महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११७-
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
शुभ कर्मसे एक कीड़ेको पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना
युधिष्ठिर उवाच
अकामाश्च सकामाश्च ये हताः स्म महामृधे ।
कां गतिं प्रतिपन्नास्ते तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! जो योद्धा महासमरमें इच्छा या अनिच्छासे मारे गये हैं, वे किस गतिको प्राप्त हुए हैं? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
दुःखं प्राणपरित्यागः पुरुषाणां महामृधे ।
जानासि त्वं महाप्राज्ञ प्राणत्यागं सुदुष्करम् ॥ २ ॥
महाप्राज्ञ! आप तो जानते ही हैं कि महा-संग्राममें मनुष्योंके लिये प्राणोंका परित्याग करना कितना दुःखदायक होता है। प्राणोंका त्याग करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है ॥ २ ॥
समृद्धौ वासमृद्धौ वा शुभे वा यदि वाशुभे ।
कारणं तत्र मे ब्रूहि सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ ३ ॥
प्राणी उन्नति या अवनति, शुभ या अशुभ किसी भी अवस्थामें मरना नहीं चाहते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये; क्योंकि मेरी दृष्टिमें आप सर्वज्ञ हैं ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
समृद्धौ वासमृद्धौ वा शुभे वा यदि वाशुभे ।
संसारेऽस्मिन् समायाताः प्राणिनः पृथिवीपते ॥ ४ ॥
निरता येन भावेन तत्र मे शृणु कारणम् ।
सम्यक् चायमनुप्रश्नस्त्वयोक्तस्तु युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा—पृथ्वीनाथ! इस संसारमें आये हुए प्राणी उन्नतिमें या अवनतिमें तथा शुभ या अशुभ अवस्थामें ही सुख मानते हैं। मरना नहीं चाहते। इसका क्या कारण है, यह बताता हूँ, सुनो। युधिष्ठिर! यह तुमने बहुत अच्छा प्रश्न उपस्थित किया है ॥ ४-५ ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तमिदं नृप ।
द्वैपायनस्य संवादं कीटस्य च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
नरेश्वर! युधिष्ठिर! इस विषयमें द्वैपायन व्यास और एक कीड़ेका संवादरूप जो यह प्राचीन वृत्तान्त प्रसिद्ध है, वही तुम्हें बता रहा हूँ ॥ ६ ॥
ब्रह्मभूतश्चरन् विप्रः कृष्णद्वैपायनः पुरा ।
ददर्श कीटं धावन्तं शीघ्रं शकटवर्त्मनि ॥ ७ ॥
पहलेकी बात है, ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन विप्रवर व्यासजी कहीं जा रहे थे। उन्होंने एक कीड़ेको गाड़ीकी लीकसे बड़ी तेजीके साथ भागते देखा ॥ ७ ॥
गतिज्ञः सर्वभूतानां भाषाज्ञश्च शरीरिणाम् ।
सर्वज्ञः स तदा दृष्ट्वा कीटं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
सर्वज्ञ व्यासजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी गतिके ज्ञाता तथा सभी देहधारियोंकी भाषाको समझनेवाले हैं। उन्होंने उस कीड़ेको देखकर उससे इस प्रकारकी बातचीत की ॥ ८ ॥
व्यास उवाच
कीट संत्रस्तरूपोऽसि त्वरितश्चैव लक्ष्यसे ।
क्व धावसि तदाचक्ष्व कुतस्ते भयमागतम् ॥ ९ ॥
व्यासजीने पूछा— कीट! आज तुम बहुत डरे हुए और उतावले दिखायी दे रहे हो, बताओ तो सही—कहाँ भागे जा रहे हो? कहाँसे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है? ॥ ९ ॥
कीट उवाच
शकटस्यास्य महतो घोषं श्रुत्वा भयं मम ।
आगतं वै महाबुद्धे स्वन एष हि दारुणः ॥ १० ॥
कीड़ेने कहा— महामते! यह जो बहुत बड़ी बैलगाड़ी आ रही है, इसीकी घर्घराहट सुनकर मुझे भय हो गया है; क्योंकि उसकी यह आवाज बड़ी भयंकर है ॥
श्रूयते न च मां हन्यादिति ह्यस्मादपक्रमे ।
श्वसतां च शृणोम्येनं गोपुत्राणां प्रतोद्यताम् ॥ ११ ॥
वहतां सुमहाभारं संनिकर्षे स्वनं प्रभो ।
नृणां च संवाहयतां श्रूयते विविधः स्वनः ॥ १२ ॥
यह आवाज जब कानोंमें पड़ती है, तब यह संदेह होता है कि कहीं गाड़ी आकर मुझे कुचल न डाले। इसीलिये यहाँसे जल्दी-जल्दी भाग रहा हूँ। यह देखिये बैलोंपर चाबुककी मार पड़ रही है और वे बहुत भारी बोझ लिये हाँफते हुए इधर आ रहे हैं। प्रभो! मुझे उनकी आवाज बहुत निकट सुनायी पड़ती है। गाड़ीपर बैठे हुए मनुष्योंके भी नाना प्रकारके शब्द कानोंमें पड़ रहे हैं ॥ ११-१२ ॥
श्रोतुमस्मद्विधेनैष न शक्यः कीटयोनिना ।
तस्मादतिक्रामाम्येष भयादस्मात् सुदारुणात् ॥ १३ ॥
मेरे-जैसे कीड़ेके लिये इस भयंकर शब्दको धैर्यपूर्वक सुन सकना असम्भव है। अतः इस अत्यन्त दारुण भयसे अपनी रक्षा करनेके लिये मैं यहाँसे भाग रहा हूँ ॥ १३ ॥
दुःखं हि मृत्युर्भूतानां जीवितं च सुदुर्लभम् ।
अतो भीतः पलायामि गच्छेयं न सुखं सुखात् ॥ १४ ॥
प्राणियोंके लिये मृत्यु बड़ी दुःखदायिनी होती है। अपना जीवन सबको अत्यन्त दुर्लभ जान पड़ता है। अतः डरकर भागा जा रहा हूँ। कहीं ऐसा न हो कि मैं सुखसे दुःखमें पड़ जाऊँ ॥ १४ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स तु तं प्राह कुतः कीट सुखं तव ।
मरणं ते सुखं मन्ये तिर्यग्योनौ तु वर्तसे ॥ १५ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! कीड़ेके ऐसा कहनेपर व्यासजीने उससे पूछा—'कीट! तुम्हे सुख कहाँ है?' मेरी समझमें तो तुम्हारा मर जाना ही तुम्हारे लिये सुखकी बात है; क्योंकि तुम तिर्यक् योनि—अधम कीट-योनिमें पड़े हो ॥
शब्दं स्पर्शं रसं गन्धं भोगांश्चोच्चावचान् बहून् ।
नाभिजानासि कीट त्वं श्रेयो मरणमेव ते ॥ १६ ॥
'कीट! तुम्हें शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा बहुत-से छोटे-बड़े भोगोंका अनुभव नहीं होता है। अतः तुम्हारा तो मर जाना ही अच्छा है' ॥ १६ ॥
कीट उवाच
सर्वत्र निरतो जीव इतश्चापि सुखं मम ।
चिन्तयामि महाप्राज्ञ तस्मादिच्छामि जीवितुम् ॥ १७ ॥
**कीड़ेने कहा—**महाप्राज्ञ! जीव सभी योनियोंमें सुखका अनुभव करते हैं। मुझे भी इस योनिमें सुख मिलता है और यही सोचकर जीवित रहना चाहता हूँ ॥
इहापि विषयः सर्वो यथादेहं प्रवर्तितः ।
मानुषाः स्थैर्यजाश्चैव पृथग्भोगा विशेषतः ॥ १८ ॥
यहाँ भी इस शरीरके अनुसार सारे विषय उपलब्ध होते हैं। मनुष्यों और स्थावर प्राणियोंके भोग अलग-अलग हैं ॥ १८ ॥
अहमासं मनुष्यो वै शूद्रो बहुधनः प्रभो ।
अब्रह्मण्यो नृशंसश्च कदर्यो वृद्धिजीवनः ॥ १९ ॥
प्रभो! पहले जन्ममें मैं एक मनुष्य, उसमें भी बहुत धनी शूद्र हुआ था। ब्राह्मणोंके प्रति मेरे मनमें आदरका भाव न था। मैं कंजूस, क्रूर और व्याजखोर था ॥ १९ ॥
वाक्तीक्ष्णो निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा विश्वस्य सर्वशः ।
मिथ्याकृतोऽपि विधिना परस्वहरणे रतः ॥ २० ॥
सबसे तीखे वचन बोलना, बुद्धिमानीके साथ लोगोंको ठगना और संसारके सभी लोगोंसे द्वेष रखना, यह मेरा स्वभाव हो गया था। झूठ बोलकर लोगोंको धोखा देना और दूसरोंके मालको हड़प लेनेमें संलग्न रहना—यही मेरा काम था ॥ २० ॥
भृत्यातिथिजनश्चापि गृहे पर्यशितो मया ।
मात्सर्यात् स्वादुकामेन नृशंसेन बुभुक्षता ॥ २१ ॥ मैं इतना निर्दयी था कि केवल स्वाद लेनेकी कामनासे अकेला ही भोजनकी इच्छा रखता और ईर्ष्यावश घरपर आये हुए अतिथियों और आश्रितजनोंको भोजन कराये बिना ही भोजन कर लेता था ॥ २१ ॥
देवार्थं पितृयज्ञार्थमन्नं श्रद्धाऽऽहृतं मया । न दत्तमर्थकामेन देयमन्नं पुरा किल ॥ २२ ॥ पूर्वजन्ममें मैं देवताओं और पितरोंके यजनके लिये श्रद्धापूर्वक अन्न एकत्र करता; परंतु धन-संग्रहकी कामनासे उस देनेयोग्य अन्नका भी दान नहीं करता था ॥ २२ ॥
गुप्तं शरणमाश्रित्य भयेषु शरणागताः । अकस्मात् ते मया त्यक्ता न त्राता अभयैषिणः ॥ २३ ॥ भयके समय अभय पानेकी इच्छासे कितने ही शरणार्थी मेरे पास आते, किन्तु मैं उन्हें शरण लेनेयोग्य सुरक्षित स्थानमें पहुँचाकर भी अकस्मात् वहाँसे निकाल देता। उनकी रक्षा नहीं करता था ॥ २३ ॥
धनं धान्यं प्रियान् दारान् यानं वासस्तथाद्भुतम् । श्रियं दृष्ट्वा मनुष्याणामसूयामि निरर्थकम् ॥ २४ ॥ दूसरे मनुष्योंके पास धन-धान्य, सुन्दरी स्त्री, अच्छी-अच्छी सवारियाँ, अद्भुत वस्त्र और उत्तम लक्ष्मी देखकर मैं अकारण ही उनसे कुढ़ता रहता था ॥ २४ ॥
ईर्ष्युः परसुखं दृष्ट्वा अन्यस्य न बुभूषकः । त्रिवर्गहन्ता चान्येषामातमकामानुवर्तकः ॥ २५ ॥ दूसरोंका सुख देखकर मुझे ईर्ष्या होती थी, दूसरे किसीकी उन्नति हो यह मैं नहीं चाहता था, औरोंके धर्म, अर्थ और काममें बाधा डालता और अपनी ही इच्छाका अनुसरण करता था ॥ २५ ॥
नृशंसगुणभूयिष्ठं पुरा कर्म कृतं मया । स्मृत्वा तदनुतप्येऽहं हित्वा प्रियमिवात्मजम् ॥ २६ ॥ पूर्वजन्ममें प्रायः मैंने वे ही कर्म किये हैं, जिनमें निर्दयता अधिक थी। उनकी याद आनेसे मुझे उसी तरह पश्चात्ताप होता है, जैसे कोई अपने प्यारे पुत्रको त्यागकर पछताता है ॥ २६ ॥
शुभानां नाभिजानामि कृतानां कर्मणां फलम् । माता च पूजिता वृद्धा ब्राह्मणश्चार्चितो मया ॥ २७ ॥ सकृज्जातिगुणोपेतः संगत्या गृहमागतः । अतिथिः पूजितो ब्रह्मंस्तेन मां नाजहात् स्मृतिः ॥ २८ ॥ मुझे पहलेके अपने किये हुए शुभकर्मोंके फलका अबतक अनुभव नहीं हुआ है। पूर्वजन्ममें मैंने केवल अपनी बूढ़ी माताकी सेवा की थी तथा एक दिन किसीके साथ हो
जानेसे अपने घरपर आये हुए ब्राह्मण अतिथिका जो अपने जातीय गुणोंसे सम्पन्न थे, स्वागत-सत्कार किया था। ब्रह्मन्! उसी पुण्यके प्रभावसे मुझे आजतक पूर्वजन्मकी स्मृति छोड़ न सकी है ॥ २७-२८ ॥ कर्मणा पुनरेवाहं सुखमागामि लक्षये । तच्छ्रोतुमहमिच्छामि त्वत्तः श्रेयस्तपोधन ॥ २९ ॥ तपोधन! अब मैं पुनः किसी शुभकर्मके द्वारा भविष्यमें सुख पानेकी आशा रखता हूँ। वह कल्याणकारी कर्म क्या है, इसे मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीटका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
११८-
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
कीड़ेका क्रमशः क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना
व्यास उवाच
शुभेन कर्मणा यद्वै तिर्यग्योनौ न मुह्यसे ।
ममैव कीट तत् कर्म येन त्वं न प्रमुह्यसे ॥ १ ॥
**व्यासजीने कहा—**कीट! तुम जिस शुभकर्मके प्रभावसे तिर्यग् योनिमें जन्म लेकर भी मोहित नहीं हुए हो, वह मेरा ही कर्म है। मेरे दर्शनके प्रभावसे ही तुम्हें मोह नहीं हो रहा है ॥ १ ॥
अहं त्वां दर्शनादेव तारयामि तपोबलात् ।
तपोबलाद्धि बलवद् बलमन्यन्न विद्यते ॥ २ ॥
मैं अपने तपोबलसे केवल दर्शनमात्र देकर तुम्हारा उद्धार कर दूँगा; क्योंकि तपोबलसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ बल नहीं है ॥ २ ॥
जानामि पापैः स्वकृतैर्गतं त्वां कीट कीटताम् ।
अवाप्स्यसि पुनर्धर्मं धर्मं तु यदि मन्यसे ॥ ३ ॥
कीट! मैं जानता हूँ, अपने पूर्वकृत पापोंके कारण तुम्हें कीटयोनिमें आना पड़ा है। यदि इस समय तुम्हारी धर्मके प्रति श्रद्धा है तो तुम्हें धर्म अवश्य प्राप्त होगा ॥
कर्म भूमिकृतं देवा भुञ्जते तिर्यगाश्च ये ।
धर्मोऽपि हि मनुष्येषु कामार्थश्च तथा गुणाः ॥ ४ ॥
देवता, मनुष्य और तिर्यग् योनिमें पड़े हुए प्राणी कर्मभूमिमें किये हुए कर्मोंका ही फल भोगते हैं। अज्ञानी मनुष्यका धर्म भी कामनाको लेकर ही होता है तथा वे कामनाकी सिद्धिके लिये ही गुणोंको अपनाते हैं ॥ ४ ॥
वाग्बुद्धिपाणिपादैश्च व्यपेतस्य विपश्चितः ।
किं हास्यति मनुष्यस्य मन्दस्यापि हि जीवतः ॥ ५ ॥
मनुष्य मूर्ख हो या विद्वान्, यदि वह वाणी, बुद्धि और हाथ-पैरसे रहित होकर जीवित है तो उसे कौन-सी वस्तु त्यागेगी, वह तो सभी पुरुषार्थोंसे स्वयं ही परित्यक्त है ॥
जीवन् हि कुरुते पूजां विप्राग्र्यः शशिसूर्ययोः ।
ब्रुवन्नपि कथां पुण्यां तत्र कीट त्वमेष्यसि ॥ ६ ॥
कीट! एक जगह एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हैं। वे जीवनमें सदा सूर्य और चन्द्रमाकी पूजा किया करते हैं तथा लोगोंको पवित्र कथाएँ सुनाया करते हैं। उन्हींके यहाँ तुम (क्रमशः) पुत्ररूपसे जन्म लोगे ।। ६ ।। गुणभूतानि भूतानि तत्र त्वमुपभोक्ष्यसे । तत्र तेऽहं विनेष्यामि ब्रह्म त्वं यत्र वैष्यसि ॥ ७ ॥ वहाँ विषयोंको पंचभूतोंका विकार मानकर अनासक्तभावसे उपभोग करोगे। उस समय मैं तुम्हारे पास आकर ब्रह्मविद्याका उपदेश करूँगा तथा तुम जिस लोकमें जाना चाहोगे, वहीं तुम्हें पहुँचा दूँगा ।। ७ ।। स तथेति प्रतिश्रुत्य कीटो वर्त्मन्यतिष्ठत । शकटो व्रजंश्च सुमहानागतश्च यदृच्छया ।। ८ ।। चक्राक्रमेण भिन्नश्च कीटः प्राणान् मुमोच ह । व्यासजीके इस प्रकार कहनेपर उस कीड़ेने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और बीच रास्तेमें जाकर वह ठहर गया। इतनेहीमें वह विशाल छकड़ा अकस्मात् वहाँ आ पहुँचा और उसके पहियेसे दबकर चूर-चूर हो कीड़ेने प्राण त्याग दिये ।। ८ १/२ ।। सम्भूतः क्षत्रियकुले प्रसादादमितौजसः ।। ९ ।। तमृषिं द्रष्टुमगमत् सर्वास्र्वन्यासु योनिषु । श्वाविद्रोधावराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् ।। १० ।। श्वपाकद्रशूद्रवैश्यानां क्षत्रियाणां च योनिषु । तत्पश्चात् वह क्रमशः शाही, गोधा, सूअर, मृग, पक्षी, चाण्डाल, शूद्र और वैश्यकी योनिमें जन्म लेता हुआ क्षत्रिय-जातिमें उत्पन्न हुआ। अन्य सारी योनियोंमें भ्रमण करनेके बाद अमित तेजस्वी व्यासजीकी कृपासे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर वह उन महर्षिका दर्शन करनेके लिये उनके पास गया ।। ९-१० १/२ ।। स कीट एवमाभाष्य ऋषिणा सत्यवादिना । प्रतिस्मृत्याथ जग्राह पादौ मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ।। ११ ।। वह कीट-योनिमें उन सत्यवादी महर्षि वेदव्यासजीके साथ बातचीत करके जो इस प्रकार उन्नतिशील हुआ था, उसकी याद करके उस क्षत्रियने हाथ जोड़कर ऋषिके चरणोंमें अपना मस्तक रख दिया ।। ११ ।।
कीट उवाच
इदं तदतुलं स्थानमीप्सितं दशभिर्गुणैः । यदहं प्राप्य कीटत्वमागतो राजपुत्रताम् ।। १२ ।। कीट (क्षत्रिय) ने कहा— भगवन्! आज मुझे वह स्थान मिला है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। इसे मैं दस जन्मोंसे पाना चाहता था। यह आपकीही कृपा है कि मैं अपने दोषसे
कीड़ा होकर भी आज राजकुमार हो गया हूँ ।। १२ ।। वहन्ति मामतिबलाः कुञ्जरा हेममालिनः । स्यन्दनेषु च काम्बोजा युक्ताः परमवाजिनः ।। १३ ।। अब सोनेकी मालाओंसे सुशोभित अत्यन्त बलवान् गजराज मेरी सवारीमें रहते हैं। उत्तम जातिके काबुली घोड़े मेरे रथोंमें जोते जाते हैं ।। १३ ।। उष्ट्राश्वतरयुक्तानि यानानि च वहन्ति माम् । सबान्धवः सहामात्यश्चाश्नामि पिशितौदनम् ।। १४ ।। ऊँटों और खच्चरोंसे जुती हुई गाड़ियाँ मुझे ढोती हैं। मैं भाई-बन्धुओं और मन्त्रियोंके साथ मांस-भात खाता हूँ ।। १४ ।। गृहेषु स्वनिवासेषु सुखेषु शयनेषु च । वरार्हेषु महाभाग स्वपामि च सुपूजितः ।। १५ ।। महाभाग! श्रेष्ठ पुरुषोंमें रहने योग्य अपने निवासभूत सुन्दर महलोंके भीतर सुखद शय्याओंपर मैं बड़े सम्मानके साथ शयन करता हूँ ।। १५ ।। सर्वेष्वपररात्रेषु सूमागधबन्दिनः । स्तुवन्ति मां यथा देवा महेन्द्रं प्रियवादिनः ।। १६ ।। प्रतिदिन रातके पिछले पहरोंमें सूत, मागध और वन्दीजन मेरी स्तुति करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवता प्रिय वचन बोलकर महेन्द्रके गुण गाते हैं ।। १६ ।। प्रसादात् सत्यसंधस्य भवतोऽमिततेजसः । यदहं कीटतां प्राप्य सम्प्राप्तो राजपुत्रताम् ।। १७ ।। आप सत्यप्रतिज्ञ हैं, अमित तेजस्वी हैं, आपके प्रसादसे ही आज मैं कीड़ेसे राजपूत हो गया हूँ ।। १७ ।। नमस्तेऽस्तु महाप्राज्ञ किं करोमि प्रशाधि माम् । त्वत्तपोबलनिर्दिष्टमिदं ह्यधिगतं मया ।। १८ ।। महाप्राज्ञ! आपको नमस्कार है, मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; आपके तपोबलसे ही मुझे राजपद प्राप्त हुआ है ।। १८ ।।
व्यास उवाच
अर्चितोऽहं त्वया राजन् वाग्भिरद्य यदृच्छया । अद्य ते कीटतां प्राप्य स्मृतिर्जाता जुगुप्सिता ।। १९ ।। व्यासजीने कहा— राजन्! आज तुमने अपनी वाणीसे मेरा भलीभाँति स्तवन किया है। अभीतक तुम्हें अपनी कीट-योनिकी घृणित स्मृति अर्थात् मांस खानेकी वृत्ति बनी हुई है ।। १९ ।। न तु नाशोऽस्ति पापस्य यस्त्वयोपचितः पुरा ।
शूद्रेणार्थप्रधानेन नृशंसेनानतायिना ॥ २० ॥
तुमने पूर्वजन्ममें अर्थपरायण, नृशंस और आततायी शूद्र होकर जो पाप संचय किया था, उसका सर्वदा नाश नहीं हुआ है ॥ २० ॥
मम ते दर्शनं प्राप्तं तच्च वै सुकृतं त्वया ।
तिर्यग्योनौ स्म जातेन मम चाभ्यर्थनात् तथा ॥ २१ ॥
इतस्त्वं राजपुत्रत्वाद् ब्राह्मण्यं समवाप्स्यसि ।
कीट-योनिमें जन्म लेकर भी जो तुमने मेरा दर्शन किया, उसी पुण्यका यह फल है कि तुम राजपूत हुए और आज जो तुमने मेरी पूजा की, इसके फलस्वरूप तुम इस क्षत्रिय-योनिके पश्चात् ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ॥
गोब्राह्मणकृते प्राणान् हुत्वाऽऽत्मानं रणाजिरे ॥ २२ ॥
राजपुत्र सुखं प्राप्य क्रतूंश्चैवाप्तदक्षिणान् ।
अथ मोदिष्यसे स्वर्गे ब्रह्मभूतोऽव्ययः सुखी ॥ २३ ॥
राजकुमार! तुम नाना प्रकारके सुख भोगकर अन्तमें गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये संग्रामभूमिमें अपने प्राणोंकी आहुति दोगे। तदनन्तर ब्राह्मणरूपमें पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके स्वर्गसुखका उपभोग करोगे। तत्पश्चात् अविनाशी ब्रह्मस्वरूप होकर अक्षय आनन्दका अनुभव करोगे ॥ २२-२३ ॥
तिर्यग्योन्याः शूद्रतामभ्युपैति
शूद्रो वैश्यं क्षत्रियत्वं च वैश्यः ।
वृत्तश्लाघी क्षत्रियो ब्राह्मणत्वं
स्वर्गं पुण्यं ब्राह्मणः साधुवृत्तः ॥ २४ ॥
तिर्यग्-योनिमें पड़ा हुआ जीव जब ऊपरकी ओर उठता है, तब वहाँसे पहले शूद्र-भावको प्राप्त होता है। शूद्र वैश्ययोनिको, वैश्य क्षत्रिययोनिको और सदाचारसे सुशोभित क्षत्रिय ब्राह्मणयोनिको प्राप्त होता है। फिर सदाचारी ब्राह्मण पुण्यमय स्वर्गलोकको जाता है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
क्षत्रधर्ममनुप्राप्तः स्मरन्नेव च वीर्यवान् ।
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्ममनुप्राप्तः स्मरन्नेव च वीर्यवान् ।
त्यक्त्वा स कीटतां राजंश्चचार विपुलं तपः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजा युधिष्ठिर! इस प्रकार कीटयोनिका त्याग करके अपने पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाला वह जीव अब क्षत्रिय-धर्मको प्राप्त हो विशेष शक्तिशाली हो गया और बड़ी भारी तपस्या करने लगा ॥ १ ॥
तस्य धर्मार्थविदुषो दृष्ट्वा तद् विपुलं तपः ।
आजगाम द्विजश्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ २ ॥
तब धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उस राजकुमारकी उग्र तपस्या देखकर विप्रवर श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी उसके पास आये ॥ २ ॥
व्यास उवाच
क्षात्रं देवव्रतं कीट भूतानां परिपालनम् ।
क्षात्रं देवव्रतं ध्यायंस्ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**पूर्वजन्मके कीट! प्राणियोंकी रक्षा करना देवताओंका व्रत है और यही क्षात्रधर्म है। इसका चिंतन और पालन करके तुम अगले जन्ममें ब्राह्मण हो जाओगे ॥ ३ ॥
पाहि सर्वाः प्रजाः सम्यक् शुभाशुभविदात्मवान् ।
शुभैः संविभजन् कामैरशुभानां च पावनैः ॥ ४ ॥
आत्मवान् भव सुप्रीतः स्वधर्माचरणे रतः ।
क्षात्रीं तनुं समुत्सृज्य ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥ ५ ॥
तुम शुभ और अशुभका ज्ञान प्राप्त करो तथा अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करके भलीभाँति प्रजाका पालन करो। उत्तम भोगोंका दान करते हुए अशुभ दोषोंका मार्जन करके प्रजाको पावन बनाकर आत्मज्ञानी एवं सुप्रसन्न हो जाओ तथा सदा स्वधर्मके आचरणमें तत्पर रहो। तदनन्तर क्षत्रिय-शरीरका त्याग करके ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ॥ ४-५ ॥
भीष्म उवाच
सोऽप्यरण्यमनुप्राप्य पुनरेव युधिष्ठिर ।
महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रजा धर्मेण पाल्य च ।। ६ ।।
अचिरेणैव कालेन कीटः पार्थिवसत्तम ।
प्रजापालनधर्मेण प्रेत्य विप्रत्वमागतः ।। ७ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! वह भूतपूर्व कीट महर्षि वेदव्यासका वचन सुनकर धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करने लगा। तत्पश्चात् वह पुनः वनमें जाकर थोड़े ही समयमें परलोकवासी हो प्रजापालनरूप धर्मके प्रभावसे ब्राह्मण-कुलमें जन्म पा गया ।। ६-७ ।।
ततस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा पुनरेव महायशाः ।
आजगाम महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनस्तदा ।। ८ ।।
उसे ब्राह्मण हुआ जान महायशस्वी महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास पुनः उसके पास आये ।। ८ ।।
व्यास उवाच
भो भो ब्रह्मर्षभ श्रीमन् मा व्यथिष्ठाः कथंचन ।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ।। ९ ।।
**व्यासजीने कहा—**ब्राह्मणशिरोमणे! अब तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। उत्तम कर्म करनेवाला उत्तम योनियोंमें और पाप करनेवाला पाप-योनियोंमें जन्म लेता है ।। ९ ।।
उपपद्यति धर्मज्ञ यथापापफलोपगम् ।
तस्मान्मृत्युभयात् कीट मा व्यथिष्ठाः कथंचन ।। १० ।।
धर्मलोपभयं ते स्यात् तस्माद् धर्मं चरोत्तमम् ।
धर्मज्ञ! मनुष्य जैसा पाप करता है, उसके अनुसार ही उसे फल भोगना पड़ता है। अतः भूतपूर्व कीट! अब तुम मृत्युके भयसे किसी प्रकार व्यथित न होओ। हाँ, तुम्हें धर्मके लोपका भय अवश्य होना चाहिये, इसलिये उत्तम धर्मका आचरण करते रहो ।। १० १/२ ।।
कीट उवाच
सुखात् सुखतरं प्राप्तो भगवंस्त्वत्कृते ह्यहम् ।। ११ ।।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य पाप्मा नष्ट इहाद्य मे ।
**भूतपूर्व कीटने कहा—**भगवन्! आपके ही प्रयत्नसे मैं अधिकाधिक सुखकी अवस्थाको प्राप्त होता गया हूँ। अब इस जन्ममें धर्ममूलक सम्पत्ति पाकर मेरा सारा पाप नष्ट हो गया ।। ११ १/२ ।।
भीष्म उवाच
भगवद्वचनात् कीटो ब्राह्मण्यं प्राप्य दुर्लभम् ।। १२ ।।
अकरोत् पृथिवीं राजन् यज्ञयूपशताङ्किताम् । ततः सालोक्यमगमद् ब्रह्मणो ब्रह्मवित्तमः ॥ १३ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् व्यासके कथनानुसार उस भूतपूर्व कीटने दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर पृथ्वीको सैकड़ों यज्ञयूपोंसे अंकित कर दिया। तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ होकर उसने ब्रह्मसालोक्य प्राप्त किया अर्थात् ब्रह्मलोकमें जाकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त किया ॥ १२-१३ ॥
अवाप च पदं कीटः पार्थ ब्रह्म सनातनम् । स्वकर्मफलनिर्वृत्तं व्यासस्य वचनात् तदा ॥ १४ ॥ पार्थ! व्यासजीके कथनानुसार उसने स्वधर्मका पालन किया था। उसीका यह फल हुआ कि उस कीटने सनातन ब्रह्मपद प्राप्त कर लिया ॥ १४ ॥
तेऽपि यस्मात् प्रभावेण हताः क्षत्रियपुंगवाः । सम्प्राप्तास्ते गतिं पुण्यां तस्मान्मा शोच पुत्रक ॥ १५ ॥ बेटा! (क्षत्रिययोनिमें उस कीटने युद्ध करके प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई।) इसी प्रकार जो प्रधान-प्रधान क्षत्रिय अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस रणभूमिमें मारे गये हैं, वे भी पुण्यमयी गतिको प्राप्त हुए हैं। अतः उनके लिये तुम शोक न करो ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
व्यास और मैत्रेयका संवाद—दानकी प्रशंसा और कर्मका रहस्य
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
व्यास और मैत्रेयका संवाद—दानकी प्रशंसा और कर्मका रहस्य
युधिष्ठिर उवाच
विद्या तपश्च दानं च किमेतेषां विशिष्यते ।
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! विद्या, तप और दान—इनमेंसे कौन-सा श्रेष्ठ है? यह मैं आपसे पूछता हूँ, मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मैत्रेयस्य च संवादं कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास और मैत्रेयके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
कृष्णद्वैपायनो राजन्नज्ञातचरितं चरन् ।
वाराणस्यामुपातिष्ठन्मैत्रेयं स्वैरिणीकुले ॥ ३ ॥
नरेश्वर! एक समयकी बात है—भगवान् श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी गुप्तरूपसे विचरते हुए वाराणसी-पुरीमें जा पहुँचे। वहाँ मुनियोंकी मण्डलीमें बैठे हुए मुनिवर मैत्रेयजीके यहाँ वे उपस्थित हुए ॥ ३ ॥
तमुपस्थितमासीनं ज्ञात्वा स मुनिसत्तम ।
अर्चयित्वा भोजयामास मैत्रेयोऽशनमुत्तमम् ॥ ४ ॥
पास आकर बैठे हुए मुनिवर व्यासजीको पहचानकर मैत्रेयजीने उनका पूजन किया और उन्हें उत्तम अन्न भोजन कराया ॥ ४ ॥
तदन्नमुत्तमं भुक्त्वा गुणवत् सार्वकामिकम् ।
प्रतिष्ठमानोऽस्मयत प्रीतः कृष्णो महामनाः ॥ ५ ॥
वह उत्तम लाभदायक और सबकी रुचिके अनुकूल अन्न भोजन करके महामना व्यासजी बहुत संतुष्ट हुए। फिर जब वे वहाँसे चलने लगे तो मुस्कराये ॥ ५ ॥
तमुत्स्मयन्तं सम्प्रेक्ष्य मैत्रेयः कृष्णमब्रवीत् ।
कारणं ब्रूहि धर्मात्मन् व्यस्मयिष्ठाः कुतश्च ते ॥ ६ ॥
तपस्विनो धृतिमन्तः प्रमोदः समुपागतः ।
एतत् पृच्छामि ते विद्वन्नभिवाद्य प्रणम्य च ॥ ७ ॥
उन्हें मुस्कराते देख मैत्रेयजीने व्यासजीसे पूछा—'धर्मात्मन्! विद्वन्! मैं आपको अभिवादन* एवं प्रणाम करके यह पूछता हूँ कि आप अभी-अभी जो मुस्कराये हैं, उसका क्या कारण है? आपको हँसी कैसे आयी? आप तो तपस्वी और धैर्यवान् हैं। आपको कैसे सहसा उल्लास हो आया? यह मुझे बताइये ।। ६-७ ।।
आत्मनश्च तपोभाग्यं महाभाग्यं तवेह च ।
पृथगाचरतस्तात पृथगात्मसुखात्मनोः ।
अल्पान्तरमहं मन्ये विशिष्टमपि चान्वयात् ।। ८ ।।
'तात! मैं अपनेमें तपस्याजनित सौभाग्य देखता हूँ और आपमें यहाँ सहज महाभाग्य प्रतिष्ठित है (क्योंकि आप मेरे गुरुपुत्र हैं)। जीवात्मा और परमात्मामें मैं बहुत थोड़ा अन्तर मानता हूँ। परमात्माका सभी पदार्थोंके साथ सम्बन्ध है; क्योंकि वह सर्वव्यापी है। इसीलिये मैं उसे जीवात्माकी अपेक्षा श्रेष्ठ भी मानता हूँ, किंतु आप तो जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न जाननेवाले हैं, फिर आपका आचरण इस मान्यतासे भिन्न हो रहा है; क्योंकि आपको कुछ विस्मय हुआ है और मुझे नहीं हुआ है' ।। ८ ।।
व्यास उवाच
अतिच्छन्दातिवादाभ्यां स्मयोऽयं समुपागतः ।
असत्यं वेदवचनं कस्माद् वेदोऽनृतं वदेत् ।। ९ ।।
व्यासजीने कहा—ब्रह्मन्! अतिथिको अत्यन्त गौरव प्रदान करते हुए उसकी इच्छाके अनुसार सत्कार करना 'अतिच्छन्द' कहलाता है और वाणीद्वारा अतिथिके गौरवका जो प्रकाशन किया जाता है, उसे 'अतिवाद' कहते हैं। मुझे यहाँ अतिच्छन्द और अतिवाद दोनों प्राप्त हुए हैं, इसीलिये मेरा यह विस्मय एवं हर्षोल्लास प्रकट हुआ है। (दान और आतिथ्य आदिका महत्त्व वेदोंके द्वारा प्रतिपादित हुआ है।) वेदोंका वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। भला, वेद क्यों असत्य कहेगा? ।। ९ ।।
त्रीण्येव तु पदान्याहुः पुरुषस्योत्तमं व्रतम् ।
न द्रुह्येच्चैव दद्याच्च सत्यं चैव परं वदेत् ।। १० ।।
वेद मनुष्यके लिये तीन बातोंको उत्तम व्रत बताते हैं—(१) किसीके प्रति द्रोह न करे, (२) दान दे तथा (३) दूसरोंसे सदा सत्य बोले ।। १० ।।
इति वेदोक्तमृषिभिः पुरस्तात् परिकल्पितम् ।
इदानीं चैव नः कृत्यं पुरस्ताच्च परिश्रुतम् ।। ११ ।।
वेदके इस कथनका सबसे पहले ऋषियोंने पालन किया। हमने भी बहुत पहलेसे इसे सुन रखा है और इस समय भी वेदकी इस आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है ।। ११ ।।
अल्पोऽपि तादृशो दायो भवत्युत महाफलः ।
तृषिताय च ते दत्तं हृदयेनानसूयता ॥ १२ ॥ शास्त्रविधिके अनुसार दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान महान् फल देनेवाला होता है। तुमने ईर्ष्या-रहित हृदयसे भूखे-प्यासे अतिथिको अन्न-जलका दान किया है ॥ १२ ॥
तृषितस्तृषिताय त्वं दत्त्वैतद् दर्शनं मम । अजैषीर्महतो लोकान् महायज्ञैरिव प्रभो ॥ १३ ॥ प्रभो! मैं भूखा और प्यासा था। तुमने मुझ भूखे-प्यासेको अन्न-जल देकर तृप्त किया। इस पुण्यके प्रभावसे महान् यज्ञोंद्वारा प्राप्त होनेवाले बड़े-बड़े लोकोंपर तुमने विजय पायी है—यह मुझे प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ १३ ॥
ततो दानपवित्रेण प्रीतोऽस्मि तपसैव च । पुण्यस्यैव हि ते सत्त्वं पुण्यस्यैव च दर्शनम् ॥ १४ ॥ इस दानके द्वारा पवित्र हुई तुम्हारी तपस्यासे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ। तुम्हारा बल पुण्यका ही बल है और तुम्हारा दर्शन भी पुण्यका ही दर्शन है ॥ १४ ॥
पुण्यस्यैवाभिगन्धस्ते मन्ये कर्मविधानजम् । अधिकं मार्जनात् तात तथा चैवानुलेपनात् ॥ १५ ॥ तुम्हारे शरीरसे जो सदा पुण्यकी ही सुगन्ध फैलती रहती है, इसे मैं इस दानरूप पुण्यकर्मके अनुष्ठानका फल मानता हूँ। तात! दान करना तीर्थ-स्नान तथा वैदिक व्रतकी पूर्तिसे भी बढ़कर है ॥ १५ ॥
शुभं सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं द्विज । नो चेत् सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं भवेत् ॥ १६ ॥ ब्रह्मन्! जितने पवित्र कर्म हैं, उन सबमें दान ही सबसे बढ़कर पवित्र एवं कल्याणकारी है। यदि दान ही समस्त पवित्र वस्तुओंसे श्रेष्ठ न होता तो वेद-शास्त्रोंमें उसकी इतनी प्रशंसा नहीं की जाती ॥ १६ ॥
यानीमान्युत्तमानीह वेदोक्तानि प्रशंससि । तेषां श्रेष्ठतरं दानमिति मे नात्र संशयः ॥ १७ ॥ तुम जिन-जिन वेदोक्त उत्तम कर्मोंकी यहाँ प्रशंसा करते हो, उन सबमें दान ही श्रेष्ठतर है, इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ॥ १७ ॥
दानकृद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः । ते हि प्राणस्य दातारस्तेषु धर्मः प्रतिष्ठितः ॥ १८ ॥ दाताओंने जो मार्ग बना दिया है, उसीसे मनीषी पुरुष चलते हैं। दान करनेवाले प्राणदाता समझे जाते हैं। उन्हींमें धर्म प्रतिष्ठित है ॥ १८ ॥
यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रियसंयमः । सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम् ॥ १९ ॥
जैसे वेदोंका स्वाध्याय, इन्द्रियोंका संयम और सर्वस्वका त्याग उत्तम है, उसी प्रकार इस संसारमें दान भी अत्यन्त उत्तम माना गया है ॥ १९ ॥ त्वं हि तात महाबुद्धे सुखमेष्यसि शोभनम् । सुखात् सुखतरप्राप्तिमाप्नुते मतिमान्नरः ॥ २० ॥ तात! महाबुद्धे! तुमको इस दानके कारण उत्तम सुखकी प्राप्ति होगी। बुद्धिमान् मनुष्य दान करके उत्तरोत्तर सुख प्राप्त करता है ॥ २० ॥ तन्नः प्रत्यक्षमेवेदमुपलभ्यमसंशयम् । श्रीमन्तः प्राप्नुवन्त्यर्थान् दानं यज्ञं तथा सुखम् ॥ २१ ॥ यह बात हमलोगोंके सामने प्रत्यक्ष है। हमें निःसंदेह ऐसा ही समझना चाहिये। तुम-जैसे श्रीसम्पन्न पुरुष जब धन पाते हैं, तब उससे दान, यज्ञ और सुख भोग करते हैं ॥ २१ ॥ सुखादेव परं दुःखं दुःखादप्यपरं सुखम् । दृश्यते हि महाप्राज्ञ नियतं वै स्वभावतः ॥ २२ ॥ महाप्राज्ञ! किंतु जो लोग विषयसुखोंमें आसक्त हैं, वे सुखसे ही महान् दुःखमें पड़ते हैं और जो तपस्या आदिके द्वारा दुःख उठाते हैं, उन्हें दुःखसे ही सुखकी प्राप्ति होती देखी जाती है। सुख और दुःख मनुष्यके स्वभावके अनुसार नियत हैं ॥ २२ ॥ त्रिविधानीह वृत्तानि नरस्याहुर्मनीषिणः । पुण्यमन्यत् पापमन्यन्न पुण्यं न च पापकम् ॥ २३ ॥ इस जगत्में मनीषी पुरुषोंने मनुष्यके तीन प्रकारके आचरण बतलाये हैं—पुण्यमय, पापमय तथा पुण्य-पाप दोनोंसे रहित ॥ २३ ॥ न वृत्तं मन्यते तस्य मन्यते न च पातकम् । तथा स्वकर्मनिर्वृत्तं न पुण्यं न च पापकम् ॥ २४ ॥ ब्रह्मनिष्ठ पुरुष कर्तापनके अभिमानसे रहित होता है। अतः उसके किये हुए कर्मको न पुण्य माना जाता है न पाप। उसे अपने कर्मजनित पुण्य और पापकी प्राप्ति होती ही नहीं है ॥ २४ ॥ यज्ञदानतपःशीला नरा वै पुण्यकर्मिणः । येऽभिद्रुह्यन्ति भूतानि ते वै पापकृतो जनाः ॥ २५ ॥ जो यज्ञ, दान और तपस्यामें प्रवीण रहते हैं, वे ही मनुष्य पुण्य कर्म करनेवाले हैं तथा जो प्राणियोंसे द्रोह करते हैं, वे ही पापाचारी समझे जाते हैं ॥ २५ ॥ द्रव्याण्याददते चैव दुःखं यान्ति पतन्ति च । ततोऽन्यत् कर्म यत्किंचिन्न पुण्यं न च पातकम् ॥ २६ ॥ जो मनुष्य दूसरोंके धन चुराते हैं, वे दुःख पाते और नरकमें पड़ते हैं। इन उपर्युक्त शुभाशुभ कर्मोंसे भिन्न जो साधारण चेष्टा है, वह न तो पुण्य है और न तो पाप ही
है ।। २६ ।। रमस्वैधस्व मोदस्व देहि चैव यजस्व च । न त्वामभिभविष्यन्ति वैद्या न च तपस्विनः ।। २७ ।। महर्षे! तुम आनन्दपूर्वक स्वधर्म-पालनमें रत रहो, तुम्हारी निरन्तर उन्नति हो, तुम प्रसन्न रहो, दान दो और यज्ञ करो। विद्वान् और तपस्वी तुम्हारा पराभव नहीं कर सकेंगे ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायां विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२० ।।
* आदरणीय पुरुषके चरणोंको हाथसे पकड़कर जो नमस्कार किया जाता है, उसे अभिवादन कहते हैं और दोनों हाथोंकी अंजलि बाँधकर उसे अपने ललाटसे लगाकर जो वन्दनीय पुरुषको मस्तक झुकाया जाता है उसका नाम प्रणाम है।
व्यास-मैत्रेय-संवाद—विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
व्यास-मैत्रेय-संवाद—विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा
भीष्म उवाच
एवमुक्तः प्रत्युवाच मैत्रेयः कर्मपूजकः ।
अत्यन्तश्रीमति कुले जातः प्राज्ञो बहुश्रुतः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! व्यासजीके ऐसा कहनेपर कर्मपूजक मैत्रेयने जो अत्यन्त श्रीसम्पन्न कुलमें उत्पन्न हुए बहुश्रुत विद्वान् थे, उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ।।
मैत्रेय उवाच
असंशयं महाप्राज्ञ यथैवात्थ तथैव तत् ।
अनुज्ञातश्च भवता किंचिद् ब्रूयामहं विभो ॥ २ ॥
**मैत्रेय बोले—**महाप्राज्ञ! आप जैसा कहते हैं ठीक वैसी ही बात है, इसमें संशय नहीं है। प्रभो! यदि आप आज्ञा दें तो मैं कुछ कहूँ ॥ २ ॥
व्यास उवाच
यद् यदिच्छसि मैत्रेय यावद् यावद् यथा यथा ।
ब्रूहि तत्त्वं महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**महाप्राज्ञ मैत्रेय! तुम जो-जो, जितनी-जितनी और जैसी-जैसी बातें कहना चाहो, कहो। मैं तुम्हारी बातें सुनूँगा ॥ ३ ॥
मैत्रेय उवाच
निर्दोषं निर्मलं चैवं वचनं दानसंहितम् ।
विद्यातपोभ्यां हि भवान् भावितात्मा न संशयः ॥ ४ ॥
**मैत्रेय बोले—**मुने! आपने दानके सम्बन्धमें जो बातें बतायी हैं, वे दोषरहित और निर्मल हैं। इसमें संदेह नहीं कि आपने विद्या और तपस्यासे अपने अन्तःकरणको परम पवित्र बना लिया है ॥ ४ ॥
भवतो भावितात्मत्वाल्लाभोऽयं सुमहान् मम ।
भूयो बुद्ध्यानुपश्यामि सुसमृद्धतपा इव ॥ ५ ॥
आप शुद्धचित्त हैं, इसलिये आपके समागमसे मुझे यह महान् लाभ पहुँचा है। यह बात मैं समृद्धिशाली तपवाले महर्षिके समान बुद्धिसे बारंबार विचारकर प्रत्यक्ष देखता हूँ ।।
अपि नो दर्शनादेव भवतोऽभ्युदयो भवेत् ।
मन्ये भवत्प्रसादोऽयं तद्धि कर्म स्वभावतः ॥ ६ ॥ आपके दर्शनसे ही हमलोगोंका महान् अभ्युदय हो सकता है। आपने जो दर्शन दिया, यह आपकी बहुत बड़ी कृपा है। मैं ऐसा ही मानता हूँ। यह कर्म भी आपकी कृपासे ही स्वभावतः बन गया है ॥ ६ ॥
तपः श्रुतं च योनिश्चाप्येतद् ब्राह्मण्यकारणम् । त्रिभिर्गुणैः समुदितस्ततो भवति वै द्विजः ॥ ७ ॥ ब्राह्मणत्वके तीन कारण माने गये हैं—तपस्या, शास्त्रज्ञान और विशुद्ध ब्राह्मणकुलमें जन्म। जो इन तीनों गुणोंसे सम्पन्न है, वही सच्चा ब्राह्मण है ॥ ७ ॥
अस्मिंस्तृप्ते च तृप्यन्ते पितरो दैवतानि च । न हि श्रुतवतां किंचिदधिकं ब्राह्मणादृते ॥ ८ ॥ ऐसे ब्राह्मणके तृप्त होनेपर देवता और पितर भी तृप्त हो जाते हैं। विद्वानोंके लिये ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरा कोई मान्य नहीं है ॥ ८ ॥
अन्धं स्यात् तम एवेदं न प्रज्ञायेत किंचन । चातुर्वर्ण्यं न वर्तेत धर्माधर्मावृतानृते ॥ ९ ॥ यदि ब्राह्मण न हों तो यह सारा जगत् अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हो जाय। किसीको कुछ सूझ न पड़े तथा चारों वर्णोंकी स्थिति, धर्म-अधर्म और सत्यासत्य कुछ भी न रह जाय ॥ ९ ॥
यथा हि सुकृते क्षेत्रे फलं विन्दति मानवः । एवं दत्त्वा श्रुतवति फलं दाता समश्नुते ॥ १० ॥ जैसे मनुष्य अच्छी तरह जोतकर तैयार किये हुए खेतमें बीज डालनेपर उसका फल पाता है, उसी प्रकार विद्वान् ब्राह्मणको दान देकर दाता निश्चय ही उसके फलका भागी होता है ॥ १० ॥
ब्राह्मणश्चेन्न विन्देत श्रुतवृत्तोपसंहितः । प्रतिग्रहीता दानस्य मोघं स्यात् धनिनां धनम् ॥ ११ ॥ यदि विद्या और सदाचारसे सम्पन्न ब्राह्मण जो दान लेनेका प्रधान अधिकारी है, धन न पा सके तो धनियोंका धन व्यर्थ हो जाय ॥ ११ ॥
अदन्नविद्वान् हन्त्यन्नमद्यमानं च हन्ति तम् । तं चान्नं पाति यश्चान्नं स हन्ता हन्यतेऽबुधः ॥ १२ ॥ मूर्ख मनुष्य यदि किसीका अन्न खाता है तो वह उस अन्नको नष्ट करता है (अर्थात् कर्ताको उसका कुछ फल नहीं मिलता)। इसी प्रकार वह अन्न भी उस मूर्खको नष्ट कर डालता है। जो सुपात्र होनेके कारण अन्न और दाताकी रक्षा करता है, उसकी भी वह अन्न रक्षा करता है। जो मूर्ख दानके फलका हनन करता है, वह स्वयं भी मारा जाता है ॥ १२ ॥
प्रभुर्ह्यन्नमदन् विद्वान् पुनर्जनयतीश्वरः ।
स चान्नाज्जायते तस्मात् सूक्ष्म एष व्यतिक्रमः ॥ १३ ॥ प्रभाव और शक्तिसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण यदि अन्न भोजन करता है तो वह पुनः अन्नका उत्पादन करता है, किंतु वह स्वयं अन्नसे उत्पन्न होता है, इसलिये यह व्यतिक्रम सूक्ष्म (दुर्विज्ञेय) है अर्थात् यद्यपि वृष्टिसे अन्नकी और अन्नसे प्रजाकी उत्पत्ति होती है; किंतु यह प्रजा (विद्वान् ब्राह्मण) से अन्नकी उत्पत्तिका विषय दुर्विज्ञेय है ॥ १३ ॥
यदेव ददतः पुण्यं तदेव प्रतिगृह्णतः । न ह्येकचक्रं वर्तेत इत्येवमृषयो विदुः ॥ १४ ॥ ‘दान देनेवालेको जो पुण्य होता है, वही दान लेनेवालेको भी (यदि वह योग्य अधिकारी है तो) होता है। (क्योंकि दोनों एक दूसरेके उपकारक होते हैं) एक पहियेसे गाड़ी नहीं चलती—प्रतिग्रहीताके बिना दाताका दान सफल नहीं हो सकता।’ ऐसी ऋषियोंकी मान्यता है ॥
यत्र वै ब्राह्मणाः सन्ति श्रुतवृत्तोपसंहिताः । तत्र दानफलं पुण्यमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ १५ ॥ जहाँ विद्वान् और सदाचारी ब्राह्मण रहते हैं, वहीं दिये हुए दानका फल इहलोक और परलोकमें मनुष्य भोगता है ॥ १५ ॥
ये योनिशुद्धाः सततं तपस्यभिरता भृशम् । दानाध्ययनसम्पन्नास्ते वै पूज्यतमाः सदा ॥ १६ ॥ जो ब्राह्मण विशुद्ध कुलमें उत्पन्न, निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले, बहुत दानपरायण तथा अध्ययनसम्पन्न हैं, वे ही सदा पूज्य माने गये हैं ॥ १६ ॥
तैर्हि सद्भिः कृतः पन्थास्तेन यातो न मुह्यते । ते हि स्वर्गस्य नेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः ॥ १७ ॥ ऐसे सत्पुरुषोंने जिस मार्गका निर्माण किया है, उससे चलनेवालेको कभी मोह नहीं होता; क्योंकि वे मनुष्योंको स्वर्गलोकमें ले जानेवाले तथा सनातन यज्ञनिर्वाहक हैं ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायामेकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥