महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कालाल्लाभो यस्तु सत्यो भवेत् श्रेयोलाभः कुत्सितेऽस्मिन्न ते स्यात् ॥ २८ ॥ व्याधने कहा— देवि! इस सर्पको मार डालनेसे जो बहुतोंका भला होगा, यही अक्षय लाभ है। बलवानोंसे बलपूर्वक लाभ उठाना ही उत्तम लाभ है। कालसे जो लाभ होता है वही सच्चा लाभ है। इस नीच सर्पके जीवित रहनेसे तुम्हें कोई श्रेय नहीं मिल सकता ॥ २८ ॥
गौतम्युवाच
का नु प्राप्तिर्गृह्य शत्रुं निहत्य का कामाप्तिः प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा । कस्मात् सौम्याहं न क्षमे नो भुजङ्गे मोक्षार्थं वा कस्य हेतोर्न कुर्याम् ॥ २९ ॥ गौतमी बोली— अर्जुनक! शत्रुको कैद करके उसे मार डालनेसे क्या लाभ होता है; तथा शत्रुको अपने हाथमें पाकर उसे न छोड़नेसे किस अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्पके अपराधको क्षमा न करूँ? तथा किसलिये इसको छुटकारा दिलानेका प्रयत्न न करूँ? ॥ २९ ॥
लुब्धक उवाच
अस्मादेकाद् बहवो रक्षितव्या नैको बहुभ्यो गौतमि रक्षितव्यः । कृतागसं धर्मविदस्त्यजन्ति सरीसृपं पापमिमं जहि त्वम् ॥ ३० ॥ व्याधने कहा— गौतमी! इस एक सर्पसे बहुतेरे मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये। (क्योंकि यदि यह जीवित रहा तो बहुतोंको काटेगा।) अनेकोंकी जान लेकर एककी रक्षा करना कदापि उचित नहीं है। धर्मज्ञ पुरुष अपराधीको त्याग देते हैं; इसलिये तुम भी इस पापी सर्पको मार डालो ॥ ३० ॥
गौतम्युवाच
नास्मिन् हते पन्नगे पुत्रको मे सम्प्राप्स्यते लुब्धक जीवितं वै । गुणं चान्यं नास्य वधे प्रपश्ये तस्मात् सर्पं लुब्धक मुञ्च जीवम् ॥ ३१ ॥ गौतमी बोली— व्याध! इस सर्पके मारे जानेपर मेरा पुत्र पुनः जीवन प्राप्त कर लेगा, ऐसी बात नहीं है। इसका वध करनेसे दूसरा कोई लाभ भी मुझे नहीं दिखायी देता है।
इसलिये इस सर्पको तुम जीवित छोड़ दो ॥ ३१ ॥
लुब्धक उवाच
वृत्रं हत्वा देवराट् श्रेष्ठभाग् वै
यज्ञं हत्वा भागमवाप चैव ।
शूली देवो देववृत्तं चर त्वं
क्षिप्रं सर्पं जहि मा भूत् ते विशङ्का ॥ ३२ ॥
व्याधने कहा— देवि! वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्र श्रेष्ठ पदके भागी हुए और त्रिशूलधारी रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके उसमें अपने लिये भाग प्राप्त किया। तुम भी देवताओंद्वारा किये गये इस बर्तावका ही पालन करो। इस सर्पको शीघ्र ही मार डालो। इस कार्यमें तुम्हें शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ३२ ॥
भीष्म उवाच
असकृत् प्रोच्यमानापि गौतमी भुजगं प्रति ।
लुब्धकेन महाभागा पापे नैवाकरोन्मतिम् ॥ ३३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! व्याधके बार-बार कहने और उकसानेपर भी महाभागा गौतमीने सर्पको मारनेका विचार नहीं किया ॥ ३३ ॥
ईषदूच्छ्वसमानस्तु कृच्छ्रात् संस्तभ्य पन्नगः ।
उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडितः ॥ ३४ ॥
उस समय बन्धनसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे साँस लेता हुआ वह साँप बड़ी कठिनाईसे अपनेको सँभालकर मन्दस्वरसे मनुष्यकी वाणीमें बोला ॥ ३४ ॥
सर्प उवाच
को न्वर्जुनक दोषोऽत्र विद्यते मम बालिश ।
अस्वतन्त्रं हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत् ॥ ३५ ॥
सर्पने कहा— ओ नादान अर्जुनक! इसमें मेरा क्या दोष है? मैं तो पराधीन हूँ। मृत्युने मुझे विवश करके इस कार्यके लिये प्रेरित किया था ॥ ३५ ॥
तस्यायं वचनाद् दष्टो न कोपेन न काम्यया ।
तस्य तत्किल्बिषं लुब्ध विद्यते यदि किल्बिषम् ॥ ३६ ॥
उसके कहनेसे ही मैंने इस बालकको डँसा है, क्रोधसे और कामनासे नहीं। व्याध! यदि इसमें कुछ अपराध है तो वह मेरा नहीं, मृत्युका है ॥ ३६ ॥
लुब्धक उवाच
यद्यन्यवशगेनेदं कृतं ते पन्नगाशुभम् ।
कारणं वै त्वमप्यत्र तस्मात् त्वमपि किल्बिषी ॥ ३७ ॥
**व्याधने कहा—**ओ सर्प! यद्यपि तूने दूसरेके अधीन होकर यह पाप किया है तथापि तू भी तो इसमें कारण है ही; इसलिये तू भी अपराधी है ॥ ३७ ॥ मृत्पात्रस्य क्रियायां हि दण्डचक्रादयो यथा । कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग ॥ ३८ ॥ सर्प! जैसे मिट्टीका बर्तन बनाते समय दण्ड और चाक आदिको भी उसमें कारण माना जाता है, उसी प्रकार तू भी इस बालकके वधमें कारण है ॥ ३८ ॥ किल्बिषी चापि मे वध्यः किल्बिषी चासि पन्नग । आत्मानं कारणं ह्यत्र त्वमाख्यासि भुजङ्गम ॥ ३९ ॥ भुजंगम! जो भी अपराधी हो, वह मेरे लिये वध्य है; पन्नग! तू भी अपराधी है ही; क्योंकि तू स्वयं अपने आपको इसके वधमें कारण बताता है ॥ ३९ ॥
सर्प उवाच
सर्व एते ह्यस्ववशा दण्डचक्रादयो यथा । तथाहमपि तस्मान्मे नैष दोषो मतस्तव ॥ ४० ॥ **सर्पने कहा—**व्याध! जैसे मिट्टीका बर्तन बनानेमें ये दण्ड-चक्र आदि सभी कारण पराधीन होते हैं, उसी प्रकार मैं भी मृत्युके अधीन हूँ। इसलिये तुमने जो मुझपर दोष लगाया है, वह ठीक नहीं है ॥ ४० ॥ अथवा मतमेतत्तेऽप्यन्योन्यप्रयोजकाः । कार्यकारणसंदेहो भवत्यन्योन्यचोदनात् ॥ ४१ ॥ अथवा यदि तुम्हारा यह मत हो कि ये दण्ड-चक्र आदि भी एक-दूसरेके प्रयोजक होते हैं; इसलिये कारण हैं ही। किंतु ऐसा माननेसे एक-दूसरेको प्रेरणा देनेवाला होनेके कारण कार्य-कारणभावके निर्णयमें संदेह हो जाता है ॥ ४१ ॥ एवं सति न दोषो मे नास्मि वध्यो न किल्बिषी । किल्विषं समवाये स्यान्मन्यसे यदि किल्बिषम् ॥ ४२ ॥ ऐसी दशामें न तो मेरा कोई दोष है और न मैं वध्य अथवा अपराधी ही हूँ। यदि तुम किसीका अपराध समझते हो तो वह सारे कारणोंके समूहपर ही लागू होता है ॥ ४२ ॥
लुब्धक उवाच
कारणं यदि न स्याद् वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत । विनाशकारणं त्वं च तस्माद् वध्योऽसि मे मतः ॥ ४३ ॥ **व्याधने कहा—**सर्प! यदि मान भी लें कि तू अपराधका न तो कारण है और न कर्ता ही है तो भी इस बालककी मृत्यु तो तेरे ही कारण हुई है, इसलिये मैं तुझे मारने योग्य समझता हूँ ॥ ४३ ॥ असत्यपि कृते कार्ये नेह पन्नग लिप्यते ।
तस्मान्नात्रैव हेतुः स्याद् वध्यः किं बहु भाषसे ॥ ४४ ॥ सर्प! तेरे मतके अनुसार यदि दुष्टतापूर्ण कार्य करके भी कर्ता उस दोषसे लिप्त नहीं होता है, तब तो चोर या हत्यारे आदि जो अपने अपराधोंके कारण राजाओंके यहाँ वध्य होते हैं, उन्हें भी वास्तवमें अपराधी या दोषका भागी नहीं होना चाहिये। (फिर तो पाप और उसका दण्ड भी व्यर्थ ही होगा) अतः तू क्यों बहुत बकवाद कर रहा है ॥
सर्प उवाच
कार्याभावे क्रिया न स्यात् सत्यसत्यपि कारणे । तस्मात् समेऽस्मिन् हेतौ मे वाच्यो हेतुर्विशेषतः ॥ ४५ ॥ यद्यहं कारणत्वेन मतो लुब्धक तत्त्वतः । अन्यः प्रयोगे स्यादत्र किल्बिषी जन्तुनाशने ॥ ४६ ॥ **सर्पने कहा—**व्याध! प्रयोजक (प्रेरक) कर्ता रहे या न रहे, प्रयोज्य कर्ताके बिना क्रिया नहीं होती; इसलिये यहाँ यद्यपि हमलोग (मैं और मृत्यु) समानरूपसे हेतु हैं; तो भी प्रयोजक होनेके कारण मृत्युपर ही विशेषरूपसे यह अपराध लगाया जा सकता है। यदि तुम मुझे इस बालककी मृत्युका वस्तुतः कारण मानते हो तो यह तुम्हारी भूल है। वास्तवमें विचार करनेपर प्रेरणा करनेके कारण दूसरा ही (मृत्यु ही) अपराधी सिद्ध होगा; क्योंकि वही प्राणियोंके विनाशनमें अपराधी है ॥ ४५-४६ ॥
लुब्धक उवाच
वध्यस्त्वं मम दुर्बुद्धे बालघाती नृशंसकृत् । भाषसे किं बहु पुनर्वध्यः सन् पन्नगाधम ॥ ४७ ॥ **व्याधने कहा—**खोटी बुद्धिवाले नीच सर्प! तू बालहत्यारा और क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है; अतः निश्चय ही मेरे हाथसे वधके योग्य है। तू वध्य होकर भी अपनेको निर्दोष सिद्ध करनेके लिये क्यों बहुत बातें बना रहा है? ॥ ४७ ॥
सर्प उवाच
यथा हवींषि जुह्वाना मखे वै लुब्धकर्त्विजः । न फलं प्राप्नुवन्त्यत्र फलयोगे तथा ह्यहम् ॥ ४८ ॥ **सर्पने कहा—**व्याध! जैसे यजमानके यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग अग्निमें आहुति डालते हैं; किंतु उसका फल उन्हें नहीं मिलता। इसी प्रकार इस अपराधके फल या दण्डको भोगनेमें मुझे नहीं सम्मिलित करना चाहिये (क्योंकि वास्तवमें मृत्यु ही अपराधी है) ॥ ४८ ॥
भीष्म उवाच
तथा ब्रुवति तस्मिंस्तु पन्नगे मृत्युचोदिते ।
आजगाम ततो मृत्युः पन्नगं चाब्रवीदिदम् ॥ ४९ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! मृत्युकी प्रेरणासे बालकको डँसनेवाला सर्प जब बारंबार अपनेको निर्दोष और मृत्युको दोषी बताने लगा तब मृत्यु देवता भी वहाँ आ पहुँचा और सर्पसे इस प्रकार बोला ॥ ४९ ॥
मृत्युरुवाच
प्रचोदितोऽहं कालेन पन्नग त्वामचूचुदम् ।
विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं न प्राणिनः शिशोः ॥ ५० ॥
मृत्युने कहा— सर्प! कालसे प्रेरित होकर ही मैंने तुझे इस बालकको डँसनेके लिये प्रेरणा दी थी; अतः इस शिशु प्राणीके विनाशमें न तो तू कारण है और न मैं ही कारण हूँ ॥ ५० ॥
यथा वायुर्जलधरान् विकर्षति ततस्ततः ।
तद्वज्जलदवत् सर्प कालस्याहं वशानुगः ॥ ५१ ॥
सर्प! जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ा ले जाती है, उन बादलोंकी ही भाँति मैं भी कालके वशमें हूँ ॥ ५१ ॥
सात्त्विका राजसाश्चैव तामसा ये च केचन ।
भावाः कालात्मकाः सर्वे प्रवर्तन्ते ह जन्तुषु ॥ ५२ ॥
सात्त्विक, राजस और तामस जितने भी भाव हैं, वे सब कालात्मक हैं और कालकी ही प्रेरणासे प्राणियोंको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥
जङ्गमाः स्थावराश्चैव दिवि वा यदि वा भुवि ।
सर्वे कालात्मकाः सर्प कालात्मकमिदं जगत् ॥ ५३ ॥
सर्प! पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकमें जितने भी स्थावर-जङ्गम पदार्थ हैं, वे सभी कालके अधीन हैं। यह सारा जगत् ही कालस्वरूप है ॥ ५३ ॥
प्रवृत्तयश्च लोकेऽस्मिंस्तथैव च निवृत्तयः ।
तासां विकृतयो याश्च सर्वं कालात्मकं स्मृतम् ॥ ५४ ॥
इस लोकमें जितने प्रकारकी प्रवृत्ति-निवृत्ति तथा उनकी विकृतियाँ (फल) हैं, ये सब कालके ही स्वरूप हैं ॥ ५४ ॥
आदित्यश्चन्द्रमा विष्णुरापो वायुः शतक्रतुः ।
अग्निःखं पृथिवी मित्रः पर्जन्यो वसवोऽदितिः ॥ ५५ ॥
सरितः सागराश्चैव भावाभावौ च पन्नग ।
सर्वे कालेन सृज्यन्ते ह्रियन्ते च पुनः पुनः ॥ ५६ ॥
पन्नग! सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, पर्जन्य, वसु, अदिति, नदी, समुद्र तथा भाव और अभाव—ये सभी कालके द्वारा ही रचे जाते हैं और
काल ही इनका संहार कर देता है ॥
एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे ।
अथ चैवंगते दोषे मयि त्वमपि दोषवान् ॥ ५७ ॥
सर्प! यह सब जानकर भी तुम मुझे कैसे दोषी मानते हो? और यदि ऐसी स्थितिमें भी मुझपर दोषारोपण हो सकता है, तब तो तू भी दोषी ही है ॥
सर्प उवाच
निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वां मृत्यो ब्रवीम्यहम् ।
त्वयाहं चोदित इति ब्रवीम्येतावदेव तु ॥ ५८ ॥
**सर्पने कहा—**मृत्यो! मैं तुम्हें न तो निर्दोष बताता हूँ और न दोषी ही। मैं तो इतना ही कह रहा हूँ कि इस बालकको डँसनेके लिये तूने ही मुझे प्रेरित किया था ॥ ५८ ॥
यदि काले तु दोषोऽस्ति यदि तत्रापि नेष्यते ।
दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्यत्राधिकृता वयम् ॥ ५९ ॥
इस विषयमें यदि कालका दोष है अथवा यदि वह भी निर्दोष है तो हो, मुझे किसीके दोषकी जाँच नहीं करनी है और जाँच करनेका मुझे कोई अधिकार भी नहीं है ॥ ५९ ॥
निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मया कार्यो यथा तथा ।
मृत्योरपि न दोषः स्यादिति मेऽत्र प्रयोजनम् ॥ ६० ॥
परंतु मेरे ऊपर जो दोष लगाया गया है, उसका निवारण तो मुझे जैसे-तैसे करना ही है। मेरे कहनेका यह प्रयोजन नहीं है कि मृत्युका भी दोष सिद्ध हो जाय ॥ ६० ॥
भीष्म उवाच
सर्पोऽथार्जुनकं प्राह श्रुतं ते मृत्युभाषितम् ।
नानागसं मां पाशेन संतापयितुमर्हसि ॥ ६१ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर सर्पने अर्जुनकसे कहा—'तुमने मृत्युकी बात तो सुन ली न? अब मुझ निरपराधको बन्धनमें बाँधकर कष्ट देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ ६१ ॥
लुब्धक उवाच
मृत्योः श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजङ्गम ।
नैव तावददोषत्वं भवति त्वयि पन्नग ॥ ६२ ॥
**व्याधने कहा—**पन्नग! मैंने मृत्युकी और तेरी—दोनोंकी बातें सुन लीं; किंतु भुजंगम! इससे तेरी निर्दोषता नहीं सिद्ध हो रही है ॥ ६२ ॥
मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि बालस्यास्य विनाशने ।
उभयं कारणं मन्ये न कारणमकारणम् ॥ ६३ ॥
इस बालकके विनाशमें तू और मृत्यु—दोनों ही कारण हो; अतः मैं दोनोंको ही कारण या अपराधी मानता हूँ, किसी एकको अपराधी या निरपराध नहीं मानता ॥ ६३ ॥
धिङ्मृत्युं च दुरात्मानं क्रूरं दुःखकरं सताम् ।
त्वां चैवाहं वधिष्यामि पापं पापस्य कारणम् ॥ ६४ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंको दुःख देनेवाले इस क्रूर एवं दुरात्मा मृत्युको धिक्कार है और तू तो इस पापका कारण है ही; इसलिये तुझ पापात्माका वध मैं अवश्य करूँगा ॥ ६४ ॥
मृत्युरुवाच
विवशौ कालवशगावावां निर्दिष्टकारिणौ ।
नावां दोषेण गन्तव्यौ यदि सम्यक् प्रपश्यसि ॥ ६५ ॥
**मृत्युने कहा—**व्याध! हम दोनों कालके अधीन होनेके कारण विवश हैं। हम तो केवल उसके आदेशका पालनमात्र करते हैं। यदि तुम अच्छी तरह विचार करोगे तो हमलोगोंपर दोषारोपण नहीं करोगे ॥
लुब्धक उवाच
युवामुभौ कालवशौ यदि मे मृत्यूपन्नगौ ।
हर्षक्रोधौ यथा स्यातामेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ६६ ॥
**व्याधने कहा—**मृत्यु और सर्प! यदि तुम दोनों कालके अधीन हो तो मुझ तटस्थ व्यक्तिको परोपकारीके प्रति हर्ष और दूसरोंका अपकार करनेवाले तुम दोनोंपर क्रोध क्यों होता है, यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ ६६ ॥
मृत्युरुवाच
या काचिदेव चेष्टा स्यात् सर्वा कालप्रचोदिता ।
पूर्वमेवैतदुक्तं हि मया लुब्धक कालतः ॥ ६७ ॥
**मृत्युने कहा—**व्याध! जगत्में जो कोई भी चेष्टा हो रही है, वह सब कालकी प्रेरणासे ही होती है। यह बात मैंने तुमसे पहले ही बता दी है ॥ ६७ ॥
तस्मादुभौ कालवशावावां निर्दिष्टकारिणौ ।
नावां दोषेण गन्तव्यौ त्वया लुब्धक कर्हिचित् ॥ ६८ ॥
अतः व्याध! हम दोनोंको कालके अधीन और कालके ही आदेशका पालक समझकर तुम्हें कभी हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं करना चाहिये ॥ ६८ ॥
भीष्म उवाच
अथोपगम्य कालस्तु तस्मिन् धर्मार्थसंशये ।
अब्रवीत् पन्नगं मृत्युं लुब्धं चार्जुनकं तथा ॥ ६९ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर धार्मिक विषयमें संदेह उपस्थित होनेपर काल भी वहाँ आ पहुँचा; तथा सर्प, मृत्यु एवं अर्जुनक व्याधसे इस प्रकार बोला ॥ ६९ ॥
काल उवाच
न ह्याहं नाप्ययं मृत्युर्नायं लुब्धक पन्नगः ।
किल्बिषी जन्तुमरणे न वयं हि प्रयोजकाः ॥ ७० ॥
कालने कहा— व्याध! न तो मैं, न यह मृत्यु और न यह सर्प ही इस जीवकी मृत्युमें अपराधी हैं। हमलोग किसीकी मृत्युमें प्रेरक या प्रयोजक भी नहीं हैं ॥ ७० ॥
अकरोद् यदयं कर्म तन्नोऽर्जुनक चोदकम् ।
विनाशहेतुर्नान्योऽस्य वध्यतेऽयं स्वकर्मणा ॥ ७१ ॥
अर्जुनक! इस बालकने जो कर्म किया है वही इसकी मृत्युमें प्रेरक हुआ है, दूसरा कोई इसके विनाशका कारण नहीं है। यह जीव अपने कर्मसे ही मरता है ॥ ७१ ॥
यदनेन कृतं कर्म तेनायं निधनं गतः ।
विनाशहेतुः कर्मास्य सर्वे कर्मवशा वयम् ॥ ७२ ॥
इस बालकने जो कर्म किया है, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है। इसका कर्म ही इसके विनाशका कारण है। हम सब लोग कर्मके ही अधीन हैं ॥ ७२ ॥
कर्मदायादवाँल्लोकः कर्मसम्बन्धलक्षणः ।
कर्माणि चोदयन्तीह यथान्योन्यं तथा वयम् ॥ ७३ ॥
संसारमें कर्म ही मनुष्योंका पुत्र-पौत्रके समान अनुगमन करनेवाला है। कर्म ही दुःख-सुखके सम्बन्धका सूचक है। इस जगत्में कर्म ही जैसे परस्पर एक-दूसरेको प्रेरित करते हैं, वैसे ही हम भी कर्मोंसे ही प्रेरित हुए हैं ॥ ७३ ॥
यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद् यदिच्छति ।
एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते ॥ ७४ ॥
जैसे कुम्हार मिट्टीके लोंदेसे जो-जो बर्तन चाहता है वही बना लेता है। उसी प्रकार मनुष्य अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही सब कुछ पाता है ॥ ७४ ॥
यथा छायायातपौ नित्यं सुसम्बद्धौ निरन्तरम् ।
तथा कर्म च कर्ता च सम्बद्धावात्मकर्मभिः ॥ ७५ ॥
जैसे धूप और छाया दोनों नित्य-निरन्तर एक-दूसरेसे मिले रहते हैं, उसी प्रकार कर्म और कर्ता दोनों अपने कर्मानुसार एक-दूसरेसे सम्बद्ध होते हैं ॥ ७५ ॥
एवं नाहं न वै मृत्युने सर्पो न तथा भवान् ।
न चेयं ब्राह्मणी वृद्धा शिशुरेवात्र कारणम् ॥ ७६ ॥
इस प्रकार विचार करनेसे न मैं, न मृत्यु, न सर्प, न तुम (व्याध) और न यह बूढ़ी ब्राह्मणी ही इस बालककी मृत्युमें कारण है। यह शिशु स्वयं ही कर्मके अनुसार अपनी
मृत्युमें कारण हुआ है ।। ७६ ।। तस्मिंस्तथा ब्रुवाणे तु ब्राह्मणी गौतमी नृप । स्वकर्मप्रत्ययाँल्लोकान् मत्वार्जुनकमब्रवीत् ।। ७७ ।। नरेश्वर! कालके इस प्रकार कहनेपर गौतमी ब्राह्मणीको यह निश्चय हो गया कि मनुष्यको अपने कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है। फिर वह अर्जुनकसे बोली ।।
गौतम्युवाच
नैव कालो न भुजगो न मृत्युरिह कारणम् । स्वकर्मभिरयं बालः कालेन निधनं गतः ।। ७८ ।। गौतमीने कहा—व्याध! न यह काल, न सर्प और न मृत्यु ही यहाँ कारण हैं। यह बालक अपने कर्मोंसे ही प्रेरित हो कालके द्वारा विनाशको प्राप्त हुआ है ।। ७८ ।।
मया च तत् कृतं कर्म येनायं मे मृतः सुतः । यातु कालस्तथा मृत्युर्मुञ्चार्जुनक पन्नगम् ।। ७९ ।। अर्जुनक! मैंने भी वैसा कर्म किया था जिससे मेरा पुत्र मर गया है। अतः काल और मृत्यु अपने-अपने स्थानको पधारें; और तू इस सर्पको छोड़ दे ।। ७९ ।।
भीष्म उवाच
ततो यथागतं जग्मुर्मृत्युः कालोऽथ पन्नगः । अभूद् विशोकोऽर्जुनको विशोका चैव गौतमी ।। ८० ।। भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर काल, मृत्यु और सर्प जैसे आये थे वैसे ही चले गये; और अर्जुनक तथा गौतमी ब्राह्मणीका भी शोक दूर हो गया ।।
एतत् श्रुत्वा शमं गच्छ मा भूः शोकपरो नृप । स्वकर्मप्रत्ययाँल्लोकान् सर्वे गच्छन्ति वै नृप ।। ८१ ।। नरेश्वर! इस उपाख्यानको सुनकर तुम शान्ति धारण करो, शोकमें न पड़ो। सब मनुष्य अपने-अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाले लोकोंमें ही जाते हैं ।।
नैव त्वया कृतं कर्म नापि दुर्योधनेन वै । कालेनैतत् कृतं विद्धि निहता येन पार्थिवाः ।। ८२ ।। तुमने या दुर्योधनने कुछ नहीं किया है। कालकी ही यह सारी करतूत समझो, जिससे समस्त भूपाल मारे गये हैं ।। ८२ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्व बभूव विगतज्वरः । युधिष्ठिरो महातेजाः पप्रच्छेदं च धर्मवित् ।। ८३ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर महातेजस्वी धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिरकी चिन्ता दूर हो गयी; तथा उन्होंने पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ।। ८३ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गौतमीलुब्धकव्यालमृत्युकालसंवादे प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालका संवादविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।
द्वितीयोऽध्यायः
प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
श्रुतं मे महदाख्यानमिदं मतिमतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सर्वशास्त्र-विशारद महाप्राज्ञ पितामह! इस महत्त्वपूर्ण उपाख्यानको मैंने बड़े ध्यानसे सुना है ॥ १ ॥
भूयस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप ।
कथ्यमानं त्वया किञ्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
नरेश्वर! अब मैं पुनः आपके मुखसे कुछ और धर्म तथा अर्थयुक्त उपदेश सुनना चाहता हूँ, अतः आप मुझे इस विषयको विस्तारपूर्वक बताइये ॥ २ ॥
केन मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ।
इत्येतत् सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेनापि च पार्थिव ॥ ३ ॥
भूपाल! किस गृहस्थने केवल धर्मका आश्रय लेकर मृत्युपर विजय पायी है? यह सब बातें आप यथार्थरूपसे कहिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! एक गृहस्थने जिस प्रकार धर्मका आश्रय लेकर मृत्युपर विजय पायी थी, उसके विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ ४ ॥
मनोः प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत् सुतः ।
तस्य पुत्रशतं जज्ञे नृपतेः सूर्यवर्चसः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! प्रजापति मनुके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था इक्ष्वाकु। राजा इक्ष्वाकु सूर्यके समान तेजस्वी थे। उन्होंने सौ पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ५ ॥
दशमस्तस्य पुत्रस्तु दशाश्वो नाम भारत ।
माहिष्मत्यामभूद् राजा धर्मात्मा सत्यविक्रमः ॥ ६ ॥
भारत! उनमेंसे दसवें पुत्रका नाम दशाश्व था जो माहिष्मतीपुरीमें राज्य करता था। वह बड़ा ही धर्मात्मा और सत्यपराक्रमी था ॥ ६ ॥
दशाश्वस्य सुतस्त्वासीद् राजा परमधार्मिकः ।
सत्ये तपसि दाने च यस्य नित्यं रतं मनः ॥ ७ ॥ दशाश्वका पुत्र भी बड़ा धर्मात्मा राजा था। उसका मन सदा सत्य, तपस्या और दानमें ही लगा रहता था ॥ मदिराश्व इति ख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपतिः । धनुर्वेदे च वेदे च निरतो योऽभवत् सदा ॥ ८ ॥ वह राजा इस भूतलपर मदिराश्वके नामसे विख्यात था और सदा वेद एवं धनुर्वेदके अभ्यासमें संलग्न रहता था ॥ ८ ॥ मदिराश्वस्य पुत्रस्तु द्युतिमान् नाम पार्थिवः । महाभागो महातेजा महासत्त्वो महाबलः ॥ ९ ॥ मदिराश्वका पुत्र महाभाग, महातेजस्वी, महान् धैर्यशाली और महाबली द्युतिमान् नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ॥ ९ ॥ पुत्रो द्युतिमतस्त्वासीद् राजा परमधार्मिकः । सर्वलोकेषु विख्यातः सुवीरो नाम नामतः ॥ १० ॥ धर्मात्मा कोषवांश्चापि देवराज इवापरः । द्युतिमान्का पुत्र परम धर्मात्मा राजा सुवीर हुआ जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात था। वह धर्मात्मा, कोष (धन-भण्डार)-से सम्पन्न तथा दूसरे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी था ॥ १० १/२ ॥ सुवीरस्य तु पुत्रोऽभूत् सर्वसंग्रामदुर्जयः ॥ ११ ॥ स दुर्जय इति ख्यातः सर्वशस्त्रभृतां वरः । सुवीरका पुत्र दुर्जय नामसे विख्यात हुआ। वह सभी संग्रामोंमें शत्रुओंके लिये दुर्जय तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ॥ ११ १/२ ॥ दुर्जयस्येन्द्रवपुषः पुत्रोऽश्विसदृशद्युतिः ॥ १२ ॥ दुर्योधनो नाम महान् राजा राजर्षिसत्तमः । इन्द्रके समान शरीरवाले राजा दुर्जयके एक पुत्र हुआ जो अश्विनीकुमारोंके समान कान्तिमान् था। उसका नाम था दुर्योधन। वह राजर्षियोंमें श्रेष्ठ महान् राजा था ॥ १२ १/२ ॥ तस्येन्द्रसमवीर्यस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः ॥ १३ ॥ विषये वासवस्तस्य सम्यगेव प्रवर्षति । इन्द्रके समान पराक्रमी और युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले राजा दुर्योधनके राज्यमें इन्द्र सदा ठीक समयपर और उचित मात्रामें ही वर्षा करते थे ॥ १३ १/२ ॥ रत्नैर्धनैश्च पशुभिः सस्यैश्चापि पृथग्विधैः ॥ १४ ॥ नगरं विषयश्चास्य प्रतिपूर्णस्तदाभवत् । उनका नगर और राज्य रत्न, धन, पशु तथा भाँति-भाँतिके धान्योंसे उन दिनों भरा-पूरा रहता था ॥
न तस्य विषये चाभूत् कृपणो नापि दुर्गतिः ॥ १५ ॥ व्याधितो वा कृशो वापि तस्मिन् नाभून्नरः क्वचित् । उनके राज्यमें कहीं कोई भी कृपण, दुर्गतिग्रस्त, रोगी अथवा दुर्बल मनुष्य नहीं दृष्टिगोचर होता था ॥ १५½ ॥
सुदक्षिणो मधुरवागनसूयुर्जितेन्द्रियः । धर्मात्मा चानृशंसश्च विक्रान्तोऽथाविकत्थनः ॥ १६ ॥ वह राजा अत्यन्त उदार, मधुरभाषी, किसीके दोष न देखनेवाला, जितेन्द्रिय, धर्मात्मा, दयालु और पराक्रमी था। वह कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता था ॥ १६ ॥
यज्वा च दान्तो मेधावी ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः । न चावमन्ता दाता च वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १७ ॥ राजा दुर्योधन वेद-वेदाङ्गोंका पारङ्गत विद्वान्, यज्ञकर्ता, जितेन्द्रिय, मेधावी, ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ था। वह सबको दान देता और किसीका भी अपमान नहीं करता था ॥ १७ ॥
तं नर्मदा देवनदी पुण्या शीतजला शिवा । चकमे पुरुषव्याघ्रं स्वेन भावेन भारत ॥ १८ ॥ भारत! एक समय शीतल जलवाली पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी नर्मदा उस पुरुषसिंहको सम्पूर्ण हृदयसे चाहने लगी और उसकी पत्नी बन गयी ॥ १८ ॥
तस्यां जज्ञे तदा नद्यां कन्या राजीवलोचना । नाम्ना सुदर्शना राजन् रूपेण च सुदर्शना ॥ १९ ॥ राजन्! उस नदीके गर्भसे राजाके द्वारा एक कमलोचना कन्या उत्पन्न हुई जो नामसे तो सुदर्शना थी ही, रूपसे भी सुदर्शना (सुन्दर एवं दर्शनीय) थी ॥ १९ ॥
तादृग्रूपा न नारीषु भूतपूर्वा युधिष्ठिर । दुर्योधनसुता यादृग्भवद् वरवर्णिनी ॥ २० ॥ युधिष्ठिर! दुर्योधनकी वह सुन्दर वर्णवाली पुत्री जैसी रूपवती थी, वैसी रूप-सौन्दर्यशालिनी स्त्री नारियोंमें पहले कभी नहीं हुई थी ॥ २० ॥
तामग्निश्चकमे साक्षाद् राजकन्यां सुदर्शनाम् । भूत्वा च ब्राह्मणो राजन् वरयामास तं नृपम् ॥ २१ ॥ राजन्! राजकन्या सुदर्शनापर साक्षात् अग्निदेव आसक्त हो गये और उन्होंने ब्राह्मणका रूप धारण करके राजासे उस कन्याको माँगा ॥ २१ ॥
दरिद्रश्चासवर्णश्च ममायमिति पार्थिवः । न दित्सति सुतां तस्मै तां विप्राय सुदर्शनाम् ॥ २२ ॥ राजा यह सोचकर कि एक तो यह दरिद्र है और दूसरे मेरे समान वर्णका नहीं है, अपनी पुत्री सुदर्शनाको उस ब्राह्मणके हाथमें नहीं देना चाहते थे ॥ २२ ॥
ततोऽस्य वितते यज्ञे नष्टोऽभूद्धव्यवाहनः । ततः सुदुःखितो राजा वाक्यमाह द्विजांस्तदा ॥ २३ ॥ तब अग्निदेव रुष्ट होकर राजाके आरम्भ हुए यज्ञमेंसे अदृश्य हो गये। इससे राजाको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा— ॥ २३ ॥ दुष्कृतं मम किं नु स्याद् भवतां वा द्विजर्षभाः । येन नाशं जगामाग्निः कृतं कुपुरुषेष्विव ॥ २४ ॥ विप्रवरो! मुझसे या आपलोगोंसे कौन-सा ऐसा दुष्कर्म बन गया है जिससे अग्निदेव दुष्ट मनुष्योंके प्रति किये गये उपकारके समान नष्ट हो गये हैं ॥ २४ ॥ न ह्यल्पं दुष्कृतं नोऽस्ति येनाग्निर्नाशमागतः । भवतां चाथवा मह्यं तत्त्वेनैतद् विमृश्यताम् ॥ २५ ॥ ‘हमलोगोंका थोड़ा-सा अपराध नहीं है जिससे अग्निदेव अदृश्य हो गये हैं। वह अपराध आपलोगोंका है या मेरा—इसका ठीक-ठीक विचार करें’ ॥ २५ ॥ तत्र राज्ञो वचः श्रुत्वा विप्रास्ते भरतर्षभ । नियता वाग्यताश्चैव पावकं शरणं ययुः ॥ २६ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजाकी यह बात सुनकर उन ब्राह्मणोंने शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनपूर्वक मौन हो भगवान् अग्निदेवकी शरण ली ॥ २६ ॥ तान् दर्शयामास तदा भगवान् हव्यवाहनः । स्वं रूपं दीप्तिमत् कृत्वा शरदर्कसमद्युतिः ॥ २७ ॥ तब भगवान् हव्यवाहनने रातमें अपना तेजस्वी रूप प्रकट करके शरत्कालके सूर्यके सदृश द्युतिमान् हो उन ब्राह्मणोंको दर्शन दिया ॥ २७ ॥ ततो महात्मा तानाह दहनो ब्राह्मणर्षभान् । वरयाम्यात्मनोऽर्थाय दुर्योधनसुतामिति ॥ २८ ॥ उस समय महात्मा अग्निने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे कहा—‘मैं दुर्योधनकी पुत्रीका अपने लिये वरण करता हूँ’ ॥ २८ ॥ ततस्ते कल्यमुत्थाय तस्मै राज्ञे न्यवेदयन् । ब्राह्मणा विस्मिताः सर्वे यदुक्तं चित्रभानुना ॥ २९ ॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित हुए सब ब्राह्मणोंने सबेरे उठकर, अग्निदेवने जो कहा था वह सब कुछ राजासे निवेदन किया ॥ २९ ॥ ततः स राजा तत् श्रुत्वा वचनं ब्रह्मवादिनाम् । अवाप्य परमं हर्षं तथेति प्राह बुद्धिमान् ॥ ३० ॥ ब्रह्मवादी ऋषियोंका यह वचन सुनकर राजाको बड़ा हर्ष हुआ और उन बुद्धिमान् नरेशने ‘तथास्तु’ कहकर अग्निदेवका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ अयाचत च तं शुल्कं भगवन्तं विभावसुम् ।
नित्यं सांनिध्यमिह ते चित्रभानो भवेदिति ॥ ३१ ॥
तदनन्तर उन्होंने कन्याके शुल्करूपसे भगवान् अग्निसे याचना की—'चित्रभानो! इस नगरीमें आपका सदा निवास बना रहे' ॥ ३१ ॥
तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम् ।
ततः सांनिध्यमद्यापि माहिष्मत्यां विभावसोः ॥ ३२ ॥
यह सुनकर भगवान् अग्निने राजासे कहा, 'एवमस्तु (ऐसा ही होगा)'। तभीसे आजतक माहिष्मती नगरीमें अग्निदेवका निवास बना हुआ है ॥ ३२ ॥
दृष्टं हि सहदेवेन दिशं विजयता तदा ।
ततस्तां समलंकृत्य कन्यामाहृतवाससम् ॥ ३३ ॥
ददौ दुर्योधनो राजा पावकाय महात्मने ।
सहदेवने दक्षिण दिशाकी विजय करते समय वहाँ अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखा था। अग्निदेवके वहाँ रहना स्वीकार कर लेनेपर राजा दुर्योधनने अपनी कन्याको सुन्दर वस्त्र पहनाकर नाना प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत करके महात्मा अग्निके हाथमें दे दिया ॥ ३३ ½ ॥
प्रतिजग्राह चाग्निस्तु राजकन्यां सुदर्शनाम् ॥ ३४ ॥
विधिना वेददृष्टेन वसोर्धारामिवाध्वरे ।
अग्निने वेदोक्त विधिसे राजकन्या सुदर्शनाको उसी प्रकार ग्रहण किया, जैसे वे यज्ञमें वसुधारा ग्रहण करते हैं ॥ ३४ ½ ॥
तस्या रूपेण शीलेन कुलेन वपुषा श्रिया ॥ ३५ ॥
अभवत् प्रीतिमानग्निर्गर्भे चास्या मनो दधे ।
सुदर्शनाके रूप, शील, कुल, शरीरकी आकृति और काान्तिको देखकर अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसमें गर्भाधान करनेका विचार किया ॥ ३५ ½ ॥
तस्याः समभवत् पुत्रो नाम्नाऽऽग्नेयः सुदर्शनः ॥ ३६ ॥
सुदर्शनस्तु रूपेण पूर्णेन्दुसदृशोपमः ।
शिशुरेवाध्यगात् सर्वं परं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७ ॥
कुछ कालके पश्चात् उसके गर्भसे अग्निके एक पुत्र हुआ जिसका नाम सुदर्शन रखा गया। वह रूपमें पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था और उसे बचपनमें ही सर्वस्वरूप सनातन परब्रह्मका ज्ञान हो गया था ॥
अथौघवान् नाम नृपो नृगस्यासीत् पितामहः ।
तस्याथौघवती कन्या पुत्रश्चौघरथोऽभवत् ॥ ३८ ॥
उन दिनों राजा नृगके पितामह ओघवान् इस पृथ्वीपर राज्य करते थे। उनके ओघवती नामवाली एक कन्या और ओघरथ नामवाला एक पुत्र था ॥ ३८ ॥
तामोघवान् ददौ तस्मै स्वयमोघवतीं सुताम् ।
सुदर्शनाय विदुषे भार्यार्थे देवरूपिणीम् ॥ ३९ ॥ ओघवती देवकन्याके समान सुन्दरी थी। ओघवान्ने अपनी उस पुत्रीको विद्वान् सुदर्शनको पत्नी बनानेके लिये दे दिया ॥ ३९ ॥ स गृहस्थाश्रमरतस्तया सह सुदर्शनः । कुरुक्षेत्रेऽवसद् राजन्नोघवत्या समन्वितः ॥ ४० ॥ राजन्! सुदर्शन उसके साथ गृहस्थ-धर्मका पालन करने लगे। उन्होंने ओघवतीके साथ कुरुक्षेत्रमें निवास किया ॥ ४० ॥ गृहस्थश्चावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो । प्रतिज्ञामकरोद् धीमान् दीप्ततेजा विशाम्पते ॥ ४१ ॥ प्रजानाथ! प्रभो! उद्दीप्त तेजवाले उस बुद्धिमान् सुदर्शनने यह प्रतिज्ञा कर ली कि मैं गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए ही मृत्युको जीत लूँगा ॥ ४१ ॥ तामथौघवतीं राजन् स पावकसुतोऽब्रवीत् । अतिथेः प्रतिकूलं ते न कर्तव्यं कथंचन ॥ ४२ ॥ राजन्! अग्निकुमार सुदर्शनने ओघवतीसे कहा—'देवि! तुम्हें अतिथिके प्रतिकूल किसी तरह कोई कार्य नहीं करना चाहिये' ॥ ४२ ॥ येन येन च तुष्येत नित्यमेव त्वयातिथिः । अप्यात्मनः प्रदानेन न ते कार्या विचारणा ॥ ४३ ॥ 'जिस-जिस वस्तुसे अतिथि संतुष्ट हो, वह वस्तु तुम्हें सदा ही उसे देनी चाहिये। यदि अतिथिके संतोषके लिये तुम्हें अपना शरीर भी देना पड़े तो मनमें कभी अन्यथा विचार न करना ॥ ४३ ॥ एतद् व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते । गृहस्थानां च सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम् ॥ ४४ ॥ 'सुन्दरी! अतिथि-सेवाका यह व्रत मेरे हृदयमें सदा स्थित रहता है। गृहस्थोंके लिये अतिथि-सेवासे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है ॥ ४४ ॥ प्रमाणं यदि वामोरु वचस्ते मम शोभने । इदं वचनमव्यग्रा हृदि त्वं धारयेः सदा ॥ ४५ ॥ 'वामोरु शोभने! यदि तुम्हें मेरा वचन मान्य हो तो मेरी इस बातको शान्त भावसे सदा अपने हृदयमें धारण किये रहना ॥ ४५ ॥ निष्क्रान्ते मयि कल्याणि तथा संनिहितेऽनघे । नातिथिस्तेऽवमन्तव्यः प्रमाणं यद्यहं तव ॥ ४६ ॥ 'कल्याणि! निष्पाप! यदि तुम मुझे आदर्श मानती हो तो मैं घरमें रहूँ या घरसे कहीं दूर निकल जाऊँ, तुम्हें किसी भी दशामें अतिथिका अनादर नहीं करना चाहिये' ॥ ४६ ॥ तमब्रवीदोघवती तथा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ।
न मे त्वद्वचनात् किंचिन्न कर्तव्यं कथंचन ॥ ४७ ॥
यह सुनकर ओघवतीने दोनों हाथ जोड़ मस्तकमें लगाकर कहा—'कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो मैं आपकी आज्ञासे किसी कारणवश न कर सकूँ' ॥ ४७ ॥
जिगीषमाणस्तु गृहे तदा मृत्युः सुदर्शनम् ।
पृष्ठतोऽन्वगमद् राजन् रन्ध्रान्वेषी तदा सदा ॥ ४८ ॥
राजन्! उन दिनों गृहस्थ-धर्ममें स्थित हुए सुदर्शनको जीतनेकी इच्छासे मृत्यु उनका छिद्र खोजती हुई सदा उनके पीछे लगी रहती थी ॥ ४८ ॥
इध्मार्थं तु गते तस्मिन्नग्निपुत्रे सुदर्शने ।
अतिथिर्ब्राह्मणः श्रीमांस्तामाहौघवतीं तदा ॥ ४९ ॥
एक दिन अग्निपुत्र सुदर्शन जब समिधा लानेके लिये बाहर चले गये, उसी समय उनके घरपर एक तेजस्वी ब्राह्मण अतिथि आया और ओघवतीसे बोला— ॥ ४९ ॥
आतिथ्यं कृतमिच्छामि त्वयाद्य वरवर्णिनि ।
प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मतः ॥ ५० ॥
'वरवर्णिनि! यदि तुम गृहस्थसम्मत धर्मको मान्य समझती हो तो आज मैं तुम्हारे द्वारा किया गया आतिथ्यसत्कार ग्रहण करना चाहता हूँ ॥ ५० ॥
इत्युक्ता तेन विप्रेण राजपुत्री यशस्विनी ।
विधिना प्रतिजग्राह वेदोक्तेन विशाम्पते ॥ ५१ ॥
प्रजानाथ! उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर यशस्विनी राजकुमारी ओघवतीने वेदोक्त विधिसे उसका पूजन किया ॥ ५१ ॥
आसनं चैव पाद्यं च तस्मै दत्त्वा द्विजातये ।
प्रोवाचौघवती विप्रं केनार्थः किं ददामि ते ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणको बैठनेके लिये आसन और पैर धोनेके लिये जल देकर ओघवतीने उससे पूछा—'विप्रवर! आपको किस वस्तुकी आवश्यकता है? मैं आपकी सेवामें क्या भेंट करूँ?' ॥ ५२ ॥
तामब्रवीत् ततो विप्रो राजपुत्रीं सुदर्शनाम् ।
त्वया ममार्थः कल्याणि निर्विशङ्कैतदाचर ॥ ५३ ॥
तब ब्राह्मणने दर्शनीय सौन्दर्यसे सुशोभित राजकुमारी ओघवतीसे कहा—'कल्याणि! मुझे तुमसे ही काम है। तुम निःशंक होकर मेरा यह प्रिय कार्य करो ॥ ५३ ॥
यदि प्रमाणं धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मतः ।
प्रदानेनात्मनो राज्ञि कर्तुमर्हसि मे प्रियम् ॥ ५४ ॥
'रानी! यदि तुम्हें गृहस्थसम्मत धर्म मान्य है तो मुझे अपना शरीर देकर मेरा प्रिय कार्य करना चाहिये' ॥ ५४ ॥
स तया छन्द्यमानोऽन्यैरीप्सितैर्नृपकन्यया ।
नान्यमात्मप्रदानात् स तस्या वव्रे वरं द्विजः ॥ ५५ ॥ राजकन्याने दूसरी कोई अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये उस अतिथिसे बारंबार अनुरोध किया, किंतु उस ब्राह्मणने उसके शरीर-दानके सिवा और कोई अभिलषित पदार्थ उससे नहीं माँगा ॥ ५५ ॥
सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादितः । तथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम् ॥ ५६ ॥ तब राजकुमारीने पहले कहे हुए पतिके वचनको याद करके लजाते-लजाते उस द्विजश्रेष्ठसे कहा—‘अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है’ ॥ ५६ ॥
ततो विहस्य विप्रर्षिः सा चैवाथ विवेश ह । संस्मृत्य भर्तुर्वचनं गृहस्थाश्रमकाङ्क्षिणः ॥ ५७ ॥ गृहस्थाश्रम-धर्मके पालनकी इच्छा रखनेवाले पतिकी कही हुई बातको स्मरण करके जब उसने ब्राह्मणके समक्ष ‘हाँ’ कर दिया, तब उस विप्र ऋषिने मुसकराकर ओघवतीके साथ घरके भीतर प्रवेश किया ॥ ५७ ॥
अथेध्यानमुपादाय स पावकिरुपागमत् । मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं बन्धुरिवान्वितः ॥ ५८ ॥ इतनेहीमें अग्निकुमार सुदर्शन समिधा लेकर लौट आये। मृत्यु क्रूर भावनासे सदा उनके पीछे लगी रहती थी, मानो कोई स्नेही बन्धु अपने प्रिय बन्धुके पीछे-पीछे चल रहा हो ॥ ५८ ॥
ततस्त्वाश्रममागम्य स पावकसुतस्तदा । तां व्याजहारौघवतीं क्वासि यातेति चासकृत् ॥ ५९ ॥ आश्रमपर पहुँचकर फिर अग्निपुत्र सुदर्शन अपनी पत्नी ओघवतीको बारंबार पुकारने लगे—‘देवि! तुम कहाँ चली गयी?’ ॥ ५९ ॥
तस्मै प्रतिवचः सा तु भर्त्रे न प्रददौ तदा । कराभ्यां तेन विप्रेण स्पृष्टा भर्तृव्रता सती ॥ ६० ॥ उच्छिष्टास्मीति मन्वाना लज्जिता भर्तुरिव च । तूष्णीं भूताभवत् साध्वी न चोवाचाथ किंचन ॥ ६१ ॥ परंतु ओघवतीने उस समय अपने पतिको कोई उत्तर नहीं दिया। अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणने अपने दोनों हाथोंसे उसे छू दिया था। इससे वह सती-साध्वी पतिव्रता अपनेको दूषित मानकर अपने स्वामीसे भी लज्जित हो गयी थी; इसीलिये वह साध्वी चुप हो गयी। कुछ भी बोल न सकी ॥ ६०-६१ ॥
अथ तां पुनरेवेदं प्रोवाच स सुदर्शनः । क्व सा साध्वी क्व सा याता गरीयः किमतो मम ॥ ६२ ॥ पतिव्रता सत्यशीला नित्यं चैवार्जवे रता ।
कथं न प्रत्युदेत्यद्य स्मयमाना यथा पुरा ॥ ६३ ॥ अब सुदर्शन फिर पुकार-पुकारकर इस प्रकार कहने लगे—‘मेरी वह साध्वी पत्नी कहाँ है? वह सुशीला कहाँ चली गयी? मेरी सेवासे बढ़कर कौन गुरुतर कार्य उसपर आ पड़ा। वह पतिव्रता, सत्य बोलनेवाली और सदा सरलभावसे रहनेवाली है। आज पहलेकी ही भाँति मुसकराती हुई वह मेरी अगवानी क्यों नहीं कर रही है?’ ।। ६२-६३ ।।
उटजस्थस्तु तं विप्रः प्रत्युवाच सुदर्शनम् । अतिथिं विद्धि सम्प्राप्तं ब्राह्मणं पावके च माम् ॥ ६४ ॥ यह सुनकर आश्रमके भीतर बैठे हुए ब्राह्मणने सुदर्शनको उत्तर दिया—‘अग्निकुमार! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं ब्राह्मण हूँ और तुम्हारे घरपर अतिथिके रूपमें आया हूँ॥ ६४ ॥
अनया छन्द्यमानोऽहं भार्यया तव सत्तम । तैस्तैरतिथिसत्कारैर्ब्रह्मन्नेषा वृता मया ॥ ६५ ॥ ‘साधुशिरोमणे! तुम्हारी इस पत्नीने अतिथि-सत्कारके द्वारा मेरी इच्छा पूर्ण करनेका वचन दिया है। ब्रह्मन्! तब मैंने इसे ही वरण कर लिया है ।। ६५ ।।
अनेन विधिना सेयं मामर्च्छति शुभानना । अनुरूपं यदत्रान्यत् तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ ६६ ॥ ‘इसी विधिके अनुसार यह सुमुखी इस समय मेरी सेवामें उपस्थित हुई है। अब यहाँ तुम्हें दूसरा जो कुछ उचित प्रतीत हो, वह कर सकते हो’ ।। ६६ ।।
कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वगात् । हीनप्रतिज्ञमत्रैनं वधिष्यामीति चिन्तयन् ॥ ६७ ॥ इसी समय मृत्यु हाथमें लोहदण्ड लिये सुदर्शनके पीछे आकर खड़ी हो गयी। वह सोचती थी कि अब तो यह अपनी प्रतिज्ञा तोड़ बैठेगा। इसलिये इसे यहीं मार डालूँगी ।। ६७ ।।
सुदर्शनस्तु मनसा कर्मणा चक्षुषा गिरा । त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्च स्मयमानोऽब्रवीदिदम् ॥ ६८ ॥ परंतु सुदर्शन मन, वाणी, नेत्र और क्रियासे भी ईर्ष्या तथा क्रोधका त्याग कर चुके थे। वे हँसते-हँसते यों बोले— ।। ६८ ।।
सुरतं तेऽस्तु विप्राग्र्य प्रीतिर्हि परमा मम । गृहस्थस्य हि धर्मोऽग्र्यः सम्प्राप्तातिथिपूजनम् ॥ ६९ ॥ ‘विप्रवर! आपकी सुरत कामनापूर्ण हो। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता है; क्योंकि घरपर आये हुए अतिथिका पूजन करना गृहस्थके लिये सबसे बड़ा धर्म है ।। ६९ ।।
अतिथिः पूजितो यस्य गृहस्थस्य तु गच्छति । नान्यस्तस्मात् परो धर्म इति प्राहुर्मनीषिणः ॥ ७० ॥
'जिस गृहस्थके घरपर आया हुआ अतिथि पूजित होकर जाता है उसके लिये उससे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है—ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ।। ७० ।।
प्राणा हि मम दाराश्च यच्चान्यद् विद्यते वसु । अतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम् ।। ७१ ।। 'मेरे प्राण, मेरी पत्नी तथा मेरे पास और जो कुछ धन-दौलत हैं, वह सब मेरी ओरसे अतिथियोंके लिये निछावर है, ऐसा मैंने व्रत ले रखा है ।। ७१ ।।
निःसंदिग्धं यथा वाक्यमेतन्मे समुदाहृतम् । तेनाहं विप्र सत्येन स्वयमात्मानमालभे ।। ७२ ।। 'ब्रह्मन्! मैंने जो यह बात कही है, इसमें संदेह नहीं है। इस सत्यको सिद्ध करनेके लिये मैं स्वयं ही अपने शरीरको छूकर शपथ खाता हूँ ।। ७२ ।।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । बुद्धिरात्मा मनः कालो दिशश्चैव गुणा दश ।। ७३ ।। नित्यमेव हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः । सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभृतां वर ।। ७४ ।। 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, नेत्र, बुद्धि, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ—से दस गुण (वस्तुएँ) सदा ही प्राणियोंके शरीरमें स्थित होकर उनके पुण्य और पापकर्मको देखा करते हैं ।। ७३-७४ ।।
यथैषा नानृता वाणी मयाद्य समुदीरिता । तेन सत्येन मां देवाः पालयन्तु दहन्तु वा ।। ७५ ।। 'आज मेरी कही हुई यह वाणी यदि मिथ्या नहीं है तो इस सत्यके प्रभावसे देवता मेरी रक्षा करें, अथवा मिथ्या होनेपर मुझे जलाकर भस्म कर डालें' ।। ७५ ।।
ततो नादः समभवद् दिक्षु सर्वासु भारत । असकृत् सत्यमित्येवं नैतन्मिथ्येति सर्वतः ।। ७६ ।। भरतनन्दन! सुदर्शनके इतना कहते ही सम्पूर्ण दिशाओंसे बारंबार आवाज आने लगी—'तुम्हारा कथन सत्य है। इसमें झूठका लेश भी नहीं है' ।। ७६ ।।
उटजात् तु ततस्तस्मान्निष्क्राम स वै द्विजः । वपुषा द्यां च भूमिं च व्याप्य वायुरिवोद्यतः ।। ७७ ।। तत्पश्चात् वह ब्राह्मण उस आश्रमसे बाहर निकला। वह अपने शरीरसे वायुकी भाँति पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हो गया ।। ७७ ।।
स्वरेण विप्रः शैक्षेण त्रीँल्लोकाननुनादयन् । उवाच चैनं धर्मज्ञं पूर्वमामन्त्र्य नामतः ।। ७८ ।। शिक्षाके अनुकूल उदात्त आदि स्वरसे तीनों लोकोंको प्रतिध्वनित करते हुए उस ब्राह्मणने पहले धर्मज्ञ सुदर्शनको सम्बोधित करके उससे इस प्रकार कहा— ।। ७८ ।।