महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
आपके नेत्र श्वेत पिङ्गलवर्णके हैं, काले और लाल रंगके हैं। आप प्राणवायु (श्वास)को जीतनेवाले, दण्ड (आयुध) रूप, ब्रह्माण्डरूपी घटको फोड़नेवाले तथा कृश-शरीरधारी हैं। आपको नमस्कार है ।। १०८ ।।
धर्मकामार्थमोक्षाणां कथनीयकथाय च । सांख्याय सांख्यमुख्याय सांख्ययोगप्रवर्तिने ।। १०९ ।। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देनेके विषयमें आपकी कीर्तिकथा वर्णन करनेके योग्य है। आप सांख्यस्वरूप, सांख्ययोगियोंमें प्रधान तथा सांख्यशास्त्रको प्रवृत्त करनेवाले हैं। आपको प्रणाम है ।। १०९ ।।
नमो रथ्यविरथ्याय चतुष्पथरथाय च । कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ।। ११० ।। आप रथपर बैठकर तथा बिना रथके भी घूमनेवाले हैं। जल, अग्नि, वायु तथा आकाश—इन चारों मार्गोंपर आपकी गति है। आप काले मृगचर्मको दुपट्टेकी भाँति ओढ़नेवाले तथा सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले हैं। आपको प्रणाम है ।। ११० ।।
ईशान वज्रसंघात हरिकेश नमोऽस्तु ते । त्र्यम्बकाम्बिकानाथाय व्यक्ताव्यक्त नमोऽस्तु ते ।। १११ ।। ईशान! आपका शरीर वज्रके समान कठोर है। हरिकेश! आपको नमस्कार है। व्यक्ताव्यक्तस्वरूप परमेश्वर! आप त्रिनेत्रधारी तथा अम्बिकाके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है ।। १११ ।।
काम कामद कामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे । सर्व सर्वद सर्वघ्न संध्याराग नमोऽस्तु ते ।। ११२ ।। आप कामस्वरूप, कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कामदेवके नाशक, तृप्त और अतृप्तका विचार करनेवाले, सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले, सबके संहारक और संध्याकालके समान रंगवाले हैं। आपको प्रणाम है ।।
महाबल महाबाहो महासत्त्व महाद्युते । महामेघचयप्रख्य महाकाल नमोऽस्तु ते ।। ११३ ।। महाबल! महाबाहो! महासत्त्व! महाद्युते! आप महान् मेघोंकी घटाके समान रंगवाले महाकालस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ।। ११३ ।।
स्थूल जीर्णाङ्ग जटिले वल्कलाजिनधारिणे । दीप्तसूर्याग्निजटिले वल्कलाजिनवाससे । सहस्रसूर्यप्रतिम तपोनित्य नमोऽस्तु ते ।। ११४ ।। आपका श्रीविग्रह स्थूल और जीर्ण है। आप जटाधारी हैं। वल्कल और मृगचर्म धारण करते हैं। देदीप्यमान सूर्य और अग्निके समान ज्योतिर्मयी जटासे सुशोभित हैं। वल्कल और
मृगचर्म ही आपके वस्त्र हैं। आप सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान और सदा तपस्यामें संलग्न रहनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ११४ ॥ उन्मादन शतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज । चन्द्रावर्त युगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते ॥ ११५ ॥ आप जगत्को उन्माद (मोह)-में डालनेवाले हैं। आपके मस्तकपर गंगाजीकी सैकड़ों लहरें और भँवरें उठती रहती हैं। आपके केश सदा गंगाजलसे भीगे रहते हैं। आप चन्द्रमाको क्षय-वृद्धिके चक्करमें डालनेवाले हैं। आप ही युगोंकी पुनरावृत्ति करनेवाले और मेघोंके प्रवर्तक हैं। आपको नमस्कार है ॥ ११५ ॥ त्वमन्नमन्नभोक्ता च अन्नदोऽन्नभुगेव च । अन्नस्रष्टा च पक्ता च पक्वभुक्पवनोऽनलः ॥ ११६ ॥ आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, अन्नदाता, अन्नका पालन करनेवाले, अन्नस्रष्टा, पाचक, पक्वान्नभोजी, प्राणवायु तथा जठरानलरूप हैं ॥ ११६ ॥ जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजाश्च तथोद्भिजः । त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः ॥ ११७ ॥ देवदेवेश्वर! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणिसमूह आप ही हैं ॥ चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता तथैव च । त्वामाहुर्ब्रह्मविदुषो ब्रह्म ब्रह्मविदां वर ॥ ११८ ॥ ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! आप ही चराचर जीवोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपहीको ब्रह्म कहते हैं ॥ ११८ ॥ मनसः परमा योनिः खं वायुर्ज्योतिषां निधिः । ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः ॥ ११९ ॥ वेदवादी विद्वान् आपको ही मनका परम कारण, आकाश, वायु, तेजकी निधि, ऋक्, साम तथा ॐकार बताते हैं ॥ ११९ ॥ हायिहायिहुवाहायाहावुहायि तथाऽसकृत् । गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठ सामगा ब्रह्मवादिनः ॥ १२० ॥ सुरश्रेष्ठ! सामगान करनेवाले वेदवेत्ता पुरुष ‘हा ३ यि, हा ३ यि, हू ३ वा, हा ३ यि, हा ३ वु, हा ३ यि’ आदिका बारंबार उच्चारण करके निरन्तर आपकी ही महिमाका गान करते हैं ॥ १२० ॥ यजुर्मयो ऋङ्मयश्च त्वमाहुतिमयस्तथा । पठ्यसे स्तुतिभिश्चैव वेदोपनिषदां गणैः ॥ १२१ ॥ यजुर्वेद और ऋग्वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हविष्य हैं। वेदों और उपनिषदोंके समूह अपनी स्तुतियोंद्वारा आपकी ही महिमाका प्रतिपादन करते हैं ॥ १२१ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये ।
त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युत्स्तनितगर्जितः ॥ १२२ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्त्यज—ये आपके ही स्वरूप हैं। मेघोंकी घटा, बिजली, गर्जना और गड़गड़ाहट भी आप ही हैं ॥ १२२ ॥
संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च ।
युगं निमेषाः काष्ठास्त्वं नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः ॥ १२३ ॥
संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, युग, निमेष, काष्ठा, नक्षत्र, ग्रह और कला भी आप ही हैं ॥ १२३ ॥
वृक्षाणां ककुदोऽसि त्वं गिरीणां शिखराणि च ।
व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योऽनन्तश्च भोगिनाम् ॥ १२४ ॥
वृक्षोंमें प्रधान वट-पीपल आदि, पर्वतोंमें उनके शिखर, वन-जन्तुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ तथा सर्पोंमें अनन्त आप ही हैं ॥ १२४ ॥
क्षीरोदो ह्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च ।
वज्रः प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च ॥ १२५ ॥
समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रों (अस्त्रों)-में धनुष, चलाये जानेवाले आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य भी आप ही हैं ॥ १२५ ॥
त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे ।
व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ ॥ १२६ ॥
आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय तथा पराजय हैं ॥
त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाङ्गी झर्झरी तथा ।
छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता त्वं नेता मन्ता पिता मतः ॥ १२७ ॥
आप गदा, बाण, धनुष, खाटका अंग तथा झर्झर नामक अस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं। सत्पथपर ले जानेवाले, शुभका मनन करनेवाले तथा पिता माने गये हैं ॥ १२७ ॥
दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च ।
गङ्गा समुद्राः सरितः पल्वलानि सरांसि च ॥ १२८ ॥
लता वल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः ।
द्रव्यकर्मसमारम्भः कालः पुष्पफलप्रदः ॥ १२९ ॥
दस लक्षणोंवाला धर्म तथा अर्थ और काम भी आप ही हैं। गंगा, समुद्र, नदियाँ, गड़हे, तालाब, लता, वल्ली, तृण, ओषधि, पशु, मृग, पक्षी, द्रव्य और कर्मोंके आरम्भ तथा फूल और फल देनेवाला काल भी आप ही हैं ॥ १२८-१२९ ॥
आदिश्चान्तश्च देवानां गायत्र्योंकार एव च ।
हरितो रोहितो नीलः कृष्णो रक्तस्तथारुणः । कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा ॥ १३० ॥ आप देवताओंके आदि और अन्त हैं। गायत्री-मन्त्र और ॐकार भी आप ही हैं। हरित, लोहित, नील, कृष्ण, रक्त, अरुण, कद्रु, कपिल, कबूतरके समान तथा मेचक (श्याम मेघके समान)—ये दस प्रकारके रंग भी आपके ही स्वरूप हैं ॥ १३० ॥
अवर्णश्च सुवर्णश्च वर्णकारो घनोपमः । सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च ॥ १३१ ॥ आप वर्णरहित होनेके कारण अवर्ण और अच्छे वर्णवाले होनेसे सुवर्ण कहलाते हैं। आप वर्णोंके निर्माता और मेघके समान हैं। आपके नाममें सुन्दर वर्णों (अक्षरों)-का उपयोग हुआ है, इसलिये आप सुवर्णनामा हैं तथा आपको श्रेष्ठ वर्ण प्रिय है ॥ १३१ ॥
त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनलः । उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च ॥ १३२ ॥ आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, अग्नि, सूर्य-चन्द्रका ग्रहण, चित्रभानु (सूर्य), राहु और भानु हैं ॥ १३२ ॥
होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभुः । त्रिसौपर्णं तथा ब्रह्म यजुषां शतरुद्रियम् ॥ १३३ ॥ होत्र (स्रुवा), होता, हवनीय पदार्थ, हवन-क्रिया तथा (उसके फल देनेवाले) परमेश्वर भी आप ही हैं। वेदकी त्रिसौपर्ण नामक श्रुतियोंमें तथा यजुर्वेदके शतरुद्रिय-प्रकरणमें जो बहुत-से वैदिक नाम हैं, वे सब आपहीके नाम हैं ॥ १३३ ॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् । गिरिको हिंडुको वृक्षो जीवः पुद्गल एव च ॥ १३४ ॥ प्राणः सत्त्वं रजश्चैव तमश्चाप्रमदस्तथा । प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ १३५ ॥ उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च । लोहितान्तर्गता दृष्टिर्महावक्त्रो महोदरः ॥ १३६ ॥ आप पवित्रोंके भी पवित्र और मंगलोंके भी मंगल हैं। आप ही गिरिक (अचेतनको भी चेतन करनेवाले), हिंडुक (गमनागमन करनेवाले), संसार-वृक्ष, जीव, शरीर, प्राण, सत्त्व, रज, तम, अप्रमद (स्त्रीरहित—ऊर्ध्वरेता), प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष (आँखोंका खोलना-मींचना), छींकना और जँभाई लेना आदि चेष्टाएँ भी आप ही हैं। आपकी अग्निमयी लाल रंगकी दृष्टि भीतर छिपी हुई है। आपके मुख और उदर महान् हैं ॥ १३४—१३६ ॥
सूचीरोमा हरिश्मश्रूरूर्ध्वकेशश्चलाचलः । गीतवादित्रतत्त्वज्ञो गीतवादनकप्रियः ॥ १३७ ॥
रोएँ सूईके समान हैं। दाढ़ी-मूँछ काली है। सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। आप चराचर-स्वरूप हैं। गाने-बजानेके तत्त्वको जाननेवाले हैं। गाना-बजाना आपको अधिक प्रिय है ॥ १३७ ॥
मत्स्यो जलचरो जाल्योऽकलः कलिकलः कलिः । अकालश्चातिकालश्च दुष्कालः काल एव च ॥ १३८ ॥ आप मत्स्य, जलचर और जालधारी घड़ियाल हैं। फिर भी अकल (बन्धनसे परे) हैं। आप केलिकलासे युक्त और कलहरूप हैं। आपही अकाल, अतिकाल, दुष्काल तथा काल हैं ॥ १३८ ॥
मृत्युः क्षुरश्च कृत्यश्च पक्षोऽपक्षक्षयंकरः । मेघकालो महादंष्ट्रः संवर्तकबलाहकः ॥ १३९ ॥ मृत्यु, क्षुर (छेदन करनेका शस्त्र), कृत्य (छेदन करने योग्य), पक्ष (मित्र) तथा अपक्ष-क्षयंकर (शत्रुपक्षका नाश करनेवाले) भी आप ही हैं। आप मेघके समान काले, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले और प्रलयकालीन मेघ हैं ॥ १३९ ॥
घण्टोऽघण्टो घटी घण्टी चरुचेली मिलीमिली । ब्रह्मकायिकमग्नीनां दण्डी मुण्डस्त्रिदण्डधृक् ॥ १४० ॥ घण्ट (प्रकाशवान्), अघण्ट (अव्यक्त प्रकाशवाले), घटी (कर्मफलसे युक्त करनेवाले), घण्टी (घण्टावाले), चरुचेली (जीवोंके साथ क्रीडा करनेवाले) तथा मिली-मिली (कारणरूपसे सबमें व्याप्त)—ये सब आप ही हैं। आप ही ब्रह्म, अग्नियोंके स्वरूप, दण्डी, मुण्ड तथा त्रिदण्डधारी हैं ॥ १४० ॥
चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्तकः । चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरश्च यः ॥ १४१ ॥ चार युग और चार वेद आपके ही स्वरूप हैं तथा चार प्रकारके होतृ-कर्मोंके प्रवर्तक आप ही हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं ॥ १४१ ॥
सदा चाक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः । रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिशो गिरिकप्रियः ॥ १४२ ॥ आप ही अक्षप्रिय, धूर्त, गणाध्यक्ष और गणाधिप आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। आप रक्त वस्त्र तथा लाल फूलोंकी माला पहनते हैं, पर्वतपर शयन करते और गेरुए वस्त्रसे प्रेम रखते हैं ॥ १४२ ॥
शिल्पिकः शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्तकः । भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः ॥ १४३ ॥ आप ही शिल्पियोंमें सर्वश्रेष्ठ शिल्पी (कारीगर) तथा सब प्रकारकी शिल्पकलाके प्रवर्तक हैं। आप भगदेवताकी आँख फोड़नेके लिये अंकुश, चण्ड (अत्यन्त कोप करनेवाले) और पूषाके दाँत नष्ट करनेवाले हैं ॥
स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः ।
गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकस्तारकामयः ॥ १४४ ॥
स्वाहा, स्वधा, वषट्-नमस्कार और नमो नमः आदि पद आपके ही नाम हैं। आप गूढ़ व्रतधारी, गुप्त तपस्या करनेवाले, तारकमन्त्र और ताराओंसे भरे हुए आकाश हैं ॥ १४४ ॥
धाता विधाता संधाता विधाता धारणोऽधरः ।
ब्रह्मा तपश्च सत्यं च ब्रह्मचर्यमथार्जवम् ॥ १४५ ॥
भूतात्मा भूतकृद्भूतो भूतभव्यभवोद्भवः ।
भूर्भुवः स्वरितश्चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः ॥ १४६ ॥
धाता (धारण करनेवाले), विधाता (सृष्टि करनेवाले), संधाता (जोड़नेवाले), विधाता, धारण और अधर (आधाररहित) भी आपके ही नाम हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, ब्रह्मचर्य आर्जव (सरलता), भूतात्मा (प्राणियोंके आत्मा), भूतोंकी सृष्टि करनेवाले, भूत (नित्यसिद्ध), भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, ध्रुव (स्थिर), दान्त (दमनशील) और महेश्वर हैं ॥ १४५-१४६ ॥
दीक्षितोऽदीक्षितः क्षान्तो दुर्दान्तोऽदान्तनाशनः ।
चन्द्रावर्तो युगावर्तः संवर्तः सम्प्रवर्तकः ॥ १४७ ॥
दीक्षित (यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले), अदीक्षित, क्षमावान्, दुर्दान्त, उद्दण्ड प्राणियोंका नाश करनेवाले, चन्द्रमाकी आवृत्ति करनेवाले (मास), युगोंकी आवृत्ति करनेवाले (कल्प), संवर्त (प्रलय) तथा सम्प्रवर्तक (पुनः सृष्टि-संचालन करनेवाले) भी आप ही हैं ॥ १४७ ॥
कामो बिन्दुरणुः स्थूलः कर्णिकारस्त्रजप्रियः ।
नन्दीमुखो भीममुखः सुमुखो दुर्मुखोऽमुखः ॥ १४८ ॥
चतुर्मुखो बहुमुखो रणेष्वग्निमुखस्तथा ।
हिरण्यगर्भः शकुनिर्महोरगपतिर्विराट् ॥ १४९ ॥
आप ही काम, बिन्दु, अणु (सूक्ष्म) और स्थूलरूप हैं। आप कनेरके फूलकी माला अधिक पसंद करते हैं। आप ही नन्दीमुख, भीममुख (भयंकर मुखवाले), सुमुख, दुर्मुख, अमुख (मुखरहित), चतुर्मुख, बहुमुख तथा युद्धके समय शत्रुके संहार करनेके कारण अग्निमुख (अग्निके समान मुखवाले) हैं। हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शकुनि (पक्षीके समान असंग), महान् सर्पोंके स्वामी (शेषनाग) और विराट् भी आप ही हैं ॥ १४८-१४९ ॥
अधर्महा महापाश्र्वश्रृण्डधारो गणाधिपः ।
गोनर्दो गोप्रतारश्च गोवृषेश्वरवाहनः ॥ १५० ॥
त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गोऽमार्ग एव च ।
श्रेष्ठः स्थिरश्च स्थाणुश्च निष्कम्पः कम्प एव च ॥ १५१ ॥
दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः ।
दुर्धर्षो दुष्प्रकम्पश्च दुर्विषो दुर्जयो जयः ॥ १५२ ॥
शशः शशाङ्कः शमनः शीतोष्णक्षुज्जराधिकृत् । आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिरेव च ॥ १५३ ॥
आप अधर्मके नाशक, महापार्श्व, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द (श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग (इन्द्रियोंके संचालक), अमार्ग (इन्द्रियोंके अगोचर), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वारण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे), दुर्विषह (असह्य वेगवाले), दुःसह, दुर्लङ्घ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्रकम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश (शीघ्रगामी), शशांक (चन्द्रमा) तथा शमन (यमराज) हैं। सर्दी-गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही आधि-व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं ॥ १५०—१५३ ॥
मम यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामागमो गमः । शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः ॥ १५४ ॥ दण्डधारस्त्र्यम्बकश्च उग्रदण्डोऽण्डनाशनः । विषाग्निपाः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पतिः ॥ १५५ ॥
मेरे यज्ञरूपी मृगके वधिक तथा व्याधियोंको लाने और मिटानेवाले भी आप ही हैं। (कृष्णरूपमें) मस्तकपर शिखण्ड (मोरपंख) धारण करनेके कारण आप शिखण्डी हैं। आप कमलके समान नेत्रोंवाले, कमलके वनमें निवास करनेवाले, दण्ड धारण करनेवाले, त्र्यम्बक, उग्रदण्ड और ब्रह्माण्डके संहारक हैं। विषाग्निको पी जानेवाले, देवश्रेष्ठ, सोमरसका पान करनेवाले और मरुद्गणोंके स्वामी हैं ॥ १५४-१५५ ॥
अमृतपास्त्वं जगन्नाथ देवदेव गणेश्वरः । विषाग्निपा मृत्युपाश्च क्षीरपाः सोमपास्तथा । मधुश्च्युतानामग्रपास्त्वमेव तुषिताद्यपाः ॥ १५६ ॥
देवाधिदेव! जगन्नाथ! आप अमृत पान करनेवाले और गणोंके स्वामी हैं। विषाग्नि तथा मृत्युसे रक्षा करनेवाले और दूध एवं सोमरसका पान करनेवाले हैं। आप सुखसे भ्रष्ट हुए जीवोंके प्रधान रक्षक तथा तुषितनामक देवताओंके आदिभूत ब्रह्माजीका भी पालन करनेवाले हैं ॥ १५६ ॥
हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेव त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च नपुंसकं च । बालो युवा स्थविरो जीर्णदंष्ट्र- स्त्वं नागेन्द्र शक्रस्त्वं विश्वकृद्विश्वकर्ता ॥ १५७ ॥ विश्वकृद् विश्वकृतां वरेण्यस्त्वं विश्ववाहो विश्वरूपस्तेजस्वी विश्वतोमुखः । चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामहः ॥ १५८ ॥
आप ही हिरण्यरेता (अग्नि), पुरुष (अन्तर्यामी) तथा आप ही स्त्री, पुरुष और नपुंसक हैं। बालक-युवा और वृद्ध भी आप ही हैं। नागेश्वर! आप जीर्ण दाढ़ोंवाले और इन्द्र हैं। आप विश्वकृत् (जगत्के संहारक), विश्वकर्ता (प्रजापति), विश्वकृत् (ब्रह्माजी), विश्वकी रचना करनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, विश्वका भार वहन करनेवाले, विश्वरूप, तेजस्वी और सब ओर मुखवाले हैं। चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र तथा पितामह ब्रह्मा आपके हृदय हैं ।। १५७-१५८ ।।
महोदधिः सरस्वती वाग् बलमनलो-
ऽनिलःअहोरात्रं निमेषोन्मेषकर्म ।। १५९ ।।
आप ही समुद्र हैं, सरस्वती आपकी वाणी हैं, अग्नि और वायु बल हैं तथा आपके नेत्रोंका खुलना और बंद होना ही दिन और रात्रि है ।। १५९ ।।
न ब्रह्मा न च गोविन्दः पौराणा ऋषयो न ते ।
माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन ते शिव ।। १६० ।।
शिव! आपके माहात्म्यको ठीक-ठीक जाननेमें ब्रह्मा, विष्णु तथा प्राचीन ऋषि भी समर्थ नहीं हैं ।। १६० ।।
या मूर्तयः सुसूक्ष्मास्ते न मह्यं यान्ति दर्शनम् ।
त्राहि मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम् ।। १६१ ।।
आपके जो सूक्ष्म रूप हैं वे हमलोगोंकी दृष्टिमें नहीं आते। भगवन्! जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी तरह आप सर्वदा मेरी रक्षा करें ।। १६१ ।।
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते ।
भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ।। १६२ ।।
अनघ! मैं आपके द्वारा रक्षित होने योग्य हूँ, आप अवश्य मेरी रक्षा करें, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप भक्तोंपर दया करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदाके लिये आपका भक्त हूँ ।। १६२ ।।
यः सहस्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्दर्शः ।
तिष्ठत्येकः समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यशः ।। १६३ ।।
जो हजारों मनुष्योंपर मायाका परदा डालकर सबके लिये दुर्बोध हो रहे हैं, अद्वितीय हैं तथा समुद्रके समान कामनाओंका अन्त होनेपर प्रकाशमें आते हैं, वे परमेश्वर नित्य मेरी रक्षा करें ।। १६३ ।।
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः ।
ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ।। १६४ ।।
जो निद्राके वशीभूत न होकर प्राणोंपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको जीतकर सत्त्वगुणमें स्थित हैं, ऐसे योगीलोग ध्यानमें जिस ज्योतिर्मय तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं, उस योगात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ।। १६४ ।।
जटिले दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे । कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६५ ॥ जो सदा जटा और दण्ड धारण किये रहते हैं, जिनका उदर और शरीर विशाल है तथा कमण्डलु ही जिनके लिये तरकसका काम देता है, ऐसे ब्रह्माजीके रूपमें विराजमान भगवान् शिवको प्रणाम है ॥ १६५ ॥ यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ १६६ ॥ जिनके केशोंमें बादल, शरीरकी संधियोंमें नदियाँ और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ १६६ ॥ सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते । यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ॥ १६७ ॥ जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सब प्राणियोंका संहार करके एकार्णवके जलमें शयन करते हैं, उन जलशायी भगवान्की मैं शरण लेता हूँ ॥ १६७ ॥ प्रविश्य वदनं राहोर्यः सोमं पिबते निशि । ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा मां सोऽभिरक्षतु ॥ १६८ ॥ जो रातमें राहुके मुखमें प्रवेश करके स्वयं चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं; तथा स्वयं ही राहु बनकर सूर्यपर ग्रहण लगाते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें ॥ ये चानुपतिता गर्भा यथा भागानुपासते । नमस्तेभ्यः स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्तु मुदन्तु ते ॥ १६९ ॥ ब्रह्माजीके बाद उत्पन्न होनेवाले जो देवता और पितर बालककी भाँति यज्ञमें अपने-अपने भाग ग्रहण करते हैं, उन्हें नमस्कार है। वे ‘स्वाहा और स्वधा’ के द्वारा अपने भाग प्राप्त करके प्रसन्न हों ॥ १६९ ॥ येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम् । रक्षन्तु ते हि मां नित्यं नित्यं चाप्याययन्तु माम् ॥ १७० ॥ जो अंगुष्ठमात्र जीवके रूपमें सम्पूर्ण देहधारियोंके भीतर विराजमान हैं, वे सदा मेरी रक्षा और वृद्धि करें ॥ ये न रोदन्ति देहस्था देहिनो रोदयन्ति च । हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७१ ॥ जो देहके भीतर रहते हुए स्वयं न रोकर देहधारियोंको ही रुलाते हैं, स्वयं हर्षित न होकर उन्हें ही हर्षित करते हैं, उन सब रुद्रोंको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ॥ १७१ ॥ ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च । वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारे गहनेषु च ॥ १७२ ॥ चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु तटेषु च ।
हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च ॥ १७३ ॥
येषु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च ।
चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु ॥ १७४ ॥
रसातलगता ये च ये च तस्मै परं गताः ।
नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७५ ॥
नदी, समुद्र, पर्वत, गुहा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, दुर्गम पथ, वन, चौराहे, सड़क, चौतरे, किनारे, हस्तिशाला, अश्वशाला, रथशाला, पुराने बगीचे, जीर्ण गृह, पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य तथा उन-उनकी किरणोंमें, रसातलमें और उससे भिन्न स्थानोंमें भी जो अधिष्ठातृ देवताके रूपमें व्याप्त हैं, उन सबको सदा नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १७२—१७५ ॥
येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च ।
असंख्येयगुणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७६ ॥
जिनकी संख्या, प्रमाण और रूपकी सीमा नहीं है, जिनके गुणोंकी गिनती नहीं हो सकती, उन रुद्रोंको मैं सदा नमस्कार करता हूँ ॥ १७६ ॥
सर्वभूतकरो यस्मात् सर्वभूतपतिर्हरः ।
सर्वभूतान्तरात्मा च तेन त्वं न निमन्त्रितः ॥ १७७ ॥
आप सम्पूर्ण भूतोंके जन्मदाता, सबके पालक और संहारक हैं; तथा आप ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। इसीलिये मैंने आपको पृथक् निमन्त्रण नहीं दिया ॥ १७७ ॥
त्वमेव हीज्यसे यस्माद् यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
त्वमेव कर्ता सर्वस्य तेन त्वं न निमन्त्रितः ॥ १७८ ॥
नाना प्रकारकी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंद्वारा आपहीका यजन किया जाता है और आप ही सबके कर्ता हैं, इसीलिये मैंने आपको अलग निमन्त्रण नहीं दिया ॥ १७८ ॥
अथवा मायया देव सूक्ष्मया तव मोहितः ।
एतस्मात् कारणाद् वापि तेन त्वं न निमन्त्रितः ॥ १७९ ॥
अथवा देव! आपकी सूक्ष्म मायासे मैं मोहमें पड़ गया था, इस कारणसे भी मैंने आपको निमन्त्रण नहीं दिया ॥ १७९ ॥
प्रसीद मम भद्रं ते भव भावगतस्य मे ।
त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिर्मनस्त्वयि ॥ १८० ॥
भगवन् भव! आपका भला हो, मैं भक्तिभावके साथ आपकी शरणमें आया हूँ, इसलिये अब मुझपर प्रसन्न होइये। मेरा हृदय, मेरी बुद्धि और मेरा मन सब आपमें समर्पित हैं ॥ १८० ॥
स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम प्रजापतिः ।
भगवानपि सुप्रीतः पुनर्दक्षमभाषत ॥ १८१ ॥
इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तब भगवान् शिवने भी बहुत प्रसन्न होकर दक्षसे कहा— ॥ १८१ ॥
परितुष्टोऽस्मि ते दक्ष स्तवेनानेन सुव्रत ।
बहुनात्र किमुक्तेन मत्समीपे भविष्यसि ॥ १८२ ॥
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्ष! तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। यहाँ अधिक क्या कहूँ, तुम मेरे निकट निवास करोगे ॥ १८२ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च ।
प्रजापते मत्प्रसादात् फलभागी भविष्यसि ॥ १८३ ॥
‘प्रजापते! मेरे प्रसादसे तुम्हें एक हजार अश्वमेध तथा एक सौ वाजपेय यज्ञका फल मिलेगा’ ॥ १८३ ॥
अथैनमब्रवीद् वाक्यं लोकस्याधिपतिर्भवः ।
आश्वासनकरं वाक्यं वाक्यविद्वाक्य सम्मतम् ॥ १८४ ॥
तदनन्तर वाक्यविशारद, लोकनाथ भगवान् शिवने प्रजापतिको सान्त्वना देनेवाला युक्तियुक्त एवं उत्तम वचन कहा— ॥ १८४ ॥
दक्ष दक्ष न कर्तव्यो मन्युर्विघ्नमिमं प्रति ।
अहं यज्ञहरस्तुभ्यं दृष्टमेतत् पुरातनम् ॥ १८५ ॥
‘दक्ष! दक्ष! इस यज्ञमें जो विघ्न डाला गया है, इसके लिये तुम खेद न करना। मैंने पहले कल्पमें भी तुम्हारे यज्ञका विध्वंस किया था। यह घटना भी पूर्वकल्पके अनुसार ही हुई है ॥ १८५ ॥
भूयश्च ते वरं दद्मि तं त्वं गृह्णीष्व सुव्रत ।
प्रसन्नवदनो भूत्वा तदिहैकमनाः शृणु ॥ १८६ ॥
‘सुव्रत! मैं पुनः तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम इसे स्वीकार करो और प्रसन्नवदन तथा एकाग्रचित्त होकर यहाँ मेरी यह बात सुनो ॥ १८६ ॥
वेदात् षडङ्गादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च युक्तितः ।
तपः सुतप्तं विपुलं दुश्चरं देवदानवैः ॥ १८७ ॥
‘पूर्वकालमें षडङ्ग वेद, सांख्ययोग और तर्कसे निश्चित करके देवताओं और दानवोंने जिस विशाल एवं दुष्कर तपका अनुष्ठान किया था (उससे भी उत्तम व्रत मैं तुम्हें बता रहा हूँ) ॥ १८७ ॥
अपूर्वं सर्वतोभद्रं सर्वतोमुखमव्ययम् ।
अब्दैर्दशाहसंयुक्तं गूढमप्राज्ञनिन्दितम् ॥ १८८ ॥
वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ।
गतान्तैरध्यवसितमत्याश्रममिदं व्रतम् ॥ १८९ ॥
मया पाशुपतं दक्ष शुभमुत्पादितं पुरा ।
तस्य चीर्णस्य तत् सम्यक् फलं भवति पुष्कलम् ।
तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वरः ।। १९० ।।
‘दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो
अपूर्व है। साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी
(सभी वर्णों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है।
वर्षोंतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी
उपलब्धि होती है। वह गूढ़ है। मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं। वह समस्त वर्णधर्म और
आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है। जिन्हें सिद्धान्तका
ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है। यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है।
इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है। महाभाग! उस पाशुपत व्रतके
अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो। अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर
दो' ।। १८८-१९० ।।
एवमुक्त्वा महादेवः सपत्नीकः सहानुगः ।
अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामितविक्रमः ।। १९१ ।।
दक्षसे ऐसा कहकर पत्नी और पार्षदोंसहित अमित पराक्रमी महादेवजी वहीं अन्तर्धान
हो गये ।।
दक्षप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्तयेद् यः शृणोति वा ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।। १९२ ।।
जो मनुष्य दक्षके द्वारा कहे हुए इस स्तोत्रका कीर्तन अथवा श्रवण करेगा, उसे कोई
अमंगल नहीं प्राप्त होगा। वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है ।। १९२ ।।
यथा सर्वेषु देवेषु वरिष्ठो भगवान् शिवः ।
तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां ब्रह्मसम्मितः ।। १९३ ।।
जैसे भगवान् शिव सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार यह वेदतुल्य स्तोत्र सभी
स्तुतियोंमें श्रेष्ठ है ।।
यशोराज्यसुखैश्वर्यकामार्थधनकांक्षिभिः ।
श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः ।। १९४ ।।
यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, काम, अर्थ, धन और विद्याकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको
भक्तिभावका आश्रय लेकर यत्नपूर्वक इस स्तोत्रका श्रवण करना चाहिये ।।
व्याधितो दुःखितो दीनश्चोरग्रस्तो भयार्दितः ।
राजकार्याभियुक्तो वा मुच्यते महतो भयात् ।। १९५ ।।
रोगी, दुखी, दीन, चोरके हाथमें पड़ा हुआ, भयभीत तथा राजकार्यका अपराधी मनुष्य
भी इस स्तोत्रका पाठ करनेसे महान् भयसे छुटकारा पा जाता है ।। १९५ ।।
अनेनैव तु देहेन गणानां समतां व्रजेत् ।
तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः ॥ १९६ ॥
इतना ही नहीं, वह इसी शरीरसे भगवान् शिवके गणोंकी समानता प्राप्त कर लेता है तथा तेज और यशसे सम्पन्न होकर निर्मल हो जाता है ॥ १९६ ॥
न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः ।
विघ्नं कुर्युगृहे तस्य यत्रायं पठ्यते स्तवः ॥ १९७ ॥
जिसके यहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उसके घरमें राक्षस, पिशाच, भूत और विनायक कभी कोई विघ्न नहीं करते हैं ॥ १९७ ॥
शृणुयाच्चैव या नारी तद्भक्ता ब्रह्मचारिणी ।
पितृपक्षे भर्तृपक्षे पूज्या भवति देववत् ॥ १९८ ॥
जो नारी भगवान् शंकरमें भक्तिभाव रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करती हुई इस स्तोत्रको सुनती है, वह पितृकुल और पतिकुलमें देवताके समान आदरणीय होती है ॥ १९८ ॥
शृणुयाद् यः स्तवं कृत्स्नं कीर्तयेद् वा समाहितः ।
तस्य सर्वाणि कर्माणि सिद्धिं गच्छन्त्यभीक्ष्णशः ॥ १९९ ॥
जो एकाग्रचित्त होकर इस सम्पूर्ण स्तोत्रको सुनता अथवा पढ़ता है, उसके सारे कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं ॥ १९९ ॥
मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचानुकीर्तितम् ।
सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवस्यास्यानुकीर्तनात् ॥ २०० ॥
वह मनसे जिस वस्तुके लिये चिन्तन करता है अथवा वाणीसे जिस मनोरथकी याचना करता है, उसका वह सारा अभीष्ट इस स्तोत्रके बार-बार पाठसे सिद्ध हो जाता है ॥ २०० ॥
देवस्य च गुहस्यापि देव्या नन्दीश्वरस्य च ।
बलिं सुविहितं कृत्वा दमेन नियमेन च ॥ २०१ ॥
ततस्तु युक्तो गृह्णीयान्नामान्याशु यथाक्रमम् ।
ईप्सितान् लभते सोऽर्थान् भोगान् कामांश्च मानवः ॥ २०२ ॥
मृतश्च स्वर्गमाप्नोति तिर्यक्षु च न जायते ।
इत्याह भगवान् व्यासः पराशरसुतः प्रभुः ॥ २०३ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह इन्द्रियोंको संयममें रखकर शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करते हुए महादेवजी, कार्तिकेय, पार्वतीदेवी और नन्दिकेश्वरको विधिपूर्वक पूजोपहार समर्पित करे, फिर एकाग्रचित्त होकर क्रमशः इन सहस्र नामोंका पाठ करे। ऐसा करनेसे मनुष्य शीघ्र ही मनोवाञ्छित पदार्थों, भोगों और कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा मृत्युके पश्चात् स्वर्गमें जाता है। उसे पशु-पक्षी आदिकी योनिमें जन्म नहीं लेना पड़ता है। इस प्रकार सर्वसमर्थ पराशरनन्दन भगवान् व्यासजीने इस स्तोत्रका माहात्म्य बतलाया है ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दक्षप्रोक्तशिवसहस्रनामस्तवे चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनामस्तोत्रविषयक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८४ ॥
अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन
पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह विद्यते ।
यदध्यात्मं यतश्चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! शास्त्रमें पुरुषके लिये जो यह अध्यात्मतत्त्व बताया गया है, वह अध्यात्म क्या है और उसकी उत्पत्ति कहाँसे हुई है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वज्ञानं परं बुद्ध्या यन्मां त्वमनुपृच्छसि ।
तद् व्याख्यास्यामि ते तात तस्य व्याख्यामिमां शृणु ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! तुम मुझसे जिस अध्यात्मतत्त्वको पूछ रहे हो, वह बुद्धिके द्वारा सभी विषयोंका उत्तम ज्ञान प्रदान करनेवाला है। मैं तुमसे उसकी व्याख्या करूँगा, तुम उस व्याख्याको ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥ ३ ॥
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये पाँच महाभूत समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ॥ ३ ॥
स तेषां गुणसंघातः शरीरं भरतर्षभ ।
सततं हि प्रलीयन्ते गुणास्ते प्रभवन्ति च ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्राणियोंका शरीर उन्हीं पाँचों महाभूतोंका कार्यसमूह है। वे कार्यरूपमें परिणत भूतगण सदा लीन होते और प्रकट होते रहते हैं ॥ ४ ॥
ततः सृष्टानि भूतानि तानि यान्ति पुनः पुनः ।
महाभूतानि भूतेभ्य ऊर्मयः सागरे यथा ॥ ५ ॥
जैसे महाभूत सूक्ष्म भूतोंसे प्रकट होते और उन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं; तथा जैसे लहरें समुद्रसे प्रकट होकर फिर उसीमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मासे समस्त प्राणी उत्पन्न होते और पुनः उसीमें लीन हो जाते हैं ॥ ५ ॥
प्रसारयित्वेहाङ्गानि कूर्मः संहरते यथा ।
तद्वद् भूतानि भूतानामल्पीयांसि स्थवीयसाम् ॥ ६ ॥
जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके शरीर आकाश आदि पाँच महाभूतोंसे उत्पन्न होते और फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं॥ ६ ॥ आकाशात् खलु यो घोषः संघातस्तु महीगुणः । वायोःप्राणो रसस्त्वद्भ्यो रूपं तेजस उच्यते ॥ ७ ॥ शरीरमें जो शब्द होता है, वह आकाशका गुण है। यह स्थूल शरीर पृथिवीका गुण या कार्य है। प्राण वायुका, रस जलका तथा रूप तेजका गुण बताया जाता है॥ ७ ॥ इत्येतन्मयमेवैतत् सर्वं स्थावरजङ्गमम् । प्रलये च तमभ्येति तस्मादुद्दिश्यते पुनः ॥ ८ ॥ इस प्रकार यह समस्त स्थावर-जङ्गम शरीर पञ्चभूतमय ही है। प्रलयकालमें यह परमात्मामें ही लीन होता है और सृष्टिके आरम्भमें पुनः उन्हींसे प्रकट हो जाता है॥ महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् । विषयान् कल्पयामास यस्मिन् यदनुपश्यति ॥ ९ ॥ सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले ईश्वरने समस्त प्राणियोंमें पञ्चमहाभूतोंका ही विभागपूर्वक समावेश किया है। देहके भीतर जिस भूतके स्थित होनेसे मनुष्य जो कार्य देखता है, वह बताता हूँ; सुनो॥ ९ ॥ शब्दश्रोत्रे तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् । रसः स्नेहश्च जिह्वा च अपामेते गुणाः स्मृताः ॥ १० ॥ शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय और सम्पूर्ण छिद्र—ये तीन आकाशके कार्य हैं। रस, स्नेह तथा जिह्वा—ये तीनों जलके गुण या कार्य माने गये हैं॥ १० ॥ रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिविधं ज्योतिरुच्यते । घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणाः स्मृताः ॥ ११ ॥ रूप, नेत्र और परिपाक—इन तीन गुणोंके रूपमें तेजकी ही स्थिति बतायी जाती है। गन्ध, घ्राण तथा शरीर—ये तीनों भूमिके गुण माने गये हैं॥ ११ ॥ प्राणः स्पर्शश्च चेष्टा च वायोरैते गुणाः स्मृताः । इति सर्वगुणा राजन् व्याख्याताः पाञ्चभौतिकाः ॥ १२ ॥ प्राण, स्पर्श और चेष्टा—ये तीनों वायुके गुण बताये गये हैं। राजन्! इस प्रकार मैंने समस्त पाञ्चभौतिक गुणोंकी व्याख्या कर दी॥ १२ ॥ सत्त्वं रजस्तमः कालः कर्म बुद्धिश्च भारत । मनःषष्ठानि चैतेषु ईश्वरः समकल्पयत् ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! ईश्वरने इन प्राणियोंके शरीरोंमें सत्त्व, रज, तम, काल, कर्म, बुद्धि तथा मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंकी कल्पना की है॥ १३ ॥ यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ् मूर्ध्नश्च पश्यसि ।
एतस्मिन्नेव कृत्स्नेयं वर्तते बुद्धिरन्तरे ॥ १४ ॥
पैरोंके तलुओंसे लेकर ऊपरकी ओर और मस्तकसे नीचेकी ओर जितना भी शरीर है, इसके भीतर यह बुद्धि पूर्णरूपसे व्याप्त हो रही है ॥ १४ ॥
इन्द्रियाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते ।
सप्तमीं बुद्धिमेवाहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः ॥ १५ ॥
मानव-शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और छठा मन बताया जाता है। बुद्धिको सातवीं और क्षेत्रज्ञको आठवाँ कहते हैं ॥ १५ ॥
इन्द्रियाणि च कर्ता च विचेतव्यानि भागशः ।
तमः सत्त्वं रजश्चैव तेऽपि भावास्तदाश्रयाः ॥ १६ ॥
पाँच इन्द्रियाँ और जीवात्मा—इन सबको कार्य-विभागके अनुसार अलग-अलग समझना चाहिये। सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा उनके सात्त्विक, राजस और तामस भाव जीवात्माके ही आश्रित हैं ॥ १६ ॥
चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः ।
बुद्धिरध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ।
तमः सत्त्वं रजश्चेति कालः कर्म च भारत ॥ १७ ॥
गुणैर्नेनीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाणि च ।
मनःषष्ठानि सर्वाणि बुद्ध्याभावे कुतो गुणाः ॥ १८ ॥
नेत्र आदि इन्द्रियाँ दर्शन आदि कार्योंके लिये हैं। मन संशय करता है और बुद्धि उस विषयका ठीक-ठीक निश्चय करनेके लिये है। क्षेत्रज्ञ (आत्मा)-को साक्षी बताया जाता है। भरतनन्दन! सत्त्व, रज, तम, काल और कर्म—इन पाँच गुणोंद्वारा बुद्धि बार-बार विभिन्न विषयोंकी ओर ले जायी जाती है। बुद्धि मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका संचालन करती है। यदि बुद्धि न हो तो ये गुण—इन्द्रिय आदि कैसे कोई कार्य कर सकते हैं ॥
येन पश्यति तच्चक्षुः शृण्वती श्रोत्रमुच्यते ।
जिघ्रती भवति घ्राणं रसती रसना रसान् ॥ १९ ॥
स्पर्शनं स्पर्शती स्पर्शान् बुद्धिविक्रियतेऽसकृत् ।
यदा प्रार्थयते किञ्चित् तदा भवति सा मनः ॥ २० ॥
बुद्धि जिसके द्वारा देखती है, उस इन्द्रियका नाम दृष्टि या नेत्र है। वही अपने वृत्तिविशेषके द्वारा जब सुनने लगती है, तब श्रोत्र कहलाती है। गन्धको ग्रहण करते समय वह घ्राण बन जाती है। रसास्वादन करते समय रसना कहलाती है और स्पर्शोंका अनुभव करते समय वही स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) नाम धारण करती है। इस प्रकार बुद्धि बार-बार विकृत होती है। जब वह कुछ प्रार्थना (याचना) करती है, तब मन बन जाती है ॥
अधिष्ठानानि बुद्ध्या हि पृथगेतानि पञ्चधा ।
इन्द्रियाणीति तान्याहुस्तेषु दुष्टेषु दुष्यति ॥ २१ ॥
बुद्धिके ये जो पृथक्-पृथक् पाँच अधिष्ठान हैं, इन्हींको इन्द्रिय कहते हैं। इन इन्द्रियोंके दूषित होनेपर बुद्धि भी दूषित हो जाती है ॥ २१ ॥
पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ।
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचति ॥ २२ ॥
साक्षी आत्माके आश्रित रहनेवाली बुद्धि सात्त्विक, राजस और तामस तीन भावोंमें (जो सुख-दुःख और मोहरूप हैं) स्थित होती है, इसीलिये कभी (सत्त्वगुणका उद्रेक होनेपर) उसे आनन्द प्राप्त होता है और कभी (रजोगुणकी अधिकता होनेपर) वह दुःख-शोकका अनुभव करती है ॥ २२ ॥
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते ।
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान् परिवर्तते ॥ २३ ॥
कभी (तमोगुणकी अधिकतासे मोहाच्छन्न होनेपर) उसका न सुखसे संयोग होता है न दुःखसे (वह निद्रा और आलस्य आदिमें मग्न रहती है)। इस प्रकार यह भावात्मिका बुद्धि इन तीन भावोंका अनुसरण करती है ॥ २३ ॥
सरितां सागरो भर्ता यथा वेलामिवोर्मिवान् ।
इति भावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते ॥ २४ ॥
जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे युक्त होनेपर भी अपनी तटभूमिका उल्लंघन नहीं करता है, उसी प्रकार सात्त्विक आदि भावोंसे युक्त बुद्धि तीनों गुणोंका उल्लंघन नहीं करती। भावनामय मनमें ही चक्कर लगाती रहती है ॥ २४ ॥
प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावेनानुवर्तते ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ॥ २५ ॥
कथंचिदुपपद्यन्ते पुरुषे सात्त्विका गुणाः ।
जब रजोगुणकी प्रवृत्ति होती है तब बुद्धि राजसिक भावका अनुसरण करती है। यदि पुरुषमें किसी प्रकार अधिक हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तमें शान्ति उपलब्ध हो तो ये सात्त्विक गुण हैं ॥ २५½ ॥
परिदाहस्तथा शोकः संतापोऽपूर्तिरक्षमा ॥ २६ ॥
लिङ्गानि रजसस्तानी दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ।
जब शरीर या मनमें किसी कारणसे या अकारण ही दाह, शोक, संताप, अपूर्णता (लोभ-लिप्सा) और असहनशीलताके भाव दिखायी देते हों तो उन्हें रजोगुणके चिह्न समझना चाहिये ॥ २६½ ॥
अविद्या रागमोहौ च प्रमादः स्तब्धता भयम् ॥ २७ ॥
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोहः स्वप्नतन्द्रिता ।
कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ २८ ॥
यदि किसी प्रकार अविद्या, राग, मोह, प्रमाद, स्तब्धता, भय, दरिद्रता, दीनता, प्रमोह (मूर्च्छा), स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष आ घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप जाने ।। २७-२८ ।।
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तथा ॥ २९ ॥
ऐसी स्थितिमें शरीर अथवा मनके भीतर यदि कोई प्रसन्नताका भाव हो तो वह सात्त्विक भाव है, ऐसा विचार करना चाहिये ।। २९ ।।
अथ यद् दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।
प्रवृत्तं रज इत्येव तदसंरभ्य चिन्तयेत् ॥ ३० ॥
जब अपने लिये अप्रसन्नताका हेतु और दुःखयुक्त भाव अनुभवमें आये तब रजोगुणकी प्रवृत्ति हुई है—ऐसा अपने मनमें विचार करे तथा वैसे किसी कार्यका आरम्भ न करके उसकी ओरसे अपना ध्यान हटा ले ।।
अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३१ ॥
इसी प्रकार शरीर या मनमें जो मोहयुक्त भाव अतर्कित या अविज्ञातरूपसे उपस्थित हो गया हो, उसके विषयमें यही निश्चय करे कि यह तमोगुण है ।। ३१ ।।
इति बुद्धिगतीः सर्वा व्याख्याता यावतीरिह ।
एतद् बुद्ध्वा भवेद् बुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार बुद्धिकी जितनी अवस्थाएँ हैं उनकी व्याख्या यहाँ कर दी गयी। यह सब जानकर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। इसके सिवा ज्ञानीका और क्या लक्षण हो सकता है? ।। ३२ ।।
सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयोः ।
सृजतेऽत्र गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥ ३३ ॥
बुद्धि और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)—ये दोनों सूक्ष्मतत्त्व हैं। इन दोनोंमें जो अन्तर है, उसे समझो। इनमेंसे एक अर्थात् बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और दूसरा (आत्मा) गुणोंकी सृष्टि नहीं करता—केवल साक्षीभावसे देखता रहता है ।। ३३ ।।
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तु सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा ।
यथा मत्स्योऽद्भिरन्यः स्यात् सम्प्रयुक्तो भवेत् तथा ॥ ३४ ॥
वे दोनों बुद्धि और क्षेत्रज्ञ स्वभावतः एक-दूसरेसे भिन्न हैं, परंतु सदा परस्पर मिले हुए-से प्रतीत होते हैं। जैसे मछली जलसे भिन्न है तो भी उससे सदा संयुक्त रहती है, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा परस्पर भिन्न होते हुए भी अभिन्न रहते हैं ।। ३४ ।।
न गुणा विदुरात्मानं स गुणान् वेद सर्वतः ।
परिद्रष्टा गुणानां तु संस्रष्टा मन्यते यथा ॥ ३५ ॥
सत्त्व आदि गुण जड होनेके कारण आत्माको नहीं जानते; परंतु आत्मा चेतन है, इसलिये गुणोंको पूर्णरूपसे जानता है। वह गुणोंका साक्षी है तथापि मूढ़ मनुष्य उसे गुणोंसे संश्लिष्ट या संयुक्त समझते हैं ।। ३५ ।।
आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणसर्गेण चेतना ।
सत्त्वमस्य सृजन्त्यन्ये गुणान् वेद कदाचन ।। ३६ ।।
बुद्धि जब सत्त्वादि गुणोंकी सृष्टि करती है, उस समय जीवात्मा उसका आश्रय नहीं होता। अन्य गुणोंकी रचना बुद्धि ही करती है और उन गुणोंको जीव कभी जानता है ।। ३६ ।।
सृजते हि गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ।
सम्प्रयोगस्तयोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवः ।। ३७ ।।
बुद्धि गुणोंको उत्पन्न करती है और आत्मा केवल देखता है। बुद्धि और आत्माका यह सम्बन्ध अनादि है ।। ३७ ।।
इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं क्रियते बुद्धिरन्तरा ।
निश्चक्षुर्भिरजानद्भिरिन्द्रियाणि प्रदीपवत् ।। ३८ ।।
ज्ञानशक्तिरहित न जाननेवाली इन्द्रियाँ वस्तुओंको प्रकाशित करनेके लिये बुद्धिको बीचमें करती हैं। इन्द्रियाँ तो वस्तुको प्रकट करनेमें दीपककी भाँति केवल सहायक हैं ।। ३८ ।।
एवं स्वभावमेवैतत् तद् बुद्ध्वा विहरेन्नरः ।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च स वै विगतमत्सरः ।। ३९ ।।
इस प्रकार ‘आत्मा असंग एवं निर्लेप है’ इस बातको जानकर मनुष्य शोक, हर्ष और द्वेषका परित्याग करके विचरण करे ।। ३९ ।।
स्वभावसिद्धमेवैतद् यदिमान् सृजते गुणान् ।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद् गुणाः ।। ४० ।।
जैसे मकड़ी जाला बुनती है, उसी प्रकार बुद्धि गुणोंकी सृष्टि करती है—यह स्वभावसिद्ध है। अतएव गुणोंको जालेके समान और बुद्धिको मकड़ीके समान जानना चाहिये ।। ४० ।।
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते ।
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ।। ४१ ।।
वे गुण नष्ट होनेपर पुनः वापस नहीं आते; क्योंकि फिर उनकी प्रवृत्ति उपलब्ध नहीं होती। एक श्रेणीके विद्वानोंका ऐसा ही निश्चय है। दूसरी श्रेणीके लोग उन नष्ट हुए गुणोंकी पुनरावृत्ति भी मानते हैं ।। ४१ ।।
इतीदं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम् ।
विमुच्य सुखमासीत विशोकश्छिन्नसंशयः ।। ४२ ।।