भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

एतां श्रुत्वोपमां पार्थ प्रयतो ब्राह्मणर्षभान् ।
सततं पूजयेथास्त्वं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ ३१ ॥
कुन्तीनन्दन! इस दृष्टान्त एवं ब्राह्मण-माहात्म्यको सुनकर तुम सदा पवित्रभावसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन करते रहो। इससे तुम कल्याणके भागी होओगे ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पृथ्वीवासुदेवसंवादे
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पृथ्वी और वासुदेवका संवादविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन

भीष्म उवाच

जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।
नमस्यः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्राह्मण जन्मसे ही महान् भाग्यशाली, समस्त प्राणियोंका वन्दनीय, अतिथि और प्रथम भोजन पानेका अधिकारी है ॥ १ ॥

सर्वार्थाः सुहृदस्ततात ब्राह्मणाः सुमनोमुखाः ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरनुध्यायन्ति पूजिताः ॥ २ ॥
तात! ब्राह्मण सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले, सबके सुहृद् तथा देवताओंके मुख हैं। वे पूजित होनेपर अपनी मंगलयुक्त वाणीसे आशीर्वाद देकर मनुष्यके कल्याणका चिन्तन करते हैं ॥ २ ॥

सर्वान्न्रो द्विषतस्तात ब्राह्मणा जातमन्यवः ।
गीर्भिर्दारुणयुक्ताभिरभिहन्युरपूजिताः ॥ ३ ॥
तात! हमारे शत्रुओंके द्वारा पूजित न होनेपर उनके प्रति कुपित हुए ब्राह्मण उन सबको अभिशापयुक्त कठोर वाणीद्वारा नष्ट कर डालें ॥ ३ ॥

अत्र गाथाः पुरागीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
सृष्ट्वा द्विजातीन् धाता हि यथापूर्वं समादधत् ॥ ४ ॥
न चान्यदिह कर्तव्यं किञ्चिदूर्ध्वं यथाविधि ।
गुप्तो गोपायते ब्रह्म श्रेयो वस्तेन शोभनम् ॥ ५ ॥
इस विषयमें पुराणवेत्ता पुरुष पहलेकी गायी हुई कुछ गाथाओंका वर्णन करते हैं—प्रजापतिने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको पूर्ववत् उत्पन्न करके उनको समझाया, 'तुमलोगोंके लिये विधिपूर्वक स्वधर्मपालन और ब्राह्मणोंकी सेवाके सिवा और कोई कर्तव्य नहीं है। ब्राह्मणकी रक्षा की जाय तो वह स्वयं भी अपने रक्षककी रक्षा करता है; अतः ब्राह्मणकी सेवासे तुमलोगोंका परम कल्याण होगा ॥ ४-५ ॥

स्वमेव कुर्वतां कर्म श्रीर्वो ब्राह्मी भविष्यति ।
प्रमाणं सर्वभूतानां प्रग्रहाश्च भविष्यथ ॥ ६ ॥
'ब्राह्मणकी रक्षारूप अपने कर्तव्यका पालन करनेसे ही तुमलोगोंको ब्राह्मी लक्ष्मी प्राप्त होगी। तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये प्रमाणभूत तथा उनको वशमें करनेवाले बन जाओगे ॥ ६ ॥

न शौद्रं कर्म कर्तव्यं ब्राह्मणेन विपश्चिता ।

शौद्रं हि कुर्वतः कर्म धर्मः समुपरुध्यते ॥ ७ ॥ ‘विद्वान् ब्राह्मणको शूद्रोचित कर्म नहीं करना चाहिये। शूद्रके कर्म करनेसे उसका धर्म नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥

श्रीश्च बुद्धिश्च तेजश्च विभूतिश्च प्रतापिनी । स्वाध्याये चैव माहात्म्यं विपुलं प्रतिपत्स्यते ॥ ८ ॥ ‘स्वधर्मका पालन करनेसे लक्ष्मी, बुद्धि, तेज और प्रतापयुक्त ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, तथा स्वाध्यायका अत्यधिक माहात्म्य उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥

हुत्वा चाहवनीयस्थं महाभाग्ये प्रतिष्ठिताः । अग्रभोज्याः प्रसूतीनां श्रिया ब्राह्म्यानुकल्पिताः ॥ ९ ॥ ‘ब्राह्मण आहवनीय अग्निमें स्थित देवतागणोंको हवनसे तृप्त करके महान् सौभाग्यपूर्ण पदपर प्रतिष्ठित होते हैं। वे ब्राह्मी विद्यासे उत्तम पात्र बनकर बालकोंसे भी पहले भोजन पानेके अधिकारी होते हैं ॥ ९ ॥

श्रद्धया परया युक्ता ह्यनभिद्रोहालब्धया । दमस्वाध्यायनिरताः सर्वान् कामानवाप्स्यथ ॥ १० ॥ ‘द्विजगण! यदि तुमलोग किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करनेके कारण प्राप्त हुई परम श्रद्धासे सम्पन्न हो इन्द्रियसंयम और स्वाध्यायमें लगे रहोगे तो सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लोगे ॥ १० ॥

यच्चैव मानुषे लोके यच्च देवेषु किञ्चन । सर्वं तु तपसा साध्यं ज्ञानेन नियमेन च ॥ ११ ॥ ‘मनुष्यलोकमें तथा देवलोकमें जो कुछ भी भोग्य वस्तुएँ हैं, वे सब ज्ञान, नियम और तपस्यासे प्राप्त होनेवाली हैं ॥ ११ ॥

(युष्मत्सम्माननात् प्रीतिं पावनाः क्षत्रियाः श्रियम् । अमुत्रेह समायान्ति वैश्यशूद्रादिकास्तथा ॥ अरक्षिताश्च युष्माभिर्विरुद्धा यान्ति विप्लवम् । युष्मत्तेजोधृता लोकास्तद् रक्षथ जगत्त्रयम् ॥) ‘आपलोगोंके समादरसे पवित्र हुए क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदि प्राणी इहलोक और परलोकमें भी प्रीति एवं सम्पत्ति पाते हैं। जो आपके विरोधी हैं, वे आपसे अरक्षित होनेके कारण विनाशको प्राप्त होते हैं। आपके तेजसे ही ये सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं; अतः आप तीनों लोकोंकी रक्षा करें’ ॥

इत्येवं ब्रह्मगीतास्ते समाख्याता मयानघ । विप्राणामनुकम्पार्थं तेन प्रोक्तं हि धीमता ॥ १२ ॥ निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्रह्माजीकी गायी हुई गाथा मैंने तुम्हें बतायी है। उन परम बुद्धिमान् धाताने ब्राह्मणोंपर कृपा करनेके लिये ही ऐसा कहा है ॥ १२ ॥

भूयस्तेषां बलं मन्ये यथा राज्ञस्तपस्विनः । दुरासदाश्च चण्डाश्च रभसाः क्षिप्रकारिणः ॥ १३ ॥ मैं ब्राह्मणोंका बल तपस्वी राजाके समान बहुत बड़ा मानता हूँ। वे दुर्जय, प्रचण्ड, वेगशाली और शीघ्रकारी होते हैं ॥ १३ ॥

सन्त्येषां सिंहसत्त्वाश्च व्याघ्रसत्त्वास्तथापरे । वराहमृगसत्त्वाश्च जलसत्त्वास्तथापरे ॥ १४ ॥ ब्राह्मणोंमें कुछ सिंहके समान शक्तिशाली होते हैं और कुछ व्याघ्रके समान। कितनोंकी शक्ति वाराह और मृगके समान होती है। कितने ही जल-जन्तुओंके समान होते हैं ॥ १४ ॥

सर्पस्पर्शसमाः केचित् तथान्ये मकरस्पृशः । विभाष्यघातिनः केचित् तथा चक्षुर्हणोऽपरे ॥ १५ ॥ किन्हींका स्पर्श सर्पके समान होता है तो किन्हींका घड़ियालोंके समान। कोई शाप देकर मारते हैं तो कोई क्रोधभरी दृष्टिसे देखकर ही भस्म कर देते हैं ॥ १५ ॥

सन्ति चाशीविषसमाः सन्ति मन्दास्तथापरे । विविधानीह वृत्तानि ब्राह्मणानां युधिष्ठिर ॥ १६ ॥ कुछ ब्राह्मण विषधर सर्पके समान भयंकर होते हैं और कुछ मन्द स्वभावके भी होते हैं। युधिष्ठिर! इस जगत्में ब्राह्मणोंके स्वभाव और आचार-व्यवहार अनेक प्रकारके हैं ॥ १६ ॥

मेकला द्राविडा लाटाः पौण्ड्राः कान्वशिरास्तथा । शौण्डिका दरदा दार्वाश्चौराः शबरबर्बराः ॥ १७ ॥ किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानाममर्षणात् ॥ १८ ॥ मेकल, द्राविड़, लाट, पौण्ड्र, कान्वशिरा, शौण्डिक, दरद, दार्व, चौर, शबर, बर्बर, किरात और यवन—ये सब पहले क्षत्रिय थे; किंतु ब्राह्मणोंके साथ ईर्ष्या करनेसे नीच हो गये ॥ १७-१८ ॥

ब्राह्मणानां परिभवादसुराः सलिलेशयाः । ब्राह्मणानां प्रसादाच्च देवाः स्वर्गनिवासिनः ॥ १९ ॥ ब्राह्मणोंके तिरस्कारसे ही असुरोंको समुद्रमें रहना पड़ा और ब्राह्मणोंके कृपाप्रसादसे देवता स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ १९ ॥

अशक्यं स्प्रष्टुमाकाशमचाल्यो हिमवान् गिरिः । अधार्या सेतुना गङ्गा दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २० ॥ जैसे आकाशको छूना, हिमालयको विचलित करना और बाँध बाँधकर गङ्गाके प्रवाहको रोक देना असम्भव है, उसी प्रकार इस भूतलपर ब्राह्मणोंको जीतना सर्वथा असम्भव है ॥ २० ॥

न ब्राह्मणविरोधेन शक्या शास्तुं वसुन्धरा ।
ब्राह्मणा हि महात्मानो देवानामपि देवताः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणोंसे विरोध करके भूमण्डलका राज्य नहीं चलाया जा सकता; क्योंकि महात्मा ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं ॥ २१ ॥
तान् पूजयस्व सततं दानेन परिचर्यया ।
यदिच्छसि महीं भोक्तुमिमां सागरमेखलाम् ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! यदि तुम इस समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य भोगना चाहते हो तो दान और सेवाके द्वारा सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करते रहो ॥ २२ ॥
प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणां शाम्यतेऽनघ ।
प्रतिग्रहं ये नेच्छेयुस्तेभ्यो रक्ष्यं त्वया नृप ॥ २३ ॥
निष्पाप नरेश! दान लेनेसे ब्राह्मणोंका तेज शान्त हो जाता है; इसलिये जो दान नहीं लेना चाहते उन ब्राह्मणोंसे तुम्हें अपने कुलकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायां
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसाविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके दो श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्त्रिंशोऽध्यायः

ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शक्रशम्बरसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, इसे सुनो ॥ १ ॥ शक्रो ह्यज्ञातरूपेण जटी भूत्वा रजोगुणः । विरूपं रथमास्थाय प्रश्नं पप्रच्छ शम्बरम् ॥ २ ॥ एक समयकी बात है, देवराज इन्द्र अज्ञातरूपसे रजोगुणसम्पन्न जटाधारी तपस्वी बनकर एक बेडौल रथपर सवार हो शम्बरासुरके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उससे पूछा ॥ २ ॥

शक्र उवाच

केन शम्बर वृत्तेन स्वजात्यानधितिष्ठसि । श्रेष्ठं त्वां केन मन्यन्ते तद् वै प्रब्रूहि तत्त्वतः ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—शम्बरासुर! किस बर्तावसे अपनी जातिवालॉंपर शासन करते हो? वे किस कारण तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? यह ठीक-ठीक बतलाओ ॥ ३ ॥

शम्बर उवाच

नासूयामि यदा विप्रान् ब्राह्ममेव च मे मतम् । शास्त्राणि वदतो विप्रान् सम्मन्यामि यथासुखम् ॥ ४ ॥ शम्बरासुरने कहा—मैं ब्राह्मणोंमें कभी दोष नहीं देखता। उनके मतको ही अपना मत समझता हूँ और शास्त्रोंकी बात बतानेवाले विप्रोंका सदा सम्मान करता हूँ—उन्हें यथासाध्य सुख देनेकी चेष्टा करता हूँ ॥ ४ ॥ श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् । अभ्यर्च्याभ्यनुपृच्छामि पादौ गृह्णामि धीमताम् ॥ ५ ॥ सुनकर उनके वचनोंकी अवहेलना नहीं करता। कभी उनका अपराध नहीं करता। उनकी पूजा करके कुशल पूछता हूँ और बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके पाँव पकड़ता हूँ ॥ ५ ॥ ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते सम्पृच्छन्ते च मां सदा । प्रमत्तेष्वप्रमत्तोऽस्मि सदा सुप्तेषु जागृमि ॥ ६ ॥

ब्राह्मण भी अत्यन्त विश्वस्त होकर मेरे साथ बातचीत करते और मेरी कुशल पूछते हैं। ब्राह्मणोंके असावधान रहनेपर भी मैं सदा सावधान रहता हूँ। उनके सोते रहनेपर भी मैं जागता रहता हूँ ॥ ६ ॥

ते मां शास्त्रपथे युक्तं ब्रह्मण्यमनसूयकम् ।
समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥ ७ ॥
मुझे शास्त्रीय मार्गपर चलनेवाला ब्राह्मणभक्त तथा अदोषदर्शी जानकर वे उपदेशक ब्राह्मण मुझे उसी प्रकार सदुपदेशके अमृतसे सींचते रहते हैं जैसे मधुमक्खियाँ मधुके छत्तेको ॥ ७ ॥

यच्च भाषन्ति संतुष्टास्तच्च गृह्णामि मेधया ।
समाधिमात्मनो नित्यमनुलोममचिन्तयम् ॥ ८ ॥
संतुष्ट होकर वे मुझसे जो कुछ कहते हैं उसे मैं अपनी बुद्धिके द्वारा ग्रहण करता हूँ। सदा ब्राह्मणोंमें अपनी निष्ठा बनाये रखता हूँ और नित्यप्रति उनके अनुकूल विचार रखता हूँ ॥ ८ ॥

सोऽहं वागग्रमृष्टानां रसानामवलेहकः ।
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ९ ॥
उनकी वाणीसे जो उपदेशका मधुर रस प्रवाहित होता है उसका मैं आस्वादन करता रहता हूँ। इसीलिये नक्षत्रोंपर चन्द्रमाकी भाँति मैं अपनी जातिवालोंपर शासन करता हूँ ॥ ९ ॥

एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् ।
यद् ब्राह्मणमुखात् शास्त्रमिह श्रुत्वा प्रवर्तते ॥ १० ॥
ब्राह्मणके मुखसे शास्त्रका उपदेश सुनकर इस जीवनमें उसके अनुसार बर्ताव करना ही पृथ्वीपर सर्वोत्तम अमृत और सर्वोत्तम दृष्टि है ॥ १० ॥

एतत् कारणमाज्ञाय दृष्ट्वा देवासुरं पुरा ।
युद्धं पिता मे हृष्टात्मा विस्मितः समपद्यत ॥ ११ ॥
इस कारणको जानकर अर्थात् ब्राह्मणके उपदेशके अनुसार चलना ही अमृत है—इस बातको भलीभाँति समझकर पूर्वकालमें देवासुरसंग्रामको उपस्थित हुआ देख मेरे पिता मन-ही-मन प्रसन्न और विस्मित हुए थे ॥

दृष्ट्वा च ब्राह्मणानां तु महिमानं महात्मनाम् ।
पर्यपृच्छत् कथममी सिद्धा इति निशाकरम् ॥ १२ ॥
महात्मा ब्राह्मणोंकी इस महिमाको देखकर उन्होंने चन्द्रमासे पूछा—‘निशाकर! इन ब्राह्मणोंको किस प्रकार सिद्धि प्राप्त हुई?’ ॥ १२ ॥

सोम उवाच

ब्राह्मणास्तपसा सर्वे सिध्यन्ते वाग्बलाः सदा । भुजवीर्याश्च राजानो वागस्त्राश्च द्विजातयः ॥ १३ ॥ चन्द्रमाने कहा— दानवराज! सम्पूर्ण ब्राह्मण तपस्यासे ही सिद्ध हुए हैं। इनका बल सदा इनकी वाणीमें ही होता है। राजाओंका बल उनकी भुजाएँ हैं और ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणी ॥ १३ ॥

प्रणवं चाप्यधीयीत ब्राह्मीर्दुर्वसतीर्वसन् । निर्मन्युरपि निर्वाणो यदि स्यात् समदर्शनः ॥ १४ ॥ पहले गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्लेश-सहनपूर्वक निवास करके प्रणवसहित वेदका अध्ययन करना चाहिये। फिर अन्तमें क्रोध त्यागकर शान्तभावसे संन्यास ग्रहण करना चाहिये। यदि संन्यासी हो तो सर्वत्र समान दृष्टि रखे ॥ १४ ॥

अपि च ज्ञानसम्पन्नः सर्वान् वेदान् पितुर्गृहे । श्लाघमान इवाधीयाद् ग्राम्य इत्येव तं विदुः ॥ १५ ॥ जो सम्पूर्ण वेदोंको पिताके घरमें रहकर पढ़ता है वह ज्ञानसम्पन्न और प्रशंसनीय होनेपर भी विद्वानोंके द्वारा ग्रामीण (गँवार) ही समझा जाता है। (वास्तवमें गुरुके घरमें क्लेश-सहनपूर्वक रहकर वेद पढ़नेवाला ही श्रेष्ठ है) ॥ १५ ॥

भूमिरेतौ निगिरति सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाप्ययोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १६ ॥ जैसे साँप बिलमें रहनेवाले छोटे जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार युद्ध न करनेवाले क्षत्रिय और विद्याके लिये प्रवास न करनेवाले ब्राह्मणको यह पृथ्वी निगल जाती है ॥ १६ ॥

अभिमानः श्रियं हन्ति पुरुषस्याल्पमेधसः । गर्भेण दुष्यते कन्या गृहवासेन च द्विजः ॥ १७ ॥ मन्दबुद्धि पुरुषके भीतर जो अभिमान होता है वह उसकी लक्ष्मीका नाश करता है। गर्भ धारण करनेसे कन्या दूषित हो जाती है और सदा घरमें रहनेसे ब्राह्मण दूषित समझे जाते हैं ॥ १७ ॥

(विद्याविदो लोकविदः तपोबलसमन्विताः । नित्यपूज्याश्च वन्द्याश्च द्विजा लोकद्वयेच्छुभिः ॥) जो इहलोक और परलोक दोनोंको सुधारना चाहते हों, उन्हें विद्वान्, लौकिक बातोंके ज्ञाता, तपस्वी और शक्तिशाली ब्राह्मणोंकी सदा पूजा और वन्दना करनी चाहिये ॥

इत्येतन्मे पिता श्रुत्वा सोमादद्भुतदर्शनात् । ब्राह्मणान् पूजयामास तथैवाहं महाव्रतान् ॥ १८ ॥ अद्भुत दर्शनवाले चन्द्रमासे यह बात सुनकर मेरे पिताजीने महान् व्रतधारी ब्राह्मणोंका पूजन किया। वैसे ही मैं भी करता हूँ ॥ १८ ॥

भीष्म उवाच

श्रुत्वैतद् वचनं शक्रो दानवेन्द्रमुखाच्च्युतम् । द्विजान् सम्पूजयामास महेन्द्रत्वमवाप च ॥ १९ ॥

**भीष्मजी कहते हैं—**भारत! दानवराज शम्बरके मुखसे यह वचन सुनकर इन्द्रने ब्राह्मणोंका पूजन किया, इससे उन्हें महेन्द्रपदकी प्राप्ति हुई ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायामिन्द्रशम्बरसंवादे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसाके प्रसंगमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवादविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २० श्लोक हैं)

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तत्रिंशोऽध्यायः

दानपात्रकी परीक्षा

युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वश्च भवेत् पात्रमथवापि चिरोषितः ।
दूरादभ्यागतं चापि किं पात्रं स्यात् पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! दानका पात्र कौन होता है? अपरिचित पुरुष या बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हुआ पुरुष। अथवा किसी दूर देशसे आया हुआ मनुष्य? इनमेंसे किसको दानका उत्तम पात्र समझना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

क्रिया भवति केषांचिदुपांशुव्रतमुत्तमम् ।
यो यो याचेत यत् किञ्चित् सर्वं दद्याम इत्यपि ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! कितने ही याचकोंका तो यज्ञ, गुरुदक्षिणा या कुटुम्बका भरण-पोषण आदि कार्य ही मनोरथ होता है और किन्हींका उत्तम मौनव्रतसे रहकर निर्वाह करना प्रयोजन होता है। इनमेंसे जो-जो याचक जिस किसी वस्तुकी याचना करे उन सबके लिये यही कहना चाहिये कि 'हम देंगे' (किसीको निराश नहीं करना चाहिये) ॥ २ ॥

अपीडयन् भृत्यवर्गमित्येवमनुशुश्रुम ।
पीडयन् भृत्यवर्गं हि आत्मानमपकर्षति ॥ ३ ॥

परंतु हमने सुना है कि 'जिनके भरण-पोषणका अपने ऊपर भार है उस समुदायको कष्ट दिये बिना ही दाताको दान करना चाहिये। जो पोष्यवर्गको कष्ट देकर या भूखे मारकर दान करता है वह अपने आपको नीचे गिराता है' ॥ ३ ॥

अपूर्वं भावयेत् पात्रं यच्चापि स्याच्चिरोषितम् ।
दूरादभ्यागतं चापि तत्पात्रं च विदुर्बुधाः ॥ ४ ॥

इस दृष्टिसे विचार करनेपर जो पहलेसे परिचित नहीं है या जो चिरकालसे साथ रह चुका है, अथवा जो दूर देशसे आया हुआ है—इन तीनोंको ही विद्वान् पुरुष दान-पात्र समझते हैं ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अपीडया च भूतानां धर्मस्याहिंसया तथा ।
पात्रं विद्यात् तु तत्त्वेन यस्मै दत्तं न संतपेत् ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किसी प्राणीको पीड़ा न दी जाय और धर्ममें भी बाधा न आने पाये, इस प्रकार दान देना उचित है; परंतु पात्रकी यथार्थ पहचान कैसे हो? जिससे

दिया हुआ दान पीछे संतापका कारण न बने ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

ऋत्विक् पुरोहिताचार्याः शिष्यसम्बन्धिबान्धवाः । सर्वे पूज्याश्च मान्याश्च श्रुतवन्तोऽनसूयकाः ॥ ६ ॥ **भीष्मजीने कहा—**बेटा! ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, विद्वान् और दोष-दृष्टिसे रहित पुरुष—ये सभी पूजनीय और माननीय हैं ॥ ६ ॥

अतोऽन्यथा वर्तमानाः सर्वे नार्हन्ति सत्क्रियाम् । तस्मान्नित्यं परीक्षेत पुरुषान् प्रणिधाय वै ॥ ७ ॥ इनसे भिन्न प्रकारके तथा भिन्न बर्ताववाले जो लोग हैं, वे सब सत्कारके पात्र नहीं हैं; अतः एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सुपात्र पुरुषोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥

अक्रोधः सत्यवचनमहिंसा दम आर्जवम् । अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ॥ ८ ॥ यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते न चाकार्याणि भारत । स्वभावतो निविष्टानि तत्पात्रं मानमर्हति ॥ ९ ॥ भारत! क्रोधका अभाव, सत्य-भाषण, अहिंसा, इन्द्रियसंयम, सरलता, द्रोहहीनता, अभिमानशून्यता, लज्जा, सहनशीलता, दम और मनोनिग्रह—ये गुण जिनमें स्वभावतः दिखायी दें और धर्मविरुद्ध कार्य दृष्टिगोचर न हों, वे ही दानके उत्तम पात्र और सम्मानके अधिकारी हैं ॥ ८-९ ॥

तथा चिरोषितं चापि सम्प्रत्यागतमेव च । अपूर्वं चैव पूर्वं च तत्पात्रं मानमर्हति ॥ १० ॥ जो पुरुष बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हो, एवं जो कहींसे तत्काल आया हो, वह पहलेका परिचित हो या अपरिचित, वह दानका पात्र और सम्मानका अधिकारी है ॥ १० ॥

अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चाभिलङ्घनम् । अव्यवस्था च सर्वत्र एतान्नाशनमात्मनः ॥ ११ ॥ वेदोंको अप्रामाणिक मानना, शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना तथा सर्वत्र अव्यवस्था फैलाना—ये सब अपना ही नाश करनेवाले हैं ॥ ११ ॥

भवेत् पण्डितमानी यो ब्राह्मणो वेदनिन्दकः । आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥ १२ ॥ हेतुवादान् ब्रुवन् सत्सु विजेताहेतुवादिकः । आक्रोष्टा चातिवक्ता च ब्राह्मणानां सदैव हि ॥ १३ ॥ सर्वाभिशङ्की मूढश्च बालः कटुकवागपि ।

बोद्धव्यस्तादृशस्तात नरं श्वानं हि तं विदुः ॥ १४ ॥
जो ब्राह्मण अपने पाण्डित्यका अभिमान करके व्यर्थके तर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता है, आन्वीक्षिकी निरर्थक तर्कविद्यामें अनुराग रखता है, सत्पुरुषोंकी सभामें कोरी तर्ककी बातें कहकर विजय पाता, शास्त्रानुकूल युक्तियोंका प्रतिपादन नहीं करता, जोर-जोरसे हल्ला मचाता और ब्राह्मणोंके प्रति सदा अतिवाद (अमर्यादित वचन)-का प्रयोग करता है, जो सबपर संदेह करता है, जो बालकों और मूर्खोंका-सा व्यवहार करता तथा कटुवचन बोलता है, तात! ऐसे मनुष्यको अस्पृश्य समझना चाहिये। विद्वान् पुरुषोंने ऐसे पुरुषको कुत्ता माना है ॥ १२—१४ ॥
यथा श्वा भषितुं चैव हन्तुं चैवावसज्जते ।
एवं सम्भाषणार्थाय सर्वशास्त्रवधाय च ॥ १५ ॥
जैसे कुत्ता भौंकने और काटनेके लिये निकट आ जाता है, उसी प्रकार वह बहस करने और शास्त्रोंका खण्डन करनेके लिये इधर-उधर दौड़ता-फिरता है (ऐसा व्यक्ति दानका पात्र नहीं है) ॥ १५ ॥
लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च ।
एवं नरो वर्तमानः शाश्वतीर्वर्धते समाः ॥ १६ ॥
मनुष्यको जगत्के व्यवहारपर दृष्टि डालनी चाहिये। धर्म और अपने कल्याणके उपायोंपर भी विचार करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सदा ही अभ्युदयशील होता है ॥ १६ ॥
ऋणमुन्मुच्य देवानाम्ऋषीणां च तथैव च ।
पितॄणामथ विप्राणामतिथीनां च पञ्चमम् ॥ १७ ॥
पर्यायेण विशुद्धेन सुविनीतेन कर्मणा ।
एवं गृहस्थः कर्माणि कुर्वन् धर्मान्न हीयते ॥ १८ ॥
जो यज्ञ-यागादि करके देवताओंके ऋणसे, वेदोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके ऋणसे, श्रेष्ठ पुत्रकी उत्पत्ति तथा श्राद्ध करके पितरोंके ऋणसे, दान देकर ब्राह्मणोंके ऋणसे और आतिथ्य सत्कार करके अतिथियोंके ऋणसे मुक्त होता है तथा क्रमशः विशुद्ध और विनययुक्त प्रयत्नसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह गृहस्थ कभी धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता ॥ १७-१८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पात्रपरीक्षायां सप्तत्रिंशोऽध्यायः
॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पात्रकी परीक्षाविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टत्रिंशोऽध्यायः

पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना

युधिष्ठिर उवाच

स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि श्रोतुं भरतसत्तम ।
स्त्रियो हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ताः स्मृताः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**भरतश्रेष्ठ! मैं स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि सारे दोषोंकी जड़ स्त्रियाँ ही हैं। वे ओछी बुद्धिवाली मानी गयी हैं ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं पुंश्चल्या पञ्चचूडया ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें देवर्षि नारदका अप्सरा पञ्चचूड़ाके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

लोकाननुचरन् सर्वान् देवर्षिर्नारदः पुरा ।
ददर्शाप्सरसं ब्राह्मीं पञ्चचूडामनिन्दिताम् ॥ ३ ॥
पहलेकी बात है, सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते हुए देवर्षि नारदने एक दिन ब्रह्मलोककी अनिन्द्य सुन्दरी अप्सरा पञ्चचूड़ाको देखा ॥ ३ ॥

तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं पप्रच्छाप्सरसं मुनिः ।
संशयो हृदि कश्चिन्मे ब्रूहि तन्मे सुमध्यमे ॥ ४ ॥
मनोहर अंगोंसे युक्त उस अप्सराको देखकर मुनिने उसके सामने अपना प्रश्न रखा—‘सुमध्यमे! मेरे हृदयमें एक महान् संदेह है। उसके विषयमें मुझे यथार्थ बात बताओ’ ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्ताथ सा विप्रं प्रत्युवाचाथ नारदम् ।
विषये सति वक्ष्यामि समर्थं मन्यसे च माम् ॥ ५ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! नारदजीके ऐसा कहनेपर पंचचूड़ा अप्सराने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—‘यदि आप मुझे उस प्रश्नका उत्तर देनेके योग्य मानते हैं और वह बताने योग्य है तो अवश्य बताऊँगी’ ॥ ५ ॥

नारद उवाच

न त्वामविषये भद्रे नियोक्ष्यामि कथंचन ।
स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि त्वत्तः श्रोतुं वरानने ॥ ६ ॥
नारदजीने कहा— भद्रे! मैं तुम्हें ऐसी बात बतानेके लिये नहीं कहूँगा जो कहने योग्य न हो; अथवा तुम्हारा विषय न हो। सुमुखि! मैं तुम्हारे मुँहसे स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य देवर्षेरप्सरोत्तमा ।
प्रत्युवाच न शक्ष्यामि स्त्री सती निन्दितुं स्त्रियः ॥ ७ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! नारदजीका यह वचन सुनकर वह उत्तम अप्सरा बोली—‘देवर्षे! मैं स्त्री होकर स्त्रियोंकी निन्दा नहीं कर सकती ॥ ७ ॥
विदितास्ते स्त्रियो याश्च यादृशाश्च स्वभावतः ।
न मामर्हसि देवर्षे नियोक्तुं कार्य ईदृशे ॥ ८ ॥
‘संसारमें जैसी स्त्रियाँ हैं और उनके जैसे स्वभाव हैं, वे सब आपको विदित हैं; अतः देवर्षे! आप मुझे ऐसे कार्यमें न लगावें' ॥ ८ ॥
तामुवाच स देवर्षिः सत्यं वद सुमध्यमे ।
मृषावादे भवेद् दोषः सत्ये दोषो न विद्यते ॥ ९ ॥
तब देवर्षिने उससे कहा—‘सुमध्यमे! तुम सच्ची बात बताओ। झूठ बोलनेमें दोष लगता है। सच कहनेमें कोई दोष नहीं है' ॥ ९ ॥
इत्युक्ता सा कृतमतिरभवच्चारुहासिनी ।
स्त्रीदोषान् शाश्वतान् सत्यान् भाषितुं सम्प्रचक्रमे ॥ १० ॥
उनके इस प्रकार समझानेपर उस मनोहर हास्यवाली अप्सराने कहनेके लिये दृढ़ निश्चय करके स्त्रियोंके सच्चे और स्वाभाविक दोषोंको बताना आरम्भ किया ॥ १० ॥

पञ्चचूडोवाच

कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च योषितः ।
मर्यादासु न तिष्ठन्ति स दोषः स्त्रीषु नारद ॥ ११ ॥
पंचचूड़ा बोली— नारदजी! कुलीन, रूपवती और सनाथ युवतियाँ भी मर्यादाके भीतर नहीं रहती हैं। यह स्त्रियोंका दोष है ॥ ११ ॥
न स्त्रीभ्यः किञ्चिदन्यद् वै पापीयस्तरमस्ति वै ।
स्त्रियो हि मूलं दोषाणां तथा त्वमपि वेत्थ ह ॥ १२ ॥
स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। स्त्रियाँ सारे दोषोंकी जड़ हैं, इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं ॥ १२ ॥
समाज्ञातान्ॠद्धिमतः प्रतिरूपान् वशे स्थितान् ।

पतीनन्तरमासाद्य नालं नार्यः प्रतीक्षितुम् ॥ १३ ॥ यदि स्त्रियोंको दूसरोंसे मिलनेका अवसर मिल जाय तो वे सद्गुणोंमें विख्यात, धनवान्, अनुपम रूप-सौन्दर्यशाली तथा अपने वशमें रहनेवाले पतियोंकी भी प्रतीक्षा नहीं कर सकतीं ॥ १३ ॥

असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो । पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे ॥ १४ ॥ प्रभो! हम स्त्रियोंमें यह सबसे बड़ा पातक है कि हम पापीसे पापी पुरुषोंको भी लाज छोड़कर स्वीकार कर लेती हैं ॥ १४ ॥

स्त्रियं हि यः प्रार्थयते संनिकर्षं च गच्छति । ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः ॥ १५ ॥ जो पुरुष किसी स्त्रीको चाहता है, उसके निकटतक पहुँचता है और उसकी थोड़ी-सी सेवा कर देता है, उसीको वे युवतियाँ चाहने लगती हैं ॥ १५ ॥

अनर्थित्वान्मनुष्याणां भयात् परिजनस्य च । मर्यादायाममर्यादाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ १६ ॥ स्त्रियोंमें स्वयं मर्यादाका कोई ध्यान नहीं रहता। जब उनको कोई चाहनेवाला पुरुष न मिले और परिजनोंका भय बना रहे तथा पति पास हों, तभी ये नारियाँ मर्यादाके भीतर रह पाती हैं ॥ १६ ॥

नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासां वयसि निश्चयः । विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १७ ॥ इनके लिये कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो अगम्य हो। उनका किसी अवस्था-विशेषपर भी निश्चय नहीं रहता। कोई रूपवान् हो या कुरूप; पुरुष है—इतना ही समझकर स्त्रियाँ उसका उपभोग करती हैं ॥ १७ ॥

न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थहेतोः कथंचन । न ज्ञातिकुलसम्बन्धात् स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ १८ ॥ स्त्रियाँ न तो भयसे, न दयासे, न धनके लोभसे और न जाति या कुलके सम्बन्धसे ही पतियोंके पास टिकती हैं ॥ १८ ॥

यौवने वर्तमानानां मृष्टाभरणवाससाम् । नारीणां स्वैरवृत्तीनां स्पृहयन्ति कुलस्त्रियः ॥ १९ ॥ जो जवान हैं, सुन्दर गहने और अच्छे कपड़े पहनती हैं, ऐसी स्वेच्छाचारिणी स्त्रियोंके चरित्रको देखकर कितनी ही कुलवती स्त्रियाँ भी वैसी ही बननेकी इच्छा करने लगती हैं ॥ १९ ॥

याश्च शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिताः स्त्रियः । अपि ताः सम्प्रसज्जन्ते कुब्जान्धजडवामनैः ॥ २० ॥

जो बहुत सम्मानित और पतिकी प्यारी स्त्रियाँ हैं, जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है वे भी घरमें आने-जानेवाले कुबड़ों, अन्धों, गूँगों और बौनोंके साथ भी फँस जाती हैं ॥ २० ॥
पङ्गुष्वथ च देवर्षे ये चान्ये कुत्सिता नराः ।
स्त्रीणामगम्यो लोकेऽस्मिन् नास्ति कश्चिन्महामुने ॥ २१ ॥
महामुनि देवर्षे! जो पंगु हैं अथवा जो अत्यन्त घृणित मनुष्य हैं, उनमें भी स्त्रियोंकी आसक्ति हो जाती है। इस संसारमें कोई भी पुरुष स्त्रियोंके लिये अगम्य नहीं है ॥ २१ ॥
यदि पुंसां गतिर्ब्रह्मन् कथंचिन्नोपपद्यते ।
अप्यन्योन्यं प्रवर्तन्ते न हि तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! यदि स्त्रियोंको पुरुषकी प्राप्ति किसी प्रकार भी सम्भव न हो और पति भी दूर गये हों तो वे आपसमें ही कृत्रिम उपायोंसे ही मैथुनमें प्रवृत्त हो जाती हैं ॥ २२ ॥
अलाभात् पुरुषाणां हि भयात् परिजनस्य च ।
वधबन्धभयाच्चापि स्वयं गुप्ता भवन्ति ताः ॥ २३ ॥
पुरुषोंके न मिलनेसे, घरके दूसरे लोगोंके भयसे तथा वध और बन्धनके डरसे ही स्त्रियाँ सुरक्षित रहती हैं ॥ २३ ॥
चलस्वभावा दुःसेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्तथा ।
प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रियः ॥ २४ ॥
स्त्रियोंका स्वभाव चंचल होता है। उनका सेवन बहुत ही कठिन काम है। इनका भाव जल्दी किसीके समझमें नहीं आता; ठीक उसी तरह, जैसे विद्वान् पुरुषकी वाणी दुर्बोध होती है ॥ २४ ॥
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ।
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचनाः ॥ २५ ॥
अग्नि कभी ईंधनसे तृप्त नहीं होती, समुद्र कभी नदियोंसे तृप्त नहीं होता, मृत्यु समस्त प्राणियोंको एक साथ पा जाय तो भी उनसे तृप्त नहीं होती; इसी प्रकार सुन्दर नेत्रोंवाली युवतियाँ पुरुषोंसे कभी तृप्त नहीं होतीं ॥ २५ ॥
इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम् ।
दृष्ट्वैव पुरुषं हृद्यं योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियाः ॥ २६ ॥
देवर्षे! सम्पूर्ण रमणियोंके सम्बन्धमें दूसरी भी रहस्यकी बात यह है कि किसी मनोरम पुरुषको देखते ही स्त्रीकी योनि गीली हो जाती है ॥ २६ ॥
कामानांमपि दातारं कर्तारं मनसां प्रियम् ।
रक्षितारं न मृष्यन्ति स्वभर्तारमलं स्त्रियः ॥ २७ ॥
सम्पूर्ण कामनाओंके दाता तथा मनचाही करनेवाला पति भी यदि उनकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला हो तो वे अपने पतिके शासनको भी सहन नहीं कर सकतीं ॥ २७ ॥

न कामभोगान् विपुलान् नालंकारान् न संश्रयान् ।
तथैव बहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम् ॥ २८ ॥
वे न तो काम-भोगकी प्रचुर सामग्रीको, न अच्छे-अच्छे गहनोंको और न उत्तम घरोंको ही उतना अधिक महत्त्व देती हैं, जैसा कि रतिके लिये किये गये अनुग्रहको ॥ २८ ॥

अन्तकः पवनो मृत्युः पातालं वडवामुखम् ।
क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः ॥ २९ ॥
यमराज, वायु, मृत्यु, पाताल, बड़वानल, छुरेकी धार, विष, सर्प और अग्नि—ये सब विनाशके हेतु एक तरफ और स्त्रियाँ अकेली एक तरफ बराबर हैं ॥ २९ ॥

यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च
यतश्च लोका विहिता विधात्रा ।
यतः पुमांसः प्रमदाश्च निर्मिता-
स्तदैव दोषाः प्रमदासु नारद ॥ ३० ॥
नारद! जहाँसे पाँचों महाभूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँसे विधाताने सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की है तथा जहाँसे पुरुषों और स्त्रियोंका निर्माण हुआ है, वहींसे स्त्रियोंमें ये दोष भी रचे गये हैं (अर्थात् ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं) ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चचूडानारदसंवादे अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पंचचूड़ा और नारदका संवादविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

स्त्रियोंकी रक्षाके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न

युधिष्ठिर उवाच

इमे वै मानवा लोके स्त्रीषु सज्जन्त्यभीक्ष्णशः ।
मोहेन परमाविष्टा देवसृष्टेन पार्थिव ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पृथ्वीनाथ! संसारके ये मनुष्य विधाताद्वारा उत्पन्न किये गये महान् मोहेसे आविष्ट हो सदा ही स्त्रियोंमें आसक्त होते हैं ॥ १ ॥

स्त्रियश्च पुरुषेष्वेव प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ।
अत्र मे संशयस्तीव्रो हृदि सम्परिवर्तते ॥ २ ॥
इसी तरह स्त्रियाँ भी पुरुषोंमें ही आसक्त होती हैं। यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है और लोग इसके साक्षी हैं। इस बातको लेकर मेरे मनमें भारी संदेह खड़ा हो गया है ॥ २ ॥

कथमासां नराः सङ्गं कुर्वते कुरुनन्दन ।
स्त्रियो वा केषु रज्यन्ते विरज्यन्ते च ताः पुनः ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! पुरुष क्यों इन स्त्रियोंका संग करते हैं? अथवा स्त्रियाँ भी किस निमित्तसे पुरुषोंमें अनुरक्त एवं विरक्त होती हैं ॥ ३ ॥

इति ताः पुरुषव्याघ्र कथं शक्यास्तु रक्षितुम् ।
प्रमदाः पुरुषेणेह तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४ ॥
पुरुषसिंह! पुरुष यौवनसे उन्मत्त स्त्रियोंकी रक्षा कैसे कर सकता है? यह विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥

एता हि रममाणास्तु वञ्चयन्तीह मानवान् ।
न चासां मुच्यते कश्चित् पुरुषो हस्तमागतः ॥ ५ ॥
ये रमण करती हुई भी यहाँ पुरुषोंको ठगती रहती हैं। इनके हाथमें आया हुआ कोई भी पुरुष इनसे बचकर नहीं जा सकता ॥ ५ ॥

गावो नवतृणानीव गृह्णन्त्येता नवं नवम् ।
शम्बरस्य च या माया माया या नमुचेरपि ॥ ६ ॥
बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ।
जैसे गौएँ नयी-नयी घास चरती हैं, उसी प्रकार ये नारियाँ नये-नये पुरुषको अपनाती रहती हैं। शम्बरासुरकी जो माया है तथा नमुचि, बलि और कुम्भीनसीकी जो मायाएँ हैं, उन सबको ये युवतियाँ जानती हैं ॥ ६ ½ ॥

हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्ति च ॥ ७ ॥
अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णते कालयोगतः ।

पुरुषको हँसते देख ये स्त्रियाँ जोर-जोरसे हँसती हैं। उसे रोते देख स्वयं भी फूट-फूटकर रोने लगती हैं और अवसर आनेपर अप्रिय पुरुषको प्रिय वचनोंद्वारा अपना लेती हैं ।। ७ १/२ ।।
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ।। ८ ।।
स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तास्तु रक्ष्याः कथं नरैः ।
जिस नीतिशास्त्रको शुक्राचार्य जानते हैं, जिसे बृहस्पति जानते हैं, वह भी स्त्रीकी बुद्धिसे बढ़कर नहीं है। ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष कैसे कर सकते हैं ।। ८ १/२ ।।
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् ।। ९ ।।
इति यास्ताः कथं वीर संरक्ष्याः पुरुषैरिह ।
वीर! जिनके झूठको भी सच और सचको भी झूठ बताया गया है, ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष यहाँ कैसे कर सकते हैं? ।। ९ १/२ ।।
स्त्रीणां बुद्धयर्थनिष्कर्षार्दथशास्त्राणि शत्रुहन् ।। १० ।।
बृहस्पतिप्रभृतिभिर्मन्ये सद्भिः कृतानि वै ।
शत्रुघाती नरेश! मुझे तो ऐसा लगता है कि स्त्रियोंकी बुद्धिमें जो अर्थ भरा है, उसीका निष्कर्ष (सारांश) लेकर बृहस्पति आदि सत्पुरुषोंने नीतिशास्त्रोंकी रचना की है ।। १० १/२ ।।
सम्पूज्यमानाः पुरुषैर्विकुर्वन्ति मनो नृषु ।। ११ ।।
अपास्ताश्च तथा राजन् विकुर्वन्ति मनः स्त्रियः ।
नरेश्वर! पुरुषोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी ये रमणियाँ उनका मन विकृत कर देती हैं और उनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देती हैं ।। ११ १/२ ।।
इमाः प्रजा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् ।। १२ ।।
सत्कृतासत्कृताश्चापि विकुर्वन्ति मनः सदा ।
कस्ताः शक्तो रक्षितुं स्यादिति मे संशयो महान् ।। १३ ।।
महाबाहो! हमने सुन रखा है कि ये स्त्रीरूपिणी प्रजाएँ बड़ी धार्मिक होती हैं (जैसा कि सावित्री आदिके जीवनसे प्रत्यक्ष हो चुका है); फिर भी ये स्त्रियाँ सम्मानित हों या असम्मानित, सदा ही पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न करती रहती हैं। उनकी रक्षा कौन कर सकता है? यही मेरे मनमें महान् संशय है ।। १२-१३ ।।
तथा ब्रूहि महाभाग कुरूणां वंशवर्धन ।
यदि शक्या कुरुश्रेष्ठ रक्षा तासां कदाचन ।।
कर्तुं वा कृतपूर्वं वा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।। १४ ।।
महाभाग! कुरुकुलवर्धन! कुरुश्रेष्ठ! यदि किसी प्रकार कभी भी उनकी रक्षा की जा सके तो वह बताइये। यदि किसीने पहले कभी किसी स्त्रीकी रक्षा की हो तो वह कथा भी मुझे विस्तारके साथ बताइये ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्त्रीस्वभावकथने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्त्रियोंके स्वभावका वर्णनविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥