महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
एकोनविंशोऽध्यायः
अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं सहधर्मेति प्रोच्यते भरतर्षभ ।
पाणिग्रहणकाले तु स्त्रीणामेतत् कथं स्मृतम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ! जो यह स्त्रियोंके लिये विवाहकालमें सहधर्मकी बात कही जाती है, वह किस प्रकार बतायी गयी है? ॥ १ ॥
आर्ष एष भवेद् धर्मः प्राजापत्योऽथवाऽऽसुरः ।
यदेतत् सहधर्मेति पूर्वमुक्तं महर्षिभिः ॥ २ ॥
महर्षियोंने पूर्वकालमें जो यह स्त्री-पुरुषोंके सहधर्मकी बात कही है, यह आर्ष धर्म है या प्राजापत्य धर्म; अथवा आसुर धर्म है? ॥ २ ॥
संदेहः सुमहानेष विरुद्ध इति मे मतिः ।
इह यः सहधर्मो वै प्रेत्यायं विहितः क्व नु ॥ ३ ॥
मेरे मनमें यह महान् संदेह पैदा हो गया है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि यह सहधर्मका कथन विरुद्ध है। यहाँ जो सहधर्म है, वह मृत्युके पश्चात् कहाँ रहता है? ॥
स्वर्गो मृतानां भवति सहधर्मः पितामह ।
पूर्वमेकस्तु म्रियते क्व चैकस्तिष्ठते वद ॥ ४ ॥
पितामह! जबकि मरे हुए मनुष्योंका स्वर्गवास हो जाता है एवं पति और पत्नीमेंसे एककी पहले मृत्यु हो जाती है, तब एक व्यक्तिमें सहधर्म कहाँ रहता है? यह बताइये ॥ ४ ॥
नानाधर्मफलोपेता नानाकर्मनिवासिताः ।
नानानिरयनिष्ठान्ता मानुषा बहवो यदा ॥ ५ ॥
जब बहुत-से मनुष्य नाना प्रकारके धर्मफलसे संयुक्त होते हैं, नाना प्रकारके कर्मवश विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हैं और शुभाशुभ कर्मोंके फल-स्वरूप स्वर्ग-नरक आदि नाना अवस्थाओंमें पड़ते हैं, तब वे सहधर्मका निर्वाह किस प्रकार कर सकते हैं? ॥ ५ ॥
अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति ।
यदानृताः स्त्रियस्तात सहधर्मः कुतः स्मृतः ॥ ६ ॥
धर्मसूत्रकार यह निश्चितरूपसे कहते हैं कि स्त्रियाँ असत्यपरायण होती हैं। तात! जब स्त्रियाँ असत्यवादिनी ही हैं तब उन्हें साथ रखकर सहधर्मका अनुष्ठान कैसे किया जा सकता है? ॥ ६ ॥
अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते ।
धर्मोऽयं पूर्विका संज्ञा उपचारः क्रियाविधिः ॥ ७ ॥
वेदोंमें भी यह बात पढ़ी गयी है कि स्त्रियाँ असत्यभाषिणी होती हैं, ऐसी दशामें उनका वह असत्य भी सहधर्मके अन्तर्गत आ सकता है, किंतु असत्य कभी धर्म नहीं हो सकता; अतः दाम्पत्यधर्मको जो सहधर्म कहा गया है, यह उसकी गौण संज्ञा है। वे पति-पत्नी साथ रहकर जो भी कार्य करते हैं, उसीको उपचारतः धर्म नाम दे दिया गया है ॥ ७ ॥
गह्वरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तयतोऽनिशम् ।
निःसंदेहमिदं सर्वं पितामह यथाश्रुति ॥ ८ ॥
पितामह! मैं ज्यों-ज्यों इस विषयपर विचार करता हूँ, त्यों-त्यों यह बात मुझे अत्यन्त दुर्बोध प्रतीत होती है। अतः आपने इस विषयमें जो कुछ श्रुतिका विधान हो, उसके अनुसार यह सब समझाइये जिससे मेरा संदेह दूर हो जाय ॥ ८ ॥
यदैतद् यादृशं चैतद् यथा चैतत् प्रवर्तितम् ।
निखिलेन महाप्राज्ञ भवानेतद् ब्रवीतु मे ॥ ९ ॥
महामते! यह सहधर्म जबसे प्रचलित हुआ, जिस रूपमें सामने आया और जिस प्रकार इसकी प्रवृत्ति हुई, ये सारी बातें आप मुझे बताइये ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अष्टावक्रस्य संवादं दिशया सह भारत ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें अष्टावक्र मुनिका उत्तर दिशाकी अधिष्ठात्रीदेवीके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १० ॥
निर्वेष्टुकामस्तु पुरा अष्टावक्रो महातपाः ।
ऋषेरथ वदान्यस्य वव्रे कन्यां महात्मनः ॥ ११ ॥
पूर्वकालकी बात है, महातपस्वी अष्टावक्र विवाह करना चाहते थे, उन्होंने इसके लिये महात्मा वदान्य ऋषिसे उनकी कन्या माँगी ॥ ११ ॥
सुप्रभां नाम वै नाम्ना रूपेणाप्रतिमां भुवि ।
गुणप्रभावशीलेन चारित्रेण च शोभनाम् ॥ १२ ॥
उस कन्याका नाम था सुप्रभा। इस पृथ्वीपर उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। गुण, प्रभाव, शील और चरित्र सभी दृष्टियोंसे वह परम सुन्दर थी ॥ १२ ॥
सा तस्य दृष्ट्वैव मनो जहार शुभलोचना ।
वनराजी यथा चित्रा वसन्ते कुसुमाचिता ॥ १३ ॥
जैसे वसंतऋतुमें सुन्दर फूलोंसे सजी हुई विचित्र वनश्रेणी मनुष्यके मनको लुभा लेती है, उसी प्रकार उस शुभलोचना मुनिकुमारीने दर्शनमात्रसे अष्टावक्रका मन चुरा लिया था ॥ १३ ॥
ऋषिस्तमाह देया मे सुता तुभ्यं हि तच्छृणु ।
(अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ह्यप्रवासी प्रियंवदः ।
सुरूपः सम्मतो वीरः शीलवान् भोगभुक्छविः ॥
दारानुमतयज्ञश्च सुनक्षत्रामथोद्वहेत् ।
स्वभर्त्रा स्वजनोपेत इह प्रेत्य च मोदते ॥)
गच्छ तावद् दिशं पुण्यामुत्तरां द्रक्ष्यसे ततः ॥ १४ ॥
वदान्य ऋषिने अष्टावक्रके माँगनेपर इस प्रकार उत्तर दिया—‘विप्रवर! जिसके दूसरी कोई स्त्री न हो, जो परदेशमें न रहता हो, विद्वान्, प्रिय वचन बोलनेवाला, लोकसम्मानित, वीर, सुशील, भोग भोगनेमें समर्थ, कान्तिमान् और सुन्दर पुरुष हो, उसीके साथ मुझे अपनी पुत्रीका विवाह करना है। जो स्त्रीकी अनुमतिसे यज्ञ करता और उत्तम नक्षत्रवाली कन्याको ब्याहता है, वह पुरुष अपनी पत्नीके साथ तथा पत्नी अपने पतिके साथ रहकर दोनों ही इहलोक और परलोकमें आनन्द भोगते हैं। मैं तुम्हें अपनी कन्या अवश्य दे दूँगा, परंतु पहले एक बात सुनो, यहाँसे परम पवित्र उत्तर दिशाकी ओर चले जाओ। वहाँ तुम्हें उसका दर्शन होगा’ ॥ १४ ॥
अष्टावक्र उवाच
किं द्रष्टव्यं मया तत्र वक्तुमर्हति मे भवान् ।
तथेदानीं मया कार्यं यथा वक्ष्यति मां भवान् ॥ १५ ॥
**अष्टावक्रने पूछा—**महर्षे! उत्तर दिशामें जाकर मुझे किसका दर्शन करना होगा? आप यह बतानेकी कृपा करें तथा उस समय मुझे क्या और किस प्रकार करना चाहिये, यह भी आप ही बतायेंगे ॥ १५ ॥
वदान्य उवाच
धनदं समतिक्रम्य हिमवन्तं च पर्वतम् ।
रुद्रस्यायतनं दृष्ट्वा सिद्धचारणसेवितम् ॥ १६ ॥
**वदान्यने कहा—**वत्स! तुम कुबेरकी अलकापुरीको लाँघकर जब हिमालय पर्वतको भी लाँघ जाओगे तब तुम्हें सिद्धों और चारणोंसे सेवित रुद्रके निवासस्थान कैलास पर्वतका दर्शन होगा ॥ १६ ॥
संहृष्टैः पार्षदैर्जुष्टं नृत्यद्भिर्विविधाननैः ।
दिव्याङ्गरागैः पैशाचैरन्यैर्नानाविधैः प्रभोः ॥ १७ ॥
वहाँ नाना प्रकारके मुखवाले भाँति-भाँतिके दिव्य अंगराग लगाये अनेकानेक पिशाच तथा अन्य भूत-वैताल आदि भगवान् शिवके पार्षदगण हर्ष और उल्लासमें भरकर नाच रहे होंगे ॥ १७ ॥
पाणितालसुतालैश्च शम्पातालैः समैस्तथा ।
सम्प्रहृष्टैः प्रनृत्यद्भिः शर्वस्तत्र निषेव्यते ॥ १८ ॥
वे करताल और सुन्दर ताल बजाकर शम्पा ताल देते हुए समभावसे हर्षविभोर हो जोर-जोरसे नृत्य करते हुए वहाँ भगवान् शंकरकी सेवा करते हैं ॥ १८ ॥
इष्टं किल गिरौ स्थानं तद्दिव्यमिति शुश्रुम ।
नित्यं संनिहितो देवस्तथा ते पार्षदाः स्मृताः ॥ १९ ॥
उस पर्वतका वह दिव्य स्थान भगवान् शंकरको बहुत प्रिय है। यह बात हमारे सुननेमें आयी है। वहाँ महादेवजी तथा उनके पार्षद नित्य निवास करते हैं ॥
तत्र देव्या तपस्तप्तं शङ्करार्थं सुदुश्चरम् ।
अतस्तदिष्टं देवस्य तथोमाया इति श्रुतिः ॥ २० ॥
वहाँ देवी पार्वती ने भगवान् शंकरकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी, इसीलिये वह स्थान भगवान् शिव और पार्वतीको अधिक प्रिय है, ऐसा सुना जाता है ॥ २० ॥
पूर्वे तत्र महापाश्र्वं देवस्योत्तरतस्तथा ।
ऋतवः कालरात्रिश्च ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ २१ ॥
देवं चोपासते सर्वे रूपिणः किल तत्र ह ।
तदतिक्रम्य भवनं त्वया यातव्यमेव हि ॥ २२ ॥
महादेवजीके पूर्व तथा उत्तर भागमें महापाश्र्व नामक पर्वत है, जहाँ ऋतु, कालरात्रि तथा दिव्य और मानुषभाव सब-के-सब मूर्तिमान् होकर महादेवजीकी उपासना करते हैं। उस स्थानको लाँघकर तुम आगे बढ़ते ही चले जाना ॥ २१-२२ ॥
ततो नीलं वनोद्देशं द्रक्ष्यसे मेघसंनिभम् ।
रमणीयं मनोग्राहि तत्र वै द्रक्ष्यसे स्त्रियम् ॥ २३ ॥
तपस्विनीं महाभागां वृद्धां दीक्षामनुष्ठिताम् ।
द्रष्टव्या सा त्वया तत्र सम्पूज्या चैव यत्नतः ॥ २४ ॥
तदनन्तर तुम्हें मेघोंकी घटाके समान नीला एक वन्य प्रदेश दिखायी देगा। वह बड़ा ही मनोरम और रमणीय है। उस वनमें तुम एक स्त्रीको देखोगे जो तपस्विनी, महान् सौभाग्यवती, वृद्धा और दीक्षापरायण है। तुम यत्नपूर्वक वहाँ उसका दर्शन और पूजन करना ॥ २३-२४ ॥
तां दृष्ट्वा विनिवृत्तस्त्वं ततः पाणिं ग्रहीष्यसि ।
यद्येष समयः सर्वः साध्यतां तत्र गम्यताम् ॥ २५ ॥ उसे देखकर लौटनेपर ही तुम मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कर सकोगे। यदि यह सारी शर्त स्वीकार हो तो इसे पूरी करनेमें लग जाओ और अभी वहाँकी यात्रा आरम्भ कर दो ॥ २५ ॥
अष्टावक्र उवाच
तथास्तु साधयिष्यामि तत्र यास्याम्यसंशयम् ।
यत्र त्वं वदसे साधो भवान् भवतु सत्यवाक् ॥ २६ ॥
अष्टावक्र बोले— ऐसा ही होगा, मैं यह शर्त पूरी करूँगा। श्रेष्ठ पुरुष! आप जहाँ कहते हैं वहाँ अवश्य जाऊँगा। आपकी वाणी सत्य हो ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
ततोऽगच्छत् स भगवानुत्तरामुत्तरां दिशम् ।
हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २७ ॥
स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् ।
अभ्यगच्छन्नदीं पुण्यां बाहुदां धर्मशालिनीम् ॥ २८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर भगवान् अष्टावक्र उत्तरोत्तर दिशाकी ओर चल दिये। सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिश्रेष्ठ महापर्वत हिमालयपर पहुँचकर वे श्रेष्ठ द्विज धर्मसे शोभा पानेवाली पुण्यमयी बाहुदा नदीके तटपर गये ॥ २७-२८ ॥
अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा वै तर्प्य देवताः ।
तत्र वासाय शयने कौशे सुखमुवास ह ॥ २९ ॥
वहाँ निर्मल अशोक तीर्थमें स्नान करके देवताओंका तर्पण करनेके पश्चात् उन्होंने कुशकी चटाईपर सुखपूर्वक निवास किया ॥ २९ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय स द्विजः ।
स्नात्वा प्रादुश्चकाराग्निं स्तुत्वा चैनं प्रधानतः ॥ ३० ॥
रुद्राणीं रुद्रमासाद्य ह्रदे तत्र समाश्वसत् ।
विश्रान्तश्च समुत्थाय कैलासमभितो ययौ ॥ ३१ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर वे द्विज प्रातःकाल उठे और उन्होंने स्नान करके अग्निदेवको प्रज्वलित किया। फिर मुख्य-मुख्य वैदिक मन्त्रोंसे अग्निदेवकी स्तुति करके ‘रुद्राणी रुद्र’ नामक तीर्थमें गये और वहाँ सरोवरके तटपर कुछ कालतक विश्राम करते रहे। विश्रामके पश्चात् उठकर वे कैलासकी ओर चल दिये ॥ ३०-३१ ॥
सोऽपश्यत् काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिया ।
मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥
कुछ दूर जानेपर उन्होंने कुबेरकी अलकापुरीका सुवर्णमय द्वार देखा, जो दिव्य दीप्तिसे देदीप्यमान हो रहा था। वहीं महात्मा कुबेरकी कमलपुष्पोंसे सुशोभित एक बावड़ी देखी, जो गंगाजीके जलसे परिपूर्ण होनेके कारण मन्दाकिनी नामसे विख्यात थी ॥ ३२ ॥
अथ ते राक्षसाः सर्वे येऽभिरक्षन्ति पद्मिनीम्।
प्रत्युत्थिता भगवन्तं मणिभद्रपुरोगमाः ॥ ३३ ॥
वहाँ जो उस पद्मपूर्ण पुष्करिणीकी रक्षा कर रहे थे, वे सब मणिभद्र आदि राक्षस भगवान् अष्टावक्रको देखकर उनके स्वागतके लिये उठकर खड़े हो गये ॥
स तान् प्रत्यर्चयामास राक्षसान् भीमविक्रमान्।
निवेदयत मां क्षिप्रं धनदायेति चाब्रवीत् ॥ ३४ ॥
मुनिने भी उन भयंकर पराक्रमी राक्षसोंके प्रति सम्मान प्रकट किया और कहा—‘आपलोग शीघ्र ही धनपति कुबेरको मेरे आगमनकी सूचना दे दें’ ॥ ३४ ॥
ते राक्षसास्तथा राजन् भगवन्तमथाब्रुवन्।
असौ वैश्रवणो राजा स्वयमायाति तेऽन्तिकम् ॥ ३५ ॥
राजन्! वे राक्षस वैसा करके भगवान् अष्टावक्रसे बोले—‘प्रभो! राजा कुबेर स्वयं ही आपके निकट पधार रहे हैं’ ॥ ३५ ॥
विदितो भगवानस्य कार्यमागमनस्य यत्।
पश्यैनं त्वं महाभागं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ ३६ ॥
‘आपका आगमन और इस आगमनका जो उद्देश्य है, वह सब कुछ कुबेरको पहलेसे ही ज्ञात है। देखिये, ये महाभाग धनाध्यक्ष अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए आ रहे हैं’ ॥ ३६ ॥
ततो वैश्रवणोऽभ्येत्य अष्टावक्रमनिन्दितम्।
विधिवत्कुशलं पृष्ट्वा ततो ब्रह्मर्षिमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर विश्रवाके पुत्र कुबेरने निकट आकर निन्दारहित ब्रह्मर्षि अष्टावक्रसे विधिपूर्वक कुशल-समाचार पूछते हुए कहा— ॥ ३७ ॥
सुखं प्राप्तो भवान् कच्चित् किं वा मत्तश्चिकीर्षति।
ब्रूहि सर्वं करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि वै द्विज ॥ ३८ ॥
‘ब्रह्मन्! आप सुखपूर्वक यहाँ आये हैं न? बताइये मुझसे किस कार्यकी सिद्धि चाहते हैं? आप मुझसे जो-जो कहेंगे, वह सब पूर्ण करूँगा’ ॥ ३८ ॥
भवनं प्रविश त्वं मे यथाकामं द्विजोत्तम।
सत्कृतः कृतकार्यश्च भवान् यास्यत्यविघ्नतः ॥ ३९ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! आप इच्छानुसार मेरे भवनमें प्रवेश कीजिये और यहाँका सत्कार ग्रहण करके कृतकृत्य हो यहाँसे निर्विघ्न यात्रा कीजियेगा ॥ ३९ ॥
प्राविशद् भवनं स्वं वै गृहीत्वा तं द्विजोत्तमम्।
आसनं स्वं ददौ चैव पाद्यमर्घ्यं तथैव च ॥ ४० ॥
ऐसा कहकर कुबेरने विप्रवर अष्टावक्रको साथ लेकर अपने भवनमें प्रवेश किया और उन्हें पाद्य, अर्घ्य तथा अपना आसन दिया ॥ ४० ॥
अथोपविष्टयोस्तत्र मणिभद्रपुरोगमाः ।
निषेदुस्तत्र कौबेरा यक्षगन्धर्वकिन्नराः ॥ ४१ ॥
जब कुबेर और अष्टावक्र दोनों वहाँ आरामसे बैठ गये तब कुबेरके सेवक मणिभद्र आदि यक्ष, गन्धर्व और किन्नर भी नीचे बैठ गये ॥ ४१ ॥
ततस्तेषां निषण्णानां धनदो वाक्यमब्रवीत् ।
भवच्छन्दं समाज्ञाय नृत्येयुरप्सरोगणाः ॥ ४२ ॥
आतिथ्यं परमं कार्यं शुश्रूषा भवतस्तथा ।
संवर्ततामित्युवाच मुनिर्मधुरया गिरा ॥ ४३ ॥
उन सबके बैठ जानेपर कुबेरने कहा—'आपकी इच्छा हो तो उसे जानकर यहाँ अप्सराएँ नृत्य करें; क्योंकि आपका आतिथ्य सत्कार और सेवा करना हमलोगोंका परम कर्तव्य है।' तब मुनिने मधुर वाणीमें कहा, 'तथास्तु—ऐसा ही हो' ॥ ४२-४३ ॥
अथोर्वरा मिश्रकेशी रम्भा चैवोर्वशी तथा ।
अलम्बुषा घृताची च चित्रा चित्राङ्गदा रुचिः ॥ ४४ ॥
मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा ।
विद्युता प्रशमी दान्ता विद्योता रतिरेव च ॥ ४५ ॥
एताश्चान्याश्च वै बह्व्यः प्रनृत्ताप्सरसः शुभाः ।
अवादयंश्च गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च ॥ ४६ ॥
तदनन्तर उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा, उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा, रुचि, मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युता, प्रशमी, दान्ता, विद्योता और रति—ये तथा और भी बहुत-सी शुभलक्षणा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्वगण नाना प्रकारके बाजे बजाने लगे ॥ ४४—४६ ॥
अथ प्रवृत्ते गान्धर्वे दिव्ये ऋषिरुपाविशत् ।
दिव्यं संवत्सरं तत्रारमतैष महातपाः ॥ ४७ ॥
वह दिव्य नृत्य-गीत आरम्भ होनेपर महातपस्वी ऋषि अष्टावक्र भी दर्शक-मण्डलीमें आ बैठे और वे देवताओंके वर्षसे एक वर्षतक इसी आमोद-प्रमोदमें रमते रहे ॥ ४७ ॥
ततो वैश्रवणो राजा भगवन्तमुवाच ह ।
साग्रः संवत्सरो जातो विप्रेह तव पश्यतः ॥ ४८ ॥
तब राजा वैश्रवण (कुबेर)-ने भगवान् अष्टावक्रसे कहा—'विप्रवर! यहाँ नृत्य देखते हुए आपका एक वर्षसे कुछ अधिक समय व्यतीत हो गया है ॥ ४८ ॥
हार्योऽयं विषयो ब्रह्मन् गान्धर्वो नाम नामतः ।
छन्दतो वर्ततां विप्र यथा वदति वा भवान् ।। ४९ ।।
‘ब्रह्मन्! यह नृत्य-गीतका विषय जिसे ‘गान्धर्व’ नाम दिया गया है बड़ा मनोहारी है; अतः यदि आपकी इच्छा हो तो यह आयोजन कुछ दिन और इसी तरह चलता रहे अथवा विप्रवर! आप जैसी आज्ञा दें वैसा किया जाय ।। ४९ ।।
अतिथिः पूजनीयस्त्वमिदं च भवतो गृहम् ।
सर्वमाज्ञाप्यतामाशु परवन्तो वयं त्वयि ।। ५० ।।
‘आप मेरे पूजनीय अतिथि हैं। यह घर आपका ही है। आप निस्संकोच भावसे शीघ्र ही सभी कार्योंके लिये हमें आज्ञा दें। हम आपके वशवर्ती किंकर हैं’ ।।
अथ वैश्रवणं प्रीतो भगवान् प्रत्यभाषत ।
अर्चितोऽस्मि यथान्यायं गमिष्यामि धनेश्वर ।। ५१ ।।
तब अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् अष्टावक्रने कुबेरसे कहा—‘धनेश्वर! आपने यथोचित रूपसे मेरा सत्कार किया है। अब आज्ञा दें, मैं यहाँसे जाऊँगा ।। ५१ ।।
प्रीतोऽस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप ।
तव प्रसादाद् भगवन् महर्षेश्च महात्मनः ।। ५२ ।।
नियोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान् भव ।
अथ निष्क्रम्य भगवान् प्रययावुत्तरामुखः ।। ५३ ।।
‘धनाधिप! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आपकी सारी बातें आपके अनुरूप ही हैं। भगवन्! अब मैं आपकी कृपासे उन महात्मा महर्षि वदान्यकी आज्ञाके अनुसार आगे जाऊँगा। आप अभ्युदयशील एवं समृद्धिशाली हों।' इतना कहकर भगवान् अष्टावक्र उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके चल दिये ।। ५२-५३ ।।
कैलासं मन्दरं हैमं सर्वाननुचचार ह ।
एवं समूचे कैलास, मन्दराचल और हिमालयपर विचरण करने लगे ।। ५३ ½ ।।
तानतीत्य महाशैलान् कैरातं स्थानमुत्तमम् ।। ५४ ।।
प्रदक्षिणं तथा चक्रे प्रयतः शिरसा नतः ।
धरणीमवतीर्याथ पूतात्मासौ तदाभवत् ।। ५५ ।।
उन बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँघकर यतचित्त हो उन्होंने किरातवेषधारी महादेवजीके उत्तम स्थानकी परिक्रमा की और उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर नीचे पृथ्वीपर उतरकर वे उस स्थानके माहात्म्यसे तत्काल पवित्रात्मा हो गये ।। ५४-५५ ।।
स तं प्रदक्षिणं कृत्वा त्रिः शैलं चोत्तरामुखः ।
समेन भूमिभागेन ययौ प्रीतिपुरस्कृतः ।। ५६ ।।
तीन बार उस पर्वतकी परिक्रमा करके वे उत्तराभिमुख हो समतल भूमिसे प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े ।। ५६ ।।
ततोऽपरं वनोद्देशं रमणीयमपश्यत ।
सर्वर्तुभिर्मूलफलैः पक्षिभिश्च समन्वितैः ॥ ५७ ॥ रमणीयैर्वनोद्देशैस्तत्र तत्र विभूषितम् । आगे जानेपर उन्हें एक दूसरी रमणीय वनस्थली दिखायी दी, जो सभी ऋतुओंके फल-मूलों, पक्षिसमूहों और मनोरम वनप्रान्तोंसे जहाँ-तहाँ शोभासम्पन्न हो रही थी ॥ ५७ १/२ ॥
तत्राश्रमपदं दिव्यं ददर्श भगवानथ ॥ ५८ ॥ शैलांश्च विविधाकारान् काञ्चनान् रत्नभूषितान् । मणिभूमौ निविष्टांश्च पुष्करिण्यस्तथैव च ॥ ५९ ॥ वहाँ भगवान् अष्टावक्रने एक दिव्य आश्रम देखा। उस आश्रमके चारों ओर नाना प्रकारके सुवर्णमय एवं रत्नभूषित पर्वत शोभा पा रहे थे। वहाँकी मणिमयी भूमिपर कई सुन्दर बावड़ियाँ बनी थीं ॥ ५८-५९ ॥
अन्यान्यपि सुरम्याणि पश्यतः सुबहून्यथ । भृशं तस्य मनो रेमे महर्षेर्भावितात्मनः ॥ ६० ॥ इनके सिवा और भी बहुत-से सुरम्य दृश्य वहाँ दिखायी देते थे। उन सबको देखते हुए उन भावितात्मा महर्षिका मन वहाँ विशेष आनन्दका अनुभव करने लगा ॥
स तत्र काञ्चनं दिव्यं सर्वरत्नमयं गृहम् । ददर्शाद्भुतसंकाशं धनदस्य गृहाद् वरम् ॥ ६१ ॥ महर्षिने उस प्रदेशमें एक दिव्य सुवर्णमय भवन देखा, जिसमें सब प्रकारके रत्न जड़े गये थे। वह मनोहर गृह कुबेरके राजभवनसे भी सुन्दर, श्रेष्ठ एवं अद्भुत था ॥ ६१ ॥
महान्तो यत्र विविधा मणिकाञ्चनपर्वताः । विमानानि च रम्याणि रत्नानि विविधानि च ॥ ६२ ॥ वहाँ भाँति-भाँतिके मणिमय और सुवर्णमय विशाल पर्वत शोभा पाते थे। अनेकानेक सुरम्य विमान तथा नाना प्रकारके रत्न दृष्टिगोचर होते थे ॥ ६२ ॥
मन्दारपुष्पैः संकीर्णां तथा मन्दाकिनीं नदीम् । स्वयंप्रभांश्च मणयो वज्रैर्भूमिश्च भूषिता ॥ ६३ ॥ उस प्रदेशमें मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती थी, जिसके स्रोतमें मन्दारके पुष्प बह रहे थे। वहाँ स्वयं प्रकाशित होनेवाली मणियाँ अपनी अद्भुत छटा बिखेर रही थीं। वहाँकी भूमि हीरोंसे जड़ी गयी थी ॥ ६३ ॥
नानाविधैश्च भवनैर्विचित्रमणितोरणैः । मुक्ताजालविनिक्षिप्तैर्मणिरत्नविभूषितैः ॥ ६४ ॥ मनोदृष्टिहरै रम्यैः सर्वतः संवृतं शुभैः । ऋषिभिश्चावृतं तत्र आश्रमं तं मनोहरम् ॥ ६५ ॥ उस आश्रमके चारों ओर विचित्र मणिमय तोरणोंसे सुशोभित, मोतीकी झालरोंसे अलंकृत तथा मणि एवं रत्नोंसे विभूषित सुन्दर भवन शोभा पा रहे थे। वे मनको मोह
लेनेवाले तथा दृष्टिको बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले थे। उन मंगलमय भवनोंसे घिरा और ऋषि-मुनियोंसे भरा हुआ वह आश्रम बड़ा मनोहर जान पड़ता था ॥ ६४-६५ ॥
ततस्तस्याभवच्चिन्ता कुत्र वासो भवेदिति ।
अथ द्वारं समभितो गत्वा स्थित्वा ततोऽब्रवीत् ॥ ६६ ॥
वहाँ पहुँचकर अष्टावक्रके मनमें यह चिन्ता हुई कि अब कहाँ ठहरा जाय। यह विचार उठते ही वे प्रमुख द्वारके समीप गये और खड़े होकर बोले— ॥ ६६ ॥
अतिथिं समनुप्राप्तमभिजानन्तु येऽत्र वै ।
अथ कन्याः परिवृता गृहात् तस्माद् विनिर्गताः ॥ ६७ ॥
नानारूपाः सप्त विभो कन्याः सर्वा मनोहराः ।
यां यामपश्यत् कन्यां वै सा सा तस्य मनोऽहरत् ॥ ६८ ॥
'इस घरमें जो लोग रहते हों, उन्हें यह विदित होना चाहिये कि मैं एक अतिथि यहाँ आया हूँ।' उनके इस प्रकार कहते ही उस घरसे एक साथ सात कन्याएँ निकलीं। वे सब-की-सब भिन्न-भिन्न रूपवाली तथा बड़ी मनोहर थीं। विभो! अष्टावक्र मुनि उनमेंसे जिस-जिस कन्याकी ओर देखते, वही-वही उनका मन हर लेती थी ॥ ६७-६८ ॥
न च शक्तो वारयितुं मनोऽस्याथावसीदति ।
ततो धृतिः समुत्पन्ना तस्य विप्रस्य धीमतः ॥ ६९ ॥
वे अपने मनको रोक नहीं पाते थे। बलपूर्वक रोकनेपर उनका मन शिथिल होता जाता था। तदनन्तर उन बुद्धिमान् ब्राह्मणके हृदयमें किसी तरह धैर्य उत्पन्न हुआ ॥ ६९ ॥
अथ तं प्रमदाः प्राहुर्भगवान् प्रविशत्विति ।
स च तासां सुरूपाणां तस्यैव भवनस्य हि ॥ ७० ॥
कौतूहलं समाविष्टः प्रविवेश गृहं द्विजः ।
तत्पश्चात् वे सातों तरुणी स्त्रियाँ बोलीं—'भगवन्! आप घरके भीतर प्रवेश करें।' ऋषिके मनमें उन सुन्दरियोंके तथा उस घरके विषयमें कौतूहल पैदा हो गया था; अतः उन्होंने उस घरमें प्रवेश किया ॥ ७० १/२ ॥
तत्रापश्यज्जरायुक्तामरजोऽम्बरधारिणीम् ॥ ७१ ॥
वृद्धां पर्यङ्कमासीनां सर्वाभरणभूषिताम् ।
वहाँ उन्होंने एक जराजीर्ण वृद्धा स्त्रीको देखा, जो निर्मल वस्त्र धारण किये समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो पलँगपर बैठी हुई थी ॥ ७१ १/२ ॥
स्वस्तीति तेन चैवोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत् तदा ॥ ७२ ॥
प्रत्युत्थाय च तं विप्रमास्यतामित्युवाच ह ।
अष्टावक्रने 'स्वस्ति' कहकर उसे आशीर्वाद दिया। वह स्त्री उनके स्वागतके लिये पलँगसे उठकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली—'विप्रवर! बैठिये' ॥ ७२ १/२ ॥
अष्टावक्र उवाच
सर्वाः स्वानालयान् यान्तु एका मामुपतिष्ठतु ॥ ७३ ॥
प्रज्ञाता या प्रशान्ता या शेषा गच्छन्तु च्छन्दतः ।
अष्टावक्रने कहा—'सारी स्त्रियाँ अपने-अपने घरको चली जायें। केवल एक ही मेरे पास रह जाय। जो ज्ञानवती तथा मन और इन्द्रियोंको शान्त रखनेवाली हो, उसीको यहाँ रहना चाहिये। शेष स्त्रियाँ अपनी इच्छाके अनुसार जा सकती हैं' ॥ ७३ १/२ ॥
ततः प्रदक्षिणीकृत्य कन्यास्तास्तमृषिं तदा ॥ ७४ ॥
निश्चक्रमुर्गृहात् तस्मात् सा वृद्धाथ व्यतिष्ठत ।
तदनन्तर वे सब कन्याएँ उस समय ऋषिकी परिक्रमा करके उस घरसे निकल गयीं। केवल वह वृद्धा ही वहाँ ठहरी रही ॥ ७४ १/२ ॥
अथ तां संविशन् प्राह शयने भास्वरे तदा ॥ ७५ ॥
त्वयापि सुप्यतां भद्रे रजनी ह्यतिवर्तते ।
तत्पश्चात् उज्ज्वल एवं प्रकाशमान शय्यापर सोते हुए ऋषिने उस वृद्धासे कहा—'भद्रे! अब तुम भी सो जाओ। रात अधिक बीत चली है' ॥ ७५ १/२ ॥
संलापात् तेन विप्रेण तथा सा तत्र भाषिता ॥ ७६ ॥
द्वितीये शयने दिव्ये संविवेश महाप्रभे ।
बातचीतके प्रसङ्गमें उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर वह भी दूसरे अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य पलँगपर सो रही ॥ ७६ १/२ ॥
अथ सा वेपमानाङ्गी निमित्तं शीतजं तदा ॥ ७७ ॥
व्यपदिश्य महर्षेर्वै शयनं व्यवरोहत ।
स्वागतेनागतां तां तु भगवानभ्यभाषत ॥ ७८ ॥
थोड़ी ही देरमें वह सरदी लगनेका बहाना करके थरथर काँपती हुई आयी और महर्षिकी शय्यापर आरूढ़ हो गयी। पास आनेपर भगवान् अष्टावक्रने 'आइये, स्वागत है' ऐसा कहकर उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया ॥ ७७-७८ ॥
सोपगूढद् भुजाभ्यां तु ऋषिं प्रीत्या नरर्षभ ।
निर्विकारमृषिं चापि काष्ठकुड्योपमं तदा ॥ ७९ ॥
नरश्रेष्ठ! उसने प्रेमपूर्वक दोनों भुजाओंसे ऋषिका आलिंगन कर लिया तो भी उसने देखा, ऋषि अष्टावक्र सूखे काठ और दीवारके समान विकारशून्य हैं ॥ ७९ ॥
दुःखिता प्रेक्ष्य संजल्पमकार्षीदृषिणा सह ।
ब्रह्मन्नकामतऽन्यास्ति स्त्रीणां पुरुषतो धृतिः ॥ ८० ॥
कामेन मोहिता चाहं त्वां भजन्तीं भजस्व माम् ।
प्रहृष्टो भव विप्रर्षे समागच्छ मया सह ॥ ८१ ॥
उनकी ऐसी स्थिति देख वह बहुत दुखी हो गयी और मुनिसे इस प्रकार बोली—'ब्रह्मन्! पुरुषको अपने समीप पाकर उसके काम-व्यवहारको छोड़कर और किसी बातसे स्त्रीको धैर्य नहीं रहता। मैं कामसे मोहित होकर आपकी सेवामें आयी हूँ। आप मुझे स्वीकार कीजिये। ब्रह्मर्षे! आप प्रसन्न हों और मेरे साथ समागम करें।।
उपगूह च मां विप्र कामार्तां भृशं त्वयि । एतद्धि तव धर्मात्मंस्तपसः पूज्यते फलम् ॥ ८२ ॥
'विप्रवर! आप मेरा आलिंगन कीजिये। मैं आपके प्रति अत्यन्त कामातुर हूँ। धर्मात्मन्! यही आपकी तपस्याका प्रशस्त फल है ॥ ८२ ॥
प्रार्थितं दर्शनादेव भजमानां भजस्व माम् । मम चेदं धनं सर्वं यच्चान्यदपि पश्यसि ॥ ८३ ॥ प्रभुस्त्वं भव सर्वत्र मयि चैव न संशयः । सर्वान् कामान् विधास्यामि रमस्व सहितो मया ॥ ८४ ॥
'मैं आपको देखते ही आपके प्रति अनुरक्त हो गयी हूँ; अतः आप मुझ सेविकाको अपनाइये। मेरा यह सारा धन तथा और जो कुछ आप देख रहे हैं, उस सबके तथा मेरे भी आप ही स्वामी हैं—इसमें संशय नहीं है। आप मेरे साथ रमण कीजिये। मैं आपकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगी ॥ ८३-८४ ॥
रमणीये वने विप्र सर्वकामफलप्रदे । त्वद्वशाहं भविष्यामि रंस्यसे च मया सह ॥ ८५ ॥
'ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलको देनेवाले इस रमणीय वनमें मैं आपके अधीन होकर रहूँगी। आप मेरे साथ रमण कीजिये ॥ ८५ ॥
सर्वान् कामानुपाश्नीमो ये दिव्या ये च मानुषाः । नातः परं हि नारीणां विद्यते च कदाचन ॥ ८६ ॥ यथा पुरुषसंसर्गः परमेतद्धि नः फलम् ।
'हमलोग यहाँ दिव्य और मनुष्यलोक-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करेंगे। स्त्रियोंके लिये पुरुषसंसर्ग जितना प्रिय है, उससे बढ़कर दूसरा कोई फल कदापि प्रिय नहीं होता। यही हमारे लिये सर्वोत्तम फल है ।।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते नार्यो मन्मथचोदिताः ॥ ८७ ॥ न च दह्यन्ति गच्छन्त्यः सुतप्तैरपि पांसुभिः ।
'कामसे प्रेरित हुई नारियाँ सदा अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती हैं। कामसे संतप्त होनेपर वे तपी हुई धूलमें भी चलती हैं; परंतु इससे उनके पैर नहीं जलते' ॥ ८७ ॥
अष्टावक्र उवाच
परदारानहं भद्रे न गच्छेयं कथंचन ॥ ८८ ॥ दूषितं धर्मशास्त्रज्ञैः परदाराभिमर्शनम् । अष्टावक्र बोले— भद्रे! मैं परायी स्त्रीके साथ किसी तरह संसर्ग नहीं कर सकता; क्योंकि धर्मशास्त्रके विद्वानोंने परस्त्रीसमागमकी निन्दा की है ॥ ८८ १/२ ॥ भद्रे निर्वेष्टुकामं मां विद्धि सत्येन वै शपे ॥ ८९ ॥ विषयेष्वनभिज्ञोऽहं धर्मार्थं किल संततिः । एवं लोकान् गमिष्यामि पुत्रैरिति न संशयः ॥ ९० ॥ भद्रे धर्मं विजानीहि ज्ञात्वा चोपरमस्व ह । भद्रे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि एक मनोनीत मुनिकुमारीके साथ विवाह करना चाहता हूँ। तुम इसे ठीक समझो। मैं विषयोंसे अनभिज्ञ हूँ। केवल धर्मके लिये संतानकी प्राप्ति मुझे अभीष्ट है; अतः यही मेरे विवाहका उद्देश्य है। ऐसा होनेपर मैं पुत्रोंद्वारा अभीष्ट लोकोंमें जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। भद्रे! तुम धर्मको समझो और उसे समझकर इस स्वेच्छाचारसे निवृत्त हो जाओ ॥ ८९-९० १/२ ॥
स्त्र्युवाच
नानिलोऽग्निर्न वरुणो न चान्ये त्रिदशा द्विज ॥ ९१ ॥ प्रियाः स्त्रीणां यथा कामो रतिशीला हि योषितः । सहस्रे किल नारीणां प्राप्यैतैका कदाचन ॥ ९२ ॥ तथा शतसहस्रेषु यदि काचित् पतिव्रता । स्त्री बोली— ब्रह्मन्! वायु, अग्नि, वरुण तथा अन्य देवता भी स्त्रियोंको वैसे प्रिय नहीं हैं, जैसा उन्हें काम प्रिय लगता है; क्योंकि स्त्रियाँ स्वभावतः रतिकी इच्छुक होती हैं। सहस्रों नारियोंमें कभी कोई एक ऐसी स्त्री मिलती है जो रतिलोलुप न हो तथा लाखों स्त्रियोंमें शायद ही कोई एक पतिव्रता मिल सके ॥ ९१-९२ १/२ ॥ नैता जानन्ति पितरं न कुलं न च मातरम् ॥ ९३ ॥ न भ्रातॄन् न च भर्तारं न च पुत्रान् न देवरान् । लीलायन्त्यः कुलं घ्नन्ति कूलानीव सरिद्वराः । दोषान् सर्वांश्च मत्वाऽऽशु प्रजापतिरभाषत ॥ ९४ ॥ ये स्त्रियाँ न पिताको जानती हैं न माताको, न कुलको समझती हैं न भाइयोंको। पति, पुत्र तथा देवरोंकी भी ये परवाह नहीं करती हैं। अपने लिये रतिकी इच्छा रखकर ये समस्त कुलकी मर्यादाका नाश कर डालती हैं, ठीक उसी तरह जैसे बड़ी-बड़ी नदियाँ अपने तटोंको ही तोड़-फोड़ देती हैं। इन सब दोषोंको समझकर ही प्रजापतिने स्त्रियोंके विषयमें उपर्युक्त बातें कही हैं ॥
भीष्म उवाच
ततः स ऋषिरैकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतां रुचितश्छन्दः किं च कार्यं ब्रवीहि मे ॥ ९५ ॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तब ऋषिने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्रीसे कहा—'चुप रहो। मनमें भोगकी रुचि होनेपर स्वेच्छाचार होता है। मेरी रुचि नहीं है, अतः मुझसे यह काम नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यदि मुझसे कोई काम हो तो बताओ' ॥ ९५ ॥
सा स्त्री प्रोवाच भगवन् द्रक्ष्यसे देशकालतः । वस तावन्महाभाग कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ ९६ ॥ उस स्त्रीने कहा—'भगवन्! महाभाग! देश और कालके अनुसार आपको अनुभव हो जायगा। आप यहाँ रहिये, कृतकृत्य हो जाइयेगा' ॥ ९६ ॥
ब्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्ठिर । वत्स्येऽहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशयः ॥ ९७ ॥ युधिष्ठिर! तब ब्रह्मर्षिने उससे कहा—'ठीक है, जबतक मेरे मनमें यहाँ रहनेका उत्साह होगा तबतक आपके साथ रहूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ९७ ॥
अथर्षिरभिसम्प्रेक्ष्य स्त्रियं तां जरयार्दिताम् । चिन्तां परमिकां भेजे संतप्त इव चाभवत् ॥ ९८ ॥ इसके बाद ऋषि उस स्त्रीको जरावस्थासे पीड़ित देख बड़ी चिन्तामें पड़ गये और संतप्त-से हो उठे ॥ ९८ ॥
यद् यदङ्गं हि सोऽपश्यत् तस्या विप्रर्षभस्तदा । नारमत् तत्र तत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता ॥ ९९ ॥ विप्रवर अष्टावक्र उसका जो-जो अंग देखते थे वहाँ-वहाँ उनकी दृष्टि रमती नहीं थी, अपितु उसके रूपसे विरक्त हो उठती थी ॥ ९९ ॥
देवतेयं गृहस्यास्य शापात् किं नु विरूपिता । अस्याश्च कारणं वेत्तुं न युक्तं सहसा मया ॥ १०० ॥ वे सोचने लगे 'यह नारी तो इस घरकी अधिष्ठात्री देवी है। फिर इसे इतना कुरूप किसने बना दिया? इसकी कुरूपताका कारण क्या है? इसे किसीका शाप तो नहीं लग गया। इसकी कुरूपताका कारण जाननेके लिये सहसा चेष्टा करना मेरे लिये उचित नहीं है' ॥ १०० ॥
इति चिन्ताविविक्तस्य तमर्थं ज्ञातुमिच्छतः । व्यगच्छत् तदहःशेषं मनसा व्याकुलेन तु ॥ १०१ ॥ इस प्रकार व्याकुल चित्तसे एकान्तमें बैठकर चिन्ता करते और उसकी कुरूपताका कारण जाननेकी इच्छा रखते हुए महर्षिका वह सारा दिन बीत चला ॥
अथ सा स्त्री तथोवाच भगवन् पश्य वै रवेः । रूपं संध्याभ्रसंरक्तं किमुपस्थाप्यतां तव ॥ १०२ ॥
तब उस स्त्रीने कहा—‘भगवन्! देखिये, सूर्यका रूप संध्याकी लालीसे लाल हो गया है। इस समय आपके लिये कौन-सी वस्तु प्रस्तुत की जाय?’ ॥ १०२ ॥
स उवाच ततस्तां स्त्रीं स्नानोदकमिहानय । उपासिष्ये ततः संध्यां वाग्यतो नियतेन्द्रियः ॥ १०३ ॥
तब ऋषिने उस स्त्रीसे कहा—‘मेरे नहानेके लिये यहाँ जल ले आओ। स्नानके पश्चात् मैं मौन होकर इन्द्रियसयंमपूर्वक संध्योपासना करूँगा’ ॥ १०३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवादविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं)
विंशोऽध्यायः
अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद
भीष्म उवाच
अथ सा स्त्री तमुवाच बाढमेवं भवत्विति ।
तैलं दिव्यमुपादाय स्नानशाटीमुपानयत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ऋषिकी बात सुनकर उस स्त्रीने कहा—‘बहुत अच्छा, ऐसा ही हो’ यों कहकर वह दिव्य तेल और स्नानोपयोगी वस्त्र ले आयी ॥ १ ॥
अनुज्ञाता च मुनिना सा स्त्री तेन महात्मना ।
अथास्य तैलेनाङ्गानि सर्वाण्येवाभ्यमृक्षत ॥ २ ॥
फिर उन महात्मा मुनिकी आज्ञा लेकर उस स्त्रीने उनके सारे अंगोंमें तेलकी मालिश की ॥ २ ॥
शनैश्चोत्सादितस्तत्र स्नानशालामुपागमत् ।
भद्रासनं ततश्चित्रमृषिरन्वगमन्नवम् ॥ ३ ॥
फिर उसके उठानेपर वे धीरेसे वहाँ स्नानगृहमें गये। वहाँ ऋषिको एक विचित्र एवं नूतन चौकी प्राप्त हुई ॥ ३ ॥
अथोपविष्टश्च यदा तस्मिन् भद्रासने तदा ।
स्नापयामास शनकैस्तमृषिं सुखहस्तवत् ॥ ४ ॥
जब वे उस सुन्दर चौकीपर बैठ गये तब उस स्त्रीने धीरे-धीरे हाथोंके कोमल स्पर्शसे उन्हें नहलाया ॥ ४ ॥
दिव्यं च विधिवच्चक्रे सोपचारं मुनेस्तदा ।
स तेन सुसुखोष्णेन तस्या हस्तसुखेन च ॥ ५ ॥
व्यतीतां रजनीं कृत्स्नां नाजानात् स महाव्रतः ।
उसने मुनिके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण दिव्य सामग्री प्रस्तुत की। वे महाव्रतधारी मुनि उसके दिये हुए कुछ-कुछ गरम होनेके कारण सुखदायक जलसे नहाकर उसके हाथोंके सुखद स्पर्शसे सेवित होकर इतने आनन्दविभोर हो गये कि कब सारी रात बीत गयी? इसका उन्हें ज्ञान ही नहीं हुआ ॥ ५ १/२ ॥
तत उत्थाय स मुनिस्तदा परमविस्मितः ॥ ६ ॥
पूर्वस्यां दिशि सूर्यं च सोऽपश्यदुदितं दिवि ।
तस्य बुद्धिरियं किं नु मोहस्तत्त्वमिदं भवेत् ॥ ७ ॥
तदनन्तर वे मुनि अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उठ बैठे। उन्होंने देखा कि पूर्व-दिशाके आकाशमें सूर्यदेवका उदय हो गया है। वे सोचने लगे, क्या यह मेरा मोह है या वास्तवमें सूर्योदय हो गया है ।। ६-७ ।।
अथोपास्य सहस्त्रांशुं किं करोमीत्युवाच ताम् ।
सा चामृतरसप्रख्यं ऋषेरन्नमुपाहरत् ।। ८ ।।
फिर तो तत्काल स्नान, संध्योपासना और सूर्योपस्थान करके उससे बोले, ‘अब क्या करूँ?’ तब उस स्त्रीने ऋषिके समक्ष अमृतरसके समान मधुर अन्न परोसकर रखा ।। ८ ।।
तस्य स्वादुतयान्नस्य न प्रभूतं चकार सः ।
व्यगमच्चाप्यहःशेषं ततः संध्यागमत् पुनः ।। ९ ।।
उस अन्नके स्वादसे वे इतने आकृष्ट हो गये कि उसे पर्याप्त न मान सके—‘बस अब पूरा हो गया’ यह बात न कह सके। इसीमें सारा दिन निकल गया और पुनः संध्याकाल आ पहुँचा ।। ९ ।।
अथ सा स्त्री भगवन्तं सुप्यतामित्यचोदयत् ।
तत्र वै शयने दिव्ये तस्य तस्याश्च कल्पिते ।। १० ।।
इसके बाद उस स्त्रीने भगवान् अष्टावक्रसे कहा—‘अब आप सो जाइये।’ फिर वहीं उनके और उस स्त्रीके लिये दो शय्याएँ बिछायी गयीं ।। १० ।।
पृथक् चैव तथा सुप्तौ सा स्त्री स च मुनिस्तदा ।
तथार्धरात्रे सा स्त्री तु शयनं तदुपागमत् ।। ११ ।।
उस समय वह स्त्री और मुनि दोनों अलग-अलग सो गये। जब आधी रात हुई तब वह स्त्री उठकर मुनिकी शय्यापर आ बैठी ।। ११ ।।
अष्टावक्र उवाच
न भद्रे परदारेषु मनो मे सम्प्रसज्जति ।
उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते स्वयं वै विरमस्व च ।। १२ ।।
**अष्टावक्र बोले—**भद्रे! मेरा मन परायी स्त्रियोंमें आसक्त नहीं होता है। तुम्हारा भला हो, यहाँसे उठो और स्वयं ही इस पापकर्मसे विरत हो जाओ ।। १२ ।।
भीष्म उवाच
सा तदा तेन विप्रेण तथा तेन निवर्तिता ।
स्वतन्त्रास्मीत्युवाचर्षिं न धर्मच्छलमस्ति ते ।। १३ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिके लौटानेपर उसने कहा—‘मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मेरे साथ समागम करनेसे आपके धर्मकी छलना नहीं होगी’ ।। १३ ।।
अष्टावक्र उवाच
नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणामस्वतन्त्रा हि योषितः । प्रजापतिमतं ह्येतन्न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १४ ॥ अष्टावक्र बोले— भद्रे! स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि वे परतन्त्र मानी गयी हैं। प्रजापतिका यह मत है कि स्त्री स्वतन्त्र रहनेयोग्य नहीं है ॥ १४ ॥
स्त्र्युवाच बाधते मैथुनं विप्र मम भक्तिं च पश्य वै । अधर्मं प्राप्स्यसे विप्र यन्मां त्वं नाभिनन्दसि ॥ १५ ॥ स्त्री बोली— ब्रह्मन्! मुझे मैथुनकी भूख सता रही है। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, इसपर भी तो दृष्टिपात कीजिये। विप्रवर! यदि आप मुझे संतुष्ट नहीं करते हैं तो आपको पाप लगेगा ॥ १५ ॥
अष्टावक्र उवाच हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम् । प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वशयनं व्रज ॥ १६ ॥ अष्टावक्रने कहा— भद्रे! स्वेच्छाचारी मनुष्यको ही सब प्रकारके पापसमूह अपनी ओर खींचते हैं। मैं धैर्यके द्वारा सदा अपने मनको काबूमें रखता हूँ; अतः तुम अपनी शय्यापर लौट जाओ ॥ १६ ॥
स्त्र्युवाच शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमर्हसि । भूमौ निपतमानायाः शरणं भव मेऽनघ ॥ १७ ॥ स्त्री बोली— अनघ! विप्रवर! मैं सिर झुकाकर प्रणाम करती हूँ और आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ। आप मुझपर कृपा करें और मुझे शरण दें ॥ १७ ॥ यदि वा दोषजातं त्वं परदारेषु पश्यसि । आत्मानं स्पर्शयाम्यद्य पाणिं गृह्णीष्व मे द्विज ॥ १८ ॥ ब्रह्मन्! यदि आप परायी स्त्रियोंके साथ समागममें दोष देखते हैं तो मैं स्वयं आपको अपना दान करती हूँ। आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये ॥ १८ ॥ न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम् । स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मयि । त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम् ॥ १९ ॥ मैं सच कहती हूँ, आपको कोई दोष नहीं लगेगा। आप मुझे स्वतन्त्र समझिये। इसमें जो पाप होता है, वह मुझे ही लगे। मेरा चित्त आपके ही चिन्तनमें लगा है। मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मुझे स्वीकार कीजिये ॥ १९ ॥
अष्टावक्र उवाच
स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे ब्रूहि कारणमत्र वै ।
नास्ति त्रिलोके स्त्री काचिद् या वै स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ २० ॥
अष्टावक्रने कहा— भद्रे! तुम स्वतन्त्र कैसे हो? इसमें जो कारण हो, वह बताओ! तीनों लोकोंमें कोई ऐसी स्त्री नहीं है जो स्वतन्त्र रहने योग्य हो ॥ २० ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्राश्च स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता ॥ २१ ॥
कुमारावस्थामें पिता इसकी रक्षा करते हैं, जवानीमें वह पतिके संरक्षणमें रहती है और बुढ़ापेमें पुत्र उसकी देखभाल करते हैं। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये स्वतन्त्रता नहीं है ॥ २१ ॥
स्त्र्युवाच
कौमारं ब्रह्मचर्यं मे कन्यैवास्मि न संशयः ।
पत्नीं कुरुष्व मां विप्र श्रद्धां विजहि मा मम ॥ २२ ॥
स्त्री बोली— विप्रवर! मैं कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचारिणी हूँ; अतः कन्या ही हूँ—इसमें संशय नहीं है। अब आप मुझे पत्नी बनाइये। मेरी श्रद्धाका नाश न कीजिये ॥
अष्टावक्र उवाच
यथा मम तथा तुभ्यं यथा तुभ्यं तथा मम ।
जिज्ञासेयमृषेस्तस्य विघ्नः सत्यं न किं भवेत् ॥ २३ ॥
अष्टावक्रने कहा— जैसी मेरी दशा है, वैसी तुम्हारी है और जैसी तुम्हारी दशा है, वैसी मेरी है। यह वास्तवमें वदान्य ऋषिके द्वारा परीक्षा ली जा रही है या सचमुच यह कोई विघ्न तो नहीं है? ॥ २३ ॥
आश्चर्यं परमं हीदं किं नु श्रेयो हि मे भवेत् ।
दिव्याभरणवस्त्रा हि कन्येयं मामुपस्थिता ॥ २४ ॥
(वे मन-ही-मन सोचने लगे—) यह पहले वृद्धा थी और अब दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्यारूप होकर मेरी सेवामें उपस्थित है। यह बड़े ही आश्चर्यकी बात है। क्या यह मेरे लिये कल्याणकारी होगा? ॥ २४ ॥
किं त्वस्याः परमं रूपं जीर्णमासीत् कथं पुनः ।
कन्यारूपमिहाद्यैवं किमिवात्रोत्तरं भवेत् ॥ २५ ॥
परंतु इसका यह परम सुन्दर रूप पहले जराजीर्ण कैसे हो गया था और अब यहाँ यह कन्यारूप कैसे प्रकट हो गया? ऐसी दशामें यहाँ उसके लिये क्या उत्तर हो सकता है? ॥ २५ ॥
यथा परं शक्तिधृतेर्न व्युत्थास्ये कथंचन ।
न रोचते हि व्युत्थानं सत्येनासादयाम्यहम् ॥ २६ ॥
मुझमें कामको दमन करनेकी शक्ति है और पूर्वप्राप्त मुनि-कन्याको किसी तरह भी प्राप्त करनेका धैर्य बना हुआ है। इस शक्ति और धृतिके ही सहारे मैं किसी तरह विचलित नहीं होऊँगा। मुझे धर्मका उल्लंघन अच्छा नहीं लगता। मैं सत्यके सहारेसे ही पत्नीको प्राप्त करूँगा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥