महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यदुश्रेष्ठ! पत्नीसहित महादेवजीसे आप सोलह और आठ वर प्राप्त करेंगे। यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३७३ ॥
अतीतानागतं चैव वर्तमानं च नित्यशः ।
विदितं मे महाबाहो प्रसादात् तस्य धीमतः ॥ ३७४ ॥
महाबाहो! बुद्धिमान् महादेवजीके कृपा-प्रसादसे मुझे सदा ही भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालका ज्ञान प्राप्त है ॥ ३७४ ॥
एतान् सहस्रशश्चान्यान् समनुध्यातवान् हरः ।
कस्मात् प्रसादं भगवान् न कुर्यात् तव माधव ॥ ३७५ ॥
माधव! भगवान् हरने यहाँ रहनेवाले इन सहस्रों मुनियोंको कृपापूर्ण हृदयसे अनुगृहीत किया है। फिर आपपर वे अपना कृपाप्रसाद क्यों नहीं प्रकट करेंगे ॥ ३७५ ॥
त्वादृशेन हि देवानां श्लाघनीयः समागमः ।
ब्रह्मण्येनानृशंसेन श्रद्दधानेन चाप्युत ॥ ३७६ ॥
जप्यं तु ते प्रदास्यामि येन द्रक्ष्यसि शंकरम् ।
आप-जैसे ब्राह्मणभक्त, कोमलस्वभाव और श्रद्धालु पुरुषका समागम देवताओंके लिये भी प्रशंसनीय है। मैं आपको जपनेयोग्य मन्त्र प्रदान करूँगा, जिससे आप भगवान् शंकरका दर्शन करेंगे ॥ ३७६ १/२ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
अब्रुवं तमहं ब्रह्मंस्त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ ३७७ ॥
द्रक्ष्ये दितिजसंघानां मर्दनं त्रिदशेश्वरम् ।
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**तब मैंने उनसे कहा—ब्रह्मन्! महामुने! मैं आपके कृपाप्रसादसे दैत्यदलोंका दलन करनेवाले देवेश्वर महादेवजीका दर्शन अवश्य करूँगा ॥ ३७७ १/२ ॥
एवं कथयतस्तस्य महादेवाश्रितां कथाम् ॥ ३७८ ॥
दिनान्यष्टौ ततो जग्मुर्मुहूर्तमिव भारत ।
दिनेऽष्टमे तु विप्रेण दीक्षितोऽहं यथाविधि ॥ ३७९ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार महादेवजीकी महिमासे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कहते हुए उन मुनीश्वरके आठ दिन एक मुहूर्तके समान बीत गये। आठवें दिन विप्रवर उपमन्युने विधिपूर्वक मुझे दीक्षा दी ॥
दण्डी मुण्डी कुशी चीरी घृताक्तो मेखली कृतः ।
मासमेकं फलाहारो द्वितीयं सलिलाशनः ॥ ३८० ॥
उन्होंने मेरा सिर मुड़ा दिया। मेरे शरीरमें घी लगाया तथा मुझसे दण्ड, कुशा, चीर एवं मेखला धारण कराया। मैं एक महीनेतक फलाहार करके रहा और दूसरे महीनेमें केवल जलका आहार किया ॥ ३८० ॥
तृतीयं च चतुर्थं च पञ्चमं चानिलाशनः । एकपादेन तिष्ठंश्च ऊर्ध्वबाहुरतन्द्रितः ॥ ३८१ ॥ तीसरे, चौथे और पाँचवें महीनेमें मैं दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा रहा। आलस्यको अपने पास नहीं आने दिया। उन दिनों वायुमात्र ही मेरा आहार रहा ॥ ३८१ ॥
तेजः सूर्यसहस्रस्य अपश्यं दिवि भारत । तस्य मध्यगतं चापि तेजसः पाण्डुनन्दन ॥ ३८२ ॥ इन्द्रायुधपिनद्धाङ्गं विद्युन्मालागवाक्षकम् । नीलशैलचयप्रख्यं वलाकाभूषिताम्बरम् ॥ ३८३ ॥ भारत! पाण्डुनन्दन! छठे महीनेमें आकाशके भीतर मुझे सहस्रों सूर्योंका-सा तेज दिखायी दिया। उस तेजके भीतर एक और तेजोमण्डल दृष्टिगोचर हुआ, जिसका सर्वांग इन्द्रधनुषसे परिवेष्टित था। विद्युन्माला उसमें झरोखेके समान प्रतीत होती थी। वह तेज नील पर्वतमालाके समान प्रकाशित होता था। उस द्विविध तेजके कारण वहाँका आकाश बकपंक्यितोंसे विभूषित-सा जान पड़ता था ॥ ३८२-३८३ ॥
तत्र स्थितश्च भगवान् देव्या सह महाद्युतिः । तपसा तेजसा कान्त्या दीप्तया सह भार्यया ॥ ३८४ ॥ उस नील तेजके भीतर महातेजस्वी भगवान् शिव तप, तेज, कान्ति तथा अपनी तेजस्विनी पत्नी उमादेवीके साथ विराजमान थे ॥ ३८४ ॥
रराज भगवांस्तत्र देव्या सह महेश्वरः । सोमेन सहितः सूर्यो यथा मेघस्थितस्तथा ॥ ३८५ ॥ उस नील तेजमें पार्वती देवीके साथ स्थित हुए भगवान् महेश्वर ऐसी शोभा पा रहे थे मानो चन्द्रमाके साथ सूर्य श्याम मेघके भीतर विराज रहे हों ॥ ३८५ ॥
संहृष्टरोमा कौन्तेय विस्मयोत्फुल्ललोचनः । अपश्यं देवसंघानां गतिमार्तिहरं हरम् ॥ ३८६ ॥ कुन्तीनन्दन! जो सम्पूर्ण देवसमुदायकी गति हैं तथा सबकी पीड़ा हर लेते हैं, उन भगवान् हरको जब मैंने देखा, तब मेरे रोंगटे खड़े हो गये और मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे ॥ ३८६ ॥
किरीटिनं गदिनं शूलपाणिं व्याघ्राजिनं जटिलं दण्डपाणिम् । पिनाकिनं वज्रिणं तीक्ष्णदंष्ट्रं शुभाङ्गदं व्यालयज्ञोपवीतम् ॥ ३८७ ॥ भगवान्के मस्तकपर मुकुट था। उनके हाथमें गदा, त्रिशूल और दण्ड शोभा पाते थे। सिरपर जटा थी। उन्होंने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा था। पिनाक और वज्र भी उनकी शोभा
बढ़ा रहे थे। उनकी दाढ़ तीखी थी। उन्होंने सुन्दर बाजूबंद पहनकर सर्पमय यज्ञोपवीत धारण कर रखा था॥ ३८७॥
दिव्यां मालामुरसानेकवर्णां
समुद्वहन्तं गुल्फदेशावलम्बाम्।
चन्द्रं यथा परिविष्टं ससंध्यं
वर्षात्यये तद्वदपश्यमेनम्॥ ३८८॥
वे अपने वक्षःस्थलपर अनेक रंगवाली दिव्य माला धारण किये हुए थे, जो गुल्फदेश (घुटनों)-तक लटक रही थी। जैसे शरद्ऋतुमें संध्याकी लालीसे युक्त और घेरेसे घिरे हुए चन्द्रमाका दर्शन होता हो, उसी प्रकार मैंने मालावेष्टित उन भगवान् महादेवजीका दर्शन किया था॥ ३८८॥
प्रमथानां गणैश्चैव समन्तात् परिवारितम्।
शरदीव सुदुष्प्रेक्ष्यं परिविष्टं दिवाकरम्॥ ३८९॥
प्रमथगणोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए महातेजस्वी महादेव परिधिसे घिरे हुए शरत्कालके सूर्यकी भाँति बड़ी कठिनाईसे देखे जाते थे॥ ३८९॥
एकादशशतान्येवं रुद्राणां वृषवाहनम्।
अस्तुवं नियतात्मानं कर्मभिः शुभकर्मिणम्॥ ३९०॥
इस प्रकार मनको वशमें रखनेवाले और कर्मेन्द्रियोंद्वारा शुभकर्मका ही अनुष्ठान करनेवाले महादेवजीकी, जो ग्यारह सौ रुद्रोंसे घिरे हुए थे, मैंने स्तुति की॥ ३९०॥
आदित्या बसवः साध्या विश्वेदेवास्तथाश्विनौ।
विश्वाभिः स्तुतिभिर्देवं विश्वदेवं समस्तुवन्॥ ३९१॥
बारह आदित्य, आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव तथा अश्विनीकुमार—ये भी सम्पूर्ण स्तुतियोंद्वारा सबके देवता महादेवजीकी स्तुति कर रहे थे॥ ३९१॥
शतक्रतुश्च भगवान् विष्णुश्चादितिनन्दनौ।
ब्रह्मा रथन्तरं साम ईरयन्ति भवान्तिके॥ ३९२॥
इन्द्र तथा वामनरूपधारी भगवान् विष्णु—ये दोनों अदितिकुमार और ब्रह्माजी भगवान् शिवके निकट रथन्तर सामका गान कर रहे थे॥ ३९२॥
योगीश्वराः सुबहवो योगदं पितरं गुरुम्।
ब्रह्मर्षयश्च ससुतास्तथा देवर्षयश्च वै॥ ३९३॥
बहुत-से योगीश्वर, पुत्रोंसहित ब्रह्मर्षि तथा देवर्षिगण भी योगसिद्धि प्रदान करनेवाले, पिता एवं गुरुरूप महादेवजीकी स्तुति करते थे॥ ३९३॥
(महाभूतानि च्छन्दांसि प्रजानां पतयो मखाः।
सरितः सागरा नागा गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥
विद्याधराश्च गीतेन वाद्यनृत्तादिणार्चयन्।
तेजस्विनां मध्यगतं तेजोरार्शिं जगत्पतिम् ।।) महाभूत, छन्द, प्रजापति, यज्ञ, नदी, समुद्र, नाग, गन्धर्व, अप्सरा तथा विद्याधर—ये सब गीत, वाद्य तथा नृत्य आदिके द्वारा तेजस्वियोंके मध्यभागमें विराजमान तेजोरारि जगदीश्वर शिवकी पूजा-अर्चा करते थे ।।
पृथिवी चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।
मासार्धमासा ऋतवो रात्रिः संवत्सराः क्षणाः ।। ३९४ ।।
मुहूर्ताश्च निमेषाश्च तथैव युगपर्ययाः ।
दिव्या राजन् नमस्यन्ति विद्याः सत्त्वविदस्तथा ।। ३९५ ।।
राजन्! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, नक्षत्र, ग्रह, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, संवत्सर, क्षण, मुहूर्त, निमेष, युगचक्र तथा दिव्य विद्याएँ—ये सब (मूर्तिमान होकर) शिवजीको नमस्कार कर रहे थे। वैसे ही सत्त्ववेत्ता पुरुष भी भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ।। ३९४-३९५ ।।
सनत्कुमारो देवाश्च इतिहासास्तथैव च ।
मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।। ३९६ ।।
मनवः सप्त सोमश्च अथर्वा सबृहस्पतिः ।
भृगुर्दक्षः कश्यपश्च वसिष्ठः काश्य एव च ।। ३९७ ।।
छन्दांसि दीक्षा यज्ञाश्च दक्षिणाः पावको हविः ।
यज्ञोपगानि द्रव्याणि मूर्तिमन्ति युधिष्ठिर ।। ३९८ ।।
प्रजानां पालकाः सर्वे सरितः पन्नगा नगाः ।
देवानां मातरः सर्वा देवपत्न्यः सकन्यकाः ।। ३९९ ।।
सहस्राणि मुनीनां च अयुतान्यर्बुदानि च ।
नमस्यन्ति प्रभुं शान्तं पर्वताः सागरा दिशः ।। ४०० ।।
युधिष्ठिर! सनत्कुमार, देवगण, इतिहास, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, सात मनु, सोम, अथर्वा, बृहस्पति, भृगु, दक्ष, कश्यप, वसिष्ठ, काश्य, छन्द, दीक्षा, यज्ञ, दक्षिणा, अग्नि, हविष्य, यज्ञोपयोगी मूर्तिमान् द्रव्य, समस्त प्रजापालकगण, नदी, नग, नाग, सम्पूर्ण देवमाताएँ, देवपत्नियां, देवकन्याएँ, सहस्रों, लाखों, अरबों महर्षि, पर्वत, समुद्र और दिशाएँ—ये सब-के-सब शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ।। ३९६—४०० ।।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतवादित्रकोविदाः ।
दिव्यतालेषु गायन्तः स्तुवन्ति भवमद्भुतम् ।। ४०१ ।।
गीत और वाद्यकी कलामें कुशल अप्सराएँ तथा गन्धर्व दिव्य तालपर गाते हुए अद्भुत शक्तिशाली भगवान् भवकी स्तुति करते थे ।। ४०१ ।।
विद्याधरा दानवाश्च गुह्यका राक्षसास्तथा ।
सर्वाणि चैव भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
नमस्यन्ति महाराज वाङ्मनःकर्मभिर्विभुम् ॥ ४०२ ॥
महाराज! विद्याधर, दानव, गुह्यक, राक्षस तथा समस्त चराचर प्राणी मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ॥ ४०२ ॥
पुरस्ताद् धिष्ठितः शर्वो ममासीत् त्रिदशेश्वरः ।
पुरस्ताद् धिष्ठितं दृष्ट्वा ममेशानं च भारत ॥ ४०३ ॥
सप्रजापतिशक्रान्तं जगन्मामभ्युदैक्षत ।
ईक्षितुं च महादेवं न मे शक्तिरभूत् तदा ॥ ४०४ ॥
देवेश्वर शिव मेरे सामने खड़े थे। भारत! मेरे सामने महादेवजीको खड़ा देख प्रजापतियोंसे लेकर इन्द्रतक सारा जगत् मेरी ओर देखने लगा। किंतु उस समय महादेवजीको देखनेकी मुझमें शक्ति नहीं रह गयी थी ॥ ४०३-४०४ ॥
ततो मामब्रवीद् देवः पश्य कृष्ण वदस्व च ।
त्वया ह्याराधितश्चाहं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४०५ ॥
तब भगवान् शिवने मुझसे कहा—'श्रीकृष्ण! मुझे देखो, मुझसे वार्तालाप करो। तुमने पहले भी सैकड़ों और हजारों बार मेरी आराधना की है ॥ ४०५ ॥
त्वत्समो नास्ति मे कश्चित् त्रिषु लोकेषु वै प्रियः ।
शिरसा वन्दिते देवे देवी प्रीता ह्युमा तदा ।
ततोऽहमब्रुवं स्थाणुं स्तुतं ब्रह्मादिभिः सुरैः ॥ ४०६ ॥
'तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है।' जब मैंने मस्तक झुकाकर महादेवजीको प्रणाम किया, तब देवी उमाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा प्रशंसित भगवान् शिवसे इस प्रकार कहा ॥ ४०६ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
नमोऽस्तु ते शाश्वत सर्वयोने
ब्रह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति ।
तपश्च सत्त्वं च रजस्तमश्च
त्वामेव सत्यं च वदन्ति सन्तः ॥ ४०७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं— सबके कारणभूत सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है। ऋषि आपको ब्रह्माजीका भी अधिपति बताते हैं। साधु पुरुष आपको ही तप, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्यस्वरूप कहते हैं ॥ ४०७ ॥
त्वं वै ब्रह्मा च रुद्रश्च वरुणोऽग्निर्मनुर्भवः ।
धाता त्वष्टा विधाता च त्वं प्रभुः सर्वतोमुखः ॥ ४०८ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, वरुण, अग्नि, मनु, शिव, धाता, विधाता और त्वष्टा हैं। आप ही सब ओर मुखवाले परमेश्वर हैं ॥ ४०८ ॥
त्वत्तो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
त्वया सृष्टमिदं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ४०९ ॥
समस्त चराचर प्राणी आपहीसे उत्पन्न हुए हैं। आपने ही स्थावर-जंगम प्राणियोंसहित इस समस्त त्रिलोकीकी सृष्टि की है ॥ ४०९ ॥
यानीन्द्रियाणीह मनश्च कृत्स्नं
ये वायवः सप्त तथैव चाग्नयः ।
ये देवसंस्थास्तवदेवताश्च
तस्मात् परं त्वामृषयो वदन्ति ॥ ४१० ॥
यहाँ जो-जो इन्द्रियाँ, जो सम्पूर्ण मन, जो समस्त वायु और सात अग्नियाँ* हैं, जो देवसमुदायके अंदर रहनेवाले स्तवनके योग्य देवता हैं, उन सबसे परे आपकी स्थिति है। ऋषिगण आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ४१० ॥
वेदाश्च यज्ञाः सोमश्च दक्षिणा पावको हविः ।
यज्ञोपगं च यत् किंचिद् भगवांस्तदसंशयम् ॥ ४११ ॥
वेद, यज्ञ, सोम, दक्षिणा, अग्नि, हविष्य तथा जो कुछ भी यज्ञोपयोगी सामग्री है, वह सब आप भगवान् ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४११ ॥
इष्टं दत्तमधीतं च व्रतानि नियमाश्च ये ।
ह्रीः कीर्तिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः सिद्धिश्चैव तदर्पणी ॥ ४१२ ॥
यज्ञ, दान, अध्ययन, व्रत और नियम, लज्जा, कीर्ति, श्री, धृति, तुष्टि तथा सिद्धि—ये सब आपके स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाले हैं ॥ ४१२ ॥
कामः क्रोधो भयं लोभो मदः स्तम्भोऽथ मत्सरः ।
आधयो व्याधयश्चैव भगवंस्तनवस्तव ॥ ४१३ ॥
भगवन्! काम, क्रोध, भय, लोभ, मद, स्तब्धता, मात्सर्य, आधि और व्याधि—ये सब आपके ही शरीर हैं ॥
कृतिर्विकारः प्रणयः प्रधानं बीजमव्ययम् ।
मनसः परमा योनिः प्रभावश्चापि शाश्वतः ॥ ४१४ ॥
क्रिया, विकार, प्रणय, प्रधान, अविनाशी बीज, मनका परम कारण और सनातन प्रभाव—ये भी आपके ही स्वरूप हैं ॥ ४१४ ॥
अव्यक्तः पावनोऽचिन्त्यः सहस्रांशुर्हिरण्मयः ।
आदिर्गणानां सर्वेषां भवान् वै जीविताश्रयः ॥ ४१५ ॥
अव्यक्त, पावन, अचिन्त्य, हिरण्मय सूर्यस्वरूप आप ही समस्त गणोंके आदिकारण तथा जीवनके आश्रय हैं ॥ ४१५ ॥
महानात्मा मतिर्ब्रह्मा विश्वः शम्भुः स्वयम्भुवः ।
बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च संवित् ख्यातिर्धृतिःस्मृतिः ॥ ४१६ ॥
पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । त्वां बुद्ध्वा ब्राह्मणो वेदात् प्रमोहं विनियच्छति ॥ ४१७ ॥ महान्, आत्मा, मति, ब्रह्मा, विश्व, शम्भु, स्वयम्भू, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, संवित्, ख्याति, धृति और स्मृति—इन चौदह पर्यायवाची शब्दोंद्वारा आप परमात्मा ही प्रकाशित होते हैं। वेदसे आपका बोध प्राप्त करके ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण मोहका सर्वथा नाश कर देता है ॥
हृदयं सर्वभूतानां क्षेत्रज्ञस्त्वमृषिस्तुतः । सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥ ४१८ ॥ ऋषियोंद्वारा प्रशंसित आप ही सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें स्थित क्षेत्रज्ञ हैं। आपके सब ओर हाथ-पैर हैं। सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ४१८ ॥
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि । फलं त्वमसि तिग्मांशोर्निमेषादिषु कर्मसु ॥ ४१९ ॥ आपके सब ओर कान हैं और जगत्में आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं। जीवके आँख मीजने और खोलनेसे लेकर जितने कर्म हैं, उनके फल आप ही हैं ॥ ४१९ ॥
त्वं वै प्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि संश्रितः । अणिमा महिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ ४२० ॥ आप अविनाशी परमेश्वर ही सूर्यकी प्रभा और अग्निकी ज्वाला हैं। आप ही सबके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं। अणिमा, महिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ तथा ज्योति भी आप ही हैं ॥ ४२० ॥
त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये । ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥ ४२१ ॥ आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है। जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ॥ ४२१ ॥
यस्त्वां ध्रुवं वेदयते गुहाशयं प्रभुं पुराणं पुरुषं च विग्रहम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥ ४२२ ॥ जो आपको अपनी हृदयगुहामें स्थित आत्मा, प्रभु, पुराण-पुरुष, मूर्तिमान् परब्रह्म, हिरण्मय पुरुष और बुद्धिमानोंकी परम गतिरूपमें निश्चित भावसे जानता है, वही बुद्धिमान् लौकिक बुद्धिका उल्लंघन करके परमात्म-भावमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४२२ ॥
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं त्वां च मूर्तितः । प्रधानविधियोगस्थस्त्वामेव विशते बुधः ॥ ४२३ ॥
विद्वान् पुरुष महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा—इन सात सूक्ष्म तत्त्वोंको जानकर आपके स्वरूपभूत छः* अंगोंका बोध प्राप्त करके प्रमुख विधियोंका आश्रय ले आपमें ही प्रवेश करते हैं ।। ४२३ ।।
एवमुक्ते मया पार्थ भवे चार्तिविनाशने ।
चराचरं जगत् सर्वं सिंहनादं तदाकरोत् ।। ४२४ ।।
कुन्तीनन्दन! जब मैंने सबकी पीड़ाका नाश करनेवाले महादेवजीकी इस प्रकार स्तुति की, तब यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सिंहनाद कर उठा ।। ४२४ ।।
तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च
नागाः पिशाचाः पितरो वयांसि ।
रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे
महर्षयश्चैव तदा प्रणेमुः ।। ४२५ ।।
ब्राह्मणोंके समुदाय, देवता, असुर, नाग, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षसगण, समस्त भूतगण तथा महर्षि भी उस समय भगवान् शिवको प्रणाम करने लगे ।। ४२५ ।।
मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम् ।
राशयो निपतन्ति स्म वायुश्च सुसुखो ववौ ।। ४२६ ।।
मेरे मस्तकपर ढेर-के-ढेर दिव्य सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होने लगी तथा अत्यन्त सुखदायक हवा चलने लगी ।। ४२६ ।।
निरीक्ष्य भगवान् देवीं ह्युमां मां च जगद्धितः ।
शतक्रतुं चाभिवीक्ष्य स्वयं मामाह शङ्करः ।। ४२७ ।।
जगत्के हितैषी भगवान् शंकरने उमादेवीकी ओर देखकर मेरी ओर देखा और फिर इन्द्रपर दृष्टिपात करके स्वयं मुझसे कहा— ।। ४२७ ।।
विदुः कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन् ।
क्रियतामात्मनः श्रेयः प्रीतिर्हि त्वयि मे परा ।। ४२८ ।।
‘शत्रुहन् श्रीकृष्ण! मुझमें जो तुम्हारी पराभक्ति है, उसे सब लोग जानते हैं, अब तुम अपना कल्याण करो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा विशेष प्रेम है ।। ४२८ ।।
वृणीष्वाष्टौ वरान् कृष्ण दातास्मि तव सत्तम ।
ब्रूहि यादवशार्दूल यानिच्छसि सुदुर्लभान् ।। ४२९ ।।
‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! यदुकुलसिंह श्रीकृष्ण! मैं तुम्हें आठ वर देता हूँ। तुम जिन परम दुर्लभ वरोंको पाना चाहते हो, उन्हें बताओ’ ।। ४२९ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने
चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वका
आख्यानविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।
(दाक्षिणात्य पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं)
* गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य—ये पाँच वैदिक अग्नियाँ हैं। स्मार्त छठी और लौकिक सातवीं अग्नि है।
* सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति और अनन्त शक्ति—ये महेश्वरके स्वरूपभूत छः अङ्ग बताये गये हैं।
पञ्चदशोऽध्यायः
शिव और पार्वतीका श्रीकृष्णको वरदान और उपमन्युके द्वारा महादेवजीकी महिमा
श्रीकृष्ण उवाच
मूर्ध्ना निपत्य नियतस्तेजःसंनिचये ततः ।
परमं हर्षमागत्य भगवन्तमथाब्रुवम् ॥ १ ॥
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**भारत! तदनन्तर मनको वशमें करके तेजोराशिमें स्थित महादेवजीको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बड़े हर्षमें भरकर मैंने उन भगवान् शिवसे कहा— ॥ १ ॥
धर्मे दृढत्वं युधि शत्रुघातं
यशस्तथाग्र्यं परमं बलं च ।
योगप्रियत्वं तव संनिकर्षं
वृणे सुतानां च शतं शतानि ॥ २ ॥
'धर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिति, युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेकी क्षमता, श्रेष्ठ यश, उत्तम बल, योगबल, सबका प्रिय होना, आपका सांनिध्य तथा दस हजार पुत्र—ये ही आठ वर मैं माँग रहा हूँ' ॥ २ ॥
एवमस्त्विति तद्वाक्यं मयोक्तः प्राह शङ्करः ।
ततो मां जगतो माता धारिणी सर्वपावनी ॥ ३ ॥
उवाचोमा प्रणिहिता शर्वाणी तपसां निधिः ।
दत्तो भगवता पुत्रः साम्बो नाम तवानघ ॥ ४ ॥
मेरे इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकरने कहा, 'एवमस्तु—ऐसा ही हो।' तब सबका धारण-पोषण करनेवाली सर्वपावनी तपोनिधि रुद्रपत्नी जगदम्बा उमादेवी एकाग्रचित्त होकर बोलीं—'निष्पाप श्यामसुन्दर! भगवान्ने तुम्हें साम्ब नामक पुत्र दिया है ॥ ३-४ ॥
मत्तोऽप्यष्टौ वरानिष्टान् गृहाण त्वं ददामि ते ।
प्रणम्य शिरसा सा च मयोक्ता पाण्डुनन्दन ॥ ५ ॥
'अब मुझसे भी अभीष्ट आठ वर माँग लो। मैं तुम्हें वे वर प्रदान करती हूँ।' पाण्डुनन्दन! तब मैंने जगदम्बाके चरणोंमें सिरसे प्रणाम करके उनसे कहा— ॥ ५ ॥
द्विजेष्वकोपं पितृतः प्रसादं
शतं सुतानां परमं च भोगम् ।
कुले प्रीतिं मातृतश्च प्रसादं
शमप्राप्तिं प्रवृणे चापि दाक्ष्यम् ॥ ६ ॥ ‘ब्राह्मणोंपर कभी मेरे मनमें क्रोध न हो। मेरे पिता मुझपर प्रसन्न रहें। मुझे सैकड़ों पुत्र प्राप्त हों। उत्तम भोग सदा उपलब्ध रहें। हमारे कुलमें प्रसन्नता बनी रहे। मेरी माता भी प्रसन्न रहें। मुझे शान्ति मिले और प्रत्येक कार्यमें कुशलता प्राप्त हो—ये आठ वर और माँगता हूँ’ ॥ ६ ॥
उमोवाच
एवं भविष्यत्यमरप्रभाव नाहं मृषा जातु वदे कदाचित् । भार्यासहस्राणि च षोडशैव तासु प्रियत्वं च तथाक्षयं च ॥ ७ ॥ प्रीतिं चाग्र्यां बान्धवानां सकाशाद् ददामि तेऽहं वपुषः काम्यतां च । भोक्ष्यन्ते वै सप्ततिं वै शतानि गृहे तुभ्यमतिथीनां च नित्यम् ॥ ८ ॥ **भगवती उमाने कहा—**अमरोंके समान प्रभावशाली श्रीकृष्ण! ऐसा ही होगा। मैं कभी झूठ नहीं बोलती हूँ। तुम्हें सोलह हजार रानियाँ होंगी। उनका तुम्हारे प्रति प्रेम रहेगा। तुम्हें अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति होगी। बन्धु-बान्धवोंकी ओरसे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी। मैं तुम्हारे इस शरीरके सदा कमनीय बने रहनेका वर देती हूँ और तुम्हारे घरमें प्रतिदिन सात हजार अतिथि भोजन करेंगे* ॥ ७-८ ॥
वासुदेव उवाच
एवं दत्त्वा वरान् देवो मम देवी च भारत । अन्तर्हितः क्षणे तस्मिन् सगणो भीमपूर्वज ॥ ९ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**भरतनन्दन! भीमसेनके बड़े भैया! इस प्रकार महादेवजी तथा देवी पार्वती मुझे वरदान देकर अपने गणोंके साथ उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ॥
एतदत्यद्भुतं पूर्वं ब्राह्मणायातितेजसे । उपमन्यवे मया कृत्स्नं व्याख्यातं पार्थिवोत्तम । नमस्कृत्या तु स प्राह देवदेवाय सुव्रत ॥ १० ॥ नृपश्रेष्ठ! यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त मैंने पहले महातेजस्वी ब्राह्मण उपमन्युको पूर्णरूपसे बताया था। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! उपमन्युने देवाधिदेव महादेवजीको नमस्कार करके इस प्रकार कहा ॥ १० ॥
उपमन्युरुवाच
नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः।
नास्ति शर्वसमो दाने नास्ति शर्वसमो रणे ।। ११ ।।
उपमन्यु बोले— महादेवजीके समान कोई देवता नहीं है। महादेवजीके समान कोई गति नहीं है। दानमें शिवजीकी समानता करनेवाला कोई नहीं है तथा युद्धमें भी भगवान् शंकरके समान दूसरा कोई वीर नहीं है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने
पञ्चदशोऽध्यायः ।। १५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहन (इन्द्ररूपधारी महादेव)-की महिमाके प्रतिपादक पर्वकी कथामें पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।
* यहाँ श्रीकृष्णके माँगे हुए आठ वरोंको एवं 'भविष्यति' इस वाक्यके द्वारा देनेके पश्चात् पार्वतीजी अपनी ओरसे आठ वर और देती हैं। इनमें 'अमरप्रभाव' इस सम्बोधनके द्वारा देवोपम प्रभावका दान ही पहला वरदान सूचित किया गया है। 'मैं कभी झूठ नहीं बोलती' इस कथनके द्वारा 'तुम भी कभी झूठ नहीं बोलोगे' यह दूसरा वर सूचित होता है। सोलह हजार रानियोंके प्राप्त होनेका वर तीसरा है। उनका प्रिय होना चौथा वर है। अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति पाँचवाँ वर है। बान्धवोंकी प्रीति छठा, शरीरकी कमनीयता सातवाँ और सात हजार अतिथियोंका भोजन आठवाँ वर है। इससे पहले जो सोलह और आठ वरके प्राप्त होनेकी बात कही गयी थी, उसकी संगति लग जाती है।
षोडशोऽध्यायः
उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल
उपमन्युरुवाच
ऋषिरासीत् कृते तात तण्डिरित्येव विश्रुतः ।
दशवर्षसहस्राणि तेन देवः समाधिना ।। १ ।।
आराधितोऽभूद् भक्तेन तस्योदर्कं निशामय ।
स दृष्टवान् महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम् ।। २ ।।
उपमन्यु कहते हैं—तात! सत्ययुगमें तण्डि नामसे विख्यात एक ऋषि थे जिन्होंने भक्तिभावसे ध्यानके द्वारा दस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की थी। उन्हें जो फल प्राप्त हुआ था, उसे बता रहा हूँ, सुनिये। उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया और स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुकी स्तुति की ।। १-२ ।।
इति तण्डिस्तपोयोगात् परमात्मानमव्ययम् ।
चिन्तयित्वा महात्मानमिदमाह सुविस्मितः ।। ३ ।।
इस तरह तण्डिने तपस्यामें संलग्न होकर अविनाशी परमात्मा महामना शिवका चिन्तन करके अत्यन्त विस्मित हो इस प्रकार कहा था— ।। ३ ।।
यं पठन्ति सदा सांख्याश्चिन्तयन्ति च योगिनः ।
परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमीश्वरम् ।। ४ ।।
उत्पत्तौ च विनाशे च कारणं यं विदुर्बुधाः ।
देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते ।। ५ ।।
अजं तमहमीशानमनादिनिधनं प्रभुम् ।
अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे ।। ६ ।।
‘सांख्यशास्त्रके विद्वान् पर, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदा जिनका गुणगान करते हैं, योगीजन जिनके चिन्तनमें लगे रहते हैं, विद्वान् पुरुष जिन्हें जगत्की उत्पत्ति और विनाशका कारण समझते हैं, देवताओं, असुरों और मुनियोंमें भी जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, उन अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनघ और अत्यन्त सुखी, प्रभावशाली ईश्वर महादेवजीकी मैं शरण लेता हूँ' ।। ४—६ ।।
एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम् ।
तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम् ।। ७ ।।
निष्कलं सकलं ब्रह्म निर्गुणं गुणगोचरम् ।
योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम् ॥ ८ ॥ इतना कहते ही तण्डिने उन तपोनिधि, अविकारी, अनुपम, अचिन्त्य, शाश्वत, ध्रुव, निष्कल, सकल, निर्गुण एवं सगुण ब्रह्मका दर्शन प्राप्त किया, जो योगियोंके परमानन्द, अविनाशी एवं मोक्षस्वरूप हैं ॥ ७-८ ॥ मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् । अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥ ९ ॥ वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं। मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता। वे अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं ॥ ९ ॥ दुर्विज्ञेयमसंख्येयं दुष्प्रापमकृतात्मभिः । योनिं विश्वस्य जगतस्तमसः परतः परम् ॥ १० ॥ उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। वे अप्रमेय हैं। जिन्होंने अपने अन्तःकरणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं। अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं ॥ १० ॥ यः प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मनः । तं देवं दर्शनाकाङ्क्षी बहून् वर्षगणानृषिः ॥ ११ ॥ तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्ट्वा तुष्टाव चेश्वरम् ॥ जो देवता अपनेको प्राणवान्—जीवस्वरूप बनाकर उसमें मनोमय ज्योति बनकर स्थित हुए थे, उन्हींके दर्शनकी अभिलाषासे तण्डि मुनि बहुत वर्षोंतक उग्र तपस्यामें लगे रहे। जब उनका दर्शन प्राप्त कर लिया तब उन मुनीश्वरने जगदीश्वर शिवकी इस प्रकार स्तुति की ॥ ११ १/२ ॥
तण्डिरुवाच
पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतां वर ॥ १२ ॥ अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तपः । **तण्डिने कहा—**सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर! आप पवित्रोंमें भी परम पवित्र तथा गतिशील प्राणियोंकी उत्तम गति हैं। तेजोंमें अत्यन्त उग्र तेज और तपस्याओंमें उत्कृष्ट तप हैं ॥ १२ १/२ ॥ विश्वावसुहिरण्याक्षपुरुहूतनमस्कृत ॥ १३ ॥ भूरिकल्याणद विभो परं सत्यं नमोऽस्तु ते । गन्धर्वराज विश्वावसु, दैत्यराज हिरण्याक्ष और देवराज इन्द्र भी आपकी वन्दना करते हैं। सबको महान् कल्याण प्रदान करनेवाले प्रभो! आप परम सत्य हैं। आपको नमस्कार है ॥ १३ १/२ ॥
जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो ॥ १४ ॥
निर्वाणद सहस्रांशो नमस्तेऽस्तु सुखाश्रय ।
विभो! जो जन्म-मरणसे भयभीत हो संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न करते हैं, उन यतियोंको निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाले आप ही हैं। आप ही सहस्रों किरणोंवाले सूर्य होकर तप रहे हैं। सुखके आश्रयरूप महेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ १४½ ॥
ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षयः ॥ १५ ॥
न विदुस्त्वां तु तत्त्वेन कुतो वेत्स्यामहे वयम् ।
त्वत्तः प्रवर्तते सर्वं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १६ ॥
ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव तथा महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं। फिर हम कैसे जान सकते हैं। आपसे ही सबकी उत्पत्ति होती है तथा आपमें ही यह सारा जगत् प्रतिष्ठित है ॥ १५-१६ ॥
कालाख्यः पुरुषाख्यश्च ब्रह्माख्यश्च त्वमेव हि ।
तनवस्ते स्मृतास्तिस्रः पुराणज्ञैः सुरर्षिभिः ॥ १७ ॥
काल, पुरुष और ब्रह्म—इन तीन नामोंद्वारा आप ही प्रतिपादित होते हैं। पुराणवेत्ता देवर्षियोंने आपके ये तीन रूप बताये हैं ॥ १७ ॥
अधिपौरुषमध्यात्ममधिभूताधिदैवतम् ।
अधिलोकाधिविज्ञानमधियज्ञस्त्वमेव हि ॥ १८ ॥
अधिपौरुष, अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, अधिलोक, अधिविज्ञान और अधियज्ञ आप ही हैं ॥ १८ ॥
त्वां विदित्वात्मदेहस्थं दुर्विदं दैवतैरपि ।
विद्वांसो यान्ति निर्मुक्ताः परं भावमनामयम् ॥ १९ ॥
आप देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय हैं। विद्वान् पुरुष आपको अपने ही शरीरमें स्थित अन्तर्यामी आत्माके रूपमें जानकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो रोग-शोकसे रहित परमभावको प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥
अनिच्छतस्तव विभो जन्ममृत्युरनेकतः ।
द्वारं तु स्वर्गमोक्षाणामाक्षेप्ता त्वं ददासि च ॥ २० ॥
प्रभो! यदि आप स्वयं ही कृपा करके जीवका उद्धार करना न चाहें तो उसके बारंबार जन्म और मृत्यु होते रहते हैं। आप ही स्वर्ग और मोक्षके द्वार हैं। आप ही उनकी प्राप्तिमें बाधा डालनेवाले हैं तथा आप ही ये दोनों वस्तुएँ प्रदान करते हैं ॥ २० ॥
त्वं वै स्वर्गश्च मोक्षश्च कामः क्रोधस्त्वमेव च ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव अधश्चोर्ध्वं त्वमेव हि ॥ २१ ॥
आप ही स्वर्ग और मोक्ष हैं। आप ही काम और क्रोध हैं तथा आप ही सत्त्व, रज, तम, अधोलोक और ऊर्ध्वलोक हैं ॥ २१ ॥
ब्रह्मा भवश्च विष्णुश्च स्कन्देन्द्रौ सविता यमः । वरुणेन्दू मनुर्धाता विधाता त्वं धनेश्वरः ॥ २२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, इन्द्र, सूर्य, यम, वरुण, चन्द्रमा, मनु, धाता, विधाता और धनाध्यक्ष कुबेर भी आप ही हैं ॥ २२ ॥ भूर्वायुः सलिलाग्निश्च खं वाग्बुद्धिः स्थितिर्मतिः । कर्म सत्यानृते चोभे त्वमेवास्ति च नास्ति च ॥ २३ ॥ पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश, वाणी, बुद्धि, स्थिति, मति, कर्म, सत्य, असत्य तथा अस्ति और नास्ति भी आप ही हैं ॥ २३ ॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च प्रकृतिभ्यः परं ध्रुवम् । विश्वाविश्वपरोभावश्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि ॥ २४ ॥ आप ही इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय हैं। आप ही प्रकृतिसे परे निश्चल एवं अविनाशी तत्त्व हैं। आप ही विश्व और अविश्व—दोनोंसे परे विलक्षण भाव हैं तथा आप ही चिन्त्य और अचिन्त्य हैं ॥ २४ ॥ यच्चैतत् परमं ब्रह्म यच्च तत् परमं पदम् । या गतिः सांख्ययोगानां स भवान् नात्र संशयः ॥ २५ ॥ जो यह परम ब्रह्म है, जो वह परमपद है तथा जो सांख्यवेत्ताओं और योगियोंकी गति है, वह आप ही हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥ नूनमद्य कृतार्थाः स्म नूनं प्राप्ताः सतां गतिम् । यां गतिं प्रार्थयन्तीह ज्ञाननिर्मलबुद्धयः ॥ २६ ॥ ज्ञानसे निर्मल बुद्धिवाले ज्ञानी पुरुष यहाँ जिस गतिको प्राप्त करना चाहते हैं, सत्पुरुषोंकी उसी गतिको निश्चित रूपसे हम प्राप्त हो गये हैं; अतः आज हम निश्चय ही कृतार्थ हो गये ॥ २६ ॥ अहो मूढाः स्म सुचिरमिमं कालमचेतसा । यन्न विद्मः परं देवं शाश्वतं यं विदुर्बुधाः ॥ २७ ॥ अहो, हम अज्ञानवश इतने दीर्घकालतक मोहमें पड़े रहे हैं, क्योंकि जिन्हें विद्वान् पुरुष जानते हैं, उन्हीं सनातन परमदेवको हम अबतक नहीं जान सके थे ॥ २७ ॥ सेयमासादिता साक्षात् त्वद्भक्तिर्जन्मभिर्मया । भक्तानुग्रहकृद् देवो यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ २८ ॥ अब अनेक जन्मोंके प्रयत्नसे मैंने यह साक्षात् आपकी भक्ति प्राप्त की है। आप ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले महान् देवता हैं, जिन्हें जानकर ज्ञानी पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥ २८ ॥ देवासुरमुनीनां तु यच्च गुह्यं सनातनम् । गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि ॥ २९ ॥
स एष भगवान् देवः सर्वकृत् सर्वतोमुखः । सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वगः सर्ववेदिता ॥ ३० ॥ जो सनातन ब्रह्म देवताओं, असुरों और मुनियोंके लिये भी गुह्य है, जो हृदयगुहामें स्थित रहकर मननशील मुनिके लिये भी दुर्विज्ञेय बने हुए हैं, वही ये भगवान् हैं। ये ही सबकी सृष्टि करनेवाले देवता हैं। इनके सब ओर मुख हैं। ये सर्वात्मा, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं ॥ २९-३० ॥ देहकृद् देहभृद् देही देहभुग्देहिनां गतिः । प्राणकृत् प्राणभृत् प्राणी प्राणदः प्राणिनां गतिः ॥ ३१ ॥ आप शरीरके निर्माता और शरीरधारी हैं, इसीलिये देही कहलाते हैं। देहके भोक्ता और देहधारियोंकी परम गति हैं। आप ही प्राणोंके उत्पादक, प्राणधारी, प्राणी, प्राणदाता तथा प्राणियोंकी गति हैं ॥ ३१ ॥ अध्यात्मगतिरिष्टानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम् । अपुनर्भवकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः ॥ ३२ ॥ ध्यान करनेवाले प्रियभक्तोंकी जो अध्यात्मगति हैं तथा पुनर्जन्मकी इच्छा न रखनेवाले आत्मज्ञानी पुरुषोंकी जो गति बतायी गयी है, वह ये ईश्वर ही हैं ॥ ३२ ॥ अयं च सर्वभूतानां शुभाशुभगतिप्रदः । अयं च जन्ममरणे विदध्यात् सर्वजन्तुषु ॥ ३३ ॥ ये ही समस्त प्राणियोंको शुभ और अशुभ गति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही समस्त प्राणियोंको जन्म और मृत्यु प्रदान करते हैं ॥ ३३ ॥ अयं संसिद्धिकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः । भूराद्यान् सर्वभुवनानुत्पाद्य सदिवौकसः । दधाति देवस्तनुभिरष्टाभिर्यो बिभर्ति च ॥ ३४ ॥ संसिद्धि (मुक्ति)-की इच्छा रखनेवाले पुरुषोंकी जो परम गति है, वह ये ईश्वर ही हैं। देवताओंसहित भू आदि समस्त लोकोंको उत्पन्न करके ये महादेव ही (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्र, यजमान—इन) अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा उनका धारण और पोषण करते हैं ॥ ३४ ॥ अतः प्रवर्तते सर्वमस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् । अस्मिंश्च प्रलयं याति अयमेकः सनातनः ॥ ३५ ॥ इन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है और इन्हींमें सारा जगत् प्रतिष्ठित है और इन्हींमें सबका लय होता है। ये ही एक सनातन पुरुष हैं ॥ ३५ ॥ अयं स सत्यकामानां सत्यलोकः परं सताम् । अपवर्गश्च मुक्तानां कैवल्यं चात्मवेदिनाम् ॥ ३६ ॥
ये ही सत्यकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंके लिये सर्वोत्तम सत्यलोक हैं। ये ही मुक्त पुरुषोंके अपवर्ग (मोक्ष) और आत्मज्ञानियोंके कैवल्य हैं॥ ३६॥
अयं ब्रह्मादिभिः सिद्धैर्गुहायां गोपितः प्रभुः।
देवासुरमनुष्याणामप्रकाशो भवेदिति ॥ ३७ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंको इनका पता न लगने पाये, मानो इसीलिये ब्रह्मा आदि सिद्ध पुरुषोंने इन परमेश्वरको अपनी हृदयगुफामें छिपा रखा है॥ ३७॥
तं त्वां देवासुरनरास्तत्त्वेन न विदुर्भवम्।
मोहिताः खल्वनेनैव हृदिस्थेनाप्रकाशिना ॥ ३८ ॥
हृदयमन्दिरमें गूढ़भावसे रहकर प्रकाशित न होनेवाले इन परमात्मदेवने सबको अपनी मायासे मोहित कर रखा है। इसीलिये देवता, असुर और मनुष्य आप महादेवको यथार्थ रूपसे नहीं जान पाते हैं॥ ३८॥
ये चैनं प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविताः।
तेषामेवात्मनाऽऽत्मानं दर्शयत्येष हृच्छयः ॥ ३९ ॥
जो लोग भक्तियोगसे भावित होकर उन परमेश्वरकी शरण लेते हैं, उन्हींको यह हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले भगवान् स्वयं अपना दर्शन देते हैं॥ ३९॥
यं ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते।
यं विदित्वा परं वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते ॥ ४० ॥
यं लब्ध्वा परमं लाभं नाधिकं मन्यते बुधः।
यां सूक्ष्मां परमां प्राप्तिं गच्छन्नव्ययमक्षयम् ॥ ४१ ॥
यं सांख्या गुणतत्त्वज्ञाः सांख्यशास्त्रविशारदाः।
सूक्ष्मज्ञानतराः सूक्ष्मं ज्ञात्वा मुच्यन्ति बन्धनैः ॥ ४२ ॥
यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्ते च प्रतिष्ठितम्।
प्राणायामपरा नित्यं यं विशन्ति जपन्ति च ॥ ४३ ॥
ओंकाररथमारुह्य ते विशन्ति महेश्वरम्।
अयं स देवयानानामादित्यो द्वारमुच्यते ॥ ४४ ॥
जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत्त्वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य ह्रास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्त्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और
उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। ॐकाररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं ॥ ४०—४४ ॥
अयं च पितृयानानां चन्द्रमा द्वारमुच्यते ।
एष काष्ठा दिशश्चैव संवत्सरयुगादि च ॥ ४५ ॥
दिव्यादिव्यः परो लाभ अयने दक्षिणोत्तरे ।
ये ही पितृयान-मार्गके द्वार चन्द्रमा कहलाते हैं। काष्ठा, दिशा, संवत्सर और युग आदि भी ये ही हैं। दिव्य लाभ (देवलोकका सुख), अदिव्य लाभ (इस लोकका सुख), परम लाभ (मोक्ष), उत्तरायण और दक्षिणायन भी ये ही हैं ॥ ४५ १/२ ॥
एनं प्रजापतिः पूर्वमाराध्य बहुभिः स्तवैः ॥ ४६ ॥
प्रजार्थं वरयामास नीललोहितसंज्ञितम् ।
पूर्वकालमें प्रजापतिने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा इन्हीं नीललोहित नामवाले भगवान्की आराधना करके प्रजाकी सृष्टिके लिये वर प्राप्त किया था ॥ ४६ १/२ ॥
ऋग्भिर्मनुशासन्ति तत्त्वे कर्मणि बह्वृचाः ॥ ४७ ॥
यजुर्भिर्यत्त्रिधा वेद्यं जुह्वत्यध्वर्यवोऽध्वरे ।
सामभिर्यं च गायन्ति सामगाः शुद्धबुद्धयः ॥ ४८ ॥
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म स्तुवन्त्याथर्वणा द्विजाः ।
यज्ञस्य परमा योनिः पतिश्चायं परः स्मृतः ॥ ४९ ॥
ऋग्वेदके विद्वान् तात्त्विक यज्ञकर्ममें ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमाका गान करते हैं, यजुर्वेदके ज्ञाता द्विज यज्ञमें यजुर्मन्त्रोंद्वारा दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय—इन त्रिविध रूपोंसे जाननेयोग्य जिन महादेवजीके उद्देश्यसे आहुति देते हैं तथा शुद्ध बुद्धिसे युक्त सामवेदके गानेवाले विद्वान् साममन्त्रोंद्वारा जिनकी स्तुति गाते हैं, अथर्ववेदी ब्राह्मण ऋत, सत्य एवं परब्रह्मनामसे जिनकी स्तुति करते हैं, जो यज्ञके परम कारण हैं, वे ही ये परमेश्वर समस्त यज्ञोंके परमपति माने गये हैं ॥ ४७—४९ ॥
रात्र्यहःश्रोत्रनयनः पक्षमासशिरोभुजः ।
ऋतुवीर्यस्तपोधैर्यो ह्यब्दगुह्योरुपादवान् ॥ ५० ॥
रात और दिन इनके कान और नेत्र हैं, पक्ष और मास इनके मस्तक और भुजाएँ हैं, ऋतु वीर्य है, तपस्या धैर्य है तथा वर्ष गुह्य-इन्द्रिय, ऊरु और पैर हैं ॥ ५० ॥
मृत्युर्यमो हुताशश्च कालः संहारवेगवान् ।
कालस्य परमा योनिः कालश्चायं सनातनः ॥ ५१ ॥
मृत्यु, यम, अग्नि, संहारके लिये वेगशाली काल, कालके परम कारण तथा सनातन काल भी—ये महादेव ही हैं ॥ ५१ ॥
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ ग्रहाश्च सह वायुना ।
ध्रुवः सप्तर्षयश्चैव भुवनाः सप्त एव च ॥ ५२ ॥
प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम् ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत् ॥ ५३ ॥
अष्टौ प्रकृतयश्चैव प्रकृतिभ्यश्च यः परः ।
चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, वायु, ध्रुव, सप्तर्षि, सात भुवन, मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, विकारोंके सहित विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्व, ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, भूतादि, सत् और असत् आठ प्रकृतियाँ तथा प्रकृतिसे परे जो पुरुष है, इन सबके रूपमें ये महादेवजी ही विराजमान हैं ॥ ५२-५३ १/२ ॥
अस्य देवस्य यद् भागं कृत्स्नं सम्परिवर्तते ॥ ५४ ॥
एतत् परम्मानन्दं यत् तच्छाश्वतमेव च ।
एषा गतिर्विरक्तानामेष भावः परः सताम् ॥ ५५ ॥
इन महादेवजीका अंशभूत जो सम्पूर्ण जगत् चक्रकी भाँति निरन्तर चलता रहता है, वह भी ये ही हैं। ये परमानन्दस्वरूप हैं। जो शाश्वत ब्रह्म है, वह भी ये ही हैं। ये ही विरक्तोंकी गति हैं और ये ही सत्पुरुषोंके परमभाव हैं ॥ ५४-५५ ॥
एतत् पदमनुद्विग्नमेतद् ब्रह्म सनातनम् ।
शास्त्रवेदाङ्गविदुषामेतद् ध्यानं परं पदम् ॥ ५६ ॥
ये ही उद्वेगरहित परमपद हैं। ये ही सनातन ब्रह्म हैं। शास्त्रों और वेदाङ्गोंके ज्ञाता पुरुषोंके लिये ये ही ध्यान करनेके योग्य परमपद हैं ॥ ५६ ॥
इयं सा परमा काष्ठा इयं सा परमा कला ।
इयं सा परमा सिद्धिरियं सा परमा गतिः ॥ ५७ ॥
इयं सा परमा शान्तिरियं सा निर्वृतिः परा ।
यं प्राप्य कृतकृत्याः स्म इत्यमन्यन्त योगिनः ॥ ५८ ॥
यही वह पराकाष्ठा, यही वह परम कला, यही वह परम सिद्धि और यही वह परम गति हैं एवं यही वह परम शान्ति और वह परम आनन्द भी हैं, जिसको पाकर योगीजन अपनेको कृतकृत्य मानते हैं ॥
इयं तुष्टिरियं सिद्धिरियं श्रुतिरियं स्मृतिः ।
अध्यात्मगतिरिष्टानां विदुषां प्राप्तिरव्यया ॥ ५९ ॥
यह तुष्टि, यह सिद्धि, यह श्रुति, यह स्मृति, भक्तोंकी यह अध्यात्मगति तथा ज्ञानी पुरुषोंकी यह अक्षय प्राप्ति (पुनरावृत्तिरहित मोक्षलाभ) आप ही हैं ॥ ५९ ॥
यजतां कामयानानां मखैर्विपुलदक्षिणैः ।
या गतिर्यज्ञशीलानां सा गतिस्त्वं न संशयः ॥ ६० ॥
प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा सकाम भावसे यजन करनेवाले यजमानोंकी जो गति होती है, वह गति आप ही हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ६० ॥
सम्यग् योगजपैः शान्तिर्नियमैर्देहतापनैः ।