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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

संस्कृतकी कुछ मूल तथा सानुवाद पुस्तकें श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्वविवेचनी-पृष्ठ ६८४, चित्र ४, सजिल्द, मूल्य ˙ ˙ ˙ ४.०० श्रीमद्भगवद्गीता [बड़ी]-पृष्ठ ५७२, चित्र ४ सजिल्द, मूल्य ˙ १.२५ ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ ५२, मूल्य .२० केनोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १४२, मूल्य ˙ ˙ .५० कठोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १७८, मूल्य ˙ ˙ .५६ प्रश्नोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १२८, मूल्य ˙ .४५ मुण्डकोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १२२, मूल्य .४५ माण्डूक्योपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २८४, मूल्य १.०० ऐतरेयोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, पृष्ठ १०४, मूल्य ˙ .३७ तैत्तिरीयोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २५२, मूल्य .८१ श्वेताश्वतरोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २६८, मूल्य .८७ ईशावास्योपनिषद्-अन्वय तथा सरल हिंदी-व्याख्यासहित, पृष्ठ १६, मूल्य .०६ श्रीमद्भागवतमहापुराण-दो खण्डोमे, सटीक, पृष्ठ २०३२, चित्र रंगीन २६, १५.०० श्रीमद्भागवतमहापुराण-मूल मोटा टाइप, पृष्ठ ६९२, चित्र १, सजिल्द मू० ६.०० श्रीमद्भागवतमहापुराण-मूल, गुटका, सजिल्द, पृष्ठ ७६८, सचित्र, मूल्य ३.०० श्रीविष्णुपुराण-सानुवाद, पृष्ठ ६२४, चित्र ८, सजिल्द, मूल्य ४.०० अध्यात्मरामायण-सानुवाद, पृष्ठ ४००, सचित्र, कपड़ेकी जिल्द, मूल्य ३.०० पातञ्जलयोगदर्शन-मूल, पृष्ठ २०, मूल्य ˙ ˙ ˙ ˙ .०२ श्रीदुर्गासप्तशती-सानुवाद, पृष्ठ २४०, सचित्र, मूल्य .७५ श्रीदुर्गासप्तशती-मूल, पृष्ठ १५२, सचित्र, मूल्य ˙ .५० लघुसिद्धान्तकौमुदी-(संस्कृतके विद्यार्थियोंके लिये) पृष्ठ ३६८, मूल्य .७५ सूक्ति-सुधाकर-सुन्दर श्लोक-संग्रह, सानुवाद, पृष्ठ २६६, मूल्य ˙ ˙ ˙ .६२ स्तोत्ररत्नावली-चुने हुए स्तोत्र, सानुवाद, सचित्र, पृष्ठ ३२०, मूल्य ˙ ˙ ˙ .५० प्रेमदर्शन-नारद-भक्ति-सूत्रोकी विस्तृत टीका, सचित्र, पृष्ठ १९२, मूल्य .३१ विवेक-चूडामणि-सानुवाद, सचित्र, पृष्ठ १८४, मूल्य ˙ ˙ .३१ अपरोक्षानुभूति-शङ्करस्वामिकृत सानुवाद, पृष्ठ ४०, सचित्र, मूल्य ˙ ˙ ˙ .१६ मनुस्मृति-द्वितीय अध्याय, सार्थ, .१० | संध्या-विधिसहित, पृष्ठ १६, मूल्य .०३ श्रीविष्णुसहस्रनाम-सटीक .१० | शारीरकमीमांसादर्शन-मूल, .०५ श्रीविष्णुसहस्रनाम-मूल, पृष्ठ ४८, .०५ | श्रीरामगीता-सटीक, पृष्ठ ४०, .०५ शाण्डिल्यभक्तिसूत्र-सटीक, .१० | प्रश्नोत्तरी-सटीक, पृष्ठ ३२, .०३ मूलरामायण-सानुवाद, पृष्ठ २४ .०८ | नारद-भक्ति-सूत्र-सटीक, पृष्ठ २४, .०२ गोविन्द-दामोदर-स्तोत्र-सटीक, .०६ | सहस्रश्लोकी गीता-सटीक ०१ संध्योपासनविधि-अर्थसहित, .०६ | पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

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२९६ मार्क्सवाद और रामराज्य कुटुम्बमें विघटन, वैमनस्यसे नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक सभी प्रकारका पतन और पातक हो सकता है । पर उपर्युक्त लोगोंसे झगड़ा टालनेमें ये विषय उपस्थित ही नहीं होते । अतः समाजके संघटन, धारण-पोषणमें कोई बाधा नहीं पड़ती । धर्मके ही सम्बन्धसे बालक, बूढे, दुर्बल, रोगियोंके आग्रहो, बातों और चिडचिडापनको सहना पड़ता है, जो भौतिक और स्वार्थ-दृष्टिके संघटन- में असम्भव है । ज्येष्ठ भ्राताको पिताके समान और भार्या तथा पुत्रको अपना शरीर समझकर उनसे विवाद बचाना चाहिये । दासवर्गको अपनी छायामें और कन्याको परम दयाका पात्र जानकर उन सबका सहन करना चाहिये । भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥ छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् । तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेतासंज्वरः सदा ॥ (मनु० ४ । १८५) वास्तवमें इस तरह जो अपने सहवासियोंद्वारा अपनी निन्दा सह लेगा, वही व्यापक संघटनका अधिकारी होगा । किसी भी समाज या राष्ट्रको वशमें लानेके लिये बड़ी सहिष्णुता तथा स्वार्थ त्यागकी अपेक्षा है । अपने कुटुम्बको कुटुम्ब बनानेके बाद ही प्राणी वसुधाको कुटुम्ब बना सकता है । जिसका अपने कुटुम्बमें ही सहयोग नहीं, जो अपने कुटुम्बके ही अधिक्षेपोको नहीं सह सकता, वह दूसरोंके अधिक्षेपोको कैसे सहेगा और कैसे उनके लिये स्वार्थ त्याग करेगा ? अधिक क्या ? दैहिक संघटन भी कम चमत्कारपूर्ण नहीं है । हस्त, पाद, मुख, नेत्रादि एकदूसरेकी विपत्तियोंमें कैसे भाग लेते हैं ! पलके, हाथ आदि नेत्रकी सारी विपत्तिको स्वय लेना चाहती हैं। पैरमें काँटा लगनेपर नेत्र देखनेको उतावले हो उठते हैं; हाथ निकालनेको और मुँह फूँकनेको प्रस्तुत हो उठता है । देहीकी तो बात ही निराली है। यदि कहीं अपने दाँतोसे जीभ कट जाय तो क्या दाँत पत्थरसे तोड़ डाले जायें ? एक अङ्गसे दूसरे अङ्गपर आघात हो तो क्या देही उसे काट दे ? वह तो यही समझता है कि सब मेरे ही हैं । इस दृष्टिसे सर्वत्र व्यापक अनन्त एक आत्माको देखनेवाला पुरुष तो सब देहोको अपना ही अङ्ग समझता है, फिर अपनी देहपर प्रहार करनेवालेको क्या करे, क्योंकि वह भी तो अपना ही है— जिह्वां क्वचित् संदशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् । ( श्रीमद्भा० ११ । २३ । ५१ ) 'सब अपना ही कुटुम्ब है या अपना ही अङ्ग या स्वरूप है', इस दृष्टिसे समाज और राष्ट्र एव विश्वका हित चाहना बड़ी ऊँची बात है । बिना ऐसे भावोंके क्या संघटन सम्भव है ? राष्ट्रका वशीकरण यद्यपि समाजका आधार व्यक्ति है, तथापि बिना संघटनके समाज नहीं बनता।

वर्ग-संघर्ष २०७ संगठित व्यक्तियोका प्रथम समाज कुटुम्ब ही है। उसके संचालनमें जिन गुणोंकी आवश्यकता होती है, वास्तवमें राष्ट्रके संचालनमें भी उन्हीं गुणोंकी आवश्यकता है। कुटुम्बमें भी भिन्न स्वार्थोंका संघर्ष है। किसी-न-किसी तरह उसमें सामञ्जस्य स्थापित करना छोटे, बड़े, बूढे, स्त्री, पुत्र, कलत्र सबको सन्तुष्ट रखना, नीतिद्वारा काम निकालना, किसीके साथ अन्याय न होने देना, अनुशासन और स्वतन्त्रताका उचित अनुपातमें मेल मिलाये रखना, सबको स्नेहके सूत्रमें बाँध रखना और घरके भीतर-बाहर शान्ति बनाये रखना जटिल समस्या है। राष्ट्रके संचालनमें भी ऐसी ही समस्याओंका पग-पगपर सामना करना पड़ता है। अतः जिसने कुटुम्ब-संचालन- में सफलता पा ली, वही राष्ट्र-संगठनमें भी सफल हो सकता है। इसीलिये शास्त्रोंमें कुटुम्बकी रक्षापर बड़ा जोर दिया गया है और सहिष्णुता, उदारता, समता, आज्ञापालन, सौहार्द, सौमनस्य आदि गुणोंकी बड़ी आवश्यकता बतलायी गयी है। कुटुम्बमे जो वास्तवमें एक छोटा मोटा राष्ट्र ही है, जबतक समान-मन, समान- उद्देश्य नहीं बनता एवं जबतक स्नेहसूत्रमें सब बँध नहीं जाते तबतक किसी प्रकारका अभ्युदय असम्भव है। इन सबको सम्पादन करनेके लिये अथर्ववेदके सामनस्य सूक्तमें (३।६।३०) एक अनुष्ठान बतलाया गया है। उसके मन्त्रोंका विधिवत् जप, हवन, अभिषेकद्वारा इस लक्ष्यकी सिद्धि होती है। इन मन्त्रोंके कुछ अंश एवं आशय इस प्रकार हैं—‘सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः’। (३।६।३०।१) अर्थात्—हे विवाद करनेवाले मनुष्यो ! मैं तुमलोगोंका वैमनस्य मिटाकर सौमनस्य करता हूँ। (यह उक्ति जापक, होता या अभिषेक करनेवालेकी है।) मैं तुम्हें समान हृदय, समान चित्तवृत्ति एवं सम्यक् प्रीतिसे सख्य भावसे युक्त बनाना चाहता हूँ। जैसे गौ अपने वत्सको चाहती है, वैसे तुमलोग भी एक दूसरेसे प्रेम करो—‘अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शंतिवाम्।’ (२) पुत्र पिताका अनुगामी हो, माता पुत्रादिकोंके समान मनवाली और भार्या पतिसे सुखयुक्त मधुर वचन बोलनेवाली हो—‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।’ (३) एक भाई दूसरेसे द्वेष न करे, एक बहन दूसरेसे द्वेष न करे। सब लोग समान रहन-सहन, ज्ञान, कर्मसम्पन्न होकर कल्याणमयी वाणी बोले—‘येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः। तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे। संज्ञानं पुरुषेभ्यः’ (४) जिस मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रादि देवताओंका परस्पर विवाद, विद्वेष नहीं होता, उसी एक मत्यापादक सामनस्य मन्त्रको तुम्हारे गृहमें प्रयुक्त करता हूँ—‘ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियौष्ट सराधयन्तः सधुराश्चरन्तः। अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्व संमनसस्कृणोमि।’ (५) तुमलोग ज्येष्ठ, कनिष्ठभावसे परस्पर अनुरक्त हो। समान चित्त होकर समान कार्यके लिये समान प्रयत्नशील हो। परस्पर वियुक्त न हो, एक दूसरेसे प्रियवाक् बोलते हुए परस्पर मिलो। मैं तुमलोगोंको समान कर्ममें समान मन होकर प्रवृत्त

२९८ मार्क्सवाद और रामराज्य करता हूँ—'समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।' ( ६ ) तुमलोगोंकी एक पानीयशाला हो, साथ ही अन्नभाग हो, ( एक जगह ही बैठकर अन्नपानादिका भोग करो, ) मैं तुमलोगोंको एक स्नेहपाशमे बाँधता हूँ । जैसे चारो ओरसे घेरकर अरा नाभी ( चक्र ) का आश्रयण करते हैं, वैसे ही समान फलकी आकांक्षासे तुम एक ही अग्निदेवकी उपासना करो—'सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्संवनेनेन सर्वान् । देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायं प्रातः सौमनसो वोऽस्तु ।' ( ३ । ६ । ३० । ७ ) मैं तुम्हे एक कार्यके लिये एक चित्तसे सहोद्युक्त बनाता हूँ और एक प्रकार ही तुम्हारी व्याप्ति या मुक्ति हो। इस सांमनस्य वशीकरणसे मै तुम सबको वश करता हूँ । जैसे देवता एक मत होकर अजरामरत्व- प्रापक अमृतकी रक्षा करते हुए शोभनमनस्क होते हैं, वैसे ही आपलोग भी सदा शोभनमनस्क हों ।' कितनी उच्च और उदार कामनाएँ हैं । जो लोग अथर्ववेदको जादूगरी, टोनाटामरका पिटारा समझते हैं, उनका ध्यान क्या कभी इस ओर भी जाता है ? कुटुम्बियो एव कुटुम्बोके सौमनस्य, सामनस्यमें सारा राष्ट्र ही नहीं—सारा विश्व स्नेहपाशमें बँधकर एकमत होकर अपने अभीष्टको प्राप्त कर सकता है । सभा, सोसाइटियोंमें केवल प्रस्ताव पास करनेकी वीरता दिखलानेसे कुछ नहीं होता । मनुष्य कितनी ही दृष्टादृष्ट शक्तियोसे घिरा रहता है, सब बाते उसके वशकी नहीं । इसीलिये लौकिक प्रयत्नोंके साथ पारलौकिक प्रयत्नोकी भी आवश्यकता रहती है। सकल्पकी शक्ति बड़ी प्रबल होती है । उनका प्रभाव लौकिक स्थितियोपर भी पडता है । आज कुटुम्ब, राष्ट्र तथा विश्वमें विघटन-ही-विघटन है । 'अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग' सर्वत्र आज यही दिखलायी दे रहा है। जहाँ देखो, वहीं ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, कलह, संघर्षका साम्राज्य है । इनके प्रशमनके आधुनिक सभी उपाय विफल हो रहे हैं। आज वैज्ञानिक अनुसंधानोके पीछे लाखो रुपये उड़ते हैं। असफलता होनेपर भी कुछ नवीन बातोके अनुभव होनेका संतोष कर लिया जाता है । फिर क्यो न कभी कुछ दैवी प्रयत्न करके भी देख लिया जाय ? यदि हमसे कठिन अनुष्ठान नहीं होते तो क्या इतना भी नहीं बन पड़ता कि प्रतिदिन अपनी श्रद्धानुसार कुछ जप, भजन, प्रार्थना विश्वकल्याणार्थ करके देख ले कि उसका फल क्या होता है ? समाजवादमें लोकतन्त्र 'सोवियट कम्युनिज्म' ( रूसी साम्यवाद ) नामक पुस्तकमें फेबियन वेव दम्पतिने लिखा है कि 'जहाँ अमेरिका, ब्रिटेनमें ६० प्रतिशत जनता चुनावमें भाग लेती है, वहाँ सोवियट रूसमें ८० प्रतिशत जनता भाग लेती है । इस आधार- पर मार्क्सवादी सर्वहाराका अधिनायकत्व ही वास्तविक जनतन्त्र है । ब्रिटेन, अमेरिकाका जनतन्त्र तो ढोगमात्र है ।' परंतु दूसरी पार्टीको प्रेस, पत्र, प्रचार

वर्ग-संघर्ष २०० आदिका जहाँ अवकाश ही न हो, दूसरे दलको स्वतन्त्ररूपसे निर्वाचनमें भाग लेनेका अधिकार ही न हो, वहाँ अधिनायकके आदेशानुसार जनताको वोट देना ही पड़े, वहाँ अस्सी प्रतिशत ही क्या शत प्रतिशत वोट पड़ें तो भी क्या आश्चर्य है ? परन्तु क्या उसे स्वतन्त्र जनमत कहा जा सकता है ? वह तो केवल दूसरेकी आँखोंमें धूल झोंकनेके लिये शुद्ध नाटकमात्र है । कहा जाता है कि 'रूसमें मजदूर वर्गको छोड़कर दूसरा कोई वर्ग ही नहीं, अतः दूसरी पार्टीकी वहाँ आवश्यकता नहीं। पूँजीवादी राष्ट्रोंमें विभिन्न वर्ग हैं, अतः उन वर्गोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टियाँ वहाँ आवश्यक होती हैं। इसलिये रूसमें दूसरी पार्टियोंका न होना गुण ही है, दोष नहीं।' परन्तु दूसरा वर्ग है या नहीं, इसका पता तो तब चले, जब कि दूसरोंको मुँह खोलने दिया जाय। दूसरे लोगोंको लेखन, भाषण एवं प्रेस-पत्रकी, सम्पत्ति रखनेकी, निर्वाचन लड़नेकी स्वाधीनता मिल जाय—तभी मालूम हो सकता है कि लोग क्या चाहते हैं ? यों तो सभी पत्रोंद्वारा सरकारी मतको ही जनताका मत बतलाया जाता है । सरकारी मतके विपरीत मतको राष्ट्रविरोधी, जनविरोधी, मानवताविरोधी और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। जहाँ कुछ अंशोंमें भी विचार-स्वातन्त्र्य है, वहाँ तो समाजवादी-विचारधारावालोंमें भी पार्टीभेद होता है। जैसे भारतमें ही कम्युनिष्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, क्रान्तिकारी कम्युनिष्ट पार्टी आदिका भेद है। फिर यदि रूसमें मतभेद नहीं है, वर्गभेद नहीं है, तो प्रबल पुलिस एवं प्रबलतम गुप्तचर विभाग किसलिये है । श्रमिकोंका एकाधिपत्य मार्क्सका कहना है कि, 'श्रमजीवियोंके एकाधिपत्यके सिद्धान्तका जन्म- दाता वह स्वयं ही है। उसने १८५२ में अपने एक अमेरिकन मित्रको पत्रमें लिखा था कि वर्ग-कलहका सिद्धान्त यद्यपि पहलेसे ही हुआ था तथापि वर्गोंके अस्तित्वका सम्बन्ध भौतिक उत्पत्तिकी किसी विशेष अवस्थासे होता है और वर्ग- कलहका अन्तिम परिणाम श्रमजीवियोंका एकाधिपत्य स्थापित होना है। यह श्रमजीवियोंका एकाधिपत्य समस्त वर्गोंके लोप होने और एक स्वाधीनतामूलक समानाधिकारसम्पन्न समाजकी स्थापनाके लिये बीचकी सीढ़ी है। उन बातोंका आविष्कारक मैं ही हूँ।' उसने यह भी कहा है कि 'आरम्भमें नये कानूनोंद्वारा जायदादके अधिकार और पूँजीवादियोंके उत्पादनपर जबरदस्ती आक्रमण करना पड़ेगा। तत्पश्चात् सभी प्राचीन प्रणालियोंपर भी आक्रमण करना पड़ेगा।' पूर्वोक्त युक्तियोंसे सिद्ध है कि कम्युनिष्ट आन्दोलन शुद्ध द्वेष एवं ईर्ष्यापर ही अवलम्बित है। उसमें वास्तविकताका लेश भी नहीं है। इनके मतानुसार व्यष्टि लोकतन्त्र या लोककी इच्छाका भी कुछ मूल्य नहीं है। पूँजीपतियोंके विपरीत

३०० मार्क्सवाद और रामराज्य मजदूरतन्त्रकी स्थापना ही इन्हें मान्य है । सहिष्णुता, उदारता, असंकीर्णता, समष्टिलोककल्याणकी कल्पनाका भी इस वादमें कोई स्थान नहीं है। किंतु सभी आकाङ्क्षाएँ आदरणीय नहीं होतीं, वैध आकाङ्क्षाओंका ही समाजमे आदर होता है। किसीके भी सुन्दर भवन, कलत्र, मोटर आदिकी हथियानेकी आकाङ्क्षा शास्त्रीय, धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कारशून्य लोगोंको होती ही है। वैधमार्गसे कोई कोटिपति, अर्बुदपति, सर्वभूमिपति बननेकी आकाङ्क्षा और तदनुकूल प्रयत्न करने तथा सफलता पाने आदिमें किसीको कोई आपत्ति नहीं। पर अवैधमार्गसे वैसा प्रयत्न या आकाङ्क्षा सर्वथा अक्षम्य है। अवैध- मार्गसे कोई व्यक्ति या समूह साम्यवादी सरकारकी सम्पत्तिपर अधिकार करना चाहे तो क्या साम्यवादी सरकार ही उसे सहन करेगी। वस्तुतस्तु कम्युनिष्टोंकी कोई भी योजना या सिद्धान्त ऐसा नहीं है, जिसका औचित्य सर्वसम्मत युक्तिसे सिद्ध किया जा सके। अविप्रतिपन्न युक्तियोंसे विप्रतिपन्न वस्तुओंकी सिद्धि की जा सकती है; परंतु कम्युनिष्ट जब किसी भी पुराने सिद्धान्त, पुराने न्याय, पुराने सत्य या पुराने नियमको स्थिर नहीं मानते, तब वे किस सर्वसम्मत आधारपर अपनी बातोंको सिद्ध करेंगे। अद्वैतवादी वेदान्ती यद्यपि ब्रह्मातिरिक्त सभी वस्तुओंका पारमार्थिक बाध करते हैं, तथापि स्वपक्ष-साधन, परपक्ष-बाधनार्थ व्यावहारिक प्रमाण-प्रमेयादि सभी व्यवस्था मानते हैं। परंतु जो कम्युनिष्ट सत्य एवं न्यायको एकरस माननेको तैयार नहीं हैं, उनके औचित्यानौचित्य निर्णयका आधार ही क्या हो सकता है। यह कहा ही जा चुका है कि प्रत्यक्षानुमानागमादि प्रमाणोंके बिना किसी पदार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। इतिहास भी यदि किसी शिष्ट एवं सत्यवादी आप्तद्वारा लिखित होगा, तब तो वह आगमप्रमाण ही ठहरेगा, तद्भिन्न होनेसे सर्वथा प्रलाप ही होगा। इतिहासलेखकोंकी भी शिष्टता, सत्यवादिताका निर्णय किसी प्रमाणसे ही करना होगा। इसके अतिरिक्त अर्वाचीन, प्राचीन सत्यमें भी यदि भेद हो गया है तब प्राचीन सत्यवादियोंका आधुनिक सत्यके साथ सम्बन्ध भी क्या होगा। सिद्धान्तरूपसे यह भी कहा जा चुका है कि सत्त्वगुण एवं धर्मके संस्कार दृढ होनेसे ही समन्वय एवं सामञ्जस्यकी भावना सफल होती है। रजोगुण, तमोगुण बढनेसे अधर्म, असहिष्णुता आदिकी वृद्धि होती है। वर्गभेद, वर्गकलह ही क्यों, एक वर्गके भीतर भी वर्गभेद उत्पन्न हो जाता है और अन्तमे तो व्यक्ति-व्यक्तिमें भेद, संघर्ष एवं कलहका विकराल रूप प्रकट हो जाता है और फिर उनमें जो प्रबल होता है, उसका आधिपत्य होता है, जो हारता है वह पिसता है। अनेक बार साधनसम्पन्न साधनविहीनोंपर नियन्त्रण करते हैं, तो कई बार साधनविहीन साधनसम्पन्नोंको नष्ट करनेका प्रयत्न करते हैं। कभी-कभी सफल भी हो जाते

वर्ग-संघर्ष ३०१

हैं, अतः श्रेणी, चेतना तथा मजदूरोंका एकाधिपत्य आदि सिद्धान्त कोई महत्त्व नहीं रखते। वर्गभेद, वर्गकलह आदि सब प्रचारमूलक ही हैं। चार-पाँच धूर्तोंने एक बार एक ब्राह्मणसे, जो बकरा लिये जा रहा था, ले लेनेका निश्चय किया। फिर क्या था, एकने कहा—'पण्डितजी ! आप इस श्वानको कहाँ लिये जा रहे हैं।' ब्राह्मणने कहा, 'यह तो बकरा है।' धूर्तने कहा—'आपने कोई नशा खा लिया हैं क्या ! महाराज ! यह तो कुत्ता है।' ब्राह्मण कई प्रकारकी बातें सोचता चला जा रहा था, तबतक दूसरा धूर्त मिला। वह बोला, 'अरे महाराज ! कहाँ तो आप कुत्ता छूते भी न थे, आज न जाने क्यों, उसे कन्धोंपर ही चढ़ा लिया।' ब्राह्मण बोला, 'अरे भाई ! यह कुत्ता नहीं, बकरा है।' धूर्त बोला—'अरे ! आज आपके दिमागमें यह क्या हो गया है, जो कुत्तेको बकरा कह रहे हैं? क्रमशः तीसरे और चौथे धूर्तोंने भी इसी प्रकारकी बातें कहीं और ब्राह्मण सशंक होकर कुत्तेके भ्रममें बकरेको छोड़कर चलता बना। इसी प्रकार वर्गवादियोंके मिथ्या प्रचारसे वर्गभेद, वर्गकलहका सिद्धान्त भी फैलता जा रहा है। असलमें तो यह न कोई सिद्धान्त है और न इसका कोई आधार ही है। साथ ही समस्त वर्गोंका लोप करके मजदूरोंका एकाधिपत्य स्थापित करन तथा समानाधिकारसम्पन्न समाज स्थापित करनेकी जो बात करते हैं, उन्हें इस बातपर भी विचार करना चाहिये कि भले ही प्रचारकी महिमासे किसी वर्गके प्रति विद्वेष उत्पन्न करके, किसी समूहको उत्तेजित करके एक वर्गका विध्वंस होना सम्भव हो सकता है, पर विरोधीवर्ग समाप्त होते ही विजयीवर्गमें ही वर्गभेद उत्पन्न होते हैं । उदाहरणार्थ भारतीय कांग्रेसका अंग्रेजोंके साथ संघर्ष हुआ। संघर्ष समाप्त होनेपर स्वयं कांग्रेसमें ही फूट पड़ गयी। फलतः समाजवादी, प्रजासमाजवादी, नवीन समाजवादी, कम्युनिष्टपार्टी आदि अनेकों पार्टियाँ बन गयीं। रूसमें भी जारशाही समाप्त होते-न-होते कितनी ही पार्टियोंका जन्म हो गया। ट्राटत्स्की-जैसे लोगोंकी हत्या साधारण बात बन गयी। अधिकारारूढ दलद्वारा अनेक बार 'सफाया' किये जानेपर भी वहाँ तद्भिन्न वर्गका अभाव नहीं है, फिर केवल सामूहिक संघटन, हड़ताल, जुलूस या मार-काटके बलसे बहुत बड़े किसान आदि श्रेणीवर्गको समाप्त करना भी यदि उचित हो सकता है, तब तो शस्त्रबल, धनबल या छलछद्मके बलसे मजदूर-किसान वर्गको पद- दलित बनाये रखनेको भी उचित कहनेका कोई साहस कर ही सकता है। अन्यायको रोकना उचित ही है, वह चाहे गरीबोंका हो या अमीरोंका—अन्याय तो अन्याय ही ठहरा। गरीबोंका अन्याय भी न्याय है तथा अमीरोंका न्याय भी अन्याय है, यह बात सभ्य समाजमें नहीं चल सकती। गरीबोंपर होने

वाले अन्यायोंको रोकना परम धर्म है तो किसान आदि श्रेणीके लोग आज सर्वाधिक दयनीय हैं। पूँजीपति पूँजीसे काम चला लेता है, मजदूर आन्दोलनोंसे वेतन बढ़ाकर काम चला लेता है, परंतु किसान आदि साधारण श्रेणीका व्यक्ति दोनोंके बीचमें पड़ा हुआ पिसता है। देशमे गरीब, किसानो तथा नमक, तेल, कपड़ा, दाल, चावल आदिकी दुकानोंके द्वारा काम चलानेवाले व्यापारियोंकी संख्या बहुत बड़ी है। गरीबी भी उनकी भीषण है। अपनी उसी गरीबीमे उन्हें दान-पुण्य, श्राद्ध-तर्पण, शादी-ब्याह भी करना पड़ता है। फिर तो उस वर्गकी सहायता करना आवश्यक है। फिर ऐसे वर्गको मिटा देना कहाँतक उचित है? यो तो डाकू भी लूट-खसोटकर दूसरोको मिटाकर अपने गिरोहमें स्वाधीनतामूलक समानाधिकारसम्पन्न समूह बनाते ही हैं, परंतु क्या यह कभी उचित कहा जा सकता है। या उनकी समानता भी अन्ततक चलती है। धर्म-नियन्त्रित शासनतन्त्रमें सत्य या न्यायके आधारपर सबका ही हित करना अभीष्ट है। प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक वर्गको विकासकी सुविधा होती है। समष्टिके अविरोधेन, वैध मार्गसे विकसित होनेका सभीको अधिकार रहता है। विकासके मार्गमें होनेवाली असुविधा दूरकर विकासकी विविध सुविधाओंका उपस्थापन करना राज्यका कर्तव्य है। छीना-झपटी, लूट खसोटद्वारा समानताकी स्थापना व्यर्थ है। आलस्य, प्रमाद त्याग कर स्वयं पुरुषार्थ न कर, केवल छीना-झपटीद्वारा स्थापित समानता टिकाऊ नहीं हो सकती। विशेषतः गति- शील लोगोंका गन्तव्य स्थानपर पहुँचकर सम्पादित समानता ही वास्तविक समानता है। मार्गमें किसी जगह अग्रगामी, पृष्ठगामी लोगोंको रोककर स्थापित समानता निरर्थक होती है। इसमे तो उलटे राष्ट्रकी प्रगति ही रुक जाती है। निर्बल, निर्बुद्धि, निर्धनको बुद्धिमान्, बलवान्, धनवान् बनाकर ही समानताकी स्थापना की जा सकती है। बलवानो, धनवानो, बुद्धिमानोंको निर्धन, निर्बल एव निर्बुद्धि बनाकर समानताकी स्थापना वैसी ही है, जैसा कि आँखवालोंकी एक या दोनो आँखोंको फोड़कर एकाक्षों या अन्धोंके बराबर बनाकर समानताकी स्थापना करना। जैसे किसीकी आँख फोड़ना सरल है, पर अंधेको नेत्रवान् बनाना कठिन है, वैसे ही किसी धनीके धनको छीनकर निर्धन बनाना, बलवान्‌को फाका कराकर निर्बल बनाना, किसी बुद्धिमान्‌को मूर्खताकी इलाज खिलाकर या क्लोरोफार्म आदि सुँघाकर निर्बुद्धि बनाना सरल है, पर आलस्य-प्रमाद त्याग कर स्वतः प्रयत्नशील हुए बिना, बलवान्, बुद्धिमान्, धनवान् बना सकना या बने रहना सम्भव नहीं है। प्रमाद या आलस्यसे कोई समुन्नत नहीं होता। दूसरे लोगोंको भी उसी स्थितिमे बनाये रखनेके लिये प्रयत्नकी अपेक्षा यह कहीं श्रेष्ठ है कि प्रमाद,

आलस्य छुड़ाकर अनुन्नत लोगोंको उन्नत बनानेका प्रयत्न किया जाय। अतः वर्ग-लोप करके समानता स्थापनाकी बात व्यर्थ है । कम्युनिस्टोंका किसीकी जायदादपर बलात् आक्रमण तथा प्राचीन प्रणालियोंपर आक्रमण सिद्ध करता है कि लोकसिद्ध न्याय एवं सत्यके आधारपर वे अभीष्ट-सिद्धि नहीं कर सकते ।

कम्युनिस्टोंकी कूटनीति

'कम्युनिस्टोंके हाथ शासनसूत्र न जाकर प्रजातन्त्रवादियोंके हाथमें आने- पर' मार्क्सकी रायमें 'कम्युनिस्टोंको उससे अलग ही रहकर उनके कामोंमें अड़ंगा डालते रहना चाहिये । उनके सामने ऐसी शर्त पेश करनी चाहिये जिनका मानना असम्भव हो । क्रान्तिके अवसरपर श्रमजीवियोंको चाहिये कि मध्यम श्रेणीवालोंके साथ किसी प्रकारके समझौतेका विरोध करें । प्रजातन्त्र- वादियोंको अत्याचार करनेके लिये बाध्य कर दें । उनके अत्याचारोंका उदाहरण देकर लोगोंमें जोश बढ़ाना चाहिये । क्रान्तिके आरम्भ और मध्यमें प्रजातन्त्र- वादियोंके साथ अपनी माँग भी पेश करते रहना चाहिये । यदि प्रजातन्त्र- वादियोंको सफलता मिली तो श्रमजीवियोंकी सुरक्षाकी गारण्टी माँगनी चाहिये । अधिकाधिक सुधारों और अधिकारोंकी माँग करनी चाहिये । सरकारपर खुले आम अविश्वास प्रकट करना चाहिये, जिससे उनका विजयका गर्व ठंडा हो जाय । शासनके मुकाबले अपने मजदूर पञ्चायतोंकी स्थापना करनी चाहिये । शासनके सामने कई अड़चनें खड़ी होंगी और सम्पूर्ण मजदूर-शक्तिके साथ सरकारको लोहा लेना पड़ेगा । क्रान्तिके अनन्तर श्रमजीवियोंको पराजित शत्रु की निन्दा न करके पुराने साथी, प्रजातन्त्रवादियोंके प्रति अविश्वास प्रकट करें । श्रमजीवियोंको सशस्त्र और संघटित रहना चाहिये । इससे मजदूरोंका विश्वास जागरूक होता है। बन सके तो सरकारी सेना संघटनमें बाधा डाली जाय । यदि यह न हो सके तो अपनी सेना बनानी चाहिये । सेनापति, अफसर आदि ऐसे ही लोग हों जो मजदूर-कमेटीकी आज्ञा पालन कर सकें । सरकारी सेनाके भी सशस्त्र श्रमजीवियोंको अपने पक्षमें कर लेना चाहिये । मध्यम श्रेणीके प्रजातन्त्रवादियोंके प्रभावसे श्रमजीवियोंको मुक्त करना और उनका स्वतन्त्र सशस्त्र संघटन करना परमावश्यक होता है । तरह-तरहके अड़ंगे डालकर शासन चलाना असम्भव करना श्रमजीवियोंका प्रोग्राम होना चाहिये ।' उपर्युक्त कम्युनिस्ट-नीतिसे उनकी ईमानदारी एवं सद्भावनाका भंडा- फोड़ होता है । इससे स्पष्ट है कि कम्युनिस्ट अपने न्यायपूर्ण तर्क, युक्ति एवं सिद्धान्तोंके द्वारा लोकको प्रभावित कर बहुमत प्राप्त करनेकी आशा नहीं रखते । साथ ही जाल फरेब बिना किये अपने पुराने साथियों तथा उपकारियोंको गिरा

३०४ मार्क्सवाद और रामराज्य धोखा दिये, उनको बिना समाप्त किये भी सफलताकी आशा नहीं रखते । यह सामान्य न्याय है कि अत्याचार करनेवाला उतना अपराधी नहीं माना जाता, जितना कि अत्याचार करनेके लिये किसीको बाध्य करनेवाला। किसी सुशासनमें अड़ंगा डालना या उसके सामने ऐसी शर्तें उपस्थित करना जिनका मानना असम्भव हो, स्पष्ट ही बेईमानी है । यहाँ लोकहितकी तो कोई भावना ही नहीं है। केवल जिस किसी तरह शासनसत्ता हथियानेके लिये ही सब प्रकारका अत्याचार करना, बेईमानी अपनाना उन्हें मंजूर है । इसी तरह उत्तेजना फैलाकर उत्तेजित करके युद्ध कराना अलग बात है और उत्तेजित करके न्यायको अन्याय एवं उचितको अनुचित समझनेके लिये बाध्य करना अलग बात है। यह सर्वसम्मत है कि वस्तुस्थिति समझनेमें किसी प्रकारकी भावुकता या उत्तेजना बाधक होती है। इसी तरह मध्यम श्रेणीके लोगोंसे किसी प्रकारके समझौतेका विरोध करना भी विचित्र बात है। यदि उचित आधारपर समझौता सम्भव हो और समझौता लोक-कल्याणकारी हो, तो भी उसका विरोध क्यो करना ? क्या अपना उल्लू सीधा करनेके लिये ? यदि ऐसा ही तो फिर कम्युनिष्ट दूसरोंकी ऐसी भावनाओंका किस मुँहसे विरोध कर सकता है ? इसी तरह पुराने निन्दनीय साथियोंकी निन्दा न कर प्रशंसा करना वर्तमान योग्य एवं उचित शासनके प्रति अविश्वास प्रकट करना भी सद्भावनाका सूचक नहीं । कम्युनिष्टोंके प्रोग्रामोंको समझकर यदि शासनारूढ़ प्रजातन्त्रवादी भी उनके अनुसार ही सत्य, न्यायकी चिन्ता न कर बदला चुकानेपर उतर आये तो फिर कम्युनिष्ट तथा उनके छिट-फुट सैनिक संगठनको अन्त करनेमें कितना विलम्ब होगा ? बल्कि लोक हितकर तथा शास्त्रसम्मत तो यही है— यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिन् तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया वाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ (महा० शां० प० १०९ । ३०) मायवीके साथ मायासे तथा साधुके साथ साधुतासे व्यवहार करना उचित ही है। मार्क्स आगे कहता है—'प्रजातन्त्रवादियोको प्राचीन सामाजिक प्रणालीपर जितना हो आक्रमण करनेके लिये लाचार किया जाय, निश्चित कार्यक्रममें बाधा डाली जाय तथा पैदावार और माल ढोनेके साधनोको राज्यके अधिकारमें लानेका आग्रह किया जाय । निजी जायदादपर आक्रमण करनेवाले प्रस्तावोंको बार-बार लाना चाहिये । यदि सरकार रेलों, कारखानोंको खरीदनेका प्रस्ताव करे तो बिना हरजाना, बिना मुआवजा दिये ही उसे राज्यकी सम्पत्ति बना लेनेका प्रस्ताव होना चाहिये । सम्पत्ति-वृद्धिपर इतना बड़ा टैक्स लगानेका प्रस्ताव पेश होना चाहिये जिससे बड़ी जायदादवालोका दिवाला ही निकल जाय । प्रजातन्त्र-

वर्ग-संघर्ष ३०५ वादियोंद्वारा लाये गये राज्यके कर्ज चुकाने आदि प्रस्ताव आनेपर राज्यके दिवालिया होनेका प्रस्ताव लाना चाहिये। प्रजातन्त्रवादी स्थानीय, स्वाधीनता, स्वभाग्य-निर्णय आदिके नामपर देशको अनेक भागोंमें बाँटनेका प्रयत्न कर सकते हैं। श्रमजीवियोंको इन सब बातोंका विरोध कर संयुक्त शासनपर ही जोर देना चाहिये। उपर्युक्त मार्क्सीय कार्यक्रमोंके अनुसार ही कम्युनिष्टोंकी अड़ंगेबाजी चलती रहती है। उन्हें केवल विरोधके लिये विरोध करना है, अन्य किसी सार्व- जनिक हितकी दृष्टिसे नहीं। अनैतिकता तथा उच्छृङ्खलताका स्वयं विस्तार करना अथवा सरकारको वैसा करनेके लिये बाध्य करना घोर अराजकता एव उद्दण्डताका विस्तार करना है। व्यक्तिगत छोटे-बड़े किसी भी व्यापार या उद्योग-धन्धों, पैदावार या माल ढोनेवाले साधनोंका अपहरण चौर्य ही हो सकता है। कभी चोर भले बिना दण्ड पाये ही छूट जायें, परंतु ऐसे लोगोंको तो चोरसे भी उग्र दण्ड मिलना ही चाहिये। उत्पादन और समाज कम्युनिष्टोंकी प्रणालीके अनुसार "साधनोंपर समाजका अधिकार होनेसे सहयोगपूर्वक पैदावार तथा व्यावहारिक शिक्षाका विस्तार होगा। तभी हर व्यक्तिसे उसकी शक्तिके अनुसार काम लेने तथा उसकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु देनेका सिद्धान्त चल सकेगा। जबतक आर्थिक, सामाजिक, शिक्षा-सम्बन्धी प्राचीन प्रणाली कायम रहेगी, तबतक वैसी व्यवस्था नहीं हो सकती। तबतक जो जितना काम करेगा, उतना ही उसे फल दिया जायगा। केवल शासनका कारबार चलाने एवं शिक्षा तथा अन्य कार्योंके लिये कुछ अंश काट लिया जायगा। काम करनेके घंटे नियत होंगे। जो जितनी देर काम करेगा, उसको एक प्रमाणपत्र दिया जायगा, जिसे दिखाकर वह उतना सामान ले सकेगा। वह जितना श्रम करेगा, उतना ही वह दूसरे रूपमें पा जायगा। व्यक्तिमें समानरूपसे योग्यता और शक्ति नहीं होती, इसीलिये वस्तुओंका बँटवारा असमान रूपसे होगा। जब सर्वाङ्गपूर्ण कम्युनिष्ट समाजमें शारीरिक एवं बौद्धश्रमका अन्तर मिट जायगा, जब उत्पादन क्रिया ही जीवनका सर्वप्रधान आवश्यकता हो जायगी, जब व्यक्तियों एवं उत्पादक-शक्तियोंका पूर्णरूपसे विकास हो जायगा—समाजके सभी सदस्योंके पूर्ण सहयोगसे चीजोंकी पैदावार खूब बढ़ जायगी, तभी पूँजीवादी समाजका स्वत्वसम्बन्धी विचार त्यागा जा सकता है और उसके स्थानपर समानताका सिद्धान्त लाया जा सकता है। यद्यपि श्रमजीवी आन्दोलनका अन्तर्राष्ट्रीय होना आवश्यक है, तथापि राष्ट्रियताके आर्थिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक महत्त्वको भी भुलाया नहीं मा० रा० ६०—

जा सकता। साधनोंपर समाजका अधिकार होनेसे सहयोगपूर्वक पैदावार तथा व्यावहारिक शिक्षाका विस्तार होगा। तब हर व्यक्तिसे उसकी शक्तिके अनुसार काम लेने और उसकी आवश्यकतानुसार वस्तु देनेका सिद्धान्त चल सकेगा।' पर यह केवल व्यामोहक वाग्जाल है। व्यक्तिगत सम्पत्तियो तथा साधनोपर कुछ मुट्ठीभर लोगोंका अधिकार-सम्पादनके लिये ही समाजका नाम लिया जाता है। वस्तुतः व्यक्तियोंके समुदायका ही नाम तो समाज है। यदि व्यक्ति निर्धन, निःसत्त्व, निःसाधन हो जाते हैं तो समाज भी सुतरां निःसत्त्व, निःसाधन हो जाता है। हाँ, समाजके नामपर मुट्ठीभर लोगोंको यह अवसर अवश्य मिल जाता है कि वे संसारको धोखा दे सके। जो लोग सिवा मजदूरोंके बहुसंख्यक मध्यमश्रेणी तथा गरीब किसानोको भी मिटा देना आवश्यक समझते हैं, वे भी समानताकी बात करे तो 'किमाश्चर्यमतः परम् ।' कौन नहीं जानता कि मिलमालिकों, पूँजीपतियों एवं मजदूरों सबको भी भोजन-प्राप्ति किसानके श्रमका ही फल है। किसानके नष्ट हो जानेपर सभी भूखों मर जायेंगे। यन्त्रीकरण या राष्ट्रियकरणके नामपर सबकी समानताकी बात उपहासास्पद है। जैसे रोगियों- को मारकर राष्ट्रको निरोग करनेका फारमूला मूर्खतापूर्ण है, वैसे ही मजदूरोंसे भिन्न लोगोंको समाप्त कर समानताकी स्थापना भी मूर्खतापूर्ण मक्कारी है। अन्तमें मालिक बन जानेपर मजदूर भी मजदूर न रह जायँगे। उनमें भी वही विषमता परिलक्षित होने लगेगी। कौन कह सकता है कि रूसी प्रधान मन्त्री, गृहमन्त्री या पार्टीके संचालक मजदूर होते हैं और उनका जीवनस्तर पदप्राप्तिके बाद मजदूरोंके तुल्य ही होता है ? व्यक्तिको हानि-लाभका डर न होनेसे, पैदावार एव शिक्षामे उन्नति होना असम्भव है। प्रायः इसके उदाहरणके रूपमें रूसका नाम लिया जाता है। परन्तु वहाँकी वस्तुस्थिति कुछ और है, अतिरंजित वर्णन कुछ और ही। वहाँ भी व्यक्तिगत रुपयोंका कारखाना, सूद लेना गैर कानूनी नहीं है। प्रतियोगिताएँ भी चलती हैं। शक्ति एव योग्यता रहते हुए भी ईमानदारी न होनेसे उनका उचित प्रयोग नहीं किया जाता, अतः शक्तिचौर्य भी चलता है। चेतन मनुष्य, जडयन्त्रोंके तुल्य सर्वथा परेच्छया काम नहीं कर सकता। उसकी अपनी इच्छा, अपनी रुचि, अपना उत्साह जबतक न होगा, तबतक सुचारुरूपमें कार्य चलना सम्भव नहीं होता। मुट्ठीभर तानाशाहोंद्वारा सचालित शासन-यन्त्रके नगण्य कल-पुर्जे बनकर व्यक्तियोंमे इच्छा, रुचि, उत्साह आदिका सर्वथा अन्त हो जाता है। धर्म-नियन्त्रित शासन-तन्त्र रामराज्यमें, प्रत्येक व्यक्तिको अपनी शक्ति, एव योग्यताका विशिष्ट फल मिलता है। इसीलिये वह शक्ति एव योग्यतामें

वर्ग-संघर्ष ३०७ विशेषता लानेका यत्न भी करता है। वह अपनी कमाई अपनी पत्नी एवं पुत्र-पौत्रोंको छोड़ जाता है या अपने बूढ़े माँ-बापकी सेवामें लगा सकता है। अपना और अपने पूर्वजोंके नाम अमर करनेके लिये अनेक प्रकारका सामाजिक उपकारका काम करता है। यज्ञ, तप, दानके द्वारा अपना लोक-परलोक बनानेके लिये अपनी कमाईका उपयोग कर सकता है। इस दृष्टिमे उत्साहका और ही रूप रहता है। जो शुद्ध जडवादी, धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कारोंसे शून्य होते हैं, वे ही चार्वाकप्राय मार्क्सवादियोंकी योजनाओंमें सन्तुष्ट रह सकते हैं। वे ही कह सकते हैं— यावज्जीव सुखं जीवेद्ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ (सर्वदर्शनसंग्रह १) अर्थात् जबतक जीवन रहे सुखपूर्वक रहे, किसीको मार, धमका, कानून बनाकर उसका वित्त, कलत्र, गृहभूमि छीनकर सुरापान करना चाहिये । शरीर मरकर भस्म हो जायगा। लोक-परलोक—कुछ भी सत्य नहीं, फिर धर्माधर्मके चक्करमें क्यों पड़ा जाय ? कुरान, पुराण, वेद, वाइविल, गिर्जा, गुरुद्वारा, मन्दिर, मसजिद, राम, रहीम, गाड, अहुरमज्ड, दोजख, वहिश्त, स्वर्ग, नरक कुछ भी नहीं। फिर किसी भी नियन्त्रण, सदाचार, दान, पुण्यकी क्या आवश्यकता रह जाती है ? घण्टेकी आवाजपर सामाजिक या सामूहिक कल- कारखानों या सरकारी खेतोंमें काम करना, भोजनालयोंमें भोजन कर लेना, सरकारी औरतोंसे सरकारी बच्चे पैदा करना, सरकारी शिशु पोषणालयोंमें उन्हें भेज देना, सरकारी अस्पतालोंमे बीमार होकर मर जाना, ऐसे यान्त्रिक जीवनमें न तो कोई उल्लास है, न उत्साह । न तो इसमें लौकिक ही सुख है, न परलोककी ही आशा । ऐसा नीरस, निरुत्साह जीवन उन्हें कथमपि पसन्द न होगा, जो कुछ भी दीन या ईमान मानते हैं, जिन्हें कुरान-पुराणादि उपर्युक्त वस्तुओंपर तनिक भी विश्वास है, ऐसा निराशापूर्ण जीवन वे कथमपि नहीं पसन्द कर सकते । ऐसे दीनदार, ईमानदार लोगोंके लिये धर्मसापेक्ष, पक्षपातहीन राज्य, रामराज्य ही श्रेष्ठ है, जहाँ लोक-परलोक सभी आशापूर्ण एव उत्साहप्रद होते हैं। इसी प्रकार आवश्यकताका भी निर्णय भोक्ता ही करे या सरकार ? यह स्पष्ट है कि सरकारद्वारा भोक्ताके आन्तरिक आवश्यकताका ध्यान रखे बिना किया हुआ निर्णय संतोषकारक नहीं होगा । भोक्ताओंकी दृष्टिसे ही यदि आवश्यकताका निर्णय होगा, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी शक्ति और आवश्यकताका संतुलन रहेगा। शक्ति एव योग्यता कम होनेपर भी, काम न करनेपर भी आवश्यकता अधिक हो सकती है। फिर राज्य उसकी पूर्ति कैसे कर सकेगा ? 'काम करनेमे आलसी भोजनको होशियार ।' 'अलसः स्यात्

३०८ मार्क्सवाद और रामराज्य कामाश्च ।' आलसी किंतु अच्छे भोजन-वस्त्र, वाहन, मकानकी कामनावाले लोगोकी कमी किसी देशमें नहीं है । पर यह सम्भव नहीं । अतः— कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करै सो तस फल चाखा ॥ यह भारतीय सिद्धान्त ही श्रेष्ठ है। जो जैसा करता है, वैसा ही फल पाता है । विश्वस्रष्टा परमेश्वर एवं विश्वहितैषी निष्काम महर्षियो या उनके भी सम्मान्य अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंद्वारा ही कर्मफलका साध्य-साधनभाव जानना ठीक है । पारलौकिक कर्मों एव फलोंका साध्य-साधनभाव जिस प्रकार शास्त्रों एव शिष्टोद्वारा जाना जाता है, वैसे ही शास्त्रो एवं शिष्टोके आधारपर ही लौकिक कर्मों एवं उनके फलोंका भी साध्य साधनभाव निर्णीत होना श्रेष्ठ है । कम-से-कम निर्धारित, संतुलित जीवनस्तर एवं तदनुसार ही काम-दामके अतिरिक्त कर्मोंकी विशेषताके अनुसार ही फलोंमें विशेषताकी बात उपयुक्त होती है । इस पक्षमें आवश्यकताके अनुसार फलाकाङ्क्षा होगी । फलाकाङ्क्षाके अनुसार कर्ममें प्रवृत्ति होगी । परंतु शक्ति एवं योग्यता वहाँ नियामिका होगी । अतः शक्ति एवं योग्यतानुसार ही प्राणी कर्म कर सकेगा । तदनुसार ही फल पा सकेगा । अतः तदनुसार ही आवश्यकता भी बनानेका प्रयत्न करेगा । आवश्यकताका घटाना-बढ़ाना जितना सम्भव हो सकता है, शक्तिका घटाना-बढ़ाना उतना आसान नहीं है । फिर प्रतिदिन मजदूरी करना, सर्टिफिकेट दिखाकर भोजन लेना, यह कोई सम्मानकी बात नही । जब बँटवारेमें असमानता स्वीकार है, तो फिर समानताकी बात केवल प्रलोभन नहीं तो और क्या है ? फिर वहाँ भी ईमानदारीका प्रश्न खडा हो सकता है । अगर व्यवस्थापक ईमानदार हो तब तो ईमानदारीसे कर्मोनुसार वितरण कर सकेगा । यह भी तभी सम्भव है जब कि व्यक्तिके ईमानदारीपर विश्वास भी हो । पर यदि ऐसा विश्वास सम्भव ही है तब तो व्यक्तिगत काम लेनेवाला भी ईमानदारीसे फल वितरण कर सकता है। यदि व्यक्तयोंकी ईमानदारीका विश्वास नहीं हो सकता तो व्यवस्थापकोंकी ईमानदारीपर भी कैसे विश्वास होगा ? जो कहते हैं कि 'बेईमान व्यवस्थापक हटा दिया जायगा,' वह भी ठीक नहीं; क्योकि सभी शक्तियोके केन्द्रीकरण हो जानेसे, व्यक्तियोके पास व्यवस्थापकोंको हटानेकी कोई शक्ति नहीं रहती । सभी कम्युनिष्ट कभी समानरूपसे बौद्धिक, शारीरिक क्षमतायुक्त हो सकें तो उनका अन्तर मिट सकेगा । सभी समानरूपसे ईमानदार हो जायें, शक्तिभर काम करें और अनिवार्य आवश्यकतासे कोई अधिक दाम या सामान न ले, यह

सुख-स्वप्न जड़वादियोंकी अपेक्षा अध्यात्मवादियोंके यहाँ कहीं अधिक सफल होता है। रामराज्यमें तो इस तरहके स्वप्न साकार भी हो चुके हैं— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥ नाधिव्याधिजराग्लानिदुःखशोकमयभ्रमाः । मृत्युश्चानिच्छतां चासीद् रामे राजन्यधोक्षजे ॥ (श्रीमद्भा० ९।१०।५४) न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नायज्वा न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥ (छान्दोग्योप० ५।११।५) फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। चरहिं एक सँग गज पंचानन ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ जहाँ कोई किसीका शोषक न हो, दूसरेके पोषक तथा हितैषी ही हों, सभी सुखी, सम्पन्न, स्वधर्मनिष्ठ, ईश्वरपरायण, शिक्षित उदार हों, जहाँ कोई चोर, सुरापी, कायर, स्वैरी, स्वैरिणी न हो, सभी आहिताग्नि, यज्वा, स्वधर्मनिष्ठ हों, ऐसा शासनतन्त्र तो अध्यात्मवादमें ही सम्भव होता है। जड़वादमें तो इस सुखके पूरा होनेका स्वप्न दुराशामात्र ही है। शासनके कारोबारको चलानेके लिये तथा शिक्षा एवं अन्य कार्योंके लिये कोई भी सभ्य शासन कुछ अंश ही काटता है। अंग्रेज भारतपर शासन करते थे, वे भी आमदनी तथा खर्चका लेखा-जोखा बराबर दिखाते रहते थे। पर आजकल शासन, राष्ट्ररक्षणके नामपर, कितने गुप्तचर, पुलिस, पलटन एवं शस्त्रास्त्र अपेक्षित होते हैं, यह विज्ञोंसे तिरोहित नहीं है। प्राचीन भारतीय ढंगके धर्मनियन्त्रित शासनोंमें तो नियम यह था कि जैसे सूर्य तिग्मरश्मियोंसे पृथ्वीका जल खींचते हैं और समय आते ही उसे बरसाकर विश्व-कल्याण एवं रक्षण करते हैं, वैसे ही शासक भी प्रजाका कर उसके कुसमयमें वितरण कर देता था, उसे अपने उपभोगमें वह नहीं लाता था। कितने मुसल्मान बादशाह भी अपना निर्वाह टोपी सीकर, कुरान लिखकर, किताबें लिखकर, उन्हें बेंचकर कर लेते थे। ऐसे ही दूसरे राजा भी अपनी जीवन-यात्रा चलाते रहे हैं। यदि लाखोंका सालाना वेतन पानेवाले भी शोषित हैं और उनका राज्य भी कल्याणकारी राज्य है, तो फिर जमींदारोंका ही राज्य क्या बुरा है ? व्यावहारिक अनुभव तो यह है कि सूर्य भी उतना तापक नहीं होता जितना तत्सङ्घृष्ट वालुका- निकर (कण) तापक होता है। कहा जाता है मजदूरोंको भूखे मरते हुए लाचारीसे अल्प मूल्यमे बहुत काम करना पड़ता है, परंतु उसी तरह किसी अवसरपर मजदूर भी अवसरका अनुचित लाभ उठाते ही हैं। रिक्शे, ताँगे तथा नाववाले कभी-कभी चार आनेके बदले

३१० मार्क्सवाद और रामराज्य आठ रुपये ले लेते हैं । किसी गरीबका लडका बीमार है, अस्पताल जाना है, यदि मौके-बेमौके अन्य रिक्शे आदि तैयार नहीं तो वह बिना रहम किये गरीबसे मनमाना पैसा लेता है । लाचार होकर गरीबको देना ही पडता है । ऐसे अवसरसे डाक्टर, इजीनियर—सभी नाजायज फायदा उठाते हैं । इसी तरह टूटते हुए बाँध, वर्षाके समय गिरते हुए मकान, अचानक बिगड़े हुए कारखानोंको सुधारनेके लिये श्रमजीवी मनमानी दाम लेते हैं । मार्गमें बिगड़ी हुई मोटरको सुधारनेमें अति शीघ्र सुधारनेकी आवश्यकता जानकर श्रमजीवी मनमाना दाम लेता है । कुम्भादिके अवसरपर मल्लाह दो पैसेके बदले गरीबों, धर्म-भीरुओंसे बीस-बीस ले लेते हैं । फिर कम्युनिष्ट इनको शोषित ही कहेगे और उनके इन कार्योंको उचित ही । इतना ही क्यों ? वे चोरी और हत्या-जैसी चीजको भी उनकी गरीबी और लाचारीकी दुहाई देकर उचित कहनेका प्रयत्न करते हैं, फिर तो किसीके बलात्कार व्यभिचारका भी यह कहकर समर्थन किया जा सकता है कि उसके पास स्त्री नहीं थी, कामातुर होकर उसने लाचारीसे बलात्कार किया है । वस्तुतः सर्व- मान्य परम्परा-सिद्ध किसी भी शास्त्रीय नियमको मानकर कम्युनिष्ट अपने किसी भी सिद्धान्तको सिद्ध नहीं कर सकता । इसीलिये वह प्राचीन नियमोंका समूल परिवर्तन चाहता है । पुराने सत्य, न्याय, सिद्धान्त, नियम—सबका ही परिवर्तन चाहता है। यद्यपि यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीजकी बहुलता हो और माँग कम हो वह सस्ती हो जाती है, जिसकी माँग बहुत और मात्रा कम हो वह महँगी हो जाती है । यही स्थिति श्रम एवं मजदूरीके सम्बन्धमें भी लागू होती है, तथापि राज्यके द्वारा समय-समयपर जैसे योग्यता, आवश्यकता एवं उत्पादनके अनुसार काम, दाम, आरामका एक स्तर निर्धारण करना आवश्यक होता है, वैसे ही मजदूरीका भी एक स्तर निर्धारण करना पड़ता है । सस्ती, मन्दीके भावोंपर भी नियन्त्रण करना पड़ता है । अन्यथा आन्दोलनोंसे मजदूर वेतन बढ़ायेगा, पूँजीपति दाम बढायेगा । फिर किसानको कपड़े आदिके लिये ज्यादा पैसा चाहिये । अतः वह गेहूँ, चावल आदिका भी दाम बढायेगा । तब मजदूरका वह बढ़ा हुआ वेतन इसी आटा, दाल, चावल, कपड़ा खरीदनेमें खतम हो जायगा और फिर वेतन बढ़ानेका आन्दोलन करेगा । फिर महँगी बढ़ेगी, वितरण अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन करके भारतीय शास्त्रोंमें यद्यपि राष्ट्र- हितार्थ उसका विनियोग बतलाया है, फिर भी अतिरिक्त आयको अवैध या अनुचित नहीं कहा जा सकता । कोई भी उद्योग यदि लागत खर्च, सरकारी टैक्सभरके लिये ही आमदनी पैदा करता है तो उससे उद्योगपतिका जीवन भी चलाना कठिन होगा और बड़ी-बड़ी मशीनोंके खरीदने आदिका काम भी न

? Wait, if it's attached under the same shirorekha, it's व्यापारियोंगorव्यापारियोंक! Wait, let's look at व्यापारियों: Is it attached? Yes, the shirorekha continues over that letter. Wait, what if the letter is NOT , but काconnected without space? In Hindi, postpositions likeकाare often written joined:व्यापारियोंका! Look at line 1: आयका Line 2:मशीनोंको, अन्वेषकोंको, आदिका Line 4:नुकसानका, आदिका Line 5:लाभके Line 6:आदिके Line 7:बारीमें, आदिमें, खर्चसे Line 8:श्रमका Line 9:विशेषताके Line 11:सम्पत्तिका Line 13:मालमें Line 14:भोजनका Line 15:मनुष्यकी Line 17:कार्यका Line 18:जन्मके Line 19:दुष्कृतके, गर्दभमें Line 21:मार्क्सके