मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८२ गुड़-धेनुके दानकी विधि और उसकी महिमा
| * अध्याय ७७ * | २८९ |
|---|
सतहत्तरवाँ अध्याय
शर्करासप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
|---|---|
| शर्करासप्तमीं वक्ष्ये तद्वत् कल्मषनाशिनीम्।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यं ययानन्तं प्रजायते॥ १ | ब्रह्मन्! अब मैं उसी प्रकार पापनाशिनी शर्करासप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। |
| माधवस्य सिते पक्षे सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>प्रातः स्नात्वा तिलैः शुक्लैः शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ २ | व्रतनिष्ठ पुरुष वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रातःकाल श्वेत तिलोंसे युक्त जलसे स्नान करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दन धारण कर ले। |
| स्थण्डिले पद्ममालिख्य कुङ्कुमेन सकर्णिकम्।<br>तस्मिन् नमः सवित्रे तु गन्धधूपौ निवेदयेत्॥ ३ | फिर वेदीपर कुङ्कुमसे कर्णिकासहित कमलका चित्र बनावे। उसपर 'सवित्रे नमः' कहकर गन्ध और धूप निवेदित करे। |
| स्थापयेदुदकुम्भं च शर्करापात्रसंयुतम्।<br>शुक्लवस्त्रैरलङ्कृत्य शुक्लमाल्यानुलेपनैः।<br>सुवर्णेन समायुक्तं मन्त्रेणानेन पूजयेत्॥ ४ | फिर उसपर शक्करसे परिपूर्ण पात्रसहित जलपूर्ण कलश स्थापित करे, उसपर स्वर्णमयी मूर्ति रख दे और उसे श्वेत वस्त्रसे सुशोभित करके श्वेत पुष्पमाला और चन्दनद्वारा वक्ष्यमाण-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक पूजन करे। |
| विश्ववेदमयो यस्माद् वेदवादीति पठ्यसे।<br>त्वमेवामृतसर्वस्वमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ५ | (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सूर्यदेव! विश्व और वेद आपके स्वरूप हैं, आप वेदवादी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंके लिये अमृततुल्य फलदायक हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान कीजिये।' |
| पञ्चगव्यं ततः पीत्वा स्वपेत् तत्पार्श्वतः क्षितौ।<br>सौरसूक्तं जपंस्तिष्ठेत् पुराणश्रवणेन वा॥ ६ | तत्पश्चात् पञ्चगव्य पान कर उसी कलशके पार्श्वभागमें भूमिपर शयन करे। उस समय सूर्यसूक्तका जप* अथवा पुराणका श्रवण करते रहना चाहिये। |
| अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां कृतनैत्यकः।<br>तत् सर्वं वेद विदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ७ | इस प्रकार दिन-रात बीत जानेपर अष्टमीके दिन प्रातःकाल नित्यकर्मसे निवृत्त होकर पहलेकी तरह वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे। |
| भोजयेच्छक्तितो विप्राञ्छर्कराघृतपायसैः।<br>भुञ्जीतातैललवणं स्वयमप्यथ वाग्यतः॥ ८ | पुनः अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको शक्कर, घी और दूधसे बने हुए पदार्थ भोजन करावे और स्वयं भी मौन रहकर तेल और नमकसे रहित पदार्थोंका भोजन करे। |
| अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>संवत्सरान्ते शयनं शर्कराकलशान्वितम्॥ ९ | इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सारा कार्य करना चाहिये। एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर शक्करसे पूर्ण कलशसमेत समग्र उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा |
| सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकां गां पयस्विनीम्।<br>गृहं च शक्तिमान् दद्यात् समस्तोपस्करान्वितम्॥ १० | एक दुधारू गौ दान करनेका विधान है। व्रती यदि धन-सम्पत्तिसे युक्त हो तो उसे समस्त उपकरणोंसे युक्त गृहका भी दान करना चाहिये। |
| सहस्रेणाथ निष्काणां कृत्वा दद्याच्छतेन वा।<br>दशभिर्वाथ निष्केण तदर्धेनापि शक्तितः॥ ११ | तदनन्तर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल एक हजार अथवा एक सौ अथवा पाँच निष्क (सोलह माशेका एक निष्क होता है जिसे दीनार भी कहते हैं) |
* ऋग्वेदके प्रथम मण्डलका ५० वाँ सूक्त सूर्यसूक्त है।
२९० * मत्स्यपुराण *
| सुवर्णाश्वः प्रदातव्यः पूर्ववन्मन्त्रवादनम्।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषं समश्नुते॥ १२<br><br>अमृतं पिबतो वक्त्रात् सूर्यस्यामृतबिन्दवः।<br>निष्येतुर्ये धरण्यां ते शालिमुद्गेक्षवः स्मृताः॥ १३<br><br>शर्करा तु परा तस्मादिक्षुसारोऽमृतात्मवान्।<br>इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः॥ १४<br><br>शर्करासप्तमी चेयं वाजिमेधफलप्रदा।<br>सर्वदुष्टप्रशमनी पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी॥ १५<br><br>यः कुर्यात् परया भक्त्या स वै सद्गतिमाप्नुयात्।<br>कल्पमेकं वसेत् स्वर्गे ततो याति परं पदम्॥ १६<br><br>इदमनघं शृणोति यः स्मरेद् वा<br>परिपठतीह दिवाकरस्य लोके।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनमालयाभिपूज्यः॥ १७ | सोनेका एक घोड़ा बनवाकर पहलेकी ही भाँति मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान करना चाहिये। इसमें कृपणता न करे, यदि करता है तो दोषभागी होना पड़ता है॥ १—१२॥<br><br>अमृत-पान करते समय सूर्यके मुखसे जो अमृतबिन्दु भूतलपर गिर पड़े थे, वे ही शालि (अगहनी धान), मूँग और ईंख नामसे कहे जाते हैं। इनमें ईंखका सारभूत शक्कर अमृततुल्य सुस्वादु है, इसलिये यह तीनोंमें श्रेष्ठ है। इसी कारण यह पुण्यवती शर्करा सूर्यके हव्य एवं कव्य—दोनों हवनीय पदार्थोंमें उन्हें अत्यन्त प्रिय है। यह शर्करासप्तमी अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायिनी, समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाली और पुत्र-पौत्रोंकी प्रवर्धिनी है। जो मानव उत्कृष्ट श्रद्धाके साथ इसका अनुष्ठान करता है, उसे सद्गतिकी प्राप्ति होती है। वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास कर अन्तमें परमपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस निष्पाप व्रतका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। साथ ही जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवगणों एवं देवाङ्गनाओंके समूहसे पूजित होता है॥१३—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शर्कराव्रतं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शर्करासप्तमीव्रत नामक सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७७॥
अठहत्तरवाँ अध्याय
कमलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत् कमलसप्तमीम्।<br>यस्याः संकीर्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः॥ १<br><br>वसन्तामलसप्तम्यां स्नातः सन् गौरसर्षपैः।<br>तिलपात्रे च सौवर्णं निधाय कमलं शुभम्॥ २<br><br>वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गन्धपुष्पैः समर्चयेत्।<br>नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे॥ ३<br><br>दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>ततो विकालवेलायामुदकुम्भसमन्वितम्॥ ४<br><br>विप्राय दद्यात् सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः।<br>शक्त्या च कपिलां दद्यादलङ्कृत्य विधानतः॥ ५ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इसके बाद अब मैं कमलसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका नाम लेनेमात्रसे भी भगवान् सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। व्रती मनुष्य वसन्त-ऋतुमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करके शुद्ध हो जाय और किसी तिलसे पूर्ण पात्रमें एक सुन्दर स्वर्णमय कमल स्थापित कर दे। फिर उसे दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर गन्ध, पुष्प आदिद्वारा उसकी अर्चना करे। पूजनके समय 'पद्महस्ताय ते नमः', 'विश्वधारिणे ते नमः', 'दिवाकर तुभ्यं नमः', 'प्रभाकर ते नमोऽस्तु'—इन मन्त्रोंका उच्चारण (कर सूर्यको प्रणाम) करे। तदनन्तर सायंकाल वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे ब्राह्मणका पूजन कर उन्हें जलपूर्ण कलशसहित कमल दान कर दे। साथ ही एक कपिला गौको |
८३ पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७९ * | २९१ |
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| अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां भोजयेद् द्विजान्।<br>यथाशक्त्यथ भुञ्जीत मांसतैलविवर्जितम्॥ ६<br>अनेन विधिना शुक्लसप्तम्यां मासि मासि च।<br>सर्वं समाचरेद् भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ ७<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>गां च दद्यात् स्वशक्त्या तु सुवर्णाढ्यां पयस्विनीम्॥ ८<br>भोजनासनदीपादीन् दद्यादिष्टानुपस्करान्।<br>अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कमलसप्तमीम्।<br>लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्यलोके महीयते॥ ९<br>कल्पे कल्पे ततो लोकान् सप्त गत्वा पृथक् पृथक्।<br>अप्सरोभिः परिवृतस्ततो याति परां गतिम्॥ १०<br>यः पश्यतीदं शृणुयाच्च मर्त्यः<br>पठेच्च भक्त्याथ मतिं ददाति।<br>सोऽप्यत्र लक्ष्मीमचलामवाप्य<br>गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात्॥ ११ | भी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक सुसज्जित करके दान करे। पुनः दिन-रात बीत जानेके बाद अष्टमी तिथिको अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उसके बाद स्वयं भी मांस और तेलसे रहित अन्नका भोजन करे। प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको इसी विधिके अनुसार कंजूसी छोड़कर भक्तिपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये। (एक वर्ष पूर्ण होनेपर) व्रतकी समाप्तिके समय स्वर्णमय कमलके साथ एक शय्याका भी दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुसज्जित एक दुधारू गौ तथा भोजन, आसन, दीप आदि अभीष्ट सामग्रियोंके भी दान करनेका विधान है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार कमलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह प्रत्येक कल्पमें अप्सराओंसे घिरा हुआ पृथक्-पृथक् सातों लोकोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको देखता, सुनता, पढ़ता और इसे करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी इस लोकमें अचल लक्ष्मीका उपभोग कर अन्तमें गन्धर्व-विद्याधरलोकका भागी होता है॥ १—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कमलसप्तमीव्रतं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कमलसप्तमीव्रत नामक अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७८ ॥
उन्यासीवाँ अध्याय
मन्दारसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वकामप्रदां पुण्यां नाम्ना मन्दारसप्तमीम्॥ १<br>माघस्यामलपक्षे तु पञ्चम्यां लघुभुङ्नरः।<br>दन्तकाष्ठं ततः कृत्वा षष्ठीमुपवसेद् बुधः॥ २<br>विप्रान् सम्पूजयित्वा तु मन्दारं प्राशयेन्निशि।<br>ततः प्रभात उत्थाय कृत्वा स्नानं पुनर्द्विजान्॥ ३ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं परम पुण्यप्रदायिनी मन्दारसप्तमीका वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापोंकी विनाशिनी एवं सम्पूर्ण कामनाओंकी प्रदात्री है। बुद्धिमान् व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको थोड़ा आहार करके (रात्रिमें शयन करे)। पुनः षष्ठी तिथिको प्रातःकाल दातून कर दिनभर उपवास करे। रातमें ब्राह्मणोंकी पूजा कर मन्दार-पुष्पका भक्षण करे और सो जाय। तत्पश्चात् सप्तमी* तिथिको प्रातःकाल उठकर स्नान आदि नित्यकर्म सम्पादन कर |
* पाद्म, वायव्यादि विविध माघमाहात्म्यों एवं 'व्रतरत्न' आदि व्रतनिबन्धोंमें इसी तिथिको अचलासप्तमी, रथसप्तमी, रथाङ्गसप्तमी, महासप्तमी आदि कहकर अन्य व्रत भी निर्दिष्ट हैं।
| २९२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भोजयेच्छक्तितः कुर्यात् मन्दारकुसुमाष्टकम्।<br>सौवर्णं पुरुषं तद्वत् पद्महस्तं सुशोभनम्॥ ४<br><br>पद्मं कृष्णातिलैः कृत्वा ताम्रपात्रेऽष्टपत्रकम्।<br>हेममन्दारकुसुमैर्भास्करायेति पूर्वतः॥ ५<br><br>नमस्कारेण तद्वच्च सूर्यायेत्यानले दले।<br>दक्षिणे तद्वदर्काय तथार्यम्णेति नैर्ऋते॥ ६<br><br>पश्चिमे वेदधाम्ने च वायव्ये चण्डभानवे।<br>पूष्णोत्युत्तरतः पूज्यमानन्दायैत्यतः परम्॥ ७<br><br>कर्णिकायां च पुरुषं स्थाप्य सर्वात्मनेति च।<br>शुक्लवस्त्रैः समावेष्ट्य भक्ष्यैर्माल्पफलादिभिः॥ ८ | अपनी शक्तिके अनुसार पुनः ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तदनन्तर सोनेके आठ मन्दार-पुष्प और एक पुरुषाकार सुन्दर मूर्ति बनवाये, जिसके हाथमें कमल सुशोभित हो। पुनः ताँबेके पात्रमें काले तिलोंसे अष्टदल कमलकी रचना करे। तदनन्तर स्वर्णमय मन्दार-पुष्पोंद्वारा (कमलके आठों दलोंपर वक्ष्यमाण-मन्त्रोंका उच्चारण करके सूर्यका आवाहन करे। यथा—) 'भास्कराय नमः' से पूर्वदलपर, 'सूर्याय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'अर्काय नमः' से दक्षिणदलपर, 'अर्यम्णे नमः' से नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर, 'वेदधाम्ने नमः' से पश्चिमदलपर, 'चण्डभानवे नमः' से वायव्यकोणस्थित दलपर, 'पूष्णे नमः' से उत्तरदलपर, उसके बाद 'आनन्दाय नमः' से ईशानकोणवाले दलपर स्थापना करके कर्णिकाके मध्यमें 'सर्वात्मने नमः' कहकर पुरुषाकार मूर्तिको स्थापित कर दे तथा उसे श्वेत वस्त्रोंसे ढँककर खाद्य पदार्थ (नैवेद्य), पुष्पमाला, फल आदिसे उसकी अर्चना करे॥ १-८॥ |
| एवमभ्यर्च्य तत् सर्वं दद्याद् वेदविदे पुनः।<br>भुञ्जीतातैललवणं वाग्यतः प्राङ्मुखो गृही॥ ९<br><br>अनेन विधिना सर्वं सप्तम्यां मासि मासि च।<br>कुर्यात् संवत्सरं यावद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ १० | इस प्रकार गृहस्थ व्रती उस मूर्तिका पूजन कर पुनः वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और स्वयं पूर्वाभिमुख बैठकर मौन हो तेल और नमकरहित अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको इसी विधिके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न करनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। |
| एतदेव व्रतान्ते तु निधाय कलशोपरि।<br>गोभिर्विभवतः सार्धं दातव्यं भूतिमिच्छता॥ ११ | व्रतकी समाप्तिके समय वैभवकी अभिलाषा रखनेवाला व्रती उस मूर्तिको कलशके ऊपर रखकर अपनी धन-सम्पत्तिके अनुसार प्रस्तुत की गयी गौओंके साथ दान कर दे। |
| नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च।<br>त्वं रवे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्॥ १२ | (उस समय सूर्यभगवान्से यों प्रार्थना करे—) 'सूर्यदेव! आप मन्दारके स्वामी हैं और मन्दार आपका भवन है, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंका इस संसाररूपी सागरसे उद्धार कीजिये।' |
| अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मन्दारसप्तमीम्।<br>विपाप्मा स सुखी मर्त्यः कल्पं च दिवि मोदते॥ १३ | जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस मन्दारसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित हो सुखपूर्वक एक कल्पतक स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है। |
| इमामघौघपटलभीषणध्वान्तदीपिकाम् ।<br>गच्छन् संगृह्य संसारशर्वर्यां न स्खलेन्नरः॥ १४ | यह सप्तमीव्रत पापसमूहरूप परदेसे आच्छादित होनेके कारण प्रकट हुए भयंकर अन्धकारके लिये दीपकके समान है, जो मनुष्य इसे हाथमें लेकर संसाररूपी रात्रिमें यात्रा करता है, वह कहीं पथभ्रष्ट नहीं होता। |
| मन्दारसप्तमीमेतामीप्सितार्थफलप्रदाम् ।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १५ | जो मनुष्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली इस मन्दारसप्तमीके व्रतको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९-१५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्दारसप्तमीव्रतं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्दारसप्तमीव्रत नामक उन्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७९॥
* अध्याय ८० * <span style="float: right;">२९३</span>
अस्सीवाँ अध्याय
शुभसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| अथान्यामपि वक्ष्यामि शोभनां शुभसप्तमीम्।<br>यामुपोष्य नरो रोगशोकदुःखैः प्रमुच्यते॥ १<br><br>पुण्ये चाश्वयुजे मासि कृतस्नानजपः शुचिः।<br>वाचयित्वा ततो विप्रानारभेच्छुभसप्तमीम्॥ २<br><br>कपिलां पूजयेद् भक्त्या गन्धमाल्यानुलेपनैः।<br>नमामि सूर्यसम्भूतामशेषभुवनालयाम्।<br>त्वामहं शुभकल्याणशरीरां सर्वसिद्धये॥ ३<br><br>अथ कृत्वा तिलप्रस्थं ताम्रपात्रेण संयुतम्।<br>काञ्चनं वृषभं तद्वद् गन्धमाल्यगुडान्वितम्॥ ४<br><br>फलैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्घृतपायससंयुतैः ।<br>दद्याद् विकालवेलायामर्यमा प्रीयतामिति॥ ५<br><br>पञ्चगव्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावसंस्तरे।<br>ततः प्रभाते संजाते भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्॥ ६<br><br>अनेन विधिना दद्यान्मासि मासि सदा नरः।<br>वाससी वृषभं हैमं तद्वद् गां काञ्चनोद्भवाम्॥ ७<br><br>संवत्सरान्ते शयनमिक्षुदण्डगुडान्वितम्।<br>सोपधानकविश्रामं भाजनासनसंयुतम्॥ ८<br><br>ताम्रपात्रे तिलप्रस्थं सौवर्णं वृषभं तथा।<br>दद्याद् वेदविदे सर्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ९ | ब्रह्मन्! अब मैं एक अन्य सुन्दर शुभसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य रोग, शोक और दुःखसे मुक्त हो जाता है। पुण्यप्रद आश्विनमासमें (शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको) व्रती स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो जाय, तब ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर शुभसप्तमी-व्रत आरम्भ करे। उस समय सुगन्धित पदार्थ, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे भक्तिपूर्वक कपिला गौकी पूजा करके यों प्रार्थना करे—'देवि! आप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रयभूता हैं तथा आपका शरीर सुशोभन मङ्गलोंसे युक्त है, आपको मैं समस्त सिद्धियोंकी प्राप्तिके निमित्त नमस्कार करता हूँ।' तदनन्तर एक ताँबेके पात्रमें एक सेर तिल भर दे और एक बड़े आसनपर स्वर्णमय वृषभको स्थापित कर उसकी चन्दन, माला, गुड़, फल, घी एवं दूधसे बने हुए नाना प्रकारके नैवेद्य आदिसे पूजा करे। फिर सायंकाल 'अर्यमा प्रसन्न हों' यों कहकर उसे दान कर दे। रातमें पञ्चगव्य खाकर बिना बिछावनके ही भूमिपर शयन करे। प्रातःकाल होनेपर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करे। व्रती मनुष्यको प्रत्येक मासमें सदा इसी विधिसे दो वस्त्र, स्वर्णमय बैल और स्वर्णनिर्मित गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार वर्षकी समाप्तिमें विश्रामहेतु गद्दा, तकिया आदिसे युक्त एवं ईख, गुड़, बर्तन, आसन आदिसे सम्पन्न शय्या तथा एक सेर तिलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रके ऊपर स्थापित स्वर्णमय वृषभ आदि सारा उपकरण वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और यों कहे—'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'॥ १-९॥ |
| अनेन विधिना विद्वान् कुर्याद् यः शुभसप्तमीम्।<br>तस्य श्रीर्विपुला कीर्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥ १०<br><br>अप्सरोगणगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरालये।<br>वसेद् गणाधिपो भूत्वा यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>कल्पादाववतीर्णस्तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥ ११ | जो विद्वान् पुरुष उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शुभसप्तमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे प्रत्येक जन्ममें विपुल लक्ष्मी और कीर्ति प्राप्त होती है। वह देवलोकमें गणाधीश्वर होकर अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा पूजित होता हुआ प्रलयपर्यन्त निवास करता है। पुनः कल्पके |
| २९४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्महत्यासहस्रस्य भ्रूणहत्याशतस्य च।<br>नाशयालमियं पुण्या पठ्यते शुभसप्तमी ॥ १२<br>इमां पठेद् यः शृणुयान्मुहूर्तं<br>पश्येत् प्रसङ्गादपि दीयमानम्।<br>सोऽप्यत्र सर्वाघविमुक्तदेहः<br>प्राप्नोति विद्याधरनायकत्वम् ॥ १३<br>यावत् समाः सप्त नरः करोति<br>यः सप्तमीं सप्तविधानयुक्ताम्।<br>स सप्तलोकाधिपतिः क्रमेण<br>भूत्वा पदं याति परं मुरारेः ॥ १४ । | आदिमें उत्पन्न होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। यह पुण्यप्रद शुभसप्तमी एक हजार ब्रह्महत्या और एक सौ भ्रूणहत्याके पापोंका नाश करनेके लिये समर्थ कही जाती है। जो मनुष्य इस व्रत-विधिको पढ़ता अथवा दो घड़ीतक सुनता है तथा प्रसङ्गवश दिये जाते हुए दानको देखता है, वह भी इस लोकमें समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परलोकमें विद्याधरोंके अधिनायक-पदको प्राप्त करता है। जो मनुष्य उपर्युक्त सात विधानोंसे युक्त इस सप्तमीव्रतका सात वर्षोंतक अनुष्ठान करता है, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति होकर अन्तमें भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ १०—१४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शुभसप्तमीव्रतं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुभसप्तमीव्रत नामक अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
विशोकद्वादशीव्रतकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>किमभीष्टवियोगशोकसंघा-<br>दलमुद्धर्तुमुपोषणं व्रतं वा।<br>विभवोद्भवकारि भूतलेऽस्मिन्<br>भवभीतेरपि सूदनं च पुंसः ॥ १ | मनुने पूछा— भगवन्! इस भूतलपर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्यके अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे उत्पन्न शोकसमूहसे उद्धार करनेमें समर्थ, धन-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला और संसार-भयका नाशक है ॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>परिपृष्टमिदं जगत्प्रियं ते<br>विबुधानामपि दुर्लभं महत्त्वात्।<br>तव भक्तिमतस्तथापि वक्ष्ये<br>व्रतमिन्द्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥ २<br><br>पुण्यमाश्वयुजे मासि विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>दशम्यां लघुभुग्विद्वानारभेन्नियमेन तु ॥ ३<br><br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा दन्तधावनपूर्वकम्।<br>एकादश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य केशवम्।<br>श्रियं वाभ्यर्च्य विधिवद् भोक्ष्येऽहं चापरेऽहनि ॥ ४ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजर्षे! तुमने जिस व्रतके विषयमें प्रश्न किया है, यह समस्त जगत्को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते, तथापि तुम-जैसे भक्तिमान्के प्रति मैं अवश्य इसका वर्णन करूँगा। उस पुण्यप्रद व्रतका नाम विशोकद्वादशीव्रत है। विद्वान् व्रतीको आश्विनमासमें दशमी तिथिको अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रतका आरम्भ करना चाहिये। पुनः एकादशीके दिन व्रती मानव उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातून करे, फिर (स्नान आदिसे निवृत्त होकर) निराहार रहकर भगवान् केशव और लक्ष्मीकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करे और 'दूसरे दिन |
| * अध्याय ८१ * | २९५ |
|---|---|
| एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>स्नानं सर्वौषधैः कुर्यात् पञ्चगव्यजलेन तु॥<br>शुक्लमाल्याम्बरधरः पूजयेच्छ्रीशमुत्पलैः॥ ५<br>विशोकाय नमः पादौ जङ्घे च वरदाय वै।<br>श्रीशाय जानुनी तद्वदूरू च जलशायिने॥ ६<br>कन्दर्पाय नमो गुह्यं माधवाय नमः कटिम्।<br>दामोदरायेत्युदरं पार्श्वे च विपुलाय वै॥ ७<br>नाभिं च पद्मनाभाय हृदयं मन्मथाय वै।<br>श्रीधराय विभोर्वक्षः करौ मधुजिते नमः॥ ८<br>चक्रिणे वामबाहुं च दक्षिणं गदिने नमः।<br>वैकुण्ठाय नमः कण्ठमास्यं यज्ञमुखाय वै॥ ९<br>नासामशोकनिधये वासुदेवाय चक्षुषी।<br>ललाटं वामनायेति हरयेति पुनर्ध्रुवौ॥ १०<br>अलकान् माधवायेति किरीटं विश्वरूपिणे।<br>नमः सर्वात्मने तद्वच्छिर इत्यभिपूजयेत्॥ ११<br>एवं सम्पूज्य गोविन्दं फलमाल्यानुलेपनैः।<br>ततस्तु मण्डलं कृत्वा स्थण्डिलं कारयेन्मुदा॥ १२<br>चतुरस्रं समन्ताच्च रत्निमात्रमुदक्प्लवम्।<br>श्लक्ष्णं हृद्यं च परितो वप्रत्रयसमावृतम्॥ १३<br>त्र्यङ्गुलेनोच्छ्रिता वप्रास्तद्विस्तारस्तु द्व्यङ्गुलः।<br>स्थण्डिलस्योपरिष्टाच्च भित्तिरष्टाङ्गुला भवेत्॥ १४<br>नदीवालुकया शूर्पे लक्ष्म्याः प्रतिकृतिं न्यसेत्।<br>स्थण्डिले शूर्पमारोप्य लक्ष्मीमित्यर्चयेद् बुधः॥ १५<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै वृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः॥ १६<br>विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे।<br>विशोका चास्तु सम्पत्त्यै विशोका सर्वसिद्धये॥ १७<br>ततः शुक्लाम्बरैः शूर्पं वेष्ट्य सम्पूजयेत् फलैः।<br>वस्त्रैर्नानाविधैस्तद्वत् सुवर्णकमलेन च॥ १८<br>रजनीषु च सर्वासु पिबेद् दर्भोदकं बुधः।<br>ततस्तु गीतनृत्यादि कारयेत् सकलां निशाम्॥ १९ | भोजन करूँगा'—ऐसा नियम लेकर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर सर्वौषधि और पञ्चगव्य मिले हुए जलसे स्नान करे तथा श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करके भगवान् विष्णुकी कमल-पुष्पोंद्वारा पूजा करे। (पूजनकी विधि इस प्रकार है—) 'विशोकाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'वरदाय नमः' से दोनों जङ्घाओंका, 'श्रीशाय नमः' से दोनों जानुओंका, 'जलशायिने नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'कन्दर्पाय नमः' से गुह्यप्रदेशका, 'माधवाय नमः' से कटिप्रदेशका, 'दामोदराय नमः' से उदरका, 'विपुलाय नमः' से दोनों पार्श्वभागोंका, 'पद्मनाभाय नमः' से नाभिका, 'मन्मथाय नमः' से हृदयका, 'श्रीधराय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलका, 'मधुजिते नमः' से दोनों हाथोंका, 'चक्रिणे नमः' से बाँयीं भुजाका, 'गदिने नमः' से दाहिनी भुजाका, 'वैकुण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'यज्ञमुखाय नमः' से मुखका, 'अशोकनिधये नमः' से नासिकाका, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों नेत्रोंका, 'वामनाय नमः' से ललाटका, 'हरये नमः' से दोनों भौंहोंका, 'माधवाय नमः' से बालोंका, 'विश्वरूपिणे नमः' से किरीटका और 'सर्वात्मने नमः' से सिरका पूजन करना चाहिये॥ २—११॥<br><br>इस प्रकार हर्षपूर्वक फल, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे भगवान् गोविन्दका पूजन करनेके पश्चात् मण्डल बनाकर वेदीका निर्माण कराये। वह वेदी बीस अंगुल लम्बी-चौड़ी, चारों ओरसे चौकोर, उत्तरकी ओर ढालू, चिकनी, सुन्दर और तीन ओर वप्र (परिधि)-से युक्त हो। वे वप्र तीन अङ्गुल ऊँचे और दो अङ्गुल चौड़े होने चाहिये। वेदीके ऊपर आठ अङ्गुलकी दीवाल बनायी जाय। तत्पश्चात् बुद्धिमान् व्रती सूपमें नदीकी बालुकासे लक्ष्मीकी मूर्ति अङ्कित करे और उस सूपको वेदीपर रखकर 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'वृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः' के उच्चारणपूर्वक लक्ष्मीकी अर्चना करे और यों प्रार्थना करे—'विशोका (लक्ष्मीदेवी) मेरे दुःखोंका नाश करें, विशोका मेरे लिये वरदायिनी हों, विशोका मुझे धन-सम्पत्ति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें।' तदनन्तर श्वेत वस्त्रोंसे सूपको परिवेष्टित कर नाना प्रकारके फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलसे लक्ष्मीकी पूजा करे। चतुर व्रती सभी रात्रियोंमें कुशोदक पान करे और सारी रात नाच-गान आदिका आयोजन |
८४ लवणाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| २९६ | * मत्स्यपुराण * |
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| यामत्रये व्यतीते तु सुप्त्वाप्युत्थाय मानवः।<br>अभिगम्य च विप्राणां मिथुनानि तदार्चयेत्॥ २०<br>शक्तिस्तस्त्रीणि चैकं वा वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>शयनस्थानि पूज्यानि नमोऽस्तु जलशायिने॥ २१<br>ततस्तु गीतवाद्येन रात्रौ जागरणे कृते।<br>प्रभाते च ततः स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्॥ २२<br>भोजनं च यथाशक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>भुक्त्वा श्रुत्वा पुराणानि तद् दिनं चातिवाहयेत्॥ २३<br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>व्रतान्ते शयनं दद्याद् गुडधेनुसमन्वितम्।<br>सोपधानकविश्रामं सास्तरावरणं शुभम्॥ २४<br>यथा न लक्ष्मीर्देवेश त्वां परित्यज्य गच्छति।<br>तथा सुरूपतारोग्यमशोकश्चास्तु मे सदा॥ २५<br>यथा देवेन रहिता न लक्ष्मीर्जायते क्वचित्।<br>तथा विशोकता मेऽस्तु भक्तिरग्र्या च केशवे॥ २६<br>मन्त्रेणानेन शयनं गुडधेनुसमन्वितम्।<br>शूर्पं च लक्ष्म्या सहितं दातव्यं भूतिमिच्छता॥ २७<br>उत्पलं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कुमम्।<br>केतकी सिन्धुवारं च मल्लिका गन्धपाटला।<br>कदम्बं कुब्जकं जातिः शस्तान्येतानि सर्वदा॥ २८ | करावे। तीन पहर रात व्यतीत होनेपर व्रती मनुष्य स्वयं नींद त्यागकर उठ पड़े और अपनी शक्तिके अनुसार शय्यापर सोते हुए तीन या एक द्विज-दम्पतिके पास जाकर वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे ‘जलशायिने नमोऽस्तु’—जलशायी भगवान्को नमस्कार है—यों कहकर उनकी पूजा करे। इस प्रकार रातमें गीत-वाद्य आदि कराकर जागरण करे तथा प्रातःकाल स्नान कर पुनः द्विज-दम्पतिका पूजन करे और कृपणता छोड़कर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल उन्हें भोजन करावे। फिर स्वयं भोजन करके पुराणोंकी कथाएँ सुनते हुए वह दिन व्यतीत करे। प्रत्येक मासमें इसी विधिसे सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये॥ १२—२३ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार व्रतकी समाप्तिके अवसरपर गद्दा, चादर, तकिया आदि उपकरणोंसे युक्त एक सुन्दर शय्या गुड-धेनुके साथ दान करके यों प्रार्थना करे—‘देवेश! जिस प्रकार लक्ष्मी आपका परित्याग करके अन्यत्र नहीं जातीं, उसी प्रकार मुझे सदा सौन्दर्य, नीरोगता और निःशोकता प्राप्त हो। जैसे लक्ष्मी कहीं भी आपसे वियुक्त होकर नहीं प्रकट होतीं, वैसे ही मुझे भी विशोकता और भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो।’ वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको इस मन्त्रके उच्चारणके साथ गुड-धेनुसहित शय्या और लक्ष्मीसहित सूप दान कर देना चाहिये। इस व्रतमें कमल, करवीर (कनेर), बाण (नीलकुसुम या अगस्त्य वृक्षका पुष्प), ताजा (बिना कुम्हलाया हुआ) कुङ्कुम, केतकी (केवड़ा), सिन्दुवार, मल्लिका, गन्धपाटला, कदम्ब, कुब्जक और जाती—ये पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं॥ २४—२८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकद्वादशीव्रतं नामैकाशीतितमोऽध्यायः॥ ८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकद्वादशीव्रत नामक इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८१॥
८५- गुडपर्वतके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
* अध्याय ८२ * २९७
बयासीवाँ अध्याय
गुड-धेनुके$^१$ दानकी विधि और उसकी महिमा
| मनुरुवाच | मनुने पूछा—जगत्पते! अब आप मुझे (अभी विशोकद्वादशीके प्रसङ्गमें निर्दिष्ट) गुड-धेनुका विधान बतलाइये। साथ ही उस गुड-धेनुका कैसा रूप होता है और उसे किस मन्त्रका पाठ करके दान करना चाहिये—यह भी बतलानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
|---|---|
| गुडधेनुविधानं मे समाचक्ष्व जगत्पते।<br>किं रूपं केन मन्त्रेण दातव्यं तदिहोच्यताम्॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजर्षे! इस लोकमें गुड-धेनुके विधानका जो रूप है और उसका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका मैं अब वर्णन कर रहा हूँ। वह समस्त पापोंका विनाशक है। गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर सब ओरसे कुश बिछाकर उसपर चार हाथ लम्बा काला मृगचर्म स्थापित कर दे, जिसका अग्रभाग पूर्व दिशाकी ओर हो। उसी प्रकार एक छोटे मृगचर्ममें बछड़ेकी कल्पना करके उसीके निकट रख दे। फिर उसमें पूर्व मुख और उत्तर पैरवाली सवत्सा गौकी कल्पना करनी चाहिये। चार भार$^२$ गुड़से बनी हुई गुड-धेनु सदा उत्तम मानी गयी है। उसका बछड़ा एक भार गुड़का बनाना चाहिये। दो भार गुड़की बनी हुई धेनु मध्यम कही गयी है। उसका बछड़ा आधा भार गुड़का होना चाहिये। एक भार गुड़की बनी धेनु कनिष्ठा होती है, उसका बछड़ा चौथाई भार गुड़का बनता है। तात्पर्य यह है कि अपने गृहकी सम्पत्तिके अनुसार इस (गौ)-का निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार गौ और बछड़ेकी कल्पना करके उन्हें श्वेत एवं महीन वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर घीसे उनके मुखकी, सीपसे कानोंकी, गन्नेसे पैरोंकी, श्वेत मोतीसे नेत्रोंकी, श्वेत सूतसे नाड़ियोंकी, श्वेत कम्बलसे गलकम्बलकी, लाल रंगके चिह्नसे पीठकी, श्वेत रंगके मृगपुच्छके बालोंसे रोएँकी, मूँगेसे दोनों भौंहोंकी, मक्खनसे दोनोंके स्तनोंकी, रेशमके धागेसे पूँछकी, काँसासे दोहनीकी, इन्द्रनीलमणिसे आँखोंकी तारिकाओंकी, सुवर्णसे सींगके |
| गुडधेनुविधानस्य यद् रूपमिह यत् फलम्।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविनाशनम्॥ २ | |
| कृष्णाजिनं चतुर्हस्तं प्राग्ग्रीवं विन्यसेद् भुवि।<br>गोमयेनानुलिप्तायां दर्भानास्तीर्य सर्वतः॥ ३ | |
| लघ्वेणकाजिनं तद्वद् वत्सं च परिकल्पयेत्।<br>प्राङ्मुखीं कल्पयेद् धेनुमुदक्पादां सवत्सकाम्॥ ४ | |
| उत्तमा गुड़धेनुः स्यात् सदा भारचतुष्टयम्।<br>वत्सं भारेण कुर्वीत द्वाभ्यां वै मध्यमा स्मृता॥ ५ | |
| अर्धभारेण वत्सः स्यात् कनिष्ठा भारकेण तु।<br>चतुर्थांशेन वत्सः स्याद् गृहवित्तानुसारतः॥ ६ | |
| धेनुवत्सौ घृतास्यौ तौ सितसूक्ष्माम्बरावृतौ।<br>शुक्तिकर्णाविक्षुपादौ शुचिमुक्ताफलेक्षणौ॥ ७ | |
| सितसूत्रशिरालौ तौ सितकम्बलकम्बलौ।<br>ताम्रगण्डकपृष्ठौ तौ सितचामररोमकौ॥ ८ | |
| विद्रुमभ्रूयुगोपेतौ नवनीतस्तनावुभौ।<br>क्षौमपुच्छौ कांस्यदोहाविन्द्रनीलकतारकौ॥ ९ | |
| सुवर्णशृङ्गाभरणौ रजतैः खुरसंयुतौ। |
१. यह अध्याय पद्मपु० १। २१, वराहपुराण १०२, कृत्यकल्पतरु ५, दानकाण्ड तथा दानमयूख, दानसागरादिमें विशेष शुद्धरूपसे उद्धृत है। तदनुसार इसे भी शुद्ध किया गया है।
२. दो हजार पल अर्थात् तीन मनके वजनको 'भार' कहते हैं।
८६- सुवर्णाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
२९८ * मत्स्यपुराण *
| नानाफलसमायुक्तौ घ्राणगन्धकरण्डकौ।<br>इत्येवं रचयित्वा तौ धूपदीपैरथार्चयेत्॥ १०<br>या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवेष्ववस्थिता।<br>धेनुरूपेण सा देवी मम शान्तिं प्रयच्छतु॥ ११<br>देहस्था या च रुद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया।<br>धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु॥ १२<br>विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः।<br>चन्द्रार्कशक्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये॥ १३<br>चतुर्मुखस्य या लक्ष्मीर्या लक्ष्मीर्धनदस्य च।<br>लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे॥ १४<br>स्वधा या पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजां च या।<br>सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ १५<br>एवमामन्त्र्य तां धेनुं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।<br>विधानमेतद् धेनूनां सर्वासामभिषद्यते॥ १६<br>यास्ताः पापविनाशिन्यः पठ्यन्ते दश धेनवः।<br>तासां स्वरूपं वक्ष्यामि नामानि च नराधिप॥ १७<br>प्रथमा गुडधेनुः स्याद् घृतधेनुस्तथापरा।<br>तिलधेनुस्तृतीया तु चतुर्थी जलसंज्ञिता॥ १८<br>क्षीरधेनुश्च विख्याता मधुधेनुस्तथापरा।<br>सप्तमी शर्कराधेनुर्दधिधेनुस्तथाष्टमी।<br>रसधेनुश्च नवमी दशमी स्यात् स्वरूपतः॥ १९<br>कुम्भाः स्युर्द्रवधेनूनामितरासां तु राशयः।<br>सुवर्णधेनुमप्यत्र केचिदिच्छन्ति मानवाः॥ २०<br>नवनीतेन रत्नैश्च तथान्ये तु महर्षयः।<br>एतदेवं विधानं स्यात्त एवोपस्कराः स्मृताः॥ २१<br>मन्त्रावाहनसंयुक्ताः सदा पर्वणि पर्वणि।<br>यथाश्रद्धं प्रदातव्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः॥ २२<br>गुडधेनुप्रसङ्गेन सर्वास्तावन्मयोदिताः।<br>अशेषयज्ञफलदाः सर्वाः पापहराः शुभाः॥ २३<br>व्रतानामुत्तमं यस्माद् विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>तदङ्गत्वेन चैवात्र गुडधेनुः प्रशस्यते॥ २४ | आभूषणोंकी, चाँदीसे खुरोंकी और नाना प्रकारके फलोंसे नासापुटोंकी रचना कर धूप, दीप आदिद्वारा उनकी अर्चना करनेके पश्चात् यों प्रार्थना करे॥२-१०॥<br>'जो समस्त प्राणियों तथा देवताओंमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हैं, धेनुरूपसे वही देवी मुझे शान्ति प्रदान करें। जो सदा शङ्करजीके वामाङ्गमें विराजमान रहती हैं तथा उनकी प्रिय पत्नी हैं, वे रुद्राणीदेवी धेनुरूपसे मेरे पापोंका विनाश करें। जो लक्ष्मी विष्णुके वक्षःस्थलपर विराजमान हैं, जो स्वाहारूपसे अग्निकी पत्नी हैं तथा जो चन्द्र, सूर्य और इन्द्रकी शक्तिरूपा हैं, वे ही धेनुरूपसे मेरे लिये सम्पत्तिदायिनी हों। जो ब्रह्माकी लक्ष्मी हैं, जो कुबेरकी लक्ष्मी हैं तथा जो लोकपालोंकी लक्ष्मी हैं, वे धेनुरूपसे मेरे लिये वरदायिनी हों। जो लक्ष्मी प्रधान पितरोंके लिये स्वधारूपा हैं, जो यज्ञभोजी अग्रियोंके लिये स्वाहारूपा हैं, समस्त पापोंको हरनेवाली वे ही धेनुरूपा हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान करें।' इस प्रकार उस गुड-धेनुको आमन्त्रित कर उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। यही विधान घृत-तिल आदि सम्पूर्ण धेनुओंके दानके लिये कहा जाता है। नरेश्वर! अब जो दस पापविनाशिनी गौएँ बतलायी जाती हैं, उनका नाम और स्वरूप बतला रहा हूँ। पहली गुड-धेनु, दूसरी घृत-धेनु, तीसरी तिल-धेनु, चौथी जल-धेनु, पाँचवीं सुप्रसिद्ध क्षीर-धेनु, छठी मधु-धेनु, सातवीं शर्करा-धेनु, आठवीं दधि-धेनु, नवीं रस-धेनु और दसवीं स्वरूपतः प्रत्यक्ष धेनु है। द्रव (बहनेवाले) पदार्थोंसे बननेवाली गौओंका स्वरूप घट है और अद्रव पदार्थोंसे बननेवाली गौओंका उन-उन पदार्थोंकी राशि है। इस लोकमें कुछ मानव सुवर्ण-धेनुकी तथा अन्य महर्षिगण नवनीत (मक्खन) और रत्नोंसे भी गौकी रचनाकी इच्छा करते हैं। परंतु सभीके लिये यही विधान है और ये ही सामग्रियाँ भी हैं। सदा पर्व-पर्वपर अपनी श्रद्धाके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहनसहित इन गौओंका दान करना चाहिये; क्योंकि ये सभी भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाली हैं॥११-२२॥<br>इस प्रकार गुड-धेनुके वर्णन-प्रसङ्गसे मैंने सभी धेनुओंका वर्णन कर दिया। ये सभी सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी और पापहारिणी हैं। चूँकि इस लोकमें विशोकद्वादशी-व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उसका अङ्ग होनेके कारण गुड-धेनु भी प्रशस्त मानी गयी है। |
८७- तिलशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ८३ * | २९९ |
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| अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपातेऽथवा पुनः।<br>गुडधेन्वादयो देयास्तूपरागादिपर्वसु॥ २५<br>विशोकद्वादशी चैषा पुण्या पापहरा शुभा।<br>यामुपोष्य नरो याति तद् विष्णोः परमं पदम्॥ २६<br>इह लोके च सौभाग्यमायुरारोग्यमेव च।<br>वैष्णवं पुरमाप्नोति मरणे च स्मरन् हरिम्॥ २७<br>नवार्बुदसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>न शोकदुःखदौर्गत्यं तस्य संजायते नृप॥ २८<br>नारी वा कुरुते या तु विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>नृत्यगीतपरा नित्यं सापि तत्फलमाप्नुयात्॥ २९<br>तस्मादग्रे हरेर्नित्यमनन्तं गीतवादनम्।<br>कर्तव्यं भूतिकामेन भक्त्या तु परया नृप॥ ३०<br>इति पठति य इत्थं यः शृणोतीह सम्यङ्—<br>मधुमुरनरकारेर्चनं यश्च पश्येत्।<br>मतिमपि च जनानां यो ददातीन्द्रलोके<br>वसति स बिबुधौघैः पूज्यते कल्पमेकम्॥ ३१ | उत्तरायण और दक्षिणायनके दिन, पुण्यप्रद विषुवयोग, व्यतीपातयोग अथवा सूर्य-चन्द्रके ग्रहण आदि पर्वोंपर इन गुड-धेनु आदि गौओंका दान करना चाहिये। यह विशोकद्वादशी पुण्यदायिनी, पापहारिणी और मङ्गलकारिणी है। इसका व्रत करके मनुष्य विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें सौभाग्य, नीरोगता और दीर्घायुका उपभोग करके मरनेपर श्रीहरिका स्मरण करता हुआ विष्णुलोकको चला जाता है। धर्मज्ञ नरेश! उसे नौ अरब अठारह हजार वर्षोंतक शोक, दुःख और दुर्गंतिकी प्राप्ति नहीं होती। अथवा जो स्त्री नित्य नाच-गानमें तत्पर रहकर इस विशोकद्वादशीव्रतका अनुष्ठान करती है, उसे भी वही पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है। राजन्! इसलिये वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको उत्कृष्ट भक्तिके साथ श्रीहरिके समक्ष नित्य-निरन्तर गायन-वादनका आयोजन करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य इस व्रत-विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है एवं मधु, मुर और नरक नामक राक्षसोंके शत्रु श्रीहरिके पूजनको भलीभाँति देखता है तथा वैसा करनेके लिये लोगोंको सम्मति देता है, वह इन्द्रलोकमें वास करता है और एक कल्पतक देवगणोंद्वारा पूजित होता है॥ २३–३१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकद्वादशीव्रतं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकद्वादशीव्रत नामक बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८२॥
तिरासीवाँ अध्याय
पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| नारद उवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि दानमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>यदक्षयं परे लोके देवर्षिगणपूजितम्॥ १ | नारदजीने पूछा— भगवन्! अब मैं विविध दानोंके उत्तम माहात्म्यको श्रवण करना चाहता हूँ, जो देवगणों एवं ऋषिसमूहोंद्वारा पूजित और परलोकमें अक्षय फल देनेवाला है॥ १॥ |
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| उमापतिरुवाच<br>मेरोः प्रदानं वक्ष्यामि दशधा मुनिपुङ्गव।<br>यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति सुरपूजितान्॥ २<br>पुराणेषु च वेदेषु यज्ञेष्व्वायतनेषु च।<br>न तत्फलमधीतेषु कृतेष्विह यदश्नुते॥ ३ | उमापतिने कहा— मुनिपुङ्गव! मैं मेरु-(पर्वत) दानके दस भेदोंको बतला रहा हूँ। जिनका दान करनेसे मनुष्य देवपूजित लोकोंको प्राप्त करता है। उसे इस लोकमें जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह वेदों और पुराणोंके अध्ययनसे, यज्ञानुष्ठानसे और देव-मन्दिर आदिके |
८९- घृताचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
३०० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्माद् विधानं वक्ष्यामि पर्वतानामनुक्रमात्।<br>प्रथमो धान्यशैलः स्याद् द्वितीयो लवणाचलः॥ ४<br>गुडाचलस्तृतीयस्तु चतुर्थो हेमपर्वतः।<br>पञ्चमस्तिलशैलः स्यात् षष्ठः कार्पासपर्वतः॥ ५<br>सप्तमो घृतशैलश्च रत्नशैलस्तथाष्टमः।<br>राजतो नवमस्तद्वद् दशमः शर्कराचलः॥ ६<br>वक्ष्ये विधानमेतेषां यथावदनुपूर्वशः।<br>अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये॥ ७<br>शुक्लपक्षे तृतीयायामुपरागे शशिक्षये।<br>विवाहोत्सवयज्ञेषु द्वादश्यामथ वा पुनः॥ ८<br>शुक्लायां पञ्चदश्यां वा पुण्यर्क्षे वा विधानतः।<br>धान्यशैलादयो देया यथाशास्त्रं विजानता॥ ९<br>तीर्थेष्वायतने वापि गोष्ठे वा भवनाङ्गणे।<br>मण्डपं कारयेद् भक्त्या चतुरस्रमुदङ्मुखम्।<br>प्रागुदक्प्रवणं तद्वत् प्राङ्मुखं च विधानतः॥ १०<br>गोमयेनानुुलिप्तायां भूमावास्तीर्य वै कुशान्।<br>तन्मध्ये पर्वतं कुर्याद् विष्कम्भपर्वतान्वितम्॥ ११<br>धान्यद्रोणसहस्रेण भवेद् गिरिरिहोत्तमः।<br>मध्यमः पञ्चशतकः कनिष्ठः स्यात् त्रिभिः शतैः॥ १२ | निर्माणसे भी नहीं प्राप्त होता। इसलिये अब मैं पर्वतोंके क्रमसे उनके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। (उनके नाम हैं—) पहला धान्यशैल, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमपर्वत, पाँचवाँ तिलशैल, छठा कार्पासपर्वत, सातवाँ घृतशैल, आठवाँ रत्नशैल, नवाँ रजतशैल और दसवाँ शर्कराचल। इनका विधान यथार्थरूपसे क्रमशः बतला रहा हूँ। सूर्यके उत्तरायण और दक्षिणायनके समय, पुण्यमय विषुवयोगमें, व्यतीपातयोगमें, ग्रहणके समय सूर्य अथवा चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेपर, शुक्लपक्षकी तृतीया, द्वादशी अथवा पूर्णिमा तिथिके दिन, विवाह, उत्सव और यज्ञके अवसरोंपर तथा पुण्यप्रद शुभ नक्षत्रके योगमें विद्वान् दाताको शास्त्रादेशानुसार विधिपूर्वक धान्यशैल आदि पर्वतदानोंको करना चाहिये। इसके लिये तीर्थोंमें, देवमन्दिरमें, गोशालामें अथवा अपने घरके आँगनमें ही भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ एक चौकोर मण्डपका निर्माण करावे; उसमें उत्तर और पूर्व दिशामें दो दरवाजे हों और उसकी भूमि पूर्वोत्तर दिशामें ढालू हो। उस मण्डपकी गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर कुश बिछाकर उसके बीचमें विष्कम्भपर्वतसहित¹ देय पदार्थकी पर्वताकार राशि लगा दे। इस विषयमें एक हजार द्रोण² अन्नका पर्वत उत्तम, पाँच सौ द्रोणका मध्यम और तीन सौ द्रोणका कनिष्ठ माना जाता है॥ २—१२॥ |
| मेरुर्महाव्रीहिमयस्तु मध्ये<br>सुवर्णवृक्षत्रयसंयुतः स्यात्।<br>पूर्वेण मुक्ताफलवज्रयुक्तो<br>याम्येन गोमेदकपुष्परागैः॥ १३<br>पश्चाच्च गारुत्मतनीलरत्नैः<br>सौम्येन वैदूर्यसरोजरागैः।<br>श्रीखण्डखण्डैरभितः प्रवालै-<br>र्लतान्वितः शुक्तिशिलातलः स्यात्॥ १४<br>ब्रह्माथ विष्णुर्भगवान् पुरारि-<br>र्दिवाकरोऽप्यत्र हिरण्मयः स्यात्।<br>मूर्धन्यवस्थानममत्सरेण<br>कार्यं त्वनेकैश्च पुनर्द्विजौघैः॥ १५ | महान् धान्यराशिसे बने हुए मेरु पर्वतको मध्यमें तीन स्वर्णमय वृक्षोंसे युक्त कर, पूर्व दिशामें मोती और हीरेसे, दक्षिण दिशामें गोमेद और पुष्पराग (पुखराज)-से, पश्चिम दिशामें गारुत्मत (पन्ना) और नीलम मणिसे, उत्तर दिशामें वैदूर्य और पद्मराग मणिसे तथा चारों ओर चन्दनके टुकड़ों और मूँगेसे सुशोभित कर दे। उसे लताओंसे परिवेष्टित तथा सीपीके शिलाखण्डोंसे सुसज्जित कर दिया जाय। पुनः यजमान गर्वरहित होकर अनेकों द्विजसमूहोंके साथ उस पर्वतके मूर्धा-स्थानपर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शङ्कर और सूर्यकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। |
१. सुमेरुगिरिके चारों ओर स्थित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक पर्वतोंको 'विष्कम्भपर्वत' कहा जाता है।
२. बत्तीस सेरका एक प्राचीन मान।
९०- रत्नाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ८३ * | ३०१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चत्वारि शृङ्गाणि च राजतानि<br>नितम्बभागेष्वपि राजतः स्यात्।<br>तथेषुवंशावृतकन्दरस्तु<br>घृतोदकप्रस्रवणैश्च दिक्षु॥ १६<br>शुक्लाम्बराण्युम्बुधरावली स्यात्<br>पूर्वेण पीतानि च दक्षिणेन।<br>वासांसि पश्चादथ कर्बुराणि<br>रक्तानि चैवोत्तरतो घनाली॥ १७<br>रौप्यान् महेन्द्रप्रमुखान्स्तथाष्टौ<br>संस्थाप्य लोकाधिपतीन् क्रमेण।<br>नानाफलाली च समन्ततः स्या-<br>न्मनोरमं माल्यविलेपनं च॥ १८<br>वितानकं चोपरि पञ्चवर्ण-<br>म्म्लानपुष्पाभरणं सितं च।<br>इत्थं निवेश्यामरशैलमग्र्यं<br>मेरोस्तु विष्कम्भगिरीन् क्रमेण॥ १९<br>तुरीयभागेन चतुर्दिशं च<br>संस्थापयेत् पुष्पविलेपनाढ्यान्।<br>पूर्वेण मन्दरमनेकफलावलीभि-<br>र्युक्तं यवैः कनकभद्रकदम्बचिह्नैः॥ २०<br>कामेन काञ्चनमयेन विराजमान-<br>माकारयेत् कुसुमवस्त्रविलेपनाढ्यम्।<br>क्षीरारुणोदसरसाथ वनेन चैवं<br>रौप्येण शक्तिघटितेन विराजमानम्॥ २१ | उसमें चाँदीके चार शिखर बनाये जायँ, जिनके नितम्बभाग भी चाँदीके ही बने हों। उसी प्रकार चारों दिशाओंमें गन्ना और बाँससे ढकी हुई कन्दराएँ तथा घी और जलके झरने भी बनाये जायँ। पुनः पूर्व दिशामें श्वेत वस्त्रोंसे, दक्षिण दिशामें पीले वस्त्रोंसे, पश्चिम दिशामें चितकबरे वस्त्रोंसे और उत्तर दिशामें लाल वस्त्रोंसे बादलोंकी पङ्क्तियाँ बनायी जायँ। फिर चाँदीके बने हुए महेन्द्र आदि आठों लोकपालोंको क्रमशः स्थापित करे और उस पर्वतके चारों ओर अनेकों प्रकारके फल, मनोरम पुष्पमालाएँ और चन्दन भी रख दे। उसके ऊपर पँचरंगा चाँदौवा लगा दे और उसे खिले हुए श्वेत पुष्पोंसे विभूषित कर दे। इस प्रकार श्रेष्ठ अमरशैल (सुमेरुगिरि)-की स्थापना कर उसके चतुर्थांशसे इसकी चारों दिशाओंमें क्रमशः विष्कम्भ (मर्यादा) पर्वतोंकी स्थापना करनी चाहिये। ये सभी पुष्प और चन्दनसे सुशोभित हों। पूर्व दिशामें यवसे मन्दराचलका आकार बनावे, उसके निकट अनेकों प्रकारके फलोंकी कतारें लगा दे, उसे कनकभद्र (देवदारु) और कदम्ब-वृक्षोंके चिह्नोंसे सुशोभित कर दे, उसपर कामदेवकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित कर दे। फिर उसे अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीके बने हुए वन और दूधनिर्मित अरुणोद नामक सरोवरसे सुशोभित कर दे। तत्पश्चात् वस्त्र, पुष्प और चन्दन आदिसे उसे भरपूर सुसज्जित कर देना चाहिये॥ १३–२१॥ |
| याम्येन गन्धमदनश्च विवेशनीयो<br>गोधूमसंचयमयः कलधौतयुक्तः।<br>हैमेन यज्ञपतिना घृतमानसेन<br>वस्त्रैश्च रजतवनेन च संयुतः स्यात्॥ २२<br>पश्चात् तिलाचलमनेकसुगन्धिपुष्प-<br>सौवर्णपिप्पलहिरण्मयहंसयुक्तम्।<br>आकारयेद् रजतपुष्पवनेन तद्वद्<br>वस्त्रान्वितं दधिसितोदरस्तथाग्रे॥ २३<br>संस्थाप्य तं विपुलशैलमथोत्तरेण<br>शैलं सुपार्श्वमपि माषमयं सुवस्त्रम्।<br>पुष्पैश्च हेमवटपादपशेखरं त-<br>माकारयेत् कनकधेनुविराजमानम्॥ २४ | दक्षिण दिशामें गेहूँकी राशिसे गन्धमादनकी रचना करनी चाहिये। उसे स्वर्णपत्रसे सुशोभित कर दे। उसपर यज्ञपतिकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर दे और उसे वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर उसे घीके सरोवर और चाँदीके वनसे सुशोभित कर देना चाहिये। पश्चिम दिशामें अनेकों सुगन्धित पुष्पों, स्वर्णमय पीपल-वृक्ष और सुवर्णनिर्मित हंससे युक्त तिलाचलकी स्थापना करनी चाहिये। उसी प्रकार इसे भी वस्त्रसे परिवेष्टित तथा चाँदीके पुष्पवनसे सुशोभित कर दे। इसके अग्रभागमें दहीसे सितोद सरोवरकी भी रचना कर दे। इस प्रकार उस विपुल शैलकी स्थापना करके उत्तर दिशामें उड़दसे सुपार्श्व नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित कर दे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वटवृक्ष रख दे और सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे। |
९१- रजताचलिके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
३०२ * मत्स्यपुराण *
| माक्षीकभद्रसरसाथ वनेन तद्वद्<br>रौप्येण भास्वरवता च युतं विधाय।<br>होमश्रुतुर्भिरथ वेदपुराणविद्भि-<br>र्दान्तैरनिन्द्यचरिताकृतिभिर्द्विजेन्द्रैः ॥ २५<br>पूर्वेण हस्तमितमत्र विधाय कुण्डं<br>कार्यस्तिलैर्यवघृतेन समित्कुशैश्च।<br>रात्रौ च जागरमनुद्धतगीततूर्यै-<br>रावाहनं च कथयामि शिलोच्चयानाम्॥ २६<br>त्वं सर्वदेवगणधामनिधे विरुद्ध-<br>मस्मद्गृहेष्वमरपर्वत नाशयाशु।<br>क्षेमं विधत्स्व कुरु शान्तिमनुत्तमां नः<br>सम्पूजितः परमभक्तिमता मया हि ॥ २७<br>त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः।<br>मूर्तामूर्तात् परं बीजमतः पाहि सनातन॥ २८<br>यस्मात् त्वं लोकपालानां विश्वमूर्तेश्च मन्दिरम्।<br>रुद्रादित्यवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २९<br>यस्मादशून्यममरैर्नारीभिश्च शिवेन च।<br>तस्मान्मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥ ३०<br>एवमभ्यर्च्य तं मेरुं मन्दरं चाभिपूजयेत्।<br>यस्माच्चैत्ररथेन त्वं भद्राश्वेन च वर्षतः॥ ३१<br>शोभसे मन्दर क्षिप्रमतस्तुष्टिकरो भव।<br>यस्माच्चूडामणिर्जम्बूद्वीपे त्वं गन्धमादन ॥ ३२<br>गन्धर्ववनशोभावानातः कीर्तिर्दृढास्तु मे।<br>यस्मात् त्वं केतुमालेन वैभ्राजेन वनेन च॥ ३३<br>हिरण्मयाश्वत्थशिरास्तस्मात् पुष्टिर्ध्रुवास्तु मे।<br>उत्तरैः कुरुभिर्यस्मात् सावित्रेण वनेन च॥ ३४<br>सुपार्श्व राजसे नित्यमतः श्रीरक्षयास्तु मे।<br>एवमामन्त्र्य तान् सर्वान् प्रभाते विमले पुनः॥ ३५<br>स्नात्वाथ गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम्।<br>विष्कम्भपर्वतान् दद्यादृत्विग्भ्यः क्रमशॊ मुने ॥ ३६ | उसी प्रकार मधुसे बने हुए भद्रसर नामक सरोवर और चमकीली चाँदीसे निर्मित वनसे संयुक्त कर देना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्व दिशामें एक हाथ लम्बा, चौड़ा और गहरा कुण्ड बनाकर तिल, यव, घी, समिधा और कुशोंद्वारा चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे हवन करावे। वे सभी ब्राह्मण वेदों और पुराणोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, अनिन्द्य चरित्रवान् और सुरूप हों। रातमें मधुर शब्दमें गायन और तुरही आदि वाद्योंका वादन कराते हुए जागरण करना चाहिये। अब मैं इन पर्वतोंके आवाहनका प्रकार बतला रहा हूँ। (उन्हें इस प्रकार आवाहित करे—) अमरपर्वत! तुम समस्त देवगणोंके निवासस्थान और रत्नोंकी निधि हो। मैंने परम भक्तिके साथ तुम्हारी पूजा की है, इसलिये तुम हमारे घरोंमें स्थित विरुद्धभाव अर्थात् वैरभावको शीघ्र ही नष्ट कर दो, हमारे कल्याणका विधान करो और हमें श्रेष्ठ शान्ति प्रदान करो। सनातन! तुम्हीं ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शङ्कर और सूर्य हो तथा मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)-से परे संसारके बीज (कारणरूप) हो, अतः हमारी रक्षा करो। चूँकि तुम लोकपालों, विश्वमूर्ति भगवान् विष्णु, रुद्र, सूर्य और वसुओंके निवासस्थान हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम देवताओं, देवाङ्गनाओं और शिवजीसे अशून्य अर्थात् संयुक्त रहते हो, इसलिये इस निखिल दुःखोंसे भरे हुए संसार-सागरसे मेरा उद्धार करो॥ २२-३०॥<br><br>इस प्रकार उस मेरुगिरिकी अर्चना करनेके पश्चात् मन्दराचलकी पूजा करनी चाहिये—'मन्दराचल! चूँकि तुम चैत्ररथ नामक वन और भद्राश्व नामक वर्षसे सुशोभित हो रहे हो, इसलिये शीघ्र ही मेरे लिये तुष्टिकारक बनो।' 'गन्धमादन! चूँकि तुम जम्बूद्वीपमें शिरोमणिके समान सुशोभित और गन्धर्वोंके वनोंकी शोभासे सम्पन्न हो, इसलिये मेरी कीर्तिको सुदृढ़ कर दो।' 'विपुल! चूँकि तुम केतुमाल वर्ष और वैभ्राज नामक वनसे सुशोभित हो और तुम्हारे शिखरपर स्वर्णमय पीपलका वृक्ष विराजमान है, इसलिये (तुम्हारी कृपासे) मुझे निश्चला पुष्टि प्राप्त हो।' 'सुपार्श्व! चूँकि तुम उत्तर कुरुवर्ष और सावित्र नामक वनसे नित्य शोभित हो रहे हो, अतः मुझे अक्षय लक्ष्मी प्रदान करो।' इस प्रकार उन सभी पर्वतोंको आमन्त्रित करके पुनः निर्मल प्रभात होनेपर स्नान आदिसे निवृत्त हो बीचवाला श्रेष्ठ पर्वत गुरु (यज्ञ करानेवाले)-को दान कर दे। मुने! इसी प्रकार क्रमशः विष्कम्भपर्वतोंको ऋत्विजोंने दान कर |
९२- शर्कराशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य तथा राजा धर्ममूर्तिके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें लवणाचल-दानका महत्त्व
* अध्याय ८३ * ३०३
| गाश्च दद्याच्चतुर्विंशत्यथवा दश नारद।<br>नव सप्त तथाष्टौ वा पञ्च दद्यादशक्तिमान् ॥ ३७<br>एकापि गुरवे देया कपिला च पयस्विनी।<br>पर्वतानामशेषाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३८<br>त एव पूजने मन्त्रास्त एवोपस्करा मताः।<br>ग्रहाणां लोकपालानां ब्रह्मादीनां च सर्वदा ॥ ३९<br>स्वमन्त्रेणैव सर्वेषु होमः शैलेषु पठ्यते।<br>उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते ॥ ४०<br>विधानं सर्वशैलानां क्रमशः शृणु नारद।<br>दानकाले च ये मन्त्राः पर्वतेषु च यत्फलम् ॥ ४१<br>अन्नं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।<br>अन्नाद् भवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्तते ॥ ४२<br>अन्नमेव ततो लक्ष्मीरन्नमेव जनार्दनः।<br>धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम ॥ ४३<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् धान्यमयं गिरिम्।<br>मन्वन्तरशतं साग्रं देवलोके महीयते ॥ ४४<br>अप्सरोगणगन्धर्वैराकीर्णेन विराजता।<br>विमानेन दिवः पृष्ठमायाति स्म निषेवितः।<br>धर्मक्षये राजराज्यमाप्नोतीह न संशयः ॥ ४५ | देना चाहिये। नारद! इसके बाद चौबीस, दस, नौ, आठ, सात अथवा पाँच गौ दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान कर दे। सभी पर्वतदानोंके लिये यही विधि कही गयी है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। नारद! अब तुम सभी पर्वतदानोंकी विधि, दानकालमें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र और उन दानोंसे प्राप्त होनेवाला जो फल है, वह सब क्रमशः सुनो। (दान देते समय धान्यशैलसे यों प्रार्थना करनी चाहिये—) 'पर्वतश्रेष्ठ! अन्नको ही ब्रह्म कहा जाता है; क्योंकि अन्नमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्नसे जगत् वर्तमान है, इसलिये अन्न ही लक्ष्मी है, अन्न ही भगवान् जनार्दन है, इसलिये धान्यशैलके रूपसे तुम मेरी रक्षा करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे वह स्वर्गलोकमें आता है और उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्यक्षय होनेपर वह इस लोकमें निस्संदेह राजाधिराज होता है॥ ३१—४५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे दानमाहात्म्यं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें दानमाहात्म्य नामक तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८३ ॥
३०४ * मत्स्यपुराण *
चौरासीवाँ अध्याय
लवणाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके$^१$ दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य शिव-संयुक्त लोकोंको अर्थात् शिवलोकोंको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये; क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम और (चार$^२$) द्रोणसे बना हुआ अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार एक द्रोणसे कुछ अधिकका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक्-पृथक् (चार) विष्कम्भपर्वतोंका निर्माण कराना उचित है। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय लोकपालोंके स्थापनाका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोंका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दानमन्त्रोंको सुनो—'पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य-सरोवरसे$^३$ प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये उसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते, अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है॥ १—९॥ |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लवणाचलमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति शिवसंयुतान्॥ १<br><br>उत्तमः षोडशद्रोणैः कर्तव्यो लवणाचलः।<br>मध्यमः स्यात् तदर्धेन चतुर्भिरधमः स्मृतः॥ २<br><br>वित्तहीनो यथाशक्त्या द्रोणादूर्ध्वं तु कारयेत्।<br>चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वतान् कारयेत् पृथक् ॥ ३<br><br>विधानं पूर्ववत् कुर्याद् ब्रह्मादीनां च सर्वदा।<br>तद्वद्धेममयान् सर्वांल्लोकपालान् निवेशयेत्॥ ४<br><br>सरांसि कामदेवादींस्तद्वदत्रापि कारयेत्।<br>कुर्याज्जागरणं चापि दानमन्त्रान् निबोधत॥ ५<br><br>सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणाचलः।<br>तद्दानकर्तृत्वेन त्वं मां पाहि नगोत्तम॥ ६<br><br>यस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कटा लवणं विना।<br>प्रियं च शिवयोर्नित्यं तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७<br><br>विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्।<br>तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥ ८<br><br>अनेन विधिना यस्तु दद्याल्लवणपर्वतम्।<br>उमालोके वसेत् कल्पं ततो याति परां गतिम्॥ ९ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे लवणाचलकीर्तनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें लवणाचलकीर्तन नामक चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८४॥
१. बल्लालसेनने 'दानसागर' इसे मत्स्य अ० ८४का कहकर 'विष्णुदैवत दान' माना है। यह वर्णन पद्मपु० १।१२१।११७–३५, भविष्योत्तरपु० १२६ और महाभारत आदिमें भी आता है।
२. यह 'विधानपारिजात' कार मदनभूपालका मत है। उन्होंने सर्वत्र लम्बी टिप्पणियाँ लिखी हैं।
३. यह वर्णन पहले सौभाग्यशयनमें आ चुका है।
| * अध्याय ८५ * | ३०५ |
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पचासीवाँ अध्याय
गुड़पर्वतके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि गुडपर्वतमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरः श्रीमान् स्वर्गमाप्नोति पूजितम्॥ १<br>उत्तमो दशभिर्भारैर्मध्यमः पञ्चभिर्मतः।<br>त्रिभिर्भारैः कनिष्ठः स्यात् तदर्धेनाल्पवित्तवान्॥ २<br>तद्वदामन्त्रणं पूजां हेमवृक्षसुरार्चनम्।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वत् सरांसि वनदेवताः॥ ३<br>होमं जागरणं तद्वल्लोकपालाधिवासनम्।<br>धान्यपर्वतवत् कुर्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ ४<br>यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः।<br>सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥ ५<br>प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा।<br>तथा रसानां प्रवरः सदैवक्षुरसो मतः॥ ६<br>मम तस्मात् परां लक्ष्मीं ददस्व गुडपर्वत।<br>यस्मात् सौभाग्यदायिन्या भ्राता त्वं गुडपर्वत।<br>निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् गुडमयं गिरिम्।<br>पूज्यमानः स गन्धर्वैर्गौरीलोके महीयते॥ ८<br>ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्।<br>आयुरायोग्यसम्पन्नः शत्रुभिश्चापराजितः॥ ९ | ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं (उस) उत्तम गुड़पर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका दान करनेसे धनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। दस भार गुड़से बना हुआ गुड़पर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्कम्भपर्वत, सरोवर, वन-देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि धान्यपर्वतकी ही भाँति करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करे—'जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद* योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें ॐकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षु-रस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुड़पर्वत! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुड़पर्वत! चूँकि तुम सौभाग्यदायिनी पार्वतीके भ्राता और निवासस्थान हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुड़पर्वतका दान करता है, वह गन्धर्वोंद्वारा पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है॥ १—९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे गुडपर्वतकीर्तनं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें गुड़पर्वतकीर्तन नामक पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८५॥
* इस पुराणमें सामवेदकी सर्वत्र प्रमुख रूपसे चर्चा है, यह ध्येय है।
| ३०६ | * मत्स्यपुराण * |
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छियासीवाँ अध्याय
सुवर्णाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अथ पापहरं वक्ष्ये सुवर्णाचलमुत्तमम्।<br>यस्य प्रदानाद् भवनं वैरिञ्च्यं याति मानवः॥ १<br><br>उत्तमः पलसाहस्रो मध्यमः पञ्चभिः शतैः।<br>तदर्धेनाधमस्तद्वदल्पवित्तोऽपि शक्तितः।<br>दद्यादेकपलादूर्ध्वं यथाशक्त्या विमत्सरः॥ २<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वं विदध्यान्मुनिपुङ्गव।<br>विष्कम्भशैलास्तद्वच्च ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादयेत्॥ ३<br><br>नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय ते नमः।<br>यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय॥ ४<br><br>यस्मादग्नेरपत्यं* त्वं यस्मात् तेजो जगत्पतेः।<br>हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम॥ ५<br><br>अनेन विधिना यस्तु दद्यात् कनकपर्वतम्।<br>स याति परमं ब्रह्मलोकमानन्दकारकम्।<br>तत्र कल्पशतं तिष्ठेत् ततो याति परां गतिम्॥ ६ | ईश्वरने कहा— नारद! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। मुनिश्रेष्ठ! शेष सारे कार्योंका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर उन्हें ऋत्विजोंको दान करनेका विधान है। (प्रार्थना-मन्त्र इस प्रकार है—) 'शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अतः तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेजःस्वरूप हो, अतः सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम आनन्ददायक ब्रह्मलोकमें जाता है और वहाँ सौ कल्पोंतक निवास करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है॥ १–६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सुवर्णाचलकीर्तनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सुवर्णाचलकीर्तन नामक छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८६॥
* सुवर्णकी अग्नि-अपत्यता (अग्निकी पुत्रता) प्रसिद्ध है। इस विषयमें एक श्लोक सर्वत्र मिलता है, जो इस प्रकार है— 'अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः। लोकत्रयं तेन भवेत् प्रदत्तं यः काञ्चनं गां च महीं प्रदद्यात्॥'
९३- शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रहशान्तिकी विधिका वर्णन
| * अध्याय ८८ * | ३०७ |
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सतासीवाँ अध्याय
तिलशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा—नारद! इसके बाद मैं तिलशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका विधिपूर्वक दान करनेसे मनुष्य सनातन विष्णुलोकको प्राप्त होता है। विप्रवर! दस द्रोण तिलका बना हुआ तिलशैल उत्तम, पाँच द्रोणका मध्यम और तीन द्रोणका कनिष्ठ बतलाया गया है। इसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंकी स्थापना तथा अन्यान्य सारा कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। मुनिपुङ्गव! अब मैं दानके मन्त्रोंको यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ। 'चूँकि मधुदैत्यके वधके समय भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूँदोंसे तिल, कुश और उड़दकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये तुम इस लोकमें मुझे शान्ति प्रदान करो। शैलेन्द्र तिलाचल! चूँकि देवताओंके हव्य और पितरोंके कव्य—दोनोंमें सम्मिलित होकर तिल ही सब ओरसे (भूत-प्रेतादिसे) रक्षा करता है, इसलिये तुम मेरा भवसागरसे उद्धार करो, तुम्हें नमस्कार है। इस प्रकार आमन्त्रित कर जो मनुष्य श्रेष्ठ तिलाचलका दान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। उसे इस लोकमें दीर्घायुकी प्राप्ति होती है, वह पुत्र एवं पौत्रोंको प्राप्तकर उनके साथ आनन्द मनाता है तथा अन्तमें देवताओं, गन्धर्वों और पितरोंद्वारा पूजित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है॥ १—७॥ |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि तिलशैलं विधानतः।<br>यत्प्रदानान्नरो याति विष्णुलोकं सनातनम्॥ १<br><br>उत्तमो दशभिर्द्रोणैर्मध्यमः पञ्चभिः स्मृतः।<br>त्रिभिः कनिष्ठो विप्रेन्द्र तिलशैलः प्रकीर्तितः॥ २<br><br>पूर्ववच्चापरान् सर्वान् विष्कम्भानभितो गिरीन्।<br>दानमन्त्रान् प्रवक्ष्यामि यथावन्मुनिपुङ्गव॥ ३<br><br>यस्मान्मधुवधे विष्णोर्देहस्वेदसमुद्भवाः।<br>तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छान्त्यै भवन्त्विह॥ ४<br><br>हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिलैरेवाभिरक्षणम्।<br>भवादुद्धर शैलेन्द्र तिलाचल नमोऽस्तु ते॥ ५<br><br>इत्यामन्त्र्य च यो दद्यात् तिलाचलमनुत्तमम्।<br>स वैष्णवं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ६<br><br>दीर्घायुष्यमवाप्नोति पुत्रपौत्रैश्च मोदते।<br>पितृभिर्देवगन्धर्वैः पूज्यमानो दिवं व्रजेत्॥ ७ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तिलाचलकीर्तनं नाम समाशीतितमोऽध्यायः॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तिलाचलकीर्तन नामक सतासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८७॥
अठासीवाँ अध्याय
कार्पासाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा—नारद! इसके पश्चात् मैं श्रेष्ठ कार्पासाचलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य धनवाला परमपदको प्राप्त कर लेता है। इस लोकमें बीस भार रूईसे बना हुआ कार्पासपर्वत उत्तम, |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कार्पासाचलमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरः श्रीमान् प्राप्नोति परमं पदम्॥ १<br><br>कार्पासपर्वतस्तद्वद् विंशद्भारैरिहोत्तमः। |
| ३०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पञ्चभिस्त्वधमः स्मृतः।<br>भारेणाल्पधनो दद्याद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ २<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्य मुनिपुङ्गव।<br>प्रभातायां तु शर्वर्यां दद्यादिदमुदीरयन्॥ ३<br><br>त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।<br>कार्पासाद्र नमस्तुभ्यमघौघध्वंसनो भव॥ ४<br><br>इति कार्पासशैलेन्द्रं यो दद्याच्छर्वसंनिधौ।<br>रुद्रलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह॥ ५ | दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपाससे बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। मुनिश्रेष्ठ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल इसे दान करनेका विधान है। उस समय ऐसा मन्त्र उच्चारण करना चाहिये—‘कार्पासाचल! चूँकि इस लोकमें तुम्हीं सदा सभी लोगोंके शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।’ इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानमें कार्पासाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर राजा होता है॥ १–५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कार्पासशैलकीर्तनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः॥ ८८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कार्पासशैलकीर्तन नामक अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८८॥
नवासीवाँ अध्याय
घृताचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि घृताचलमनुत्तमम्।<br>तेजोऽमृतमयं दिव्यं महापातकनाशनम्॥ १<br><br>विंशत्या घृतकुम्भानामुत्तमः स्याद् घृताचलः।<br>दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पञ्चभिस्त्वधमः स्मृतः॥ २<br><br>अल्पवित्तः प्रकुर्वीत द्वाभ्यामिह विधानतः।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वच्चतुर्थांशेन कल्पयेत्॥ ३<br><br>शालितण्डुलपात्राणि कुम्भोपरि निवेशयेत्।<br>कारयेत् संहतानुच्चान् यथाशोभं विधानतः॥ ४<br><br>वेष्टयेच्छुक्लवासोभिरिक्षुदण्डफलादिकैः।<br>धान्यपर्वतवच्छेषं विधानमिह पठ्यते॥ ५<br><br>अधिवासनपूर्वं च तद्वद्धोमसुरार्चनम्।<br>प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरवे तन्निवेदयेत्।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वदृृत्विग्भ्यः शान्तमानसः॥ ६ | नारद! इसके बाद मैं दिव्य तेजसे सम्पन्न, अमृतमय और महान्-से-महान् पापोंके विनाशक श्रेष्ठ घृताचलका वर्णन कर रहा हूँ। बीस घड़े* घीसे बना हुआ घृताचल उत्तम, दससे मध्यम और पाँचसे अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प वित्तवाला भी यदि करना चाहे तो वह दो ही घड़े घृतसे विधिपूर्वक घृताचलकी रचना करके दान कर सकता है। पुनः उसके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनी चाहिये। उन सभी घड़ोंके ऊपर अगहनी चावलसे परिपूर्ण पात्र रखा जाय और उन्हें विधिपूर्वक शोभाका ध्यान रखते हुए एकके ऊपर एक रखकर ऊँचा कर दिया जाय। उन्हें श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दिया जाय और उनके निकट गन्ना और फल आदि रख दिये जायें। इसमें शेष सारा विधान धान्यपर्वतकी ही भाँति बतलाया गया है। देवताओंकी स्थापना, हवन और देवार्चन भी उसी प्रकार करना चाहिये। रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल (यजमान) शान्तमनसे वह घृताचल गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंको ऋत्विजोंको दान कर देनेका विधान है। |
* मदन, नीलकण्ठ आदि व्याख्याता यहाँ कुम्भसे पात्रका ही अर्थ लेते हैं—'कुम्भः पात्ररूप एव द्रवत्वेन धृतधारणयोग्यपरिमाणः।'