महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
'देवराज! तुम सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी हो, तुम्हारे ही आधारपर समस्त लोक टिके हुए हैं। तुम नमुचि, विश्वरूप और बलासुरके विनाशक हो ।। २३ ।।
त्वमाजहर्थ देवानामेको वीरश्रियं पराम् ।
त्वं बिभर्षि भुवं द्यां च सदैव बलसूदन ।। २४ ।।
'बलसूदन! तुम अद्वितीय वीर हो। तुमने उत्तम सम्पत्ति प्राप्त की है। तुम पृथ्वी और स्वर्ग दोनोंका भरण-पोषण एवं संरक्षण करते हो ।। २४ ।।
पौरोहित्यं कथं कृत्वा तव देवगणेश्वर ।
याजयेयमहं मर्त्यं मरुत्तं पाकशासन ।। २५ ।।
'देवेश्वर! पाकशासन! तुम्हारी पुरोहिती करके मैं मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे करा सकता हूँ ।। २५ ।।
समाश्र्वसिहि देवेन्द्र नाहं मर्त्यस्य कर्हिचित् ।
ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ।। २६ ।।
'देवेन्द्र! धैर्य धारण करो। अब मैं कभी किसी मनुष्यके यज्ञमें जाकर सुवा हाथमें नहीं लूँगा। इसके सिवा मेरी यह बात भी ध्यानसे सुन लो ।। २६ ।।
हिरण्यरेता नोष्णः स्यात् परिवर्तत मेदिनी ।
भासं तु न रविः कुर्यान्न तु सत्यं चलेन्मयि ।। २७ ।।
'आग चाहे ठण्डी हो जाय, पृथ्वी उलट जाय और सूर्यदेव प्रकाश करना छोड़ दें; किंतु मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा नहीं टल सकती' ।। २७ ।।
वैशम्पायन उवाच
बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सरः ।
प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा ।। २८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! बृहस्पतिजीकी बात सुनकर इन्द्रका मात्सर्य दूर हो गया और तब वे उनकी प्रशंसा करके अपने घरमें चले गये ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।
बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥
षष्ठोऽध्यायः
नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रसंगमें बुद्धिमान् राजा मरुत्त और बृहस्पतिके इस पुरातन संवादविषयक इतिहासका उल्लेख किया जाता है ॥ १ ॥
देवराजस्य समयं कृतमाङ्गिरसेन ह ।
श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्यज्ञमाहारयत् परम् ॥ २ ॥
राजा मरुत्तने जब यह सुना कि अंगिराके पुत्र बृहस्पतिजीने मनुष्यके यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा कर ली है, तब उन्होंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया ॥ २ ॥
संकल्प्य मनसा यज्ञं करन्धमसुतात्मजः ।
बृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
बातचीत करनेमें कुशल करन्धमपौत्र मरुत्तने मन-ही-मन यज्ञका संकल्प करके बृहस्पतिजीके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
भगवन् यन्मया पूर्वमभिगम्य तपोधन ।
कृतोऽभिसंधिर्यज्ञस्य भवतो वचनाद् गुरो ॥ ४ ॥
तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भाराः सम्भृताश्च मे ।
याज्योऽस्मि भवतः साधो तत् प्राप्नुहि विधत्स्व च ॥ ५ ॥
‘भगवन्! तपोधन! गुरुदेव! मैंने पहले एक बार आकर जो आपसे यज्ञके विषयमें सलाह ली थी और आपने जिसके लिये मुझे आज्ञा दी थी, उस यज्ञको अब मैं प्रारम्भ करना चाहता हूँ। आपके कथनानुसार मैंने सब सामग्री एकत्र कर ली है। साधु पुरुष! मैं आपका पुराना यजमान भी हूँ। इसलिये चलिये, मेरा यज्ञ करा दीजिये’ ॥ ४-५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
न कामये याजयितुं त्वामहं पृथिवीपते ।
वृतोऽस्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे ॥ ६ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! अब मैं तुम्हारा यज्ञ कराना नहीं चाहता। देवराज इन्द्रने मुझे अपना पुरोहित बना लिया है और मैंने भी उनके सामने यह प्रतिज्ञा कर ली है ॥ ६ ॥
मरुत्त उवाच
पित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं बहु मन्ये च ते भृशम् । तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ॥ ७ ॥ **मरुत्त बोले—**विप्रवर! मैं आपके पिताके समयसे ही आपका यजमान हूँ तथा विशेष सम्मान करता हूँ। आपका शिष्य हूँ और आपकी सेवामें तत्पर रहता हूँ। अतः मुझे अपनाइये ॥ ७ ॥
बृहस्पतिरुवाच
अमर्त्यं याजयित्वाहं याजयिष्ये कथं नरम् । मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोऽस्म्यद्य याजनात् ॥ ८ ॥ **बृहस्पतिजीने कहा—**मरुत्त! अमरोंका यज्ञ करानेके बाद मैं मरणधर्मा मनुष्योंका यज्ञ कैसे कराऊँगा? तुम जाओ या रहो। अब मैं मनुष्योंका यज्ञकार्य करानेसे निवृत्त हो गया हूँ ॥ ८ ॥ न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि । उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति ॥ ९ ॥ महाबाहो! मैं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। तुम दूसरे जिसको चाहो उसीको अपना पुरोहित बना लो। जो तुम्हारा यज्ञ करायेगा ॥ ९ ॥
व्यास उवाच
एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितोऽभवत् । प्रत्यागच्छन् सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम् ॥ १० ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! बृहस्पतिजीसे ऐसा उत्तर पाकर महाराज मरुत्तको बड़ा संकोच हुआ। वे बहुत खिन्न होकर लौटे जा रहे थे, उसी समय मार्गमें उन्हें देवर्षि नारदजीका दर्शन हुआ ॥ १० ॥ देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिवः । विधिवत् प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ देवर्षि नारदके साथ समागम होनेपर राजा मरुत्त यथाविधि हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब नारदजीने उनसे कहा— ॥ ११ ॥ राजर्षे नातिहृष्टोऽसि कच्चित् क्षेमं तवानघ । क्व गतोऽसि कुतश्चेदमप्रीतिस्थानमागतम् ॥ १२ ॥ 'राजर्षे! तुम अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देते हो। निष्पाप नरेश! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? कहाँ गये थे और किस कारण तुम्हें यह खेदका अवसर प्राप्त हुआ है? ॥ १२ ॥ श्रोतव्यं चेन्मया राजन् ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ । व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप ॥ १३ ॥
'राजन्! नृपश्रेष्ठ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ। नरेश्वर! मैं पूर्ण यत्न करके तुम्हारा दुःख दूर करूँगा' ।। १३ ।। एवमुक्तो मरुत्तः स नारदेन महर्षिणा । विप्रलम्भमुपाध्यायात् सर्वमेव न्यवेदयत् ।। १४ ।। महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने उपाध्याय (पुरोहित)-से बिछोह होनेका सारा समाचार उन्हें कह सुनाया ।। १४ ।।
मरुत्त उवाच गतोऽस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम् । यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ।। १५ ।। मरुत्तने कहा—नारदजी! मैं अंगिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिके पास गया था। मेरी यात्राका उद्देश्य यह था कि उन्हें अपना यज्ञ करानेके लिये ऋत्विज्के रूपमें देखूँ; किंतु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की ।। १५ ।। प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये । परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ।। १६ ।। नारदजी! मेरे गुरुने मुझपर मरणधर्मा मनुष्य होनेका दोष लगाकर मुझे त्याग दिया। उनके द्वारा इस प्रकार अस्वीकार किये जानेके कारण अब मैं जीवित रहना नहीं चाहता ।। १६ ।।
व्यास उवाच एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारदः प्रत्युवाच ह । आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव ।। १७ ।। व्यासजी कहते हैं—महाराज! राजा मरुत्तके ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा अविक्षित्कुमारको जीवन प्रदान करते हुए-से कहा ।। १७ ।।
नारद उवाच राजन्नङ्गिरसः पुत्रः संवर्तो नाम धार्मिकः । चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहयन् प्रजाः ।। १८ ।। तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति बृहस्पतिः । प्रसन्नस्त्वां महातेजाः संवर्तो याजयिष्यति ।। १९ ।। नारदजी बोले—राजन्! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं। वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात् सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं। यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ। संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे ।। १८-१९ ।।
मरुत्त उवाच
संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद ।
पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर ॥ २० ॥
कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत् ।
प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २१ ॥
**मरुत्त बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया। अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें। यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २०-२१ ॥
नारद उवाच
उन्मत्तवेषं बिभ्रत् स चङ्क्रमीति यथासुखम् ।
वाराणस्यां महाराज दर्शनेप्सुर्महेश्वरम् ॥ २२ ॥
**नारदजीने कहा—**महाराज! वे इस समय वाराणसीमें महेश्वर विश्वनाथके दर्शनकी इच्छासे पागलका-सा वेष धारण किये अपनी मौजसे घूम रहे हैं ॥ २२ ॥
तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् ।
तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत संवर्तः स महीपते ॥ २३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1591)
महाराज मरुत्तकी देवर्षिसे भेंट
महाराज मरुत्तका संवर्तमुनिसे संवाद
महाराज मरुत्तका संवर्तमुनिसे संवाद
तं पृष्ठतोऽनुगच्छेथा यत्र गच्छेत् स वीर्यवान् । तनेकान्ते समासाद्य प्राञ्जलिः शरणं व्रजेः ॥ २४ ॥ तुम उस पुरीके प्रवेश-द्वारपर पहुँचकर वहाँ कहींसे एक मुर्दा लाकर रख देना। पृथ्वीनाथ! जो उस मुर्देको देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े, उसे ही संवर्त समझना और वे शक्तिशाली मुनि जहाँ कहीं जायँ उनके पीछे-पीछे चले जाना। जब वे किसी एकान्त स्थानमें पहुचें, तब हाथ जोड़कर शरणापन्न हो जाना ॥ २३-२४ ॥
पृच्छेत् त्वां यदि केनाहं तवाख्यात इति स्म ह । ब्रूयास्त्वं नारदेनेति संवर्त कथितोऽसि मे ॥ २५ ॥ यदि तुमसे पूछें कि किसने तुम्हें मेरा पता बताया है तो कह देना—'संवर्तजी! नारदजीने मुझे आपका पता बताया है' ॥ २५ ॥
स चेत् त्वामनुयुञ्जीत ममानुगमनेप्सया । शंसेथा वह्निमारूढं मामपि त्वमशङ्कया ॥ २६ ॥ यदि वे तुमसे मेरे पास आनेके लिये मेरा पता पूछें तो तुम निर्भीक होकर कह देना कि 'नारदजी आगमें समा गये' ॥ २६ ॥
व्यास उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य पूजयित्वा च नारदम् । अभ्यनुज्ञाय राजर्षिर्ययौ वाराणसीं पुरीम् ॥ २७ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! यह सुनकर राजर्षि मरुत्तने 'बहुत अच्छा' कहकर नारदजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उनसे जानेकी आज्ञा ले वे वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये ॥ २७ ॥
तत्र गत्वा यथोक्तं स पुर्या द्वारे महायशाः । कुणपं स्थापयामास नारदस्य वचः स्मरन् ॥ २८ ॥ वहाँ जाकर नारदजीके कथनका स्मरण करते हुए महायशस्वी नरेशने उनके बताये अनुसार काशीपुरीके द्वारपर एक मुर्दा लाकर रख दिया ॥ २८ ॥
यौगपद्येन विप्रश्च पुरीद्वारमथाविशत् । ततः स कुणपं दृष्ट्वा सहसा संन्यवर्तत ॥ २९ ॥ इसी समय विप्रवर संवर्त भी पुरीके द्वारपर आये; किंतु उस मुर्देको देखकर वे सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े ॥ २९ ॥
स तं निवृत्तमालक्ष्य प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् । आविक्षितो महीपालः संवर्तमुपशिक्षितुम् ॥ ३० ॥ उन्हें लौटा देख राजा मरुत्त संवर्तसे शिक्षा लेनेके लिये हाथ जोड़े उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३० ॥
स च तं विजने दृष्ट्वा पांसुभिः कर्दमेन च ।
श्लेष्मणा चैव राजानं ष्ठीवनैश्च समाकिरत् ॥ ३१ ॥
एकान्तमें पहुँचनेपर राजाको अपने पीछे-पीछे आते देख संवर्तने उनपर धूल फेंकी, कीचड़ उछाला तथा थूक और खखार डाल दिये ॥ ३१ ॥
स तथा बाध्यमानो वै संवर्तेन महीपतिः ।
अन्वगादेव तमृषिं प्राञ्जलिः सम्प्रसादयन् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार संवर्तके सतानेपर भी राजा मरुत्त हाथ जोड़ उन्हें प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे उन महर्षिके पीछे-पीछे चले ही गये ॥ ३२ ॥
ततो निवर्त्य संवर्तः परिश्रान्त उपाविशत् ।
शीतलच्छायामासाद्य न्यग्रोधं बहुशाखिनम् ॥ ३३ ॥
तब संवर्त मुनि लौटकर शीतल छायासे युक्त तथा अनेक शाखाओंसे सुशोभित एक बरगदके नीचे थककर बैठ गये ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1595)
सप्तमोऽध्यायः
संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना
संवर्त उवाच
कथमस्मि त्वया ज्ञातः केन वा कथितोऽस्मि ते ।
एतदाचक्ष्व मे तत्त्वमिच्छसे चेन्मम प्रियम् ॥ १ ॥
संवर्त बोले— राजन्! तुमने मुझे कैसे पहचाना? किसने तुम्हें मेरा परिचय दिया है? यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ ॥ १ ॥
सत्यं ते ब्रुवतः सर्वे सम्पत्स्यन्ते मनोरथाः ।
मिथ्या च ब्रुवतो मूर्धा शतधा ते स्फुटिष्यति ॥ २ ॥
यदि सच-सच बता दोगे तो तुम्हारे सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ २ ॥
मरुत्त उवाच
नारदेन भवान् मह्यमाख्यातो ह्यटता पथि ।
गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा ॥ ३ ॥
मरुत्तने कहा— मुने! भ्रमणशील नारदजीने रास्तेमें मुझे आपका परिचय दिया और पता बताया। आप मेरे गुरु अंगिराके पुत्र हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ३ ॥
संवर्त उवाच
सत्यमेतद् भवानाह स मां जानाति सत्रिणम् ।
कथयस्व तदेतन्मे क्व नु सम्प्रति नारदः ॥ ४ ॥
संवर्त बोले— राजन्! तुम ठीक कहते हो, नारदको यह मालूम है कि मैं यज्ञ कराना जानता हूँ और गुप्त वेषमें घूम रहा हूँ। अच्छा यह तो बताओ, इस समय नारद कहाँ हैं? ॥ ४ ॥
मरुत्त उवाच
भवन्तं कथयित्वा तु मम देवर्षिसत्तमः ।
ततो मामभ्यनुज्ञाय प्रविष्टो हव्यवाहनम् ॥ ५ ॥
मरुत्तने कहा— मुने! मुझे आपका परिचय और पता बताकर देवर्षिशिरोमणि नारद मुझे जानेकी आज्ञा दे स्वयं अग्निमें प्रवेश कर गये थे ॥ ५ ॥
व्यास उवाच
श्रुत्वा तु पार्थिवस्यैतत् संवर्तः प्रमुदं गतः । एतावदहमप्येवं शक्नुयामिति सोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥ व्यासजी कहते हैं— राजन्! राजाकी यह बात सुनकर संवर्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और बोले— 'इतना तो मैं भी कर सकता हूँ' ॥ ६ ॥ ततो मरुत्तमुन्मत्तो वाचा निर्भर्त्सयन्निव । रूक्षया ब्राह्मणो राजन् पुनः पुनरथाब्रवीत् ॥ ७ ॥ राजन्! वे उन्मत्त वेषधारी ब्राह्मण देवता मरुत्तको अपनी रूखी वाणीद्वारा बारंबार फटकारते हुए-से बोले— ॥ ७ ॥ वातप्रधानेन मया स्वचित्तवशवर्तिना । एवं विकृतरूपेण कथं याजितुमिच्छसि ॥ ८ ॥ ‘नरेश्वर! मैं तो वायु-प्रधान—बावला हूँ, अपने मनकी मौजसे ही सब काम करता हूँ, मेरा रूप भी विकृत है। अतः मुझ-जैसे व्यक्तिसे तुम क्यों यज्ञ कराना चाहते हो? ॥ ८ ॥ भ्राता मम समर्थश्च वासवेन च संगतः । वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय ॥ ९ ॥ ‘मेरे भाई बृहस्पति इस कार्यमें पूर्णतः समर्थ हैं। आजकल इन्द्रके साथ उनका मेलजोल बढ़ा हुआ है। वे उनके यज्ञ करानेमें लगे रहते हैं। अतः उन्हींसे अपने सारे यज्ञकर्म कराओ ॥ ९ ॥ गार्हस्थ्यं चैव याज्याश्च सर्वा गृह्याश्च देवताः । पूर्वजेन ममाक्षिप्तं शरीरं वर्जितं त्विदम् ॥ १० ॥ ‘घर-गृहस्थीका सारा सामान, यजमान तथा गृहदेवताओंके पूजन आदि कर्म—इन सबको इस समय मेरे बड़े भाईने अपने अधिकारमें कर लिया है। मेरे पास तो केवल मेरा एक शरीर ही छोड़ रखा है ॥ १० ॥ नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कर्हिचित् । याजयेयं कथंचिद् वै स हि पूज्यतमो मम ॥ ११ ॥ ‘आविक्षित्-कुमार! मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना कभी किसी तरह भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता; क्योंकि वे मेरे परम पूजनीय भाई हैं ॥ ११ ॥ स त्वं बृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज । ततोऽहं याजयिष्ये त्वां यदि यष्टुमिहेच्छसि ॥ १२ ॥ ‘अतः तुम बृहस्पतिके पास जाओ और उनकी आज्ञा लेकर आओ। उस दशामें यदि तुम यज्ञ कराना चाहो तो मैं यज्ञ करा दूँगा' ॥ १२ ॥
मरुत्त उवाच
बृहस्पतिं गतः पूर्वमहं संवर्त तच्छृणु ।
न मां कामयते याज्यमसौ वासवकाम्यया ॥ १३ ॥
मरुत्तने कहा—संवर्तजी! मैं पहले बृहस्पतिजीके ही पास गया था। वहाँका समाचार बताता हूँ, सुनिये। वे इन्द्रको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे अब मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते हैं ॥ १३ ॥
अमरं याज्यमासाद्य याजयिष्ये न मानुषम् ।
शक्रेण प्रतिषिद्धोऽहं मरुत्तं मा स्म याजयेः ॥ १४ ॥
स्पर्धते हि मया विप्र सदा हि स तु पार्थिवः ।
एवमस्त्विति चाप्युक्तो भ्रात्रा ते बलसूदनः ॥ १५ ॥
उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि 'अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ नहीं कराऊँगा।' साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि 'आप मरुत्तका यज्ञ न कराइयेगा; क्योंकि ब्रह्मन्! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है।' इन्द्रकी इस बातको आपके भाईने 'एवमस्तु' कहकर स्वीकार कर लिया है ॥ १४-१५ ॥
स मामधिगतं प्रेम्णा याज्यत्वेन बुभूषति ।
देवराजं समाश्रित्य तद् विद्धि मुनिपुङ्गव ॥ १६ ॥
मुनिप्रवर! मैं बड़े प्रेमसे उनके पास गया था; परंतु वे देवराज इन्द्रका आश्रय लेकर मुझे अपना यजमान बनाना ही नहीं चाहते हैं। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें ॥ १६ ॥
सोऽहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् ।
कामये समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ॥ १७ ॥
अतः मेरी इच्छा यह है कि मैं सर्वस्व देकर भी आपसे ही यज्ञ कराऊँ और आपके द्वारा सम्पादित गुणोंके प्रभावसे इन्द्रको भी मात कर दूँ ॥ १७ ॥
न हि मे वर्तते बुद्धिर्गन्तुं ब्रह्मन् बृहस्पतिम् ।
प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथानपकृते सति ॥ १८ ॥
ब्रह्मन्! अब बृहस्पतिके पास जानेका मेरा विचार नहीं है; क्योंकि बिना अपराधके ही उन्होंने मेरी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी है ॥ १८ ॥
संवर्त उवाच
चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत् त्वयि ध्रुवम् ।
यदि सर्वानभिप्रायन् कर्तासि मम पार्थिव ॥ १९ ॥
संवर्तने कहा—पृथ्वीनाथ! यदि मेरी इच्छाके अनुसार काम करो तो तुम जो कुछ चाहोगे, वह निश्चय ही पूर्ण होगा ॥ १९ ॥
याज्यमानं मया हि त्वां बृहस्पतिपुरन्दरौ ।
द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेकं समर्थसेः ॥ २० ॥
जब मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा, तब बृहस्पति और इन्द्र दोनों ही कुपित होकर मेरे साथ द्वेष करेंगे। उस समय तुम्हें मेरे पक्षका समर्थन करना होगा ॥ २० ॥
स्थैर्यमत्र कथं मे स्यात् सत्त्वं निःसंशयं कुरु । कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्यां सबान्धवम् ॥ २१ ॥
परंतु इस बातका मुझे विश्वास कैसे हो कि तुम मेरा साथ दोगे। अतः जैसे भी हो, मेरे मनका संशय दूर हो; नहीं तो अभी क्रोधमें भरकर मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें भस्म कर डालूँगा ॥ २१ ॥
मरुत्त उवाच
यावत् तपेत् सहस्रांशुस्तिष्ठेरंश्चापि पर्वताः । तावल्लोकान्न लभेयं त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २२ ॥
**मरुत्तने कहा—**ब्रह्मन्! यदि मैं आपका साथ छोड़ दूँ तो जबतक सूर्य तपते हों और जबतक पर्वत स्थिर रहें तबतक मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति न हो ॥ २२ ॥
मा चापि शुभबुद्धित्वं लभेयमिह कर्हिचित् । विषयैः सङ्गतं चास्तु त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २३ ॥
यदि आपका साथ छोड़ दूँ तो मुझे संसारमें शुभ बुद्धि कभी न प्राप्त हो और मैं सदा विषयोंमें ही रचा-पचा रह जाऊँ ॥ २३ ॥
संवर्त उवाच
आविक्षित शुभा बुद्धिवर्ततां तव कर्मसु । याजनं हि ममाप्येव वर्तते हृदि पार्थिव ॥ २४ ॥
**संवर्तने कहा—**अविक्षित्-कुमार! तुम्हारी शुभ बुद्धि सदा सत्कर्मोंमें ही लगी रहे। पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें भी तुम्हारा यज्ञ करानेकी इच्छा तो है ही ॥ २४ ॥
अभिधास्ये च ते राजन्नक्षयं द्रव्यमुत्तमम् । येन देवान् सगन्धर्वान् शक्रं चाभिभविष्यसि ॥ २५ ॥
राजन्! इसके लिये मैं तुम्हें परम उत्तम अक्षय धनकी प्राप्तिका उपाय बतलाऊँगा, जिससे तुम गन्धर्वों-सहित सम्पूर्ण देवताओं तथा इन्द्रको भी नीचा दिखा सकोगे ॥ २५ ॥
न तु मे वर्तते बुद्धिर्धने याज्येषु वा पुनः । विप्रियं तु करिष्यामि भ्रातुश्चेन्द्रस्य चोभयोः ॥ २६ ॥
मुझको अपने लिये धन अथवा यजमानोंके संग्रहका विचार नहीं है। मुझे तो भाई बृहस्पति और इन्द्र दोनोंके विरुद्ध कार्य करना है ॥ २६ ॥
गमयिष्यामि शक्रेण समतामपि ते ध्रुवम् । प्रियं च ते करिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥
निश्चय ही मैं तुम्हें इन्द्रकी बराबरीमें बैठाऊँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। मैं यह बात तुमसे सत्य कहता हूँ॥ २७॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७॥
गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्जवान् नाम पर्वत: ।
अष्टमोऽध्यायः
संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना
संवर्त उवाच
गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्जवान् नाम पर्वत: ।
तप्यते यत्र भगवांस्तपो नित्यमुमापतिः ॥ १ ॥
संवर्तने कहा— राजन! हिमालयके पृष्ठभागमें मुञ्जवान् नामक एक पर्वत है, जहाँ उमावल्लभ भगवान् शंकर सदा तपस्या किया करते हैं ॥ १ ॥
वनस्पतीनां मूलेषु शृङ्गेषु विषमेषु च ।
गुहासु शैलराजस्य यथाकामं यथासुखम् ॥ २ ॥
उमासहायो भगवान् यत्र नित्यं महेश्वरः ।
आस्ते शूली महातेजा नानाभूतगणावृतः ॥ ३ ॥
वहाँ वनस्पतियोंके मूलभागमें, दुर्गम शिखरोंपर तथा गिरिराजकी गुफाओंमें नाना प्रकारके भूतगणोंसे घिरे हुए महातेजस्वी त्रिशूलधारी भगवान् महेश्वर उमादेवीके साथ इच्छानुसार सुखपूर्वक सदा निवास करते हैं ॥ २-३ ॥
तत्र रुद्राश्च साध्याश्च विश्वेऽथ वसवस्तथा ।
यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च सहानुगः ॥ ४ ॥
भूतानि च पिशाचाश्च नासत्यावपि चाश्विनौ ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा देवर्षयस्तथा ॥ ५ ॥
आदित्या मरुतश्चैव यातुधानाश्च सर्वशः ।
उपासन्ते महात्मानं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ६ ॥
उस पर्वतपर रुद्रगण, साध्यगण, विश्वेदेवगण, वसुगण, यमराज, वरुण, अनुचरोंसहित कुबेर, भूत, पिशाच, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, देवर्षि, आदित्यगण, मरुद्गण तथा यातुधानगण अनेक रूपधारी उमावल्लभ परमात्मा शिवकी सब प्रकारसे उपासना करते हैं ॥ ४—६ ॥
रमते भगवांस्तत्र कुबेरानुचरैः सह ।
विकृतैर्विकृताकारैः क्रीडद्भिः पृथिवीपते ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! वहाँ विकराल आकार और विकृत वेशवाले कुबेर-सेवक यक्ष भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते हैं और उनके साथ भगवान् शिव आनन्दपूर्वक रहते हैं ॥ ७ ॥
श्रिया ज्वलन् दृश्यते वै बालादित्यसमद्युतिः ।
न रूपं शक्यते तस्य संस्थानं वा कदाचन ॥ ८ ॥
निर्देष्टुं प्राणिभिः कैश्चित् प्राकृतैर्मांसलोचनैः ।
उनका श्रीविग्रह प्रभातकालके सूर्यकी भाँति तेजसे जाज्वल्यमान दिखायी देता है। संसारके कोई भी प्राकृत प्राणी अपने मांसमय नेत्रोंसे उनके रूप या आकारको कभी देख नहीं सकते ॥ ८ १/२ ॥
नोष्णं न शिशिरं तत्र न वायुर्न च भास्करः ॥ ९ ॥
न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्न भयं नृप ।
वहाँ न अधिक गर्मी पड़ती है न विशेष ठंडक, न वायुका प्रकोप होता है न सूर्यके प्रचण्ड तापका। नरेश्वर! उस पर्वतपर न तो भूख सताती है न प्यास, न बुढ़ापा आता है न मृत्यु। वहाँ दूसरा कोई भय भी नहीं प्राप्त होता है ॥ ९ १/२ ॥
तस्य शैलस्य पार्श्वेषु सर्वेषु जयतां वर ॥ १० ॥
धातवो जातरूपस्य रश्मयः सवितुर्यथा ।
रक्ष्यन्ते ते कुबेरस्य सहायैरुद्यतायुधैः ॥ ११ ॥
चिकीर्षद्भिः प्रियं राजन् कुबेरस्य महात्मनः ।
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! उस पर्वतके चारों ओर सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान सुवर्णकी खानें हैं। राजन्! अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित कुबेरके अनुचर अपने स्वामी महात्मा कुबेरका प्रिय करनेकी इच्छासे उन खानोंकी रक्षा करते हैं ॥ १०-११ १/२ ॥
(तत्र गत्वा त्वमन्वास्य महायोगेश्वरं शिवम् ।
कुरु प्रणामं राजर्षे भक्त्या परमया युतः ॥)
राजर्षे! वहाँ जाकर तुम परम भक्तिभावसे युक्त हो महायोगेश्वर शिवको प्रणाम करो ॥
तस्मै भगवते कृत्वा नमः शर्वाय वेधसे ॥ १२ ॥
(एभिस्तं नामभिर्देवं सर्वविद्याधरं स्तुहि)
जगत्स्रष्टा भगवान् शंकरको नमस्कार करके समस्त विद्याओंको धारण करनेवाले उन महादेवजीकी तुम इन निम्नांकित नामोंद्वारा स्तुति करो ॥ १२ ॥
रुद्राय शितिकण्ठाय पुरुषाय सुवर्चसे ।
कपर्दिने करालाय हर्यक्षणे वरदाय च ॥ १३ ॥
त्र्यक्षणे पूष्णो दन्तभिदे वामनाय शिवाय च ।
याम्यायाव्यक्तरूपाय सद्वृत्ते शङ्कराय च ॥ १४ ॥
क्षेम्याय हरिकेशाय स्थाणवे पुरुषाय च ।
हरिनेत्राय मुण्डाय क्रुद्धायोत्तरणाय च ॥ १५ ॥
भास्कराय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे ।
उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे ॥ १६ ॥
गिरिशाय प्रशान्ताय यतये चीरवाससे । बिल्वदण्डाय सिद्धाय सर्वदण्डधराय च ॥ १७ ॥ मृगव्याधाय महते धन्विनेऽथ भवाय च । वराय सोमवक्त्राय सिद्धमन्त्राय चक्षुषे ॥ १८ ॥ हिरण्यबाहवे राजन्नुग्राय पतये दिशाम् । लेलिहानाय गोष्ठाय सिद्धमन्त्राय वृष्णये ॥ १९ ॥ पशूनां पतये चैव भूतानां पतये नमः । वृषाय मातृभक्ताय सेनान्ये मध्यमाय च ॥ २० ॥ सुहस्ताय पतये धन्विने भार्गवाय च । अजाय कृष्णनेत्राय विरूपाक्षाय चैव ह ॥ २१ ॥ तीक्ष्णदंष्ट्राय तीक्ष्णाय वैश्वानरमुखाय च । महाद्युतयेऽनङ्गाय सर्वाय पतये विशाम् ॥ २२ ॥ विलोहिताय दीप्ताय दीप्ताक्षाय महौजसे । वसुरेतःसुवपुषे पृथवे कृत्तिवाससे ॥ २३ ॥ कपालमालिने चैव सुवर्णमुकुटाय च । महादेवाय कृष्णाय त्र्यम्बकायानघाय च ॥ २४ ॥ क्रोधनायानृशंसाय मृदवे बाहुशालिने । दण्डिने तप्ततपसे तथैवाक्रूरकर्मणे ॥ २५ ॥ सहस्रशिरसे चैव सहस्रचरणाय च । नमः स्वधास्वरूपाय बहुरूपाय दंष्ट्रिणे ॥ २६ ॥
‘भगवन्! आप रुद्र (दुःखके कारणको दूर करनेवाले), शितिकण्ठ (गलेमें नील चिह्न धारण करनेवाले), पुरुष (अन्तर्यामी), सुवर्चा (अत्यन्त तेजस्वी), कपर्दी (जटा-जूटधारी), कराल (भयंकर रूपवाले), हर्यक्ष (हरे नेत्रोंवाले), वरद (भक्तोंको अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले), त्र्यक्ष (त्रिनेत्रधारी), पूषाके दाँत उखाड़नेवाले, वामन, शिव, याम्य (यमराजके गणस्वरूप), अव्यक्तरूप, सद्वृत्त (सदाचारी), शंकर, क्षेम्य (कल्याणकारी), हरिकेश (भूरे केशोंवाले), स्थाणु (स्थिर), पुरुष, हरिनेत्र, मुण्ड, क्रुद्ध, उत्तरण (संसार-सागरसे पार उतरनेवाले), भास्कर (सूर्यरूप), सुतीर्थ (पवित्र तीर्थरूप), देवदेव, रंहस (वेगवान्), उष्णीषी (सिरपर पगड़ी धारण करनेवाले), सुवक्त्र (सुन्दर मुखवाले), सहस्राक्ष (हजारों नेत्रोंवाले), मीढ्वान् (कामपूरक), गिरिश (पर्वतपर शयन करनेवाले), प्रशान्त, यति (संयमी), चीरवासा (चीरवस्त्र धारण करनेवाले), विल्वदण्ड (बेलका डंडा धारण करनेवाले), सिद्ध, सर्वदण्डधर (सबको दण्ड देनेवाले), मृगव्याध (आर्द्रा-नक्षत्रस्वरूप), महान्, धन्वी (पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले), भव (संसारकी उत्पत्ति करनेवाले), वर (श्रेष्ठ), सोमवक्त्र (चन्द्रमाके समान मुखवाले), सिद्धमन्त्र (जिन्होंने सभी मन्त्र सिद्ध
कर लिया है ऐसे), चक्षुष (नेत्ररूप), हिरण्यबाहु (सुवर्णके समान सुन्दर भुजाओंवाले), उग्र (भयंकर), दिशाओंके पति, लेलिहान (अग्निरूपसे अपनी जिह्वाओंके द्वारा हविष्यका आस्वादन करनेवाले), गोष्ठ (वाणीके निवासस्थान), सिद्धमन्त्र, वृष्णि (कामनाओंकी वृष्टि करनेवाले), पशुपति, भूतपति, वृष (धर्मस्वरूप), मातृभक्त, सेनानी (कार्तिकेय रूप), मध्यम, सुवहस्त (हाथमें सुवा ग्रहण करनेवाले ऋत्विज्रूप), पति (सबका पालन करनेवाले), धन्वी, भार्गव, अज (जन्मरहित), कृष्णनेत्र, विरूपाक्ष, तीक्ष्णदंष्ट्र, तीक्ष्ण, वैश्वानरमुख (अग्निरूप मुखवाले), महाद्युति, अनंग (निराकार), सर्व, विशाम्पति (सबके स्वामी), विलोहित (रक्तवर्ण), दीप्त (तेजस्वी), दीप्ताक्ष (देदीप्यमान नेत्रोंवाले), महौजा (महाबली), वसुरेता (हिरण्यवीर्य अग्निरूप), सुवपुष् (सुन्दर शरीरवाले), पृथु (स्थूल), कृत्तिवासा (मृगचर्म धारण करनेवाले), कपालमाली (मुण्डमाला धारण करनेवाले), सुवर्णमुकुट, महादेव, कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप), त्र्यम्बक (त्रिनेत्रधारी), अनघ (निष्पाप), क्रोधन (दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले), अनृशंस (कोमल स्वभाववाले), मृदु, बाहुशाली, दण्डी, तेज तप करनेवाले, कोमल कर्म करनेवाले, सहस्रशिरा (हजारों मस्तकवाले), सहस्रचरण, स्वधास्वरूप, बहुरूप और दंष्ट्री नाम धारण करनेवाले हैं। आपको मेरा प्रणाम है ॥ १३—२६ ॥
पिनाकिनं महादेवं महायोगिनमव्ययम् । त्रिशूलहस्तं वरदं त्र्यम्बकं भुवनेश्वरम् ॥ २७ ॥ त्रिपुरघ्नं त्रिनयनं त्रिलोकेशं महौजसम् । प्रभवं सर्वभूतानां धारणं धरणीधरम् ॥ २८ ॥ ईशानं शङ्करं सर्वं शिवं विश्वेश्वरं भवम् । उमापतिं पशुपतिं विश्वरूपं महेश्वरम् ॥ २९ ॥ विरूपाक्षं दशभुजं दिव्यगोवृषभध्वजम् । उग्रं स्थाणुं शिवं रौद्रं शर्वं गौरीशमीश्वरम् ॥ ३० ॥ शितिकण्ठमजं शुक्लं पृथुं पृथुहरं वरम् । विश्वरूपं विरूपाक्षं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ३१ ॥ प्रणम्य शिरसा देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् । शरण्यं शरणं याहि महादेवं चतुर्मुखम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार उन पिनाकधारी, महादेव, महायोगी, अविनाशी, हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले, वरदायक, त्र्यम्बक, भुवनेश्वर, त्रिपुरासुरको मारनेवाले, त्रिनेत्रधारी, त्रिभुवनके स्वामी, महान् बलवान्, सब जीवोंकी उत्पत्तिके कारण, सबको धारण करनेवाले, पृथ्वीका भार सँभालनेवाले, जगत्के शासक, कल्याणकारी, सर्वरूप, शिव, विश्वेश्वर, जगत्को उत्पन्न करनेवाले, पार्वतीके पति, पशुओंके पालक, विश्वरूप, महेश्वर, विरूपाक्ष, दस भुजाधारी, अपनी ध्वजामें दिव्य वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र,
शर्व, गौरीश, ईश्वर, शितिकण्ठ, अजन्मा, शुक्र, पृथु, पृथुहर, वर, विश्वरूप, विरूपाक्ष, बहुरूप, उमापति, कामदेवको भस्म करनेवाले, हर, चतुर्मुख एवं शरणागतवत्सल महादेवजीको सिरसे प्रणाम करके उनके शरणापन्न हो जाना ॥ २७—३२ ॥ (विरोचमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् । अनाद्यन्तमजं शम्भुं सर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥ निस्त्रैगुण्यं निरुद्वेगं निर्मलं निधिमोजसाम् । प्रणम्य प्राञ्जलिः शर्वं प्रयामि शरणं हरम् ॥ (और इस प्रकार स्तुति करना)—जो अपने तेजस्वी श्रीविग्रहसे प्रकाशित हो रहे हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं, आदि-अन्तसे रहित, अजन्मा, शम्भु, सर्वव्यापी, ईश्वर, त्रिगुणरहित, उद्वेगशून्य, निर्मल, ओज एवं तेजकी निधि एवं सबके पाप और दुःखको हर लेनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको हाथ जोड़ प्रणाम करके मैं उनकी शरणमें जाता हूँ ॥ सम्मान्यं निश्चलं नित्यमकारणमलेपनम् । अध्यात्मवेदमासाद्य प्रयामि शरणं मुहुः ॥ जो सम्माननीय, निश्चल, नित्य, कारणरहित, निर्लेप और अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता हैं, उन भगवान् शिवके निकट पहुँचकर मैं बारंबार उन्हींकी शरणमें जाता हूँ ॥ यस्य नित्यं विदुः स्थानं मोक्षमध्यात्मचिन्तकाः । योगिनस्तत्त्वमार्गस्थाः कैवल्यं पदमक्षरम् ॥ यं विदुः सङ्गनिर्मुक्ताः सामान्यं समदर्शिनः । तं प्रपद्ये जगद्योनिमयोनिं निर्गुणात्मकम् ॥ अध्यात्मतत्त्वका विचार करनेवाले ज्ञानी पुरुष मोक्षतत्त्वमें जिनकी स्थिति मानते हैं तथा तत्त्वमार्गमें परिनिष्ठित योगीजन अविनाशी कैवल्य पदको जिनका स्वरूप समझते हैं और आसक्तिशून्य समदर्शी महात्मा जिन्हें सर्वत्र समानरूपसे स्थित समझते हैं, उन योनिरहित जगत्कारणभूत निर्गुण परमात्मा शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ असृजद् यस्तु भूरादीन् सप्तलोकान् सनातनान् । स्थितः सत्योपरि स्थाणुं तं प्रपद्ये सनातनम् ॥ जिन्होंने सत्यलोकके ऊपर स्थित होकर भू आदि सात सनातन लोकोंकी सृष्टि की है, उन स्थाणुरूप सनातन शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ भक्तानां सुलभं तं हि दुर्लभं दूरपातिनाम् । अदूरस्थममुं देवं प्रकृतेः परतः स्थितम् ॥ नमामि सर्वलोकस्थं व्रजामि शरणं शिवम् ।) जो भक्तोंके लिये सुलभ और दूर (विमुख) रहनेवाले लोगोंके लिये दुर्लभ हैं, जो सबके निकट और प्रकृतिसे परे विराजमान हैं, उन सर्वलोकव्यापी महादेव शिवको मैं नमस्कार करता और उनकी शरण लेता हूँ ॥
एवं कृत्वा नमस्तस्मै महादेवाय रंहसे । महात्मने क्षितिपते तत्सुवर्णमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार वेगशाली महात्मा महादेवजीको नमस्कार करके तुम वह सुवर्ण-राशि प्राप्त कर लोगे ॥ ३३ ॥ (लभन्ते गाणपत्यं च तदेकाग्रा हि मानवाः । किं पुनः स्वर्णभाण्डानि तस्मात् त्वं गच्छ मा चिरम् ॥ महत्तरं हि ते लाभं हस्त्यश्वोष्ट्रादिभिः सह ।) जो लोग भगवान् शंकरमें अपने मनको एकाग्र करते हैं, वे तो गणपति-पदको भी प्राप्त कर लेते हैं, फिर सुवर्णमय पात्र पा लेना कौन बड़ी बात है। अतः तुम शीघ्र वहाँ जाओ, विलम्ब न करो। हाथी, घोड़े और ऊँट आदिके साथ तुम्हें वहाँ महान् लाभ प्राप्त होगा ।। सुवर्णमाहरिष्यन्तस्तत्र गच्छन्तु ते नराः । इत्युक्तः स वचस्तेन चक्रे कारन्धमात्मजः ॥ ३४ ॥ तुम्हारे सेवकलोग सुवर्ण लानेके लिये वहाँ जायँ। उनके ऐसा कहनेपर करन्धमके पौत्र मरुत्तने वैसा ही किया ॥ ३४ ॥ (गङ्गाधरं नमस्कृत्य लब्धवान् धनमुत्तमम् । कुबेर इव तत् प्राप्य महादेवप्रसादतः ॥ शालाश्च सर्वसम्भारस्ततः संवर्तशासनात् ।) उन्होंने गंगाधर महादेवजीको नमस्कार करके उनकी कृपासे कुबेरकी भाँति उत्तम धन प्राप्त कर लिया। उस धनको पाकर संवर्तकी आज्ञासे उन्होंने यज्ञशालाओं तथा अन्य सब सम्भारोंका आयोजन किया ॥ ततोऽतिमानुषं सर्वं चक्रे यज्ञस्य संविधिम् । सौवर्णानि च भाण्डानि संचक्रुस्तत्र शिल्पिनः ॥ ३५ ॥ तदनन्तर राजाने अलौकिकरूपसे यज्ञकी सारी तैयारी आरम्भ की। उनके कारीगरोंने वहाँ रहकर सोनेके बहुत-से पात्र तैयार किये ॥ ३५ ॥ बृहस्पतिस्तु तां श्रुत्वा मरुत्तस्य महीपतेः । समृद्धिमतिदेवेभ्यः संतापमकरोद् भृशम् ॥ ३६ ॥ उधर बृहस्पतिने जब सुना कि राजा मरुत्तको देवताओंसे भी बढ़कर सम्पत्ति प्राप्त हुई है, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ ॥ ३६ ॥ स तप्यमानो वैवर्ण्यं कृशत्वं चागमत् परम् । भविष्यति हि मे शत्रुः संवर्तो वसुमानिति ॥ ३७ ॥ वे चिन्ताके मारे पीले पड़ गये और यह सोचकर कि 'मेरा शत्रु संवर्त बहुत धनी हो जायगा' उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया ॥ ३७ ॥ तं श्रुत्वा भृशसंतप्तं देवराजो बृहस्पतिम् ।