महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तस्मात् पानीयदानाद् वै न परं विद्यते क्वचित् । मनीषी पुरुषोंने अन्नको ही मनुष्योंका प्राण बताया है। पुरुषसिंह! सब प्रकारका अन्न (खाद्य पदार्थ) जलसे ही उत्पन्न होता है; अतः जलदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान कहीं नहीं है॥ १५ १/२॥ तच्च दद्यान्नरो नित्यं यदिच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १६ ॥ धन्यं यशस्यमायुष्यं जलदानमिहोच्यते । शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय सदा तिष्ठति तोयदः ॥ १७ ॥ जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे प्रतिदिन जलदान करना चाहिये। जलदान इस जगत्में धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला बताया जाता है। कुन्तीनन्दन! जलदान करनेवाला पुरुष सदा अपने शत्रुओंसे भी ऊपर रहता है॥ १६-१७॥ सर्वकामानवाप्नोति कीर्तिं चैव हि शाश्वतीम् । प्रेत्य चानन्त्यमश्नाति पापेभ्यश्च प्रमुच्यते ॥ १८ ॥ वह इस जगत्में सम्पूर्ण कामनाओं तथा अक्षय कीर्तिको प्राप्त करता है और सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। मृत्युके पश्चात् वह अक्षय सुखका भागी होता है॥ तोयदो मनुजव्याघ्र स्वर्गं गत्वा महाद्युते । अक्षयान् समवाप्नोति लोकानित्यब्रवीन्मनुः ॥ १९ ॥ महातेजस्वी पुरुषसिंह! जलदान करनेवाला पुरुष स्वर्गमें जाकर वहाँके अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है—ऐसा मनुने कहा है॥ १९॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पानीयदानमाहात्म्ये सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें जलदानका माहात्म्यविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥
तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
तिलानां कीदृशं दानमथ दीपस्य चैव हि ।
अन्नानां वाससां चैव भूय एव ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! तिलोंके दानका कैसा फल होता है? दीप, अन्न और वस्त्रके दानकी महिमाका भी पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ब्राह्मणस्य च संवादं यमस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें ब्राह्मण और यमके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
मध्यदेशे महान् ग्रामो ब्राह्मणानां बभूव ह ।
गंगायामुनयोर्मध्ये यामुनस्य गिरेरधः ॥ ३ ॥
पर्णशालेति विख्यातो रमणीयो नराधिप ।
विद्वांसस्तत्र भूयिष्ठा ब्राह्मणाश्चावसंस्तथा ॥ ४ ॥
नरेश्वर! मध्यदेशमें गंगा-यमुनाके मध्यभागमें यामुन पर्वतके निम्न स्थलमें ब्राह्मणोंका एक विशाल एवं रमणीय ग्राम था जो लोगोंमें पर्णशालानामसे विख्यात था। वहाँ बहुत-से विद्वान् ब्राह्मण निवास करते थे ॥ ३-४ ॥
अथ प्राह यमः कंचित् पुरुषं कृष्णवाससम् ।
रक्ताक्षमूर्ध्वरोमाणं काकजंघाक्षिनासिकम् ॥ ५ ॥
एक दिन यमराजने काला वस्त्र धारण करनेवाले अपने एक दूतसे, जिसकी आँखें लाल, रोएँ ऊपरको उठे हुए और पैरोंकी पिण्डली, आँख एवं नाक कौएके समान थीं, कहा— ॥ ५ ॥
गच्छ त्वं ब्राह्मणग्रामं ततो गत्वा तमानय ।
अगस्त्यं गोत्रतश्चापि नामतश्चापि शर्मिणम् ॥ ६ ॥
शमे निविष्टं विद्वांसमध्यापकमनावृतम् ।
‘तुम ब्राह्मणोंके उस ग्राममें चले जाओ और जाकर अगस्त्यगोत्री शर्मी नामक शमपरायण विद्वान् अध्यापक ब्राह्मणको, जो आवरणरहित है, यहाँ ले आओ ॥ ६ १/२ ॥
मा चान्यमानयेथास्त्वं सगोत्रं तस्य पार्श्वतः ॥ ७ ॥
स हि तादृग्गुणस्तेन तुल्योऽध्ययनजन्मना ।
अपत्येषु तथा वृत्ते समस्तेनैव धीमता ॥ ८ ॥
‘उसी गाँवमें उसीके समान एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता है। वह शर्मीके ही गोत्रका है। उसके अगल-बगलमें ही निवास करता है। गुण, वेदाध्ययन और कुलमें भी वह शर्मीके ही समान है। सन्तानोंकी संख्या तथा सदाचारके पालनमें भी वह बुद्धिमान् शर्मीके ही तुल्य है। तुम उसे यहाँ न ले आना ॥ ७-८ ॥
तमानय यथोद्दिष्टं पूजा कार्या हि तस्य वै ।
स गत्वा प्रतिकूलं तच्चकार यमशासनम् ॥ ९ ॥
‘मैंने जिसे बताया है, उसी ब्राह्मणको तुम यहाँ ले आओ; क्योंकि मुझे उसकी पूजा करनी है।’ उस यमदूतने वहाँ जाकर यमराजकी आज्ञाके विपरीत कार्य किया ॥ ९ ॥
तमाक्रम्यानयामास प्रतिषिद्धो यमेन यः ।
तस्मै यमः समुत्थाय पूजां कृत्वा च वीर्यवान् ॥ १० ॥
प्रोवाच नीयतामेष सोऽन्य आनीयतामिति ।
वह आक्रमण करके उसी ब्राह्मणको उठा लाया, जिसके लिये यमराजने मना कर दिया था। शक्तिशाली यमराजने उठकर उसके लाये हुए ब्राह्मणकी पूजा की और दूतसे कहा—‘इसको तुम ले जाओ और दूसरेको यहाँ ले आओ’ ॥ १०½ ॥
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन स द्विजः ॥ ११ ॥
उवाच धर्मराजानं निर्विण्णोऽध्ययनेन वै ।
यो मे कालो भवेच्छेषस्तं वसेयमिहाच्युत ॥ १२ ॥
धर्मराजके इस प्रकार आदेश देनेपर अध्ययनसे ऊबे हुए उस समागत ब्राह्मणने उनसे कहा—‘धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले देव! मेरे जीवनका जो समय शेष रह गया है, उसमें मैं यहीं रहूँगा’ ॥ ११-१२ ॥
यम उवाच
नाहं कालस्य विहितं प्राप्नोमीह कथंचन ।
यो हि धर्मं चरति वै तं तु जानामि केवलम् ॥ १३ ॥
**यमराजने कहा—**ब्रह्मन्! मैं कालके विधानको किसी तरह नहीं जानता। जगत्में जो पुरुष धर्माचरण करता है, केवल उसीको मैं जानता हूँ ॥ १३ ॥
गच्छ विप्र त्वमद्यैव आलयं स्वं महाद्युते ।
ब्रूहि सर्वं यथा स्वैरं करवाणि किमच्युत ॥ १४ ॥
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महातेजस्वी ब्राह्मण! तुम अभी अपने घरको चले जाओ और अपनी इच्छाके अनुसार सब कुछ बताओ। मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? ॥ १४ ॥
ब्राह्मण उवाच
यत् तत्र कृत्वा सुमहत् पुण्यं स्यात् तद् ब्रवीहि मे।
सर्वस्य हि प्रमाणं त्वं त्रैलोक्यस्यापि सत्तम॥ १५॥
ब्राह्मणने कहा— साधुशिरोमणे! संसारमें जो कर्म करनेसे महान् पुण्य होता हो वह मुझे बताइये; क्योंकि समस्त त्रिलोकीके लिये धर्मके विषयमें आप ही प्रमाण हैं॥ १५॥
यम उवाच
शृणु तत्त्वेन विप्रर्षे प्रदानविधिमुत्तमम्।
तिलाः परमकं दानं पुण्यं चैवेह शाश्वतम्॥ १६॥
यमने कहा— ब्रह्मर्षे! तुम यथार्थरूपसे दानकी उत्तम विधि सुनो। तिलका दान सब दानोंमें उत्तम है। वह यहाँ अक्षय पुण्यजनक माना गया है॥ १६॥
तिलाश्च सम्प्रदातव्या यथाशक्ति द्विजर्षभ।
नित्यदानात् सर्वकामांस्तिला निर्वर्तयन्त्युत॥ १७॥
द्विजश्रेष्ठ! अपनी शक्तिके अनुसार तिलोंका दान अवश्य करना चाहिये। नित्यदान करनेसे तिल दाताकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं॥ १७॥
तिलान् श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतद्ध्यनुत्तमम्।
तान् प्रयच्छस्व विप्रेभ्यो विधिदृष्टेन कर्मणा॥ १८॥
श्राद्धमें विद्वान् पुरुष तिलोंकी प्रशंसा करते हैं। यह तिलदान सबसे उत्तम दान है। अतः तुम शास्त्रीय विधिके अनुसार ब्राह्मणोंको तिलदान देते रहो॥ १८॥
वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु तिलान् दद्याद् द्विजातिषु।
तिला भक्षयितव्याश्च सदा त्वालम्भनं च तैः॥ १९॥
वैशाखकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंके लिये तिलदान दे, तिल खाये और सदा तिलोंका ही उबटन लगाये॥ १९॥
कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेयः सर्वात्मना गृहे।
तथाऽऽपः सर्वदा देयाः पेयाश्चैव न संशयः॥ २०॥
जो सदा कल्याणकी इच्छा रखते हैं, उन्हें सब प्रकारसे अपने घरमें तिलोंका दान और उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार सर्वदा जलका दान और पान करना चाहिये—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥
पुष्करिण्यस्तडागानि कूंपांश्चैवात्र खानयेत्।
एतत् सुदुर्लभतरमिहलोके द्विजोत्तम॥ २१॥
द्विजश्रेष्ठ! मनुष्यको यहाँ पोखरी, तालाब और कुएँ खुदवाने चाहिये। यह इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ—पुण्य कार्य है॥ २१॥
आपो नित्यं प्रदेयास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम्।
प्रपाश्च कार्या दानार्थं नित्यं ते द्विजसत्तम ।
भुक्तेऽप्यन्नं प्रदेयं तु पानीयं वै विशेषतः ॥ २२ ॥
विप्रवर! तुम्हें प्रतिदिन जलका दान करना चाहिये। जल देनेके लिये प्याऊ लगाने चाहिये। यह सर्वोत्तम पुण्य कार्य है। (भूखेको अन्न देना तो आवश्यक है ही,) जो भोजन कर चुका हो उसे भी अन्न देना चाहिये। विशेषतः जलका दान तो सभीके लिये आवश्यक है ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्ते स तदा तेन यमदूतेन वै गृहान् ।
नीतश्च कारयामास सर्वं तद् यमशासनम् ॥ २३ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! यमराजके ऐसा कहनेपर उस समय ब्राह्मण जानेको उद्यत हुआ। यमदूतने उसे उसके घर पहुँचा दिया और उसने यमराजकी आज्ञाके अनुसार वह सब पुण्य कार्य किया और कराया ॥ २३ ॥
नीत्वा तं यमदूतोऽपि गृहीत्वा शर्मिणं तदा ।
ययौ स धर्मराजाय न्यवेदयत चापि तम् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् यमदूत शर्मीको पकड़कर वहाँ ले गया और धर्मराजको इसकी सूचना दी ॥ २४ ॥
तं धर्मराजो धर्मज्ञं पूजयित्वा प्रतापवान् ।
कृत्वा च संविदं तेन विससर्ज यथागतम् ॥ २५ ॥
प्रतापी धर्मराजने उस धर्मज्ञ ब्राह्मणकी पूजा करके उससे बातचीत की और फिर वह जैसे आया था, उसी प्रकार उसे विदा कर दिया ॥ २५ ॥
तस्यापि च यमः सर्वमुपदेशं चकार ह ।
प्रेत्यैत्य च ततः सर्वं चकारोक्तं यमेन तत् ॥ २६ ॥
उसके लिये भी यमराजने सारा उपदेश किया। परलोकमें जाकर जब वह लौटा, तब उसने भी यमराजके बताये अनुसार सब कार्य किया ॥ २६ ॥
तथा प्रशंसते दीपान् यमः पितृहितेप्सया ।
तस्माद् दीपप्रदो नित्यं संतारयति वै पितॄन् ॥ २७ ॥
पितरोंके हितकी इच्छासे यमराज दीपदानकी प्रशंसा करते हैं; अतः प्रतिदिन दीपदान करनेवाला मनुष्य पितरोंका उद्धार कर देता है ॥ २७ ॥
दातव्याः सततं दीपास्तस्माद् भरतसत्तम ।
देवतानां पितॄणां च चक्षुष्यं चात्मनां विभो ॥ २८ ॥
इसलिये भरतश्रेष्ठ! देवता और पितरोंके उद्देश्यसे सदा दीपदान करते रहना चाहिये। प्रभो! इससे अपने नेत्रोंका तेज बढ़ता है ॥ २८ ॥
रत्नदानं च सुमहत् पुण्यमुक्तं जनाधिप । यस्तान् विक्रीय यजते ब्राह्मणो ह्यभयंकरम् ॥ २९ ॥ जनेश्वर! रत्नदानका भी बहुत बड़ा पुण्य बताया गया है। जो ब्राह्मण दानमें मिले हुए रत्नको बेचकर उसके द्वारा यज्ञ करता है, उसके लिये वह प्रतिग्रह भयदायक नहीं होता ॥ २९ ॥
यद् वै ददाति विप्रेभ्यो ब्राह्मणः प्रतिगृह्य वै । उभयोः स्यात् तदक्षय्यं दातुरादातुरेव च ॥ ३० ॥ जो ब्राह्मण किसी दातासे रत्नोंका दान लेकर स्वयं भी उसे ब्राह्मणोंको बाँट देता है तो उस दानके देने और लेनेवाले दोनोंको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
यो ददाति स्थितः स्थित्यां तादृशाय प्रतिग्रहम् । उभयोरक्षयं धर्मं तं मनुः प्राह धर्मवित् ॥ ३१ ॥ जो पुरुष स्वयं धर्ममर्यादामें स्थित होकर अपने ही समान स्थितिवाले ब्राह्मणको दानमें मिली हुई वस्तुका दान करता है, उन दोनोंको अक्षय धर्मकी प्राप्ति होती है। यह धर्मज्ञ मनुका वचन है ॥ ३१ ॥
वाससां सम्प्रदानेन स्वदारनिरतो नरः । सुवस्त्रश्च सुवेषश्च भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता हुआ वस्त्र दान करता है, वह सुन्दर वस्त्र और मनोहर वेष-भूषासे सम्पन्न होता है—ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ३२ ॥
गावः सुवर्णं च तथा तिलाश्चैवानुवर्णिताः । बहुशः पुरुषव्याघ्र वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥ पुरुषसिंह! मैंने गौ, सुवर्ण और तिलके दानका माहात्म्य अनेकों बार वेद-शास्त्रके प्रमाण दिखाकर वर्णन किया है ॥ ३३ ॥
विवाहांश्चैव कुर्वीत पुत्रानुत्पादयेत च । पुत्रलाभो हि कौरव्य सर्वलाभाद् विशिष्यते ॥ ३४ ॥ कुरुनन्दन! मनुष्य विवाह करे और पुत्र उत्पन्न करे। पुत्रका लाभ सब लाभोंसे बढ़कर है ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमब्राह्मणसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यम और ब्राह्मणका संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
युधिष्ठिरने कहा— महाप्राज्ञ कुरुश्रेष्ठ! आप दानकी उत्तम विधिका फिरसे वर्णन कीजिये। विशेषतः भूमिदानका महत्त्व बताइये ॥ १ ॥
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
गोदानकी महिमा तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षासे पुण्यकी प्राप्ति
युधिष्ठिर उवाच
भूय एव कुरुश्रेष्ठ दानानां विधिमुत्तमम् ।
कथयस्व महाप्राज्ञ भूमिदानं विशेषतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— महाप्राज्ञ कुरुश्रेष्ठ! आप दानकी उत्तम विधिका फिरसे वर्णन कीजिये। विशेषतः भूमिदानका महत्त्व बताइये ॥ १ ॥
पृथिवीं क्षत्रियो दद्याद् ब्राह्मणायेष्टिकर्मिणे ।
विधिवत् प्रतिगृह्णीयान्न त्वन्यो दातुमर्हति ॥ २ ॥
केवल क्षत्रिय राजा ही यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणको पृथ्वीका दान कर सकता है और उसीसे ब्राह्मण विधि-पूर्वक भूमिका प्रतिग्रह ले सकता है। दूसरा कोई यह दान नहीं कर सकता ॥ २ ॥
सर्ववर्णैस्तु यच्छक्यं प्रदातुं फलकाङ्क्षिभिः ।
वेदे वा यत् समाख्यातं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
दानके फलकी इच्छा रखनेवाले सभी वर्णोंके लोग जो दान कर सकें अथवा वेदमें जिस दानका वर्णन हो, उसकी मेरे समक्ष व्याख्या कीजिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
तुल्यनामानि देयानि त्रीणि तुल्यफलानि च ।
सर्वकामफलानीह गावः पृथ्वी सरस्वती ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! गाय, भूमि और सरस्वती—ये तीनों समान नामवाली हैं—इन तीनों वस्तुओंका दान करना चाहिये। इन तीनोंके दानका फल भी समान ही है। ये तीनों वस्तुएँ मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली हैं ॥ ४ ॥
यो ब्रूयाच्चापि शिष्याय धर्म्यां ब्राह्मीं सरस्वतीम् ।
पृथिवीगोप्रदानाभ्यां तुल्यं स फलमश्नुते ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण अपने शिष्यको धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी) का उपदेश करता है, वह भूमिदान और गोदानके समान फलका भागी होता है ॥ ५ ॥
तथैव गाः प्रशंसन्ति न तु देयं ततः परम् ।
संनिकृष्टफलास्ता हि लघ्वर्थाश्च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है। उससे बढ़कर कोई दान नहीं है। युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करती हैं।। ६ ।। मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः । वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः ।। ७ ।। गौएँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता कहलाती हैं। वे सबको सुख देनेवाली हैं। जो अपने अभ्युदयकी इच्छा रखता हो, उसे गौओंको सदा दाहिने करके चलना चाहिये ।। ७ ।। संताड्या न तु पादेन गवां मध्ये न च व्रजेत् । मंगलायतनं देव्यस्तस्मात् पूज्याः सदैव हि ।। ८ ।। गौओंको लात न मारे। उनके बीचसे होकर न निकले। वे मंगलकी आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ।। ८ ।। प्रचोदनं देवकृतं गवां कर्मसु वर्तताम् । पूर्वमेवाक्षरं चान्यदभिधेयं ततः परम् ।। ९ ।। देवताओंने भी यज्ञके लिये भूमि जोतते समय बैलोंको डंडे आदिसे हाँका था। अतः पहले यज्ञके लिये ही बैलोंको जोतना या हाँकना श्रेयस्कर माना गया है। उससे भिन्न कर्मके लिये बैलोंको जोतना या डंडे आदिसे हाँकना निन्दनीय है ।। ९ ।। प्रचारे वा निवाते वा बुधो नोद्वेजयेत गाः । तृषिता ह्यभिवीक्षन्त्यो नरं हन्युः सबान्धवम् ।। १० ।। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जब गौएँ स्वच्छन्दता-पूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रवशून्य स्थानमें बैठी हों तो उन्हें उद्वेगमें न डाले। जब गौएँ प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने स्वामीकी ओर देखती हैं (और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है), तब वे रोषपूर्ण दृष्टिसे बन्धु-बान्धवोंसहित उसका नाश कर देती हैं ।। १० ।। पितृसद्मानि सततं देवतायतनानि च । पूयन्ते शकृता यासां पूतं किमधिकं ततः ।। ११ ।। जिनके गोबरसे लीपनेपर देवताओंके मन्दिर और पितरोंके श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं, उनसे बढ़कर पावन और क्या हो सकता है? ।। ११ ।। ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः । अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ।। १२ ।। जो एक वर्षतक प्रतिदिन स्वयं भोजनके पहले दूसरेकी गायको एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका वह व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है ।। १२ ।। स हि पुत्रान् यशोऽर्थं च श्रियं चाप्यधिगच्छति । नाशयत्यशुभं चैव दुःस्वप्नं चाप्यपोहति ।। १३ ।।
वह अपने लिये पुत्र, यश, धन और सम्पत्ति प्राप्त करता है तथा अशुभ कर्म और दुःस्वप्नका नाश कर देता है ।। १३ ।।
युधिष्ठिर उवाच
देयाः किंलक्षणा गावः काश्चापि परिवर्जयेत् ।
कीदृशाय प्रदातव्या न देयाः कीदृशाय च ।। १४ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! किन लक्षणोंवाली गौओंका दान करना चाहिये और किनका दान नहीं करना चाहिये? कैसे ब्राह्मणको गाय देनी चाहिये और कैसे ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये? ।। १४ ।।
भीष्म उवाच
असदवृत्ताय पापाय लुब्धायानृतवादिने ।
हव्यकव्यव्यपेताय न देया गौः कथंचन ।। १५ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दुराचारी, पापी, लोभी, असत्यवादी तथा देवयज्ञ और श्राद्धकर्म न करनेवाले ब्राह्मणको किसी तरह गौ नहीं देनी चाहिये ।। १५ ।।
भिक्षवे बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये ।
दत्त्वा दशगवां दाता लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ।। १६ ।।
जिसके बहुत-से पुत्र हों, जो श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) और अग्निहोत्री ब्राह्मण हो और गौके लिये याचना कर रहा हो, ऐसे पुरुषको दस गौओंका दान करनेवाला दाता उत्तम लोकोंको पाता है ।। १६ ।।
यश्चैव धर्मं कुरुते तस्य धर्मफलं च यत् ।
सर्वस्यैवांशभाग् दाता तं निमित्तं प्रवृत्तयः ।। १७ ।।
जो गोदान ग्रहण करके धर्माचरण करता है, उसके धर्मका जो कुछ भी फल होता है, उस सम्पूर्ण धर्मके एक अंशका भागी दाता भी होता है, क्योंकि उसीके लिये उसकी गोदानमें प्रवृत्ति हुई थी ।। १७ ।।
यश्चैनमुत्पादयते यश्चैनं त्रायते भयात् ।
यश्चास्य कुरुते वृत्तिं सर्वे ते पितरस्त्रयः ।। १८ ।।
जो जन्म देता है, जो भयसे बचाता है तथा जो जीविका देता है—ये तीनों ही पिताके तुल्य हैं ।। १८ ।।
कल्मषं गुरुशुश्रूषा हन्ति मानो महद् यशः ।
अपुत्रतां त्रयः पुत्रा अवृत्तिं दश धेनवः ।। १९ ।।
गुरुजनोंकी सेवा सारे पापोंका नाश कर देती है। अभिमान महान् यशको नष्ट कर देता है। तीन पुत्र पुत्रहीनताके दोषका निवारण कर देते हैं और दूध देनेवाली दस गौएँ हों तो ये जीविकाके अभावको दूर कर देती हैं ।। १९ ।।
वेदान्तनिष्ठस्य बहुश्रुतस्य प्रज्ञानतृप्तस्य जितेन्द्रियस्य । शिष्टस्य दान्तस्य यतस्य चैव भूतेषु नित्यं प्रियवादिनश्च ॥ २० ॥ यः क्षुद्भयाद् वै न विकर्म कुर्या- न्मृदुश्च शान्तो ह्यतिथिप्रियश्च । वृत्तिं द्विजायातिसृजेत तस्मै यस्तुल्यशीलश्च सपुत्रदारः ॥ २१ ॥ जो वेदान्तनिष्ठ, बहुज्ञ, ज्ञानानन्दसे तृप्त, जितेन्द्रिय, शिष्ट, मनको वशमें रखनेवाला, यत्नशील, समस्त प्राणियोंके प्रति सदा प्रिय वचन बोलनेवाला, भूखके भयसे भी अनुचित कर्म न करनेवाला, मृदुल, शान्त, अतिथिप्रेमी, सबपर समानभाव रखनेवाला और स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्बसे युक्त हो, उस ब्राह्मणकी जीविकाका अवश्य प्रबन्ध करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥
शुभे पात्रे ये गुणा गोप्रदाने तावान् दोषो ब्राह्मणस्वापहारे । सर्वावस्थं ब्राह्मणस्वापहारो दाराश्चैषां दूरतो वर्जनीयाः ॥ २२ ॥ शुभ पात्रको गोदान करनेसे जो लाभ होते हैं, उसका धन ले लेनेपर उतना ही पाप लगता है; अतः किसी भी अवस्थामें ब्राह्मणोंके धनका अपहरण न करे तथा उनकी स्त्रियोंका संसर्ग दूरसे ही त्याग दे ॥ २२ ॥
(विप्रदारे परहृते विप्रस्वनिचये तथा । परित्रायन्ति शक्तास्तु नमस्तेभ्यो मृतास्तु वा ॥ न पालयन्ति चेत् तस्य हन्ता वैवस्वतो यमः । दण्डयन् भर्त्सयन् नित्यं निरयेभ्यो न मुञ्चति ॥ तथा गवां परित्राणे पीडने च शुभाशुभम् । विप्रगोषु विशेषेण रक्षितेषु हतेषु वा ॥) जहाँ ब्राह्मणोंकी स्त्रियों अथवा उनके धनका अपहरण होता हो, वहाँ शक्ति रहते हुए जो उन सबकी रक्षा करते हैं, उन्हें नमस्कार है। जो उनकी रक्षा नहीं करते हैं, वे मुर्दोंके समान हैं। सूर्यपुत्र यमराज ऐसे लोगोंका वध कर डालते हैं, प्रतिदिन उन्हें यातना देते और डाँटते-फटकारते हैं और नरकसे उन्हें कभी छुटकारा नहीं देते हैं। इसी प्रकार गौओंके संरक्षण और पीड़नसे भी शुभ और अशुभकी प्राप्ति होती है। विशेषतः ब्राह्मणों और गौओंके अपने द्वारा सुरक्षित होनेपर पुण्य और मारे जानेपर पाप होता है ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानमाहात्म्ये
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानका माहात्म्यविषयक
उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे होनेवाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान
सप्ततितमोऽध्यायः
ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे होनेवाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान
भीष्म उवाच
अत्रैव कीर्त्यते सद्भिर्ब्राह्मणस्वाभिमर्शने ।
नृगेण सुमहत् कृच्छ्रं यदवाप्तं कुरुद्वह ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**कुरुश्रेष्ठ! इस विषयमें श्रेष्ठ पुरुष वह प्रसंग सुनाया करते हैं, जिसके अनुसार एक ब्राह्मणके धनको ले लेनेके कारण राजा नृगको महान् कष्ट उठाना पड़ा था ॥ १ ॥
निविशन्त्यां पुरा पार्थ द्वारवत्यामिति श्रुतिः ।
अदृश्यत महाकूपस्तृणवीरुत्समावृतः ॥ २ ॥
पार्थ! हमारे सुननेमें आया है कि पूर्वकालमें जब द्वारकापुरी बस रही थी, उसी समय वहाँ घास और लताओंसे ढँका हुआ एक विशाल कूप दिखायी दिया ॥ २ ॥
प्रयत्नं तत्र कुर्वाणास्तस्मात् कूपाज्जलार्थिनः ।
श्रमेण महता युक्तास्तस्मिंस्तोये सुसंवृते ॥ ३ ॥
ददृशुस्ते महाकायं कृकलासमवस्थितम् ।
वहाँ रहनेवाले यदुवंशी बालक उस कुएँका जल पीनेकी इच्छासे बड़े परिश्रमके साथ उस घास-फूसको हटानेके लिये महान् प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें उस कुएँके ढँके हुए जलमें स्थित हुए एक विशालकाय गिरगिटपर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३ ½ ॥
तस्य चोद्धरणे यत्नमकुर्वंस्ते सहस्रशः ॥ ४ ॥
प्रग्रहैश्चर्मपट्टैश्च तं बद्ध्वा पर्वतोपमम् ।
नाशक्नुवन् समुद्धर्तुं ततो जग्मुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥
फिर तो वे सहस्रों बालक उस गिरगिटको निकालनेका यत्न करने लगे। गिरगिटका शरीर एक पर्वतके समान था। बालकोंने उसे रस्सियों और चमड़ेकी पट्टियोंसे बाँधकर खींचनेके लिये बहुत जोर लगाया परंतु वह टस-से-मस न हुआ। जब बालक उसे निकालनेमें सफल न हो सके, तब वे भगवान् श्रीकृष्णके पास गये ॥ ४-५ ॥
खमावृत्योदपानस्य कृकलासः स्थितो महान् ।
तस्य नास्ति समुद्धर्तेत्येतत् कृष्णे न्यवेदयन् ॥ ६ ॥
उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे निवेदन किया—‘भगवन्! एक बहुत बड़ा गिरगिट कुएँमें पड़ा है, जो उस कुएँके सारे आकाशको घेरकर बैठा है; पर उसे निकालनेवाला कोई नहीं
है' ।। ६ ।।
स वासुदेवेन समुद्धृतश्च
पृष्टश्च कार्यं निजगाद राजा ।
नृगस्तदाऽऽत्मानमथो न्यवेदयत्
पुरातनं यज्ञसहस्रयाजिनम् ॥ ७ ॥
यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण उस कुएँके पास गये। उन्होंने उस गिरगिटको कुएँसे बाहर निकाला और अपने पावन हाथके स्पर्शसे राजा नृगका उद्धार कर दिया। इसके बाद उनसे परिचय पूछा। तब राजाने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा—‘प्रभो! पूर्वजन्ममें मैं राजा नृग था, जिसने एक सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था’ ।।
तथा ब्रुवाणं तु तमाह माधवः
शुभं त्वया कर्म कृतं न पापकम् ।
कथं भवान् दुर्गतिमीदृशीं गतो
नरेन्द्र तद् ब्रूहि किमेतदीदृशम् ॥ ८ ॥
उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने पूछा—‘राजन्! आपने तो सदा पुण्यकर्म ही किया था, पापकर्म कभी नहीं किया, फिर आप ऐसी दुर्गतिमें कैसे पड़ गये? बताइये, क्यों आपको यह ऐसा कष्ट प्राप्त हुआ? ।। ८ ।।
शतं सहस्राणि गवां शतं पुनः
पुनः शतान्यष्टशतायुतानि ।
त्वया पुरा दत्तमितीह शुश्रुम
नृप द्विजेभ्यः क्व नु तद् गतं तव ॥ ९ ॥
‘नरेश्वर! हमने सुना है कि पूर्वकालमें आपने ब्राह्मणोंको पहले एक लाख गौएँ दान कीं। दूसरी बार सौ गौओंका दान किया। तीसरी बार पुनः सौ गौएँ दानमें दीं। फिर चौथी बार आपने गोदानका ऐसा सिलसिला चलाया कि लगातार अस्सी लाख गौओंका दान कर दिया। (इस प्रकार आपके द्वारा इक्यासी लाख दो सौ गौएँ दानमें दी गयीं।) आपके उन सब दानोंका पुण्यफल कहाँ चला गया?’ ।। ९ ।।
नृगस्ततोऽब्रवीत् कृष्णं ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ।
प्रोषितस्य परिभ्रष्टा गौरेका मम गोधने ॥ १० ॥
तब राजा नृगने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘प्रभो! एक अग्निहोत्री ब्राह्मण परदेश चला गया था। उसके पास एक गाय थी, जो एक दिन अपने स्थानसे भागकर मेरी गौओंके झुंडमें आ मिली ।। १० ।।
गवां सहस्रे संख्याता तदा सा पशुपैर्मम ।
सा ब्राह्मणाय मे दत्ता प्रेत्यार्थमभिकाङ्क्षता ॥ ११ ॥
‘उस समय मेरे ग्वालोंने दानके लिये मँगायी गयी एक हजार गौओंमें उसकी भी गिनती करा दी और मैंने परलोकमें मनोवांछित फलकी इच्छासे वह गौ भी एक ब्राह्मणको दे दी ॥ ११ ॥
अपश्यत् परिमार्गंश्च तां गां परगृहे द्विजः । ममेयमिति चोवाच ब्राह्मणो यस्य साभवत् ॥ १२ ॥
‘कुछ दिनों बाद जब वह ब्राह्मण परदेशसे लौटा, तब अपनी गाय ढूँढ़ने लगा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब वह गाय उसे दूसरेके घर मिली, तब उस ब्राह्मणने, जिसकी वह गौ पहले थी, उस दूसरे ब्राह्मणसे कहा—‘यह गाय तो मेरी है’ ॥ १२ ॥
तावुभौ समनुप्राप्तौ विवदन्तौ भृशज्वरौ । भवान् दाता भवान् हर्तेत्यथ तौ मामवोचताम् ॥ १३ ॥
‘फिर तो वे दोनों आपसमें लड़ पड़े और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मेरे पास आये। उनमेंसे एकने कहा—‘‘महाराज! यह गौ आपने मुझे दानमें दी है (और यह ब्राह्मण इसे अपनी बता रहा है)।” दूसरेने कहा—‘‘महाराज! वास्तवमें यह मेरी गाय है। आपने उसे चुरा लिया है” ॥ १३ ॥
शतेन शतसंख्येन गवां विनिमयेन वै ।
याचे प्रतिग्रहीतारं स तु मामब्रवीदिदम् ॥ १४ ॥
देशकालोपसम्पन्ना दोग्ध्री शान्तातिवत्सला ।
स्वादुक्षीरप्रदा धन्या मम नित्यं निवेशने ॥ १५ ॥
‘तब मैंने दान लेनेवाले ब्राह्मणसे प्रार्थनापूर्वक कहा—‘मैं इस गायके बदले आपको दस हजार गौएँ देता हूँ (आप इन्हें इनकी गाय वापस दे दीजिये)। यह सुनकर वह यों बोला—‘महाराज! यह गौ देश-कालके अनुरूप, पूरा दूध देनेवाली, सीधी-सादी और अत्यन्त दयालुस्वभावकी है। यह बहुत मीठा दूध देनेवाली है। धन्य भाग्य जो यह मेरे घर आयी। यह सदा मेरे ही यहाँ रहे ॥ १४-१५ ॥
कृतं च भरते सा गौरमं पुत्रमपस्तनम् ।
न सा शक्या मया दातुमित्युक्त्वा स जगाम ह ॥ १६ ॥
‘अपने दूधसे यह गौ मेरे मातृहीन शिशुका प्रतिदिन पालन करती है; अतः मैं इसे कदापि नहीं दे सकता।’ यह कहकर वह उस गायको लेकर चला गया ॥ १६ ॥
ततस्तमपरं विप्रं याचे विनिमयेन वै ।
गवां शतसहस्रं हि तत्कृते गृह्यतामिति ॥ १७ ॥
‘तब मैंने उन दूसरे ब्राह्मणसे याचना की—‘भगवन्! उसके बदलेमें आप मुझसे एक लाख गौएँ ले लीजिये” ॥ १७ ॥
ब्राह्मण उवाच
न राज्ञां प्रतिगृह्णामि शक्तोऽहं स्वस्य मार्गणे ।
सैव गौर्दीयतां शीघ्रं ममेति मधुसूदन ॥ १८ ॥
‘मधुसूदन! तब उस ब्राह्मणने कहा—‘मैं राजाओंका दान नहीं लेता। मैं अपने लिये धनका उपार्जन करनेमें समर्थ हूँ। मुझे तो शीघ्र मेरी वही गौ ला दीजिये” ॥ १८ ॥
रुक्ममश्वांश्च ददतो रजतस्यन्दनांस्तथा ।
न जग्राह ययौ चापि तदा स ब्राह्मणर्षभः ॥ १९ ॥
‘मैंने उसे सोना, चाँदी, रथ और घोड़े—सब कुछ देना चाहा; परंतु वह उत्तम ब्राह्मण कुछ न लेकर तत्काल चुपचाप चला गया ॥ १९ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु चोदितः कालधर्मणा ।
पितृलोकमहं प्राप्य धर्मराजमुपागमम् ॥ २० ॥
‘इसी बीचमें कालकी प्रेरणासे मैं मृत्युको प्राप्त हुआ और पितृलोकमें पहुँचकर धर्मराजसे मिला ॥ २० ॥
यमस्तु पूजयित्वा मां ततो वचनमब्रवीत् ।
नान्तः संख्यायते राजंस्तव पुण्यस्य कर्मणः ॥ २१ ॥
अस्ति चैव कृतं पापमज्ञानात् तदपि त्वया ।
चरस्व पापं पश्चाद् वा पूर्वं वा त्वं यथेच्छसि ॥ २२ ॥ ‘यमराजने मेरा आदर-सत्कार करके मुझसे यह बात कही— “राजन्! तुम्हारे पुण्यकर्मोंकी तो गिनती ही नहीं है। परन्तु अनजानमें तुमसे एक पाप भी बन गया है। उस पापको तुम पीछे भोगो या पहले ही भोग लो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, करो ॥ २१-२२ ॥
रक्षितास्मीति चोक्तं ते प्रतिज्ञा चानृता तव । ब्राह्मणस्वस्य चादानं द्विविधस्ते व्यतिक्रमः ॥ २३ ॥ “आपने प्रजाके धन-जनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी; किंतु उस ब्राह्मणकी गाय खो जानेके कारण आपकी वह प्रतिज्ञा झूठी हो गयी। दूसरी बात यह है कि आपने ब्राह्मणके धनका भूलसे अपहरण कर लिया था। इस तरह आपके द्वारा दो तरहका अपराध हो गया है” ॥ २३ ॥
पूर्वं कृच्छ्रं चरिष्येऽहं पश्चाच्छुभमिति प्रभो । धर्मराजं ब्रुवन्नेवं पतितोऽस्मि महीतले ॥ २४ ॥ ‘तब मैंने धर्मराजसे कहा—प्रभो! मैं पहले पाप ही भोग लूँगा। उसके बाद पुण्यका उपभोग करूँगा। इतना कहना था कि मैं पृथ्वीपर गिरा ॥ २४ ॥
अश्रौषं पतितश्चाहं यमस्योच्चैः प्रभाषतः । वासुदेवः समुद्धर्ता भविता ते जनार्दनः ॥ २५ ॥ पूर्णे वर्षसहस्रान्ते क्षीणे कर्मणि दुष्कृते । प्राप्स्यसे शाश्वताँल्लोकाञ्जितान् स्वेनैव कर्मणा ॥ २६ ॥ ‘गिरते समय उच्चस्वरसे बोलते हुए यमराजकी यह बात मेरे कानोंमें पड़ी—‘महाराज! एक हजार दिव्य वर्ष पूर्ण होनेपर तुम्हारे पापकर्मका भोग समाप्त होगा। उस समय जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण आकर तुम्हारा उद्धार करेंगे और तुम अपने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे प्राप्त हुए सनातन लोकोंमें जाओगे’ ॥ २५-२६ ॥
कूपेऽऽत्मानमधःशीर्षमपश्यं पतितञ्च ह । तिर्यग्योनिमनुप्राप्तं न च मामजहात् स्मृतिः ॥ २७ ॥ ‘कुएँमें गिरनेपर मैंने देखा, मुझे तिर्यग्योनि (गिरगिटकी देह) मिली है और मेरा सिर नीचेकी ओर है। इस योनिमें भी मेरी पूर्वजन्मोंकी स्मरणशक्तिने मेरा साथ नहीं छोड़ा है ॥ २७ ॥
त्वया तु तारितोऽस्म्यद्य किमन्यत्र तपोबलात् । अनुजानीहि मां कृष्ण गच्छेयं दिवमद्य वै ॥ २८ ॥ ‘श्रीकृष्ण! आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। इसमें आपके तपोबलके सिवा और क्या कारण हो सकता है। अब मुझे आज्ञा दीजिये, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा’ ॥ २८ ॥
अनुज्ञातः स कृष्णेन नमस्कृत्य जनार्दनम् । दिव्यमास्थाय पन्थानं ययौ दिवमरिंदमः ॥ २९ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें आज्ञा दे दी और वे शत्रुदमन नरेश उन्हें प्रणाम करके दिव्य मार्गका आश्रय ले स्वर्गलोकको चले गये ॥ २९ ॥
ततस्तस्मिन् दिवं याते नृगे भरतसत्तम । वासुदेव इमं श्लोकं जगाद कुरुनन्दन ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ! कुरुनन्दन! राजा नृगके स्वर्गलोकको चले जानेपर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने इस श्लोकका गान किया— ॥ ३० ॥
ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं पुरुषेण विजानता । ब्राह्मणस्वं हृतं हन्ति नृगं ब्राह्मणगौरिव ॥ ३१ ॥
‘समझदार मनुष्यको ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये। चुराया हुआ ब्राह्मणका धन चोरका उसी प्रकार नाश कर देता है, जैसे ब्राह्मणकी गौने राजा नृगका सर्वनाश किया था’ ॥ ३१ ॥
सतां समागमः सद्भिर्नाफलः पार्थ विद्यते । विमुक्तं नरकात् पश्य नृगं साधुसमागमात् ॥ ३२ ॥
कुन्तीनन्दन! यदि सज्जन पुरुष सत्पुरुषोंका संग करें तो उनका वह संग व्यर्थ नहीं जाता। देखो, श्रेष्ठ पुरुषके समागमके कारण राजा नृगका नरकसे उद्धार हो गया ॥
प्रदानफलवत् तत्र द्रोहस्तत्र तथाफलः । अपचारं गवां तस्माद् वर्जयेत युधिष्ठिर ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर! गौओंका दान करनेसे जैसा उत्तम फल मिलता है, वैसे ही गौओंसे द्रोह करनेपर बहुत बड़ा कुफल भोगना पड़ता है; इसलिये गौओंको कभी कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि नृगोपाख्याने सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नृगका उपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
अध्याय (पृष्ठ 641)
एकसप्ततितमोऽध्यायः
पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना
युधिष्ठिर उवाच
दत्तानां फलसम्प्राप्तिं गवां प्रब्रूहि मेऽनघ ।
विस्तरेण महाबाहो न हि तृप्यामि कथ्यताम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— निष्पाप महाबाहो! गौओंके दानसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मुझे विस्तारके साथ बताइये। मुझे आपके वचनामृतोंको सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती है, इसलिये अभी और कहिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ऋषेरुद्दालकेर्वाक्यं नाचिकेतस्य चोभयोः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें विज्ञ पुरुष उद्दालक ऋषि और नाचिकेत दोनोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
ऋषिरुद्दालकिर्दीक्षामुपगम्य ततः सुतम् ।
त्वं मामुपचरस्वेति नाचिकेतमभाषत ॥ ३ ॥
एक समय उद्दालक ऋषिने यज्ञकी दीक्षा लेकर अपने पुत्र नाचिकेतसे कहा—'तुम मेरी सेवामें रहो' ॥ ३ ॥
समाप्ते नियमे तस्मिन् महर्षिः पुत्रमब्रवीत् ।
उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च ॥ ४ ॥
इध्मा दर्भाः सुमनसः कलशश्चातिभोजनम् ।
विस्मृतं मे तदादाय नदीतीरादिहाव्रज ॥ ५ ॥
उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)—इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ' ॥ ४-५ ॥
गत्वानावप्य तत् सर्वं नदीवेगसमाप्लुतम् ।
न पश्यामि तदित्येवं पितरं सोऽब्रवीन्मुनिः ॥ ६ ॥
नाचिकेत जब वहाँ गया, तब उसे कुछ न मिला। सारा सामान नदीके वेगमें बह गया था। नाचिकेत मुनि लौट आया और पितासे बोला—‘मुझे तो वहाँ वह सब सामान नहीं दिखायी दिया’ ॥ ६ ॥
क्षुत्पिपासाश्रमाविष्टो मुनिरुद्दालकिस्तदा ।
यमं पश्येति तं पुत्रमशपत् स महातपाः ॥ ७ ॥
महातपस्वी उद्दालक मुनि उस समय भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे, अतः रुष्ट होकर बोले—‘अरे वह सब तुम्हें क्यों दिखायी देगा? जाओ यमराजको देखो।’ इस प्रकार उन्होंने उसे शाप दे दिया ॥ ७ ॥
तथा स पित्राभिहितो वाग्वज्रेण कृताञ्जलिः ।
प्रसीदेति ब्रुवन्नेव गतसत्त्वोऽपतद् भुवि ॥ ८ ॥
पिताके वाग्वज्रसे पीड़ित हुआ नाचिकेत हाथ जोड़कर बोला—‘प्रभो! प्रसन्न होइये।’ इतना ही कहते-कहते वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८ ॥
नाचिकेतं पिता दृष्ट्वा पतितं दुःखमूर्च्छितः ।
किं मया कृतमित्युक्त्वा निपपात महीतले ॥ ९ ॥
नाचिकेतको गिरा देख उसके पिता भी दुःखसे मूर्च्छित हो गये और ‘अरे, यह मैंने क्या कर डाला!’ ऐसा कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९ ॥
तस्य दुःखपरीतस्य स्वं पुत्रमनुशोचतः ।
व्यतीतं तदहःशेषं सा चोग्रा तत्र शर्वरी ॥ १० ॥
दुःखमें डूबे और बारंबार अपने पुत्रके लिये शोक करते हुए ही महर्षिका वह शेष दिन व्यतीत हो गया और भयानक रात्रि भी आकर समाप्त हो गयी ॥ १० ॥
पित्र्येणाश्रुप्रपातेन नाचिकेतः कुरुद्वह ।
प्रास्पन्दच्छयने कौश्ये वृष्ट्या सस्यमिवाप्लुतम् ॥ ११ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कुशकी चटाईपर पड़ा हुआ नाचिकेत पिताके आँसुओंकी धारासे भीगकर कुछ हिलने-डुलने लगा, मानो वर्षासे सिंचकर अनाजकी सूखी खेती हरी हो गयी हो ॥ ११ ॥
स पर्यपृच्छत् तं पुत्रं क्षीणं पर्यागतं पुनः ।
दिव्यैर्गन्धैः समादिग्धं क्षीणस्वप्नमिवोत्थितम् ॥ १२ ॥
महर्षिका वह पुत्र मरकर पुनः लौट आया, मानो नींद टूट जानेसे जाग उठा हो। उसका शरीर दिव्य सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था। उस समय उद्दालकने उससे पूछा— ॥ १२ ॥
अपि पुत्र जिता लोकाः शुभास्ते स्वेन कर्मणा ।
दिष्ट्या चासि पुनः प्राप्तो न हि ते मानुषं वपुः ॥ १३ ॥
बेटा! क्या तुमने अपने कर्मसे शुभ लोकोंपर विजय पायी है? मेरे सौभाग्यसे ही तुम पुनः यहाँ चले आये हो। तुम्हारा यह शरीर मनुष्योंका-सा नहीं है—दिव्य भावको प्राप्त हो
गया है' ।। १३ ।। प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पित्रा पृष्टो महात्मना । स तां वार्तां पितुर्मध्ये महर्षीणां न्यवेदयत् ।। १४ ।। अपने महात्मा पिताके इस प्रकार पूछनेपर परलोककी सब बातोंको प्रत्यक्ष देखनेवाला नाचिकेत महर्षियोंके बीचमें पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन करने लगा— ।। १४ ।। कुर्वन् भवच्छासनमाशु यातो ह्यहं विशालां रुचिरप्रभावाम् । वैवस्वतीं प्राप्य सभामपश्यं सहस्रशो योजनहेमभासम् ।। १५ ।। ‘पिताजी! मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये यहाँसे तुरन्त प्रस्थित हुआ और मनोहर कान्ति एवं प्रभावसे युक्त विशाल यमपुरीमें पहुँचकर मैंने वहाँकी सभा देखी, जो सुवर्णके समान सुन्दर प्रभासे प्रकाशित हो रही थी। उसका तेज सहस्रों योजन दूरतक फैला हुआ था ।। १५ ।। दृष्ट्वैव मामभिमुखमापतन्तं देहीति स ह्यासनमादिदेश । वैवस्वतोऽर्घ्यादिभिरर्हणैश्च भवत्कृते पूजयामास मां सः ।। १६ ।। ‘मुझे सामनेसे आते देख विवस्वान्के पुत्र यमने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि ‘इनके लिये आसन दो।' उन्होंने आपके नाते अर्घ्य आदि पूजनसम्बन्धी उपचारोंसे स्वयं ही मेरा पूजन किया ।। १६ ।। ततस्त्वहं तं शनकैरवोचं वृतः सदस्यैरभिपूज्यमानः । प्राप्तोऽस्मि ते विषयं धर्मराज लोकानर्हो यानहं तान् विधत्स्व ।। १७ ।। ‘तब सब सदस्योंसे घिरकर उनके द्वारा पूजित होते हुए मैंने वैवस्वत यमसे धीरेसे कहा—'धर्मराज! मैं आपके राज्यमें आया हूँ; मैं जिन लोकोंमें जानेके योग्य होऊँ, उनमें जानेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये' ।। १७ ।। यमोऽब्रवीन्मां न मृतोऽसि सौम्य यमं पश्येत्याह स त्वां तपस्वी । पिता प्रदीप्ताग्निसमानतेजा न तच्छक्यमनृतं विप्र कर्तुम् ।। १८ ।। ‘तब यमराजने मुझसे कहा—"सौम्य! तुम मरे नहीं हो। तुम्हारे तपस्वी पिताने इतना ही कहा था कि तुम यमराजको देखो। विप्रवर! वे तुम्हारे पिता प्रज्वलित अग्निके समान