमाणस्ततस्ततः ॥ ११ ॥ जहाँ-तहाँ समस्त प्राणियोंके दुःखद बर्तावसे उनपर जो कुछ बीतता है उसे देखता हुआ मनुष्य दरिद्रतासे प्राप्त होनेवाले उन महान् दुःखोंका निवारण करनेके लिये बुद्धिके द्वारा औषध करे (अर्थात् विचारद्वारा अपने-आपको कुमार्गपर जानेसे रोके) ॥ ११ ॥

मानसानां पुनर्योनिर्दुःखानां चित्तविभ्रमः । अनिष्टोपनिपातो वा तृतीयं नोपपद्यते ॥ १२ ॥ मनुष्योंको बार-बार मानसिक दुःखोंकी प्राप्तिके कारण दो ही हैं—चित्तका भ्रम और अनिष्टकी प्राप्ति। तीसरा कोई कारण सम्भव नहीं है ॥ १२ ॥

एवमेतानि दुःखानि तानि तानीह मानवम् । विविधान्युपवर्तन्ते तथा संस्पर्शजान्यपि ॥ १३ ॥

इस प्रकार मनुष्यको इन्हीं दो कारणोंसे ये भिन्न-भिन्न प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं। विषयोंकी आसक्तिसे भी ये दुःख प्राप्त होते हैं ।। १३ ।। जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव । बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ।। १४ ।। बुढ़ापा और मृत्यु—ये दोनों दो भेड़ियोंके समान हैं, जो बलवान् दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियोंको खा जाते हैं ।। १४ ।। न कश्चिज्जात्वतिक्रामेज्जरामृत्यू हि मानवः । अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ।। १५ ।। कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मौतको लाँघ नहीं सकता। भले ही वह समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीपर विजय पा चुका हो ।। १५ ।। सुखं वा यदि वा दुःखं भूतानां पर्युपस्थितम् । प्राप्तव्यमवशैः सर्वं परिहारो न विद्यते ।। १६ ।। प्राणियोंके निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता है, क्योंकि उसके टालनेका कोई उपाय नहीं है ।। १६ ।। पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप । अवर्जनीयास्तेऽर्था वै कांक्षिता ये ततोऽन्यथा ।। १७ ।। नरेश्वर! पूर्वावस्था, मध्यावस्था अथवा उत्तरावस्थामें कभी-न-कभी वे क्लेश अनिवार्यरूपसे प्राप्त होते ही हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीतरूपमें चाहता है (अर्थात् सुख-ही-सुखकी इच्छा करता है; परंतु उसे कष्ट भी प्राप्त होते ही हैं) ।। १७ ।। अप्रियैः सह संयोगो विप्रयोगश्च सुप्रियैः । अर्थानर्थौ सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते ।। १८ ।। अप्रिय वस्तुओंके साथ संयोग, अत्यन्त प्रिय वस्तुओंका वियोग, अर्थ, अनर्थ, सुख और दुःख—इन सबकी प्राप्ति प्रारब्धके विधानके अनुसार होती है ।। १८ ।। प्रादुर्भावश्च भूतानां देहत्यागस्तथैव च । प्राप्तिर्व्यायामयोगश्च सर्वमेतत् प्रतिष्ठितम् ।। १९ ।। प्राणियोंकी उत्पत्ति, देहावसान, लाभ* और हानि—ये सब प्रारब्धके ही आधारपर स्थित हैं ।। १९ ।। गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावतः । तथैव सुखदुःखानि विधानमनुवर्तते ।। २० ।। जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध स्वभावतः आते-जाते रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य सुख और दुःखोंको प्रारब्धानुसार पाता रहता है ।। २० ।। आसनं शयनं यानमुत्थानं पानभोजनम् । नियतं सर्वभूतानां कालेनैव भवत्युत ।। २१ ।।

सभी प्राणियोंके लिये बैठना, सोना, चलना-फिरना, उठना और खाना-पीना—ये सभी कार्य समयके अनुसार ही नियत रूपसे होते रहते हैं ।। २१ ।।
वैद्याश्चाप्यातुराः सन्ति बलवन्तश्च दुर्बलाः ।
श्रीमन्तश्चापरे षण्ढा विचित्रः कालपर्ययः ।। २२ ।।
कभी-कभी वैद्य भी रोगी, बलवान् भी दुर्बल और श्रीमान् भी असमर्थ हो जाते हैं, यह समयका उलट-फेर बड़ा अद्भुत है ।। २२ ।।
कुले जन्म तथा वीर्यमारोग्यं रूपमेव च ।
सौभाग्यमुपभोगश्च भवितव्येन लभ्यते ।। २३ ।।
उत्तम कुलमें जन्म, बल-पराक्रम, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और उपभोग-सामग्री—ये सब होनहारके अनुसार ही प्राप्त होते हैं ।। २३ ।।
सन्ति पुत्राः सुबहवो दरिद्राणामनिच्छताम् ।
नास्ति पुत्रः समृद्धानां विचित्रं विधिचेष्टितम् ।। २४ ।।
जो दरिद्र हैं और संतानकी इच्छा नहीं रखते हैं, उनके तो बहुत-से पुत्र हो जाते हैं और जो धनवान् हैं, उनमेंसे किसी-किसीको एक पुत्र भी नहीं प्राप्त होता। विधाताकी चेष्टा बड़ी विचित्र है ।। २४ ।।
व्याधिरग्निर्जलं शस्त्रं बुभुक्षाश्वापदो विषम् ।
ज्वरश्च मरणं जन्तोरुच्चाच्च पतनं तथा ।। २५ ।।
निर्माणे यस्य यद् दिष्टं तेन गच्छति सेतुना ।
रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, प्यास, विपत्ति, विष, ज्वर और ऊँचे स्थानसे गिरना—ये सब जीवकी मृत्युके निमित्त हैं। जन्मके समय जिसके लिये प्रारब्धवश जो निमित्त नियत कर दिया गया है, वही उसका सेतु है, अतः उसीके द्वारा वह जाता है अर्थात् परलोकमें गमन करता है ।। २५ ½ ।।
दृश्यते नाप्यतिक्रामन् निष्क्रान्तोऽथवा पुनः ।। २६ ।।
दृश्यते चाप्यतिक्रामन्निग्राह्योऽथवा पुनः ।
कोई इस सेतुका उल्लंघन करता दिखायी नहीं देता अथवा पहले भी किसीने इसका उल्लंघन किया हो, ऐसा देखनेमें नहीं आया। कोई-कोई पुरुष जो (तपस्या आदि प्रबल पुरुषार्थके द्वारा) दैवके नियन्त्रणमें रहनेयोग्य नहीं है, वह पूर्वोक्त सेतुका उल्लंघन करता भी दिखायी देता है ।। २६ ½ ।।
दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन् वसुमान् नरः ।
दरिद्रश्च परिक्लिष्टः शतवर्षो जरान्वितः ।। २७ ।।
इस जगत्में धनवान् मनुष्य भी जवानीमें ही नष्ट होता दिखायी देता है और क्लेशमें पड़ा हुआ दरिद्र भी सौ वर्षोंतक जीवित रहकर अत्यन्त वृद्धावस्थामें मरता देखा जाता है ।। २७ ।।

अकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः ।
समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतंगवत् ॥ २८ ॥
जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे दरिद्र भी दीर्घजीवी देखे जाते हैं और धनवान् कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य भी कीट-पतंगोंके समान नष्ट होते रहते हैं ॥

प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते ।
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ २९ ॥
जगत्में प्रायः धनवानोंको खाने और पचानेकी शक्ति ही नहीं रहती है और दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं ॥ २९ ॥

अहमेतत् करोमीति मन्यते कालनोदितः ।
यद् यदिष्टमसंतोषाद् दुरात्मा पापमाचरेत् ॥ ३० ॥
दुरात्मा मनुष्य कालसे प्रेरित होकर यह अभिमान करने लगता है कि मैं यह करूँगा। तत्पश्चात् असंतोषवश उसे जो-जो अभीष्ट होता है, उस पापपूर्ण कृत्यको भी वह करने लगता है ॥ ३० ॥

मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं प्रसंगा निन्दिता बुधैः ।
दृश्यन्ते पुरुषाश्चात्र सम्प्रयुक्ता बहुश्रुताः ॥ ३१ ॥
विद्वान् पुरुष शिकार करने, जूआ खेलने, स्त्रियोंके संसर्गमें रहने और मदिरा पीनेके प्रसंगोंकी बड़ी निन्दा करते हैं, परंतु इन पापकर्मोंमें अनेक शास्त्रोंके श्रवण और अध्ययनसे सम्पन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ॥

इति कालेन सर्वार्थानीप्सितानीप्सितानिह ।
स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार कालके प्रभावसे समस्त प्राणी इष्ट और अनिष्ट पदार्थोंको प्राप्त करते रहते हैं, इस इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिका अदृष्टके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ३२ ॥

वायुमाकाशमग्निं च चन्द्रादित्यावहःक्षपे ।
ज्योतींषि सरितः शैलान् कः करोति बिभर्ति च ॥ ३३ ॥
वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतोंको कालके सिवा कौन बनाता और धारण करता है? ॥ ३३ ॥

शीतमुष्णं तथा वर्षं कालेन परिवर्तते ।
एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ ॥ ३४ ॥
सर्दी, गर्मी और वर्षाका चक्र भी कालसे ही चलता है। नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्योंके सुख-दुःख भी कालसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥

नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपाः ।
त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ॥ ३५ ॥

वृद्धावस्था और मृत्युके वशमें पड़े हुए मनुष्यको औषध, मन्त्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते हैं।।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागमः ।। ३६ ।।
जैसे महासागरमें एक काठ एक ओरसे और दूसरा दूसरी ओरसे आकर दोनों थोड़ी देरके लिये मिल जाते हैं तथा मिलकर फिर बिछुड़ भी जाते हैं, इसी प्रकार यहाँ प्राणियोंके संयोग-वियोग होते रहते हैं ।। ३६ ।।

ये चैव पुरुषाः स्त्रीभिर्गीतवाद्यैरुपस्थिताः ।
ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रियः ।। ३७ ।।
जगत्में जिन धनवान् पुरुषोंकी सेवामें बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत और वाद्योंके साथ उपस्थित हुआ करती हैं और जो अनाथ मनुष्य दूसरोंके अन्नपर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सबके प्रति कालकी समान चेष्टा होती है ।। ३७ ।।

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ।। ३८ ।।
हमने संसारमें अनेक बार जन्म लेकर सहस्रों माता-पिता और सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके सुखका अनुभव किया है; परंतु अब वे किसके हैं अथवा हम उनमेंसे किसके हैं? ।। ३८ ।।

नैवास्य कश्चिद् भविता नायं भवति कस्यचित् ।
पथि संगतमेवेदं दारबन्धुसुहृज्जनैः ।। ३९ ।।
इस जीवका न तो कोई सम्बन्धी होगा और न यह किसीका सम्बन्धी है। जैसे मार्गमें चलनेवालोंको दूसरे राहगीरोंका साथ मिल जाता है, उसी प्रकार यहाँ भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और सुहृदोंका समागम होता है ।। ३९ ।।

क्वासे क्व च गमिष्यामि को न्वहं किमिहास्थितः ।
कस्मात् किमनुशोचेयमित्येवं स्थापयेन्मनः ।। ४० ।।
अतः विवेकी पुरुषको अपने मनमें यह विचार करना चाहिये कि 'मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा, कौन हूँ, यहाँ किसलिये आया हूँ और किसलिये किसका शोक करूँ?' ।।

अनित्ये प्रियसंवासे संसारे चक्रवद्गतौ ।
पथि संगतमेवैतद् भ्राता माता पिता सखा ।। ४१ ।।
यह संसार चक्रके समान घूमता रहता है। इसमें प्रियजनोंका सहवास अनित्य है। यहाँ भ्राता, मित्र, पिता और माता आदिका साथ रास्तेमें मिले हुए बटोहियोंके समान ही है ।। ४१ ।।

न दृष्टपूर्वं प्रत्यक्षं परलोकं विदुर्बुधाः ।
आगमांस्त्वनतिक्रम्य श्रद्धातव्यं बुभूषता ।। ४२ ।।

यद्यपि विद्वान् पुरुष कहते हैं कि परलोक न तो आँखोंके सामने है और न पहलेका ही देखा हुआ है, तथापि अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके उसकी बातोंपर विश्वास करना चाहिये ।। ४२ ।।

कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्माणि च समाचरेत् ।
यजेच्च विद्वान् विधिवत् त्रिवर्गं चाप्युपाचरेत् ।। ४३ ।।
विज्ञ पुरुष पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका यजन करे। धर्मानुकूल कार्योंका अनुष्ठान और यज्ञ करे तथा विधिपूर्वक धर्म, अर्थ और कामका भी सेवन करे ।। ४३ ।।

संनिमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे ।
जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते ।। ४४ ।।
जिसमें जरा और मृत्युरूपी बड़े-बड़े ग्राह पड़े हुए हैं, उस गम्भीर कालसमुद्रमें यह सारा संसार डूब रहा है, किंतु कोई इस बातको समझ नहीं पाता है ।। ४४ ।।

आयुर्वेदमधीयानाः केवलं सपरिग्रहाः ।
दृश्यन्ते बहवो वैद्या व्याधिभिः समभिप्लुताः ।। ४५ ।।
केवल आयुर्वेदका अध्ययन करनेवाले बहुत-से वैद्य भी परिवारसहित रोगोंके शिकार हुए देखे जाते हैं ।।

ते पिबन्तः कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च ।
न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ।। ४६ ।।
वे कड़वे-कड़वे काढ़े और नाना प्रकारके घृत पीते रहते हैं तो भी जैसे महासागर अपनी तट-भूमिसे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे मौतको लाँघ नहीं पाते हैं ।।

रसायनविदश्चैव सुप्रयुक्तरसायनाः ।
दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः ।। ४७ ।।
रसायन जाननेवाले वैद्य अपने लिये रसायनोंका अच्छी तरह प्रयोग करके भी वृद्धावस्थाद्वारा वैसे ही जर्जर हुए दिखायी देते हैं, जैसे श्रेष्ठ हाथियोंके आघातसे टूटे हुए वृक्ष दृष्टिगोचर होते हैं ।। ४७ ।।

तथैव तपसोपेताः स्वाध्यायाभ्यसने रताः ।
दातारो यज्ञशीलाश्च न तरन्ति जरान्तकौ ।। ४८ ।।
इसी प्रकार शास्त्रोंके स्वाध्याय और अभ्यासमें लगे हुए विद्वान्, तपस्वी, दानी और यज्ञशील पुरुष भी जरा और मृत्युको पार नहीं कर पाते हैं ।। ४८ ।।

न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः समाः ।
जातानां सर्वभूतानां न पक्षा न पुनः क्षपाः ।। ४९ ।।
संसारमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणियोंके दिन-रात, वर्ष, मास और पक्ष एक बार बीतकर फिर वापस नहीं लौटते हैं ।। ४९ ।।

सोऽयं विपुलमध्वानं कालेन ध्रुवमध्रुवः ।

नरोऽवशः समभ्येति सर्वभूतनिषेवितम् ॥ ५० ॥ मृत्युके इस विशाल मार्गका सेवन सभी प्राणियोंको करना पड़ता है। इस अनित्य मानवको भी कालसे विवश होकर कभी न टलनेवाले मृत्युके मार्गपर आना ही पड़ता है ॥ ५० ॥

देहो वा जीवतोऽभ्येति जीवो वाभ्येति देहतः । पथि संगममभ्येति दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ॥ ५१ ॥ (आस्तिक मतके अनुसार) जीव (चेतन) से शरीरकी उत्पत्ति हो या (नास्तिकोंकी मान्यताके अनुसार) शरीरसे जीवकी। सर्वथा स्त्री-पुत्र आदि या अन्य बन्धुओंके साथ जो समागम होता है, वह रास्तेमें मिलनेवाले राहगीरोंके समान ही है ॥ ५१ ॥

नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् । अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ५२ ॥ किसी भी पुरुषको कभी किसीके साथ भी सदा एक स्थानमें रहनेका सुयोग नहीं मिलता। जब अपने शरीरके साथ भी बहुत दिनोंतक सम्बन्ध नहीं रहता, तब दूसरे किसीके साथ कैसे रह सकता है? ॥ ५२ ॥

क्व नु तेऽद्य पिता राजन् क्व नु तेऽद्य पितामहाः । न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽनघ ॥ ५३ ॥ राजन्! आज तुम्हारे पिता कहाँ हैं? आज तुम्हारे पितामह कहाँ गये? निष्पाप नरेश! आज न तो तुम उन्हें देख रहे हो और न वे तुम्हें देखते हैं ॥ ५३ ॥

न चैव पुरुषो द्रष्टा स्वर्गस्य नरकस्य च । आगमस्तु सतां चक्षुर्नृपते तमिहाचर ॥ ५४ ॥ कोई भी मनुष्य यहींसे इन स्थूल नेत्रोंद्वारा स्वर्ग और नरकको नहीं देख सकता। उन्हें देखनेके लिये सत्पुरुषोंके पास शास्त्र ही एकमात्र नेत्र हैं, अतः नरेश्वर! तुम यहाँ उस शास्त्रके अनुसार ही आचरण करो ॥ ५४ ॥

चरितब्रह्मचयर्यो हि प्रजायेत यजेत च । पितृदेवमनुष्याणामृण्यादनसूयकः ॥ ५५ ॥ मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पूर्णरूपसे पालन करके गृहस्थ-आश्रम स्वीकार करे और पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों (अतिथियों) के ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पादन तथा यज्ञ करे, किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखे ॥ ५५ ॥

स यज्ञशीलः प्रजने निविष्टः प्राग् ब्रह्मचारी प्रविविक्तचक्षुः । आराधयेत् स्वर्गमिमं च लोकं परं च मुक्त्वा हृदयव्यलीकम् ॥ ५६ ॥

मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पालन करके संतानोत्पादनके लिये विवाह करे, नेत्र आदि इन्द्रियोंको पवित्र रखे और स्वर्गलोक तथा इहलोकके सुखकी आशा छोड़कर हृदयके शोक-संतापको दूर करके यज्ञपरायण हो परमात्माकी आराधना करता रहे ॥ ५६ ॥

समं हि धर्मं चरतो नृपस्य
द्रव्याणि चाभ्याहरतो यथावत् ।
प्रवृत्तधर्मस्य यशोऽभिवर्धते
सर्वेषु लोकेषु चराचरेषु ॥ ५७ ॥

राजा यदि नियमपूर्वक प्रजाके निकटसे करके रूपमें द्रव्य ग्रहण करे और राग-द्वेषसे रहित हो राजधर्मका पालन करता रहे तो उस धर्मपरायण नरेशका सुयश सम्पूर्ण चराचर लोकोंमें फैल जाता है ॥ ५७ ॥

इत्येवमाज्ञाय विदेहराजो
वाक्यं समग्रं परिपूर्णहेतुः ।
अश्मानमामन्त्र्य विशुद्धबुद्धि-
र्ययौ गृहं स्वं प्रति शान्तशोकः ॥ ५८ ॥

निर्मल बुद्धिवाले विदेहराज जनक अश्माका यह युक्तिपूर्ण सम्पूर्ण उपदेश सुनकर शोकरहित हो गये और उनकी आज्ञा ले अपने घरको लौट गये ॥ ५८ ॥

तथा त्वमप्यच्युत मुञ्च शोक-
मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि ।
क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते
तां भुङ्क्ष्व कुन्तीसुत मावमंस्थाः ॥ ५९ ॥

अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी कुन्तीकुमार युधिष्ठिर! तुम भी शोक छोड़कर उठो और हृदयमें हर्ष धारण करो। तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर विजय पायी है; अतः इसे भोगो। इसकी अवहेलना न करो ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्येऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥


* नीलकण्ठने 'प्राप्ति' का अर्थ 'लाभ' और 'व्यायाम' का अर्थ उसके विपरीत 'अलाभ' किया है।

श्रीकृष्णके द्वारा नारद-संजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा नारद-संजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न

वैशम्पायन उवाच

अव्याहरति राजेन्द्रे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ।
गुडाकेशो हृषीकेशमभ्यभाषत पाण्डवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सबके समझाने-बुझानेपर भी जब धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर मौन ही रह गये, तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ १ ॥

अर्जुन उवाच

ज्ञातिशोकाभिसंतप्तो धर्मपुत्रः परंतपः ।
एष शोकार्णवे मग्नस्तमाश्वासय माधव ॥ २ ॥
**अर्जुन बोले—**माधव! शत्रुओंको संताप देनेवाले ये धर्मपुत्र युधिष्ठिर स्वयं भाई-बन्धुओंके शोकसे संतप्त हो शोकके समुद्रमें डूब गये हैं, आप इन्हें धीरज बँधाइये ॥

सर्वे स्म ते संशयिताः पुनरेव जनार्दन ।
अस्य शोकं महाबाहो प्रणाशयितुमर्हसि ॥ ३ ॥
महाबाहु जनार्दन! हम सब लोग पुनः महान् संशयमें पड़ गये हैं। आप इनके शोकका नाश कीजिये ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गोविन्दो विजयेन महात्मना ।
पर्यवर्तत राजानं पुण्डरीकेक्षणोऽच्युतः ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! महामना अर्जुनके ऐसा कहनेपर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले कमलनयन भगवान् गोविन्द राजा युधिष्ठिरकी ओर घूमे—उनके सम्मुख हुए ॥ ४ ॥

अनतिक्रमणीयो हि धर्मराजस्य केशवः ।
बाल्यात् प्रभृति गोविन्दः प्रीत्या चाभ्यधिकोऽर्जुनात् ॥ ५ ॥
धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे; क्योंकि श्रीकृष्ण बाल्यावस्थासे ही उन्हें अर्जुनसे भी अधिक प्रिय थे ॥ ५ ॥

सम्प्रगृह्य महाबाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् ।
शैलस्तम्भोपमं शौरिरुवाचाभिविनोदयन् ॥ ६ ॥
महाबाहु गोविन्दने युधिष्ठिरकी पत्थरके बने हुए खम्भे-जैसी चन्दनचर्चित भुजाको हाथमें लेकर उनका मनोरंजन करते हुए इस प्रकार बोलना आरम्भ किया ॥ ६ ॥

शुशुभे वदनं तस्य सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् ।
व्याकोशमिव विस्पष्टं पद्मं सूर्य इवोदिते ॥ ७ ॥
उस समय सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रोंसे युक्त उनका मुखारविन्द सूर्योदयके समय पूर्णतः विकसित हुए कमलके समान शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥

वासुदेव उवाच

मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं त्वं गात्रशोषणम् ।
न हि ते सुलभा भूयो ये हतास्मिन् रणाजिरे ॥ ८ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**पुरुषसिंह! तुम शोक न करो। शोक तो शरीरको सुखा देनेवाला होता है। इस समरांगणमें जो वीर मारे गये हैं, वे फिर सहज ही मिल सकें, यह सम्भव नहीं है ॥ ८ ॥

स्वप्नलब्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिबोधने ।
एवं ते क्षत्रिया राजन् ये व्यतीता महारणे ॥ ९ ॥
राजन्! जैसे सपनेमें मिले हुए धन जगनेपर मिथ्या हो जाते हैं, उसी प्रकार जो क्षत्रिय महासमरमें नष्ट हो गये हैं, उनका दर्शन अब दुर्लभ है ॥ ९ ॥

सर्वेऽप्यभिमुखाः शूरा विजिता रणशोभिनः ।
नैषां कश्चित् पृष्ठतो वा पलायन् वापि पतितः ॥ १० ॥
संग्राममें शोभा पानेवाले वे सभी शूरवीर शत्रु का सामना करते हुए पराजित हुए हैं। उनमेंसे कोई भी पीठपर चोट खाकर या भागता हुआ नहीं मारा गया है ॥

सर्वे त्यक्त्वाऽऽत्मनः प्राणान् युद्ध्य्वा वीरा महामृधे ।
शस्त्रपूता दिवं प्राप्ता न तान् शोचितुमर्हसि ॥ ११ ॥
सभी वीर महायुद्धमें जूझते हुए अपने प्राणोंका परित्याग करके अस्त्र-शस्त्रोंसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें गये हैं, अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥

क्षत्रधर्मरताः शूरा वेदवेदाङ्गपारगाः ।
प्राप्ता वीरगतिं पुण्यां तान् न शोचितुमर्हसि ॥ १२ ॥
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ।
क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले, वेद-वेदांगोंके पारंगत वे शूरवीर नरेश पुण्यमयी वीर-गतिको प्राप्त हुए हैं। पहलेके मरे हुए महानुभाव भूपतियोंका चरित्र सुनकर तुम्हें अपने उन बन्धुओंके लिये भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ १२ १/२ ॥

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।। १३ ।।
सृञ्जयं पुत्रशोकार्तं यथायं नारदोऽब्रवीत् ।
इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जैसा कि इन देवर्षि नारदजीने पुत्र-शोकसे पीड़ित हुए राजा सृञ्जयसे कहा था ।। १३१/२ ।।
सुखदुःखैरहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृञ्जय ।। १४ ।।
अविमुक्ता मरिष्यामस्तत्र का परिदेवना ।
‘सृञ्जय! मैं, तुम और ये समस्त प्रजावर्गके लोग कोई भी सुख और दुःखोंके बन्धनसे मुक्त नहीं हुए हैं तथा एक दिन हम सब लोग मरेंगे भी। फिर इसके लिय शोक क्या करना है? ।। १४१/२ ।।
महाभाग्यं पुरा राज्ञां कीर्त्यमानं मया शृणु ।। १५ ।।
गच्छावधानं नृपते ततो दुःखं प्रहास्यसि ।
‘नरेश्वर! मैं पूर्ववर्ती राजाओंके महान् सौभाग्यका वर्णन करता हूँ। सुनो और सावधान हो जाओ। इससे तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा ।। १५१/२ ।।
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ।। १६ ।।
शममानय संतापं शृणु विस्तरशश्च मे ।
‘मरे हुए महानुभाव भूपतियोंके नाम सुनकर ही तुम अपने मानसिक संतापको शान्त कर लो और मुझसे विस्तारपूर्वक उन सबका परिचय सुनो ।। १६१/२ ।।
क्रूरग्रहाभिशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ।। १७ ।।
अग्रियाणां क्षितिभुजामुपादानं मनोहरम् ।
‘उन पूर्ववर्ती राजाओंका श्रवण करनेयोग्य मनोहर वृत्तान्त बहुत ही उत्तम, क्रूर ग्रहोंको शान्त करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है ।। १७१/२ ।।
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।। १८ ।।
यस्य सेन्द्राः सवरुणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।
देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीयुर्महात्मनः ।। १९ ।।
‘सृञ्जय! हमने सुना है कि अविक्षित्के पुत्र वे राजा मरुत्त भी मर गये, जिन महात्मा नरेशके यज्ञमें इन्द्र तथा वरुणसहित सम्पूर्ण देवता और प्रजापतिगण बृहस्पतिको आगे करके पधारे थे ।। १८-१९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 190)

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महाभारत

स्वयं श्रीकृष्ण शोकमग्न युधिष्ठिरको समझा रहे हैं

यः स्पर्धयायाजच्छक्रं देवराजं पुरंदरम् । शक्रप्रियैषी यं विद्वान् प्रत्याचष्ट बृहस्पतिः ॥ २० ॥ संवर्तो याजयामास यवीयान् स बृहस्पतेः । 'उन्होंने देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखनेके कारण अपने यज्ञ-वैभवद्वारा उन्हें पराजित कर दिया था। इन्द्रका प्रिय चाहनेवाले बृहस्पतिजीने जब उनका यज्ञ करानेसे इन्कार कर दिया, तब उन्हींके छोटे भाई संवर्तने मरुत्तका यज्ञ कराया था ॥ २० ½ ॥ यस्मिन् प्रशासति महीं नृपतौ राजसत्तम । अकृष्टपच्या पृथिवी विबभौ चैत्यमालिनी ॥ २१ ॥ नृपश्रेष्ठ! राजा मरुत्त जब इस पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय यह बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी और समस्त भूमण्डलमें देवालयोंकी माला-सी दृष्टिगोचर होती थी, जिससे इस पृथ्वीकी बड़ी शोभा होती थी ॥ २१ ॥ आविक्षितस्य वै सत्रे विश्वेदेवाः सभासदः । मरुतः परिवेष्टारः साध्याश्चासन् महात्मनः ॥ २२ ॥ 'महामना मरुत्तके यज्ञमें विश्वेदेवगण सभासद थे और मरुद्गण तथा साध्यगण रसोई परोसनेका काम करते थे ॥ २२ ॥ मरुद्गणा मरुत्तस्य यत् सोममपिबंस्ततः । देवान् मनुष्यान् गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ॥ २३ ॥ 'मरुद्गणोंने मरुत्तके यज्ञमें उस समय खूब सोमरसका पान किया था। राजाने जो दक्षिणाएँ दी थीं, वे देवताओं, मनुष्यों और गन्धर्वोंके सभी यज्ञोंसे बढ़कर थीं ॥ २३ ॥ स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ २४ ॥ 'संजय! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य—इन चारों बातोंमें राजा मरुत्त तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब औरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो ॥ २४ ॥ सुहोत्रं चैवातिथिनं मृतं संजय शुश्रुम । यस्मिन् हिरण्यं ववृषे मघवा परिवत्सरम् ॥ २५ ॥ 'संजय! अतिथिसत्कारके प्रेमी राजा सुहोत्र भी जीवित नहीं रहे, ऐसा सुननेमें आया है। उनके राज्यमें इन्द्रने एक वर्षतक सोनेकी वर्षा की थी ॥ २५ ॥ सत्यनामा वसुमती यं प्राप्यासीज्जनाधिपम् । हिरण्यमवहन् नद्यस्तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ २६ ॥ 'राजा सुहोत्रको पाकर पृथ्‍वीका वसुमती नाम सार्थक हो गया था। जिस समय वे जनपदके स्वामी थे, उन दिनों वहाँकी नदियाँ अपने जलके साथ-साथ सुवर्ण बहाया करती थीं ॥ २६ ॥

कूर्मान् कर्कटकान् नक्रान् मकराञ्छिंशुकानपि ।
नदीष्वपातयद् राजन् मघवा लोकपूजितः ॥ २७ ॥
'राजन्! लोकपूजित इन्द्रने सोनेके बने हुए बहुत-से कछुए, केकड़े, नाके, मगर, सूँस और मत्स्य उन नदियोंमें गिराये थे ॥ २७ ॥

हिरण्यान् पतितान् दृष्ट्वा मत्स्यान् मकरकच्छपान् ।
सहस्रशोऽथ शतशस्ततोऽस्मयदथोऽतिथिः ॥ २८ ॥
'उन नदियोंमें सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें सुवर्णमय मत्स्यों, ग्राहों और कछुओंको गिराया गया देख अतिथिप्रिय राजा सुहोत्र आश्चर्यचकित हो उठे थे ॥

तद्धिरण्‍यमपर्यन्तमावृतं कुरुजाङ्गले ।
ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समर्पयत् ॥ २९ ॥
'वह अनन्त सुवर्णराशि कुरुजांगल देशमें छा गयी थी। राजा सुहोत्रने वहाँ यज्ञ किया और उसमें वह सारी धनराशि ब्राह्मणोंमें बाँट दी ॥ २९ ॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ३० ॥
अदक्षिणमयज्वानं श्वैत्य संशाम्य मा शुचः ।
'श्वेतपुत्र सृंजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो। उसने न तो कोई यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही बाँटी थी, अतः उसके लिये शोक न करो, शान्त हो जाओ ॥ ३० १/२ ॥

अङ्गं बृहद्रथं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम ॥ ३१ ॥
यः सहस्रं सहस्राणां श्वेतानश्वानवासृजत् ।
सहस्रं च सहस्राणां कन्या हेमपरिष्कृताः ॥ ३२ ॥
ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ।
'सृंजय! अंगदेशके राजा बृहद्रथकी भी मृत्यु हुई थी, ऐसा हमने सुना है। उन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें दस लाख श्वेत घोड़े और सोनेके आभूषणोंसे भूषित दस लाख कन्याएँ दक्षिणारूपमें बाँटी थीं ॥ ३१-३२ १/२ ॥

यः सहस्रं सहस्राणां गजानां पद्ममालिनाम् ॥ ३३ ॥
ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ।
'इसी प्रकार यजमान बृहद्रथने उस विस्तृत यज्ञमें सुवर्णमय कमलोंकी मालाओंसे अलंकृत दस लाख हाथी भी दक्षिणामें बाँटे थे ॥ ३३ १/२ ॥

शतं शतसहस्राणि वृषाणां हेममालिनाम् ॥ ३४ ॥
गवां सहस्रानुचरं दक्षिणामत्यकालयत् ।

‘उन्होंने उस यज्ञमें एक करोड़ सुवर्णमालाधारी गाय, बैल और उनके सहस्रों सेवक दक्षिणारूपमें दिये थे॥

अङ्गस्य यजमानस्य तदा विष्णुपदे गिरौ ॥ ३५ ॥
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।
‘यजमान अंग जब विष्णुपद पर्वतपर यज्ञ कर रहे थे, उस समय इन्द्र वहाँ सोमरस पीकर मतवाले हो उठे थे और दक्षिणाओंसे ब्राह्मणोंपर भी आनन्दोन्माद छा गया था॥ ३५ ½॥

यस्य यज्ञेषु राजेन्द्र शतसंख्येषु वै पुरा ॥ ३६ ॥
देवान् मनुष्यान् गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ।
‘राजेन्द्र! प्राचीन कालमें अंगराजने ऐसे-ऐसे सौ यज्ञ किये थे और उन सबमें जो दक्षिणाएँ दी गयी थीं, वे देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्योंके यज्ञोंसे बढ़ गयी थीं॥

न जातो जनिता नान्यः पुमान् यः सम्प्रदास्यति ॥ ३७ ॥
यदङ्गः प्रददौ वित्तं सोमसंस्थासु सप्तसु ।
‘अंगराजने सातों सोम-संस्थाओंमें १ जो धन दिया था, उतना जो दे सके, ऐसा दूसरा न तो कोई मनुष्य पैदा हुआ है और न पैदा होगा॥ ३७ ½॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥ ३८ ॥
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
‘सृंजय! पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे बृहद्रथ तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये संतप्त न होओ॥ ३८ ½॥

शिबिर्मौशीनरं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम ॥ ३९ ॥
य इमां पृथिवीं सर्वां चर्मवत्समवेष्टयत् ।
‘सृंजय! जिन्होंने इस सम्पूर्ण पृथिवीको चमड़ेकी भाँति लपेट लिया था (सर्वथा अपने अधीन कर लिया था), वे उशीनरपुत्र राजा शिबि भी मरे थे, यह हमने सुना है॥ ३९ ½॥

महता रथघोषेण पृथिवीमनुनादयन् ॥ ४० ॥
एकच्छत्रां महीं चक्रे जैत्रेणैकरथेन यः ।
‘वे अपने रथकी गम्भीर ध्वनिसे पृथिवीको प्रतिध्वनित करते हुए एकमात्र विजयशील रथके द्वारा इस भूमण्डलका एकछत्र शासन करते थे॥ ४० ½॥

यावदद्य गवाश्वं स्यादारण्यैः पशुभिः सह ॥ ४१ ॥
तावतीः प्रददौ गाः स शिबिरौशीनरोऽध्वरे ।
‘आज संसारमें जंगली पशुओंसहित जितने गाय-बैल और घोड़े हैं, उतनी संख्यामें उशीनरपुत्र शिबिने अपने यज्ञमें केवल गौओंका दान किया॥ ४१ ½॥

न वोढारं धुरं तस्य कश्चिन्मेने प्रजापतिः ॥ ४२ ॥ न भूतं न भविष्यं च सर्वराजसु संजय । अन्यत्रौशीनराच्छैब्याद् राजर्षेरिन्द्रविक्रमात् ॥ ४३ ॥ ‘संजय! प्रजापति ब्रह्माने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उशीनरपुत्र राजा शिबिके सिवा सम्पूर्ण राजाओंमें भूत या भविष्यकालके दूसरे किसी राजाको ऐसा नहीं माना, जो शिबिका कार्यभार वहन कर सकता हो ॥ ४२-४३ ॥ अदक्षिणमयज्वानं मा पुत्रमनुतप्यथाः । स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ४४ ॥ ‘संजय! राजा शिबि पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे। तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तब दूसरेकी क्या बात है, अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक मत करो। उसने न तो कोई यज्ञ किया था, न दक्षिणा ही दी थी; अतः उस पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४४ ॥ भरतं चैव दौष्यन्तिं मृतं संजय शुश्रुम । शाकुन्तलं महात्मानं भूरिद्रविणसंचयम् ॥ ४५ ॥ ‘संजय! दुष्यन्त और शकुन्तलाके पुत्र महाधनी महामनस्वी भरत भी मृत्युके अधीन हो गये, यह हमने सुना था ॥ ४५ ॥ यो बद्ध्वा त्रिशतं चाश्वान् देवेभ्यो यमुनामनु । सरस्वतीं विंशतिं च गङ्गामनु चतुर्दश ॥ ४६ ॥ अश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च । इष्टवान् स महातेजा दौष्यन्तिर्भरतः पुरा ॥ ४७ ॥ ‘उन महातेजस्वी दुष्यन्तकुमार भरतने पूर्वकालमें देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यमुनाके तटपर तीन सौ, सरस्वतीके तटपर बीस और गंगाके तटपर चौदह घोड़े बाँधकर उतने-उतने अश्वमेध यज्ञ किये थे।३ उन्होंने अपने जीवनमें एक सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ सम्पन्न किये थे ॥ ४६-४७ ॥ भरतस्य महत् कर्म सर्वराजसु पार्थिवाः । खं मर्त्या इव बाहुभ्यां नानुगन्तुमशक्नुवन् ॥ ४८ ॥ ‘जैसे मनुष्य दोनों भुजाओंसे आकाशको तैर नहीं सकते, उसी प्रकार सम्पूर्ण राजाओंमें भरतका जो महान् कर्म है, उसका दूसरे राजा अनुकरण न कर सके ॥ ४८ ॥ परं सहस्राद् यो बद्ध्वान् हयान् वेदीर्वितत्य च । सहस्रं यत्र पद्मानां कण्व्याय भरतो ददौ ॥ ४९ ॥ ‘उन्होंने सहस्रसे भी अधिक घोड़े बाँधे और यज्ञ-वेदियोंका विस्तार करके अश्वमेध यज्ञ किये। उसमें भरतने आचार्य कण्वको एक हजार सुवर्णके बने हुए कमल भेंट

किये ।। ४९ ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ५० ।। ‘संजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद—इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चार मंगलकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है। अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।। ५० ।।

रामं दाशरथिं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम । योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।। ५१ ।। ‘संजय! सुननेमें आया है कि दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामजी भी यहाँसे परम धामको चले गये थे, जो सदा अपनी प्रजापर वैसी ही कृपा रखते थे, जैसे-पिता अपने औरस पुत्रोंपर रखता है ।। ५१ ।।

विधवा यस्य विषये नानाथाः काश्चनाभवन् । सदैवासीत् पितृसमो रामो राज्यं यदन्वशात् ।। ५२ ।। ‘उनके राज्यमें कोई भी स्त्री अनाथ-विधवा नहीं हुई। श्रीरामचन्द्रजीने जबतक राज्यका शासन किया, तबतक वे अपनी प्रजाके लिये सदा ही पिताके समान कृपालु बने रहे ।। ५२ ।।

कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि समपादयत् । नित्यं सुभिक्षमेवासीद् रामे राज्यं प्रशासति ।। ५३ ।। ‘मेघ समयपर वर्षा करके खेतीको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता था—उसे बढ़ने और फूलने-फलनेका अवसर देता था। रामके राज्य-शासनकालमें सदा सुकाल ही रहता था (कभी अकाल नहीं पड़ता था) ।।

प्राणिनो नाप्सु मज्जन्ति नान्यथा पावकोऽदहत् । रुजाभयं न तत्रासीद् रामे राज्यं प्रशासति ।। ५४ ।। ‘रामके राज्यका शासन करते समय कभी कोई प्राणी जलमें नहीं डूबते थे, आग अनुचितरूपसे कभी किसीको नहीं जलाती थी तथा किसीको रोगका भय नहीं होता था ।। ५४ ।।

आसन् वर्षसहस्रिण्यस्तथा वर्षसहस्रकाः । अरोगाः सर्वसिद्धार्था रामे राज्यं प्रशासति ।। ५५ ।। ‘श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों हजार वर्षतक जीनेवाली स्त्रियाँ और सहस्रों वर्षतक जीवित रहनेवाले पुरुष थे। किसीको कोई रोग नहीं सताता था, सभीके सारे मनोरथ सिद्ध होते थे ।।

नान्योऽन्येन विवादोऽभूत् स्त्रीणामपि कुतो नृणाम् ।

धर्मनित्याः प्रजाश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५६ ॥
‘स्त्रियोंमें भी परस्पर विवाद नहीं होता था; फिर पुरुषोंकी तो बात ही क्या? श्रीरामके राज्य-शासनकालमें समस्त प्रजा सदा धर्ममें तत्पर रहती थी ॥

संतुष्टाः सर्वसिद्धार्था निर्भयाः स्वैरचारिणः ।
नराः सत्यव्रताश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५७ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी जब राज्य करते थे, उस समय सभी मनुष्य संतुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वाधीन और सत्यव्रती थे ॥ ५७ ॥

नित्यपुष्पफलाश्चैव पादपा निरुपद्रवाः ।
सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५८ ॥

‘श्रीरामके राज्यशासनकालमें सभी वृक्ष बिना किसी विघ्न-बाधाके सदा फले-फूले रहते थे और समस्त गौएँ एक-एक दोन दूध देती थीं ॥ ५८ ॥

स चतुर्दशवर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः ।
दशाश्वमेधान् जारूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥ ५९ ॥

‘महातपस्वी श्रीरामने चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करके राज्य पानेके अनन्तर दस ऐसे अश्वमेध यज्ञ किये, जो सर्वथा स्तुतिके योग्य थे तथा जहाँ किसी भी याचकके लिये दरवाजा बंद नहीं होता था ॥ ५९ ॥

युवा श्यामो लोहिताक्षो मातङ्ग इव यूथपः ।
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥ ६० ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी नवयुवक और श्याम वर्णवाले थे। उनकी आँखोंमें कुछ-कुछ लालिमा शोभा देती थी। वे यूथपति गजराजके समान शक्तिशाली थे। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। उनका मुख सुन्दर और कंधे सिंहके समान थे ॥ ६० ॥

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥ ६१ ॥

‘श्रीरामने अयोध्याके अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था ॥ ६१ ॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ६२ ॥

‘संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी यहाँ रह न सके, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥

भगीरथं च राजानं मृतं सृंजय शुश्रुम ।
यस्येन्द्रो वितते यज्ञे सोमं पीत्वा मदोत्कटः ॥ ६३ ॥

असुराणां सहस्राणि बहूनि सुरसत्तमः ।
अजयद् बाहुवीर्येण भगवान् पाकशासनः ॥ ६४ ॥

‘संजय! राजा भगीरथ भी कालके गालमें चले गये, ऐसा हमने सुना है। जिनके विस्तृत यज्ञमें सोम पीकर मदोन्मत्त हुए सुरश्रेष्ठ भगवान् पाकशासन इन्द्रने अपने बाहुबलसे कई सहस्र असुरोंको पराजित किया ।। यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः । ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ।। ६५ ।। ‘जिन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित दस लाख कन्याओंका दक्षिणारूपमें दान किया था ।। ६५ ।। सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः । शतं शतं रथे नागाः पद्मिनो हेममालिनः ।। ६६ ।। ‘वे सभी कन्याएँ अलग-अलग रथमें बैठी हुई थीं। प्रत्येक रथमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे। हर एक रथके पीछे सोनेकी मालाओंसे विभूषित तथा मस्तकपर कमलके चिह्नोंसे अलंकृत सौ-सौ हाथी थे ।। ६६ ।। सहस्रमश्वा एकैकं हस्तिनं पृष्ठतोऽन्वयुः । गवां सहस्रमश्वेऽश्वे सहस्रं गव्यजाविकम् ।। ६७ ।। ‘प्रत्येक हाथीके पीछे एक-एक हजार घोड़े, हर एक घोड़ेके पीछे हजार-हजार गायें और एक-एक गायके साथ हजार-हजार भेड़-बकरियाँ चल रही थीं ।। ६७ ।। उपह्वरे निवसतो यस्याङ्के निषसाद ह । गङ्गा भागीरथी तस्मादुर्वशी चाभवत् पुरा ।। ६८ ।। ‘तटके निकट निवास करते समय गंगाजी राजा भगीरथकी गोदमें आ बैठी थीं। इसलिये वे पूर्वकालमें भागीरथी और उर्वशी नामसे प्रसिद्ध हुईं ।। ६८ ।। भूरिदक्षिणमिक्ष्वाकुं यजमानं भगीरथम् । त्रिलोकपथगा गङ्गा दुहितृत्वमुपेयुषी ।। ६९ ।। ‘त्रिपथगामिनी गंगाने पुत्रीभावको प्राप्त होकर पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकुवंशी यजमान भगीरथको अपना पिता माना ।। ६९ ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ७० ।। संजय! वे पूर्वोक्त चारों बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा थे, जब वे भी कालसे न बच सके तो दूसरोंके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो ।। दिलीपं च महात्मानं मृतं सृंजय शुश्रुम । यस्य कर्माणि भूरीणि कथयन्ति द्विजातयः ।। ७१ ।। ‘संजय! महामना राजा दिलीप भी मरे थे, यह सुननेमें आया है। उनके महान् कर्मोंका आज भी ब्राह्मणलोग वर्णन करते हैं ।। ७१ ।।

य इमां वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः । ददौ तस्मिन् महायज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ७२ ॥ 'एकाग्रचित्त हुए उन नरेशने अपने उस महायज्ञमें रत्न और धनसे परिपूर्ण इस सारी पृथ्वीका ब्राह्मणोंके लिये दान कर दिया था ॥ ७२ ॥ यस्येह यजमानस्य यज्ञे यज्ञे पुरोहितः । सहस्रं वारणान् हैमान् दक्षिणामत्यकालयत् ॥ ७३ ॥ 'यजमान दिलीपके प्रत्येक यज्ञमें पुरोहितजी सोनेके बने हुए एक हजार हाथी दक्षिणारूपमें पाकर उन्हें अपने घर ले जाते थे ॥ ७३ ॥ यस्य यज्ञे महानासीद् यूपः श्रीमान् हिरण्मयः । तं देवाः कर्म कुर्वाणाः शक्रज्येष्ठा उपाश्रयन् ॥ ७४ ॥ 'उनके यज्ञमें सोनेका बना हुआ कालियुक्त बहुत बड़ा यूप शोभा पाता था। यज्ञकर्म करते हुए इन्द्र आदि देवता सदा उसी यूपका आश्रय लेकर रहते थे ॥ ७४ ॥ चषाले यस्य सौवर्णे तस्मिन् यूपे हिरण्मये । ननृतुर्देवगन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा ॥ ७५ ॥ अवादयत् तत्र वीणां मध्ये विश्वावसुः स्वयम् । सर्वभूतान्यमन्यन्त मम वादयतीत्ययम् ॥ ७६ ॥ 'उनके उस सुवर्णमय यूपमें जो सोनेका चषाल (घेरा) बना था, उसके ऊपर छः हजार देवगन्धर्व नृत्य किया करते थे। वहाँ साक्षात् विश्वावसु बीचमें बैठकर सात स्वरोंके अनुसार वीणा बजाया करते थे। उस समय सब प्राणी यही समझते थे कि ये मेरे ही आगे बाजा बजा रहे हैं ॥ ७५-७६ ॥ एतद् राज्ञो दिलीपस्य राजानो नानुचक्रिरे । यस्येभा हेमसंछन्नाः पथि मत्ताः स्म शेरते ॥ ७७ ॥ राजानं शतधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम् । येऽपश्यन् सुमहात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ॥ ७८ ॥ 'राजा दिलीपके इस महान् कर्मका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सके। उनके सुनहरे साज-बाज और सोनेके आभूषणोंसे सजे हुए मतवाले हाथी रास्तेपर सोये रहते थे। सत्यवादी शतधन्वा महामनस्वी राजा दिलीपका जिन लोगोंने दर्शन किया था, उन्होंने भी स्वर्गलोकको जीत लिया ॥ ७७-७८ ॥ त्रयः शब्दा न जीर्यन्ते दिलीपस्य निवेशने । स्वाध्यायघोषो ज्याघोषो दीयतामिति वै त्रयः ॥ ७९ ॥ 'महाराज दिलीपके भवनमें वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष, शूरवीरोंके धनुषकी टंकार तथा 'दान दो' की पुकार—ये तीन प्रकारके शब्द कभी बंद नहीं होते थे ॥ ७९ ॥ स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।