भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मानमेयोदय (नारायण भट्ट - भाट्ट मीमांसा प्रमाण एवं प्रमेय शास्त्र सटीक)

Manameyodaya of Narayana Bhatta with Commentary

नारायण भट्ट एवं नारायण पण्डित द्वारा

DevanagariHindipublished672 पृष्ठ

आकरग्रन्थसङ्केतः पुट. | पङ्कि. | सङ्केताः | पुट. | पङ्कि. | सङ्केताः 367 | 7 | न्या. र 402 | 383 | 16 | तत्त्वचिन्तामणि 368 | 7 | न्या. म 33 | 384 | 7 | न्या. म 122 368 | 9 | न्या. र 250 | 384 | 10 | न्या. मा 57 369 | 2 | न्यायक 167 | 384 | 11 | श्लोक 348 369 | 11 | स. सि 4-42 | 385 | 5 | न्या. मा 122 370 | 5 | न्या. म 109 | 385 | 17 | श्लोक 381 371 | 3 | सि. मु 136 ता. | 386 | 3 | न्या. मा 56 371 | 19 | श्लोक 359 | 386 | 13 | प्र. त 3-38 372 | 11 | स. सि 4-43 | 386 | 18 | न्या. म 111 374 | 8 | ,, 4-44 | 387 | 3 | न्या. र 387 374 | 15 | न्यायपरिशुद्धिः | 387 | 14 | श्लोक 585 375 | 13 | प्र. त 3-11 | 389 | 7 | न्यायपरि 79 375 | 14 | ,, 2-1 | 389 | 18 | स. सि 4-53 376 | 2 | न्यायपरि | 390 | 17 | तत्त्वमुक्ता 4-51 376 | 10 | न्या. र 402 | 391 | 2 | स सि 4-49 376 | 20 | प्र. त 13 | 391 | 15 | न्या. वा 120 377 | 7 | न्यायपरि 150 | 392 | 20 | न्या. म 118 377 | 17 | न्यायबिन्दुः | 393 | 3 | ,, 123 377 | 19 | न्या. र 377 | 394 | 3 | वैशेषिकभाष्यम् 378 | 8 | किर 143 | 394 | 6 | न्या. भा 1-1-32 378 | 11 | न्या. ता 109 | 395 | 8 | न्या. म 584 378 | 13 | वैशेषिकभाष्यम् | 395 | 11 | मानमेयोदयः 378 | 15 | न्या. सू 1-1-5 | 396 | 1 | प्र. त 3-9 379 | 5 | वै. सू 3-2-7 | 396 | 5 | ,, 3-13 380 | 1 | श्लोक 392 | 396 | 15 | ,, 3-42 381 | 9 | न्या. म 133 | 397 | 9 | न्या. र 250 381 | 15 | न्यायपरि 80 | 397 | 17 | ,, 258 382 | 7 | शा. भा 1-1-2 | 398 | 5 | श्लोक 260 382 | 10 | न्या. सू 2-1-8 | 398 | 11 | ब्र. सू. शं 2-1-1 383 | 7 | न्या. र 388 | 399 | 12 | मानमेय 305

xxxvi आकारग्रन्थसंकेताः पुट. पङ्कि. संकेताः | पुट. पङ्कि. संकेताः 399 13 वैशेषिकभाष्यम् | 419 7 श्लोक 488 400 1 सि. मु 71 का. | 419 13 न्याः र 482 400 13 प्र. त 6-47 | 419 17 श्लोक 197 401 3 स. सं 2 द् | 420 1 न्या. र 483 401 5 न्यायप 167 | 422 3 प्र. क 9 प्र. 401 8 न्या. कु 3 स्त. | 422 5 न्या. र 588 402 18 शास्त्रदी 1-1-5 | 422 17 ,, 941 403 5 श्लोक. 375 | 423 5 ,, 410 403 20 न्यायप. 175 | 423 7 ,, 562 404 5 न्या. म 590 | 424 5 श्लोक. 410 405 10 शतदू. 9 | 424 7 ,, 432 405 11 स सि 4-63 | 424 11 न्या. र 503 407 9 न्या. ता 499 | 425 10 मानमेय 411 408 11 श्लोक 433 | 427 17 सं. वा 500 श्लो 409 7 न्या. भा 1-1-6 | 427 20 न्या. र 402 409 17 न्या र 435 | 428 1 श्लोक. 418 409 19 न्या. कु 3 स्त | 428 8 न्याः कु 3 स्त 410 4 श्लोक. 433 | 428 19 श्लोक. 913 411 9 न्या. म 245 | 429 5 ध्वन्या 200 411 12 श्लोक. 680 | 430 12 मानमेयोदयः 411 17 वै. सू 7-2-20 | 430 17 मानमेय 110 412 3 श्लोक 450 | 431 7 न्या. कु 2 स्त 413 1 प्रक 5 प्र. | 431 9 न्या. र 909 413 19 न्या. कु. 3 स्त | 432 3 ,, 367 414 5 श्लोक 463 | 432 9 काव्यप्रकाशसं 2 415 3 पा. सू 1-4-36 | 433 2 मानमेय 519 415 7 श्लोक 49 | 433 11 न्या. सि 6 परि 415 11 ,, 475 | 434 9 स. सि 4-81 417 5 न्या. कु 3 स्त | 435 3 श्लोक. 924 418 1 न्या. र 486 | 435 6 शब्दशक्तिप्रका

आकरग्रन्थसङ्केतः पुट. पङ्क्ति सङ्केताः | पुट. पङ्क्ति सङ्केताः 436 1 वा. प 1-134 | 458 1 न्या. ता 42 436 7 तन्त्र 199 | 458 8 तन्त्र 80 437 8 स्तोत्ररक्षा 4 श्लो. | 458 15 जै. मा 12 437 9 तन्त्र 233 | 460 7 प्रक. अतिदेशपार 438 1 ,, 157 | 463 6 तन्त्र 731 438 5 ,, 429 | 463 11 न्यायसु 3-3-14 438 11 ,, 535 | 463 13 बालप्रकाशः 441 17 ऋक्संहिता 10-71-3 | 463 19 न्या. म 589 441 18 मनु 2-1 | 465 10 बालप्रकाशः 442 2 तन्त्र 132 | 469 12 सुधीविलोचनम् 442 12 स. सि 4-113 | 470 9 वि. वि 450 443 15 तन्त्र 115 | 485 6 तन्त्र 337 444 19 श्लोक 59 | 487 5 वै. सू. वृ 5-1-1 445 19 तन्त्र 170 | 487 19 न्या. सू 3-1-25 446 10 स. सं 2 दृ | 488 19 न्यायसु 26 446 18 न्या. कु 1 स्त | 489 4 वि. वि 243 449 20 आप-परिभाषा | 489 7 न्या. सू 1-1-24 450 15 स. सि 594 | 489 15 न्या. कु 5 स्त 451 7 स्मृतिचन्द्रिका | 490 3 वा. प 2-1 452 11 आगमप्रामाण्यम् | 490 17 ,, 2-30 452 20 न्यायपरिशुद्धिः | 491 3 रघुवं 1-1 453 15 श्रुत. अथशब्दार्थः | 491 19 वा. प 2-145 454 14 न्यायसुधा 183 | 492 1 ,, 2-30 455 4 न्या. भा 4-1-62 | 494 7 ,, 2-57 455 8 ब्र. सू 2-1-1 | 494 11 न्या. म 330 455 14 न्या. भा 1-1-1 | 495 15 तन्त्र 345 455 18 मनु 7-43 | 496 7 पा. भा 4-20 456 3 न्यायपरिशुद्धिः | 497 11 तन्त्र 351 456 11 प. म 15 भ. | 498 5 ,, 345 457 7 श्लोक 209 | 498 8 न्यायसु 579

xxxviii आकरग्रन्थसंकेताः पृट. पङ्क्ति सङ्केताः | पृट. पङ्क्ति सङ्केताः 499 5 भाट्टररहस्यम् | 526 12 रामा 7-74 499 15 वि. चि 48 | 526 16 हेमा 661 499 17 न्या. म 345 | 526 19 गौ. ध 3-36 501 3 तन्त्र 240 | 527 1 ब्र. सू 3-4-18 502 7 जै. सू 6-2-9 | 527 10 मनु 4-176 503 1 भगी 4-1 | 527 12 प. म 6 भ. 503 7 प्रक. वाक्यार्थमातृका | 528 3 भ. गी 16-21 507 11 वादावलिः | 528 5 बृ. उ 7-2 508 5 तात्पर्यदी 215 | 528 13 न्या. ता 97 508 11 श्लोक 930 | 528 17 संबन्ध. 1008 श्लो 511 5 याज्ञ 3-219 | 529 3 रामा 2-105 511 13 न्या. सु 603 | 531 3 गौ. का 2-29 512 2 न्या. सू 3-1-25 | 531 10 तै. उ 4-10 512 16 न्या. म 356 | 531 12 मनु. 2-94 513 17 तन्त्र 240 | 531 18 श्वेता. 4 अ. 514 14 न्या. सू 1-1-24 | 531 19 तै. सं 6-3-10 515 14 न्या. कु 5 स्त. | 531 20 गौ. ध 3-36 515 17 वे. सं 214 | 532 7 वे. सं 248 516 10 अधिकर 20 श्लो. | 532 15 स. सि 2-75 519 9 न्या. म 395 | 533 2 न्या. सि 2 परि. 519 18 स. सि 4-91 | 533 13 न्यायपरिशुद्धिः 520 8 श्लो. क 432 | 534 9 तै. उ. शं 1-1 521 1 न्या. र 909 | 534 11 किर. 8 521 17 न्या. म 401 | 534 14 तन्त्र. 241 523 4 मनु 2-224 | 534 14 प्रक. 8 प्र. 523 10 भारत 18-6 | 537 15 न्या. भा 4-1-63 524 9 विष्णु 1-18 | 540 7 प्रश्नो. शं 6-3 524 14 तन्त्र 16 | 540 11 स. सं 6 दृ. 525 10 वे. सं 199 | 541 4 श्लोक. 695 525 18 भ. गी 17-11 | 541 6 तन्त्र. 375

आकरग्रन्थसङ्केतः xxx पृष्ट. पङ्क्ति. सङ्केताः | पृष्ट. पङ्क्ति. सङ्केताः 541 13 संवित्सिद्धिः | 552 7 भा. भा 175 542 17 स. सि 2-17 | 552 15 वि. वि 440 542 20 न्या. कु 1 स्त. | 553 11 जै. सू 6-2-9 543 5 श्लोक. 696 | 554 1 याज्ञ. 1-123 544 7 ,, 105 | 554 2 मनु. 11-16 544 13 श्रीभा. 2-2-3 | 554 7 न्या. मा 193 545 1 श्लोक. 667 | 554 13 श्लोक 671 545 9 पा. भा 2-22 | 555 10 न्या. कु 1 स्त 545 13 न्यायक. 270 | 555 17 स. सं 3 द. 545 17 वै. भा गुणभागः | 557 11 याज्ञ. 3-113 546 5 न्यायसु. 330 | 559 13 स. सि 1-4 546 13 श्लोक. 671 | 560 16 सिद्धान्तलेशः 546 17 पा. भा 2-13 | 562 11 स. सि 4-18 547 5 न्या. म 520 | 563 11 शतदू. 7 स. 547 10 भ. गी 18-66 | 565 9 तात्पर्यदी. 2-3 547 12 ब्र. सू 4-1-7 | 565 5 वे. सं 248 548 4 संबन्ध. 117 | 565 9 काव्यालंका 2-2-2 548 15 न्या. सु 330 | 567 1 आगमप्रामाण्यम् 548 19 तै. उ शं 1-1 | 568 15 श्रीभा. 2-2-42 549 5 मु. उ 1-2 | 569 12 श्रीभाष्यारम्भे 549 6 भ. गी. 2-42 | 569 16 अधिकरण 15 श्लो 549 10 किर 12 | 571 1 ब्र. सू. 4-4-22 549 17 संबन्ध 238 श्लो. | 571 3 ,, 2-3-46 549 19 ब्र. सू 3-4-2 | 571 5 ,, 1-3-22 550 3 संबन्ध. 1133 श्लो. | 571 8 भ. गी. शं. 13-4 550 5 ,, 345 श्लो. | 571 13 ब्र. सू. 1-1-1 550 9 बृ. उ 6-4 | 572 3 भामत्यारम्भे 550 11 सिद्धान्तलेशसंग्रहः | 572 8 तत्त्वटीका 551 11 भा. भा 207 | 573 12 नैष्कर्म्य 90 श्लो. 552 1 श्रीभा. 1-1-4 | 574 11 स. सि 3-79

xi आकारग्रन्थसंकेताः पुट. पङ्क्ति. सङ्केताः | पुट. पङ्क्ति. सङ्केताः 575 11 वे. सं 170 | 593 13 स. सि 2-42 575 19 छान्दो 8-1-1 | 594 1 भ. गी 9 माध्यायः 576 19 तै. उ 4-50, 51 | 594 7 ,, 18-56 576 18 श्वेता 6-18 | 594 19 पाञ्चरात्ररक्षा 577 1 छान्दो 2-2-23 | 595 3 प्र. त 166 577 4 रहस्यत्रयसारः | 595 8 गौतमधर्ममस्करी 579 3 न्या. सि 2 प | 596 3 भ. गी भा व्या 18- 579 8 भ. गी 18-66 | 597 1 शा. भा 1-1-20 581 7 न्यासदशकम् | 597 1 ब्र. सू 4-4-5 581 9 न्या. म 507 | 598 9 पाणिनि 4-4-34 582 15 किर 12 | 598 19 मनु 12-9 584 7 दिनकरीयारम्भे | 599 2 श्रीभाष्य 584 13 तन्त्र 240 | 600 16 न्या. कु 1 स्त 586 7 श्लोक 669 | 602 3 तत्त्वचिन्ता मङ्गलव 586 11 ,, 667 | 603 8 श्रीभा महापूर्वपक्ष 586 13 ,, 670 | 603 14 श्लोक 362 587 9 तन्त्र 16 | 604 7 शतदू 11 भ 587 11 श्लोक 673 | 605 17 तै. ब्रा 3-12-9 589 20 शास्त्र-मोक्षवादः | 606 1 कठोप 2-8 590 1 जै. सू 6-1-2 | 606 3 ,, 6-12 590 6 ब्र. सू 1-3-33 | 606 7 ,, 2-9 590 7 बृ. उ 5-5 | 606 9 केनोप 4 590 13 स. सि 2-37 | 606 11 जै. सू 1-1-2 590 13 सिद्धान्तलेश 3 प. | 606 12 ब्र. सू 1-1-3 591 3 मुण्ड. शं 1-1-1 | 606 13 ,, 2-1-10 591 4 वेदान्तपरिभा. व्या | 606 15 वा. प 1-34 591 18 सिद्धान्तलेश 3 प. | 606 19 ,, 1-137 592 18 ब्र. सू. शं 3-4-50 | 607 1 ,, 2-316 593 5 छान्दो 8-15 | 607 3 ,, 1-139 593 7 बृ. उ 5-5 | 607 9 मनु. 12-106

आकरग्रन्थसङ्केतः XII [पृ]ट. पङ्कि. सङ्केतः | पुट. पङ्कि. सङ्केतः 607 11 मनु. 4-256 | 614 3 श्लोक. 75 607 13 स्मृतिचन्द्रिका | 614 5 ,, 88 608 1 न्या. सु 350 | 614 7 तन्त्र. 178 609 18 तन्त्र. 104 | 614 11 आ. ध-व्या 1-1-2 610 7 वा. प 2-119 | 615 16 प्र. चं 2-4 610 9 ,, 1-123 | 615 18 विष्णु. 3-18 610 11 ,, 2-149 | 619 1 स. सि 3-68 611 5 न्या. म 589 | 619 5 श्लोक. 202 612 11 वृ.-उ 4-4 | 619 9 ,, 331 612 13 स्मृतिचन्द्रिका | 622 5 मा. वृ 4 613 5 वा. प 2-140 | 622 9 त. टी 86 613 11 श्लोक. 520 | 628 17 रामा. 2-105 613 17 वा. प 2-143 | 628 18 भारत. शा 328

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॥ श्रीरस्तु ॥ मानमेय रहस्य श्लोकवार्तिक प्रारम्भः

प्रमेयकाण्डः. (1) पीठिका 1 शुद्धस्वाभाविकप्रज्ञाशक्तिकारुण्यभूषणम् । नमिकर्मीकरोम्यद्यं विद्यादेवं श्रियः पतिम् ॥ अभिवन्द्य महोदारामस्मद्गुरुपरंपरम् । किंचित् करोमि जगतां प्रज्ञाविभवतोऽधुना ॥ 2 यः श्रीलक्ष्मीपुरंश्रीनिवासार्यो विदुषां मणिः । यं जन्मना ब्रह्मणा च वेंकटस्वाम्यजीजनत् ॥ श्रीमान् रामानुजाचार्यो येन पौत्र्यजयत् क्षितौ श्रीमत्तिरुमलै नल्लान् वात्स्यवंशाब्धिचन्द्रमाः ॥ श्रीमत्कस्तूरिरङ्गेन्द्रविद्वद्रत्नकृपाभरः । सर्वतन्त्रस्वतन्त्रत्वं यस्मै प्रायच्छदव्ययम् ॥ पितृव्यस्स विरक्तश्रीरघूद्वहगुरुद्वहः । आत्मरक्षाभरं यस्मादादत्त करुणाकरः ॥ यस्य वृत्तिं प्रतिष्ठां चानन्यतुल्यामकल्पयत् । महीशूरमहीधुर्यतुर्यश्रीकृष्णभूपतिः ॥

२ मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके यस्मिन् लोकाः प्रसीदन्ति ताताम्बातपसां निधौ। स व्यातानीत् मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिकम् ॥ ३ शास्त्रेषु विस्तृतांशस्य गतार्थत्वान्न विस्तरः । सुखबोधाय सारांशः संक्षेपेण प्रदर्श्यते ॥ कुतो वा नूतनं वस्तु वयमुत्प्रेक्षितुं क्षमाः । वचोविन्यासवैचित्र्यमात्रमत्र विमृश्यताम् ॥ प्रायः प्रागनुभूतेषु सर्वेष्वपि च वस्तुषु । अपूर्वरचने तत्र तुष्यन्ति हि सुमानुषाः ॥ प्रज्ञाविवेकं लभते विभिन्नागमदर्शनैः । कियद्वा शक्यमुन्नेतुं स्वयत्नमनुधावता ॥ तत्तदुत्प्रेक्षमाणानां पुराणैरागमैर्विना । अनुपासितवृद्धानां विद्या नातिप्रसीदति ॥ संकेताद्वा वासनया तथा मीमांसयाऽपि वा । कस्मैचिद्रोचते किंचित् मध्यस्थमनसामपि ॥ सर्वसिद्धान्तसारार्थचिन्ताचातुर्यशालिनाम् । न कश्चिदपराधो नः निगूढार्थनिवेदनात् ॥ प्रकाश्यते च प्रायेण स्वाभिप्रायो निबन्धृभिः । अत्र त्वस्मदभिप्रायः सर्वाभिप्रायसंग्रहः ॥ प्रज्ञाप्रासादमारुह्य ह्यशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिस्थानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥

शास्त्रारम्भः 4 मेयं मानाधीनमपि तदेवादौ निरूप्यते । प्रोपसर्गप्रयोगस्तु प्रमाभ्रमविवेकतः ॥ विज्ञानाद्वैतसिद्धान्ते प्रविवेको न कश्चन । तथाऽसत्ख्यातिसिद्धान्ते व्यवहारो ह्युपप्लवः ॥ मानाधीना मेयसिद्धिः मानसिद्धिश्‍च¹ लक्षणात् तल्लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिरितीर्यते ॥ ज्ञातं सम्यगसम्यग्वा यन्मोक्षाय भवाय वा । तत्प्रमेयमिहाभीष्टं न प्रमाणार्थमात्रकम् ॥ इति न्यायविदः प्राहुः प्रमाणपरिनिष्ठिताः । काणादास्तु पदार्थज्ञाः प्रमेयपरिनिष्ठिताः ॥ प्रमेयं च प्रमाणं च प्रयोजनमिति त्रिभिः । विभागैः प्रविभक्तोऽयं प्रबन्ध इति हि क्रमः ॥ (2) शास्त्रारम्भः. 1 विषयश्च फलं चैव संबन्धश्चाधिकार्यपि । प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गमनुबन्धचतुष्टयम् ॥ अभिधेयादयश्शास्त्रे कथ्यन्ते प्रथमं बुधैः । न निश्चीयन्त एवैते कृत्स्नशास्त्रश्रुतेः पुरा ॥ प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गं स्यात्तथाप्यर्थसंशयः । अनर्थसंशयो दृष्टः निवृत्त्यङ्गं परीक्षकैः ॥

4 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके 2 तेष्वनर्थेष्वशक्यानुष्ठानं प्रथममुच्यते । यथा च तक्षकमणिः ज्वरपीडां हरेदिति ॥ विफलं तु द्वितीयं स्यात् काकदन्तपरीक्षणम् । तृतीयं चानभिमतं जननीपाणिपीडनम् ॥ असंबद्धं तुरीयं स्यात् जरद्गववचो¹ यथा । संभावितेनाप्येकेन प्रवृत्तिः प्रतिबध्यते ॥ इति धार्मोत्तरं वर्त्म न्यायबिन्दुमुखे स्थितम् । न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकारम्भेऽपि सूचितम् ॥ व्यतिरेकदृशः केचित् केचिदन्वयदृष्टयः । प्राचीनाः प्रायशः पूर्वे पराचीनाः परे मताः ॥ ततोऽभिधेयसम्बन्धकथनं स्यादिहादितः । तच्चाभिधेयसम्बन्धसमर्थनमपीष्यते ॥ 3 प्रमाणनयतत्त्वाख्यालोकालंकारमूलके । रत्नाकरावतारेऽस्य निदानं विदितं यथा ॥ शास्त्रादावभिधेयार्थो दुर्निंरूपोऽभिधित्सितः । सोऽसंबद्धोऽथ संबद्धः नाद्यः प्रागेकवाक्यतः ॥ सर्वशास्त्रार्थसंदर्भगर्भाविर्भावसंभवात् । कृतं शास्त्रेण शेषेण बहलक्लेशकारिणा ॥ ¹ जरद्गवः कम्बलपादुकाभ्यां द्वारि स्थितो गायति मद्रकाणि । तं ब्राह्मणी पृच्छति पुत्रकामा राजन् रुमायां लवणस्य कोऽर्घः ॥

शास्त्रारम्भः 5 नान्त्यश्शब्दाभिसंबन्धे विकल्पानुपपत्तितः । संयोगाद्यास्तु संबन्धाः नैव संभावनापदम् ॥ तादात्म्यं वा तदुत्पत्तिः वाच्यवाचकताऽथवा । स्यादाद्यपक्षे प्रायेण जगतो मिश्ररूपता ॥ क्षुरमोदकशब्दाभ्यां स्यातां पाटनपूरणे । द्वितीयपक्षोऽपि मिथोऽनुपलम्भपराहतः ॥ तृतीयोऽपि स्वरूपं वा भिन्नो वेति विकल्प्यते । आद्ये नाधिकमुक्तं स्यात् अन्त्ये नित्योऽथवेतरः ॥ नित्यश्चेन्नित्यतापत्तिः एतत्संबंधिनोरपि । अनित्यश्चेत्स्वरूपं चेत् नाधिकं स्यादितीरितम् ॥ भिन्नश्चेदनवस्था स्यात् तादात्म्यादिविकल्पतः । सर्वेषामपि नित्यत्वं क्षणभङ्गपराहतम् ॥ दुर्ग्रहश्चापि संकेत: स्वरसक्षणभङ्गिनी । विकल्पयोनयश्शब्दा विकल्पाइशब्दयोनयः ॥ कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यमी । इति प्राचामुक्तिरेषा सकलार्थप्रदर्शिनी ॥ अतोऽभिधेयसंबन्धभङ्गुरः शास्त्रडम्बरः । सोऽयं सौगतसिद्धान्तः शास्त्रारम्भप्रभञ्जकः ॥ 4 क्षेप्तुं वादानवमादीन् दृश्यते किल वार्तिके । सिद्धे शब्दार्थसंबन्ध इति वाररुचं वचः ॥

6 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके शब्दे चार्थे च संबन्धे नित्य एवेति तद्वचः । व्याख्यातं भाष्यकारेण पतञ्जलिमहर्षिणा ॥ औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन संबन्ध इत्यपि । जैमिनिसूत्रयामास शब्दार्थान्वयनित्यताम् ॥ नित्याश्शब्दार्थसंबन्धाः समाम्नाता महर्षिभिः । सूत्राणां सानुसन्त्राणां भाष्याणां च प्रणेतृभिः ॥ इति वाक्यपदीयेऽपि प्राह भर्तृहरिः स्वयम् । यश्शब्दाद्वैतसिद्धान्तप्रतिष्ठापनदेशिकः ॥ 5 सर्वस्यैव हि शास्त्रस्य कर्मणो वाऽपि कस्य चित् । यावत्प्रयोजनं नोक्तं तावत्तत्केन गृह्यते ॥ सिद्धार्थं सिद्धसंबन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । ग्रन्थादौ तेन वक्तव्यस्संबन्धः सप्रयोजनः ॥ संबन्धोऽस्ति च नित्यश्चेत्युक्तमौत्पत्तिकादिना । अप्रामाण्यनिरासार्थं, तद्द्वयं नेष्यते परैः ॥ वाच्यवाचकसंबन्धनिषेधे लोकबाधनम् । विरोधश्च स्ववाक्येन न हि संबन्धवर्जितैः ॥ प्रतिज्ञार्थं पदैः शक्यः प्रतिपादयितुं परः । तस्माद्गमकतारूपः वृद्धेभ्यस्त्विह शिक्ष्यते ॥ इति कौमारिले श्लोकवार्तिके चोपबृंहणम् । अत एव हि शब्दादेर्नित्यताऽस्थापि सूरिभिः ॥

मङ्गलविचारः 6 जात्याख्यस्यातिरिक्तस्य नित्यस्यापि च वस्तुनः स्वीकारोऽपि च शिक्षायै स्यात्प्रपञ्चापलापिनाम् । कर्मैकं बुद्धिरप्येका जगत्येकस्सितो गुणः । वर्णोऽप्येको गकारादिरिति वादा अपीदृशाः ॥ तस्मादादौ शास्त्रकृतामर्थसम्बन्धसूचनम् । साधने पर्यवसितं शास्त्रारम्भोऽयमुच्यते ॥ इदानींतनशास्त्रेषु तद्विशेषविचिन्तना । प्रवर्तते युक्तिमूला सति कुड्येऽनुलेपवत् ॥ (3) मङ्गलविचारः. 1 प्रारिप्सितसमाप्त्यर्थं शिष्टाः कुर्वन्ति मङ्गलम् । आचारानुमितश्रुत्या तद्धेतुत्वं हि मीयते ॥ प्रमिते साधनत्वेऽस्मिन् श्रुत्यैव निरपेक्षया । व्यभिचारः परीहार्यः क्वचिच्चित्रादिनीतितः ॥ फलानन्तर्यनियमो यदि हेतुत्वमिष्यते । व्यभिचारस्य शङ्कैव न हि स्यादवकाशिनी ॥ तत्स्यादारब्धकर्माङ्गं प्रागनुष्ठानदर्शनात् । विघ्नध्वंसस्तदत्यन्ताभावो वा द्वारमिष्यते ॥ समाप्यतामिदं कर्म निर्विघ्नमिति कामना । यदा श्रुतित एव स्यात् तदा द्वारत्वनिर्णयः ॥

8 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके संशयो निश्चयो वाऽत्र विघ्नज्ञानं प्रवर्तकम् । समाप्तिकामो विघ्नज्ञः सोऽधिकार्यत्र बोध्यते ॥ २ प्रधानं मङ्गलं केचित् अदृष्टद्वारतः पुनः । फलं समाप्तिः तत्कामो ह्यधिकारीति जानते ॥ ३ प्रारिप्सितं निमित्तं स्यादाविघ्नेन समापनम् । प्रचयश्च फलं चेति केचिन्नैमित्तिकं विदुः ॥ मङ्गलाचरणे तस्मात्काम्यशङ्का व्यपोद्यते । समाप्तिकामना तु स्यादधिकारिविशेषणम् ॥ ४ परे त्वदृष्टद्वारेण मङ्गलस्य फलं विदुः । विघ्नसंसर्गविरहं समाप्तिस्तु ततः फलम् ॥ ५ चतुर्षु पक्षेष्वेतेषु कंचित्स्वीकृत्य सूरयः । विवदन्ते गुरुलघुविमर्शनविचक्षणाः ॥ प्रथमं परिगृह्णन्ति पक्षं प्राञ्चस्तु तार्किकाः । नव्यनैयायिकानां तु तुरीयः पक्ष ईप्सितः ॥ ६ आद्यपक्षे व्यभीचारं नास्तिकादिनिबन्धने । अन्यथासिद्धिमपि वा विघ्नध्वंसेन ते विदुः ॥ ७ न मङ्गलं महाभाष्ये दृश्यते नापि पाक्षिले । न शाबरे शाङ्करे वा तथेदानींतने क्वचित् ॥ मङ्गलं न निबध्नन्ति ग्रन्थे केचिद्विपश्चितः । कुर्वन्तो वा न कुर्वन्तो न हि तद्वेदितुं क्षमम् ॥

सिद्धान्तविचारः 9 माण्डूक्यगौडपादीयभाष्ये श्रीमति शाङ्करे । यथाबलं नमस्कारो व्यवहार इतीरितः ॥ 8 निबध्नतामयं भावश्शिष्याणां शिक्षणं तथा । महिष्ठमङ्गलावाप्तिः स्वकृतस्यानुकीर्तनात् ॥ 9 दण्ड्यादिभिर्महाकाव्यारम्भस्याङ्गमितीरितम् । सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम् ॥ आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम् । तदाहुः मङ्गलं काव्यस्यैवाङ्गमिति केचन ॥ 10 तन्मानसं वाचिकं च कायिकं चेत्यपि त्रिधा । समष्टिव्यष्टिरूपेण सर्वत्रास्तीति केचन ॥ एवं मङ्गलतत्त्वार्थविचारो मङ्गलात्मकः । मङ्गलाचारयुक्तानां विनिपातं निवारयेत् ॥ (4) सिद्धान्तविचारः. 1 प्रामाणिक इति ज्ञातो ह्यर्थः सिद्धान्त इष्यते । आवापोद्वापभेदानामिदानीमपि दर्शनात् ॥ 2 अभिमानैकमूलत्वात् अन्योन्यं च विरोधतः । न कश्चिद्यदि सिद्धान्तः नैवं तत्सिद्धयसिद्धितः ॥ सिद्धान्ताभाव एवायं प्रामाणिक इतीष्यते । नेष्यते वा द्विधाऽप्येवं सिद्धः सिद्धान्तसंग्रहः ॥ M.R. 2

10 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके 3 सर्वं शून्यमिति प्राहुः केचिद्विज्ञानमित्यपि । अपोहवादिनस्सर्वं व्यावृत्तिरिति मेनिरे ॥ 4 सर्वं सदित्येकमिति संख्येकान्तेषु चादिमः । शून्याद्वैतं सदद्वैतं विज्ञानाद्वैतमेव च ॥ शब्दाद्वैतं तथा कालाद्वैतमित्यादि विस्तरः । सर्वं नित्यमनित्यं च द्विसंख्येकान्तवादिनाम् ॥ ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयमिति त्रिसंख्येकान्तवादिनाम् । मानं मेयं मितिर्मातेत्याहुरेवं ततः परे ॥ रूपं संज्ञा च संस्कारः वेदनाऽनुभवस्त्विति । पञ्च स्कन्धा इति प्राहुः सौत्रान्तिकमुखाः परे ॥ जीवो धर्मोऽप्यधर्मश्च पुद्गलः काल एवच । आकाश इति षड्द्रव्यं षडभिज्ञाः प्रचक्षते ॥ एवं सप्तादिसंख्यानामेकान्ता अपि सम्मताः । ततश्च षष्टितन्त्रं यत्संदृष्टं कपिलादिभिः ॥ संख्येकान्तानुरोधेन तत्सांख्यं प्रथितं भुवि । सांख्या हि तत्त्वगणनापरायणतया स्थिताः ॥ प्रबोधचन्द्रोदयोक्तिरप्येवं तत्र साक्षिणी । ज्ञानप्रधानं यच्छास्त्रं तत्सांख्यमिति केचन ॥ तपःप्रधानं शास्त्रं तु पातञ्जलमिति स्थितम् । यमादयस्तपोरूपास्तत्रैव हि विशोधिताः ॥

इत्थं संख्येकान्तवादो हेतुसाध्याविशेषतः । प्रत्यक्षादिप्रमाणानां विरोधाच्च न युज्यते ॥ इत्यक्षपादमुनिना दूषितो न्यायदर्शने । संख्याविवादः प्रथमः तदधीनं हि लक्षणम् ॥ 5 इत्यालोच्यापरे प्राज्ञाः नयसंस्कृतमानसाः । तस्मिन् संख्यां परित्यज्य तत्त्वे संख्यां न्यवेशयन् ॥ ततस्तत्त्वसमासस्तु पञ्चविंशतिधा कृतः । कार्यकारणयोरैक्यं तथा वै धर्मधर्मिणोः ॥ अभेद इति सिद्धान्ताद् द्विसंख्येकान्त एव सः । षट्त्रिंशत्संख्यतत्त्वानि विदुश्शैवागमानुगाः ॥ वैशेषिकादयस्सप्त षोडशेति च मन्वते । पदार्थतत्त्वविज्ञानान्निःश्रेयसमसूत्रयत ॥ यतो विवेककाष्ठैव फलं मानवजन्मनः । तयोपादित्सितजिहासितयोर्हि विनिश्चयः ॥ ततश्शास्त्रोपयुक्तानां पदार्थानां परीक्षणम् । समस्य च विभज्यापि पदार्थानां परीक्षणम् ॥ इति द्विधा प्रवृत्तं स्याच्छास्त्रमित्यवधार्यते । 6 पदमेव पदार्थं तं मन्यन्ते ये च शाब्दिकाः ॥ अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन वेति ये वा विदुः परे ॥

2 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके वाक्यं वाऽप्यथ वाक्यार्थं प्रतिभां येऽपि मन्वते । तादृग्वादानिरोधाय पदार्थ इति शिक्ष्यते ॥ अतः पदार्थशास्त्रं वा तर्कशास्त्रमपीति वा । प्रख्यायते च तच्छास्त्रं संस्कारस्थैर्यसिद्धये ॥ 7 तत्र बाह्यार्थमात्रस्य तत्त्वं लौकायता विदुः । तथैवान्तरमात्रस्य योगाचारा विजानते ॥ बाह्यमाभ्यन्तरं चेति कापिलाद्याः विदुः परे । पातञ्जलास्त्वीश्वराख्यं पुंविशेषं विजानते ॥ तच्च तत्त्वान्तरमिति प्रायेणेश्वरवादिनः । द्रव्यं पदार्थः केषांचित् सर्वं द्रव्यात्मकं यतः ॥ महासामान्यमन्यैस्तु द्रव्यं सदिति चोच्यते । गुणः पदार्थः केषां चित् गुणवृन्दं यतोऽखिलम् ॥ द्रव्यं गुण इति द्वेधा पदार्थ इति केचन । द्रव्याद्रव्यविभागोऽपि मतेऽस्मिन् पर्यवस्यति ॥ संयोगान्तर्गतः कर्मपदार्थ इति भूषणः । केचित्कर्मानुजानन्तो बहुधाऽत्र विशेरते ॥ जातिः पदार्थः केषां चित् सर्वं जात्यात्मकं विदुः । अपोहवादिनस्सौत्रान्तिकाः व्यावृत्तिवादिनः ॥ द्रव्यं गुणः कर्म चेति केषां चित्रिविधो मतः । त्रयाणामर्थ इत्याख्यां कणादश्चाप्यसूत्रयत् ॥