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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

( ६ ) यदि आदिसे अन्ततक किसीने यह पुस्तक सावधानी तथा धैर्यपूर्वक पढ़ी, तो उसे ( आधुनिक वादोंसे प्रच्छन्न ) सत्यका प्रकाश अवश्य मिलेगा । सत्यके अन्वेषक इस पुस्तकके लिये श्रीस्वामीजी महाराजके सदा ऋणी रहेंगे । अस्तु ! गीताप्रेसके संचालकोंने प्रेसमें कार्याधिक्य रहनेपर भी समय निकालकर जल्दीसे यह पुस्तक छापकर वस्तुतः बड़ा ही प्रशंसनीय कार्य किया है । गङ्गातरङ्ग, नगवा, \Bigg} काशी \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad गङ्गाशङ्कर मिश्र महाशिवरात्रि २०१४ वि० \Bigg}

आमुख

नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै । नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्रार्कमरुद्गणेभ्यः ॥ ( वाल्मी० सु० १३ । ६० ) आजकल संसारमे दर्शन तथा राजनीतिकी बड़ी चर्चा है, उसमें भी पाश्चात्योंके दर्शन तथा नीतिकी तो बहुत ज्यादा । भारतीय जनताका भी इन दिनो जड विज्ञानके प्रभावसे उधर कम आकर्षण नहीं है। अपनी बात तो हम भूल ही गये । बहुतोंका तो यह अनुमान है कि भारतमे पहले कोई राजनीति-शास्त्र था ही नही । ऐसी दशामें एक ऐसी पुस्तककी बड़ी आवश्यकता थी, जिसमें एक ही साथ पाश्चात्त्य दर्शन, राजनीतिके साथ भारतीय-दर्शनों तथा राजनीतिका तुलनात्मक अध्ययन हो और मूल्य भी कम हो। पाश्चात्योंके दर्शन एवं नीति आदि ग्रन्थ स्वतन्त्र है, साथ ही उनका मूल्य भी अत्यधिक है, जिससे कोई साधारण व्यक्ति उन सबोंको प्राप्त नहीं कर पाता । हमारे सौभाग्यसे परमाराध्य अनन्त श्रीस्वामीजी श्रीकरपात्रीजी महाराजने बड़े अध्यवसायसे कृपापूर्वक यह पुस्तक लिख दी, जो आज पाठकों- के सामने है। इसमें पाश्चात्त्य दार्शनिकों एवं राजनीतिज्ञोंकी जीवनी, उनका समय मत-निरूपण, फिर उनकी आलोचना तथा साथ ही अपने ऋषियोंके मतका तुलनात्मक अध्ययन एवं उनकी श्रेष्ठता प्रतिपादित की है । विकासवादके अध्यायमें तो अद्भुत युक्ति तथा अगणित वैज्ञानिकोके मत द्वारा ही विकासका खण्डन एवं ईश्वरादिका मण्डन है।

( ७ ) साम्यवाद ( जिसकी आज सर्वाधिक चर्चा है ) के आचार्य मार्क्सके नामपर तो यह पुस्तक ही है। उसके प्रत्येक अङ्गपर इसके पृथक् पृथक् अध्याय हैं, जिनमें उनकी पोल खोलकर तर्कद्वारा ही उनकी धज्जी उड़ायी गयी है। साथ ही अपने गूढ़तम अकाट्य न्याय तथा वेद-वेदान्तके सिद्धान्तोंको भी विस्तारपूर्वक समझाया गया है। अन्तमें संक्षिप्त प्राचीन भारतीय निर्दोष शासन प्रणाली भी दे दी गयी है। शीघ्रताके कारण पुस्तकमें आये हुए व्यक्तियो तथा पारिभाषिक शब्दोंकी वर्णानुक्रम-सूची नहीं बन पायी। विषय-सूचीसे केवल थोड़ेसे नाम हैं। पाश्चात्योंका मत उद्धरणचिह्न ( “ ” या ‘ ’ ) मे रखा गया है। इसके बाद तुरंत ही भारतीय मत रखा गया है। पाश्चात्य ग्रन्थोंका उल्लेख पृष्ठोंमें न हो सका, उसकी सूची अन्तमें दे दी गयी है। अपने ग्रन्थोंका उल्लेख यथास्थान पुस्तकके पृष्ठोमे ही है। इसी तरह इस एक ही पुस्तकमें इतनी अधिक सामग्री आ गयी है कि उसे दर्शन तथा राजनीतिका 'विश्वकोष' कहना भी अनुपयुक्त न होगा। डिमाई साइजके ८०० से भी अधिक पृष्ठोमे ( छोटे तथा घने अक्षरोंमें ) सार-सार बातोंका संग्रह है। यह सब देखते हुए इसका मूल्य कम ही है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं धर्मके साक्षात् विग्रह श्री- स्वामीजी महाराजकी कृपा तथा गीताप्रेसकी तत्परता देखकर ऐसा लगता है कि इस कार्यके भीतर परम मङ्गलमय परमात्माकी ही शुभ प्रेरणा है। इसके अनुशीलनमें जो मेरा समय लगा, वह भी भगवत्कृपाका ही परिणाम है। मेरा विश्वास है कि जो सज्जन इसे एक बार ध्यानसे पढ़ लेंगे, वे तामस अविवेकके क्लेशसे मुक्त होकर सात्त्विक ज्ञान तथा हृत्प्रसादको निश्चय प्राप्त करेंगे, दर्शन एवं राजनीतिका निर्मल ज्ञान तो उन्हे प्राप्त होगा ही। द्वितीय संस्करणका निवेदन पहला संस्करण छपनेके बाद तुरंत ही समाप्त हो गया। तबसे इसके दूसरे संस्करणकी माँग बराबर आती रही। पर एक बड़ी मशीनके टूट जाने तथा कुछ पुर्जोंके मार्गमें ही खो जानेसे दूसरी एक नयी मशीनके व्यर्थ पड़े रहनेसे प्रकाशनमे देर होती रही। अन्तमें ग्राहकोंके तीव्र आग्रहसे यह दूसरा संस्करण जैसे-तैसे तैयार किया गया है। इस बार बौद्धदर्शनके बहुतसे नये पृष्ठ जोड़े गये हैं, फिर भी मूल्य वही रखा गया है। इस पुस्तककी राहुलजीने एक छोटी-सी आलोचना लिखी थी। पर उससे तत्त्वकी कोई बात न थी,

( ८ ) केवल बाहरी आक्षेप थे। पुस्तकके किसी अंशपर कुछ न लिखकर स्वामीजीके लेखन आदिपर ही संदेह किया गया था। अतः उसका उत्तर इसमें न देकर महाराजजीने उसे अलगसे ही प्रकाशित करना उचित समझा। वह धर्मसंघ, दुर्गाकुण्ड, काशीके पतेपर मिल सकती है। 'कल्याण' सम्पादन-विभाग } गीता-वाटिका, गोरखपुर } जानकीनाथ शर्मा कुछ समाचार-पत्रोंकी सम्मतियाँ 'नवभारत टाइम्स' दिल्ली, बंबई [ १४ दिसम्बर १९५८ ]— भौतिकवादकी प्रचण्ड आँधीने समस्त संसारकी चिन्तनधाराको झकझोर दिया है। आज संसारकी लगभग आधी आबादी मार्क्सवादसे प्रेरणा लेकर अपने-अपने ढंगपर आर्थिक उन्नयनके लिये प्रयत्नशील है। भारत भी इस हवासे अछूता नहीं है। पर यहाँकी दार्शनिक एव सांस्कृतिक परंपराओंको लाँघकर कोई भी वाद इस देशमें पनप नहीं सकता। ऐसा क्यो नहीं होगा और क्यों नही होना चाहिये, इसी वस्तुको स्पष्ट करनेके लिये स्वामी श्रीकरपात्रीजीकी यह रचना है। प्रस्तुत ग्रन्थमे न केवल मार्क्स, बल्कि तमाम पश्चिमी राजनीति-शास्त्रों- का गम्भीर विश्लेषणद्वारा खण्डन किया गया है। वस्तुतः यह एक अनुपम ग्रन्थ है। युगधर्म—( नागपुर, जबलपुर ) हर व्यक्तिके लिये पुस्तक संग्रहणीय है। हिंदी इस रचनाके लिये चिर ऋणी रहेगी। भारतीय कम्युनिस्ट ही नहीं, सभी प्रगतिशील इस पुस्तकसे वह भाषा और विचार सीख सकते हैं जो आज भारतकी 'प्रगति'के नामवाली वास्तविक 'दुर्गति' के पाशसे मुक्त करनेके लिये परमावश्यक है। 'वेंकटेश्वर समाचार,' बबई—विद्वान् लेखकका यह महान् प्रयास अभिनन्दनीय एवं प्रशंसनीय है। भारतके वर्त्तमान सभी राजनीतिक दलोंके कार्यकर्त्ताओं तथा पाश्चात्त्य दर्शनोंके प्रशंसकोंको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये। पूज्य स्वामीजी महाराजका यह महान् प्रयास समाज और राष्ट्रके लिये परम कल्याणकारक है। इसी प्रकार 'भारत, आर्यावर्त्त,' कान्ति (रामपुर मई १९५९) आदिने प्रशंसा की है।

ॐ श्रीहरिः ॐ विषय-सूची विषय पृष्ठ-संख्या १- पाश्चात्त्य-दर्शन १-३६ दर्शनकी परिभाषा १ यूनानी दर्शन .. ८ अन्य पाश्चात्त्य-दर्शन .. १३ हेगेल-दर्शन . २६ मार्क्स-दर्शन . ३० २ पाश्चात्त्य राजनीति ३७-१२९ यूनानका राज्यदर्शन .. ३७ प्लेटो ( अफलातून ) . ३८ अरस्तू . ३९ मध्ययुग ४२ आल्थूसियस ... ४४ ग्रोगस ४४ आधुनिक विचारधारा ४६ राज्यका जन्म और सामाजिक अनुबन्ध . ४६ थामस हॉब्स ४७ जान लॉक ५३ रूसोके विचार ५७ महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ६५ व्यक्तिवाद ७२ उपयोगितावाद .. ७७ वैयक्तिक स्वतन्त्रता ८२ एकसत्तावाद ९१ आदर्शवाद ९७ जनवादी राजसत्ता .. १०० क्रान्ट . १०३ फिक्टे .. १०५ विषय पृष्ठ-संख्या हीगेल १०७ बोदाँ . १०७ टी० एच्० ग्रीन . ११० एफ्० एच्० ब्रैडले . ११३ मार्क्सवाद . ११५ कार्लमार्क्स . ११५ समष्टिवाद .. ११९ सङ्घवाद .. १२१ बहुलवाद . १२२ फेबीवाद ... १२३ जनवाद .. १२४ अराजकतावाद ... १२८ ३. विकासवाद १३०-२३१ डार्विनका मत १३० स्पेन्सरकी मीमांसा १३४ जातिविज्ञान ... १५३ लुप्त जन्तु १६८ गर्भशास्त्र . १७० सन्धियोनियां .. १८३ प्राकृतिक चुनाव ... १८४ कृत्रिम चुनाव ... १९२ मनुष्यजाति . १९६ मानवसृष्टिका मूलस्थान .. १९९ भाषा-विज्ञान .. २०४ जड या चेतन ? ... २१२ विकासवाद और जाति . २१७ कर्मविपाक और विकासवाद २२३ ४. मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २३२-२४७ एञ्जिल्सका प्रकृतिसम्बन्धी द्वन्द्ववाद ... २४० ख—

( १० ) विषय पृष्ट संख्या ५. वर्ग-संघर्ष २४८-३१६ सापेक्ष और शाश्वत नियम २४८ व्यक्तिगत सम्पत्ति ... २४८ शाश्वत नियम .. २५० शोषक-शोषित ... २५२ आर्थिक असंतुलन . २६१ उत्पादन और नियम . २६४ वर्ग-विद्वेष .. २६७ वास्तविक पूँजीवाद .. २७९ श्रेणीभेदका आधार .. २८२ संगठनकी कुंजी ... २९४ राष्ट्रका वर्गीकरण २९६ समाजवादमें लोकतन्त्र .. २९८ श्रमिकोंका एकाधिपत्य . २९९ कम्युनिस्टोंकी कूटनीति . ३०३ उत्पादन और समाज ... ३०५ वितरण ... ३१० लाभ और श्रमिक .. ३११ ६. मार्क्सीय अर्थव्यवस्था ३१७-४२२ मूल्यका आधार ... ३१७ मूल्य और श्रम .. ३२१ मजदूरी ... ३२२ अतिरिक्त लाभ ... ३२४ उपयोगी वस्तु और सौदे- की वस्तु ... ३३० लाभ या मुनाफा .. ३३१ अतिरिक्त श्रम और मुनाफा ३३५ अतिरिक्त मूल्य और शोषण ३३८ श्रम और मुनाफा ... ३४४ पूँजी और श्रम ... ३५१ अतिरिक्त आय और अन्त- विरोध ... ३५७ विषय पृष्ठ-संख्या सर्वहारा और क्रान्ति ... ३५८ पूँजीवाद और कृषि ... ३६२ व्यक्तिगत वैध भूमि ... ३६६ भूमि-कर ... ३६८ कृषकका अतिरिक्त श्रम और भूमिकर .. ३७६ बडे परिमाणमे खेती ... ३७८ आर्थिक संकट ... ३८१ सामाजिक संकट . ३८९ समाजवादी सब्जबाग ... ३९४ मार्क्सवाद एवं राष्ट्र ... ४०१ मार्क्सवाद एवं युद्ध ... ४०३ अन्ताराष्ट्रिय क्षेत्रमे पूँजीवाद ४०६ पूँजीवादी साम्राज्यवाद .. ४११ अशान्तिकी जड-आर्थिक विषमता ... ४१४ ७. ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२३-४५८ इतिहास क्या है ? .. ४२३ इतिहासकी मार्क्सीय व्याख्या ४२५ भौतिकवादी व्याख्या ... ४२७ उत्पादन-शक्तियाँ और नियम ४२९ मार्क्स एव इतिहास . ४३८ परिवर्तनके कारण .. ४४१ इतिहास और व्यक्ति . ४४६ राष्ट्रियताका भाव ... ४४८ इतिहासका वर्ण्य विषय . ४५४ ८. मार्क्स दर्शन ४५९-५६८ वैज्ञानिक द्वन्द्ववाद .. ४६१ पूँजीका स्वरूप ... ४८२ प्रतिषेधका प्रतिषेध ... ४८३ ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद .. ४९२ अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वन्याय ५१३

( १२ ) विषय पृष्ठ-संख्या अन्तर्विरोधपर मुखाग्नि ... ५३४ गुण-परिवर्तन ... ५३७ ज्ञानका मूल .. ५४३ सामाजिक व्यवस्था .. ५४७ पाप-पुण्य और शोषण ५४९ समाज-विकासकी कुंजी . ५५० श्रेणी और वृत्ति .. ५५४ धर्म और अर्थ .. ५५६ उत्पत्तिके साधन और न्याय ५६० मार्क्स और धर्म .. ५६३ ९. मार्क्सीय समाज- व्यवस्था ५६९-६१० पूँजीवादी युग और स्त्री ... ५७१ पातिव्रत धर्म . ५७३ अर्थमूलक समाजमें सामाजिक सम्बन्ध .. ५७७ वर्गवाद .. ५७९ व्यभिचारका उन्मूलन . ५८३ भूत और शक्ति . ५८५ क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है ? ५८६ द्वन्द्वन्याय और अन्तिम सत्य ५९१ कान्टका ज्ञानसिद्धान्त .. ५९७ व्यवहार और तथ्य . ६०१ द्वन्द्वन्याय और विकास .. ६०७ १०. मार्क्स और ज्ञान ६११-६८२ मार्क्सीय मन या ज्ञानपर विचार ६११ विषय पृष्ठ-संख्या आदर्शवाद ... ६१२ विज्ञान एवं समाजवाद ६१४ सत्य ... ६१४ ज्ञानका मूल .. ६१५ विकास ... ६१७ आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता ६१७ स्वतन्त्रताका अवबोध ... ६१८ भारतीय दर्शनमें ज्ञान- सिद्धान्त .. ६१९ अनुभव और आत्मा .. ६४० अनुभव-विमर्श ... ६५१ ज्ञान और आनन्द ... ६७० मूल वस्तु या चेतना ? ... ६७६ आत्मा एवं भूत ... ६८० ११. मार्क्स और आत्मा ६८३-८०३ आत्मतत्त्व-विमर्श ... ७१० स्मृति और प्रमामें पार्थक्य ७६१ अहमर्थ और आत्मा .. ७८० १२. मार्क्स और ईश्वर ८०४-८२५ ईश्वरके सम्बन्धमें भारतीय दर्शनोंके आधारपर मार्क्स- वादियोंके विचार ८२० १३. उपसंहार ८२६-८४५ भारतीय राजनीतिक दर्शन ८२६ शास्त्रीय शासन-विधान .. ८२८ राजनीतिमें किसका अधिकार ? ८३१ सत्पुरुषोंसे एक निवेदन . ८४४

सहायक पुस्तकोंकी सूची लेखक पुस्तकका नाम प्रकाशन-संस्था १ मार्क्स— कैपिटल ( मराठी अनुवाद ) पीपुल्स-पब्लिशिग्स् हाउस -बम्बई ४ २ ,, भारत-सम्बन्धी लेख ,, ,, ३ स्टालिन लेनिनवाद ,, ,, ४ ,, ऐतिहासिक भौतिकवाद ,, ,, ५ ,, अराजकतावाद या समाजवाद ,, ,, ६ ,, अक्टूबरकी क्रान्ति और कम्युनिस्टोकी कार्यनीति ,, ७ ,, मार्क्सवाद और जातियोका प्रश्न ( अनुवादक—ओमप्रकाश ) ,, ८ ,, लेनिनवादकी समस्याएँ पी० प० हा० बंबई ९ ,, मार्क्सवाद और भाषा शास्त्र ,, ,, १० ,, कम्युनिस्टपार्टीका इतिहास (अनु०-रामविलास शर्मा) ,, ११ ,, कम्युनिस्टपार्टीका घोषणापत्र ... ... ,, १२ फ्रेड्रिक एंजिल्स समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक ... ,, १३ ,, परिवार, व्यक्ति, सम्पत्ति और राजसत्ताकी उत्पत्ति ... ,, १४ ,, कार्लमार्क्स और उनके सिद्धान्त (अनु०-रामबालक शर्मा),, १५ ,, मार्क्सवाद क्या है ? ( अनु०-ओमप्रकाश ) ,, १६ ,, समाजवाद और व्यक्ति ( अनु०-नरेन्द्र ) ,, १७ भूपेन्द्रनाथ सान्याल—मार्क्सका दर्शन १८ सत्यभक्त कार्ल मार्क्स १९ यशपाल मार्क्सवाद २० त्रिलोकीनाथ मिश्र—यूनानका राजदर्शन २१ डाक्टर गणेशप्रसाद—राजनीतिक विचारधाराएँ ( प्रथम सस्करण )- लौग मैन्स प्रकाशन २२ कन्हैयालाल वर्मा—पाश्चात्य राज्यदर्शन-नन्दकिशोर ब्रदर्स, वाराणसी २३ स्पेंसर—ज्ञेय मीमासा ( अनु०-कन्हूमल ) .. ... इण्डियनप्रेस २४ रघुनन्दन शर्मा—वैदिक सम्पत्ति ... ..

श्रीहरिः मार्क्सवाद और रामराज्य प्रथम परिच्छेद पाश्चात्त्य-दर्शन मार्क्सवाद समझनेके लिये उसकी पृष्ठभूमिपर एक दृष्टि डालना बहुत आवश्यक है । मार्क्सवादमें दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र तीनोंका ही समावेश है । किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मत या वादका स्थायी आधार उसका दर्शन ही होता है । मार्क्सने भी अपनी विचारधाराका आधार दर्शन ही बनाया । भूत, वर्तमान और भविष्यको एक दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता । यूरोपमें प्राचीनकालसे जो विचारधाराएँ चलती रहीं, उन्हींके विवेचनसे मार्क्सने अपने नये सिद्धान्त स्थिर किये । अतः यह बहुत आवश्यक है कि उन विचारधाराओंको भी पहले समझ लिया जाय । आरम्भमें ही यह प्रश्न उठता है कि दर्शन क्या है ? इसलिये पहले हम इसीपर विचार करेंगे । दर्शनकी परिभाषा यूनानी 'फिलासफस' शब्द ज्ञान और प्रेमके अर्थमें प्रयुक्त होता था । उसीके आधारपर अंग्रेजीका 'फिलासफी' शब्द प्रचलित हुआ । यद्यपि सविस्तर मीमांसा या विवेचना ही इसका अर्थ है, फिर भी विषय-विशेषके संक्षिप्त विचार-दर्शनके लिये भी 'फिलासफी' शब्द व्यवहृत होता है । आजकल तो दर्शनकी एक-एक शाखाके लिये भी 'फिलासफी' शब्दका प्रयोग होता है । कई आधुनिक पाश्चात्त्य विद्वान् विशेषकर कम्युनिस्ट, जीवनके दृष्टिकोणको ही दर्शन मानते हैं । उनके मतमें 'दर्शन' युगधाराका परिचायक होता है । युगसंघर्षसे ही उसका जन्म हुआ है । दर्शनका उसके निर्माताओंके जीवनकी घटनाओंसे भी सम्बन्ध होता है । अफलातून ( प्लेटो ) राजकुलमें शिक्षक था, इसलिये उसके दर्शनमें राजसम्बन्धका असाधारण प्रभाव है । हेराक्लिटिस दलितवर्गमें पैदा हुआ, इसलिये उसका दर्शन परिवर्तनप्रवर्तक हो गया; क्योंकि दलित करनेवाली दूसरी श्रेणीका परिवर्तन आवश्यक था । हेल्मूसियस मध्यम श्रेणीका प्रतिनिधि था और कार्लमार्क्स उदीयमान श्रमिकोंका, इसलिये उन-उनके अनुसार उनके दर्शन भी बने । असाधारण विप्लव कालमें मार्क्सका जन्म हुआ । फलतः उसका जीवन क्रान्तिकारी रहा और वैसा ही उसका दर्शन भी ।१ मा० रा० १--

यद्यपि अंशतः यह ठीक है, तथापि यह स्वाभाविक स्थिति है। ऐसे विचारोंका 'दर्शन' नाम नहीं दिया जा सकता; क्योंकि इनमें भावनाओंका ही प्राधान्य है। पर भावनाएँ 'दर्शन' नहीं होतीं। भावनाके प्राबल्यसे तो कभी विधुर-परिभावित कान्ताका भी साक्षात्कार हो जाता है। परिस्थितिका प्रभाव विचारोंपर होनेसे उनकी यथार्थतामें संदेह होना स्वाभाविक ही है। स्पष्ट है कि पित्तरोगयुक्त रसनासे गुड़की मधुरताका ठीक अनुभव नहीं हो सकता। पित्तयुक्त नेत्रसे श्वेत शङ्ख भी पीत प्रतीत होता है। सर्पदष्ट व्यक्ति कटु निम्बको भी मिष्ट समझता है। नीले-पीले उपनेत्रों (चश्मों) से वस्तु नीले-पीले रूपमें प्रतीत होती है। कामी संसारको कामिनीमय और ज्ञानी ब्रह्ममय देखता है। निम्बके कीटको मिश्रीकी मिष्टताके अनुभवमें पर्याप्त कठिनाई होती है। नमकके पर्वतपर रहनेवाली चींटी मिश्रीके पर्वतपर जाकर मिश्रीकी मिठासका तबतक अनुभव नहीं कर सकती, जबतक कि अपने मुँहसे नमकके कणोंको निकाल न दे। ठीक इसी तरह जबतक तपस्या, सदाचार, निःस्पृहता एवं योगाभ्यास आदिके सहारे राग-द्वेष, सम्पत्ति-विपत्ति, व्यक्तिगत परिस्थिति तथा वातावरणके प्रभावसे ऊँचा नहीं उठा जाता, तबतक सूक्ष्म विषयोंका यथार्थ ज्ञान कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। भारतीय दृष्टिसे पवित्र विचार अर्थात् धर्म-ब्रह्मादि पवित्र वस्तुसम्बन्धी कल्याणकारी पवित्र विवेचन मीमांसा है—'माने जिज्ञासायाम्'। और वस्तुतत्त्व परम सत्यका निर्दोष प्रमात्मक अनुभव करानेवाला विचार 'दर्शन' कहा जाता है— 'दृश्यते वस्तु याथात्म्यं अनेन इति दर्शनम्'। दूसरे शब्दोंमें प्रमाणद्वारा आत्मा- नात्माका ज्ञान जिसमे होता है उसका नाम 'दर्शनशास्त्र' है। प्रमाण अज्ञातज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं। ज्ञान कर्मके समान पुरुषके अधीन नहीं होता। कर्म करने, न करने, उलटा करनेमें पुरुष स्वतन्त्र है, किन्तु ज्ञानके सम्बन्धमें यह बात नहीं कही जा सकती। प्रमाण-प्रमेयके परस्पर सम्बन्ध हो जानेपर इच्छा न रहनेपर भी दुर्गन्धादिका ज्ञान होता ही है। दर्शन प्रमाण-परतन्त्र होता है। प्रमाण अनुरोधक-विरोधक सभी प्रकारके होते हैं। उनमें प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम मुख्य हैं; प्रत्यक्षानुमानका भी आगमानुसरण आवश्यक है। इसके बिना कितने ही अनुमानाभास भी अनुभवके रूपमें सामने आते हैं। उदाहरणार्थ कोई नरशिरके कपालकी हड्डीको प्राण्यङ्ग समझकर शङ्खतुल्य पवित्र मान सकता है। पर यह अनुमानाभास है। अतएव पवित्र बुद्धिके मनुष्य 'नरशिरःकपालं शुचिः प्राण्यङ्गत्वात् शङ्खवत्' इस अनुमानका तिरस्कारकर 'नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्' इस आगमानुसार जुगुप्सित नरशिरकी अस्थिका स्पर्श हो जानेपर सचैलस्नान कर अपनेको पुनः शुद्ध करते हैं। कुछ लोगोंका ऐसा भी मत है कि 'मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, यह

विश्व क्या है' आदिका चिन्तन तथा विवेचन 'दर्शन' है। इसी प्रकार कुछ विद्वान् प्रकृति तथा उसके व्यापारका अध्ययन एवं उसके भीतर एकता देखनेको दर्शन कहते हैं। पर इन मतोंमे भी आंशिक सत्यतामात्र है। सभी दर्शन सभी विषयोंमें आदरणीय भी नहीं हो सकते। जैसे अंधोंने हाथीके जितने अङ्ग जिस रूपमें अनुभव किये उसी ढङ्गसे उनका वर्णन किया। न इसे सम्पूर्ण मिथ्या ही कहा जा सकता है और न पूर्णतया सत्य ही। विशेषतया पाश्चात्त्य दर्शनोंके सम्बन्धमें तो अत्यन्त वैरूप्य है। भारतीय दर्शनोंमे यद्यपि इतना अधिक वैरूप्य नहीं है; क्योंकि उनके मूल अनादि-अपौरुषेय वेद, तदाधारित शास्त्र, योगज ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा लौकिक प्रत्यक्षानुमान हैं तथापि यहाँ भी सभी विषयोंमे सभी ऋषियोंका समान आदर नहीं, अपितु जिस विषयमें जिस ऋषिने धारणा, ध्यान, समाधि आदिद्वारा तत्त्वानुभूति प्राप्त की, उसी विषयमे उसका सार्वभौम आदर है। जैसे शब्दके सम्बन्धमे पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि आदिका एवं वाक्य- विचार आदिमें जैमिनि, व्यास आदिका। पाश्चात्त्य-दर्शनोंमें अधिकांशका जन्म कुतूहल-बुद्धि एवं ज्ञान- पिपासा-शान्तिकी दृष्टिसे ही हुआ है। अनेक पाश्चात्त्य-दर्शनोंका प्रादुर्भाव राजनैतिक उद्देश्यकी पूर्तिके लिये भी हुआ है, किन्तु भारतीय दर्शनोंका अन्तिम उद्देश्य दुःख-निवृत्ति, मृत्यु-विजय तथा मोक्ष-प्राप्ति ही है, अवान्तर उद्देश्य अर्थ- काम-धर्मार्जन भी है। वेदान्तमतमे ज्ञानस्वरूप आत्मा निर्विकार है। मन, अन्तःकरण आत्मासे भिन्न प्राकृतिक है। चित्त, अहंकार आदिके समान ही पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च- कर्मेन्द्रियाँ भी प्रकृतिके सूक्ष्म तत्त्वोंसे ही बनी हैं। स्थूल देहसे भिन्न पञ्चप्राणसहित उक्त मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एवं कर्म-ज्ञानेन्द्रियोंको मिलाकर सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर कहा जाता है। स्थूल देहके नष्ट होनेपर भी यह सूक्ष्म देह नष्ट नहीं होता। सृष्टिसे लेकर प्रलयकालतक यह सूक्ष्म देह रहता है। इसीके आधारपर व्यापक आत्माका गमनागमनादि बनता है। इससे भिन्न एक रजस्तमोलेशानुविद्ध अतएव अविशुद्ध सत्त्वप्रधान अविद्यारूपी कारण शरीर भी मान्य है, जिसका तत्त्व साक्षात्कारसे ही बाध होता है। इस तरह वह अनादि, सान्त है। मूल प्रकृति भी अनादि, सान्त है। सम्पूर्ण प्रपञ्च पञ्चभूतात्मक है। उन भूतोंकी ग्राहक इन्द्रियाँ भी सूक्ष्म भूतोंका ही परिणाम हैं। भिन्न कारणोंमें स्वकार्यानुकूल शक्ति होती है। इसी तरह ब्रह्ममें भी सर्वप्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति होती है। इसीको मूल प्रकृति कहा जाता है। चेतन ईश्वर सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान् एवं सर्वव्यापी होता है। कर्माके अनुसार जन्म-मरणके समान ही संसारका सृष्टिप्रलय होता है। संसार-

४ मार्क्सवाद और रामराज्य का कर्मके साथ असाधारण सम्बन्ध है। मोक्ष या भगवत्प्राप्ति संसारका चरम लक्ष्य है। वस्तुतः इन सभी विषयोंका विवेचन 'दर्शन' में आ जाता है। यूनानी-दर्शन पाश्चात्त्य-दर्शन प्रायः मनतक ही पहुँचते हैं। आत्मवादी भी मन और आत्माका अभेद मानते हैं। इस सृष्टिके पहलेकी सृष्टियोंका विचार भी उन लोगां- ने नहीं किया। 'मैट्टर' या भूतसमुदाय यद्यपि बहुत सूक्ष्म माना जाता है, तथापि वह सांख्यीय प्रकृतिसे भिन्न है। यही कारण है कि आत्माका विचार उनके लिये बहुत दूरकी बात हो गयी है। यूनानके दर्शन अति प्राचीन समझे जाते हैं, पर वहाँके प्राचीन दार्शनिकोंने जड़-चेतनका भेद ही नहीं माना। किस प्रथम द्रव्य- से संसारकी उत्पत्ति हुई, यही उनका विचारणीय विषय था। अन्नसे मनुष्यादि प्राणियोंकी, मिट्टीसे अन्नकी, जल जमते-जमते मिट्टीकी और गर्मीसे जलकी उत्पत्ति उन्होंने मानी है। जीव-शक्ति भी उसीमें मिली थी। फिर कुछ लोगोंने परमाणु, कुछने विद्युत्कण और कुछ लोगोंने बानवे तत्त्व माने। अन्तमें मैटर या अव्यक्त एक द्रव्यसे संसारकी उत्पत्ति मानी। यूनानमें ईसवी सन्‌से ६०० वर्ष पूर्व थैलीज, एनैक्सीमैन्डर और एनैक्सि- मेनीज—ये तीन दार्शनिक हुए हैं। हिप्पो और डायोजिनीज भी इन्हींके अनुयायी थे। ये लोग चेतन-अचेतन-मिश्रित मूल कारण द्रव्य समझते थे। अतएव आत्मा या ईश्वर आदिके सम्बन्धमें इन लोगोंने कोई चर्चा नहीं की। यद्यपि सृष्टिके पहले अतिसूक्ष्म दृश्य एवं दृक् दोनों अविकल्पित होकर एकमेव-से थे— 'आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमैवाविकल्पितम्' (श्रीमद्भा० ११।२४।३) अर्थात् ज्ञान और अर्थ दोनों ही अविकल्पित होकर एक ही प्रतीत होते थे, तथापि यह अविकल्पकता, एकता, सूक्ष्मताके कारण प्रतीत होती है, अविवेकके कारण नहीं, किंतु थैलीज आदि तो जीव-शक्ति-मिश्रित ही मूल कारण मानते थे। थैलीज जलसे, एनैक्सीमैन्डर किसी अनियत द्रव्यसे और एनैक्सिमैनीज वायुसे ही विश्वकी सृष्टि मानता था। कहा जाता है कि थैलीज ज्योतिषी था। उसने ५८५ ई० में जो सूर्य-ग्रहण हुआ था, उसे पहले ही बतला रक्खा था। उसके मतानुसार 'जल ही दृढ़ता, द्रवता तथा वायुके रूपमें परिवर्तित होता है। जलसे वनस्पति तथा सभी जीवोंको जीवन मिलता है।' किसी दृष्टिमें यह मान्यता भारतीयोंमें भी थी। मनुने लिखा है कि परमेश्वरने पहले जल ही रचा और उसमें अपनी शक्तिका निक्षेप किया— 'अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ।' (१।८) उसमें निवासके कारण ही ईश्वरको 'नारायण' कहा जाता है।

पाश्चात्त्य-दर्शन

अनेकात्मक प्रपञ्चका मूल एक वस्तु है, यह खोज भी महत्त्वकी ही है। एनैक्सिमैण्डर ज्योतिष एवं भूगोलका विद्वान् था। उसने एक अपरिच्छिन्न परिमाणवाले द्रव्यसे ही विश्वकी उत्पत्ति और उसीमे संसारका लीन होना माना है। यदि यह द्रव्य परिमित होता तो सृष्टि होते-होते समाप्त हो जाती। अतः यह द्रव्य अपरिमित अतएव अनश्वर है। इसकी गति भी शाश्वत है। यह स्वयं विशेष पदार्थ नही है, किंतु सब विशेष पदार्थ इसीसे निकलते है। शीत-उष्णका भेद, पृथ्वी, जल, वायु आदि सब इसीसे निकले। यह स्वयं थैलीजका सहवासी था और इसका शिष्य एनैक्सिमैनीज था। इसने (एनैक्सिमैनीज) प्रथम द्रव्य वायुको माना है। वायुमे ही शीतलता तथा उष्णतासे घनीभाव और शैथिल्य ये दो गुण प्रकट होते है। वायुके शैत्यसे जल एव उष्णतासे अग्नि प्रकट होती है। जैसे प्राणके आधारपर प्राणीका देह होता है, वैसे ही वायुके आधारपर संसार स्थित है। हिप्पो थैलीजका ही अनुगामी था। वह आर्द्रतासे अग्नि और अग्नि तथा जलके सङ्घर्षसे ससारका होना मानता था। ईडियस एव डीयोजेनीज़ वायुको ही मूल कारण मानते थे, परंतु एनैक्सिगोरस अनेक तत्त्वो- का अस्तित्व मानता था। साथ ही वह ईश्वरकी इच्छासे ही इन तत्त्वोके द्वारा सृष्टि स्वीकार करता था। पीथागोरसने सख्याको ही मूल माना है। वह ईश्वरको एक सख्या तथा अन्य अङ्कोका उसीसे निकलना मानता था। एकसे बहुतोकी उत्पत्ति होती है। बहुत सम्भव है कि यह 'एकोऽहं बहु स्याम्' (एक मै अनेक होकर व्यक्त हो जाऊँ) इस श्रौतसिद्धान्तका ही रूपान्तर हो। एनैक्सिमैण्डर (ई० पू० ६४० से ५५०) का कथन है कि 'जो कुछ भी जाना जाता है वह मूल नही है। मूल तत्त्व तोकोई और ही है, जिसमे पृथ्वी- जल, अग्नि, वायु और आकाश--इन पाँच तत्त्वोका जन्म होता है और जिसे 'असीम' नाम दिया जा सकता है। वही घन-विरलभावसे विश्वरूपमे परिणत और उपरत होता रहता है।' पीथागोरस (ई० पू० ५७०-५००) तो मूल तत्त्वके सूक्ष्म रूपको ही सब कुछ मानता है। इसके अनुसार 'रूपका एक प्रकार अनुपात है। जैसे पित्त, कफ और वातके उचित अनुपातसे स्वास्थ्य और विपरीत होनेपर अस्वास्थ्य होता है, वैसे ही अन्य विषयोमे भी। इसलिये विश्वका मूलवस्तु नही, पर वस्तुका रूप ही है।' उधर परामेनीडीजके मतमे विश्व न कभी उत्पन्न हुआ, न नष्ट ही होगा। भारतीय दर्शनोके लिये यह सब कुछ नया नही है। मीमासकोने कहा है कि 'न कदाचिदनीदृशं जगत्।' अर्थात् यह जगत् कभी भी ऐसा नही रहा, जैसां आज नही है, अर्थात् वह सदा ऐसा ही रहा। सारी गतियाँ बाणकी गतिके समान भ्रमात्मिका ही हैं। बाण किन्ही विशिष्ट स्थानोपर 'सत्' होते हुए भी 'असत्'

रहता है अर्थात् रहते हुए भी नही रहता । वह उस स्थानविशेषसे होकर जाता है, अतः 'सत्' है, परंतु क्षणभर भी नही ठहरता, अतः 'असत्' भी है । हेराक्लिटसने वस्तुओका अनादित्व, अनेकत्व और क्षण-विपरिवर्तित्व माना है । प्राकृत घटनाचक्र जितने भी हैं, वे सब सर्वज्ञकी बुद्धिद्वारा प्रवर्त्तित हैं और विश्वका मूल भी । अनाक्सागोरस ( ई० पू० ५००-४८८ ) और एम्पीडोल्कीज ( ई० पू० ४६०-३७० ) का कथन है कि 'वस्तुओकी अनेकविधताका पर्यवसान परमाणुओंकी अनन्ततामें हो जाता है । सभी वस्तुओके बीजभूत परमाणुओंके संयुक्त होनेपर ही विश्व उत्पन्न होता है । असत्से कुछ उत्पन्न नही हो सकता, न सत्का विनाश ही हो सकता है। अणुओंका संयोग-वियोगात्मक ही परिवर्तन है । कोई भी वस्तु 'आकस्मिक' नहीं । सब वस्तुएँ कार्य्य-कारणसम्बद्ध ही है । अणु और शून्य इन दोके अतिरिक्त और कुछ नहीं है । अणु अनन्त हैं और उनकी अवस्थाएँ भी अनन्त हैं । नये अणु निःसीम प्रदेशोंमे अनवरत गिरते रहते हैं एवं पारस्परिक संघर्षोंसे ही भिन्न होते रहते हैं । उनके इन पारस्परिक सङ्घर्षोसे ही 'पार्श्वभ्रमि गतियाँ' ( चारो ओर भँवर जैसी गतियाँ ) उत्पन्न होती हैं, जिनसे असंख्य विश्वोंकी उत्पत्ति और विनाशकी परम्परा ( शृङ्खला ) चलती रहती है ।' इनके मतमें 'अणुओंमें आन्तरिक ( भीतरी ) गति नही होती । क्रान्ति और संघर्षोंसे ही परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया होती है । सूक्ष्म अणुओंसे सारा शरीर व्याप्त है और उन्हींसे 'जीवन' और 'आत्मा' कही जानेवाली वस्तुओकी उत्पत्ति होती है ।' डीमोक्रीटस ( ई० पू० ४६०-३५७ )के मतमें 'इन्द्रियोसे ही ज्ञान उत्पन्न होता है । जो एक जगह सत्य है, वह दूसरी जगह असत्य भी हो सकता है ।' इनके मतमें मानवानुभूतिका ही सर्वाधिक महत्त्व है, ऐसा सोफिस्टोका कहना है । भौतिकवादियोके मतमें 'धार्मिक विचारोंमे दर्शनोंमें बडा प्रतिरोध उत्पन्न हुआ । चूंकि यहाँ मानव-बुद्धि सीमित ही है, अतः उससे तत्त्वज्ञान दुर्लभ ही है । प्रत्येक मानवके लिये दुर्भेद्य अन्धकार स्वभावसिद्ध है, इसीलिये प्रकृति भी रहस्यभूता ही रह जाती है ।' वस्तुस्तु भौतिकवादी धार्मिक पक्षको बडे विकृत रूपमें व्यक्त करते हैं । जो दग्धा ( जलनेवाला ) है, वह दहन ( जलाये जाने ) का विषय नहीं हो सकता, उसी प्रकार जो ज्ञाता ( जाननेवाला ) है, वह ज्ञान ( जानने ) का विषय नही हो सकता—यह सिद्धान्त सर्वथा युक्तिसङ्गत ही है। ठीक वैसे ही, रूप जैसे श्रोत्रेन्द्रियके द्वारा नहीं जाना जा सकता ( केवल चक्षुरिन्द्रियके द्वारा ही जाना जा सकता है ), वैसे ही शब्दस्पर्शादिगुणपञ्चकसे परेके पदार्थ अनिन्द्रियगोचर हैं—इन्द्रियोंद्वारा नहीं जाने जा सकते ( अर्थात् प्रत्यक्षके क्षेत्रके बाहर हैं, केवल अनुमान या शब्द-प्रमाणके द्वारा ही जाने जा सकते हैं ) । यह

सिद्धान्त भी ठीक ही है-इसमें भी कही कोई युक्तिविरुद्ध बात नहीं दिखलायी देती। प्रामाणिक अनुशासन (शास्त्र या आप्तवाक्य) को भी न माननेपर 'तर्कानवस्थान' दोष अनिवार्य्य होगा। अर्थात् तर्कके वस्तुयाथार्थ्यपर अवलम्बित न रहकर व्यक्तिगत बुद्धिपर अवलम्बित रहनेके कारण जब जिस पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, तब उसीका मत सिद्धान्तरूपमें मान लेना पड़ेगा और कब किस पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, इसकी कोई व्यवस्था नहीं, अतः कभी सत्यपक्ष सत्य रह सकता है और कभी असत्यपक्ष भी जीत सकता है और ऐसी स्थितिमें ज्ञान भी अस्थिर ही रहेगा- 'यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः। अभियुक्ततरैः यै र्न्यथैवोपपाद्यते ॥' अर्थात् कुशल अनुमाता लोग बड़े प्रयत्नसे जिस अर्थको तर्कसिद्ध करते हैं, उसी अर्थको अन्य अनुमाता तार्किक अपने अनुमान-तर्कोंद्वारा अन्यथा ही सिद्ध कर देते हैं। इस तरह पूर्व अनुमित अर्थका खण्डन कर नवीन अर्थ प्रस्तुत और पुनः उसका खण्डन कर नवीन बात सिद्ध की जा सकती है। इसलिये तर्कमें अप्रतिष्ठितताका आरोप होता है। तथापि यह तर्कका अप्रतिष्ठितत्व दूषण नहीं भूषण ही है, क्योकि तर्कोंके अप्रतिष्ठितत्वकी सिद्धि भी तर्कसे ही होगी। जैसे 'अय तर्कः अप्रतिष्ठितः तर्कत्वात् तर्कान्तरवत्' यह भी एक तर्क ही है और यदि यह तर्क भी अप्रतिष्ठित है, तो इस अप्रतिष्ठित तर्कके द्वारा तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भी किस प्रकार सिद्ध होगा ? और यदि यह तर्क प्रतिष्ठित है, तो सब तर्क अप्रतिष्ठित हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योकि यह भी तर्क है, जिसको प्रतिष्ठित मान लिया गया। अतः कदाचित् तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भूषण है, दूषण नहीं। अतः बड़ी सावधानीसे किसी तत्त्वके निर्णयके लिये कुछ तर्कोंका प्रयोग किया जाना चाहिये। सुकरातका मत था कि 'सदाचारके अनुवर्तनसे ही सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता है और वह ज्ञान प्रत्येक मनुष्यको उत्पन्न होनेवाले सामान्य ज्ञानसे भिन्न ही होता है। दृष्ट घटनाओद्वारा कार्यकारण-सम्बन्धसे सम्यग् ज्ञानकी उत्पत्ति सम्भव है। सम्यग् ज्ञान उत्कृष्ट गुण है। व्यापक विचारोसे उसकी उत्पत्ति होती है।' कुछ लोगोंको यह जो मत है कि 'सारा-का-सारा ज्ञान संशयाक्रान्त ही होता है, कोई भी ज्ञान निश्चयात्मक नहीं होता' उसका निराकरण करते हुए उनका कहना है कि 'देवता नहीं चाहते कि इस विषयको लोग जाने। इसीलिये संशयाक्रान्ति होती है और सदाचार तथा देवानुग्रहसे सम्यग्ज्ञानकी उत्पत्ति भी सम्भव ही है, असम्भव नहीं।' भौतिकवादियोंके मतमे सुकरातका दर्शन नीतिविषयक ही है। वैज्ञानिक अन्वेषणकी अपेक्षा उन्होने आध्यात्मिक कल्पनाका ही अधिक आदर किया है। उनके मतमें केवल बाह्य इन्द्रियोसे ही अनुभूति होती हो सो बात नहीं है, अपितु तत्त्वानुभूति तो अन्तरात्मासे ही उत्पन्न (प्रत्यगुद्भूत ही) होती है। न्याय, सदाचार और सुबुद्धि मनुष्योके आन्तरिक गुण हैं।' उनके मतमें

८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो त्रिकालाबाध्य है, एकरस है, वही सत्य है । उन्होंने अप्रामाणिकप्राय असम्बद्ध ज्ञानोंसे उपप्लुत मस्तिष्कको परिष्कृतकर उनमें सत्य ज्ञानके बीज बोये । उनका दर्शन शब्दार्थज्ञानविषयक ही है । बाह्य ज्ञानकी अपेक्षा आन्तरिक ज्ञानकी ही महत्ता उन्होंने अत्यधिक प्रख्यापित की है । उनके शिष्य अफलातून विशिष्ट दार्शनिक हुए । उन्हींके प्रभावसे अनेक विद्वान् अपूर्ण संसारसे विरक्त हो गये और अनन्त सत्यमें अपना मन लगा दिया । भौतिकवादियोंकी दृष्टिसे लोग 'वस्तु' से अपना ध्यान हटाकर अमूर्त्त व्यापक सत्यके अन्वेषणमें लग गये । इन्द्रियव्यापारोंसे उपरत होकर उन्होंने विचारशक्तिसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्थिर किये । उक्त विरोधाभासको ही तत्त्व मानकर यह मान लेना कि 'गति या परिवर्तन विरोधपूर्ण है, अतः उसकी व्याख्या नहीं हो सकती' मिथ्या ही है । इसलिये तत्त्व तो अपरिवर्तनीय ही रहा और वही सत्य भी है, वही नित्य भी है । परिवर्तन तो भ्रममात्र है । भौतिकवादकी पद्धतिसे तो इस दर्शनमें अनुभव और प्रयोगकी उपेक्षा ही है । जो तत्त्व है, वह 'कृतबुद्धिग्राह्य' ही है अर्थात् परमेश्वरके अनुग्रहसे प्राप्त हुई किसी रहस्यमयी आत्मशक्तिद्वारा ही उसका ज्ञान ( ग्रहण ) हो सकता है । अन्य यूनानियोंका यह मार्ग भी प्रादुर्भूत हुआ कि 'तर्कद्वारा भी तत्त्वान्वेषण हो सकता है ।' अफलातूनके मतसे 'भौतिक वस्तुओंको सत्यपरिचायक समझना चाहिये । घटनाएँ असम्पूर्ण और भ्रामिका होती हैं । इसलिये घटनाओंके मूलमें कोई गम्भीर सत्य रहता है । वही 'वैज्ञानिक नियम' कहलाता है । सारी सृष्टि उसीके अनुसार है । उन्हीं नियमोंसे घटनाओंकी व्याख्या भी होती है । साथ ही मूलभूत वैज्ञानिक नियम जाने भी जा सकते हैं ।' अफलातूनके मतमें विश्वका घटनाचक्र यन्त्र-सा नहीं है, अपितु जैसे वस्तुओंकी वृद्धिका मूल सूर्य है, वैसे ही सब घटनाचक्र किसी-न-किसी शुभके ही उद्देश्यसे प्रवृत्त होता है । इसका विषयानुरूप विवरण यह हो सकता है कि जितने अंशसे इन्द्रिय जगत्-सम्बद्ध है, उतने अंशमें उसकी सत्ता न्यून है । यदि कोई हिम ( बर्फ ) पर हाथ रखकर कवोष्ण जल ( गुनगुने पानी ) में हाथ डाले, तो उसे वह जल अनुष्णके समान लगता है और यदि अनुष्ण जलमें पहले हाथ डालकर गुनगुनेमें डाले, तो उसे वह शीतल- जैसा लगेगा, इस प्रकार वही जल उष्ण भी है और शीतल भी । हाथीकी दृष्टिसे चूहा 'लघु जन्तु' है, परंतु चींटीकी दृष्टिसे वही 'महान्' अनुभूत होने लगता है । इस प्रकार वही मूषक लघु भी है, वही महान् भी । दृष्टिभेदकी दृष्टिसे यही युक्ति अन्य भी अनेक स्थलोंपर प्रयुक्त हो सकती है । कोई भी इन्द्रियानुभूत वस्तु विपरीत गुणयुक्त विदित होने लग सकती है । अतः गुण निश्चित नहीं कहे जा सकते और जो अपरिवर्तनीय गुणयुक्त नहीं है, वह सत्य नहीं है, और न वह ज्ञान ही प्रमात्मक है । कोई चित्र

पाश्चात्य-दर्शन ९ किसीको सुन्दर लगता है किसीको असुन्दर । जो वस्तु नित्य है, उसका गुण निश्चित होता है अथवा गुणाभाव निश्चित होता है।' उन (अफलातून) के मतसे 'इन्द्रिय-सम्बद्ध जगत जाना नहीं जा सकता । यदि पूछा जाय कि 'जो विज्ञान अनुभूत होता है वह किसका है ?' तो उनके मतसे उत्तर है—'रूपजगतका अथवा धारणाओंका ।' इन्द्रियानुभूत (वस्तुओं) में गुणोंकी उपलब्धिको कारण रूप है । उसीसे उसमें सत्यत्व- का आभास होता है । रूपका ही सम्यग्ज्ञान होता है । रूपशब्दसे यहाँ तात्त्विक रूप लेना चाहते हैं । सारांश यह कि अपूर्ण बाह्य जगतकी अपेक्षा नित्यसिद्ध पूर्णताका ही अन्वेषण करना चाहिये ।' अरस्तूने बाह्य एव आन्तर दोनोंकी व्याख्या की है । 'व्यापक विचारोंसे ही तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है' यह तो उन्हें भी मान्य ही है । वे रूपोंको वस्तुसे संश्लिष्ट ही मानते हैं, अत्यन्त पृथक् नहीं । अफलातूनकी रेखागणितमे अभिरुचि थी, इसलिये काल्पनिक वस्तुकी ओर उनका स्वाभाविक झुकाव रहा । अरस्तूकी जीवविज्ञानमे रुचि थी, इसलिये प्रकृतिके विकार, परिवर्द्धन आदि संस्कारोंकी प्रबलताके कारण अपरिवर्तनीय धारणा आदि सम्बन्धमे इनकी रुचि रही । उनके मतसे आकारमण्डित ही वस्तु विशिष्ट रूप ग्रहण करती है । विभिन्न वस्तुओंका वस्तु-तत्त्व और रूप पृथक्-पृथक् होता है । जैसे मूर्त्तिका वस्तुतत्त्व पाषाण है और शिल्पीकृत रूप ही रूप है । वनस्पति, पशु, मनुष्य आदिका शरीर- संघटन वस्तुतत्त्व है । रूप है; पचन-क्रिया, इन्द्रियानुभूति और बोध । रूपके बिना वस्तु कुछ नहीं है, क्योंकि धरणी, जल, अनल, अनिल आदि भी किसी मूल वस्तुके अवस्थाविशेष ही हैं । विश्वका गतिदायक परमेश्वर है, जो स्वयं गतिहीन है । उसकी सत्तामात्रसे विश्व पूर्णताकी ओर अभिमुख होकर विकासोन्मुखी है । जिस वस्तुमें जितने अधिक रूप हैं, उसका उतना ही अधिक महत्त्व है । आम्रका वस्तुभूत वृक्ष है और वृक्षका रूप आम्रफल है, परन्तु वृक्ष भी वनका रूप है । उसकी दृष्टिसे वन वस्तु है । यहाँ एक ही पदार्थ किसीकी दृष्टिसे रूप है और किसीकी दृष्टिसे वस्तु । अरस्तूकी दृष्टिसे भी सभी वस्तुएँ बीजरूपसे स्थित हैं ही । साराका सारा वटवृक्ष बीजमे अवस्थित है । उपयुक्त सामग्रीसे उसके आवरणका अपनयन होनेपर उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है । विकासोन्मुख वस्तुओंमें विकासानुगुण (विकासोचित या विकासोपयुक्त) शक्तियोंकी कल्पना कर लेनी चाहिये । वृद्धिशील वस्तुओकी प्रवृत्ति किसी उद्देश्यसे ही होती है । विश्व

कहाँसे और क्यो दृष्टिगोचर होता है इस प्रश्नका उत्तर वस्तु, रूप, सुप्तशक्ति एव वास्तविकता इन चार बातोसे होता है । बीज वृक्षका भौतिक हेतु है । दूसरा है नियम, जिससे आम्रवृक्षसे आम्रहीका वृक्ष होता है, पनस ( कटहल ) का नहीं । तीसरा--कर्ता, जिसकी प्रेरणासे क्रिया निर्वृत्त होती है । वास्तव- विकता चौथा हेतु है, जिसके उद्देश्यसे बीजकी प्रवृत्ति होती है । बीजके क्षेत्रमे यह आम्रफल है, चित्रकारके क्षेत्रमे सम्पूर्ण चित्र है । यह सारा यूनानी भाषामे 'टेलिओलौजी' सिद्धान्त कहलाता है । यान्त्रिक हेतु इससे भिन्न है । वह कार्य्यका पूर्ववर्ती तथा भावी ( कार्य्य ) का निर्णायक होता है । सामग्री सम्पूर्ण रहे तो कार्योत्पत्ति निःसंदिग्ध है । जैसे छोटे- छोटे यन्त्र महान् यन्त्रके चलानेवाले होते है । 'टेलिओलौजी' सिद्धान्त बतलाता है कि 'इस बातपर भी ध्यान देना चाहिये कि कारण न हो तो वस्तु क्या हो जाय और किस उद्देश्यसे उसकी प्रवृत्ति होने लगे । सर्वत्र सुकल्पित, सुसङ्घटित व्यवस्था ही ईश्वरके अस्तित्वको भी सिद्ध करती है ।' 'अचेतन माया प्रकृति ही अन्य सभी चेतनोंका मूल है' यह भी उनका मत है--कि 'अन्तर्निहितशक्तिवाले भूत ही जीव, जन्तु, वनस्पति आदि रूपोंमें परिणत हो जाते है । जिस प्रकार जीर्ण-शीर्ण काष्ठ, सड़े-गले गोबर तथा गीले बालोंसे कीडे, बिच्छू तथा जूँ आदि उत्पन्न हो जाते हैं।' पर वास्तवमें ऐसी बात नहीं है । यद्यपि इस मतकी विस्तृत समालोचना आगे चलकर मार्क्सदर्शनकी समीक्षाके अवसरपर की जायगी, तथापि यहाँ इतना कह देना आवश्यक हे कि गोबर, काष्ठ, लोम, केशादिकोंसे बिच्छू आदिके जड़ कलेवरकी ही उत्पत्ति होती है, न कि उनके चेतन आत्माकी । वह तो सदाके अनुसार अन्यत्रसे ही आता है, वहाँ उसकी अभिव्यञ्जनामात्र होती है । जैसे लोहा-लकड़, कोयला, पानी आदिपर स्वतः विद्यमान अग्निकी ही अभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विद्यमान चेतनकी ही तत्तत् शरीरोंमें अभिव्यक्ति होती है । आधुनिकोंमें बहुतोंका मत यह है कि पहले वस्तुओंको देखनेके साधन यन्त्र ऐसे नहीं थे, इसलिये समष्टि दृष्टिसे विचार-परम्परा चल पड़ी । 'मानसिक विचारोंसे ही तत्त्वबोध हो सकता है, इस धारणाका भी मूल कारण यही है । अरस्तूने ज्ञानरश्मियुक्त आत्माओंके जन्मान्तर माने हैं । भौतिकवादियोंका कहना है कि यह उनका भ्रम ही था, क्योंकि जीवविज्ञानशास्त्रका निश्चित मत है कि संस्कार एवं अन्तर्बोध इन्द्रियजन्य अनुभवका ही परिणाम है । अरस्तूके मतसे पदार्थोंमें जीवनके बीजाणु सर्वदा ही रहते हैं । संसारमें विशिष्ट श्रेणियाँ विशिष्टगुणयुक्त होती हैं । यह विज्ञानकी विशिष्ट उन्नति है । संसारका स्वरूप बुद्धिप्रसूत है, नियन्त्रित है । इसलिये सभी वस्तुएँ नियमानुवर्ती ( नियमबद्ध ) ही हैं ।

दय-निःश्रेयसार्थ" Line 15: "बुद्धिमान् जन उसका सेवन करते हैं । अतः अरस्तू इत्यादिकोंका दर्शन बहुत" Wait: "अरस्तू" or "अरस्तू,"? There is a virama or comma under त्: "अरस्तू"? Wait, look at "अरस्तू" in Line 15: "अरस्तू" has 'अ', 'र', 'स्', 'त', 'ू' with a stroke below? Wait, in Line 2: "अरस्तूने" - 'अ' 'र' 'स' '्' 'त' 'ू' 'न' 'े'. In Line 15: 'अ' 'र' 'स्' 'त' 'ू' -> wait, it has a comma or halanta? "अरस्तू," or "अरस्तू"? It looks like a comma: "अरस्तू," or "अरस्तू"? Wait, look at line 15: "अरस्तू इत्यादिकोंका" - between अरस्तू and इत्यादिकोंका there is a space and a mark at baseline, like a comma: "अरस्तू, इत्यादिकोंका" or "अरस्तू इत्यादिकोंका". Line 16: "कुछ भारतीय आस्तिक दर्शनोंसे मिलता है ।"

*   Paragraph 3:
    Line 17: "उनके दर्शनका लक्ष्य सुखप्राप्तिके मार्गका ज्ञान ही है । सुख ही जीवनका"

१२ मार्क्सवाद रामराज्य गिरनेसे जटिल गतियोंकी उत्पत्ति नहीं होती, अतः विश्वसृष्टि दुर्लभ ही हो जायगी' अतः एपिकुरसने उनका वक्रगतिसे पतन माना है, जिससे विश्वसृष्टि उत्पन्न हो जाय । इस प्रकार वह सिद्ध करता है कि मनुष्य स्वतन्त्र इच्छावाला है किसी अन्यके द्वारा प्रयोज्य नहीं । शून्यसे शून्यकी ही उत्पत्ति हो सकती है, और किसी- की नहीं । अन्यथा किसीसे भी कुछ भी उत्पन्न हो जाय । जो है वह पिण्ड है, जो नहीं है वह शून्य है ( अथवा जिसकी सत्ता है वह पिण्ड है, जिसकी सत्ता नहीं है, वह शून्य है ) । अणु अविभक्त हैं, अपरिवर्तनीय हैं एव गतिमान् हैं । परस्पर अभिमुख होनेसे उनका संयोग होता है । गतियाँ अनादि हैं । परिमाण और आकारके अतिरिक्त उनका कोई गुण नहीं है । उनके मतमें आत्मा भी अणुविशेष ही है । वस्तुओंसे पृथक् जीवन-क्रियाको प्रदर्शित करनेके लिये ही आत्माकी सृष्टि हुई ( या की गयी ) है । धर्मका बन्धन छुड़ाकर प्रकृतिका अध्ययन करना ही मुख्य 'दर्शन' है-ऐसा उन ( डीमोक्रीटस ) के मतानुयायियोंका कथन है, परंतु ऐसा है नहीं । अणु परिमाण उसे कहना चाहिये जिससे अन्य कोई अपकृष्ट परिमाण न हो-'यतः अपकृष्टपरिमाणं नास्ति तत् अणुपरिमाणम्' । सूक्ष्मताकी कल्पना करते-करते वाचस्पतिकी मति भी जहाँ परिश्रान्त हो जाय, उस अविभाज्य निरतिशय सूक्ष्म अवयवको परमाणु कहते हैं । स्वतन्त्र जड परमाणुओं- में प्रपञ्चारम्भ या विनाशानुकूल व्यापार स्वतः सम्भव नहीं; क्योंकि चेतनानधिष्ठित जड पदार्थोंमें विलक्षण व्यवस्थित अभीष्टकार्यकारित्व सम्भव नहीं। अतएव स्वतन्त्र रूपमें वक्र गति या सीधी गतिसे भी सृष्टि निर्माण सम्भव नहीं, अपितु अदृष्ट और ईश्वरसपेक्ष ही परमाणुओंसे कदाचित् सृष्टि और कदाचित् विनाश होता है । मिस्रके 'अलेग्जैण्ड्रिया' नगरमें बहुत-से दार्शनिकोंका आविर्भाव हुआ । पाश्चात्त्य एवं पौरस्त्य दार्शनिक वहाँ एकत्र हुआ करते थे । वहाँ प्लाटिनसके प्रभावमें धर्म और दर्शनका सम्मिश्रण हुआ । वे मानते थे कि 'अनन्तप्रज्ञारूपिणी रहस्यपूर्ण सत्तासे ही सब वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है और वह सत्ता दुर्ज्ञेय है । उसकी प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिको ही ईश्वर मानकर व्यवहार चलाया जा सकता है और वह अपने भीतर ही संकल्पसे विश्वात्माकी सृष्टि करता है। विश्वात्मा ही समष्टिजगत् एवं व्यक्तियोंकी आत्मा है। पार्थिव सम्बन्धसे अवनति होती है और उसके विच्छेदद्वारा पूर्ण सत्ताप्राप्ति ही उत्थान है।' क्रान्सिस्कन, जान स्कोटस, एरिगेना ( ई० ८१०-८७० ), रोजिलिनस ( १०५१-११२६ ) इत्यादि दार्शनिक अफलातूनके सिद्धान्तसे प्रभावित रहे और डोटिनिसन, एलबर्ट स आदि अरस्तूके । एक्विनसकी दृष्टिसे निर्गुण पदार्थ-स्वरूप ही वस्तुएँ हैं । उन्हींमें प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । उपलब्ध वस्तुएँ रूप ही हैं । जिन रूपोंसे वस्तुओंका ज्ञान होता है, उन्हींसे मूर्ति मूर्त हो पाती है, अन्यथा

निराकार पिण्ड ही रहे। वस्तुहीके समान रूप भी सत्य है। वस्तुसे भी उच्चतर सत्य रूप है। मूर्त्तिका रूप कृत्रिम नहीं है न बाह्याकृति है, अपितु वस्तुका तत्त्व भी वही है, और बाह्य और आन्तर भी वही है। वस्तुका रूपान्तरण ही विकासवादका सिद्धान्त है। मनुष्य पशुका रूपान्तरण है और पशु अचेतन पदार्थ- का रूपान्तर। एक ही मूल वस्तुसे अनेक सत्योंका सङ्घटन सम्भव है। जीवित, चिन्तनशील, अनुभवपूर्ण मनुष्य भी वैसा ही सत्य है।' ऐक्विऩासके मतसे 'वस्तुतत्त्वका अनुभव तो बाह्य इन्द्रियोंसे होता है, परंतु रूपका बुद्धिसे ही होता है।' स्कौट्स एरिजेनाके मतमें 'प्रकृतिमे विवेक तो पहलेहीसे था। यथासमय शासनशक्ति भी उत्पन्न हो जाती है तथा समय प्रकृतिके साथ उत्पन्न होनेवाला है। तथापि प्रारम्भकालमें शासनशक्ति नहीं थी। विवेकसे ही शासनशक्ति उत्पन्न होती है, न कि शासनशक्तिसे विवेक। विवेकहीन शासनशक्ति दुर्बल ही रहती है। विवेक तो शासनशक्तिसे निरपेक्ष भी अपने गुणोंसे ही सुरक्षित है।'

अन्य पाश्चात्त्य-दर्शन

रोजेनिलस आदि दार्शनिक धर्मविरोधी थे। रोजर बेकन इत्यादिने विचार- स्वातन्त्र्यमें धर्मको कुछ नहीं गिना। धर्मके विषयमे यूरोपमे उस समय सुधारकी भावना उद्भूत हुई। तथापि वे सुधारक भी संकुचित वृत्तिके थे। कैल्विनने सुधारक होते हुए भी 'रक्तसंचालन'के तथ्यके आविष्कारमें लगे हुए सर्विटसको जीवित ही जलवा दिया था। बेकनका कहना है कि 'सर्वत्र श्रेष्ठ उपाय खोजना चाहिये। वस्तुके सभी अंगोंका यथायोग्य अध्ययन करना चाहिये। जिसका प्रथम स्थान हो, उसका अध्ययन प्रारम्भमे तथा दुरूहसे पहले सरलका अध्ययन कर लेना चाहिये। यह सब प्रयोगके बिना सम्भव नहीं हो सकता। आप्तवाक्य, विवेक और प्रयोग—ज्ञानके ये तीन मार्ग हैं। कारणरहित आप्तवाक्य अकिंचित्कर है, कारणके बिना आप्तवाक्यका कोई अर्थ नहीं। आप्तवाक्यपर विचारकर प्रयोगसे प्रमाणित कर विवेकसे ज्ञान एवं प्रदर्शनका भेद जानना चाहिये। उसके मतमे पहले प्राकृतिक ज्ञानमे ही विज्ञानकी उन्नति सम्भव है। इन्द्रियाँ पहले प्रमाण हैं, मन बादमे।' असलमें ऐसे स्थलोमे प्रत्यक्षानुमान-मूलक जो आप्तवाक्य हैं, उनका प्रत्यक्षानुमानसे भिन्न शब्दप्रमाणसे व्यवहार नहीं किया जा सकता। ये वाक्य भी प्रत्यक्षानुमानमूलक होनेसे प्रत्यक्षानुमानके अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। जैसे नैयायिकोंका प्रत्यक्षखण्ड, अनुमानखण्ड या बौद्धोंके आगमग्रन्थ होनेपर भी वे प्रत्यक्षानुमानके अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। आप्तवाक्य या शास्त्रप्रमाणके रूपमे उनकी मान्यता नहीं होती। इसी तरह यहाँ बेकनका 'आप्तवाक्य' भी है, जिसे