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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

यतेद् ब्राह्मणपूर्वं हि भोक्तुमन्नं गृही सदा ।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यादन्नदानेन मानवः ॥ २७ ॥
प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि वह पहले ब्राह्मणको भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करनेका प्रयत्न करे तथा अन्न-दानके द्वारा प्रत्येक दिनको सफल बनावे ॥ २७ ॥

भोजयित्वा दशशतं नरो वेदविदां नृप ।
न्यायविद्धर्मविदुषामितिहासविदां तथा ॥ २८ ॥
न याति नरकं घोरं संसारांश्च न सेवते ।
सर्वकामसमायुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते सुखम् ॥ २९ ॥
नरेश्वर! जो मनुष्य वेद, न्याय, धर्म और इतिहासके जाननेवाले एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह घोर नरक और संसारचक्रमें नहीं पड़ता। इहलोकमें उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और मरनेके बाद वह परलोकमें सुख भोगता है ॥ २८-२९ ॥

एवं खलु समायुक्तो रमते विगतज्वरः ।
रूपवान् कीर्तिमांश्चैव धनवांश्चोपपद्यते ॥ ३० ॥
इस प्रकार अन्न-दानमें संलग्न हुआ पुरुष निश्चिन्त हो सुखका अनुभव करता है और रूपवान्, कीर्तिमान् तथा धनवान् होता है ॥ ३० ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातमन्नदानफलं महत् ।
मूलमेतत् तु धर्माणां प्रदानानां च भारत ॥ ३१ ॥
भारत! अन्न-दान सब प्रकारके धर्मों और दानोंका मूल है। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अन्नदानका सारा महान् फल बताया है ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रे
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं)

बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान

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त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान

युधिष्ठिर उवाच

अहिंसा वैदिकं कर्म ध्यानमिन्द्रियसंयमः ।
तपोऽथ गुरुशुश्रूषा किं श्रेयः पुरुषं प्रति ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! अहिंसा, वेदोक्त कर्म, ध्यान, इन्द्रिय-संयम, तपस्या और गुरु-शुश्रूषा—इनमेंसे कौन-सा कर्म मनुष्यका (विशेष) कल्याण कर सकता है ॥

बृहस्पतिरुवाच

सर्वाण्येतानि धर्म्याणि पृथग्द्वाराणि सर्वशः ।
शृणु संकीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ ॥ २ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**भरतश्रेष्ठ! ये छः प्रकारके कर्म ही धर्मजनक हैं तथा सब-के-सब भिन्न-भिन्न कारणोंसे प्रकट हुए हैं। मैं इन छहोंका वर्णन करता हूँ; तुम सुनो ॥
हन्त निःश्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ।
अहिंसापाश्रयं धर्मं यः साधयति वै नरः ॥ ३ ॥
त्रीन् दोषान् सर्वभूतेषु निधाय पुरुषः सदा ।
कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते ॥ ४ ॥
अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमें स्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ ३-४ ॥
अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः ।
आत्मनः सुखमन्विच्छन् स प्रेत्य न सुखी भवेत् ॥ ५ ॥
जो मनुष्य अपने सुखकी इच्छा रखकर अहिंसक प्राणियोंको डंडेसे मारता है, वह परलोकमें सुखी नहीं होता है ॥ ५ ॥
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः ।
न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥ ६ ॥
जो मनुष्य सब भूतोंको अपने समान समझता, किसीपर प्रहार नहीं करता (दण्डको हमेशाके लिये त्याग देता है) और क्रोधको अपने काबूमें रखता है, वह मृत्युके पश्चात् सुख भोगता है ॥ ६ ॥

सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः ।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः ॥ ७ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, अर्थात् सबकी आत्माको अपनी ही आत्मा समझता है तथा जो सब भूतोंको समान भावसे देखता है, उस गमनागमनसे रहित ज्ञानीकी गतिका पता लगाते समय देवता भी मोहमें पड़ जाते हैं ॥ ७ ॥

न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः ।
एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥ ८ ॥
जो बात अपनेको अच्छी न लगे, वह दूसरोंके प्रति भी नहीं करनी चाहिये। यही धर्मका संक्षिप्त लक्षण है। इससे भिन्न जो बर्ताव होता है, वह कामनामूलक है ॥ ८ ॥

प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये ।
आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ ९ ॥
माँगनेपर देने और इनकार करनेसे, सुख और दुःख पहुँचानेसे तथा प्रिय और अप्रिय करनेसे पुरुषको स्वयं जैसे हर्ष-शोकका अनुभव होता है, उसी प्रकार दूसरोंके लिये भी समझे ॥ ९ ॥

यथा परः प्रक्रमते परेषु
तथापरे प्रक्रमन्ते परस्मिन् ।
तथैव तेऽस्तूपमा जीवलोके
यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः ॥ १० ॥
जैसे एक मनुष्य दूसरोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अवसर आनेपर दूसरे भी उसके ऊपर आक्रमण करते हैं। इसीको तुम जगत्में अपने लिये भी दृष्टान्त समझो। अतः किसीपर आक्रमण नहीं करना चाहिये। इस प्रकार यहाँ कौशलपूर्वक धर्मका उपदेश किया है ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा तं सुरगुरुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
दिवमाचक्रमे धीमान् पश्यतामेव नस्तदा ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहकर परम बुद्धिमान् देवगुरु बृहस्पतिजी उस समय हमलोगोंके देखते-देखते स्वर्ग-लोकको चले गये ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रसमाप्तौ
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥

(इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री नहीं है / केवल शीर्ष पर एक सजावटी प्रतीक अंकित है)

११४-

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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा शरतल्पे पितामहम् ।
पुनरेव महातेजाः पप्रच्छ वदतां वरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर महातेजस्वी और वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने बाणशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्मसे पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ऋषयो ब्राह्मणा देवाः प्रशंसन्ति महामते ।
अहिंसालक्षणं धर्मं वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ २ ॥
कर्मणा मनुजः कुर्वन् हिंसां पार्थिवसत्तम ।
वाचा च मनसा चैव कथं दुःखात् प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महामते! देवता, ऋषि और ब्राह्मण वैदिक प्रमाणके अनुसार सदा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा किया करते हैं। अतः नृपश्रेष्ठ! मैं पूछता हूँ कि मन, वाणी और क्रियासे भी हिंसाका ही आचरण करनेवाला मनुष्य किस प्रकार उसके दुःखसे छुटकारा पा सकता है? ॥ २-३ ॥

भीष्म उवाच

चतुर्विधेयं निर्दिष्टा ह्यहिंसा ब्रह्मवादिभिः ।
एकैकतोऽपि विभ्रष्टा न भवत्यरिसूदन ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**शत्रुसूदन! ब्रह्मवादी पुरुषोंने (मनसे, वाणीसे तथा कर्मसे हिंसा न करना एवं मांस न खाना—इन) चार उपायोंसे अहिंसाधर्मका पालन बतलाया है। इनमेंसे किसी एक अंशकी भी कमी रह गयी तो अहिंसा-धर्मका पूर्णतः पालन नहीं होता ॥ ४ ॥
यथा सर्वश्चतुष्पाद् वै त्रिभिः पादैर्न तिष्ठति ।
तथैवेयं महीपाल कारणैः प्रोच्यते त्रिभिः ॥ ५ ॥
महीपाल! जैसे चार पैरोंवाला पशु तीन पैरोंसे नहीं खड़ा रह सकता, उसी प्रकार केवल तीन ही कारणोंसे पालित हुई अहिंसा पूर्णतः अहिंसा नहीं कही जा सकती ॥ ५ ॥
यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् ।
सर्वाण्येवापिधीयन्ते पदजातानि कौञ्जरे ॥ ६ ॥
एवं लोकेष्वहिंसा तु निर्दिष्टा धर्मतः पुरा ।

जैसे हाथीके पैरके चिह्नमें सभी पदगामी प्राणियोंके पदचिह्न समा जाते हैं, उसी प्रकार पूर्वकालमें इस जगत्‌के भीतर धर्मतः अहिंसाका निर्देश किया गया है अर्थात् अहिंसाधर्ममें सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है। ऐसा माना गया है।। ६ १/२ ।। कर्मणा लिप्यते जन्तुर्वाचा च मनसापि च ।। ७ ।।
पूर्वं तु मनसा त्यक्त्वा तथा वाचाथ कर्मणा ।
न भक्षयति यो मांसं त्रिविधं स विमुच्यते ।। ८ ।।
जीव मन, वाणी और क्रियाके द्वारा हिंसाके दोषसे लिप्त होता है, किंतु जो क्रमशः पहले मनसे, फिर वाणीसे और फिर क्रियाद्वारा हिंसाका त्याग करके कभी मांस नहीं खाता, वह पूर्वोक्त तीनों प्रकारकी हिंसाके दोषसे भी मुक्त हो जाता है ।। ७-८ ।।
त्रिकारणं तु निर्दिष्टं श्रूयते ब्रह्मवादिभिः ।
मनो वाचि तथाऽऽस्वादे दोषा ह्येषु प्रतिष्ठिताः ।। ९ ।।
ब्रह्मवादी महात्माओंने हिंसादोषके प्रधान तीन कारण बतलाये हैं—मन (मांस खानेकी इच्छा), वाणी (मांस खानेका उपदेश) और आस्वाद (प्रत्यक्षरूपमें मांसका स्वाद लेना)। ये तीनों ही हिंसा-दोषके आधार हैं ।। ९ ।।
न भक्षयन्त्यतो मांसं तपोयुक्ता मनीषिणः ।
दोषांस्तु भक्षणे राजन् मांसस्येह निबोध मे ।। १० ।।
इसलिये तपस्यामें लगे हुए मनीषी पुरुष कभी मांस नहीं खाते हैं। राजन्! अब मैं मांसभक्षणमें जो दोष है, उनको यहाँ बता रहा हूँ, सुनो ।। १० ।।
पुत्रमांसोपमं जानन् खादते योऽविचक्षणः ।
मांसं मोहसमायुक्तः पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ।। ११ ।।
जो मूर्ख यह जानते हुए भी कि पुत्रके मांसमें और दूसरे साधारण मांसोंमें कोई अन्तर नहीं है, मोहवश मांस खाता है, वह नराधम है ।। ११ ।।
पितृमातृसमायोगे पुत्रत्वं जायते यथा ।
हिंसां कृत्वावशः पापो भूयिष्ठं जायते तथा ।। १२ ।।
जैसे पिता और माताके संयोगसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार हिंसा करनेसे पापी पुरुषको विवश होकर बारंबार पापयोनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १२ ।।
रसं च प्रतिजिह्वाया ज्ञानं प्रज्ञायते यथा ।
तथा शास्त्रेषु नियतं रागो ह्यास्वादिताद् भवेत् ।। १३ ।।
जैसे जीभसे जब रसका ज्ञान होता है, तब उसके प्रति वह आकृष्ट होने लगती है, उसी प्रकार मांसका आस्वादन करनेपर उसके प्रति आसक्ति बढ़ती है। शास्त्रोंमें भी कहा है कि विषयोंके आस्वादनसे उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है ।। १३ ।।
संस्कृतासंस्कृताः पक्वा लवणालवणास्तथा ।
प्रजायन्ते यथा भावास्तथा चित्तं निरुध्यते ।। १४ ।।

संस्कृत (मसाले आदि डालकर संस्कृत किया हुआ) असंस्कृत (मसाला आदिके संस्कारसे रहित), पक्व, केवल नमक मिला हुआ और अलोना—ये मांसकी जो-जो अवस्थाएँ होती हैं, उन्हीं-उन्हींमें रुचिभेदसे मांसाहारी मनुष्यका चित्त आसक्त होता है ।। १४ ।।

भेरीमृदंगशब्दांश्च तन्त्रीशब्दांश्च पुष्कलान्।
निषेविष्यन्ति वै मन्दा मांसभक्षाः कथं नराः ।। १५ ।।
मांसभक्षी मूर्ख मनुष्य स्वर्गमें पूर्णतः सुलभ होनेवाले भेरी, मृदंग और वीणाके दिव्य मधुर शब्दोंका सेवन कैसे कर सकेंगे; क्योंकि वे स्वर्गमें नहीं जा सकते ।।
(परेषां धनधान्यानां हिंसकास्तावकास्तथा।
प्रशंसकाश्च मांसस्य नित्यं स्वर्गे बहिष्कृताः ॥)
दूसरोंके धन-धान्यको नष्ट करनेवाले तथा मांस-भक्षणकी स्तुति-प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सदा ही स्वर्गसे बहिष्कृत होते हैं ।।

अचिन्तितमनिर्दिष्टमसंकल्पितमेव च।
रसगृद्ध्याभिभूता ये प्रशंसन्ति फलार्थिनः ।। १६ ।।
जो मांसके रसमें होनेवाली आसक्तिसे अभिभूत होकर उसी अभीष्ट फल मांसकी अभिलाषा रखते हैं तथा उसके बारंबार गुण गाते हैं, उन्हें ऐसी दुर्गति प्राप्त होती है, जो कभी चिन्तनमें नहीं आयी है। जिसका वाणीद्वारा कहीं निर्देश नहीं किया गया है तथा जो कभी मनकी कल्पनामें भी नहीं आयी है ।। १६ ।।

(भस्म विष्ठा कृमिर्वापि निष्ठा यस्येदृशी ध्रुवा।
स कायः परपीडाभिः कथं धार्यो विपश्चिता ॥)
प्रशंसा ह्येव मांसस्य दोषकर्मफलान्विता ।। १७ ।।
जो मृत्युके पश्चात् चितापर जला देनेसे भस्म हो जाता है अथवा किसी हिंसक प्राणीका खाद्य बनकर उसकी विष्ठाके रूपमें परिणत हो जाता है, या यों ही फेंक देनेसे जिसमें कीड़े पड़ जाते हैं—इन तीनोंमेंसे यह एक-न-एक परिणाम जिसके लिये सुनिश्चित है, उस शरीरको विद्वान् पुरुष दूसरोंको पीड़ा देकर उसके मांससे कैसे पोषण कर सकता है? मांसकी प्रशंसा भी पापमय कर्मफलसे सम्बन्ध कर देती है ।। १७ ।।

जीवितं हि परित्यज्य बहवः साधवो जनाः।
स्वमांसैः परमांसानि परिपाल्य दिवं गताः ।। १८ ।।
उशीनर शिबि आदि बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण देकर, अपने मांससे दूसरोंके मांसकी रक्षा करके स्वर्गलोकमें गये हैं ।। १८ ।।

एवमेषा महाराज चतुर्भिः कारणैर्वृता।
अहिंसा तव निर्दिष्टा सर्वधर्मानुसंहिता ।। १९ ।।

महाराज! इस प्रकार चार उपायोंसे जिसका पालन होता है, उस अहिंसा-धर्मका तुम्हारे लिये प्रतिपादन किया गया। यह सम्पूर्ण धर्मोंमें ओतप्रोत है ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मांसवर्जनकथने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसके परित्यागका उपदेशविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)

अहिंसा परमो धर्म इत्युक्तं बहुशस्त्वया ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः

मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन

युधिष्ठिर उवाच

अहिंसा परमो धर्म इत्युक्तं बहुशस्त्वया ।
जातो नः संशयो धर्मे मांसस्य परिवर्जने ।
दोषो भक्षयतः कः स्यात् कश्चाभक्षयतो गुणः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने बहुत बार यह बात कही है कि अहिंसा परम धर्म है; अतः मांसके परित्यागरूप धर्मके विषयमें मुझे संदेह हो गया है। इसलिये मैं यह जानना चाहता हूँ कि मांस खानेवालेकी क्या हानि होती है और जो मांस नहीं खाता उसे कौन-सा लाभ मिलता है? ॥ १ ॥

हत्वा भक्षयतो वापि परेणोपहृतस्य वा ।
हन्याद् वा यः परस्यार्थे क्रीत्वा वा भक्षयेन्नरः ॥ २ ॥
जो स्वयं पशुका वध करके उसका मांस खाता है या दूसरेके दिये हुए मांसका भक्षण करता है या जो दूसरेके खानेके लिये पशुका वध करता है अथवा जो खरीदकर मांस खाता है, उसको क्या दण्ड मिलता है? ॥ २ ॥

एतदिच्छामि तत्त्वेन कथ्यमानं त्वयानघ ।
निश्चयेन चिकीर्षामि धर्ममेतं सनातनम् ॥ ३ ॥
निष्पाप पितामह! मैं चाहता हूँ कि आप इस विषयका यथार्थरूपसे विवेचन करें। मैं निश्चितरूपसे इस सनातन धर्मके पालनकी इच्छा रखता हूँ ॥ ३ ॥

कथमायुरवाप्नोति कथं भवति सत्त्ववान् ।
कथमव्यंगतामेति लक्षण्यो जायते कथम् ॥ ४ ॥
मनुष्य किस प्रकार आयु प्राप्त करता है, कैसे बलवान् होता है, किस तरह उसे पूर्णंगता प्राप्त होती है और कैसे वह शुभलक्षणोंसे संयुक्त होता है? ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

मांसस्याभक्षणाद् राजन् यो धर्मः कुरुनन्दन ।
तन्मे शृणु यथातत्त्वं यथास्य विधिरुत्तमः ॥ ५ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! कुरुनन्दन! मांस न खानेसे जो धर्म होता है, उसका मुझसे यथार्थ वर्णन सुनो तथा उस धर्मकी जो उत्तम विधि है, वह भी जान लो ।।

रूपमव्यंगतामायुर्बुद्धिं सत्त्वं बलं स्मृतिम् ।

प्राप्तुकामैर्नरैर्हिंसा वर्जिता वै महात्मभिः ॥ ६ ॥ जो सुन्दर रूप, पूर्णांगता, पूर्ण आयु, उत्तम बुद्धि, सत्त्व, बल और स्मरणशक्ति प्राप्त करना चाहते थे, उन महात्मा पुरुषोंने हिंसाका सर्वथा त्याग कर दिया था ॥

ऋषीणामत्र संवादा बहुशः कुरुनन्दन । बभूव तेषां तु मतं यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ॥ ७ ॥ कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस विषयको लेकर ऋषियोंमें अनेक बार प्रश्नोत्तर हो चुका है। अन्तमें उन सबकी रायसे जो सिद्धान्त निश्चित हुआ है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ७ ॥

यो यजेताश्वमेधेन मासि मासि यतव्रतः । वर्जयेन्मधु मांसं च सममेतद् युधिष्ठिर ॥ ८ ॥ युधिष्ठिर! जो पुरुष नियमपूर्वक व्रतका पालन करता हुआ प्रतिमास अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा जो केवल मद्य और मांसका परित्याग करता है, उन दोनोंको एक-सा ही फल मिलता है ॥ ८ ॥

सप्तर्षयो वालखिल्यास्तथैव च मरीचिपाः । अमांसभक्षणं राजन् प्रशंसन्ति मनीषिणः ॥ ९ ॥ राजन्! सप्तर्षि, वालखिल्य तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्यान्य मनीषी महर्षि मांस न खानेकी ही प्रशंसा करते हैं ॥ ९ ॥

न भक्षयति यो मांसं न च हन्यान्न घातयेत् । तन्मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ १० ॥ स्वायम्भुव मनुका कथन है कि जो मनुष्य न मांस खाता और न पशुकी हिंसा करता और न दूसरेसे ही हिंसा कराता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका मित्र है ॥ १० ॥

अधृष्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु । साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मासं विवर्जयन् ॥ ११ ॥ जो पुरुष मांसका परित्याग कर देता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करता है, वह सब प्राणियोंका विश्वासपात्र हो जाता है तथा श्रेष्ठ पुरुष उसका सदा सम्मान करते हैं ॥ ११ ॥

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । नारदः प्राह धर्मात्मा नियतं सोऽवसीदति ॥ १२ ॥ धर्मात्मा नारदजी कहते हैं—जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह निश्चय ही दुःख उठाता है ॥ १२ ॥

ददाति यजते चापि तपस्वी च भवत्यपि । मधुमांसनिवृत्त्येति प्राह चैवं बृहस्पतिः ॥ १३ ॥ बृहस्पतिजीका कथन है—जो मद्य और मांस त्याग देता है, वह दान देता, यज्ञ करता और तप करता है अर्थात् उसे दान, यज्ञ और तपस्याका फल प्राप्त होता है ॥ १३ ॥

मासि मास्यश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः । न खादति च यो मांसं सममेतन्मतं मम ॥ १४ ॥ जो सौ वर्षोंतक प्रतिमास अश्वमेध यज्ञ करता है और जो कभी मांस नहीं खाता है— इन दोनोंका समान फल माना गया है ॥ १४ ॥

सदा यजति सत्रेण सदा दानं प्रयच्छति । सदा तपस्वी भवति मधुमांसविवर्जनात् ॥ १५ ॥ मद्य और मांसका परित्याग करनेसे मनुष्य सदा यज्ञ करनेवाला, सदा दान देनेवाला और सदा तप करनेवाला होता है ॥ १५ ॥

सर्वे वेदा न तत् कुर्य्युः सर्वे यज्ञाश्च भारत । यो भक्षयित्वा मांसानि पश्चादपि निवर्तते ॥ १६ ॥ भारत! जो पहले मांस खाता रहा हो और पीछे उसका सर्वथा परित्याग कर दे, उसको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे सम्पूर्ण वेद और यज्ञ भी नहीं प्राप्त करा सकते ॥ १६ ॥

दुष्करं च रसज्ञाने मांसस्य परिवर्जनम् । चर्तुं व्रतमिदं श्रेष्ठं सर्वप्राण्यभयप्रदम् ॥ १७ ॥ मांसके रसका आस्वादन एवं अनुभव कर लेनेपर उसे त्यागना और समस्त प्राणियोंको अभय देनेवाले इस सर्वश्रेष्ठ अहिंसाव्रतका आचरण करना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥ १७ ॥

सर्वभूतेषु यो विद्वान् ददात्यभयदक्षिणाम् । दाता भवति लोके स प्राणानां नात्र संशयः ॥ १८ ॥ जो विद्वान् सब जीवोंको अभयदान कर देता है, वह इस संसारमें निःसंदेह प्राणदाता माना जाता है ॥ १८ ॥

एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः । प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा ॥ १९ ॥ इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्मकी प्रशंसा करते हैं। जैसे मनुष्यको अपने प्राण प्रिय होते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं ॥ १९ ॥

आत्मौपम्येन मन्तव्यं बुद्धिमद्भिः कृतात्मभिः । मृत्युतो भयमस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम् ॥ २० ॥ किं पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् । अरोगाणामपापानां पापैर्मांसोपजीविभिः ॥ २१ ॥ अतः जो बुद्धिमान् और पुण्यात्मा है, उन्हें चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझें। जब अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंको भी मृत्युका भय बना रहता है,

तब जीवित रहनेकी इच्छावाले नीरोग और निरपराध प्राणियोंको, जो मांसपर जीविका चलानेवाले पापी पुरुषोंद्वारा बलपूर्वक मारे जाते हैं, क्यों न भय प्राप्त होगा ॥ २०-२१ ॥

तस्माद् विद्धि महाराज मांसस्य परिवर्जनम्। धर्मस्यायतनं श्रेष्ठं स्वर्गस्य च सुखस्य च ॥ २२ ॥ इसलिये महाराज! तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि मांसका परित्याग ही धर्म, स्वर्ग और सुखका सर्वोत्तम आधार है ॥ २२ ॥

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥ २३ ॥ अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है; क्योंकि उसीसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है ॥ २३ ॥

न हि मांसं तृणात् काष्ठादुपलाद् वापि जायते। हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद् दोषस्तु भक्षणे ॥ २४ ॥ तृणसे, काठसे अथवा पत्थरसे मांस नहीं पैदा होता है, वह जीवकी हत्या करनेपर ही उपलब्ध होता है; अतः उसके खानेमें महान् दोष है ॥ २४ ॥

स्वाहास्वधामृतभुजो देवाः सत्यार्जवप्रियाः। क्रव्यादान् राक्षसान् विद्धि जिह्मानृतपरायणान् ॥ २५ ॥ जो लोग स्वाहा (देवयज्ञ) और स्वधा (पितृयज्ञ) का अनुष्ठान करके यज्ञशिष्ट अमृतका भोजन करनेवाले तथा सत्य और सरलताके प्रेमी हैं, वे देवता हैं, किंतु जो कुटिलता और असत्य भाषणमें प्रवृत्त होकर सदा मांसभक्षण किया करते हैं, उन्हें राक्षस समझो ॥ २५ ॥

कान्तारेष्वथ घोरेषु दुर्गेषु गहनेषु च। रात्रावहनि संध्यासु चत्वरेषु सभासु च ॥ २६ ॥ उद्यतेषु च शस्त्रेषु मृगव्यालभयेषु च। अमांसभक्षणे राजन् भयमन्चैर्न गच्छति ॥ २७ ॥ राजन्! जो मनुष्य मांस नहीं खाता, उसे संकटपूर्ण स्थानों, भयंकर दुर्गों एवं गहन वनोंमें, रात-दिन और दोनों संध्याओंमें, चौराहोंपर तथा सभाओंमें भी दूसरोंसे भय नहीं प्राप्त होता तथा यदि अपने विरुद्ध हथियार उठाये गये हों अथवा हिंसक पशु एवं सर्पोंके भय सामने हों तो भी वह दूसरोंसे नहीं डरता है ॥ २६-२७ ॥

शरण्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु। अनुद्वेगकरो लोके न चाप्युद्विजते सदा ॥ २८ ॥ इतना ही नहीं, वह समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाला और उन सबका विश्वासपात्र होता है। संसारमें न तो वह दूसरेको उद्वेगमें डालता है और न स्वयं ही कभी किसीसे उद्विग्न होता है ॥ २८ ॥

यदि चेत् खादको न स्यान्न तदा घातको भवेत्।

घातकः खादकार्थाय तद् घातयति वै नरः ॥ २९ ॥ यदि कोई भी मांस खानेवाला न रह जाय तो पशुओंकी हिंसा करनेवाला भी कोई न रहे; क्योंकि हत्यारा मनुष्य मांस खानेवालोंके लिये ही पशुओंकी हिंसा करता है ॥ २९ ॥

अभक्ष्यमेतदिति वै इति हिंसा निवर्तते । खादकार्थमतो हिंसा मृगादीनां प्रवर्तते ॥ ३० ॥ यदि मांसको अभक्ष्य समझकर सब लोग उसे खाना छोड़ दें तो पशुओंकी हत्या स्वतः ही बंद हो जाय; क्योंकि मांस खानेवालोंके लिये ही मृग आदि पशुओंकी हत्या होती है ॥ ३० ॥

यस्माद् ग्रसति चैवायुर्हिंसकानां महाद्युते । तस्माद् विवर्जयेन्मांसं य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ३१ ॥ महातेजस्वी नरेश! हिंसकोंकी आयुको उनका पाप ग्रस लेता है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, वह मनुष्य मांसका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१ ॥

त्रातारं नाधिगच्छन्ति रौद्राः प्राणिविहिंसकाः । उद्वेजनीया भूतानां यथा व्यालमृगास्तथा ॥ ३२ ॥ जैसे यहाँ हिंसक पशुओंका लोग शिकार खेलते हैं और वे पशु अपने लिये कहीं कोई रक्षक नहीं पाते, उसी प्रकार प्राणियोंकी हिंसा करनेवाले भयंकर मनुष्य दूसरे जन्ममें सभी प्राणियोंके उद्वेगपात्र होते हैं और अपने लिये कोई संरक्षक नहीं पाते हैं ॥ ३२ ॥

लोभाद् वा बुद्धिमोहाद् वा बलवीर्यार्थमेव च । संसर्गादथ पापानामधर्मरुचिता नृणाम् ॥ ३३ ॥ लोभसे, बुद्धिके मोहसे, बल-वीर्यकी प्राप्तिके लिये अथवा पापियोंके संसर्गमें आनेसे मनुष्योंकी अधर्ममें रुचि हो जाती है ॥ ३३ ॥

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । उद्विग्नवासो वसति यत्र यत्राभिजायते ॥ ३४ ॥ जो दूसरोंके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ कहीं भी जन्म लेता है, चैनसे नहीं रहने पाता है ॥ ३४ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । मांसस्याभक्षणं प्राहुर्नियताः परमर्षयः ॥ ३५ ॥ नियमपरायण महर्षियोंने मांस-भक्षणके त्यागको ही धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्तिका प्रधान उपाय और परमकल्याणका साधन बतलाया है ॥ ३५ ॥

इदं तु खलु कौन्तेय श्रुतमासीत् पुरा मया । मार्कण्डेयस्य वदतो ये दोषा मांसभक्षणे ॥ ३६ ॥ कुन्तीनन्दन! मांसभक्षणमें जो दोष हैं, उन्हें बतलाते हुए मार्कण्डेयजीके मुखसे मैंने पूर्वकालमें ऐसा सुन रखा है— ॥ ३६ ॥

यो हि खादति मांसानि प्राणिनां जीवतैषिणाम्। हतानां वा मृतानां वा यथा हन्ता तथैव सः॥ ३७॥ ‘जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंको मारकर अथवा उनके स्वयं मर जानेपर उनका मांस खाता है, वह न मारनेपर भी उन प्राणियोंका हत्यारा ही समझा जाता है॥ ३७॥

धनेन क्रयिको हन्ति खादकश्चोपभोगतः। घातको वधबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वधः॥ ३८॥ खरीदनेवाला धनके द्वारा, खानेवाला उपभोगके द्वारा और घातक वध एवं बन्धनके द्वारा पशुओंकी हिंसा करता है। इस प्रकार यह तीन तरहसे प्राणियोंका वध होता है॥

अखादन्ननुमोदंश्च भावदोषेण मानवः। योऽनुमोदति हन्यन्तं सोऽपि दोषेण लिप्यते॥ ३९॥ ‘जो मांसको स्वयं नहीं खाता पर खानेवालेका अनुमोदन करता है, वह मनुष्य भी भावदोषके कारण मांसभक्षणके पापका भागी होता है। इसी प्रकार जो मारनेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी हिंसाके दोषसे लिप्त होता है॥ ३९॥

अधृष्यः सर्वभूतानामायुष्मान् नीरुजः सदा। भवत्यभक्षयन् मांसं दयावान् प्राणिनामिह॥ ४०॥ ‘जो मनुष्य मांस नहीं खाता और इस जगत्में सब जीवोंपर दया करता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करते और वह सदा दीर्घायु एवं नीरोग होता है॥ ४०॥

हिरण्यदानैर्गोदानैर्भूमिदानैश्च सर्वशः। मांसस्याभक्षणे धर्मो विशिष्ट इति नः श्रुतिः॥ ४१॥ ‘सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करनेसे जो धर्म प्राप्त होता है, मांसका भक्षण न करनेसे उसकी अपेक्षा भी विशिष्ट धर्मकी प्राप्ति होती है। यह हमारे सुननेमें आया है॥ ४१॥

खादकस्य कृते जन्तून् यो हन्यात् पुरुषाधमः। महादोषतरस्तत्र घातको न तु खादकः॥ ४२॥ ‘जो मांस खानेवालोंके लिये पशुओंकी हत्या करता है, वह मनुष्योंमें अधम है। घातकको बहुत भारी दोष लगता है। मांस खानेवालेको उतना दोष नहीं लगता॥ ४२॥

इज्यायज्ञश्रुतिकृतैर्यो मार्गैरबुधोऽधमः। हन्याज्जन्तून् मांसगृध्नुः स वै नरकभाङ्नरः॥ ४३॥ ‘जो मांसलोभी मूर्ख एवं अधम मनुष्य यज्ञ-याग आदि वैदिक मार्गोंके नामपर प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह नरकगामी होता है॥ ४३॥

भक्षयित्वापि यो मांसं पश्चादपि निवर्तते। तस्यापि सुमहान् धर्मो यः पापाद् विनिवर्तते॥ ४४॥

‘जो पहले मांस खानेके बाद फिर उससे निवृत्त हो जाता है, उसको भी अत्यन्त महान् धर्मकी प्राप्ति होती है, क्योंकि वह पापसे निवृत्त हो गया है ।। ४४ ।। आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपभोक्ता च खादकाः सर्व एव ते ।। ४५ ।। ‘जो मनुष्य हत्याके लिये पशु लाता है, जो उसे मारनेकी अनुमति देता है, जो उसका वध करता है तथा जो खरीदता, बेचता, पकाता और खाता है, वे सब-के-सब खानेवाले ही माने जाते हैं। अर्थात् वे सब खानेवालेके समान ही पापके भागी होते हैं’ ।। ४५ ।। इदमन्यत्तु वक्ष्यामि प्रमाणं विधिनिर्मितम् । पुराणमृषिभिर्जुष्टं वेदेषु परिनिष्ठितम् ।। ४६ ।। अब मैं इस विषयमें एक दूसरा प्रमाण बता रहा हूँ, जो साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादित, पुरातन, ऋषियोंद्वारा सेवित तथा वेदोंमें प्रतिष्ठित है ।। ४६ ।। प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः प्रजार्थिभिरुदाहृतः । यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाङ्क्षिणाम् ।। ४७ ।। नृपश्रेष्ठ! प्रजार्थी पुरुषोंने प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, परन्तु वह मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले विरक्त पुरुषोंके लिये अभीष्ट नहीं है ।। ४७ ।। य इच्छेत् पुरुषोऽत्यन्तमात्मानं निरुपद्रवम् । स वर्जयेत मांसानि प्राणिनामिह सर्वशः ।। ४८ ।। जो मनुष्य अपने आपको अत्यन्त उपद्रवरहित बनाये रखना चाहता हो, वह इस जगत्में प्राणियोंके मांसका सर्वथा परित्याग कर दे ।। ४८ ।। श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां व्रीहिमयः पशुः । येनायजन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः ।। ४९ ।। सुना है, पूर्वकल्पमें मनुष्योंके यज्ञमें पुरोडाश आदिके रूपमें अन्नमय पशुका ही उपयोग होता था। पुण्यलोककी प्राप्तिके साधनोंमें लगे रहनेवाले याज्ञिक पुरुष उस अन्नके द्वारा ही यज्ञ करते थे ।। ४९ ।। ऋषिभिः संशयं पृष्टो वसुश्चेदिपतिः पुरा । अभक्ष्यमपि मांसं यः प्राह भक्ष्यमिति प्रभो ।। ५० ।। प्रभो! प्राचीन कालमें ऋषियोंने चेदिराज वसुसे अपना संदेह पूछा था। उस समय वसुने मांसको भी जो सर्वथा अभक्ष्य है, भक्ष्य बता दिया ।। ५० ।। आकाशादवनिं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपतिः । एतदेव पुनश्चोक्त्वा विवेश धरणीतलम् ।। ५१ ।। उस समय आकाशचारी राजा वसु अनुचित निर्णय देनेके कारण आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े। तदनन्तर पृथ्वीपर भी फिर यही निर्णय देनेके कारण वे पातालमें समा गये ।। ५१ ।।

इदं तु शृणु राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयानघ । अभक्षणे सर्वसुखं मांसस्य मनुजाधिप ॥ ५२ ॥ निष्पाप राजेन्द्र! मनुजेश्वर! मेरी कही हुई यह बात भी सुनो—मांस-भक्षण न करनेसे सब प्रकारका सुख मिलता है ॥ ५२ ॥

यस्तु वर्षशतं पूर्णं तपस्तप्येत् सुदारुणम् । यश्चैव वर्जयेन्मांसं सममेतन्मतं मम ॥ ५३ ॥ जो मनुष्य सौ वर्षोंतक कठोर तपस्या करता है तथा जो केवल मांसका परित्याग कर देता है—ये दोनों मेरी दृष्टिमें एक समान हैं ॥ ५३ ॥

कौमुदे तु विशेषेण शुक्लपक्षे नराधिप । वर्जयेन्मधुमांसानि धर्मो ह्यत्र विधीयते ॥ ५४ ॥ नरेश्वर! विशेषतः शरदृतु, शुक्लपक्षमें मद्य और मांसका सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि ऐसा करनेमें धर्म होता है ॥ ५४ ॥

चतुरो वार्षिकान् मासान् यो मांसं परिवर्जयेत् । चत्वारि भद्राण्यवाप्नोति कीर्तिमायुर्यशोबलम् ॥ ५५ ॥ जो मनुष्य वर्षाके चार महीनोंमें मांसका परित्याग कर देता है, वह चार कल्याणमयी वस्तुओं—कीर्ति, आयु, यश और बलको प्राप्त कर लेता है ॥ ५५ ॥

अथवा मासमेकं वै सर्वमांसान्यभक्षयन् । अतीत्य सर्वदुःखानि सुखं जीवेन्निरामयः ॥ ५६ ॥ अथवा एक महीनेतक सब प्रकारके मांसोंका त्याग करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो सुखी एवं नीरोग जीवन व्यतीत करता है ॥ ५६ ॥

वर्जयन्ति हि मांसानि मासशः पक्षशोऽपि वा । तेषां हिंसानिवृत्तानां ब्रह्मलोको विधीयते ॥ ५७ ॥ जो एक-एक मास अथवा एक-एक पक्षतक मांस खाना छोड़ देते हैं, हिंसासे दूर हटे हुए उन मनुष्योंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है (फिर जो कभी भी मांस नहीं खाते, उनके लाभकी तो कोई सीमा ही नहीं है) ॥ ५७ ॥

मांसं तु कौमुदं पक्षं वर्जितं पार्थ राजभिः । सर्वभूतात्मभूतस्थैर्विदितार्थपरावरैः ॥ ५८ ॥ नाभागेनाम्बरीषेण गयेन च महात्मना । आयुनाथानरण्येन दिलीपरघुपूरुभिः ॥ ५९ ॥ कार्तवीर्यानिरुद्धाभ्यां नहुषेण यतातिना । नृगेण विष्वगश्वेन तथैव शशबिन्दुना ॥ ६० ॥ युवनाश्वेन च तथा शिबिनौशीनरेण च । मुचुकुन्देन मान्धात्रा हरिश्चन्द्रेण वा विभो ॥ ६१ ॥

कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंने आश्विन मासके दोनों पक्ष अथवा एक पक्षमें मांस भक्षणका निषेध किया था, वे सम्पूर्ण भूतोंके आत्मरूप हो गये थे और उन्हें परावर तत्त्वका ज्ञान हो गया था। उनके नाम इस प्रकार हैं—नाभाग, अम्बरीष, महात्मा गय, आयु, अनरण्य, दिलीप, रघु, पूरु, कार्तवीर्य, अनिरुद्ध, नहुष, ययाति, नृग, विश्वगश्व, शशविन्दु, युवनाश्व, उशीनरपुत्र शिबि, मुचुकुन्द, मान्धाता अथवा हरिश्चन्द्र ॥ ५८—६१ ॥

सत्यं वदत मासत्यं सत्यं धर्मः सनातनः ।
हरिश्चन्द्रश्चरति वै दिवि सत्येन चन्द्रवत् ॥ ६२ ॥
सत्य बोलो, असत्य न बोलो, सत्य ही सनातन धर्म है। राजा हरिश्चन्द्र सत्यके प्रभावसे आकाशमें चन्द्रमाके समान विचरते हैं ॥ ६२ ॥

श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च ।
रैवते रन्तिदेवेन वसुना सृञ्जयेन च ॥ ६३ ॥
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च ।
दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा ॥ ६४ ॥
विरूपाक्षेण निमिना जनकेन च धीमता ।
ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह ॥ ६५ ॥
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च ।
अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना ॥ ६६ ॥
हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च ।
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम् ॥ ६७ ॥
राजेन्द्र! श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव, वसु, सृंजय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाक्ष, निमि, बुद्धिमान् जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत—इन सबने तथा अन्यान्य राजाओंने भी कभी मांस नहीं खाया था ॥

ब्रह्मलोके च तिष्ठन्ति ज्वलमानाः श्रियान्विताः ।
उपास्यमाना गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसमन्विताः ॥ ६८ ॥
वे सब नरेश अपनी कान्तिसे प्रज्वलित होते हुए वहाँ ब्रह्मलोकमें विराज रहे हैं, गन्धर्व उनकी उपासना करते हैं और सहस्रों दिव्यांगनाएँ उन्हें घेरे रहती हैं ॥

तदेतदुत्तमं धर्ममहिंसाधर्मलक्षणम् ।
ये चरन्ति महात्मानो नाकपृष्ठे वसन्ति ते ॥ ६९ ॥
अतः यह अहिंसारूप धर्म सब धर्मोंसे उत्तम है। जो महात्मा इसका आचरण करते हैं, वे स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ ६९ ॥

मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह धार्मिकाः ।
जन्मप्रभृति मद्यं च सर्वे ते मुनयः स्मृताः ॥ ७० ॥

जो धर्मात्मा पुरुष जन्मसे ही इस जगत्में शहद, मद्य और मांसका सदाके लिये परित्याग कर देते हैं, वे सब-के-सब मुनि माने गये हैं ।। ७० ।। इमं धर्मममांसादं यश्चरेच्छ्रावयीत वा । अपि चेत् सुदुराचारो न जातु निरयं व्रजेत् ।। ७१ ।। जो मांस-भक्षणके परित्यागरूप इस धर्मका आचरण करता अथवा इसे दूसरोंको सुनाता है, वह कितना ही दुराचारी क्यों न रहा हो, नरकमें नहीं पड़ता ।। ७१ ।। पठेद् वा य इदं राजन् शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः । अमांसभक्षणविधिं पवित्रमृषिपूजितम् ।। ७२ ।। विमुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वकामैर्महीयते । विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभते नात्र संशयः ।। ७३ ।। राजन्! जो ऋषियोंद्वारा सम्मानित एवं पवित्र इस मांस-भक्षणके त्यागके प्रकरणको पढ़ता अथवा बारंबार सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंद्वारा सम्मानित होता है और अपने सजातीय बन्धुओंमें विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ।। ७२-७३ ।। आपन्नश्चापदो मुच्येद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् । मुच्येत्तथाऽऽतुरो रोगाद् दुःखान्मुच्येत दुःखितः ।। ७४ ।। इतना ही नहीं, इसके श्रवण अथवा पठनसे आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे, बन्धनमें बँधा हुआ बन्धनसे, रोगी रोगसे और दुःखी दुःखसे छुटकारा पा जाता है ।। ७४ ।। तिर्यग्योनिं न गच्छेत रूपवांश्च भवेन्नरः । ऋद्धिमान् वै कुरुश्रेष्ठ प्राप्नुयाच्च महद् यशः ।। ७५ ।। कुरुश्रेष्ठ! इसके प्रभावसे मनुष्य तिर्यग्योनिमें नहीं पड़ता तथा उसे सुन्दर रूप, सम्पत्ति और महान् यशकी प्राप्ति होती है ।। ७५ ।। एतत्ते कथितं राजन् मांसस्य परिवर्जने । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च विधानमृषिनिर्मितम् ।। ७६ ।। राजन्! यह मैंने तुम्हें ऋषियोंद्वारा निर्मित मांस-त्यागका विधान तथा प्रवृत्तिविषयक धर्म भी बताया है ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मांसभक्षणनिषेधे पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसभक्षणका निषेधविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।।

मांस न खानेसे लाभ और अहिंसाधर्मकी प्रशंसा

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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः

मांस न खानेसे लाभ और अहिंसाधर्मकी प्रशंसा

युधिष्ठिर उवाच

इमे वै मानवा लोके नृशंसा मांसगृद्धिनः ।
विसृज्य विविधान् भक्ष्यान् महारक्षोगणा इव ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर कहते हैं—**पितामह! बड़े खेदकी बात है कि संसारके ये निर्दयी मनुष्य अच्छे-अच्छे खाद्य पदार्थोंका परित्याग करके महान् राक्षसोंके समान मांसका स्वाद लेना चाहते हैं ॥ १ ॥

अपूपान् विविधाकाराञ्शाकानि विविधानि च ।
खाण्डवान् रसयोगान्न तथेच्छन्ति यथाऽऽमिषम् ॥ २ ॥
भाँति-भाँतिके मालपूओं, नाना प्रकारके शाकों तथा रसीली मिठाइयोंकी भी वैसी इच्छा नहीं रखते, जैसी रुचि मांसके लिये रखते हैं ॥ २ ॥

तदिच्छामि गुणान् श्रोतुं मांसस्याभक्षणे प्रभो ।
भक्षणे चैव ये दोषास्तांश्चैव पुरुषर्षभ ॥ ३ ॥
प्रभो! पुरुषप्रवर! अतः मैं मांस न खानेसे होनेवाले लाभ और उसे खानेसे होनेवाली हानियोंको पुनः सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

सर्वं तत्त्वेन धर्मज्ञ यथावदिह धर्मतः ।
किं च भक्ष्यमभक्ष्यं वा सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ४ ॥
धर्मज्ञ पितामह! इस समय धर्मके अनुसार यथावत्रूपसे यहाँ सब बातें ठीक-ठीक बताइये। इसके सिवा यह भी कहिये कि भोजन करने योग्य क्या वस्तु है और भोजन न करने योग्य क्या वस्तु है ॥ ४ ॥

यथैतद् यादृशं चैव गुणा ये चास्य वर्जने ।
दोषा भक्षयतो येऽपि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ५ ॥
पितामह! मांसका जो स्वरूप है, यह जैसा है, इसका त्याग कर देनेमें जो लाभ है और इसे खानेवाले पुरुषको जो दोष प्राप्त होते हैं—ये सब बातें मुझे बताइये ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
विवर्जिते तु बहवो गुणाः कौरवनन्दन ।
ये भवन्ति मनुष्याणां तान् मे निगदतः शृणु ॥ ६ ॥

**भीष्मजीने कहा—**महाबाहो! भरतनन्दन! तुम जैसा कहते हो ठीक वैसी ही बात है। कौरवनन्दन! मांस न खानेमें बहुत-से लाभ हैं, जो वैसे मनुष्योंको सुलभ होते हैं; मैं बता रहा हूँ; सुनो ।। ६ ।।

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
नास्ति क्षुद्रतरस्तस्मात् स नृशंसतरो नरः ।। ७ ।।
जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर नीच और निर्दयी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है ।। ७ ।।

न हि प्राणात् प्रियतरं लोके किंचन विद्यते ।
तस्माद् दयां नरः कुर्याद् यथाऽऽत्मनि तथा परे ।। ८ ।।
जगत्में अपने प्राणोंसे अधिक प्रिय दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इसलिये मनुष्य जैसे अपने ऊपर दया चाहता है, उसी तरह दूसरोंपर भी दया करे ।। ८ ।।

शुक्राच्च तात सम्भूतिर्मांसस्येह न संशयः ।
भक्षणे तु महान् दोषो निवृत्त्या पुण्यमुच्यते ।। ९ ।।
तात! मांस-भक्षण करनेमें महान् दोष है; क्योंकि मांसकी उत्पत्ति वीर्यसे होती है, इसमें संशय नहीं है। अतः उससे निवृत्त होनेमें ही पुण्य बताया गया है ।। ९ ।।

न ह्यतः सदृशं किंचिदिह लोके परत्र च ।
यत् सर्वेष्विह भूतेषु दया कौरवनन्दन ।। १० ।।
कौरवनन्दन! इस लोक और परलोकमें इसके समान दूसरा कोई पुण्यकार्य नहीं है कि इस जगत्में समस्त प्राणियोंपर दया की जाय ।। १० ।।

न भयं विद्यते जातु नरस्येह दयावतः ।
दयावतामिमे लोकाः परे चापि तपस्विनाम् ।। ११ ।।
इस जगत्में दयालु मनुष्यको कभी भयका सामना नहीं करना पड़ता। दयालु और तपस्वी पुरुषोंके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद होते हैं ।। ११ ।।

अहिंसालक्षणो धर्म इति धर्मविदो विदुः ।
यदहिंसात्मकं कर्म तत् कुर्यादात्मवान् नरः ।। १२ ।।
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि अहिंसा ही धर्मका लक्षण है। मनस्वी पुरुष वही कर्म करे, जो अहिंसात्मक हो ।। १२ ।।

अभयं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति दयापरः ।
अभयं तस्य भूतानि ददतीत्यनुशुश्रुम ।। १३ ।।
जो दयापरायण पुरुष सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देता है, उसे भी सब प्राणी अभयदान देते हैं। ऐसा हमने सुन रखा है ।। १३ ।।

क्षतं च स्खलितं चैव पतितं कृष्टमाहतम् ।
सर्वभूतानि रक्षन्ति समेषु विषमेषु च ।। १४ ।।