महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो स्निग्ध, मधुर, बाधारहित और पापशून्य तथा स्वागत-सत्कारके भावसे युक्त वाणी बोलते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। २१ ।।
परुषं ये न भाषन्ते कटुकं निष्ठुरं तथा।
अपैशुन्यरताः सन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २२ ॥
जो किसीकी चुगली नहीं खाते और कभी किसीसे रूखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुँहसे नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्गमें जाते हैं ।। २२ ।।
पिशुनां न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम्।
ऋतं मैत्रं तु भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २३ ॥
जो दो मित्रोंमें फूट डालनेवाली चुगलीकी बातें नहीं करते हैं, सत्य और मैत्रीभावसे युक्त वचन बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। २३ ।।
ये वर्जयन्ति परुषं परद्रोहं च मानवाः।
सर्वभूतसमा दान्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २४ ॥
जो मानव दूसरोंसे तीखी बातें बोलना और द्रोह करना छोड़ देते हैं, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखने-वाले और जितेन्द्रिय होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
शठप्रलापाद् विरता विरुद्धपरिवर्जकाः।
सौम्यप्रलापिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २५ ॥
जिनके मुँहसे कभी शठतापूर्ण बात नहीं निकलती, जो विरोधयुक्त वाणीका त्याग करते हैं और सदा सौम्य (कोमल) वाणी बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
न कोपाद् व्याहरन्ते ये वाचं हृदयदारणीम्।
सान्त्वं वदन्ति क्रुद्धाऽपि ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २६ ॥
जो क्रोधमें आकर भी हृदयको विदीर्ण करनेवाली बात मुँहसे नहीं निकालते हैं तथा क्रुद्ध होनेपर भी सान्त्वनापूर्ण वचन ही बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। २६ ।।
एष वाणीकृतो देवि धर्मः सेव्यः सदा नरैः।
शुभः सत्यगुणो नित्यं वर्जनीयो मृषा बुधैः ॥ २७ ॥
देवि! यह वाणीजनित धर्म बताया गया है। मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये। विद्वानोंको उचित है कि वे सदा शुभ और सत्य वचन बोलें तथा मिथ्याका परित्याग करें* ।। २७ ।।
उमोवाच
मनसा बध्यते येन कर्मणा पुरुषः सदा।
तन्मे ब्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृत् ॥ २८ ॥
उमाने पूछा— महाभाग! पिनाकधारी देवदेव! जिस मानसिक कर्मसे मनुष्य सदा बन्धनमें पड़ता है, उसको मुझे बताइये ।। २८ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मानसेनेह धर्मेण संयुक्ताः पुरुषाः सदा । स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तयतः शृणु ॥ २९ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! जो सदा मानसिक धर्मसे युक्त हैं अर्थात् मनसे धर्मका ही चिन्तन और आचरण करते हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं। मैं इस विषयमें जो बताता हूँ, उसे सुनो ॥ २९ ॥
दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीततरा कृतिः । मनो बध्यति येनेह शृणु वाक्यं शुभानने ॥ ३० ॥ शुभानने! मनमें दुर्विचार आनेसे मनुष्यके कार्य भी दुर्नीतिपूर्ण एवं दूषित होते हैं, जिससे मन बन्धनमें पड़ जाता है। इस विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३० ॥
अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं दृश्यते यदा । मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३१ ॥ जब दूसरेका धन निर्जन वनमें पड़ा हुआ दिखायी दे, उस समय भी जो उसकी ओर मन ललचाकर किसीकी हिंसा नहीं करते, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ॥
ग्रामे गृहे वा ये द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम् । नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३२ ॥ गाँव या घरके एकान्त स्थानमें पड़े हुए पराये धनका जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३२ ॥
तथैव परदारान् ये कामवृत्तान् रहोगतान् । मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्तमें प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियोंको मनसे भी उनके साथ अन्याय करनेका विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३३ ॥
शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः । भजन्ति मैत्राः संगम्य ते नसः स्वर्गगामिनः ॥ ३४ ॥ जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रको भी सदा समान हृदयसे अपनाते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३४ ॥
श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः । स्वैरर्थैः परिसंतुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३५ ॥ जो शास्त्रज्ञ, दयालु पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ और अपने ही धनसे संतुष्ट होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३५ ॥
अवैरा ये त्वनायासा मैत्रीचित्तरताः सदा । सर्वभूतदयावन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३६ ॥
जिनके मनमें किसीके प्रति वैर नहीं है, जो आयासरहित, मैत्रीभावसे पूर्ण हृदयवाले तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति सदा ही दयाभाव रखनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं॥ ३६ ॥
श्रद्धावन्तो दयावन्तश्चोक्षाश्चोक्षजनप्रियाः ।
धर्माधर्मविदो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३७ ॥
जो श्रद्धालु, दयालु, शुद्ध, शुद्धजनोंके प्रेमी तथा धर्म और अधर्मके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥
शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये ।
विपाकज्ञाश्च ये देवि ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३८ ॥
देवि! जो शुभ और अशुभ कर्मोंके फल-संचयके विषयमें परिणामके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३८ ॥
न्यायोपेता गुणोपेता देवद्विजपराः सदा ।
समुत्थानमनुप्राप्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३९ ॥
जो न्यायशील, गुणवान्, देवताओं और द्विजोंके भक्त तथा उत्थानको प्राप्त हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३९ ॥
शुभैः कर्मफलैर्देवि मयैते परिकीर्तिताः ।
स्वर्गमार्गपरा भूयः किं त्वं श्रोतुमिहेच्छसि ॥ ४० ॥
देवि! जो शुभ कर्मोंके फलोंसे स्वर्गलोकके मार्गमें स्थित हैं, उनका वर्णन मैंने यहाँ किया है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ४० ॥
उमोवाच
महान् मे संशयः कश्चिन्मर्त्यान् प्रति महेश्वर ।
तस्मात् त्वं नैपुणेनाद्य मम व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४१ ॥
**उमाने पूछा—**महेश्वर! मुझे मनुष्योंके विषयमें एक महान् संशय है। आप अच्छी तरह उस संशयका समाधान करें ॥ ४१ ॥
केनायुर्लभते दीर्घं कर्मणा पुरुषः प्रभो ।
तपसा वापि देवेश केनायुर्लभते महत् ॥ ४२ ॥
प्रभो! मनुष्य किस कर्मसे दीर्घायु प्राप्त करता है? तथा देवेश्वर! किस तपस्यासे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है? ॥ ४२ ॥
क्षीणायुः केन भवति कर्मणा भुवि मानवः ।
विपाकं कर्मणां देव वक्तुमर्हस्यनिन्दित ॥ ४३ ॥
अनिन्द्य महादेव! इस भूत़लपर कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण हो जाती है? आप मुझसे कर्म-विपाकका वर्णन करें ॥ ४३ ॥
अपरे च महाभाग्या मन्दभाग्यास्तथापरे ।
अकुलीनास्तथा चान्ये कुलीनाश्च तथापरे ॥ ४४ ॥
इस जगत्में कुछ लोग महान् भाग्यशाली हैं तो कुछ लोग मन्दभाग्य हैं, कुछ लोग निन्दित कुलमें उत्पन्न हैं तो दूसरे लोग उच्चकुलमें ॥ ४४ ॥
दुर्दर्शाः केचिदाभान्ति नराः काष्ठमया इव ।
प्रियदर्शास्तथा चान्ये दर्शनादेव मानवाः ॥ ४५ ॥
कुछ मनुष्य दुर्दशाके मारे काष्ठमय (जडवत्) प्रतीत हो रहे हैं, उनकी ओर देखना कठिन जान पड़ता है और दूसरे कितने ही मनुष्य दर्शनमात्रसे मन प्रसन्न कर देते हैं, उनकी ओर देखना प्रिय लगता है ॥ ४५ ॥
दुष्प्रज्ञाः केचिदाभान्ति केचिदाभान्ति पण्डिताः ।
महाप्राज्ञास्तथैवान्ये ज्ञानविज्ञानभाविनः ॥ ४६ ॥
कुछ लोग दुर्बुद्धि जान पड़ते हैं और कुछ विद्वान् तथा कितने ही ज्ञान-विज्ञानशाली महाप्राज्ञ प्रतीत होते हैं ॥ ४६ ॥
अल्पाबाधास्तथा केचिन्महाबाधास्तथापरे ।
दृश्यन्ते पुरुषा देव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४७ ॥
देव! कुछ लोग साधारण एवं स्वल्प बाधाओंसे ग्रस्त होते हैं और कुछ लोगोंको बड़ी-बड़ी बाधाएँ घेरे रहती हैं। इस तरह जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी विषम अवस्थामें पड़े हुए पुरुष दिखायी देते हैं, उनकी इस विषमताका क्या कारण है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ४७ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदयम् ।
मर्त्यलोके नरः सर्वो येन स्वफलमश्नुते ॥ ४८ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें बता रहा हूँ कि कर्मके फलका उदय किस प्रकार होता है और मर्त्यलोकके सभी मनुष्य किस प्रकार अपनी-अपनी करनीका फल भोगते हैं ॥ ४८ ॥
प्राणातिपाते यो रौद्रो दण्डहस्तोद्यतः सदा ।
नित्यमुद्यतशस्त्रश्च हन्ति भूतगणान् नरः ॥ ४९ ॥
निर्दयः सर्वभूतानां नित्यमुद्वेगकारकः ।
अपि कीटपिपीलानामशरण्यः सुनिर्घृणः ॥ ५० ॥
एवंभूतो नरो देवि निरयं प्रतिपद्यते ।
देवि! जो मनुष्य दूसरोंका प्राण लेनेके लिये हाथमें डंडा लेकर सदा भयंकर रूप धारण किये रहता है, जो प्रतिदिन हथियार उठाये जगत्के प्राणियोंकी हत्या किया करता है, जिसके भीतर किसीके प्रति दया नहीं होती, जो समस्त प्राणियोंको सदा उद्वेगमें डाले रहता है और जो अत्यन्त क्रूर होनेके कारण चींटी और कीड़ोंको भी शरण नहीं देता, ऐसा मानव घोर नरकमें पड़ता है ॥ ४९-५० १/२ ॥
विपरीतस्तु धर्मात्मा रूपवानभिजायते ॥ ५१ ॥
पापेन कर्मणा देवि वध्यो हिंसारतिर्नरः ।
अप्रियः सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते ॥ ५२ ॥
जिसका स्वभाव इसके विपरीत है, वह धर्मात्मा और रूपवान् होता है। देवि! हिंसाप्रेमी मनुष्य अपने पापकर्मके कारण दूसरोंका वध्य, सब प्राणियोंका अप्रिय तथा अल्पायु होता है ॥ ५१-५२ ॥
निरयं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसकः ।
यातनां निरये रौद्रां स कृच्छ्रां लभते नरः ॥ ५३ ॥
जिसका चित्त हिंसामें लगा होता है, वह नरकमें गिरता है और जो किसीकी हिंसा नहीं करता, वह स्वर्गमें जाता है। नरकमें पड़े हुए जीवको बड़ी कष्टदायक और भयंकर यातना भोगनी पड़ती है ॥ ५३ ॥
यः कश्चिन्निरयात् तस्मात् समुत्तरति कर्हिचित् ।
मानुष्यं लभते चापि हीनायुस्तत्र जायते ॥ ५४ ॥
यदि कभी कोई उस नरकसे छुटकारा पाता है तो मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, किंतु वहाँ उसकी आयु बहुत थोड़ी होती है ॥ ५४ ॥
पापेन कर्मणा देवि बद्धो हिंसारतिर्नरः ।
अप्रियः सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते ॥ ५५ ॥
देवि! पापकर्मसे बँधा हुआ हिंसापरायण मनुष्य समस्त प्राणियोंका अप्रिय होनेके कारण अल्पायु हो जाता है ॥ ५५ ॥
यस्तु शुक्लाभिजातीयः प्राणिघातविवर्जकः ।
निक्षिप्तशस्त्रो निर्दण्डो न हिंसति कदाचन ॥ ५६ ॥
न घातयति नो हन्ति घ्नन्तं नैवानुमोदते ।
सर्वभूतेषु सस्नेही यथाऽऽत्मनि तथापरे ॥ ५७ ॥
ईदृशः पुरुषोत्कर्षो देवि देवत्वमश्रुते ।
उपपन्नान् सुखान् भोगानुपाश्नाति मुदा युतः ॥ ५८ ॥
इसके विपरीत जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न और जीवहिंसासे अलग रहनेवाला है, जिसने शस्त्र और दण्डका परित्याग कर दिया है, जिसके द्वारा कभी किसीकी हिंसा नहीं होती, जो न मारता है, न मारनेकी आज्ञा देता है और न मारनेवालेका अनुमोदन ही करता है। जिसके
मनमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह बना रहता है तथा जो अपने ही समान दूसरोंपर भी दयादृष्टि रखता है। देवि! ऐसा श्रेष्ठ पुरुष देवत्वको प्राप्त होता है और देवलोकमें प्रसन्नतापूर्वक स्वतः उपलब्ध हुए सुखद भोगोंका अनुभव करता है ॥ ५६—५८ ॥
अथ चेन्मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते ।
तत्र दीर्घायुरुत्पन्नः स नरः सुखमेधते ॥ ५९ ॥
अथवा यदि कदाचित् वह मनुष्यलोकमें जन्म लेता है तो वह मनुष्य दीर्घायु और सुखी होता है ॥ ५९ ॥
एष दीर्घायुषां मार्गः सुवृत्तानां सुकर्मिणाम् ।
प्राणिहिंसाविमोक्षेण ब्रह्मणा समुदीरितः ॥ ६० ॥
यह सत्कर्मका अनुष्ठान करनेवाले सदाचारी एवं दीर्घजीवी मनुष्योंका लक्षण है। स्वयं ब्रह्माजीने इस मार्गका उपदेश किया है। समस्त प्राणियोंकी हिंसाका परित्याग करनेसे ही इसकी उपलब्धि होती है ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥
* उपर्युक्त कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले पुरुषको परमात्मपदकी प्राप्ति हो जाती है।
स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन
उमोवाच
किंशीलः किंसमाचारः पुरुषः कैश्च कर्मभिः ।
स्वर्गं समभिपद्येत सम्प्रदानेन केन वा ॥ १ ॥
पार्वतीने पूछा—भगवन्! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोंसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है ॥ १ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
दाता ब्राह्मणसत्कर्ता दीनार्तकृपणादिषु ।
भक्ष्यभोज्यान्नपानानां वाससां च प्रदायकः ॥ २ ॥
प्रतिश्रयान् सभाः कूपान् प्रपाः पुष्करिणीस्तथा ।
नैत्यकानि च सर्वाणि किमिच्छकमतीव च ॥ ३ ॥
आसनं शयनं यानं गृहं रत्नं धनं तथा ।
सस्यजातानि सर्वाणि गाः क्षेत्राण्यथ योषितः ॥ ४ ॥
सुप्रतीतमना नित्यं यः प्रयच्छति मानवः ।
एवंभूतो नरो देवि देवलोकेऽभिजायते ॥ ५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है ॥ २—५ ॥
तत्रोष्य सुचिरं कालं भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् ।
सहाप्सतेभिर्मुदितो रमते नन्दनादिषु ॥ ६ ॥
वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए नन्दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है ॥ ६ ॥
तस्मात् स्वर्गाच्च्युतो लोकान् मानुषेषु प्रजायते ।
महाभोगकुले देवि धनधान्यसमन्वितः ॥ ७ ॥
देवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान् भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है॥ ७॥ तत्र कामगुणैः सर्वैः समुपेतो मुदा युतः । महाभोगो महाकोशो धनी भवति मानवः ॥ ८ ॥ मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान् भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान् होता है॥ ८॥ एते देवि महाभागाः प्राणिनो दानशीलिनः । ब्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ताः सर्वस्य प्रियदर्शनाः ॥ ९ ॥ देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान् सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टिमें प्रिय होते हैं॥ ९॥ अपरे मानवा देवि प्रदानकृपणा द्विजैः । याचिता न प्रयच्छन्ति विद्यमानेऽप्यबुद्धयः ॥ १० ॥ देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते॥ १०॥ दीनान्धकृपणान् दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि । याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विताः ॥ ११ ॥ वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते॥ ११॥ न धनानि न वासांसि न भोगान् न च काञ्चनम् । न गावो नान्नविकृतिं प्रयच्छन्ति कदाचन ॥ १२ ॥ वे न धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं॥ १२॥ अप्रवृत्ताश्च ये लुब्धा नास्तिका दानवर्जिताः । एवंभूता नरा देवि निरयं यान्त्यबुद्धयः ॥ १३ ॥ देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं॥ १३॥ ते वै मनुष्यतां यान्ति यदा कालस्य पर्ययात् । धनरिक्ते कुले जन्म लभन्ते स्वल्पबुद्धयः ॥ १४ ॥ यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं॥ १४॥ क्षुत्पिपासापरीताश्च सर्वलोकबहिष्कृताः । निराशाः सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम् ॥ १५ ॥
वहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं ॥ १५ ॥ अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नराः । अनेन कर्मणा देवि भवन्त्यधनिनो नराः ॥ १६ ॥ देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं ॥ १६ ॥ अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिनः पापतो रताः । आसनार्हस्य ये पीठं न प्रयच्छन्त्यचेतसः ॥ १७ ॥ इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं ॥ १७ ॥ मार्गार्हस्य च ये मार्गं न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः । पाद्यार्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥ वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं ॥ १८ ॥ अर्घ्यार्हान् न च सत्कारैरर्चयन्ति यथाविधि । अर्घ्यमाचमनीयं वा न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः ॥ १९ ॥ इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर्घ्य या आचमनीय नहीं देते हैं ॥ १९ ॥ गुरुं चाभिगतं प्रेम्णा गुरुवन्न बुभूषते । अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिताः ॥ २० ॥ सम्मान्यांश्चावमन्यन्ते वृद्धान् परिभवन्ति च । एवंविधा नरा देवि सर्वे निरयगामिनः ॥ २१ ॥ गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते—उन्हें गुरुवत् सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़े-बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं ॥ २०-२१ ॥ ते वै यदि नरास्तस्मान्निरयादुत्तरन्ति वै । वर्षपूगैस्ततो जन्म लभन्ते कुत्सिते कुले ॥ २२ ॥ श्वपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम् । कुलेषु तेषु जायन्ते गुरुवृद्धापचायिनः ॥ २३ ॥
बहुत वर्षोंके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ।। २२-२३ ।। न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः । लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वचः ।। २४ ।। सर्ववर्णप्रियकरः सर्वभूतहितः सदा । अद्वेषी सुमुखः श्लक्ष्णः स्निग्धवाणीप्रदः सदा ।। २५ ।। स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसकः । यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चयन्तवतिष्ठति ।। २६ ।। मार्गाहाय ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चयन् । अतिथिप्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजकः ।। २७ ।। एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते । ततो मानुषतां प्राप्य विशिष्टकुलजो भवेत् ।। २८ ।। देवि ! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोंका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात् मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है ।। २४—२८ ।। तत्रासौ विपुलैर्भोगैः सर्वरत्नसमायुतः । यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत् ।। २९ ।। उस जन्ममें वह महान् भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ।। २९ ।। सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृतः । स्वकर्मफलमाप्नोति स्वयमेव नरः सदा ।। ३० ।। वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोंका फल सदा स्वयं ही भोगता है ।। ३० ।। उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजनः सदा । एष धर्मो मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरितः ।। ३१ ।।
धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता है। यह साक्षात् ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है॥ ३१॥ यस्तु रौद्रसमाचारः सर्वसत्त्वभयंकरः । हस्ताभ्यां यदि वा पद्भ्यां रज्ज्वा दण्डेन वा पुनः ॥ ३२॥ लोष्टैः स्तम्भैरायुधैर्वा जन्तून् बाधति शोभने । हिंसार्थं निकृतिप्रज्ञः प्रोद्वेजयति चैव ह ॥ ३३ ॥ उपक्रामति जन्तूंश्च उद्वेगजननः सदा । एवंशीलसमाचारो निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥ शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक शस्त्रोंका प्रहार करके जीव-जन्तुओंको सताता है, छल-कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये उन जीवोंमें उद्वेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है॥ स वै मनुष्यतां गच्छेद यदि कालस्य पर्ययात् । बह्वाबाधपरिक्लिष्टे जायते सोऽधमे कुले ॥ ३५ ॥ यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्न- बाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है॥ ३५॥ लोकद्वेष्योऽधमः पुंसां स्वयं कर्मफलैः कृतैः । एष देवि मनुष्येषु बोद्धव्यो ज्ञातिबन्धुषु ॥ ३६॥ देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोंके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति- बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं॥ अपरः सर्वभूतानि दयावाननुपश्यति । मैत्रदृष्टिः पितृसमो निर्वैरो नियतेन्द्रियः ॥ ३७ ॥ नोद्वेजयति भूतानि न विघातयते तथा । हस्तपादैः सुनियतैर्विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ॥ ३८ ॥ न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च । उद्वेजयति भूतानि श्लक्ष्णकर्मा दयापरः ॥ ३९ ॥ एवंशीलसमाचारः स्वर्गे समुपजायते । तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत् ॥ ४० ॥ इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे,
ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है ॥ ३७—४० ॥
स चेत् कर्मक्षयान्मर्त्यो मनुष्येषूपजायते ।
अल्पाबाधो निरातङ्कः स जातः सुखमेधते ॥ ४१ ॥
सुखभागी निरायासो निरुद्वेगः सदा नरः ।
एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते ॥ ४२ ॥
फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती ॥ ४१-४२ ॥
उमोवाच
इमे मनुष्या दृश्यन्ते ऊहापोहविशारदाः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः प्रज्ञावन्तोऽर्थकोविदाः ॥ ४३ ॥
पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और अर्थनिपुण देखे जाते हैं ॥ ४३ ॥
दुष्प्रज्ञाश्चापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिताः ।
केन कर्मविशेषेण प्रज्ञावान् पुरुषो भवेत् ॥ ४४ ॥
देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान-विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं। ऐसी दशामें मनुष्य कौन-सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान् हो सकता है? ॥ ४४ ॥
अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानवः ।
एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वधर्मविदां वर ॥ ४५ ॥
विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ॥ ४५ ॥
जात्यन्धाश्चापरे देव रोगार्ताश्चापरे तथा ।
नराः क्लीबाश्च दृश्यन्ते कारणं ब्रूहि तत्र वै ॥ ४६ ॥
देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ४६ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ब्राह्मणान् वेदविदुषः सिद्धान् धर्मविदस्तथा ।
परिपृच्छन्त्यहरहः कुशलाः कुशलं तथा ॥ ४७ ॥
वर्जयन्तोऽशुभं कर्म सेवमानाः शुभं तथा ।
लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिहलोके तथा सुखम् ॥ ४८ ॥
श्रीमहादेवजीने कहा— देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥
स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जायते ।
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य कल्याणमुपजायते ॥ ४९ ॥
ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है। शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है ॥ ४९ ॥
परदारेषु ये चापि चक्षुर्दुष्टं प्रयुञ्जते ।
तेन दुष्टस्वभावेन जात्यन्धास्ते भवन्ति ह ॥ ५० ॥
जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ॥
मनसा तु प्रदुष्टेन नग्नां पश्यन्ति ये स्त्रियम् ।
रोगार्तास्ते भवन्तीह नरा दुष्कृतकर्मिणः ॥ ५१ ॥
जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं ॥ ५१ ॥
ये तु मूढा दुराचारा वियोनौ मैथुने रताः ।
पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञा क्लीबत्वमुपयान्ति ते ॥ ५२ ॥
जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ॥
पशूंश्च ये घातयन्ति ये चैव गुरुतल्पगाः ।
प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीबा जायन्ति ते नसः ॥ ५३ ॥
जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं ॥ ५३ ॥
उमोवाच
सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च ।
श्रेयः कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम ॥ ५४ ॥
पार्वतीने पूछा— देवश्रेष्ठ! कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है? ॥ ५४ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
श्रेयांसं मार्गमन्विच्छन् सदा यः पृच्छति द्विजान् । धर्मान्वेषी गुणाकांक्षी स स्वर्गं समुपानुते ॥ ५५ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ॥ ५५ ॥
यदि मानुषतां देवि कदाचित् स निगच्छति । मेधावी धारणायुक्तः प्रायस्तत्राभिजायते ॥ ५६ ॥ देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ ५६ ॥
एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारकः । नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाहृतः ॥ ५७ ॥ देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है ॥ ५७ ॥
उमोवाच
अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नराः । ब्राह्मणान् वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम् ॥ ५८ ॥ पार्वतीने पूछा— भगवन्! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं ॥ ५८ ॥
व्रतवन्तो नराः केचिच्छ्रद्धाधर्मपरायणाः । अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमाः ॥ ५९ ॥ कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमभ्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं ॥ ५९ ॥
यज्वानश्च तथैवान्ये निर्होमाश्च तथापरे । केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे ॥ ६० ॥ कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ ६० ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
आगमा लोकधर्माणां मर्यादाः सर्वनिर्मिताः । प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दृढव्रताः ॥ ६१ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! शास्त्र लोकधर्मोंकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम
व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।। अधर्मं धर्ममित्याहुर्ये च मोहवशं गताः । अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता ब्रह्मराक्षसाः ।। ६२ ।। जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं ।। ६२ ।। ते चेत्कालकृतोद्योगात् सम्भवन्तीह मानुषाः । निर्होमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमाः ।। ६३ ।। वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ।। ६३ ।। एष देवि मया सर्वः संशयच्छेदनाय ते । कुशलाकुशलो नृणां व्याख्यातो धर्मसागरः ।। ६४ ।। देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है। मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ।।
[राजधर्मका वर्णन]
[राजधर्मका वर्णन] उमोवाच
देवदेव नमस्तुभ्यं त्र्यक्ष वृषभध्वज ।
श्रुतं मे भगवन् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥
उमाने कहा— देवदेव! त्रिलोचन! वृषभध्वज! भगवन्! महेश्वर! आपकी कृपासे मैंने पूर्वोक्त सब विषयोंको सुना है ।।
संगृहीतं मया तच्च तव वाक्यमनुत्तमम् ।
इदानीमस्ति संदेहो मानुषेष्विह कश्चन ॥
सुनकर आपके उस परम उत्तम उपदेशको मैंने बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया है। इस समय मनुष्योंके विषयमें एक संदेह ऐसा रह गया है, जिसका समाधान आवश्यक है ।।
तुल्यप्राणशिरःकायो राजायमिति दृश्यते ।
केन कर्मविपाकेन सर्वप्राधान्यमर्हति ॥
मनुष्योंमें यह जो राजा दिखायी देता है, उसके भी प्राण, सिर और धड़ दूसरे मनुष्योंके समान ही हैं; फिर किस कर्मके फलसे यह सबमें प्रधान पद पानेका अधिकारी हुआ है? ।।
स चापि दण्डयन् मर्त्यान् भर्त्सयन् विविधानपि ।
प्रेत्यभावे कथं लोकाँल्लभते पुण्यकर्मणाम् ॥
राजवृत्तमहं तस्माच्छ्रोतुमिच्छामि मानद ।
यह राजा नाना प्रकारके मनुष्योंको दण्ड देता और उन्हें डाँटता-फटकारता है। यह मृत्युके पश्चात् कैसे पुण्यात्माओंके लोक पाता है? मानद! अतः मैं राजाके आचार-व्यवहारका वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि राजधर्मं शुभानने ॥
राजायत्तं हि यत् सर्वं लोकवृत्तं शुभाशुभम् ।
महत्तस्तपसो देवि फलं राज्यमिति स्मृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— शुभानने! अब मैं तुम्हें राजधर्मकी बात बताऊँगा; क्योंकि जगत्का सारा शुभाशुभ आचार-व्यवहार राजाके ही अधीन है। देवि! राज्यको बहुत बड़ी तपस्याका फल माना गया है ।।
अराजके पुरा त्वासीत् प्रजानां संकुलं महत् ।
तद् दृष्ट्वा संकुलं ब्रह्मा मनुं राज्ये न्यवेशयत् ॥
प्राचीन कालकी बात है, सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी। प्रजापर महान् संकट आ गया। प्रजाकी यह संकटापन्न अवस्था देख ब्रह्माजीने मनुको राजसिंहासनपर बिठाया ।।
तदाप्रभृति संदृष्टं राज्ञां वृत्तं शुभाशुभम् ।
तन्मे शृणु वरारोहे तस्य पथ्यं जगद्धितम् ॥ तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है। वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ॥ यथा प्रेत्य लभेत् स्वर्गं यथा वीर्यं यशस्तथा । पित्र्यं वा भूतपूर्वं वा स्वयमुत्पाद्य वा पुनः ॥ राज्यधर्ममनुष्ठाय विधिवद् भोक्तुमर्हति ॥ जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ। उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो। पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ॥ आत्मानमेव प्रथमं विनयैरुपपादयेत् । अनुभृत्यान् प्रजाः पश्चादित्येष विनयक्रमः ॥ पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सेवकों और प्रजाओंको विनयकी शिक्षा दे। यही विनयका क्रम है ॥ स्वामिनं चोपमां कृत्वा प्रजास्तद्वृत्तकाङ्क्षया । स्वयं विनयसम्पन्ना भवन्तीह शुभेक्षणे ॥ शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ॥ स्वस्मात् पूर्वतरं राजा विनयत्येव वै प्रजाः । अपहास्यो भवेत्तादृक् स्वदोषस्यानवेक्षणात् ॥ जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ॥ विद्याभ्यासैर्वृद्धयोगैरात्मानं विनयं नयेत् । विद्या धर्मार्थफलिनी तद्विदो वृद्धसंज्ञिताः ॥ विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये। विद्या धर्म और अर्थरूप फल देनेवाली है। जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ॥ इन्द्रियाणां जयो देवि अत ऊर्ध्वमुदाहृतः । अजये सुमहान् दोषो राजानं विनिपातयेत् ॥ देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये—यह बात बतायी गयी। इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान् दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ॥ पञ्चैव स्ववशे कृत्वा तदर्थान् पञ्च शोषयेत् । षडुत्सृज्य यथायोगं ज्ञानेन विनयेन च ॥
शास्त्रचक्षुर्नयपरो भूत्वा भृत्यान् समाहरेत् ॥
पाँचों इन्द्रियोंको अपने अधीन करके उनके पाँचों विषयोंको सुखा डाले। ज्ञान और विनयके द्वारा आवश्यक प्रयत्न करके काम-क्रोध आदि छः दोषोंको त्याग दे तथा शास्त्रीय दृष्टिका सहारा लेकर न्यायपरायण हो सेवकोंका संग्रह करे ॥
वृत्तश्रुतकुलोपेतानुपधाभिः परीक्षितान् ।
अमात्यानुपधातीतान् सापसर्पान् जितेन्द्रियान् ॥
योजयेत यथायोगं यथार्हं स्वेषु कर्मसु ॥
जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न हों, जिनकी सच्चाई और ईमानदारीकी परीक्षा ले ली गयी हो, जो उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हों, जिनके साथ बहुत-से जासूस हों और जो जितेन्द्रिय हों—ऐसे अमात्योंको यथायोग्य अपने कर्मोंमें उनकी योग्यताके अनुसार नियुक्त करे ॥
अमात्या बुद्धिसम्पन्ना राष्ट्रं बहुजनप्रियम् ।
दुराधर्षं पुरश्रेष्ठं कोषः कृच्छ्रसहः स्मृतः ॥
अनुरक्तं बलं साम्नामद्वैधं मित्रमेव च ।
एताः प्रकृतयः स्वेषु स्वामी विनयतत्त्ववित् ॥
बुद्धिमान् मन्त्री, बहुजनप्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर या दुर्ग, कठिन अवसरोंपर काम देनेवाला कोष, सामनीतिके द्वारा राजामें अनुराग रखनेवाली सेना, दुविधामें न पड़ा हुआ मित्र और विनयके तत्त्वको जाननेवाला राज्यका स्वामी—ये सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं ॥
प्रजानां रक्षणार्थाय सर्वमेतद् विनिर्मितम् ।
आभिः करणभूताभिः कुर्याल्लोकहितं नृपः ॥
प्रजाकी रक्षाके लिये ही यह सारा प्रबन्ध किया गया है। रक्षाकी हेतुभूत जो ये प्रकृतियाँ हैं, इनके सहयोगसे राजा लोकहितका सम्पादन करे ॥
आत्मरक्षा नरेन्द्रस्य प्रजारक्षार्थमिष्यते ।
तस्मात् सततमात्मानं संरक्षेद्प्रमादवान् ॥
राजाको प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपनी रक्षा अभीष्ट होती है, अतः वह सदा सावधान होकर आत्मरक्षा करे ॥
भोजनाच्छादनस्नानाद् बहिर्निष्क्रमणादपि ।
नित्यं स्त्रीगणसंयोगाद् रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
मनको वशमें रखनेवाला राजा भोजन-आच्छादन-स्नान, बाहर निकलना तथा सदा स्त्रियोंके समुदायसे संयोग रखना—इन सबसे अपनी रक्षा करे ॥
स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च शस्त्रादपि विषादपि ।
सततं पुत्रदारेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्री-पुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ।। सर्वेभ्य एव स्थानेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् । प्रजानां रक्षणार्थाय प्रजाहितकरो भवेत् ।। आत्मवान् राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ।। प्रजाकार्यं तु तत्कार्यं प्रजासौख्यं तु तत्सुखम् । प्रजाप्रियं प्रियं तस्य स्वहितं तु प्रजाहितम् ।। प्रजार्थं तस्य सर्वस्वमात्मार्थं न विधीयते ।। प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है। प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ।। प्रकृतीनां हि रक्षार्थं रागद्वेषौ व्युदस्य च । उभयोः पक्षयोर्वादं श्रुत्वा चैव यथातथम् ।। तमर्थं विमृशेद् बुद्ध्या स्वयमातत्त्वदर्शनात् ।। प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले। फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ।। तत्त्वविद्भिश्च बहुभिः सहासीनो नरोत्तमैः । कर्तारमपराधं च देशकालौ नयानयौ ।। ज्ञात्वा सम्यग्यथाशास्त्रं ततो दण्डं नयेन्नृषु ।। तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ।। एवं कुर्वल्लभेद् धर्मं पक्षपातविवर्जनात् ।। प्रत्यक्षाप्तोपदेशाभ्यामनुमानेन वा पुनः । बोद्धव्यं सततं राज्ञा देशवृत्तं शुभाशुभम् ।। पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है। प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ।। चारैः कर्मप्रवृत्त्या च तद् विज्ञाय विचारयेत् । अशुभं निर्हरेत् सद्यो जोषयच्छुभमात्मनः ।।
गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे। तत्पश्चात् अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे ।। गर्ह्यान् विगर्हयेदेव पूज्यान् सम्पूजयेत् तथा । दण्ड्यांश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा ।। देवि! राजा निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा ही करे, पूजनीय पुरुषोंका पूजन करे और दण्डनीय अपराधियोंको दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। पञ्चापेक्षं सदा मन्त्रं कुर्याद् बुद्धियुतैनरैः । कुलवृत्तश्रुतोपेतैर्नित्यं मन्त्रपरो भवेत् ।। पाँच व्यक्तियोंकी अपेक्षा रखकर अर्थात् पाँच मन्त्रियोंके साथ बैठकर सदा ही राज-कार्यके विषयमें गुप्त मन्त्रणा करे। जो बुद्धिमान्, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञानसम्पन्न हों, उन्हींके साथ राजाको सदा मन्त्रणा करनी चाहिये ।। कामकारेण वैमुख्यैर्नैव मन्त्रमना भवेत् । राजा राष्ट्रहितापेक्षं सत्यधर्माणि कारयेत् ।। जो इच्छानुसार राज्यकार्यसे विमुख हो जाते हों, ऐसे लोगोंके साथ मन्त्रणा करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये। राजाको राष्ट्रके हितका ध्यान रखकर सत्य-धर्मका पालन करना और कराना चाहिये ।। सर्वोद्योगं स्वयं कुर्याद् दुर्गादिषु सदा नृषु । देशवृद्धिकरान् भृत्यानप्रमादेन कारयेत् ।। देशक्षयकरान् सर्वानप्रियांश्च विसर्जयेत् । अहन्यहनि सम्पश्येदनुजीविगणं स्वयं ।। दुर्ग आदि तथा मनुष्योंकी देखभालके लिये राजा सम्पूर्ण उद्योग सदा स्वयं ही करे। वह देशकी उन्नति करनेवाले भृत्योंको सावधानीके साथ कार्यमें नियुक्त करे और देशको हानि पहुँचानेवाले समस्त अप्रियजनोंका परित्याग कर दे। जो राजाके आश्रित होकर जीविका चला रहे हों, ऐसे लोगोंकी देखभाल भी राजा प्रतिदिन स्वयं ही करे ।। सुमुखः सुप्रियो दत्त्वा सम्यग्वृत्तं समाचरेत् । अधर्म्यं परुषं तीक्ष्णं वाक्यं वक्तुं न चार्हति ।। वह प्रसन्नमुख और सबका परम प्रिय होकर लोगोंको जीविका दे, उनके साथ उत्तम बर्ताव करे। किसीसे पापपूर्ण, रूखा और तीखा वचन बोलना उसके लिये कदापि उचित नहीं ।। अविश्वास्यं हि वचनं वक्तुं सत्सु न चार्हति । नरे नरे गुणान् दोषान् सम्यग्वेदितुमर्हति ।। सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।