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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

धनुषाख्योऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू । ऋषिर्मेधातिथिश्चैव ताण्ड्यश्चैव महानृषिः ॥ ७ ॥ ऋषिः शान्तिर्महाभागस्तथा वेदशिराश्च यः । ऋषिश्रेष्ठश्च कपिलः शालिहोत्रपिता स्मृतः ॥ ८ ॥ आद्यः कठस्तैत्तिरिश्च वैशम्पायनपूर्वजः । कण्वोऽथ देवहोत्रश्च एते षोडश कीर्तिताः ॥ ९ ॥ इनके सिवा (तेरह सदस्य और थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—) धनुष, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, मुनिवर मेधातिथि, महर्षि ताण्ड्य, महाभाग शान्तिमुनि, वेदशिरा, शालिहोत्रके पिता ऋषिश्रेष्ठ कपिल, आद्यकठ, वैशम्पायनके बड़े भाई तैत्तिरि, कण्व और देवहोत्र। ये कुल मिलाकर सोलह सदस्य बताये गये हैं ॥ ७–९ ॥

सम्भूताः सर्वसम्भारस्तस्मिन् राजन् महाक्रतौ । न तत्र पशुघातोऽभूत् स राजैवं स्थितोऽभवत् ॥ १० ॥ राजन्! उस महान् यज्ञमें सारे सामान एकत्र किये गये; परंतु उसमें किसी पशुका वध नहीं हुआ। वे राजा उपरिचर इसी भावसे उस यज्ञमें स्थित हुए थे ॥ १० ॥

अहिंस्रः शुचिरक्षुद्रो निराशीः कर्मसंस्तुतः । आरण्यकपदोद्भूता भागास्तत्रोपकल्पिताः ॥ ११ ॥ वे हिंसाभावसे रहित, पवित्र, उदार तथा कामनाओंसे रहित थे और इसी भावसे कर्ममें प्रवृत्त हुए थे। जंगलमें उत्पन्न हुए फल-मूल आदि पदार्थोंसे ही उस यज्ञमें देवताओंके भाग निश्चित किये गये थे ॥ ११ ॥

प्रीतस्ततोऽस्य भगवान् देवदेवः पुरातनः । साक्षात् तं दर्शयामास सोऽदृश्योऽन्येन केनचित् ॥ १२ ॥ उस समय पुराणपुरुष देवाधिदेव भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया; परंतु दूसरे किसीको उनका दर्शन नहीं हुआ ॥ १२ ॥

स्वयं भागमुपाघ्राय पुरोडाशं गृहीतवान् । अदृश्येन हृतो भागो देवेन हरिमेधसा ॥ १३ ॥ भगवान् हयग्रीवने स्वयं अदृश्य रहकर ही अपने लिये अर्पित पुरोडाशको ग्रहण किया और उसे सूँघकर अपने अधीन कर लिया ॥ १३ ॥

बृहस्पतिस्ततः क्रुद्धः स्रुचमुद्यम्य वेगितः । आकाशं घ्नन् स्रुचः पातै रोषादश्रूण्यवर्तयत् ॥ १४ ॥ यह देख बृहस्पति क्रोधमें भर गये। उन्होंने बड़े वेगसे स्रुवा उठा लिया और आकाशमें उसे दे मारा। साथ ही वे रोषवश अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ १४ ॥

उवाच चोपरिचरं मया भागोऽयमुद्यतः । ग्राह्यः स्वयं हि देवेन मत्प्रत्यक्षं न संशयः ॥ १५ ॥

फिर वे राजा उपरिचरसे बोले—'मैंने जो यह भाग प्रस्तुत किया है, उसे भगवान्‌को मेरी आँखोंके सामने प्रकट होकर ग्रहण करना चाहिये, यही न्याय है, इसमें संशय नहीं है' ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

उद्यता यज्ञभागा हि साक्षात् प्राप्ताः सुरैरिह ।
किमर्थमिह न प्राप्तो दर्शनं स हरिर्विभुः ॥ १६ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जब सभी देवताओंने प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपने-अपने भाग ग्रहण किये, तब भगवान् विष्णुने उस यज्ञमें पधारकर भी क्यों प्रत्यक्ष दर्शन नहीं दिया? ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

ततः स तं समुद्भूतं भूमिपालो महान् वसुः ।
प्रसादयामास मुनिं सदस्यास्ते च सर्वशः ॥ १७ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इसका कारण बताता हूँ, सुनो। वे महान् भूपाल वसु तथा अन्य सम्पूर्ण सदस्य मिलकर उस समय रोषमें भरे हुए मुनि बृहस्पतिको मनाने लगे ॥ १७ ॥

ऊचुश्चैनमसम्भ्रान्ता न रोषं कर्तुमर्हसि ।
नैष धर्मः कृतयुगे यस्त्वं रोषमचीकृथाः ॥ १८ ॥
सब लोग शान्तचित्त होकर उनसे बोले—'मुने! आप रोष न करें। आपने जो रोष किया है, यह सत्ययुगका धर्म नहीं है ॥ १८ ॥

अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽयमुद्यतः ।
न शक्यः स त्वया द्रष्टुमस्माभिर्वा बृहस्पते ॥ १९ ॥
यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ।
'बृहस्पते! जिनको यह भाग समर्पित किया गया है वे भगवान् कभी क्रोध नहीं करते। हम और आप उन्हें स्वेच्छासे नहीं देख सकते हैं। जिसपर वे कृपा करते हैं वही उनका दर्शन कर पाता है' ॥ १९ १/२ ॥

एकतद्वितत्रिताश्चोचुस्ततश्चित्रशिखण्डिनः ॥ २० ॥
वयं हि ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः परिकीर्तिताः ।
गता निःश्रेयसार्थं हि कदाचिद् दिशमुत्तराम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर एकत, द्वित और त्रितने तथा चित्रशिखण्डी नामवाले ऋषियोंने उनसे कहा—'बृहस्पते! हमलोग ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहलाते हैं। एक बार अपने कल्याणकी इच्छासे हम सबने उत्तर दिशाकी यात्रा की ॥ २०-२१ ॥

तप्त्वा वर्षसहस्राणि चरित्वा तप उत्तमम् ।

एकपादाः स्थिताः सम्यक् काष्ठभूताः समाहिताः ॥ २२ ॥
मेरोरुत्तरभागे तु क्षीरोदस्यानुकूलतः ।
स देशो यत्र नस्तप्तं तपः परमदारुणम् ॥ २३ ॥
कथं पश्येम हि वयं देवं नारायणात्मकम् ।
वरेण्यं वरदं तं वै देवदेवं सनातनम् ॥ २४ ॥
‘वहाँ मेरुके उत्तर और क्षीरसागरके किनारे एक पवित्र स्थान है, जहाँ हमलोगोंने हजार वर्षोंतक एकाग्रचित्त हो काष्ठकी भाँति एक पैरसे खड़े होकर बड़ी कठोर तपस्या की थी। वह उत्तम तपस्या करके हम यही चाहते थे कि किसी तरह वरदायक सनातन देवाधिदेव वरणीय भगवान् नारायणका दर्शन कर लें ॥ २२-२४ ॥
कथं पश्येम हि वयं देवं नारायणं त्विति ।
अथ व्रतस्यावभृथे वागुवाचाशरीरिणी ॥ २५ ॥
स्निग्धगम्भीरया वाचा प्रहर्षणकरी विभो ।
‘हम बारंबार यही सोचते थे कि हमें श्रीनारायणदेवका दर्शन कैसे प्राप्त होगा? तदनन्तर व्रतकी समाप्ति होनेपर हमें हर्ष प्रदान करनेवाली किसी शरीररहित वाणीने स्नेहपूर्ण गम्भीर स्वरसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥
सुतप्तं वस्तपो विप्राः प्रसन्नेनान्तरात्मना ॥ २६ ॥
यूयं जिज्ञासवो भक्ताः कथं द्रक्ष्यथ तं विभुम् ।
‘ब्राह्मणो! तुमने प्रसन्न हृदयसे भलीभाँति तप किया है। तुम भगवान्‌के भक्त हो और यह जानना चाहते हो कि उन सर्वव्यापी परमात्माका दर्शन कैसे हो? ॥
क्षीरोदधेरुत्तरतः श्वेतद्वीपो महाप्रभः ॥ २७ ॥
तत्र नारायणपरा मानवाश्चन्द्रवर्चसः ।
‘इसका उपाय सुनो। क्षीरसागरके उत्तरभागमें अत्यन्त प्रकाशमान श्वेतद्वीप है। वहाँ भगवान् नारायणका भजन करनेवाले पुरुष रहते हैं, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् हैं ॥ २७ १/२ ॥
एकान्तभावोपगतास्ते भक्ताः पुरुषोत्तमम् ॥ २८ ॥
ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्ति सनातनम् ।
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः ॥ २९ ॥
‘वे स्थूल इन्द्रियोंसे रहित, निराहार और निश्चेष्ट होते हैं। उनके शरीरसे मनोहर सुगन्ध निकलती रहती है तथा वे भगवान्‌के अनन्य भक्त होते हैं और सहस्रों किरणोंवाले उन सनातनदेव भगवान् पुरुषोत्तममें प्रवेश कर जाते हैं ॥ २८-२९ ॥
एकान्तिनस्ते पुरुषाः श्वेतद्वीपनिवासिनः ।
गच्छध्वं तत्र मुनयस्तत्रात्मा मे प्रकाशितः ॥ ३० ॥

‘मुनियो! वे श्वेतद्वीपके निवासी मेरे एकान्त भक्त हैं, तुम वहीं जाओ। वहाँ मेरे स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन होता है’ ॥ ३० ॥ अथ श्रुत्वा वयं सर्वे वाचं तामशरीरिणीम् । यथाख्यातेन मार्गेण तं देशं प्रतिपेदिरे ॥ ३१ ॥ ‘इस आकाशवाणीको सुनकर हमलोग उसके बताये हुए मार्गसे उस स्थानको गये ॥ ३१ ॥ प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं तच्चित्तास्तद्दिदृक्षवः । ततोऽस्मद्दृष्टिविषयस्तदा प्रतिहतोऽभवत् ॥ ३२ ॥ ‘श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँचकर हमारा चित्त भगवान्‌में ही लगा रहा। हम उनके दर्शनकी इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे थे। वहाँ जाते ही हमारी दृष्टिशक्ति प्रतिहत हो गयी ॥ ३२ ॥ न च पश्याम पुरुषं तत्तेजोहृतदर्शनाः । ततो नः प्रादुरभवद् विज्ञानं दैवयोगजम् ॥ ३३ ॥ न किलातप्ततपसा शक्यते द्रष्टुमञ्जसा । ‘वहाँके निवासियोंके तेजसे आँखें चौंधिया जानेके कारण हम वहाँ किसी पुरुषको देख नहीं पाते थे। तदनन्तर दैवयोगसे हमारे हृदयमें यह ज्ञान प्रकट हुआ कि तपस्या किये बिना हमलोग भगवान्‌को सुगमतापूर्वक नहीं देख सकते ॥ ३३ १/२ ॥ ततः पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत् ॥ ३४ ॥ व्रतावसाने च शुभान् नरान् ददृशिरे वयम् । श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान् सर्वलक्षणलक्षितान् ॥ ३५ ॥ ‘तदनन्तर हमने तत्काल पुनः सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस तपोमय व्रतके पूर्ण होनेपर हमलोगोंको वहाँके शुभलक्षण पुरुषोंका दर्शन हुआ, जो चन्द्रमाके समान गौरवर्ण और सब प्रकारके उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे ॥ ३४-३५ ॥ नित्याञ्जलिकृतान् ब्रह्म जपतः प्रागुदङ्मुखान् । मानसो नाम स जपो जप्यते तैर्महात्मभिः ॥ ३६ ॥ ‘वे प्रतिदिन ईशानकोणकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े हुए ब्रह्मका मानसजप करते थे ॥ ३६ ॥ तेनैकाग्रमनस्त्वेन प्रीतो भवति वै हरिः । याऽभवन्मुनिशार्दूल भाः सूर्यस्य युगक्षये ॥ ३७ ॥ एकैकस्य प्रभा तादृक् साभवन्मानवस्य ह । ‘उनके मनकी इस एकाग्रतासे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते थे। मुनिश्रेष्ठ! प्रलयकालमें सूर्यकी जैसी प्रभा होती है, वैसी ही उस द्वीपमें रहनेवाले प्रत्येक पुरुषकी थी ॥ तेजोनिवासः स द्वीप इति वै मेनिरे वयम् ॥ ३८ ॥

न तत्राभ्यधिकः कश्चित् सर्वे ते समतेजसः । ‘हमलोगोंने तो यही समझा कि यह द्वीप तेजका ही निवासस्थान है। वहाँ कोई किसीसे बढ़कर नहीं था। सबका तेज समान था ।। ३८ १/२ ।।

अथ सूर्यसहस्रस्य प्रभां युगपदुत्थिताम् ।। ३९ ।। सहसा दृष्टवन्तः स्म पुनरेव बृहस्पते । ‘बृहस्पते! थोड़ी ही देरमें हमारे सामने एक ही साथ हजारों सूर्योंके समान प्रभा प्रकट हुई। हमारी दृष्टि सहसा उस ओर खिंच गयी ।। ३९ १/२ ।।

सहिताश्चाभ्यधावन्त ततस्ते मानवा द्रुतम् ।। ४० ।। कृताञ्जलिपुटा हृष्टा नम इत्येव वादिनः । ‘तदनन्तर वहाँके निवासी पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ दोनों हाथ जोड़े ‘नमो नमः’ कहते हुए एक ही साथ तीव्र गतिसे उस तेजकी ओर दौड़े ।। ४० १/२ ।।

ततो हि वदतां तेषामश्रौष्म विपुलं ध्वनिम् ।। ४१ ।। बलिः किलोपह्रियते तस्य देवस्य तैनरैः । ‘इसके बाद जब वे स्तुति करने लगे, तब उनकी तुमुल ध्वनि हमारे कानोंमें पड़ी। वे सब लोग उन तेजोमय भगवान्‌को पूजाकी सामग्री अर्पण कर रहे थे ।।

वयं तु तेजसा तस्य सहसा हृतचेतसः ।। ४२ ।। न किंचिदपि पश्यामो हतचक्षुर्बलेन्द्रियाः । ‘भगवान्‌के उस अनिर्वचनीय तेजने हमारे चित्तको सहसा खींच लिया था; परंतु हमारे नेत्र, बल और इन्द्रियाँ प्रतिहत हो गयी थीं, इसलिये हम स्पष्ट रूपसे कुछ देख नहीं पाते थे ।। ४२ १/२ ।।

एकस्तु शब्दो विततः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितः ।। ४३ ।। जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ।। ४४ ।। ‘परंतु एक शब्द जो उच्चस्वरसे उच्चारित होकर दूरतक फैल रहा था, हमने भी सुना। सब लोग कह रहे थे—‘पुण्डरीकाक्ष! आपकी जय हो। विश्वभावन! आपको प्रणाम है। महापुरुषोंके भी पूर्वज हृषीकेश! आपको नमस्कार है’ ।। ४३-४४ ।।

इति शब्दः श्रुतोऽस्माभिः शिक्षाक्षरसमन्वितः । एतस्मिन्नन्तरे वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः ।। ४५ ।। दिव्यान्युवाह पुष्पाणि कर्मण्यांश्चौषधीस्तथा । तैरिष्टः पञ्चकालज्ञैर्हरिरेकान्तिभिर्नरैः ।। ४६ ।। भक्त्या परमया युक्तैर्मनोवाक्कर्मभिस्तदा ।

'शिक्षा और अक्षरसे युक्त यह वाक्य हमलोगोंको श्रवणगोचर हुआ। इतनेहीमें पवित्र और सुगन्धित वायु बहुत-से दिव्य पुष्प और कार्योपयोगी ओषधियाँ ले आयी, जिनसे वहाँके पंचकालवेत्ता अनन्य भक्तों ने बड़ी भक्तिके साथ मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन श्रीहरिका पूजन किया ।। ४५-४६ १/२ ।।
नूनं तत्रागतो देवो यथा तैर्वागुदीरिता ।। ४७ ।।
वयं त्वेनं न पश्यामो मोहितास्तस्य मायया ।
'जैसी बातचीत उन्होंने की थी, उससे हमें विश्वास हो गया था कि निश्चय ही यहाँ भगवान् पधारे हुए हैं, परंतु उन्हींकी मायासे मोहित होनेके कारण हम उन्हें देख नहीं पाते थे ।। ४७ १/२ ।।
मारुते संनिवृत्ते च बलौ च प्रतिपादिते ।। ४८ ।।
चिन्ताव्याकुलितात्मानो जाताः स्मोऽङ्गिरसां वर ।
'बृहस्पते! जब उस सुगन्धित वायुका चलना बंद हो गया और भगवान्‌को बलिसमर्पणका कार्य पूर्ण हो गया तब हमलोग मन-ही-मन चिन्तासे व्याकुल हो उठे ।।
मानवानां सहस्रेषु तेषु वै शुद्धयोनिषु ।। ४९ ।।
अस्मान् कश्चिन्मनसा चक्षुषा वाप्यपूजयत् ।
'वहाँ शुद्ध कुलवाले सहस्रों पुरुष थे; परंतु उनमेंसे किसीने मनसे अथवा दृष्टिपातद्वारा भी हमलोगोंका सत्कार नहीं किया ।। ४९ १/२ ।।
तेऽपि स्वस्था मुनिगणा एकभावमनुव्रताः ।। ५० ।।
नास्मासु दधिरे भावं ब्रह्मभावमनुष्ठिताः ।
वहाँ जो स्वस्थ मुनिगण थे, वे भी अनन्य भावसे भगवान्‌के भजनमें ही मन लगाये रहते थे। उन ब्रह्मभावमें स्थित मुनियोंने हमलोगोंकी ओर ध्यान नहीं दिया ।। ५० १/२ ।।
ततोऽस्मान् सुपरिश्रान्तांस्तपसा चातिकर्शितान् ।। ५१ ।।
उवाच स्वस्थं किमपि भूतं तत्राशरीरकम् ।
'हमलोग तपस्यासे थककर अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। उस समय हमलोगोंसे किसी शरीररहित स्वस्थ प्राणी (देवता) ने कहा ।। ५१ १/२ ।।

देव उवाच

दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रियविवर्जिताः ।। ५२ ।।
दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमैः ।
देवता बोले— मुनिवरो! तुमलोगोंने श्वेतद्वीपनिवासी श्वेतकाय इन्द्रियरहित पुरुषोंका दर्शन किया। इन श्रेष्ठ द्विजोंके दर्शन होनेसे साक्षात् देवेश्वर भगवान्‌का ही दर्शन हो जाता है ।। ५२ १/२ ।।
गच्छध्वं मुनयः सर्वे यथागतमितोऽचिरात् ।। ५३ ।।

न स शक्यस्त्वभक्तेन द्रष्टुं देवः कथंचन ।
मुनियो! तुम सब लोग जैसे आये हो, वैसे ही शीघ्र लौट जाओ। भगवान्‌में अनन्य भक्ति हुए बिना किसीको किसी तरह भी उनका साक्षात् दर्शन नहीं हो सकता ।।
कामं कालेन महता एकान्तित्वमुपागतैः ।। ५४ ।।
शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभामण्डलदुर्द्दशः ।
हाँ, बहुत समयतक उनकी भक्ति करते-करते जब पूरी अनन्यता आ जायगी, तब ज्योतिःपुंजके कारण कठिनाईसे देखे जानेवाले भगवान्‌का दर्शन सम्भव हो सकता है ।। ५४ १/२ ।।
महत् कार्यं च कर्तव्यं युष्माभिर्द्विजसत्तमाः ।। ५५ ।।
इतः कृतयुगेऽतीते विपर्यासं गतेऽपि च ।
वैवस्वतेऽन्तरे विप्राः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ५६ ।।
सुराणां कार्यसिद्धयर्थं सहाया वै भविष्यथ ।
विप्रवरो! इस समय तुम्हें अभी बहुत बड़ा काम करना है। इस सत्ययुगके बीतनेपर जब धर्ममें किंचित् व्यतिक्रम आ जायगा और वैवस्वत मन्वन्तरके त्रेतायुगका आरम्भ होगा, उस समय देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुमलोग ही सहायक होगे ।। ५५-५६ १/२ ।।
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवामृतोपमम् ।। ५७ ।।
तस्य प्रसादात् प्राप्ताः स्मो देशमीप्सितमञ्जसा ।
‘यह अमृतके समान मधुर एवं अद्भुत वचन सुनकर हमलोग भगवान्‌की कृपासे अनायास ही अपने अभीष्ट स्थानपर आ पहुँचे ।। ५७ १/२ ।।
एवं सुतपसा चैव हव्यकव्यैस्तथैव च ।। ५८ ।।
देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि ।
‘बृहस्पते! इस प्रकार हमने बड़ी भारी तपस्या की, हव्य-कव्योंके द्वारा भगवान्‌का पूजन भी किया, तो भी हमें उनका दर्शन न हो सका। फिर तुम कैसे अनायास ही उनका दर्शन पा लोगे? ।। ५८ १/२ ।।
नारायणो महद्भूतं विश्वसृग्हव्यकव्यभुक् ।। ५९ ।।
अनादिनिधनोऽव्यक्तो देवदानवपूजितः ।
‘भगवान् नारायण सबसे महान् देवता हैं। वे ही संसारके स्रष्टा और हव्य-कव्यके भोक्ता हैं। उनका आदि और अन्त नहीं है। उन अव्यक्त परमेश्वरकी देवता और दानव भी पूजा करते हैं’ ।। ५९ १/२ ।।
एवमेकतवाक्येन द्वितत्रितमतेन च ।। ६० ।।
अनुनीतः सदस्यैश्च बृहस्पतिरुदारधीः ।
समापयत् ततो यज्ञं दैवतं समपूजयत् ।। ६१ ।।

इस प्रकार एकतके कहनेसे, द्वित और त्रितकी सम्मतिसे तथा अन्य सदस्योंद्वारा अनुनय किये जानेसे उदारबुद्धि बृहस्पतिने उस यज्ञको समाप्त किया और भगवान्‌की पूजा की॥ ६०-६१॥

समाप्तयज्ञो राजापि प्रजां पालितवान् वसुः ।
ब्रह्मशापाद् दिवो भ्रष्टः प्रविवेश महीं ततः ॥ ६२ ॥
राजा वसु भी यज्ञ पूरा करके प्रजाका पालन करने लगे। एक बार ब्रह्मशापसे उन्हें स्वर्गसे भ्रष्ट होना पड़ा था। उस समय वे पृथ्वीके भीतर रसातलमें समा गये थे॥ ६२ ॥

स राजा राजशार्दूल सत्यधर्मपरायणः ।
अन्तर्भूमिगतश्चैव सततं धर्मवत्सलः ॥ ६३ ॥
नारायणपरो भूत्वा नारायणजयं जपन् ।
तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः ॥ ६४ ॥
महीतलाद् गतः स्थानं ब्रह्मणः समनन्तरम् ।
परां गतिमनुप्राप्त इति नैष्ठिकमञ्जसा ॥ ६५ ॥
नृपश्रेष्ठ! सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले सत्यधर्मपरायण राजा उपरिचर भूमिके भीतर प्रवेश करके भी निरन्तर नारायण-मन्त्रका जप करते हुए भी उन्हींकी आराधनामें तत्पर रहते थे। अतः उन्हींकी कृपासे वे पुनः ऊपरको उठे और भूतलसे ब्रह्मलोकमें जाकर उन्होंने परम गति प्राप्त कर ली। अनायास ही उन्हें निष्ठावानोंकी यह उत्तम गति प्राप्त हो गयी॥ ६३—६५॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महत्ताका वर्णनविषयक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३६ ॥

यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथ

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सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

यदा भागवतोऽत्यर्थमासीद् राजा महान् वसुः ।
किमर्थं स परिभ्रष्टो विवेश विवरं भुवः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! राजा वसु जब भगवान्‌के अत्यन्त भक्त और महान् पुरुष थे, तब वे स्वर्गसे भ्रष्ट होकर पातालमें कैसे प्रविष्ट हुए? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ऋषीणां चैव संवादं त्रिदशानां च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें ज्ञानीजन ऋषियों और देवताओंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासको उद्धृत किया करते हैं— ॥ २ ॥
अजेन यष्टव्यमिति प्राहुर्देवा द्विजोत्तमान् ।
स च छागोऽप्यजो ज्ञेयो नान्यः पशुरिति स्थितिः ॥ ३ ॥
‘अजके द्वारा यज्ञ करना चाहिये—ऐसा विधान है।' ऐसा कहकर देवताओंने वहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंसे कहा, 'यहाँ अजका अर्थ बकरा समझना चाहिये, दूसरा पशु नहीं, ऐसा निश्चय है' ॥ ३ ॥

ऋषय ऊचुः

बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः ।
अजसंज्ञानि बीजानि छागं नो हन्तुमर्हथ ॥ ४ ॥
ऋषियोंने कहा— देवताओ! यज्ञोंमें बीजोंद्वारा यजन करना चाहिये, ऐसी वैदिकी श्रुति है। बीजोंका ही नाम अज है; अतः बकरेका वध करना हमें उचित नहीं है ॥ ४ ॥
नैष धर्मः सतां देवा यत्र वध्येत वै पशुः ।
इदं कृतयुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशुः ॥ ५ ॥
देवताओ! जहाँ कहीं भी यज्ञमें पशुका वध हो, वह सत्पुरुषोंका धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ सत्ययुग चल रहा है। इसमें पशुका वध कैसे किया जा सकता है? ॥

भीष्म उवाच

तेषां संवदतामेवमृषीणां विबुधैः सह ।
मार्गगतो नृपश्रेष्ठस्तं देशं प्राप्तवान् वसुः ॥ ६ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार जब ऋषियोंका देवताओंके साथ संवाद चल रहा था, उसी समय नृपश्रेष्ठ वसु भी उस मार्गसे आ निकले और उस स्थानपर पहुँच गये ॥ ६ ॥

अन्तरिक्षचरः श्रीमान् समग्रबलवाहनः ।
तं दृष्ट्वा सहसाऽऽयान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् ॥ ७ ॥
ऊचुर्द्विजातयो देवानेष च्छेत्स्यति संशयम् ।
यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रियः ॥ ८ ॥
श्रीमान् राजा उपरिचर अपनी सेना और वाहनोंके साथ आकाशमार्गसे चलते थे। उन अन्तरिक्षचारी वसुको सहसा आते देख ब्रह्मर्षियोंने देवताओंसे कहा—'ये नरेश हमलोगोंका संदेह दूर कर देंगे; क्योंकि ये यज्ञ करनेवाले, दानपति, श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण भूतोंके हितैषी एवं प्रिय हैं ॥ ७-८ ॥

कथंस्विदन्यथा ब्रूयादेष वाक्यं महान् वसुः ।
एवं ते संविदं कृत्वा विबुधा ऋषयस्तथा ॥ ९ ॥
अपृच्छन् सहिताभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात् ।
'ये महान् पुरुष वसु शास्त्रके विपरीत वचन कैसे कह सकते हैं।' ऐसी सम्मति करके देवताओं और ऋषियोंने एक साथ राजा वसुके पास आकर अपना प्रश्न उपस्थित किया— ॥ ९ १/२ ॥

भो राजन् केन यष्टव्यमजेनाहोस्विदौषधैः ॥ १० ॥
एतन्नः संशयं छिन्धि प्रमाणं नो भवान् मतः ।
'राजन्! किसके द्वारा यज्ञ करना चाहिये? बकरेके द्वारा अथवा अन्नद्वारा? हमारे इस संदेहका आप निवारण करें। हमलोगोंकी रायमें आप ही प्रामाणिक व्यक्ति हैं' ॥ १० १/२ ॥

स तान् कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः ॥ ११ ॥
कस्य वै को मतः कामो ब्रूत सत्यं द्विजोत्तमाः ।
तब राजा वसुने हाथ जोड़कर उन सबसे पूछा—'विप्रवरो! आपलोग सच-सच बताइये, आपलोगोंमेंसे किस पक्षको कौन-सा मत अभीष्ट है? कौन अजका अर्थ बकरा मानता है और कौन अन्न?' ॥ ११ १/२ ॥

ऋषय ऊचुः

धान्यैर्यष्टव्यमित्येव पक्षोऽस्माकं नराधिप ॥ १२ ॥
देवानां तु पशुः पक्षो मतो राजन् वदस्व नः ।

ऋषि बोले—नरेश्वर! हमलोगोंका पक्ष यह है कि अन्नसे यज्ञ करना चाहिये तथा देवताओंका पक्ष यह है कि छाग नामक पशुके द्वारा यज्ञ होना चाहिये। राजन्! अब आप हमें अपना निर्णय बताइये॥ १२१/३॥

भीष्म उवाच

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात् ॥ १३॥
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! देवताओंका मत जानकर राजा वसुने उन्हींका पक्ष लेकर कह दिया कि अजका अर्थ है, छाग (बकरा); अतः उसीके द्वारा यज्ञ करना चाहिये॥ १३१/३॥

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः ॥ १४॥
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थवादिनम् ।
यह सुनकर वे सभी सूर्यके समान तेजस्वी ऋषि कुपित हो उठे और विमानपर बैठकर देवपक्षकी बात कहनेवाले वसुसे बोले—॥ १४१/३॥

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद् दिवः पत ॥ १५॥
अद्यप्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः ।
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि ॥ १६॥
‘राजन्! तुमने यह जानकर भी कि अजका अर्थ अन्न है, देवताओंका पक्ष लिया है; इसलिये स्वर्गसे नीचे गिर जाओ। आजसे तुम्हारी आकाशमें विचरनेकी शक्ति नष्ट हो गयी। हमारे शापके आघातसे तुम पृथ्‍वीको भेदकर पातालमें प्रवेश करोगे॥ १५-१६॥

(विरुद्धं वेदसूत्राणामुक्तं यदि भवेन्नृप ।
वयं विरुद्धवचना यदि तत्र पतामहे ॥)
‘नरेश्वर! तुमने यदि वेद और सूत्रोंके विरुद्ध कहा हो तो हमारा यह शाप अवश्य लागू हो और यदि हम शास्त्रविरुद्ध वचन कहते हों तो हमारा पतन हो जाय’॥

ततस्तस्मिन् मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा ।
अधो वै सम्बभूवाशु भूमेर्विवरगो नृप ॥ १७॥
राजन्! ऋषियोंके इतना कहते ही उसी क्षण राजा उपरिचर आकाशसे नीचे आ गये और तत्काल पृथ्‍वीके विवरमें प्रवेश कर गये॥ १७॥

स्मृतिस्त्वेनं न हि जहौ तदा नारायणाज्ञया ।
देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् ॥ १८॥
चिन्तयामासुर्व्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ।
अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना ॥ १९॥

उस समय भी भगवान् नारायणकी आज्ञासे उनकी स्मरणशक्ति उन्हें छोड़ न सकी। इधर सब देवता एकत्र होकर राजाको शापसे छुटकारा दिलानेका उपाय सोचने लगे। वे शान्तभावसे परस्पर बोले—‘राजाने तो पुण्य-ही-पुण्य किया है। उन महात्मा नरेशको हमारे कारणसे ही यह शाप प्राप्त हुआ है ।। १८-१९ ।।

अस्य प्रतिप्रियं कार्यं सहितैर्नो दिवौकसः ।
इति बुद्ध्या व्यवस्याशु गत्वा निश्चयमीश्वराः ॥ २० ॥
ऊचुः संहृष्टमनसो राजोपरिचरं तदा ।
‘देवताओ! हमलोगोंको एक साथ होकर उनका अतिशय प्रिय करना चाहिये।' अपनी बुद्धिके द्वारा ऐसा निश्चय करके वे सभी देवता राजा उपरिचर वसुके पास जाकर प्रसन्नचित्त हो बोले— ।। २० १/२ ।।

ब्रह्मण्यदेवभक्तस्त्वं सुरासुरगुरुर्हरिः ॥ २१ ॥
कामं स तव तुष्टात्मा कुर्याच्छापविमोक्षणम् ।
‘राजन्! तुम ब्रह्मण्यदेव भगवान् विष्णुके भक्त हो और वे श्रीहरि देवता तथा असुर सबके गुरु हैं। उनका मन तुमपर संतुष्ट है; इसलिये वे तुम्हारी इच्छाके अनुसार तुम्हें अवश्य शापसे मुक्त कर देंगे ।। २१ १/२ ।।

मानना तु द्विजातीनां कर्तव्या वै महात्मनाम् ॥ २२ ॥
अवश्यं तपसा तेषां फलितव्यं नृपोत्तम ।
यतस्त्वं सहसा भ्रष्ट आकाशान्मेदिनीतलम् ॥ २३ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हें महात्मा ब्राह्मणोंका सदा ही समादर करना चाहिये। अवश्य ही यह उनकी तपस्याका फल है; जिससे तुम आकाशसे सहसा भ्रष्ट होकर पातालमें चले आये हो ।। २२-२३ ।।

एकं त्वनुग्रहं तुभ्यं दद्मो वै नृपसत्तम ।
यावत् त्वं शापदोषेण कालमासिष्यसेऽनघ ॥ २४ ॥
भूमेर्विवरगो भूत्वा तावत् त्वं कालमाप्स्यसि ।
यज्ञेषु सुहुतां विप्रैर्वसोधारां समाहितैः ॥ २५ ॥
‘निष्पाप नृपशिरोमणे! हम तुम्हें अपना एक अनुग्रह प्रदान करते हैं। तुम शापदोषके कारण जबतक-जितने समयतक पृथ्वीके विवरमें रहोगे, तबतक एकाग्रचित्त ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञोंमें दी हुई वसुधाराकी आहुति तुम्हें प्राप्त होती रहेगी ।। २४-२५ ।।

प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिरस्पृशत् ।
न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यतः ॥ २६ ॥
वसोधाराभिपीतत्वात् तेजसाऽऽप्यायितेन च ।
स देवोऽस्मद्वरात् प्रीतो ब्रह्मलोकं हि नेष्यति ॥ २७ ॥

'राजेन्द्र! हमारे चिन्तनसे तुम्हें वसुधाराकी प्राप्ति होगी, जिससे ग्लानि तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी और इस पातालमें रहते हुए भी तुम्हें भूख और प्यासका कष्ट नहीं होगा; क्योंकि वसुधाराका पान करनेसे तुम्हारे तेजकी वृद्धि होती रहेगी। हमारे वरदानसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न हो तुम्हें ब्रह्मलोकमें ले जायँगे'॥ एवं दत्त्वा वरं राज्ञे सर्वे ते च दिवौकसः । गताः स्वभवनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ २८ ॥ इस प्रकार राजाको वरदान देकर वे सब देवता तथा तपोधन ऋषि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २८ ॥ चक्रे वसुस्ततः पूजां विष्वक्सेनाय भारत । जप्यं जगौ च सततं नारायणमुखोद्गतम् ॥ २९ ॥ भारत! तदनन्तर वसुने भगवान् विष्वक्सेनकी पूजा आरम्भ की और भगवान् नारायणके मुखसे प्रकट हुए जपनीय मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) का निरन्तर जप करने लगे ॥ २९ ॥ तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिंदम । अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ॥ ३० ॥ शत्रुदमन युधिष्ठिर! वहाँ पातालके विवरमें रहते हुए भी राजा उपरिचर पाँच समय पाँच यज्ञोंद्वारा देवेश्वर श्रीहरिकी आराधना करते थे ॥ ३० ॥ ततोऽस्य तुष्टो भगवान् भक्त्या नारायणो हरिः । अनन्यभक्तस्य सततस्तत्परस्य जितात्मनः ॥ ३१ ॥ उन्होंने अपने मनको जीत लिया था और वे सदा भगवान्‌के भजनमें ही लगे रहते थे। अपने उस अनन्य भक्तकी भक्तिसे भगवान् श्रीनारायण हरि बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३१ ॥ वरदो भगवान् विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् । गरुत्मन्तं महावेगमाबभाषेप्सितं तदा ॥ ३२ ॥ फिर उन वरदायक भगवान् विष्णुने अपने पास ही खड़े हुए महान् वेगशाली पक्षिराज गरुड़से अपनी अभीष्ट बात इस प्रकार कही— ॥ ३२ ॥ द्विजोत्तम महाभाग पश्यतां वचनान्मम । सम्राड् राजा वसुर्नाम धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ३३ ॥ 'महाभाग पक्षिप्रवर! तुम मेरी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मा सम्राट् राजा वसुके पास जाकर उन्हें देखो ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणानां प्रकोपेन प्रविष्टो वसुधातलम् । मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ॥ ३४ ॥ 'पक्षिराज! वे ब्राह्मणोंके कोपसे पातालमें प्रविष्ट हुए हैं। फिर भी उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका सदा सम्मान ही किया है; अतः तुम उनके पास जाओ ॥ ३४ ॥

भूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडेह ममाज्ञया । अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु मा चिरम् ॥ ३५ ॥ ‘गरुड! पृथ्वीके विवरमें सुरक्षितरूपसे रहनेवाले इन पातालचारी नृपश्रेष्ठ वसुको तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही आकाशचारी बना दो’ ॥ ३५ ॥

गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् । विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते पार्थिवो वसुः ॥ ३६ ॥ यह आज्ञा पाकर वायुके समान वेगशाली गरुड अपने दोनों पंख फैलाकर उड़े और पातालमें जहाँ राजा वसु विराजमान थे, घुस गये ॥ ३६ ॥

तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः । उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ॥ ३७ ॥ विनतानन्दन गरुड सहसा राजाको वहाँसे ऊपर उठाकर तुरंत आकाशमें ले उड़े और वहीं इन्हें छोड़ दिया ॥ ३७ ॥

अस्मिन् मुहूर्ते संजज्ञे राजोपरिचरः पुनः । सशरीरो गतश्चैव ब्रह्मलोकं नृपोत्तमः ॥ ३८ ॥ उसी क्षण राजा वसु पुनः उपरिचर हो गये। फिर वे नृपश्रेष्ठ सशरीर ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ ३८ ॥

एवं तेनापि कौन्तेय वाग्दोषाद् देवताज्ञया । प्राप्ता गतिरधस्तात् तु द्विजशापान्महात्मना ॥ ३९ ॥ कुन्तीनन्दन! इस प्रकार उस महामनस्वी नरेशने भी देवताओंकी आज्ञासे वाचिक अपराध करनेके कारण ब्राह्मणोंके शापसे अधोगति प्राप्त की थी ॥ ३९ ॥

केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरीरीश्वरः । ततः शीघ्रं जहौ शापं ब्रह्मलोकमवाप च ॥ ४० ॥ फिर उन्होंने केवल पुरुषप्रवर भगवान् श्रीहरिका सेवन किया, जिससे वे उस शापसे शीघ्र ही छूट गये और ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ४० ॥

भीष्म उवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातं सम्भूता मानवा यथा । नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः । तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ४१ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! श्वेतद्वीपके निवासी पुरुष जैसे हैं, उनकी सारी स्थिति मैंने तुमसे कह सुनायी। अब देवर्षि नारद जिस प्रकार श्वेतद्वीपमें गये, वह सब प्रसंग तुमसे कहूँगा। तुम एकचित्त होकर सुनो ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाका वर्णनविषयक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)

३३८-

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अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान्‌की स्तुति करना

भीष्म उवाच

प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं नारदो भगवानृषिः ।
ददर्श तानेव नरान् श्वेतांश्चन्द्रसमप्रभान् ॥ १ ॥
पूजयामास शिरसा मनसा तैश्च पूजितः ।
दिदृक्षुर्जप्यपरमः सर्वकृच्छ्रगतः स्थितः ॥ २ ॥

**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस महान् श्वेतद्वीपमें पहुँचकर भगवान् देवर्षि नारदने जब वहाँके उन चन्द्रमाके समान कान्तिमान् पुरुषोंको देखा, तब मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन-ही-मन उनकी पूजा की। तत्पश्चात् श्वेतद्वीपनिवासी पुरुषोंने भी नारदजीका सत्कार किया। फिर वे भगवान्‌के दर्शनकी इच्छासे उनके नामका जप करने लगे एवं कठोर नियमोंका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ १-२ ॥

भूत्वैकाग्रमना विप्र ऊर्ध्वबाहुः समाहितः ।
स्तोत्रं जगौ स विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ ३ ॥

नारदजी वहाँ अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर एकाग्रचित्त हो निर्गुण-सगुणरूप विश्वात्मा भगवान् नारायणकी इस प्रकार (दो सौ नामोंद्वारा) स्तुति करने लगे ॥ ३ ॥

नारद उवाच

१ नमस्ते देवदेवेश २ निष्क्रिय ३ निर्गुण ४ लोकसाक्षिन् ५ क्षेत्रज्ञ ६ पुरुषोत्तम ७ अनन्त ८ पुरुष ९ महापुरुष १० पुरुषोत्तम ११ त्रिगुण १२ प्रधान १३ अमृत १४ अमृताख्य १५ अनन्ताख्य १६ व्योम १७ सनातन १८ सदसद्व्यक्ताव्यक्त १९ ऋतधामन् २० आदिदेव २१ वसुप्रद २२ प्रजापते २३ सुप्रजापते २४ वनस्पते २५ महाप्रजापते २६ ऊर्जस्पते २७ वाचस्पते २८ जगतपते २९ मनस्पते ३० दिवस्पते ३१ मरुत्पते ३२ सलिलपते ३३ पृथिवीपते ३४ दिक्पते ३५ पूर्वनिवास ३६ गुह्य ३७ ब्रह्मपुरोहित ३८ ब्रह्मकायिक ३९ महाराजकिक ४० चातुर्महाराजिक ४१ भासुर ४२ महाभासुर ४३ सप्त-महाभाग ४४ याम्य ४५ महायाम्य ४६ संज्ञासंज्ञ ४७ तुषित ४८ महातुषित ४९ प्रमर्दन ५० परिनिर्मित ५१ अपरिनिर्मित ५२ वशवर्तिन् ५३ अपरिन्निन्दित ५४ अपरिमित ५५ वशवर्तिन् ५६ अवशवर्तिन् ५७ यज्ञ ५८ महायज्ञ ५९ यज्ञसम्भव ६० यज्ञयोने ६१ यज्ञगर्भ ६२ यज्ञहृदय ६३ यज्ञस्तुत ६४ यज्ञभागहर ६५ पञ्चयज्ञ ६६ पञ्चकाल-कर्तृपते ६७ पाञ्चरात्रिक ६८ वैकुण्ठ ६९ अपराजित ७० मानसिक ७१ नामनामिक ७२ परस्वामिन् ७३ सुस्नात ७४ हंस ७५ परमहंस ७६

महाहंस ७७ परमयाज्ञिक ७८ सांख्ययोग ७९ सांख्यमूर्ते ८० अमृतेशय ८१ हिरण्येशय ८२ देवेशय ८३ कुशेशय ८४ ब्रह्मेशय ८५ पद्मेशय ८६ विश्वेश्वर ८७ विष्वक्सेन ८८ त्वं जगदन्त्यः ८९ त्वं जगत्प्रकृतिः ९० तवाग्निरास्यम् ९१ वडवामुखोऽग्निः ९२ त्वमाहुतिः ९३ सारथिः ९४ त्वं वषट्कारः ९५ त्वमोङ्कारः ९६ त्वं तपः ९७ त्वं मनः ९८ त्वं चन्द्रमाः ९९ त्वं चक्षुरादित्यं १०० त्वं सूर्यः १०१ त्वं दिशां गजः १०२ त्वं दिग्भानो १०३ विदिग्भानो १०४ हयशिरः १०५ प्रथमत्रिसौपर्णः १०६ वर्णधरः १०७ पञ्चाग्ने १०८ त्रिणाचिकेत १०९ षडङ्गनिधान ११० प्राग्ज्योतिष १११ ज्येष्ठसामग ११२ सामिकव्रतधर ११३ अथर्वशिराः ११४ पञ्चमहाकल्प ११५ फेनपाचार्य ११६ वालखिल्य ११७ वैखानस ११८ अभग्नयोग ११९ अभग्न-परिसंख्यान १२० युगादे १२१ युगमध्य १२२ युगनिधन १२३ आखण्डल १२४ प्राचीनगर्भ १२५ कौशिक १२६ पुरुष्टुत १२७ पुरुहूत १२८ विश्वकृत् १२१ विश्वरूप १३० अनन्तगते १३१ अनन्तभोग १३२ अनन्त १३३ अनादे १३४ अमध्य १३५ अव्यक्तमध्य १३६ अव्यक्तनिधन १३७ व्रतावास १३८ समुद्राधिवास १३९ यशोवास १४० तपोवास १४१ दमावास १४२ लक्ष्म्यावास १४३ विद्यावास १४४ कीर्त्यावास १४५ श्रीवास १४६ सर्वावास १४७ वासुदेव १४८ सर्वच्छन्दक १४९ हरिहय १५० हरिमेध १५१ महायज्ञभागहर १५२ वरप्रद १५३ सुखप्रद १५४ धनप्रद १५५ हरिमेध १५६ यम १५७ नियम १५८ महानियम १५९ कृच्छ्र १६० अतिकृच्छ्र १६१ महाकृच्छ्र १६२ सर्वकृच्छ्र १६३ नियमधर १६४ निवृत्तभ्रम १६५ प्रवचनगत १६६ पृश्निगर्भप्रवृत्त १६७ प्रवृत्तवेदक्रिय १६८ अज १६९ सर्वगते १७० सर्वदर्शिन् १७१ अग्राह्य १७२ अचल १७३ महाविभूते १७४ माहात्म्यशरीर १७५ पवित्र १७६ महापवित्र १७७ हिरण्मय १७८ बृहत् १७९ अप्रतर्क्य १८० अविज्ञेय १८१ ब्रह्माग्र्य १८२ प्रजासर्गकर १८३ प्रजानिधनकर १८४ महामायाधर १८५ चित्रशिखण्डिन् १८६ वरप्रद १८७ पुरोडाशभागहर १८८ गताध्वर १८९ छिन्नतृष्ण १९० छिन्नसंशय १९१ सर्वतोवृत्त १९२ निवृत्तिरूप १९३ ब्राह्मणरूप १९४ ब्राह्मणप्रिय १९५ विश्वमूर्ते १९६ महामूर्ते १९७ बान्धव १९८ भक्तवत्सल १९९ ब्रह्मण्यदेव भक्तोऽहं त्वां दिदृक्षुरेकान्तदर्शनाय २०० नमो नमः ॥

१-देवदेवेश! आपको नमस्कार है। २-आप निष्क्रिय, ३-निर्गुण और ४-समस्त जगतके साक्षी हैं। ५-क्षेत्रज्ञ, ६-पुरुषोत्तम (क्षर-अक्षर पुरुषसे उत्तम), ७-अनन्त, ८ पुरुष, ९-महापुरुष, १०-पुरुषोत्तम (परमात्मा), ११-त्रिगुण, १२-प्रधान, १३-अमृत, १४-अमृताख्य, १५-अनन्ताख्य (शेषनागरूप), १६-व्योम (महाकाशरूप), १७-सनातन, १८-सदसद्व्यक्ताव्यक्त, १९-ऋतधामा (सत्यधामस्वरूप), २०-आदिदेव, २१-वसुप्रद (कर्म-फलके दाता), २२-प्रजापते (दक्ष आदि), २३-सुप्रजापते (प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ), २४-वनस्पते, २५-महाप्रजापते (ब्रह्मस्वरूप), २६-ऊर्जस्पते (महाशक्तिशाली), २७-वाचस्पते (बृहस्पति), २८-जगतपते, २९-मनस्पते, ३०-दिवस्पते (सूर्य), ३१-मरुत्पते (वायुदेवताके स्वामी), ३२-

सलिलपते (जलके स्वामी), ३३-पृथ्वीपते, ३४-दिक्पते, ३५-पूर्वनिवास (महाप्रलयके समय जगत्के आधाररूप), ३६-गुह्य (स्वरूप), ३७-ब्रह्मपुरोहित, ३८-ब्रह्मकायिक, ३९-महाराजिक, ४०-चातुर्महाराजिक, ४१-भासुर (प्रकाशमान), ४२-महाभासुर (महाप्रकाशमान), ४३-सप्तमहाभाग, ४४-याम्य, ४५-महायाम्य, ४६-संज्ञासंज्ञ, ४७-तुषित, ४८-महातुषित, ४९-प्रमर्दन (मृत्युरूप), ५०-परिनिर्मित, ५१-अपरिनिर्मित, ५२-वशवर्ती, ५३-अपरिनिन्दित (शमदम आदि गुणसम्पन्न), ५४-अपरिमित (अनन्त), ५५-वशवर्ती, ५६-अवशवर्ती, ५७-यज्ञ, ५८-महायज्ञ, ५९-यज्ञसम्भव, ६०-यज्ञयोनि (वेदस्वरूप), ६१-यज्ञगर्भ, ६२-यज्ञहृदय, ६३-यज्ञस्तुत, ६४-यज्ञभागहर, ६५-पञ्चयज्ञ, ६६-पञ्चकालकर्तृपति (अहोरात्र, मास, ऋतु, अयन और संवत्सररूप कालके स्वामी), ६७-पाञ्चरात्रिक, ६८-वैकुण्ठ (परमधाम), ६९-अपराजित, ७०-मानसिक, ७१-नानामिक (जिनमें सब नामोंका समावेश है), ७२-परस्वामी (परमेश्वर), ७३-सुस्नात, ७४-हंस, ७५-परमहंस, ७६-महाहंस, ७७-परमयाज्ञिक, ७८-सांख्ययोगरूप, ७९-सांख्यमूर्ति (ज्ञानमूर्ति), ८०-अमृतेशय (विष्णु), ८१-हिरण्येशय, ८२-देवेशय, ८३-कुशेशय, ८४-ब्रह्मेशय, ८५-पद्मेशय (विष्णु), ८६-विश्वेश्वर और ८७-विष्वक्सेन आदि आपहीके नाम हैं। ८८-आप ही जगदन्वय (जगत्में ओत-प्रोत) तथा ८९-आप ही जगत्के कारणस्वरूप हैं। ९०-अग्नि आपका मुख है। ९१-आप ही बड़वानल, ९२-आप ही आहुतिरूप, ९३-सारथि, ९४-वषट्कार, ९५-ओङ्कार, ९६-तपःस्वरूप, ९७-मनःस्वरूप, ९८-चन्द्रमास्वरूप, ९९-चक्षुके देवता सूर्य आप ही हैं। १००-सूर्य, १०१-दिग्गज, १०२-दिग्भानु (दिशाओंको प्रकाशित करनेवाले), १०३-विदिग्भानु (विदिशाओंको प्रकाशित करनेवाले) तथा १०४-हयग्रीवरूप हैं। १०५-आप प्रथम त्रिसौपर्ण मन्त्र, १०६-ब्राह्मणादि वर्णोंको धारण करनेवाले तथा १०७-पंचाग्निरूप है। १०८-नाचिकेत नामसे प्रसिद्ध त्रिविध अग्नि भी आप ही हैं। १०९-आप शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, निरुक्त और ज्योतिष नामक छः अंगोंके भण्डार हैं। ११० प्राग्ज्योतिषस्वरूप, १११-ज्येष्ठ सामगस्वरूप आप ही हैं। ११२-सामिक व्रतधारी, ११३-अथर्वशिरा, ११४-पञ्चमहाकल्परूप (आप ही सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव और वैष्णव शास्त्रोंके उपास्यदेव) हैं। ११५-फेनपाचार्य, ११६-वालखिल्य मुनिरूप, ११७-वैखानस मुनिरूप आप ही हैं। ११८-अभग्नयोग (अखण्डयोग), ११९-अभग्नपरिसंख्यान (अखण्ड विचार), १२०-युगादि (युगके आदिरूप), १२१-युगमध्य (युगके मध्यरूप), १२२-युगान्त (युगके अन्तरूप आप ही हैं), १२३-आखण्डल (इन्द्र), १२४-आप ही प्राचीनगर्भ, १२५-कौशिकमुनि, १२६-पुरुष्टुत (सबके द्वारा प्रचुर स्तुति करने योग्य), १२७-पुरुहूत, १२८-विश्वकृत (विश्वके रचयिता), १२९-विश्वरूप, १३०-अनन्तगति, १३१-अनन्तभोग, १३२-आपका न तो अन्त है, १३३-न आदि, १३४-न मध्य, १३५-अव्यक्तमध्य, १३६-अव्यक्तनिधन, १३७-व्रतावास (व्रतके आश्रय), १३८-समुद्रवासी (क्षीरसागरशायी), १३९-यशोवास, (यशके निवासस्थान), १४०-तपोवास (तपके निवासस्थान), १४१-दमावास (संयमके आधार),

१४२-लक्ष्मीनिवास, १४३-विद्याके आश्रय, १४४-कीर्तिके आधार, १४५-सम्पत्तिके आश्रय, १४६-सर्वावास (सबके निवासस्थान), १४७-वासुदेव, १४८-सर्वच्छन्दक (सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले), १४९-हरिहय, १५०-हरिमेध (अश्वमेधयज्ञरूप), १५१-महायज्ञभागहर, १५२-वरप्रद (भक्तोंको वरदान देनेवाले), १५३-सुखप्रद (सबको सुख प्रदान करनेवाले), १५४-धनप्रद (सबको धन देनेवाले), १५५-हरिमेध (भगवद्दत्त भी आप ही हैं), १५६-यम, १५७-नियम, १५८-महानियम आदि साधन भी आप ही हैं। १५९-कृच्छ्र, १६०-अतिकृच्छ्र, १६१-महाकृच्छ्र, १६२-सर्वकृच्छ्र आदि चान्द्रायणव्रत भी आप ही हैं। १६३-नियमधर (नियमोंको धारण करनेवाले), १६४-निवृत्तभ्रम (भ्रमरहित), १६५-प्रवचनगत (वेदवाक्यके विषय), १६६-पृश्निगर्भप्रवृत्त, १६७-प्रवृत्तवेदक्रिय (वैदिक कर्मोंकि प्रवर्तक), १६८-अज (जन्मरहित), १६९-सर्वगति (सर्वव्यापी), १७०-सर्वदर्शी, १७१-अग्राह्य, १७२-अचल, १७३-महाविभूति (सृष्टिरूप विभूतिवाले), १७४-माहात्म्यशरीर (अतुलित प्रभावशाली स्वरूपवाले), १७५-पवित्र, १७६-महापवित्र (पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले), १७७-हिरण्मय, १७८-बृहद् (ब्रह्म), १७९-अप्रतर्क्य (तर्कसे जाननेमें न आनेवाले), १८०-अविज्ञेय, १८१-ब्रह्माग्रय, १८२-प्रजाकी सृष्टि करनेवाले, १८३-प्रजाका अन्त करनेवाले, १८४-महामायाधर, १८५-चित्रशिखण्डी, १८६-वरप्रद, १८७-पुरोडाश भागको ग्रहण करनेवाले, १८८-गताध्वर (प्राप्तयज्ञ), १८९-छिन्नतृष्ण (तृष्णारहित), १९०-छिन्नसंशय (संशयरहित), १९१-सर्वतोवृत्त (सर्वव्यापक), १९२-निवृत्तिरूप, १९३-ब्राह्मणरूप, १९४-ब्राह्मणप्रिय, १९५-विश्वमूर्ति, १९६-महामूर्ति, १९७-बान्धव (जगत्के बन्धु), १९८-भक्तवत्सल तथा १९९-ब्रह्मण्यदेव आदि नामोंसे पुकारे जानेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है। मैं आपका भक्त हूँ। आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। २००-एकान्तमें दर्शन देनेवाले आप परमात्माको बारंबार नमस्कार है।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३३८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३३८ ।।

श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान्‌का दर्शन, भगवान्‌का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचन

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एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान्‌का दर्शन, भगवान्‌का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य

भीष्म उवाच

एवं स्तुतः स भगवान् गुह्यैस्तथ्यैश्च नामभिः ।
तं मुनिं दर्शयामास नारदं विश्वरूपधृक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार गुह्य तथा सत्य नामोंसे जब नारदजीने भगवान्‌की स्तुति की, तब उन्होंने विश्वरूप धारण करके उन्हें दर्शन दिया ॥ १ ॥

किंचिच्चन्द्राद् विशुद्धात्मा किंचिच्चन्द्राद् विशेषवान् ।
कृशानुवर्णः किंचिच्च किंचिद्धिष्ण्याकृतिः प्रभुः ॥ २ ॥
उनका वह स्वरूप कुछ चन्द्रमासे भी अधिक निर्मल और कुछ चन्द्रमासे भी विलक्षण था। कुछ अग्निके समान देदीप्यमान और कुछ नक्षत्रोंके समान जाज्वल्यमान था ॥ २ ॥

शुकपत्रनिभः किंचित् किंचित्स्फटिकसंनिभः ।
नीलाञ्जनचयप्रख्यो जातरूपप्रभः क्वचित् ॥ ३ ॥
कुछ तोतेकी पाँखके समान हरा, कुछ स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल, कहींसे कज्जलराशिके समान काला और कहींसे सुवर्णके समान कान्तिमान् था ॥ ३ ॥

प्रवालाङ्कुरवर्णश्च श्वेतवर्णस्तथा क्वचित् ।
क्वचित् सुवर्णवर्णाभो वैदूर्यसदृशः क्वचित् ॥ ४ ॥
कहीं नवांकुरित पल्लवके समान था। कहीं श्वेतवर्ण दिखायी देता था, कहीं सुनहरी आभा दिखायी देती थी और कहीं-कहीं वैदूर्यमणिकी-सी छटा छिटक रही थी ॥ ४ ॥

नीलवैदूर्यसदृश इन्द्रनीलनिभः क्वचित् ।
मयूरग्रीववर्णाभो मुक्ताहारनिभः क्वचित् ॥ ५ ॥
कहीं नीलवैदूर्य, कहीं इन्द्रनीलमणि, कहीं मोरकी ग्रीवाके सदृश वर्ण और कहीं मोतीके हारकी-सी कान्ति दृष्टिगोचर होती थी ॥ ५ ॥

एतान् बहुविधान् वर्णान् रूपैर्बिभ्रत्सनातनः ।
सहस्रनयनः श्रीमान् शतशीर्षः सहस्रपात् ॥ ६ ॥
सहस्रोदरबाहुश्च अव्यक्त इति च क्वचित् ।