महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्वेदे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका निर्वेदविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2267)
चतुर्थोऽध्यायः
व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना
व्यास उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो यथाह कुरुनन्दनः ।
धृतराष्ट्रो महातेजास्तत् कुरुष्वाविचारयन् ॥ १ ॥
**व्यासजी बोले—**महाबाहु युधिष्ठिर! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले महातेजस्वी धृतराष्ट्र जो कुछ कह रहे हैं, उसे बिना विचारे पूरा करो ॥ १ ॥
अयं हि वृद्धो नृपतिर्हतपुत्रो विशेषतः ।
नेदं कृच्छ्रं चिरतरं सहेदिति मतिर्मम ॥ २ ॥
अब ये राजा बूढ़े हो गये हैं, विशेषतः इनके सभी पुत्र नष्ट हो चुके हैं। मेरा ऐसा विश्वास है कि अब ये इस कष्टको अधिक कालतक नहीं सह सकेंगे ॥ २ ॥
गान्धारी च महाभागा प्राज्ञा करुणवेदिनी ।
पुत्रशोकं महाराज धैर्येणोद्वहते भृशम् ॥ ३ ॥
महाराज! महाभागा गान्धारी परम विदुषी और करुणाका अनुभव करनेवाली हैं; इसलिये ये महान् पुत्रशोकको धैर्यपूर्वक सहती चली आ रही हैं ॥ ३ ॥
अहमप्येतदेव त्वां ब्रवीमि कुरु मे वचः ।
अनुज्ञां लभतां राजा मा वृथेह मरिष्यति ॥ ४ ॥
मैं भी तुमसे यही कहता हूँ, तुम मेरी बात मानो। राजा धृतराष्ट्रको तुम्हारी ओरसे वनमें जानेकी अनुमति मिलनी ही चाहिये, नहीं तो यहाँ रहनेसे इनकी व्यर्थ मृत्यु होगी ॥ ४ ॥
राजर्षीणां पुराणानामनुयातु गतिं नृपः ।
राजर्षीणां हि सर्वेषामन्ते वनमुपाश्रयः ॥ ५ ॥
तुम उन्हें अवसर दो, जिससे ये नरेश प्राचीन राजर्षियोंके पथका अनुसरण कर सकें। समस्त राजर्षियोंने जीवनके अन्तिम भागमें वनका ही आश्रय लिया है ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तदा राजा व्यासेनाद्भुतकर्मणा ।
प्रत्युवाच महातेजा धर्मराजो महामुनिम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अद्भुतकर्मा व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने उन महामुनिको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ६ ॥
भगवानेव नो मान्यो भगवानेव नो गुरुः ।
भगवानस्य राज्यस्य कुलस्य च परायणम् ॥ ७ ॥
'भगवन्! आप ही हमलोगोंके माननीय और आप ही हमारे गुरु हैं। इस राज्य और पुरके परम आधार भी आप ही हैं ।। ७ ।। अहं तु पुत्रो भगवन् पिता राजा गुरुश्च मे । निदेशवर्ती च पितुः पुत्रो भवति धर्मतः ॥ ८ ॥ 'भगवन्! राजा धृतराष्ट्र हमारे पिता और गुरु हैं। धर्मतः पुत्र ही पिताकी आज्ञाके अधीन होता है। (वह पिताको आज्ञा कैसे दे सकता है)' ।। ८ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तु तं प्राह व्यासो वेदविदां वरः । युधिष्ठिरं महातेजाः पुनरेव महाकविः ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महाज्ञानी व्यासजीने युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उन्हें समझाते हुए पुनः इस प्रकार कहा— ।। ९ ।। एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । राजायं वृद्धतां प्राप्तः प्रमाणे परमे स्थितः ॥ १० ॥ 'महाबाहु भरतनन्दन! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही ठीक है, तथापि राजा धृतराष्ट्र बूढ़े हो गये हैं और अन्तिम अवस्थामें स्थित हैं ।। १० ।। सोऽयं मयाभ्यनुज्ञातस्त्वया च पृथिवीपतिः । करोतु स्वमभिप्रायं मास्य विघ्नकरो भव ॥ ११ ॥ 'अतः अब ये भूपाल मेरी और तुम्हारी अनुमति लेकर तपस्याके द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करें। इनके शुभ कार्यमें विघ्न न डालो ।। ११ ।। एष एव परो धर्मो राजर्षीणां युधिष्ठिर । समरे वा भवेन्मृत्युर्वने वा विधिपूर्वकम् ॥ १२ ॥ 'युधिष्ठिर! राजर्षियोंका यही परम धर्म है कि युद्धमें अथवा वनमें उनकी शास्त्रोक्त विधिपूर्वक मृत्यु हो ।। पित्रा तु तव राजेन्द्र पाण्डुना पृथिवीक्षिता । शिष्यवृत्तेन राजायं गुरुवत् पर्युपासितः ॥ १३ ॥ 'राजेन्द्र! तुम्हारे पिता राजा पाण्डुने भी धृतराष्ट्रको गुरुके समान मानकर शिष्यभावसे इनकी सेवा की थी ।। क्रतुभिर्दक्षिणावद्भी रत्नपर्वतशोभितैः । महद्भिरिष्टं गौर्भुक्ता प्रजाश्च परिपालिताः ॥ १४ ॥ 'इन्होंने रत्नमय पर्वतोंसे सुशोभित और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न अनेक बड़े-बड़े यज्ञ किये हैं, पृथ्वीका राज्य भोगा है और प्रजाका भलीभाँति पालन किया है ।। पुत्रसंस्थं च विपुलं राज्यं विप्रोषिते त्वयि ।
त्रयोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ॥ १५ ॥ ‘जब तुम वनमें चले गये थे, उन दिनों तेरह वर्षोंतक अपने पुत्रके अधीन रहनेवाले विशाल राज्यका इन्होंने उपभोग किया और नाना प्रकारके धन दिये हैं ॥ त्वया चायं नरव्याघ्र गुरुशुश्रूषयानघ । आराधितः सभृत्येन गान्धारी च यशस्विनी ॥ १६ ॥ ‘निष्पाप नरव्याघ्र! सेवकोंसहित तुमने भी गुरुसेवाके भावसे इनकी तथा यशस्विनी गान्धारी देवीकी आराधना की है ॥ १६ ॥ अनुजानीहि पितरं समयोऽस्य तपोविधौ । न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर ॥ १७ ॥ ‘अतः तुम अपने पिताको वनमें जानेकी अनुमति दे दो; क्योंकि अब इनके तप करनेका समय आया है। युधिष्ठिर! इनके मनमें तुम्हारे ऊपर अणुमात्र भी रोष नही है’ ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा वचनमनुमान्य च पार्थिवम् । तथास्त्विति च तेनोक्तः कौन्तेयेन ययौ वनम् ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यों कहकर महर्षि व्यासने राजा युधिष्ठिरको राजी कर लिया और ‘बहुत अच्छा’ कहकर जब युधिष्ठिरने उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली, तब वे वनमें अपने आश्रमपर चले गये ॥ १८ ॥ गते भगवति व्यासे राजा पाण्डुसुतस्तदा । प्रोवाच पितरं वृद्धं मन्दं मन्दमिवानतः ॥ १९ ॥ भगवान् व्यासके चले जानेपर राजा युधिष्ठिरने अपने बूढ़े ताऊ धृतराष्ट्रसे नम्रतापूर्वक धीरे-धीरे कहा— ॥ यदाह भगवान् व्यासो यच्चापि भवतो मतम् । यथाऽऽह च महेष्वासः कृपो विदुर एव च ॥ २० ॥ युयुत्सुः संजयश्चैव तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा । सर्व एव हि मान्या मे कुलस्य हि हितैषिणः ॥ २१ ॥ ‘पिताजी! भगवान् व्यासने जो आज्ञा दी है और आपने जो कुछ करनेका निश्चय किया है तथा महान् धनुर्धर कृपाचार्य, विदुर, युयुत्सु और संजय जैसा कहेंगे, निस्संदेह मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि ये सब लोग इस कुलके हितैषी होनेके कारण मेरे लिये माननीय हैं ॥ २०-२१ ॥ इदं तु याचे नृपते त्वामहं शिरसा नतः । क्रियतां तावदाहारस्ततो गच्छाश्रमं प्रति ॥ २२ ॥
‘किंतु नरेश्वर! इस समय आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि पहले भोजन कर लीजिये, फिर आश्रमको जाइयेगा’ ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि व्यासानुज्ञायां चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासकी आज्ञाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ।। ४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2272)
पञ्चमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश
वैशम्पायन उवाच
ततो राज्ञाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
ययौ स्वभवनं राजा गान्धार्यानुगतस्तदा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी अनुमति पाकर प्रतापी राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ अपने भवनमें गये ॥ १ ॥
मन्दप्राणगतिर्धीमान् कृच्छ्रादिव समुद्वहन् ।
पदातिः स महीपालो जीर्णो गजपतिर्यथा ॥ २ ॥
उस समय उनकी चलने-फिरनेकी शक्ति बहुत कम हो गयी थी। वे बुद्धिमान् भूपाल बूढ़े हाथीकी भाँति पैदल चलते समय बड़ी कठिनाईसे पैर उठाते थे ॥ २ ॥
तमन्वगच्छद् विदुरो विद्वान् सूतश्च संजयः ।
स चापि परमेष्वासः कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ३ ॥
उस समय उनके पीछे-पीछे ज्ञानी विदुर, सारथि संजय तथा शरद्वान्के पुत्र महाधनुर्धर कृपाचार्य भी गये ॥
स प्रविश्य गृहं राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियः ।
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठानाहारमकरोत् तदा ॥ ४ ॥
राजन्! घरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्नकालकी धार्मिक क्रिया पूरी की; फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अन्न-पान आदिसे तृप्त करके स्वयं भी भोजन किया ॥ ४ ॥
गान्धारी चैव धर्मज्ञा कुन्त्या सह मनस्विनी ।
वधूभिरुपचारेण पूजिताभुङ्क्त भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! इसी प्रकार धर्मको जाननेवाली मनस्विनी गान्धारी देवीने भी कुन्तीसहित पुत्रवधुओंद्वारा विविध उपचारोंसे पूजित होकर आहार ग्रहण किया ॥ ५ ॥
कृताहारं कृताहाराः सर्वे ते विदुरादयः ।
पाण्डवाश्च कुरुश्रेष्ठमुपातिष्ठन्त तं नृपम् ॥ ६ ॥
कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रके भोजन कर लेनेपर पाण्डव तथा विदुर आदि सब लोगोंने भी भोजन किया, फिर सब-के-सब धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुए ॥
ततोऽब्रवीन्महाराज कुन्तीपुत्रमुपह्वरे ।
निषण्णं पाणिना पृष्ठे संस्पृशन्नम्बिकासुतः ॥ ७ ॥
महाराज! उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको एकान्तमें अपने निकट बैठा जान धृतराष्ट्रने उनकी पीठपर हाथ फेरते हुए कहा— ॥ ७ ॥
अप्रमादस्त्वया कार्यः सर्वथा कुरुनन्दन ।
अष्टाङ्गे राजशार्दूल राज्ये धर्मपुरस्कृते ॥ ८ ॥
‘कुरुनन्दन! राजसिंह! इस आठ अंगोंवाले राज्यमें तुम सदा धर्मको ही आगे रखना और इसके संरक्षण और संचालनमें कभी किसी तरह भी प्रमाद न करना ॥ ८ ॥
तत्तु शक्यं महाराज रक्षितुं पाण्डुनन्दन ।
राज्यं धर्मेण कौन्तेय विद्वानसि निबोध तत् ॥ ९ ॥
‘महाराज पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! राज्यकी रक्षा धर्मसे ही हो सकती है। इस बातको तुम स्वयं भी जानते हो तथापि मुझसे भी सुनो ॥ ९ ॥
विद्यावृद्धान् सदैव त्वमुपासीथा युधिष्ठिर ।
शृणुयास्ते च यद् ब्रूयुः कुर्याश्चैवाविचारयन् ॥ १० ॥
‘युधिष्ठिर! विद्यामें बढ़े-चढ़े विद्वान् पुरुषोंका सदा ही संग किया करो। वे जो कुछ कहें, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और उसका बिना विचारे पालन करो’ ॥
प्रातरुत्थाय तान् राजन् पूजयित्वा यथाविधि ।
कृत्यकाले समुत्पन्ने पृच्छेथाः कार्यमात्मनः ॥ ११ ॥
‘राजन्! प्रातःकाल उठकर उन विद्वानोंका यथायोग्य सत्कार करके कोई कार्य उपस्थित होनेपर उनसे अपना कर्तव्य पूछो ॥ ११ ॥
ते तु सम्मानिता राजंस्त्वया कार्यहितार्थिना ।
प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वथा तव भारत ॥ १२ ॥
'राजन्! तात! भरतनन्दन! अपना हित करनेकी इच्छासे तुम्हारे द्वारा सम्मानित होनेपर वे सर्वथा तुम्हारे हितकी ही बात बतायेंगे ॥ १२ ॥
इन्द्रियाणि च सर्वाणि वाजिवत् परिपालय ।
हितायैव भविष्यन्ति रक्षितं द्रविणं यथा ॥ १३ ॥
'जैसे सारथि घोड़ोंको काबूमें रखता है, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखकर उनकी रक्षा करो। ऐसा करनेसे वे इन्द्रियाँ सुरक्षित धनकी भाँति भविष्यमें तुम्हारे लिये निश्चय ही हितकर होंगी ॥ १३ ॥
अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन् ।
दान्तान् कर्मसु पुण्यांश्च पुण्यान् सर्वेषु योजयेः ॥ १४ ॥
'जो जाँचे-बूझे हुए तथा निष्कपटभावसे काम करनेवाले हों, जो पिता-पितामहोंके समयसे काम देखते आ रहे हों तथा जो बाहर-भीतरसे शुद्ध, संयमी और जन्म एवं कर्मसे भी पवित्र हों, ऐसे मन्त्रियोंको ही सब तरहके उत्तरदायित्वपूर्ण कार्योंमें नियुक्त करना ॥ १४ ॥
चारयेथाश्च सततं चारैरविदितः परैः ।
परीक्षितैर्बहुविधैः स्वराष्ट्रप्रतिवासिभिः ॥ १५ ॥
'जिनकी किसी अवसरपर परीक्षा कर ली गयी हो और जो अपने ही राज्यके भीतर निवास करनेवाले हों, ऐसे अनेक जासूसोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुओंका गुप्त भेद लेते रहना और प्रयत्नपूर्वक ऐसी चेष्टा करना, जिससे शत्रु तुम्हारा भेद न जान सकें' ॥ १५ ॥
पुरं च ते सुगुप्तं स्याद् दृढप्राकारतोरणम् ।
अट्टाट्टालकसम्बाधं षट्पदं सर्वतोदिशम् ॥ १६ ॥
'तुम्हारे नगरकी रक्षाका पूर्ण प्रबन्ध रहना चाहिये। उसके चारों ओरकी दीवारें तथा मुख्य द्वार अत्यन्त सुदृढ़ होने चाहिये। बीचका सारा नगर ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओंसे भरा होना चाहिये। सब दिशाओंमें छः चहारदीवारियाँ बननी चाहिये ॥ १६ ॥
तस्य द्वाराणि सर्वाणि पर्याप्तानि बृहन्ति च ।
सर्वतः सुविभक्तानि यन्त्रैरारक्षितानि च ॥ १७ ॥
'नगरके सभी दरवाजे विस्तृत एवं विशाल हों। सब ओर उनकी रक्षाके लिये यन्त्र लगे हों तथा उन द्वारोंका विभाग सुन्दर ढंगसे सम्पन्न हो ॥ १७ ॥
पुरुषैरलमर्थस्ते विदितैः कुलशीलतः ।
आत्मा च रक्ष्यः सततं भोजनादिषु भारत ॥ १८ ॥
'भारत! जिन मनुष्योंके कुल और शील अच्छी तरह ज्ञात हों, उन्हींसे तुम्हें काम लेना चाहिये। भोजन आदिके अवसरोंपर सदा तुम्हें आत्मरक्षापर ध्यान देना चाहिये ॥ १८ ॥
विहाराहारकालेषु माल्यशय्यासनेषु च । स्त्रियश्च ते सुगुप्ताः स्युर्वृद्धैराप्तैरधिष्ठिताः ॥ १९ ॥ शीलवद्भिः कुलीनैश्च विद्वद्भिश्च युधिष्ठिर । ‘आहार-विहारके समय तथा माला पहनने, शय्यापर सोने और आसनोंपर बैठनेके समय भी तुम्हें सावधानीके साथ अपनी रक्षा करनी चाहिये। युधिष्ठिर! कुलीन, शीलवान्, विद्वान्, विश्वासपात्र एवं वृद्ध पुरुषोंकी अध्यक्षतामें रखकर तुम्हें अन्तःपुरकी स्त्रियोंकी रक्षाका सुन्दर प्रबन्ध करना चाहिये ॥ १९ १/२ ॥
मन्त्रिणश्चैव कुर्वीथा द्विजान् विद्याविशारदान् ॥ २० ॥ विनीतांश्च कुलीनांश्च धर्मार्थकुशलानृजून् । तैः सार्धं मन्त्रयेथास्त्वं नात्यर्थं बहुभिः सह ॥ २१ ॥ ‘राजन्! तुम उन्हीं ब्राह्मणोंको अपने मन्त्री बनाओ, जो विद्यामें प्रवीण, विनयशील, कुलीन, धर्म और अर्थमें कुशल तथा सरल स्वभाववाले हों। उन्हींके साथ तुम गूढ़ विषयपर विचार करो; किंतु अधिक लोगोंको साथ लेकर देरतक मन्त्रणा नहीं करनी चाहिये ॥
समस्तैरपि च व्यस्तैर्व्यपदेशेन केनचित् । सुसंवृतं मन्त्रगृहं स्थलं चारुह्य मन्त्रयेः ॥ २२ ॥ ‘सम्पूर्ण मन्त्रियोंको अथवा उनमेंसे दो-एकको किसी कामके बहाने चारों ओरसे घिरे हुए बंद कमरेमें या खुले मैदानमें ले जाकर उनके साथ किसी गूढ़ विषयपर विचार करना ॥ २२ ॥
अरण्ये निःशलाके वा न च रात्रौ कथंचन । वानराः पक्षिणश्चैव ये मनुष्यानुसारिणः ॥ २३ ॥ सर्वे मन्त्रगृहे वर्ज्या ये चापि जडपङ्गवः । ‘जहाँ अधिक घास-फूस या झाड़-झंखाड़ न हो, ऐसे जंगलमें भी गुप्त मन्त्रणा की जा सकती है; परंतु रात्रिके समय इन स्थानोंमें किसी तरह गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये। मनुष्योंका अनुसरण करनेवाले जो वानर और पक्षी आदि हैं, उन सबको तथा मूर्ख एवं पंगु मनुष्योंको भी मन्त्रणा-गृहमें नहीं आने देना चाहिये ॥ २३ १/२ ॥
मन्त्रभेदे हि ये दोषा भवन्ति पृथिवीक्षिताम् ॥ २४ ॥ न ते शक्याः समाधातुं कथंचिदिति मे मतिः । ‘गुप्त मन्त्रणाके दूसरोंपर प्रकट हो जानेसे राजाओंको जो संकट प्राप्त होते हैं, उनका किसी तरह समाधान नहीं किया जा सकता—ऐसा मेरा विश्वास है ॥ २४ १/२ ॥
दोषांश्च मन्त्रभेदस्य ब्रूयास्त्वं मन्त्रिमण्डले ॥ २५ ॥ अभेदे च गुणा राजन् पुनः पुनररिंदम । ‘शत्रुदमन नरेश! गुप्त मन्त्रणा फूट जानेपर जो दोष पैदा होते हैं और न फूटनेसे जो लाभ होते हैं, उनको तुम मन्त्रिमण्डलके समक्ष बारंबार बतलाते रहना ॥ २५ १/२ ॥
पौरजानपदानां च शौचाशौचे युधिष्ठिर ॥ २६ ॥
यथा स्याद् विदितं राजंस्तथा कार्यं कुरुद्वह ।
‘राजन्! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर! नगर और जनपदके लोगोंका हृदय तुम्हारे प्रति शुद्ध है या
अशुद्ध, इस बातका तुम्हें जैसे भी ज्ञान प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना ॥ २६ १/२ ॥
व्यवहारश्च ते राजन् नित्यमाप्तैरधिष्ठितः ॥ २७ ॥
योज्यस्तुस्तैर्हितै राजन् नित्यं चारैरनुष्ठितः ।
‘नरेश्वर! न्याय करनेके कामपर तुम सदा ऐसे ही पुरुषोंको नियुक्त करना, जो
विश्वासपात्र, संतोषी और हितैषी हों तथा गुप्तचरोंके द्वारा सदा उनके कार्योंपर दृष्टि
रखना ॥ २७ १/२ ॥
परिमाणं विदित्वा च दण्डं दण्ड्येषु भारत ॥ २८ ॥
प्रणयेयुर्यथान्यायं पुरुषास्ते युधिष्ठिर ।
‘भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें ऐसा विधान बनाना चाहिये, जिससे तुम्हारे नियुक्त किये
हुए न्यायाधिकारी पुरुष अपराधियोंके अपराधकी मात्राको भलीभाँति जानकर जो
दण्डनीय हों, उन्हें ही उचित दण्ड दें ॥
आदानरुचयश्चैव परदाराभिमर्शिनः ॥ २९ ॥
उग्रदण्डप्रधानाश्च मिथ्या व्याहारिणस्तथा ।
आक्रोष्टारश्च लुब्धाश्च हर्तारः साहसप्रियाः ॥ ३० ॥
सभाविहारभेत्तारो वर्णानां च प्रदूषकाः ।
हिरण्यदण्ड्या वध्याश्च कर्तव्या देशकालतः ॥ ३१ ॥
‘जो दूसरोंसे घूस लेनेकी रुचि रखते हों, परायी स्त्रियोंसे जिनका सम्पर्क हो, जो
विशेषतः कठोर दण्ड देनेके पक्षपाती हों, झूठा फैसला देते हों, जो कटुवादी, लोभी,
दूसरोंका धन हड़पनेवाले, दुस्साहसी, सभाभवन और उद्यान आदिको नष्ट करनेवाले तथा
सभी वर्णके लोगोंको कलंकित करनेवाले हों, उन न्यायाधिकारियोंको देश-कालका ध्यान
रखते हुए सुवर्णदण्ड अथवा प्राणदण्डके द्वारा दण्डित करना चाहिये ॥ २९—३१ ॥
प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युर्व्ययकर्म ते ।
अलंकारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ॥ ३२ ॥
‘प्रातःकाल उठकर (नित्य नियमसे निवृत्त होनेके बाद) पहले तुम्हें उन लोगोंसे मिलना
चाहिये, जो तुम्हारे खर्च-बर्चेके कामपर नियुक्त हों। उसके बाद आभूषण पहनने या भोजन
करनेके कामपर ध्यान देना चाहिये ॥
पश्येथाश्च ततो योधान् सदा त्वं प्रतिहर्षयन् ।
दूतानां च चराणां च प्रदोषस्ते सदा भवेत् ॥ ३३ ॥
‘तत्पश्चात् सैनिकोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए उनसे मिलना चाहिये। दूतों और
जासूसोंसे मिलनेके लिये तुम्हारे लिये सर्वोत्तम समय संध्याकाल है ॥ ३३ ॥
सदा चापररात्रान्ते भवेत् कार्यार्थनिर्णयः । मध्यरात्रे विहारस्ते मध्याह्ने च सदा भवेत् ॥ ३४ ॥ ‘पहरभर रात बाकी रहते ही उठकर अगले दिनके कार्य-क्रमका निश्चय कर लेना चाहिये। आधी रात और दोपहरके समय तुम्हें स्वयं घूम-फिरकर प्रजाकी अवस्थाका निरीक्षण करना उचित है ॥ ३४ ॥ सर्वे त्वौपयिकाः कालाः कार्याणां भरतर्षभ । तथैवालंकृतः काले तिष्ठेथा भूरिदक्षिण ॥ ३५ ॥ ‘प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भरतश्रेष्ठ! काम करनेके लिये सभी समय उपयोगी हैं तथा तुम्हें समय-समयपर सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत रहना चाहिये ॥ ३५ ॥ चक्रवत् तात कार्याणां पर्यायो दृश्यते सदा । कोशस्य निचये यत्नं कुर्वीथा न्यायतः सदा ॥ ३६ ॥ विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जयेः । ‘तात! चक्रकी भाँति सदा कार्योंका क्रम चलता रहता है, यह देखनेमें आता है। महाराज! नाना प्रकारके कोषका संग्रह करनेके लिये तुम्हें सदा न्यायाानुकूल प्रयत्न करना चाहिये। इसके विपरीत अन्यायपूर्ण प्रयत्नको त्याग देना चाहिये ॥ ३६ १/२ ॥ चारैर्विदित्वा शत्रूंश्च ये राज्ञामन्तरैषिणः ॥ ३७ ॥ तानाप्तैः पुरुषैर्दूरद् घातयेथा नराधिप । ‘नरेश्वर! जो राजाओंके छिद्र देखा करते हैं, ऐसे राजविद्रोही शत्रुओंका गुप्तचरोंद्वारा पता लगाकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा उन्हें दूरसे ही मरवा डालना चाहिये ॥ ३७ १/२ ॥ कर्म दृष्ट्वाथ भृत्यांस्त्वं वरयेथाः कुरूद्वह ॥ ३८ ॥ कारयेथाश्च कर्माणि युक्तायुक्तैरधिष्ठितैः । ‘कुरुश्रेष्ठ! पहले काम देखकर सेवकोंको नियुक्त करना चाहिये और अपने आश्रित मनुष्य योग्य हों या अयोग्य, उनसे काम अवश्य लेना चाहिये ॥ ३८ १/२ ॥ सेनाप्रणेता च भवेत् तव तात दृढव्रतः ॥ ३९ ॥ शूरः क्लेशसहश्चैव हितो भक्तश्च पूरुषः । ‘तात! तुम्हारे सेनापतिको दृढप्रतिज्ञ, शूरवीर, क्लेश सह सकनेवाला, हितैषी, पुरुषार्थी और स्वामिभक्त होना चाहिये ॥ ३९ १/२ ॥ सर्वे जनपदाश्चैव तव कर्माणि पाण्डव ॥ ४० ॥ गोवद्रासभवच्चैव कुर्युर्ये व्यवहारिणः । ‘पाण्डुनन्दन! तुम्हारे राज्यके अंदर रहनेवाले जो कारीगर और शिल्पी तुम्हारा काम करें, तुम्हें उनके भरण-पोषणका प्रबन्ध अवश्य करना चाहिये; जैसे गधों और बैलोंसे काम लेनेवाले लोग उन्हें खानेको देते हैं ॥ ४० १/२ ॥
स्वरन्ध्रं पररन्ध्रं च स्वेषु चैव परेषु च ॥ ४१ ॥
उपलक्षयितव्यं ते नित्यमेव युधिष्ठिर ।
‘युधिष्ठिर! तुम्हें सदा ही स्वजनों और शत्रुओंके छिद्रोंपर दृष्टि रखनी चाहिये ॥ ४१ १/२ ॥
देशजाश्चैव पुरुषा विक्रान्ताः स्वेषु कर्मसु ॥ ४२ ॥
यात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वया ।
गुणार्थिनां गुणः कार्यो विदुषां वै जनाधिप ।
अविचार्याश्च ते ते स्युरचला इव नित्यशः ॥ ४३ ॥
‘जनेश्वर! अपने देशमें उत्पन्न होनेवाले पुरुषोंमेंसे जो लोग अपने कार्यमें विशेष कुशल और हितैषी हों, उन्हें उनके योग्य आजीविका देकर अनुग्रहपूर्वक अपनाना चाहिये। विद्वान् राजाको उचित है कि वह गुणार्थी मनुष्यके गुण बढ़ानेका प्रयत्न करता रहे। उनके सम्बन्धमें तुम्हें कोई विचार नहीं करना चाहिये। वे तुम्हारे लिये सदा पर्वतके समान अविचल सहायक सिद्ध होंगे’ ॥ ४२-४३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपदेशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2279)
षष्ठोऽध्यायः
धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश
धृतराष्ट्र उवाच
मण्डलानि च बुध्येथाः परेषामात्मनस्तथा ।
उदासीनगणानां च मध्यस्थानां च भारत ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— भरतनन्दन! तुम्हें शत्रुओंके, अपने, उदासीन राजाओंके तथा मध्यस्थ पुरुषोंके मण्डलोंका ज्ञान रखना चाहिये ॥ १ ॥
चतुर्णां शत्रुजातानां सर्वेषामाततायिनाम् ।
मित्रं चामित्रमित्रं च बोद्धव्यं तेऽरिकर्शन ॥ २ ॥
शत्रुसूदन! तुम्हें चार प्रकारके शत्रुओंके और छः प्रकारके आततायियोंके भेदोंको एवं मित्र और शत्रुके मित्रको भी पहचानना चाहिये ॥ २ ॥
तथामात्या जनपदा दुर्गाणि विविधानि च ।
बलानि च कुरुश्रेष्ठ भवत्येषां यथेच्छकम् ॥ ३ ॥
ते च द्वादश कौन्तेय राज्ञां वै विषयात्मकाः ।
मन्त्रिप्रधानाश्च गुणाः षष्टिर्द्वादश च प्रभो ॥ ४ ॥
एतन्मण्डलमित्याहुराचार्या नीतिकोविदाः ।
कुरुश्रेष्ठ! अमात्य (मन्त्री), जनपद (देश), नाना प्रकारके दुर्ग और सेना—इनपर शत्रुओंका यथेष्ट लक्ष्य रहता है (अतः इनकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये)। प्रभो! कुन्तीनन्दन! उपर्युक्त बारह प्रकारके मनुष्य राजाओंके ही मुख्य विषय हैं। मन्त्रीके अधीन रहनेवाले कृषि आदि साठ* गुण और पूर्वोक्त बारह प्रकारके मनुष्य—इन सबको नीतिज्ञ आचार्योंने 'मण्डल' नाम दिया है ॥ ३-४½ ॥
अत्र षाड्गुण्यमायत्तं युधिष्ठिर निबोध तत् ॥ ५ ॥
वृद्धिक्षयौ च विज्ञेयौ स्थानं च कुरुसत्तम ।
युधिष्ठिर! तुम इस मण्डलको अच्छी तरह जानो; क्योंकि राज्यकी रक्षाके संधि-विग्रह आदि छः उपायोंका उचित उपभोग इन्हींके अधीन है। कुरुश्रेष्ठ! राजाको चाहिये कि वह अपनी वृद्धि, क्षय और स्थितिका सदा ही ज्ञान रखे ॥ ५½ ॥
द्विसप्तत्यां महाबाहो ततः षाड्गुण्यजा गुणाः ॥ ६ ॥
यदा स्वपक्षो बलवान् परपक्षस्तथाबलः ।
विगृह्य शत्रून् कौन्तेय जेयः क्षितिपतिस्तदा ॥ ७ ॥
महाबाहो! पहले राजप्रधान बारह और मन्त्रिप्रधान साठ—इन बहत्तरका ज्ञान प्राप्त करके संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका यथावसर उपयोग किया जाता है। कुन्तीनन्दन! जब अपना पक्ष बलवान् तथा शत्रु का पक्ष निर्बल जान पड़े, उस समय शत्रुके साथ युद्ध छेड़कर विपक्षी राजाको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये ।। ६-७ ।।
यदा परे च बलिनः स्वपक्षश्चैव दुर्बलः ।
सार्धं विद्वांस्तदा क्षीणः परैः संधिं समाश्रयेत् ।। ८ ।।
परंतु जब शत्रु-पक्ष प्रबल और अपना ही पक्ष दुर्बल हो, उस समय क्षीणशक्ति विद्वान् पुरुष शत्रुओंके साथ संधि कर ले ।। ८ ।।
द्रव्याणां संचयश्चैव कर्तव्यः सुमहांस्तथा ।
तदा समर्थो यानाय नचिरेणैव भारत ।। ९ ।।
तदा सर्वं विधेयं स्यात् स्थाने न स विचारयेत् ।
भारत! राजाको सदैव द्रव्योंका महान् संग्रह करते रहना चाहिये। जब वह शीघ्र ही शत्रुपर आक्रमण करनेमें समर्थ हो, उस समय उसका जो कर्तव्य हो, उसे वह स्थिरतापूर्वक भलीभाँति विचार ले ।। ९ १/२ ।।
भूमिरल्पफला देया विपरीतस्य भारत ।। १० ।।
हिरण्यं कुप्यभूयिष्ठं मित्रं क्षीणमथो बलम् ।
भारत! यदि अपनी विपरीत अवस्था हो तो शत्रुको कम उपजाऊ भूमि, थोड़ा-सा सोना और अधिक मात्रामें जस्ता-पीतल आदि धातु तथा दुर्बल मित्र एवं सेना देकर उसके साथ संधि करे ।। १० १/२ ।।
विपरीतान्निगृह्णीयात् स्वं हि संधिविशारदः ।। ११ ।।
संध्यर्थं राजपुत्रं वा लिप्सैथा भरतर्षभ ।
विपरीतं न तच्छ्रेयः पुत्र कस्यांचिदापदि ।। १२ ।।
तस्याः प्रमोक्षे यत्नं च कुर्याः सोपायमन्त्रवित् ।
यदि शत्रु की विपरीत दशा हो और वह संधिके लिये प्रार्थना करे तो संधिविशारद पुरुष उससे उपजाऊ भूमि, सोना-चाँदी आदि धातु तथा बलवान् मित्र एवं सेना लेकर उसके साथ संधि करे अथवा भरतश्रेष्ठ! प्रतिद्वन्द्वी राजाके राजकुमारको ही अपने यहाँ जमानतके तौरपर रखनेकी चेष्टा करनी चाहिये। इसके विपरीत बर्ताव करना अच्छा नहीं है। बेटा! यदि कोई आपत्ति आ जाय तो उचित उपाय और मन्त्रणाके ज्ञाता तुम-जैसे राजाको उससे छूटनेका प्रयत्न करना चाहिये ।।
प्रकृतीनां च राजेन्द्र राजा दीनान् विभावयेत् ।। १३ ।।
क्रमेण युगपत् सर्वं व्यवसायं महाबलः ।
पीडनं स्तम्भनं चैव कोशभङ्गस्तथैव च ।। १४ ।।
राजेन्द्र! प्रजाजनोंके भीतर जो दीन-दरिद्र (अन्ध-बधिर आदि) मनुष्य हों, उनका भी राजा आदर करे। महाबली राजा अपने शत्रुके विपरीत क्रमशः अथवा एक साथ सारा उद्योग आरम्भ कर दे। वह उसे पीड़ा दे। उसकी गति अवरुद्ध करे और उसका खजाना नष्ट कर दे ॥ १३-१४ ॥
कार्यं यत्नेन शत्रूणां स्वराज्यं रक्षता स्वयम् ।
न च हिंस्योऽभ्युपगतः सामन्तो वृद्धिमिच्छता ॥ १५ ॥
अपने राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको यत्नपूर्वक शत्रुओंके साथ उपर्युक्त बर्ताव करना चाहिये; परंतु अपनी वृद्धि चाहनेवाले नरेशको शरणमें आये हुए सामन्तका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
कौन्तेय तं न हिंसेत् स यो महीं विजिगीषते ।
गणानां भेदने योगमीप्सेथाः सह मन्त्रिभिः ॥ १६ ॥
कुन्तीकुमार! जो समूची पृथ्वीपर विजय पाना चाहता हो, वह तो कदापि उस (सामन्त)-की हिंसा न करे। तुम अपने मन्त्रियोंसहित सदा शत्रुगणोंमें फूट डालनेकी इच्छा रखना ॥ १६ ॥
साधुसंग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात् तथा ।
दुर्बलांश्चैव सततं नान्वेष्टव्या बलीयसा ॥ १७ ॥
अच्छे पुरुषोंसे मेल-जोल बढ़ाये और दुष्टोंको कैद करके उन्हें दण्ड दे। महाबली नरेशको दुर्बल शत्रुके पीछे सदा नहीं पड़े रहना चाहिये ॥ १७ ॥
तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः ।
यद्येनमभियायाच्च बलवान् दुर्बलं नृपः ॥ १८ ॥
सामादिभिरुपायैस्तं क्रमेण विनिवर्तयेः ।
राजसिंह! तुम्हें बेंतकी-सी वृत्ति (नम्रता)-का आश्रय लेकर रहना चाहिये। यदि किसी दुर्बल राजापर बलवान् राजा आक्रमण करे तो क्रमशः साम आदि उपायोंद्वारा उस बलवान् राजाको लौटानेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ १८ १/२ ॥
अशक्नुवंश्च युद्धाय निष्पतेत् सह मन्त्रिभिः ॥ १९ ॥
कोशेन पौरैर्दण्डेन ये चास्य प्रियकारिणः ।
यदि अपनेमें युद्धकी शक्ति न हो तो मन्त्रियोंके साथ उस आक्रमणकारी राजाकी शरणमें जाय तथा कोश, पुरवासी मनुष्य, दण्डशक्ति एवं अन्य जो प्रिय कार्य हों, उन सबको अर्पित करके उस प्रतिद्वन्द्वीको लौटानेकी चेष्टा करे ॥ १९ १/२ ॥
असम्भवे तु सर्वस्य यथा मुख्येन निष्पतेत् ।
क्रमेणानेन मुक्तिः स्याच्छरीरमिति केवलम् ॥ २० ॥
यदि किसी भी उपायसे संधि न हो तो मुख्य साधनको लेकर विपक्षीपर युद्धके लिये टूट पड़े। इस क्रमसे शरीर चला जाय तो भी वीर पुरुषकी मुक्ति ही होती है। केवल शरीर दे
देना ही उसका मुख्य साधन है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपदेशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपदेशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
* कृषि आदि आठ सन्धान कर्म हैं। बाल आदि बीस असन्धेय हैं। नास्तिकता आदि चौदह दोष हैं और मन्त्र आदि अठारह तीर्थ हैं। उन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन पहले आ चुका है।
अध्याय (पृष्ठ 2283)
सप्तमोऽध्यायः
युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश
धृतराष्ट्र उवाच
संधिविग्रहमप्यत्र पश्येथा राजसत्तम ।
द्वियोनिं विविधोपायं बहुकल्पं युधिष्ठिर ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम्हें संधि और विग्रहपर भी दृष्टि रखनी चाहिये। शत्रु प्रबल हो तो उसके साथ संधि करना और दुर्बल हो तो उसके साथ युद्ध छेड़ना—ये संधि और विग्रहके दो आधार हैं। इनके प्रयोगके उपाय भी नाना प्रकारके हैं और इनके प्रकार भी बहुत हैं ॥ १ ॥
कौरव्य पर्युपासीथाः स्थित्वा द्वैविध्यमात्मनः ।
तुष्टपुष्टबलः शत्रुरात्मवानिति च स्मरेत् ॥ २ ॥
कुरुनन्दन! अपनी द्विविध अवस्था—बलाबलका अच्छी तरह विचार करके शत्रुसे युद्ध या मेल करना उचित है। यदि शत्रु मनस्वी है और उसके सैनिक हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट हैं तो उसपर सहसा धावा न करके उसे परास्त करनेका कोई दूसरा उपाय सोचे ॥ २ ॥
पर्युपासनकाले तु विपरीतं विधीयते ।
आमर्दकाले राजेन्द्र व्यपसर्पेत् ततः परम् ॥ ३ ॥
आक्रमणकालमें शत्रुको स्थिति विपरीत रहनी चाहिये अर्थात् उसके सैनिक हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट नहीं होने चाहिये। राजेन्द्र! यदि शत्रुसे अपना मान मर्दन होनेकी सम्भावना हो तो वहाँसे भागकर किसी दूसरे मित्र राजाकी शरण लेनी चाहिये ॥ ३ ॥
व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारयेत् ततः ।
कर्षणं भीषणं चैव युद्धे चैव बलक्षयम् ॥ ४ ॥
वहाँ यह प्रयत्न करना चाहिये कि शत्रुओंपर कोई संकट आ जाय या उनमें फूट पड़ जाय, वे क्षीण और भयभीत हो जायें तथा युद्धमें उनकी सेना नष्ट हो जाय ॥ ४ ॥
प्रयास्यमानो नृपतिस्त्रिविधां परिचिन्तयेत् ।
आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ॥ ५ ॥
शत्रुपर चढ़ाई करनेवाले शास्त्रविशारद राजाको अपनी और शत्रुको त्रिविध शक्तियोंपर भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये ॥ ५ ॥
उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत ।
उपपन्नो नृपो यायाद् विपरीतं च वर्जयेत् ॥ ६ ॥
भारत! जो राजा उत्साह-शक्ति, प्रभु-शक्ति और मन्त्र-शक्तिमें शत्रुको अपेक्षा बढ़ा-चढ़ा हो, उसे ही आक्रमण करना चाहिये। यदि इसके विपरीत अवस्था हो तो आक्रमणका विचार
त्याग देना चाहिये ॥ ६ ॥ आददीत बलं राजा मौलं मित्रबलं तथा । अटवीबलं भृतं चैव तथा श्रेणीबलं प्रभो ॥ ७ ॥ प्रभो! राजाको अपने पास सैनिकबल, धनबल, मित्रबल, अरण्यबल, भृत्यबल और श्रेणीबलका संग्रह करना चाहिये ॥ ७ ॥ तत्र मित्रबलं राजन् मौलं चैव विशिष्यते । श्रेणीबलं भृतं चैव तुल्ये एवेति मे मतिः ॥ ८ ॥ राजन्! इनमें मित्रबल और धनबल सबसे बढ़कर है। श्रेणीबल और भृत्यबल—ये दोनों समान ही हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ८ ॥ तथा चारबलं चैव परस्परसमं नृप । विज्ञेयं बहुकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ॥ ९ ॥ नरेश्वर! चारबल (दूतोंका बल) भी परस्पर समान ही है। राजाको समय आनेपर अधिक अवसरोंपर इस तत्त्वको समझे रहना चाहिये ॥ ९ ॥ आपदश्चापि बोद्धव्या बहुरूपा नराधिप । भवन्ति राज्ञा कौरव्य यास्ताः पृथगतः शृणु ॥ १० ॥ महाराज! कुरुनन्दन! राजापर आनेवाली अनेक प्रकारकी आपत्तियाँ भी होती हैं, जिन्हें जानना चाहिये। अतः उनका पृथक्-पृथक् वर्णन सुनो ॥ १० ॥ विकल्पा बहुधा राजन्नापदां पाण्डुनन्दन । सामादिभिरुपन्यस्य गणयेत् तान् नृपः सदा ॥ ११ ॥ राजन्! पाण्डुनन्दन! उन आपत्तियोंके अनेक प्रकारके विकल्प हैं। राजा साम आदि उपायोंद्वारा उन सबको सामने लाकर सदा गिने ॥ ११ ॥ यात्रां गच्छेद बलैर्युक्तो राजा सद्भिः परंतप । युक्तश्च देशकालाभ्यां बलैरात्मगुणैस्तथा ॥ १२ ॥ परंतप नरेश! देश-कालकी अनुकूलता होनेपर सैनिक-बल तथा राजोचित गुणोंसे युक्त राजा अच्छी सेना साथ लेकर विजयके लिये यात्रा करे ॥ १२ ॥ हृष्टपुष्टबलो गच्छेद राजा वृद्धयुदये रतः । अकृशश्चाप्यथो यायादनृतावपि पाण्डव ॥ १३ ॥ पाण्डुनन्दन! अपने अभ्युदयके लिये तत्पर रहनेवाला राजा यदि दुर्बल न हो और उसकी सेना हृष्ट-पुष्ट हो तो वह युद्धके अनुकूल मौसम न होनेपर भी शत्रुपर चढ़ाई करे ॥ १३ ॥ तूणाश्मानं वाजिरथप्रवाहां ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् । पदातिनागैर्बहुकर्दमां नदीं
सपत्ननाशे नृपतिः प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥ शत्रुओंके विनाशके लिये राजा अपनी सेनारूपी नदीका प्रयोग करे। जिसमें तरकस ही प्रस्तरखण्डके समान हैं, घोड़े और रथरूपी प्रवाह शोभा पाते हैं, जिसका कूल-किनारा ध्वजरूपी वृक्षोंसे आच्छादित है तथा पैदल और हाथी जिसके भीतर अगाध पंकके समान जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥
अथोपपत्त्या शकटं पद्मवज्रं च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद् विहितं विभो ॥ १५ ॥ भारत! युद्धके समय युक्ति करके सेनाका शकट, पद्म अथवा वज्र नामक व्यूह बना ले। प्रभो! शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं, उसमें ऐसा ही विधान मिलता है ॥ १५ ॥
चारयित्वा परबलं कृत्वा स्वबलदर्शनम् । स्वभूमौ योजयेद् युद्धं परभूमौ तथैव च ॥ १६ ॥ गुप्तचरोंद्वारा शत्रुसेनाकी जाँच-पड़ताल करके अपनी सैनिक-शक्तिका भी निरीक्षण करे। फिर अपनी या शत्रु की भूमिपर युद्ध आरम्भ करे ॥ १६ ॥
बलं प्रसादयेद् राजा निक्षिपेद् बलिनो नरान् । ज्ञात्वा स्वविषयं तत्र सामादिभिरुपक्रमेत् ॥ १७ ॥ राजाको चाहिये कि वह पारितोषिक आदिके द्वारा सेनाको संतुष्ट रखे और उसमें बलवान् मनुष्योंकी भर्ती करे। अपने बलाबलको अच्छी तरह समझकर साम आदि उपायोंके द्वारा संधि या युद्धके लिये उद्योग करे ॥ १७ ॥
सर्वथैव महाराज शरीरं धारयेदिह । प्रेत्य चेह च कर्तव्यमात्मनिःश्रेयसं परम् ॥ १८ ॥ महाराज! इस जगत्में सभी उपायोंद्वारा शरीरकी रक्षा करनी चाहिये और उसके द्वारा इहलोक तथा परलोकमें भी अपने कल्याणका उत्तम साधन करना उचित है ॥ १८ ॥
एवमेतन्महाराज राजा सम्यक् समाचरन् । प्रेत्य स्वर्गमवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १९ ॥ महाराज! जो राजा इन सब बातोंका विचार करके इनके अनुसार ठीक-ठीक आचरण और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १९ ॥
एवं त्वया कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजाहितम् । उभयोर्लोकयोस्तात प्राप्तये नित्यमेव हि ॥ २० ॥ तात! कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हें इहलोक और परलोकमें सुख पानेके लिये सदा ही प्रजावर्गके हित-साधनमें संलग्न रहना चाहिये ॥ २० ॥
भीष्मेण सर्वमुक्तोऽसि कृष्णेन विदुरेण च । मयाप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ॥ २१ ॥