महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सूर्यदेव उनके सम्पूर्ण अंगोंको जलाकर भस्म कर देते हैं। फिर कहीं कोई उन्हें देख नहीं पाता। वे परमाणुस्वरूप होकर उन्हीं सूर्यदेवमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ १४ १/२ ॥
तस्मादपि च निर्मुक्ता अनिरुद्धतनौ स्थिताः ॥ १५ ॥
मनोभूतास्ततो भूत्वा प्रद्युम्नं प्रविशन्त्युत ।
फिर उनसे भी मुक्त होकर वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित होते हैं। फिर मनोमय होकर प्रद्युम्नमें प्रवेश करते हैं ॥ १५ १/२ ॥
प्रद्युम्नाच्चापि निर्मुक्ता जीवं संकर्षणं ततः ॥ १६ ॥
विशन्ति विप्रप्रवराः सांख्या भागवतैः सह ।
प्रद्युम्नसे भी युक्त होकर वे सांख्यज्ञानसम्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण भगवद्भक्तोंके साथ जीवस्वरूप संकर्षणमें प्रविष्ट होते हैं ॥ १६ १/२ ॥
ततस्त्रैगुण्यहीनास्ते परमात्मानमञ्जसा ॥ १७ ॥
प्रविशन्ति द्विजश्रेष्ठाः क्षेत्रज्ञं निर्गुणात्मकम् ।
सर्वावासं वासुदेवं क्षेत्रज्ञं विद्धि तत्त्वतः ॥ १८ ॥
तदनन्तर तीनों गुणोंसे मुक्त हो वे श्रेष्ठ द्विज अनायास ही निर्गुणस्वरूप क्षेत्रज्ञ परमात्मामें प्रवेश कर जाते हैं। तुम सबके निवासस्थान भगवान् वासुदेवको ही क्षेत्रज्ञ समझो ॥ १७-१८ ॥
समाहितमनस्काश्च नियताः संयतेन्द्रियाः ।
एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते ॥ १९ ॥
जिन्होंने अपने मनको एकाग्र कर लिया है, जो शौच संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न और जितेन्द्रिय हैं, वे अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें गये हुए भक्त साक्षात् वासुदेवमें प्रवेश करते हैं ॥ १९ ॥
आवामपि च धर्मस्य गृहे जातौ द्विजोत्तम ।
रम्यां विशालामाश्रित्य तप उग्रं समास्थितौ ॥ २० ॥
द्विजश्रेष्ठ! हम दोनों भी धर्मके घरमें अवतीर्ण हो इस रमणीय बदरिकाश्रमतीर्थका आश्रय ले कठोर तपस्यामें संलग्न हैं ॥ २० ॥
ये तु तस्यैव देवस्य प्रादुर्भावाः सुरप्रियाः ।
भविष्यन्ति त्रिलोकस्थास्तेषां स्वतीत्यथो द्विज ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! उन्हीं भगवान् परमदेव परमात्माके तीनों लोकोंमें जो देवप्रिय अवतार होनेवाले हैं, उनका सदा ही परम मंगल हो—यही हमारी इस तपस्याका उद्देश्य है ॥ २१ ॥
विधिना स्वेन युक्ताभ्यां यथापूर्वे द्विजोत्तम ।
आस्थिताभ्यां सर्वकृच्छ्रं व्रतं सम्यगनुत्तमम् ॥ २२ ॥
आवाभ्यामपि दृष्टस्त्वं श्वेतद्वीपे तपोधन ।
समागतो भगवता संजल्पं कृतवांस्तथा ॥ २३ ॥
सर्वं हि नौ संविदितं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यद् भविष्यति वृत्तं वा वर्तते वा शुभाशुभम् ।
सर्वं स ते कथितवान् देवदेवो महामुने ॥ २४ ॥
द्विजोत्तम! हम दोनोंने पूर्ववत् अपने कर्ममें संलग्न हो सर्वोत्तम एवं सम्पूर्ण कठिनाइयोंसे युक्त उत्तम व्रतमें तत्पर रहते हुए ही श्वेतद्वीपमें उपस्थित होकर वहाँ तुम्हें देखा था। तपोधन! तुम वहाँ भगवान्से मिले और उनके साथ वार्तालाप किया। ये सारी बातें हम दोनोंको अच्छी तरह विदित हैं। महामुने! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें जो शुभ या अशुभ बात हो चुकी है, हो रही है, अथवा होनेवाली है, वह सब उस समय देवदेव भगवान् श्रीहरिने तुमसे कही थी ॥ २२—२४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तयोर्वाक्यं तपस्युग्रे च वर्ततोः ।
नारदः प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणपरायणः ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कठोर तपस्यामें लगे हुए भगवान् नर और नारायणकी यह बात सुनकर नारदजीने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और नारायणकी शरण लेकर उन्हींकी आराधनामें लग गये ॥ २५ ॥
जजाप विधिवन्मन्त्रान् नारायणगतान् बहून् ।
दिव्यं वर्षसहस्रं हि नरनारायणाश्रमे ॥ २६ ॥
उन्होंने नारायणसम्बन्धी बहुत-से मन्त्रोंका विधिपूर्वक जप किया और एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक वे नर-नारायणके आश्रममें टिके रहे ॥ २६ ॥
अवसत् स महातेजा नारदो भगवानृषिः ।
तमेवाभ्यर्चयन् देवं नरनारायणौ च तौ ॥ २७ ॥
महातेजस्वी भगवान् नारद मुनि प्रतिदिन उन्हीं भगवान् वासुदेवकी तथा उन दोनों नर और नारायणकी भी आराधना करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥
३४५-
पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य नारदः परमेष्ठिजः ।
दैवं कृत्वा यथान्यायं पित्र्यं चक्रे ततः परम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! किसी समय ब्रह्मपुत्र नारदजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार पहले देवकार्य (हवन-पूजन) करके फिर पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण) किया ॥ १ ॥
ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मजः प्रभुः ।
क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते ॥ २ ॥
त्वया मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे शंस यथागमम् ।
किमेतत् क्रियते कर्म फलं वास्य किमिष्यते ॥ ३ ॥
तब धर्मके ज्येष्ठ पुत्र नरने उनसे इस प्रकार पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य हो। तुम्हारे द्वारा देवकार्य और पितृकार्यके सम्पादित होनेपर उन कर्मोंसे किसकी पूजा सम्पन्न होती है? यह मुझे शास्त्रके अनुसार बताओ। तुम यह कौन-सा कर्म करते हो? और इसके द्वारा किस फलको प्राप्त करना चाहते हो? ॥ २-३ ॥
नारद उवाच
त्वयैतत् कथितं पूर्वं दैवं कर्तव्यमित्यपि ।
दैवतं च परो यज्ञः परमात्मा सनातनः ॥ ४ ॥
नारदजीने कहा— प्रभो! आपने ही पहले यह कहा था कि देवकर्म सबके लिये कर्तव्य है; क्योंकि देवकर्म उत्तम यज्ञ है और यज्ञ सनातन परमात्माका स्वरूप है ॥ ४ ॥
ततस्तद्भावितो नित्यं यजे वैकुण्ठमव्ययम् ।
तस्माच्च प्रसूतः पूर्वं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५ ॥
अतः आपके उस उपदेशसे प्रभावित होकर मैं प्रतिदिन अविनाशी भगवान् वैकुण्ठका यजन करता हूँ। उन्हींसे सर्वप्रथम लोकपितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं ॥
मम वै पितरं प्रीतः परमेष्ठ्यप्यजीजनत् ।
अहं संकल्पजस्तस्य पुत्रः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥
परमेष्ठी ब्रह्माने प्रसन्न होकर मेरे पिता प्रजापतिको उत्पन्न किया³। मैं उनका संकल्पजनित प्रथम पुत्र हूँ ॥
यजामि वै पितॄन् साधो नारायणविधौ कृते । एवं स एव भगवान् पिता माता पितामहः ॥ ७ ॥ साधो! मैं पहले नारायणकी आराधनाका कार्य पूर्ण कर लेनेपर पितरोंका पूजन करता हूँ। इस प्रकार वे भगवान् नारायण ही मेरे पिता, माता और पितामह हैं ॥ ७ ॥ इज्यते पितृयज्ञेषु तथा नित्यं जगत्पतिः । श्रुतिश्चाप्यपरा देवी पुत्रान् हि पितरोऽयजन् ॥ ८ ॥ पितृयज्ञोंमें सदा श्रीहरिकी ही आराधना की जाती है। एक दूसरी श्रुति है कि पिताओं (देवताओं) नें पुत्रों (अग्निष्वात्त³ आदि) का पूजन किया ॥ ८ ॥ वेदश्रुतिः प्रणष्टा च पुनरध्यापिता सुतैः । ततस्ते मन्त्रदाः पुत्राः पितृत्वमुपपेदिरे ॥ ९ ॥ देवताओंका वेदज्ञान भूल गया था; फिर उनके पुत्रोंने ही उन्हें वेदश्रुतियोंको पढ़ाया। इसीसे वे मन्त्रदाता पुत्र पितृभावको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥ नूनं पुरैतद् विदितं युवयोर्भावितात्मनोः । पुत्राश्च पितरश्चैव परस्परमपूजयन् ॥ १० ॥ पुत्रों और पिताओंने जो परस्पर एक-दूसरेका पूजन किया, यह बात आप दोनों शुद्धात्मा पुरुषोंको निश्चय ही पहलेसे ही ज्ञात रही होगी ॥ १० ॥ त्रीन् पिण्डान् न्यस्य वै पृथ्व्यां पूर्वं दत्त्वा कुशानिति । कथं तु पिण्डसंज्ञां ते पितरो लेभिरे पुरा ॥ ११ ॥ देवताओंने पृथ्वीपर पहले कुश बिछाकर उनपर पितरोंके निमित्त तीन पिण्ड रखकर जो उनका पूजन किया था, इसका क्या कारण है? पूर्वकालमें पितरोंने पिण्डनाम कैसे प्राप्त किया? ॥ ११ ॥
नरनारायणावूचतुः इमां हि धरणीं पूर्वं नष्टां सागरमेखलाम् । गोविन्द उज्जहाराशु वाराहं रूपमास्थितः ॥ १२ ॥ **नर-नारायण बोले—**मुने! यह समुद्रसे घिरी हुई पृथ्वी पहले एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो गयी थी। उस समय भगवान् गोविन्दने वराहरूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक इसका उद्धार किया था ॥ १२ ॥ स्थापयित्वा तु धरणीं स्वे स्थाने पुरुषोत्तमः । जलकर्दमलिप्ताङ्गो लोककार्यार्थमुद्यतः ॥ १३ ॥ वे पुरुषोत्तम पृथ्वीको अपने स्थानपर स्थापित करके जल और कीचड़से लिपटे अंगोंसे ही लोकहितका कार्य करनेके लिये उद्यत हुए ॥ १३ ॥ प्राप्ते चाह्निककाले तु मध्यदेशगते रवौ ।
दंष्ट्राविलग्नांस्त्रीन् पिण्डान् विधाय सहसा प्रभुः ॥ १४ ॥
स्थापयामास वै पृथ्व्यां कुशानास्तीर्य नारद ।
स तेष्वात्मानमुद्दिश्य पित्र्यं चक्रे यथाविधि ॥ १५ ॥
जब सूर्य दिनके मध्य भागमें आ पहुँचे और तत्कालोचित नित्यकर्मका समय उपस्थित हुआ, तब भगवान्ने अपनी दाढ़ोंमें लगी हुई मिट्टीके सहसा तीन पिण्ड बनाये। नारद! फिर पृथ्वीपर कुश बिछाकर उन्होंने उन कुशोंपर ही वे पिण्ड रख दिये। इसके बाद अपने ही उद्देश्यसे उन पिण्डोंपर विधिपूर्वक पितृपूजनका कार्य सम्पन्न किया ॥ १४-१५ ॥
संकल्पयित्वा त्रीन् पिण्डान् स्वेनैव विधिना प्रभुः ।
आत्मगात्रोष्मसम्भूतैः स्नेहगर्भैस्तिलैरपि ॥ १६ ॥
प्रोक्ष्यापसव्यं देवेशः प्राङ्मुखः कृतवान् स्वयं ।
मर्यादास्थापनार्थं च ततो वचनमुक्तवान् ॥ १७ ॥
अपने ही विधानसे प्रभुने वे तीनों पिण्ड संकल्पित किये। फिर अपने शरीरकी ही गर्मीसे उत्पन्न हुए स्नेहयुक्त तिलों द्वारा अपसव्यभावसे उन पिण्डोंका प्रोक्षण किया। तदनन्तर देवेश्वर श्रीहरिने स्वयं ही पूर्वाभिमुख हो प्रार्थना की और धर्म-मर्यादाकी स्थापनाके लिये यह बात कही ॥ १६-१७ ॥
वृषाकपिरुवाच
अहं हि पितरः स्रष्टुमुद्यतो लोककृत् स्वयं ।
यस्य चिन्तयतः सद्यः पितृकार्यविधीन् परान् ॥ १८ ॥
दंष्ट्राभ्यां प्रविनिर्धूता ममैते दक्षिणां दिशम् ।
आश्रिता धरणीं पिण्डास्तस्मात् पितर एव ते ॥ १९ ॥
भगवान् वराहने कहा— मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका स्रष्टा हूँ। मैं स्वयं ही जब पितरोंकी सृष्टिके लिये उद्यत हो पितृकार्यसम्बन्धी दूसरी विधियोंका चिन्तन करने लगा, उसी क्षण मेरी दो दाढ़ोंसे ये तीन पिण्ड दक्षिण दिशाकी ओर पृथ्वीपर गिर पड़े; अतः ये पिण्ड पितृस्वरूप ही हैं ॥ १८-१९ ॥
त्रयो मूर्तिविहीना वै पिण्डमूर्तिधरास्त्विमे ।
भवन्तु पितरो लोके मया सृष्टाः सनातनाः ॥ २० ॥
तीन पितर मूर्तिहीन या अमूर्त होते हैं, जो पिण्डरूप मूर्ति धारण करके प्रकट हुए हैं, लोकमें मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये ये सनातन पितर हों ॥ २० ॥
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः ।
अहमेवात्र विज्ञेयस्त्रिषु पिण्डेषु संस्थितः ॥ २१ ॥
पिता, पितामह और प्रपितामह—इनके रूपमें मुझे ही इन तीन पिण्डोंमें स्थित जानना चाहिये ॥ २१ ॥
नास्ति मत्तोऽधिकः कश्चित् को वान्योऽर्च्यो मया स्वयम् ।
को वा मम पिता लोके अहमेव पितामहः ॥ २२ ॥
मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है; फिर दूसरा कौन है जिसका स्वयं मैं पूजन करूँ? संसारमें मेरा पिता कौन है? सबका दादा-बाबा तो मैं ही हूँ ॥ २२ ॥
पितामहपिता चैव अहमेवात्र कारणम् ।
इत्येतदुक्त्वा वचनं देवदेवो वृषाकपिः ॥ २३ ॥
वराहपर्वते विप्र दत्त्वा पिण्डान् सविस्तरम् ।
आत्मानं पूजयित्वैव तत्रैवादर्शनं गतः ॥ २४ ॥
पितामहका पिता—परदादा भी मैं ही हूँ। मैं ही इस जगत्का कारण हूँ। विप्रवर! ऐसी बात कहकर देवाधिदेव भगवान् वराहने वराहपर्वतपर विस्तारपूर्वक पिण्डदान दे पितरोंके रूपमें अपने आपका ही पूजन करके वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २३-२४ ॥
एषा तस्य स्थितिर्विप्र पितरः पिण्डसंज्ञिताः ।
लभन्ते सततं पूजां वृषाकपिवचो यथा ॥ २५ ॥
ब्रह्मन्! यह भगवान्की ही नियत की हुई मर्यादा है। इस प्रकार पितरोंको पिण्डसंज्ञा प्राप्त हुई है। भगवान् वराहके कथनानुसार वे पितर सदा सबके द्वारा पूजा प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥
ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंश्चैवातिथींस्तथा ।
गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं यथा ॥ २६ ॥
कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते ।
अन्तर्गतः स भगवान् सर्वसत्त्वशरीरगः ॥ २७ ॥
जो देवता, पितर, गुरु, अतिथि, गौ, श्रेष्ठ ब्राह्मण, पृथ्वी और माताकी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा पूजा करते हैं, वे वास्तवमें भगवान् विष्णुकी ही आराधना करते हैं; क्योंकि भगवान् विष्णु समस्त प्राणियोंके शरीरमें अन्तरात्मारूपसे विराजमान हैं ॥ २६-२७ ॥
समः सर्वेषु भूतेषु ईश्वरः सुखदुःखयोः ।
महान् महात्मा सर्वात्मा नारायण इति श्रुतिः ॥ २८ ॥
सुख और दुःखके स्वामी श्रीहरि समस्त प्राणियोंमें समभावसे स्थित हैं। श्रीनारायण महान्, महात्मा एवं सर्वात्मा हैं; ऐसा श्रुतिमें कहा गया है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४५ ॥
१-यद्यपि नारदजी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं तथापि दक्षके शापवश उन्हें पुनः प्रजापतिसे जन्म ग्रहण करना पड़ा यह कथा हरिवंशमें आयी है। २-अग्निष्वात्त आदि पितृगण देवताओंके ही पुत्र हैं। एक समय देवता दीर्घकालतक असुरोंके साथ युद्धमें लगे रहे, इसलिये उन्हें अपने पढ़े हुए वेद भूल गये। फिर उन पुत्रोंसे ही वेदोंको पढ़कर देवताओंने उनको पितृपदपर प्रतिष्ठित किया।
नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार
षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं नरनारायणेरितम् ।
अत्यन्तं भक्तिमान् देवे एकान्तित्वमुपेयिवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नर-नारायणका वह कथन सुनकर भगवान्के प्रति नारदजीकी भक्ति बहुत बढ़ गयी। वे उनके अनन्य भक्त हो गये ॥ १ ॥
प्रोष्य वर्षसहस्रं तु नरनारायणाश्रमे ।
श्रुत्वा भगवदाख्यानं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् ॥ २ ॥
हिमवन्तं जगामाशु यत्रास्य स्वक आश्रमः ।
नर-नारायणके आश्रममें भगवान्की कथा सुनते और प्रतिदिन अविनाशी श्रीहरिका दर्शन करते हुए जब नारदजीके एक हजार दिव्य वर्ष पूरे हो गये तब वे शीघ्र ही हिमालयपर्वतके उस भागमें चले गये, जहाँ उनका अपना आश्रम था ॥ २ १/२ ॥
तावपि ख्याततपसौ नरनारायणावृषी ॥ ३ ॥
तस्मिन्नेवाश्रमे रम्ये तेपतुस्तप उत्तमम् ।
तत्पश्चात् वे विख्यात तपस्वी नर-नारायण ऋषि भी पुनः उसी रमणीय आश्रममें रहते हुए उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ३ १/२ ॥
त्वमप्यमितविक्रान्तः पाण्डवानां कुलोद्वहः ॥ ४ ॥
पावितात्माद्य संवृत्तः श्रुत्वेमामादितः कथाम् ।
जनमेजय! तुम पाण्डवोंके कुलभूषण और अत्यन्त पराक्रमी हो। तुम भी प्रारम्भसे ही इस कथाको सुनकर आज परम पवित्र हो गये हो ॥ ४ १/२ ॥
नैव तस्यापरो लोको नायं पार्थिवसत्तम ॥ ५ ॥
कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् ।
नृपश्रेष्ठ! जो मन, वाणी, और क्रियाद्वारा अविनाशी भगवान् विष्णुके साथ द्वेष रखता है, उसका न इस लोकमें ठिकाना है और न परलोकमें ॥ ५ १/२ ॥
मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः ॥ ६ ॥
यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् ।
जो देवश्रेष्ठ भगवान् नारायण हरिसे द्वेष करता है, उसके पितर सदाके लिये नरकमें डूब जाते हैं ॥ ६ १/२ ॥
कथं नाम भवेद् द्वेष्य आत्मा लोकस्य कस्यचित् ॥ ७ ॥
आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेयो विष्णुरिति स्थितिः ।
पुरुषसिंह! भगवान् विष्णुको सबका आत्मा जानना चाहिये। यही वास्तविक स्थिति है। कोई भी मनुष्य भला अपने आत्माके साथ द्वेष कैसे कर सकता है? ।। ७ १/२ ।।
य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः ।। ८ ।।
तेनैतत् कथितं तात माहात्म्यं परमव्ययम् ।
तस्माच्छ्रुतं मया चेदं कथितं च तवानघ ।। ९ ।।
तात! ये जो हमलोगोंके गुरु गन्धवतीपुत्र महर्षि व्यास बैठे हैं, इन्होंने ही भगवान्के परम उत्तम अविनाशी माहात्म्यका वर्णन किया है। निष्पाप! उन्हींसे मैंने यह सब सुना है और मेरेद्वारा तुमको भी कहा गया है ।। ८-९ ।।
नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ।। १० ।।
नरेश्वर! देवर्षि नारदने तो रहस्य और संग्रह-सहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे ही प्राप्त किया था ।। १० ।।
एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।
कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ।। ११ ।।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह महान् धर्म मैंने तुम्हें पहले हरिगीतामें संक्षेपसे बताया है ।। ११ ।।
कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं भुवि ।
को ह्यन्यः पुरुषव्याघ्र महाभारतकृद् भवेत् ।। १२ ।।
पुरुषसिंह! तुम कृष्णद्वैपायन व्यासको इस भूतलपर नारायणका ही स्वरूप समझो। भला, भगवान्के सिवा दूसरा कौन महाभारतका कर्ता हो सकता है? ।। १२ ।।
धर्मान् नानाविधांश्चैव को ब्रूयात् तमृते प्रभुम् ।। १३ ।।
वर्ततां ते महायज्ञो यथा संकल्पितस्त्वया ।
संकल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ।। १४ ।।
भगवान्के सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका वर्णन कर सके? तुम्हारा यह महान् यज्ञ, जैसा कि तुमने संकल्प कर रखा है, निरन्तर चालू रहे। तुमने अश्वमेध-यज्ञ करनेका संकल्प लिया है और सब धर्मोंका यथार्थ रूपसे श्रवण किया है ।। १३-१४ ।।
सौतिरुवाच
एतत् तु महदाख्यानं श्रुत्वा पार्थिवसत्तमः ।
ततो यज्ञसमाप्त्यर्थं क्रियाः सर्वाः समारभत् ।। १५ ।।
सूतपुत्र कहते हैं— शौनक! वैशम्पायनजीके मुखसे यह महान् उपाख्यान सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयने अपने यज्ञको पूर्ण करनेका सारा कार्य आरम्भ किया ।। १५ ।। नारायणीयमाख्यानमेतत् ते कथितं मया । पृष्टेन शौनकाद्येह नैमिषारण्यवासिषु ।। १६ ।। शौनक! आज तुम्हारे प्रश्नके अनुसार इन नैमिषा-रण्यनिवासी मुनियोंके समीप मैंने यहाँ यह नारायणका माहात्म्य-सम्बन्धी उपाख्यान तुम्हें सुनाया है ।। १६ ।। नारदेन पुरा राजन् गुरवे मे निवेदितम् । ऋषीणां पाण्डवानां च शृण्वतः कृष्णभीष्मयोः ।। १७ ।। राजन्! पूर्वकालमें नारदजीने ऋषियों, पाण्डवों, श्रीकृष्ण तथा भीष्मके सुनते हुए यह प्रसंग मेरे गुरु व्यासजीको बताया था ।। १७ ।। स हि परमगुरुर्जनभुवनपतिः पृथुधरणिधरः श्रुतिविनयनिधिः । शमनियमनिधिर्द्विजपरमहित- स्तव भवतु गतिर्हरिरमरहितः ।। १८ ।। वे परम गुरु, जनपति, भुवनपति, विशाल पृथ्वीको धारण करनेवाले, वेदज्ञान और विनयके भण्डार, शम और नियमकी निधि, ब्राह्मणोंके परम हितैषी तथा देवताओंके हितचिन्तक श्रीहरि तुम्हारे आश्रय हों ।। १८ ।। असुरवधकरस्तपसां निधिः सुमहतां यशसां च भाजनम् । मधुकैटभहा कृतधर्मविदां गतिदो- ऽभयदो मखभागहरोऽस्तु शरणं स ते ।। १९ ।। असुरोंका वध करनेवाले, तपस्याकी निधि, विशाल यशके भाजन, मधु और कैटभके हन्ता, सत्ययुगके धर्मोंका ज्ञान रखकर उनका पालन करनेवालोंको सद्गति प्रदान करनेवाले, अभयदाता तथा यज्ञका भाग ग्रहण करनेवाले भगवान् नारायण तुम्हें शरण दें ।। १९ ।। त्रिगुणो विगुणश्चतुरात्मधरः पूर्तेष्टयोश्च फलभागहरः । विदधातु नित्यमजितोऽतिचलो गतिमात्मगां सुकृतिनामृषीणाम् ।। २० ।। जो तीनों गुणोंसे विशिष्ट होते हुए भी निर्गुण हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक चार विग्रहोंको धारण करनेवाले हैं, इष्ट (यज्ञ-याग आदि), आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग-निर्माण आदि) के फलभागको ग्रहण करनेवाले हैं, जो कभी किसीसे पराजित
नहीं होते तथा धैर्य या मर्यादासे विचलित नहीं होते, वे भगवान् श्रीहरि पुण्यात्मा ऋषियोंको आत्मज्ञानजन्य सद्गति प्रदान करें॥ २०॥
तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं पुराणं
रविवर्णमीश्वरं गतिं बहुशः।
प्रणमध्वमेकमनसो यतः
सलिलोद्भवोऽपि तमृषिं प्रणतः॥ २१॥
जो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, अजन्मा, अन्तर्यामी, पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, ईश्वर और सब प्रकारसे सबकी गति हैं, उन परमेश्वरको तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करो; क्योंकि उन वासुदेवस्वरूप नारायण ऋषिको शेषशायी भी प्रणाम करते हैं॥ २१॥
स हि लोकयोनिरमृतस्य पदं
सूक्ष्मं परायणमचलं हि पदम्।
तत्सांख्ययोगिभिरुदारवृतं
बुद्ध्या यतात्मभिरिदं सनातनम्॥ २२॥
वे इस जगत्के आदिकारण, अमृतपद (मोक्षके आश्रय) सूक्ष्मस्वरूप, दूसरोंको शरण देनेवाले, अविचल और सनातन पद हैं। उदार शौनक! अपने मनको वशमें रखनेवाले सांख्ययोगी बुद्धिके द्वारा उन्हींका वरण करते हैं॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३४६॥
इस प्रकार महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४६॥
हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
शौनक उवाच
श्रुतं भगवतस्तस्य माहात्म्यं परमात्मनः ।
जन्म धर्मगृहे चैव नरनारायणात्मकम् ॥ १ ॥
शौनकने कहा— सूतनन्दन! हमलोगोंने षड्विधि ऐश्वर्यसे सम्पन्न उन परमात्मा श्रीहरिका माहात्म्य सुना और धर्मके घरमें उन्होंने ही नर-नारायणरूपसे जन्म ग्रहण किया था, इस बातको भी जान लिया ॥ १ ॥
महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्तिः पुरातनी ।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः ॥ २ ॥
तथा च नः श्रुतो ब्रह्मन् कथ्यमानस्त्वयानघ ।
निष्पाप सूतपुत्र! भगवान् महावराहने जो प्राचीन कालमें पिण्डोंकी उत्पत्ति करके पिण्डदानकी मर्यादा चलायी तथा प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें जिस विधिकी जैसी कल्पना की, वह सब आपके मुखसे हमलोगोंने सुना ॥ २ ½ ॥
हव्यकव्यभुजो विष्णुरुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३ ॥
यच्च तत् कथितं पूर्वं त्वया हयशिरो महत् ।
तच्च दृष्टं भगवता ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥ ४ ॥
समुद्रके उत्तर-पूर्वभागमें हव्य और कव्यका भोग ग्रहण करनेवाले भगवान् विष्णुने महान् हयग्रीवावतार धारण किया था, यह बात आपने पहले मुझसे कही थी। साथ ही यह भी बतायी थी कि भगवान् परमेष्ठी ब्रह्माने उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया था ॥ ३-४ ॥
किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा ।
रूपं प्रभावं महतामपूर्व धीमतां वर ॥ ५ ॥
महान् बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र! सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले श्रीहरिने पूर्वकालमें वह अद्भुत प्रभावशाली रूप क्यों प्रकट किया? उनका वैसा रूप तो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा हि विबुधश्रेष्ठमपूर्वममितौजसम् ।
तदश्वशिरसं पुण्यं ब्रह्मा किमकरोन्मुने ॥ ६ ॥
मुने! अमित बलशाली एवं अपूर्वरूपधारी उन पुण्यात्मा सुरश्रेष्ठ हयग्रीवका दर्शन करके ब्रह्माजीने क्या किया? ॥ ६ ॥
एतन्नः संशयं ब्रह्मन् पुराणं ज्ञानसम्भवम् । कथयस्वोत्तममते महापुरुषनिर्मितम् ॥ ७ ॥ पाविताः स्म त्वया ब्रह्मन् पुण्यां कथयता कथाम् । सूतनन्दन! आपकी बुद्धि बड़ी उत्तम है। महापुरुष भगवान्के अवतारसम्बन्धी इस पुरातन ज्ञानके विषयमें हमलोगोंको संशय हो रहा है। आप इसका समाधान कीजिये। आपने यह पुण्यमयी कथा कहकर हमलोगोंको पवित्र कर दिया है ॥ ७ १/२ ॥
सौतिरुवाच
कथयिष्यामि ते सर्वं पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ८ ॥ जगौ यद् भगवान् व्यासो राज्ञः पारिक्षितस्य वै । सूतपुत्रने कहा—शौनकजी! मैं तुमसे वेदतुल्य प्रमाणभूत सारा पुरातन वृत्तान्त कहूँगा, जिसे भगवान् व्यासने* राजा जनमेजयको सुनाया था ॥ ८ १/२ ॥ श्रुत्वाश्वशिरसो मूर्तिं देवस्य हरिमेधसः ॥ ९ ॥ उत्पन्नसंशयो राजा एतदेवमचोदयत् । भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी चर्चा सुनकर तुम्हारी ही तरह राजा जनमेजयको भी संदेह हो गया था। तब उन्होंने इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
यत्तद् दर्शितवान् ब्रह्मा देवं हयशिरोधरम् ॥ १० ॥ किमर्थं तत् सम्भवत् तन्ममाचक्ष्व सत्तम । जनमेजय बोले—सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मुने! ब्रह्माजीने भगवान्के जिस हयग्रीवावतारका दर्शन किया था, उसका प्रादुर्भाव किसलिये हुआ था? यह मुझे बताइये ॥
वैशम्पायन उवाच
यत् किंचिदिह लोके वै देहसत्त्वं विशाम्पते ॥ ११ ॥ सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिभिः । वैशम्पायनजीने कहा—प्रजानाथ! इस जगत्में जितने प्राणी हैं, वे सब ईश्वरके संकल्पसे उत्पन्न हुए पाँच महाभूतोंसे युक्त हैं ॥ ११ १/२ ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ॥ १२ ॥ भूतान्तरात्मा वरदः सगुणो निर्गुणोऽपि च । विराट्स्वरूप भगवान् नारायण इस जगत्के ईश्वर और स्रष्टा हैं, वे ही सब जीवोंके अन्तरात्मा, वरदाता, सगुण और निर्गुणरूप हैं ॥ १२ १/२ ॥ भूतप्रलयमत्यन्तं शृणुष्व नृपसत्तम ॥ १३ ॥ धरण्यामथ लीनायामप्सु चैकार्णवे पुरा ।
ज्योतिर्भूते जले चापि लीने ज्योतिषि चानिले ।। १४ ।।
वायौ चाकाशसंलीने आकाशे च मनोऽनुगे ।
व्यक्ते मनसि संलीने व्यक्ते चाव्यक्ततां गते ।। १५ ।।
अव्यक्ते पुरुषं याते पुंसि सर्वगतेऽपि च ।
तम एवाभवत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।। १६ ।।
नृपश्रेष्ठ! अब तुम पञ्चभूतोंके आत्यन्तिक प्रलयकी बात सुनो। पूर्वकालमें जब इस
पृथ्वीका एकार्णवके जलमें लय हो गया। जलका तेजमें, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें,
आकाशका मनमें, मनका व्यक्त (महत्तत्त्व) में, व्यक्तका अव्यक्त प्रकृतिमें, अव्यक्तका
पुरुषमें अर्थात् मायाविशिष्ट ईश्वरमें और पुरुषका सर्वव्यापी परमात्मामें लय हो गया, उस
समय सब ओर केवल अन्धकार-ही-अन्धकार छा गया। उसके सिवा और कुछ भी जान
नहीं पड़ता था ।। १३-१६ ।।
तमसो ब्रह्म सम्भूतं तमोमूलामृतात्मकम् ।
तद्विश्वभावसंज्ञान्तं पौरुषीं तनुमाश्रितम् ।। १७ ।।
तमसे जगत्का कारणभूत ब्रह्म (परम व्योम) प्रकट हुआ है। तमका मूल है
अधिष्ठानभूत अमृततत्त्व। वह मूलभूत अमृत ही तमसे युक्त हो सभी नाम-रूपमें प्रपञ्चको
प्रकट करता है और विराट् शरीरका आश्रय लेकर रहता है ।। १७ ।।
सोऽनिरुद्ध इति प्रोक्तस्तत् प्रधानं प्रचक्षते ।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं त्रिगुणं नृपसत्तम ।। १८ ।।
नृपश्रेष्ठ! उसीको अनिरुद्ध कहा गया है। उसीको प्रधान भी कहते हैं तथा उसीको
त्रिगुणमय अव्यक्त जानना चाहिये ।। १८ ।।
विद्यासहायवान् देवो विष्वक्सेनो हरिःप्रभुः ।
अप्स्वेव शयनं चक्रे निद्रायोगमुपागतः ।। १९ ।।
उस अवस्थामें विद्याशक्तिसे सम्पन्न सर्वव्यापी भगवान् श्रीहरिने योगनिद्राका आश्रय
लेकर जलमें शयन किया ।। १९ ।।
जगतश्चिन्तयन् सृष्टिं चित्रां बहुगुणोद्भवाम् ।
तस्य चिन्तयतः सृष्टिं महानात्मगुणः स्मृतः ।। २० ।।
अहंकारस्ततो जातो ब्रह्मा स तु चतुर्मुखः ।
हिरण्यगर्भो भगवान् सर्वलोकपितामहः ।। २१ ।।
उस समय वे नाना गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली जगत्की अद्भुत सृष्टिके विषयमें विचार
करने लगे। सृष्टिके विषयमें विचार करते हुए उन्हें अपने गुण महान् (महत्तत्त्व) का स्मरण
हो आया। उससे अहंकार प्रकट हुआ। वह अहंकार ही चार मुखोंवाले ब्रह्माजी हैं, जो
सम्पूर्ण लोकोंके पितामह और भगवान् हिरण्यगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं ।। २०-२१ ।।
पद्मोऽनिरुद्धात् सम्भूतस्तदा पद्मनिभेक्षणः ।
सहस्रपत्रे द्युतिमानुपविष्टः सनातनः ॥ २२ ॥ ददृशेऽद्भुतसंकाशो लोकानापोमयान् प्रभुः । सत्त्वस्थः परमेष्ठी स ततो भूतगणान् सृजन् ॥ २३ ॥ ब्रह्माण्डमें कमलमें अनिरुद्ध (अहंकार) से कमलनयन ब्रह्माका उस समय प्रादुर्भाव हुआ था। वे अद्भुत रूपधारी एवं तेजस्वी सनातन भगवान् ब्रह्मा सहस्रदल कमलपर विराजमान हो जब इधर-उधर दृष्टि डालने लगे, तब उन्हें समस्त जगत् जलमय दिखायी दिया। तब ब्रह्माजी सत्त्वगुणमें स्थित होकर प्राणियोंकी सृष्टिमें प्रवृत्त हुए ॥ २२-२३ ॥
पूर्वमेव च पद्मस्य पत्रे सूर्यांशुसप्रभे । नारायणकृतौ बिन्दू अपामास्तां गुणोत्तरौ ॥ २४ ॥ वे जिस कमलपर बैठे थे, उसका पत्ता सूर्यके समान देदीप्यमान होता था। उसपर पहलेसे ही भगवान् नारायणकी प्रेरणासे जलकी बूँदें पड़ी थीं, जो रजोगुण और तमोगुणकी प्रतीक थीं ॥ २४ ॥
तावपश्यत् स भगवानादिनिधनोऽच्युतः । एकस्तत्राभवद् बिन्दुर्मध्वाभो रुचिरप्रभः ॥ २५ ॥ स तामसो मधुर्जातस्तदा नारायणाज्ञया । कठिनस्त्वपरो बिन्दुः कैटभो राजसस्तु सः ॥ २६ ॥ आदि-अन्तसे रहित भगवान् अच्युतने उन दोनों बूँदोंकी ओर देखा। उनमेंसे एक बूँद भगवान्की दृष्टि पड़ते ही उनकी प्रेरणासे तमोमय मधुनामक दैत्यके आकारमें परिणत हो गयी। उस दैत्यका रंग मधुके समान था और उसकी कान्ति बड़ी सुन्दर थी। जलकी दूसरी बूँद, जो कुछ कड़ी थी, नारायणकी आज्ञासे रजोगुणसे उत्पन्न कैटभ नामक दैत्यके रूपमें प्रकट हुई ॥
तावभ्यधावतां श्रेष्ठौ तमसा रजसान्वितौ । बलवन्तौ गदाहस्तौ पद्मनालानुसारिणौ ॥ २७ ॥ तमोगुण और रजोगुणसे युक्त वे दोनों श्रेष्ठ दैत्य मधु और कैटभ बड़े बलवान् थे। वे अपने हाथोंमें गदा लिये कमलनालका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ २७ ॥
ददृशातेऽरविन्दस्थं ब्रह्माणममितप्रभम् । सृजन्तं प्रथमं वेदांश्चतुरश्चारुविग्रहान् ॥ २८ ॥ ऊपर जाकर उन्होंने कमल-पुष्पके आसनपर बैठकर सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको देखा एवं उनके पास ही मनोहर रूप धारण किये हुए चारों वेदोंको देखा ॥ २८ ॥
ततो विग्रहवन्तौ तौ वेदान् दृष्ट्वासुरोत्तमौ । सहसा जगृहतुर्वेदान् ब्रह्मणः पश्यतस्तदा ॥ २९ ॥
उन विशालकाय श्रेष्ठ असुरोंने उस समय वेदोंपर दृष्टि पड़ते ही उन्हें ब्रह्माजीके देखते-देखते सहसा हर लिया ॥ २९ ॥
अथ तौ दानवश्रेष्ठौ वेदान् गृह्य सनातनान् ।
रसां विविशतुस्तूर्णमुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३० ॥
सनातन वेदोंका अपहरण करके वे दोनों श्रेष्ठ दानव उत्तर-पूर्ववर्ती महासागरमें घुस गये और तुरंत रसातलमें जा पहुँचे ॥ ३० ॥
ततो हृतेषु वेदेषु ब्रह्मा कश्मलमाविशत् ।
ततो वचनमीशानं प्राह वेदैर्विनाकृतः ॥ ३१ ॥
वेदोंका अपहरण हो जानेपर ब्रह्माजीको बड़ा खेद हुआ। उनपर मोह छा गया। वे वेदोंसे वंचित होकर मन-ही-मन परमात्मासे इस प्रकार कहने लगे ॥ ३१ ॥
ब्रह्मोवाच
वेदा मे परमं चक्षुर्वेदा मे परमं बलम् ।
वेदा मे परमं धाम वेदा मे ब्रह्म चोत्तरम् ॥ ३२ ॥
**ब्रह्मा बोले—**भगवन्! वेद ही मेरे उत्तम नेत्र हैं, वेद ही मेरे परम बल हैं। वेद ही मेरे परम आश्रय तथा वेद ही मेरे सर्वोत्तम उपास्य देव हैं ॥ ३२ ॥
मम वेदा हृताः सर्वे दानवाभ्यां बलादितः ।
अन्धकारा हि मे लोका जाता वेदैर्विनाकृताः ॥ ३३ ॥
मेरे वे सभी वेद आज दो दानवोंने बलपूर्वक यहाँसे छीन लिये हैं। अब वेदोंके बिना मेरे लिये सम्पूर्ण लोक अन्धकारमय हो गये हैं ॥ ३३ ॥
वेदानृते हि किं कुर्यां लोकानां सृष्टिमुत्तमाम् ।
अहो बत महत् दुःखं वेदनाशनजं मम ॥ ३४ ॥
प्राप्तं दुनोति हृदयं तीव्रं शोकपरायणम् ।
को हि शोकार्णवे मग्नं मामितोऽद्य समुद्धरेत् ॥ ३५ ॥
वेदांस्तांश्चानयेन्नष्टान् कस्य चाहं प्रियो भवे ।
मैं वेदोंके बिना संसारकी उत्तम सृष्टि कैसे कर सकता हूँ? अहो! आज वेदोंके नष्ट होनेसे मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा है, जो मेरे शोकमग्न हृदयको दुःसह पीड़ा दे रहा है। आज शोकके समुद्रमें डूबे हुए मुझ असहायका यहाँसे कौन उद्धार करेगा? उन नष्ट हुए वेदोंको कौन लायेगा? मैं किसको इतना प्रिय हूँ, जो मेरी ऐसी सहायता करेगा? ॥ ३४-३५
१/२ ॥
इत्येवं भाषमाणस्य ब्रह्मणो नृपसत्तम ॥ ३६ ॥
हरेः स्तोत्रार्थमुद्भूता बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ।
ततो जगौ परं जप्यं साञ्जलिप्रग्रहः प्रभुः ॥ ३७ ॥
नृपश्रेष्ठ! ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य नरेश! तब भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्रका गान आरम्भ किया ।। ३६-३७ ।।
ब्रह्मोवाच
ॐनमस्ते ब्रह्महृदय नमस्ते मम पूर्वज । लोकाद्य भुवनश्रेष्ठ सांख्ययोगनिधे प्रभो ।। ३८ ।। ब्रह्माजी बोले— प्रभो! वेद आपका हृदय है, आपको नमस्कार है। मेरे पूर्वज! आपको प्रणाम है। जगत्के आदि कारण! भुवनश्रेष्ठ! सांख्ययोगनिधे! प्रभो! आपको बारंबार नमस्कार है ।। ३८ ।। व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थित । विश्वभुक् सर्वभूतानामन्तरात्मन्नयोनिज । अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम स्वयम्भुवः ।। ३९ ।। व्यक्त जगत् और अव्यक्त प्रकृतिको उत्पन्न करनेवाले परमात्मन्! आपका स्वरूप अचिन्त्य है। आप कल्याणमय मार्गमें स्थित हैं। विश्वपालक! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, किसी योनिसे उत्पन्न न होनेवाले, जगत्के आधार और स्वयम्भू हैं। मैं आपकी कृपासे उत्पन्न हुआ हूँ ।। ३९ ।। त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् । चाक्षुषं वै द्वितीयं मे जन्म चासीत् पुरातनम् ।। ४० ।। आपसे मेरा प्रथम बार जो जन्म हुआ था, वह द्विजोंद्वारा सम्मानित मानस-जन्म कहा गया है अर्थात् प्रथम बार मैं आपके मनसे उत्पन्न हुआ। तदनन्तर पूर्वकालमें मैं आपके नेत्रसे उत्पन्न हुआ। वह मेरा दूसरा जन्म था ।। ४० ।। त्वत्प्रसादात् तु मे जन्म तृतीयं वाचिकं महत् । त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो ।। ४१ ।। तत्पश्चात् आपके कृपाप्रसादसे मेरा जो तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, वह वाचिक था अर्थात् आपके वचनमात्रसे सुलभ हो गया था। विभो! उसके बाद आपके कानोंसे मेरा चतुर्थ जन्म हुआ था ।। ४१ ।। नासिक्यं चापि मे जन्म त्वत्तः परममुच्यते । अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितम् ।। ४२ ।। उसके बाद आपकी नासिकासे मेरा पाँचवाँ उत्तम जन्म बताया जाता है। तदनन्तर मैं आपके द्वारा ब्रह्माण्डसे उत्पन्न किया गया। वह मेरा छठा जन्म था ।। ४२ ।। इदं च सप्तमं जन्म पद्मजन्मेति वै प्रभो । सर्गे सर्गे ह्यहं पुत्रस्तव त्रिगुणवर्जित ।। ४३ ।।
प्रभो! यह मेरा सातवाँ जन्म है, जो कमलसे उत्पन्न हुआ है। त्रिगुणातीत परमेश्वर! मैं प्रत्येक कल्पमें आपका पुत्र होकर प्रकट होता हूँ॥ ४३ ॥
प्रथितः पुण्डरीकाक्ष प्रधानगुणकल्पितः ।
त्वमीश्वरः स्वभावश्च स्वयम्भूः पुरुषोत्तम ॥ ४४ ॥
कमलनयन! आपका पुत्र मैं शुद्ध सत्त्वमय शरीरसे उत्पन्न हुआ हूँ। आप ईश्वर, स्वभाव, स्वयम्भू एवं पुरुषोत्तम हैं॥ ४४ ॥
त्वया विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वयोतिगः ।
ते मे वेदा हृताश्चक्षुरन्धो जातोऽस्मि जागृहि ॥ ४५ ॥
ददस्व चक्षूंषि मम प्रियोऽहं ते प्रियोऽसि मे ।
आपने मुझे वेदरूपी नेत्रोंसे युक्त बनाया है। आपकी ही कृपासे कालातीत हूँ—मुझपर कालका जोर नहीं चलता। मेरे नेत्ररूप वे वेद दानवोंद्वारा हर लिये गये हैं; अतः मैं अन्धा-सा हो गया हूँ। प्रभो! निद्रा त्यागकर जागिये। मुझे मेरे नेत्र वापस दीजिये; क्योंकि मैं आपका प्रिय भक्त हूँ और आप मेरे प्रियतम स्वामी हैं॥ ४५ १/२ ॥
एवं स्तुतः स भगवान् पुरुषः सर्वतोमुखः ॥ ४६ ॥
जहौ निद्रामथ तदा वेदकार्यार्थमुद्यतः ।
ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सब ओर मुखवाले सबके अन्तर्यामी आत्मा भगवान्ने उसी क्षण निद्रा त्याग दी और वे वेदोंकी रक्षा करनेके लिये उद्यत हो गये॥ ४६ १/२ ॥
ऐश्वर्येण प्रयोगेण द्वितीयां तनुमास्थितः ॥ ४७ ॥
सुनासिकेन कायेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा ।
कृत्वा हयशिरः शुभ्रं वेदानामालयं प्रभुः ॥ ४८ ॥
उन्होंने अपने ऐश्वर्यके योगसे दूसरा शरीर धारण किया, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् था। सुन्दर नासिकावाले शरीरसे युक्त हो वे प्रभु घोड़ेके समान गर्दन और मुखधारण करके स्थित हुए। उनका वह शुद्ध मुख सम्पूर्ण वेदोंका आलय था॥ ४७-४८ ॥
तस्य मूर्धा समभवद् द्यौः सनक्षत्रतारका ।
केशाश्चास्याभवन् दीर्घा रवेरंशुसमप्रभाः ॥ ४९ ॥
नक्षत्रों और ताराओंसे युक्त स्वर्गलोक उनका सिर था। सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बड़े-बड़े बाल थे॥ ४९ ॥
कर्णावाकाशपाताले ललाटं भूतधारिणी ।
गङ्गा सरस्वती श्रोण्यौ भ्रुवावास्तां महोदधी ॥ ५० ॥
आकाश और पाताल उनके कान थे एवं समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथ्वी ललाट थी। गंगा और सरस्वती उनके नितम्ब तथा दो समुद्र उनकी दोनों भौंहें थे॥ ५० ॥
चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा संध्या पुनः स्मृता ।
ॐ कारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता ।। ५१ ।। दन्ताश्च पितरो राजन् सोमपा इति विश्रुताः । गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः ।। ५२ ।। चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों नेत्र तथा नासिका संध्या थी। ॐकार संस्कार (आभूषण) और विद्युत् जिह्वा बनी हुई थी। राजन्! सोमपान करनेवाले पितर उनके दाँत सुने गये हैं तथा गोलोक और ब्रह्मलोक उन महात्माके ओष्ठ थे ।। ५१-५२ ।। ग्रीवा चास्याभवद् राजन् कालरात्रिर्गुणोत्तरा । एतद्धयशिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् ।। ५३ ।। अन्तर्दधौ स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः । नरेश्वर! तमोमयी कालरात्रि उनकी ग्रीवा थी। इस प्रकार अनेक मूर्तियोंसे आवृत हयग्रीव रूप धारण करके वे जगदीश्वर श्रीहरि वहाँसे अन्तर्धान हो गये और रसातलमें जा पहुँचे ।। ५३ १/२ ।। रसां पुनः प्रविष्टश्च योगं परममास्थितः ।। ५४ ।। शैक्ष्यं स्वरं समास्थाय उद्गीतं प्रासृजत् स्वरम् । रसातलमें प्रवेश करके परम योगका आश्रय ले शिक्षाके नियमानुसार उदात्त आदि स्वरोंसे युक्त उच्च स्वरसे सामवेदका गान करने लगे ।। ५४ १/२ ।। स स्वरः सानुनादी च सर्वशः स्निग्ध एव च ।। ५५ ।। बभूवान्तर्महीभूतः सर्वभूतगुणोदितः । नाद और स्वरसे विशिष्ट सामगानकी वह सर्वथा स्निग्ध एवं मधुर ध्वनि रसातलमें सब ओर फैल गयी, जो समस्त प्राणियोंके लिये गुणकारक थी ।। ५५ १/२ ।। ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान् समयबन्धनान् ।। ५६ ।। रसातले विनिक्षिप्य यतः शब्दस्ततो द्रुतौ । उन दोनों असुरोंने वह शब्द सुनकर वेदोंको कालपाशसे आबद्ध करके रसातलमें फेंक दिया और स्वयं उसी ओर दौड़े जिधरसे वह ध्वनि आ रही थी ।। ५६ १/२ ।। एतस्मिन्नन्तरे राजन् देवो हयशिरोधरः ।। ५७ ।। जग्राह वेदानखिलान् रसातल गतान् हरिः । प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ।। ५८ ।। राजन्! इसी बीचमें हयग्रीव रूपधारी भगवान् श्रीहरिने रसातलमें पड़े हुए उन सम्पूर्ण वेदोंको ले लिया तथा ब्रह्माजीको पुनः वापस दे दिया और फिर वे अपने आदि रूपमें आ गये ।। ५७-५८ ।। स्थापयित्वा हयशिर उदक्पूर्वे महोदधौ । वेदानामालयं चापि बभूवाश्वशिरास्ततः ।। ५९ ।।
भगवान्ने महासागरके पूर्वोत्तरभागमें वेदोंके आश्रयभूत अपने हयग्रीव रूपकी स्थापना करके पुनः पूर्वरूप धारण कर लिया। तबसे भगवान् हयग्रीव वहीं रहने लगे ॥ ५९ ॥
अथ किंचिदपश्यन्तौ दानवौ मधुकैटभौ ।
पुनराजग्मतुस्तत्र वेगितौ पश्यतां च तौ ॥ ६० ॥
यत्र वेदा विनिक्षिप्तास्तत् स्थानं शून्यमेव च ।
इधर वेदध्वनिके स्थानपर आकर मधु और कैटभ दोनों दानवोंने जब कुछ नहीं देखा, तब वे बड़े वेगसे फिर वहीं लौट आये, जहाँ उन वेदोंको नीचे डाल रखा था। वहाँ देखनेपर उन्हें वह स्थान सूना ही दिखायी दिया ॥ ६०१/२ ॥
तत उत्तममास्थाय वेगं बलवतां वरौ ॥ ६१ ॥
पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालयात् तदा ।
ददृशाते च पुरुषं तमेवादिकरं प्रभुम् ॥ ६२ ॥
श्वेतं चन्द्रविशुद्धाभमनिरुद्धतनौ स्थितम् ।
भूयोऽप्यमितविक्रान्तं निद्रायोगमुपागतम् ॥ ६३ ॥
तब वे बलवानोंमें श्रेष्ठ दोनों दानव पुनः उत्तम वेगका आश्रय ले रसातलसे शीघ्र ही ऊपर उठे और ऊपर आकर देखते हैं तो वे ही आदिकर्ता भगवान् पुरुषोत्तम दृष्टिगोचर हुए। जो चन्द्रमाके समान विशुद्ध, उज्ज्वल प्रभासे विभूषित, गौरवर्णके थे। वे उस समय अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित थे और वे अमित पराक्रमी भगवान् योगनिद्राका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥
आत्मप्रमाणरचिते अपामुपार कल्पिते ।
शयने नागभोगाढ्ये ज्वालामालासमावृते ॥ ६४ ॥
निष्कल्मषेण सत्त्वेन सम्पन्नं रुचिरप्रभम् ।
तं दृष्ट्वा दानवेन्द्रौ तौ महाहासममुञ्चताम् ॥ ६५ ॥
पानीके ऊपर शेषनागके शरीरकी शय्या निर्मित हुई थी, जिसकी लम्बाई भगवान्के श्रीविग्रहके अनुरूप ही थी। वह शय्या ज्वालामालाओंसे आवृत जान पड़ती थी। उसके ऊपर विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनोहर कान्तिवाले भगवान् नारायण सो रहे थे। उन्हें देखकर वे दोनों दानवराज ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ६४-६५ ॥
ऊचतुश्च समाविष्टौ रजसा तमसा च तौ ।
अयं स पुरुषः श्वेतः शेते निद्रामुपागतः ॥ ६६ ॥
अनेन नूनं वेदानां कृतमाहरणं रसात् ।
कस्यैष को नु खल्वेष किं च स्वपिति भोगवान् ॥ ६७ ॥
रजोगुण और तमोगुणसे आविष्ट हुए वे दोनों असुर परस्पर कहने लगे, 'यह जो श्वेतवर्णवाला पुरुष निद्रामें निमग्न होकर सो रहा है, निश्चय ही इसीने रसातलसे वेदोंका