मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
वियोगाभिव्यक्ति ८५ ३२ कोई कहियो रे प्रभु आवन की। आवन की मन भावन की, कोई। आप नही आवै, लिख नहीं भेजै बाण पड़ी ललचावन की। एक दोइ नैना कह्यो नही मानै, नदिया बहै जस सावन की। कहा करूं कछु बस नही मेरो, पांख नही उड जावन की। मीराँ कहै प्रभु कबर मिलोगे, चेरी भई हू तेरे दावन की।।१४७।।† उपर्युक्त तीनों पदों मे कुछ ऐसा भाव साम्य है कि तीनों ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है। "भनक सुनी हरि आवन की" भावना की ही पुनरुक्ति हुई है। "सुनिहौ मै हरि आवन की आवाज" (पद स० ३१) और "कोई कहियो प्रभु आवन की" (पद स० ३२) मे प्रथम दो पदो मे वर्षा और श्रावण का वर्णन है। तीसरे पद की अभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ की आँखो पर ही श्रावण छाया हुआ है। अन्तिम पद (स० ३२) चन्द्र सखी के निम्नांकित पद के कुछ विशेष निकट पडता है। 'चन्द्रसखी' के नाम पर भी एक ऐसा ही निम्नांकित पद पाया जाता है। निश्चित रूपेण यह कहना कि पद मौलिक रूपेण किसका है, अति दुरूह है। फिर भी, मीराँ के पदो के साथ हुए भाव और भाषा के अन्तर पर विचार करते हुए यह अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि पद मौलिक रूपेण 'चन्द्रसखी' का ही हो। कोई कहियो रे मोहन आवन की। आप तो जाय द्वारिका छाये, हम को जोग पठावन की। आप न आवै, पतियाँ न भेजै, बात करै ललचावन की। ए दोऊ नैण कहियो न मानै, घटा उमड़ रही सावन की। दिल चाहत उड जाय मिलूँ, पर पाख नही उड़ जावन की। चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, पर कमल लपटावेन की। पद स० ३२ से इस पद का बहुत अधिक साम्य है।
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण और यथावत पाठ प्रस्तुत है:
८६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह गुजराती में प्राप्त पद १ क्यारेँ¹ आवसे घेर कान रे, जोसिडा जोस² जुवो³ ने , दहीयो हमारी वाला दुर्बल थई केरे, थई गई थाकेली⁴ पान रे . वृन्दा ते वनमां वाले रास रच्यो छे, सहस्त्र गोपी मा एक कानरे । बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भावे भरिया भगवान र । ॥१४८॥† पदाभिव्यक्ति में पूर्वापर संबध का निर्वाह नही हुआ है । २ कागद कोण लई जाय रे, मथुरामां लखीए, प्रीत थोडी थोडी थाय⁵ रे । प्रीत तमीने मलवा ने तलखे, ने जोशोमति अन्न न खाय रे । वृन्दाबन की कुज गलियन मे, रोता रजनी जाय रे । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल चित चोर रे ॥१४९॥† अन्तिम पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही होता । ३ कही जइ⁶ करूं रे पोकार, कारी मुनी धावे लागे थे, मे कही जई करूं पोकार रे । पिऊ जी हमारो पारधि भयो थे, मै तो भइ हरिणी शिकार रे । दूर से थी आइ गोली लग गई,शीरू थे,नीकर गयी पारम पार रे । प्रेम नी कटारी पुने⁷ खेच कर मारी था, थई गई हाल बेहाल रे । मीराँ के प्रभु गिरिधरना गुण, हो गई पारम पार रे ॥१५०॥† १ कब, २ पंचाग, ३ देखी, ४ सूखा हुआ, ५ होती है, ६ जाकर, ७ मुझको ।
वियोगाभिव्यक्ति ८७ ४ शामले मल्या त बिसारी, ओधव ने वाले शामले मेल्या ते बिसारी । प्रीत करी ने पालव१ पकडो वाला, प्रेम नी कटारी मुने मारी । गोकुल थी मथुरा मै गयो छो वा'ला, कुब्जा सोलागी छै तस्ली२ । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल बलिहारी ।।१५१।।† ५ ब्रजमा कयम रेवाशे३ ओधव ना वा'ला, ब्रज मा कयम रेवाशे । आठ दाहडानी४ अवध करी ने गया छो, वा'ला खटमास थय छेहरिने । वृन्दाबन की कुजगलिगाँ वाला, बैठा छे मुख मोरली धरी ने । मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, वा'ला अमोरह्या छे आसडा भरी ने । ।।१५२।।† पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास स्पष्ट है । ६ आव जो म्हॉरे नेडे५, ओधव न वा'ला, आव जो म्हारे नैडे । म्हॉरे आगणिये आबो मेर्यो, वा'ला कानुडो आवीने सायॉ बैडे । अमो जल जमुना भरवा गया ता, वाला कानुडो पड्यो छे म्हारी कैड़े । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, वा'ला हरि मलवा मन हेरे ।।१५३।।† पद की तीसरी पंक्ति शेष पद से सर्वथा भिन्न पडती है । पद मे पूर्वापर सम्बन्धका भी सर्वथा अभाव है । ७ कांनी भावे देखन जाऊं, श्यामलो वेरागी भयो रे । कोरी मटकी मां नही जमाऊं, गुबालेन हो कर जावूँरे । १ आँचल, २ नेह, ३ रहा जायगा, ४ दिनकी, ५ नजदीक, पास।
८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह गोरे गोरे अंग पर भभूत लगावूूँ, जोगण होकर जाऊ रे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, श्याम सुदर पार पावूँ रे ।। १५४।।† इस तरह की अभिव्यक्ति का यह एक ही पद प्राप्त है । ८ गोविन्दा ने देश ओघ मुने लेई, जारे गोविन्दा ने देश । मने रे मोहन जी ए मेली, १ रे बिसारी, करडूूँ मोरी करम की रेख । हार तजुगी, शणगार तजुगी, तजुगी काजल की रेख । चीर ने फाडी वा'ला कफनी पेरुगी, लेऊगी जोगन का वेश । गोकुल तजुगी मे मथुरा तजुगी, तजुगी मे ब्रज केरी देश । मीराँबाई के प्रभु गिरधरना गुण, चरण कमल चित्त सग रहेश । ।।१५५।।† पदाभिव्यक्ति पर नाथ पथ का और भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट हैं। ९ आवो ने सलुणा म्हारा मीठडा मोहन, आँख लडी माँ तमने राखूं रे । हरि जेरे जोइये ते तमने आणी,आणी आपुँ २ मीठाई मेवा तमने खावा रे । ऊची ऊंची मेडी स़ाहेबा अजब झरुखा, झरुखे चढ़ी चढी फारबे रे । चुन चुन कलिया वा'ली सेज बिछावुँ,भमर पलग पर सुख नाखुँ वारी रे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, तारा चरण कमल मां चित राखूं रे। ।।१५६।।† १० मारा प्राण पातलिया वाहेला आवो रे, तमरे विनाहूँ तो जनम जोगण छूूँ। नाभी कमल की सुरता रे चाली, जई ने तखत पर रास रसीला रे। १ रखी, २ दूँ।
९० मीराँ बृहद्-पद संग्रह १३ ब्रजमा केम रेवाशे, ओधवना वा'ला, ब्रज मा केम रेवाशे । जेरे डाडा जीवन गया छो वा'ला, दु खडा काने कहेवागे । बलवात थई ने वादी शूँ मूको, वा'ला, वरद तमारू जाशे । मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, वा'ला, गोपिका अरज काशे । ।।१६०।।† पद स० ५ तथा उपर्युक्त पद की पचम पक्तियो में साम्य हे, परन्तु शेष पद सर्वथा भिन्न पडता हे । विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद पंजाबी १ सावरे दी भालन भाये, सानू प्रेम दी कटारिया । सखी पूछे दोऊ चारे, व्याकुल क्यों मैया नारे । रग के रगीले मोंसे दृग भर मारिया । व्याकुल बेहाल भैयो, सुध बुध भूल गैया । अजहूँ न आये श्याम, कुंज बिहारिया । यमुना की घाटी बाटी, असो तेरी चाल पछाती । बसियां बजावी कान्हा, मैया मत वारिया । मीराँ बाई प्रेम पाया, गिरधर लाल ध्याया । तू तो मेरो प्रभु जी प्यारा, दासी हो तिहारियां ।।१६१।।† पद की आठवी पंक्ति से अन्योक्ति ही स्पष्ट होती है। भाषा क आधार पर भी पद की प्रामाणिकता संदिग्ध ही है ।
वियोगाभिव्यक्ति ९१ खड़ी बोली १ आली सावरे की दृष्टि मानो प्रेम कटारी है। लागत बेहाल भई, तनं की सुधि बुधि गई। तन मन व्यापो प्रेम, मानो मतवारी है। सखियाँ मिलि दुइ चारी, बावरी सो भई न्यारी। हो तो वाको नीके जानो, कुज की बिहारी है। चन्द्र को चकोर चाहे, दीपक पतग दाहै। जल बिन मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है। बिनती करो है श्याम, लागो मै तुम्हारे पाम। मीराँ प्रभु ऐसे जानो दासी तुम्हारी है ॥१६२॥† भाव और भाषा दोनो के ही आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है। २ जल्दी खबर लेना मेहरम मेरी। जल बिना मीन मरे एक छन मे, एनै अमृत पाऊ तो झेरी झेरी। बहुत दिनो का बिछोह घड़ा है, अब तो राखो नेडी नेडी। चकोर को ध्यान लगो चन्दवा सो, नटवा को ध्यान लगी डोरी डोरी। सन्त को ध्यान लगे राम प्यारे, भूख को ध्यान मेरी मेरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम पर सूरत मेरी ठहरी ठहरी ॥१६३॥†
संघर्षाभिव्यक्ति राजस्थानी में प्राप्त पद १ अब नहि बिसरुँ म्हारे हिरदै लिख्यो हरिनाम् । म्हारे सतगुरु दियो बताय अब नहि बिसरू रे । मीराँ बैठी महल मे, उठत बैठत राम । सेवा करस्यां साध की म्हारे और न दूजो काम । राणा जी बतलाया¹ कहू देणो जवाब । पण लागो हरिनाम् सूं म्हांरे दिन दिन दूनो लाभ । सीप भर्यो पाणी पिवे रे, टाक² भर्यो अन्न खाय । बतलाया बोली नही रे राणो जी गया रिसाय³ । विखरा प्याला राणा जी भेज्या, दीजो मीराँ हाथ । कर चरणामृत पी गई म्हारा सबल धणी⁴ के साथ । विष का प्याला पी गई भजन करे उस ठौर । थारी मारी ना मरूं म्हांरा राखनहार और । राणाजी मोपर कोप्यो रे, मारूं एकज⁵ सेल ।⁶ मार्या पिराछित लागसी दीजो म्हाने पीहर भेल । राणा मोपर कोप्यो रे रती न राख्यो भोद । ले जाती बैकुण्ठ मे, यो तो समझ्यो नही सिसोद । छापा तिलक बनाइया तजिया सब सिगार । म्न्हें तो सरणे राम के भल निन्दो संसार । १ बात करने का प्रयास किया. २ छटाँक भर, बहुत थोडा, ३ क्रुद्ध, ४ स्वामी, पति अर्थ में रूढ़िवाचक हो गयाँ हैं, ५ एक ही, ६ कटारी ।
संघर्षाभिव्यक्ति ९३ माला म्हारे दोवडी¹, सील बरत सिगार। अब के किरपा कीजियो, हूं तो फिर बाँधू तलवार ।।१६४।। कही कही इस पद के आगे निम्नाकित कुछ पक्तिया और भी मिलती हैं — रथा बैल जुताय के ऊटा कसिया भार। कैसे तोडूँ राम सूं, म्हारो भो भो² रो भरतार। राणो साड्यो मोकल्यो जाउँयो एके दौड। कुल की तारण अस्तरी, या तो मुरड चली राठौर। साड़िया पाछो फेरिया रे परत³ न देस्या पॉव। कर सूरापण नीसरी म्हांरे कुछ राणे कुण राव। ससारी निन्दा करै दुखियो सब ससार। कुल सारो ही लाजसी मीराँ जो भया ख्वार। राती माती प्रेम की विष भगत को मोड। राम अमल माती रहै धन मीरा राठौड। २ म्हारे हिरदे लिख्यो जी हरिनाम, अब नहि बिसरू। मै तो हिरदे लिखियो जी गोपाल, अब र्नहि बिसरू। हाथी घोडा बहो घणा माया केर न पार। राज तजूं चितौड को गामडी है असी हजार। साध हमारी आतमा मे साधन की देह। रोम रोम मे राम रह्या ज्यो बादर मे मेह। राती माती हरिनाम की बाँध भक्त को मोर। राम अमल साखी फिरै धन मीरा-राठोर। एक आडी गुरु गोविन्द खडा, एक आडी सब ससार। १ दुलडी, २ जन्मजन्मान्तर, ³ लौटकर।
९४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कैसे तोडूँ राम सों म्हारो भो भो रो भरतार । संसारी निन्दा करे, रूठो सब परवार१। कुल सारोड लजाइयौ, मीरा बाई बहै अकरार२। भक्त हीन पापी घणा राणा के दरबार । ⁻ के तो विवग प्याला प्याय द्यो, के डाली कठहार । राणो जी विषण प्याला मोकल्यां३, दीज्यो मीरा रे हाथ । मे तो चरणामृत कर पी गइ अब थे जाणो म्हारा नाथ । मीरा विष का प्याला पी गई सोती खूँटी तान४। म्हारो दरद दिवाणो सावरो, म्हाने दौडि जगावेलो आन ॥ ॥१६५॥ इस पद के साथ निम्नांकित पंक्तिया और भी पाई जाती है। राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊ ए माय । म मद भागिन करम अभागिन कीरत कैसे गाऊ ए माय । बिरह पिजड की बाड सखी री, उठकर जी हुलसाऊ ए माय । उपर्युक्त तीन पंक्तिया सत मत से प्रभावित एक अन्य पद का प्रथमांश है। अत इनको तो इस पद से निश्चित रूपेण हटाया जा सकता है। ३ म्हारे हिरदे लिखयो हरिनांव, अब मेना बिसरूं। मीराँ गढ सूं उतरी जी छापा तिलक बणाय । पगा बजावता घूँघरूं जो हाथ बजावतां ताल। माला कंठी दो लडो सील बरत सिणगार । जो कोई हिरदै बस जी, जो कोइ आवणहार । १ परिवार, २ बेकरार, सम्पूर्ण सीमाओ को तोडकर, ३ भेजा, ४ खूंटी तानकर सोना, सर्वथा निश्चिन्त होकर सोना।
संघर्षाभिव्यक्ति ९५ राणो मन मे कोपियो जी मारो याके सेल१। म्हारो तो पिराछित लागै जी, पीहर दो याको मेल । रथडा बैल जुपाइया२ जी, ऊटा कसियो भार । डावो३ छोडो मेडतो जी पेला४ पोषर५ जाय । राणा साडया मोकल्या जी, पाछा ल्यावो मोड । कुल की माडण६ हस्तरी७ जी, मुरड चली८ राठौड । मीराँ वचन उचेरिया९ जी गिरधर म्हारो मोड१० । थे पाछा जावो साडिया जी काने११ मोड़ो जोड१२ ।।१६६।। † इस पद की अन्तिम कुछ पक्तियाँ विशेष विचारणीय है । उपर्युक्त तीनो ही पदो मे स्वानुभूति और अन्योक्ति का विचित्र सम्मिश्रण हुआ है। बहुधा पुनरुक्ति भी हुई है। एक पद से व्यक्त होती किसी घटना का दूसरे पद मे कोई स्पष्ट उल्लेख नही तथापि ऐसी कुछ पक्तिया सभी पदो मे मिल जाती है, जिनसे कि उस घटना विशेष का आभास मिल जाता है । भाव और भाषा के साम्य के आधार पर तीनो ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है । ४ मै तो सुमऱ्या छै मदन गोपाल, राणा जी म्हारो काई करसी । मीराँ बैठ्या महल मे जी, छापा तिलक लगाय । आया राणा जी महल मे जी, कोप कऱ्यो छै मन भाय१३ । मीराँ महला से उतऱ्या जी, ऊटा भार कसाय । १ कटार, २ जुतवाये, ३ बाँए, ४ सर्व प्रथम, ५ तालाब, ६ बनाने- वाली, ७ स्त्री, ८ नाराज होकर चली, ९ उच्चारण किया, १० मोड शब्द के तीन अर्थ होते हैं – लौटाना, सन्यासी का अवहेलनात्मक पर्यायवाची, तोडना, ११ किसलिए, १२ जोडी या साथ, विशेषत दम्पति के अर्थ मे ही 'जोडी' शब्द व्यवहृत होता है। १३ मुन मे ।
६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह डावो' छोड़यो मेड़तो कोई सूधा' द्वारका जाय। राणा जी सांड्_यो भेजिया जी, पाछा लावो घेर। घर की नार इस्तरी चाली, चाली छे मुड राठोर। लाजै पीहर सासरो जी, लाजै भाय र बाप। लजे दूदा जी रो मेड़तो जी, कोई चोथी गढ चितौड़। राणा जी विष का प्याला भेजिया जी द्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत पी गयाँ जी, आप जानो दीनानाथ। पेया२ नाग छोड़िया- जी, छाडो मीरा के महल। हिवड़े३ हार हिडोलिया,४ कोइ तुम जाणो रघुनाथ ॥१६७॥ “दूदा जी रो मेडतो” अभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा द्वारा साप भेजे जाने का कथानक यहाँ दूसरे ही रूप मे दिया गया है। आराध्य के प्रति “मदन गोपाल” सम्बोधन भी इस पद की विशेषता है। इस पद का भी पहले तीनों पदो से गहरा साम्य है। पाठान्तर १ में तो सुमर्या छै मदन गोपाल, राणो जी म्हांरो काई करसी। मीराँ बैठी महल मे जी छाप। तिलक लगाय। आया राणा जी महल म जी,कोप करियो छै मन माय। मीराँ महैलाँ से उतऱ्या जी ऊटा कसिया भार। डावो छोड्यो मेड़तो कोई सूधा द्वारका जाय। राणा जी साड्_यो भेजियो जी पाछा ल्यावो दौड़। घर की नार इस्तरी चाली, चाली मुड राठौड। लाजै पीहर सासरो जी, लाजै माय र बाप। लाजै दूदा जी रो मेडतो जी लाजै गढ चितोड। विष का प्याला भेजिया जी, द्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत पी गयां जी, आप जाणो दीनानाथ। १ सीधे, २ पिटारी, ३ हृदय पर, ४ झूला लिया।
संघर्षाभिव्यक्ति ६७ पेया नाग छोडियो जी, छोडो मीराँ महैल । हिवडे हार हिडोलिया जी, थे जाणो रघुनाथ । दोनो पाठान्तरो मे कुछ शब्दो का ही अन्तर है । इन पदो मे एक विचारणीय अभिव्यक्ति यह है कि मीराँ चित्तौड़ का त्याग करती है मेडता जाने के उद्देश्य से ही तथापि चली जाती है तीर्थ-यात्रा हेतु । "मुरड चली राठोड" जैसी राणा की धारणा से भी आभासित होता है कि मीराँ नाराज होकर गृह-त्याग कर अपने पीहर "राठोड़" जा रही है। "डॉवो तो मैल्यो मेडतो पेलाँ पोखर जाय" या "सूधा द्वारका जाय।" जैसी अभिव्यक्तियो का विश्लेषण अद्यावधि प्राप्त वृतान्त क आधार पर करना सम्भव नही । (देखे, "मीराँ, एक अध्ययन") । ५ गढ से तो मीराँ बाई उतरी, करवा¹ लीना जी साथ । डॉवो तो छोड़्यो मीराँ मेडतो, पुस्कर न्हावा जाय । मेरो मन लाग्यो हर के नाम, रहस्या साधा के साथ । राणा जी ओठी² भेज्याँ, दीजो मीराँ बाई रे हाथ । घर की मानन³ अस्तरी, मुरड⁴ चली राठोड । लाजै पीहर सासरो, लाजै तेरो सो परवार , लाजै मीराँ जी थारा मायड बाप, चोथो वंश राठोड । मीराँ बाई कागद⁵ भेज्याँ, दीजो राणा जी रे हाथ । राणा जी समझ्यो नही, ले लाती बैकुन्ठा । सिसोदियो समझ्यो नही, ले जाती बैकुन्ठा । बागाँ मे बोली कोयलियाँ, बन मे दादुर मोर ।
१ मिट्टी का बना हुआ एक छोटा सा पात्र जो (पानी से भर कर) पूजा करने, सती होने या ऐसे किसी शुभ अवसर पर व्यवहृत होता है। २ पत्र, ३ बनाने वाली, ४ नाराज होकर, ५ पत्र । ७
६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह डावो छोड़यो मेडतो कोई सूधा१ द्वारका जाय । राणा जी साड्यो भेजिया जी, पाछा लावो घेर । घर की नार इस्तरी चाली, चाली छे मुड राठोर । लाजै पीहर सासरो जी, लाजै भाय र बाप । लाजै दूदा जी रो मेडतो जी, कोई चौथी गढ चितौड । राणा जी विष का प्याला भेजिया जी द्यो मीराँ के हाथ । कर चरणामृत पी गयाँ जी, आप जानो दीनानाथ । पेया२ नाग छोडिया जी, छाडो मीरा के महल । हिवडे३ हार हिडोलिया,४ कोइ तुम जाणो रघुनाथ ॥१६७॥ “दूदा जी रो मेडतो” अभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा द्वारा सांप भेजे जाने का कथानक यहाँ दूसरे ही रूप मे दिया गया है। आराध्य के प्रति “मदन गोपाल” सम्बोधन भी इस पद की विशेषता है। इस पद का भी पहले तीनो पदो से गहरा साम्य है। पाठान्तर १ मै तो सुमर्या छै मदन गोपाल, राणो जी म्हारो काईं करसी । मीराँ बैठी महल मे जी छापा तिलक लगाय । आया राणा जी महल मे जी,कोप करियो छै मन माय । मीराँ महैलाँ से उतर्या जी ऊटा कसिया भार । डावो छोडगो मेड़तो कोई सूधा द्वारका जाय । राणा जी साड् यो भेजियो जी पाछा ल्यावो दौड । घर की नार इस्तरी चाली, चाली मुड राठौड । लाजै पीहर सासरो जी, लाजै माय र बाप । लाजै दूदा जी रो मेडतो जी लाजै गढ चितौड । विष का प्याला भेजिया जी, द्यो मीराँ के हाथ । कर चरणामृत पी गया जी, आप जाणो दीनानाथ । १ सीधे, २ पिटारी, ३ हृदय पर, ४ झूला लिया ।
संघर्षाभिव्यक्ति ६७ पेया नाग छोड़ियो जी, छोड़ो मीराँ महल । हिवडे हार हिडोलिया जी, थे जाणो रघुनाथ । दोनो पाठान्तरो मे कुछ शब्दो का ही अन्तर है । इन पदो मे एक विचारणीय अभिव्यक्ति यह है कि मीराँ चित्तौड का त्याग करती है मेडता जाने के उद्देश्य से ही तथापि चली जाती है तीथ-यात्रा हेतु । "मुरड चली राठोड" जैसी राणा की धारणा से भी आभासित होता है कि मीराँ नाराज होकर गृह-त्याग कर अपने पीहर "राठोड" जा रही है । "डॉवो तो मैल्यो मेड़तो पेलाँ पोखर जाय" या "सूधा द्वारका जाय ।” जैसी अभिव्यक्तियो का विश्लेषण अद्यावधि प्राप्त वृतान्त क आधार पर करना सम्भव नही । (देखे, "मीराँ, एक अध्ययन") । ५ गढ से तो मीराँ बाई उतरी, करवा¹ लीना जी साथ । डाँवो तो छोडचो मीराँ मेडतो, पुस्कर न्हावा जाय । मेरो मन लाग्यो हर के नाम, रहस्या साधा के साथ । राणा जी ओठी² भेज्यॉ, दीजो मीराँ बाई रे हाथ । घर की मानन³ अस्तरी, मुरड⁴ चली राठोड़ । लाजै पीहर सासरो, लाजै तेरो सो परवार , लाजै मीराँ जी थारां मायड बाप, चोथो .वंश राठोड । मीराँ बाई कागद⁵ भेज्यॉ, दीजो राणा जी रे हाथ । राणा जी समझ्यो नही, ले लाती बैकुन्ठा । सिसोदियो समझ्यो नही, ले जाती बैकुन्ठां । बागाँ मे बोली कोयलियाँ, बन मे दादुर मोर । १ मिट्टी का बना हुआ एक छोटा सा पात्र जो (पानी से भर कर) पूजा करने, सती होने या ऐसे किसी शुभ अवसर पर व्यवहृत होता है । २ पत्र, ३ बनाने वाली, ४ नाराज होकर, ५ पत्र । ७
६८ मीरॉ-बृहद्-पद-संग्रह मीरॉरा ने गिरधर मलिया, नागर नन्द किसोर ।।१६८।।† अन्तिम दोनो पक्तियो का शेष पद से समन्वय नही होता। ६ राणी जी महलां से ऊतरी, ऊटा कसियो भार । डॉवो तो राणी छोडयो मेडतो, पूठ¹ दयी चित्तौड । म्हारा रे भाई ओठियाँ², मीराँ ने लाओ ए समझाय । घर को मानन- राणी रूस गयॉ राठोड । म्हारा रे भाई साड़िया³ रे बीर, जाजै सौ सौ कोस । म्हारा रे भाई साडिया, रे तेरो ऊट पाछो⁴ ले जाय । इण राणा जी रे राज मा, जल पिवा रो दोस । म्हारी एक न मानी बात, राणा रे, ले जाती बैकुठ माँहि । बागॉ मे बोली कोयल जी, बन मे दादुर मोर । मीराँ ने गिरधर मिलिया, नागर नन्द किसोर ।।१६९।।† भाव और भाषा के आधार पर इस पद को पूर्व पद (स० ५) का गेय रूपान्तर कहा जा सकता है । ७ काई थारो लागै छै गोपाल । गढ से तो मीराँ बाई उतर्र्या जी, हाथ मगद⁵ को थाल । औरा⁶ के तन अन धन लछमी, आप फिरो कगाल । ऊचा राणा जी रा गोखडा⁷ जी, नीची मीराँ बाई री साल⁸ । रमतां तो पायो मीरां कॉकरो, कोई सेवा सालिगराम । जहर पियालो राणा जी भेज्या, जी, द्यो मीराँ ने जाय । १ पीठ, २ पत्रवाहक, ३ ऊँट चलाने वाला, ४ लौटा कर । ५ मैदे से बना हुआ एक तरह का लड्डू विशेष जो पूजा के काम आता है, या लडकी के विवाह मे बनसारे मे दिया जाता है । ६ दूसरो के लिये, ७ अटारी, ८ कमरा ।
संघर्षाभिव्यक्ति ९९ कर चरणामृत मीराँ पी गई, कोई आप जाणो रघुनाथ । साँप पेटारा राणा जी भेज्या, द्यो मीरा ने जाय । कर खग वालो मीराँ बाई पहरियो, कोई हो गयो नोसर हार¹ । काढ कटारो राणाजी बैठिया, ल्यो मीरा ने मार । इन माराँ इन दोष लगे, कोई छत्री धरम धर जाय। साँड्या² साडिया पलाण³ जो, म्है चालाँ सो सो कोस । राणा जी का देस मे, कोई जल पिवा रो दोस । मीराँ गिरधर रो रग राची, रँच न रक कलेस । अन्तिम पक्ति का निम्नाकित पाठान्तर भी पाया जाता है — “मुख से बजावै मीराँ बाँसरी, कोई नाच रह्यो-मधुरेस ।”।।१७०।। राजस्थान के ऊँटो की तीव्र चाल किसी समय विशेष प्रसिद्ध थी ! मीराँ ने ऊँट जोत लाने के लिये कहा और ऊँट ले आया गया । इतने मे ऊँट चलाने वालो ने मुडकर जो देखा तो “मीराँ बाई रो देस” ही दीखने लगा । ऊँट की तीव्र गति का चमत्कार पूर्ण वर्णन है। ८ ए मीराँ थांरो काई लागै गोपाल । राणो जी बूझै बात, काई थारो लागै गोपाल । सरप पिटारो राणो जी भेज्या, द्यो मीराँ के हाथ । ए मीराँ थारो भायलो गोपाल । मीराँ बैठी महल मे जी, छापा तिलक लगाय । बतलाया बोली नही रे, राणो जी रहयो बल खाय । काड कटारो खड्यो हुयो जी, अब बताय तेरो गोपाल । १ नोसर हार—एक तरह का बहुमूल्य हार जो अपनी बहुमूल्यता के कारण सिर्फ राजघरानो के ही उपयुक्त समझा जाता है, २ ऊँट, ३ ऊँट पर जोते जाने वाली काठी “पलाण” कहलाती है। इसका क्रिया रूप है “पलाण ज्यो” जिसका अर्थ है, जोत लो ।
१०० मीराँ-बृहद् पद-संग्रह मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जोत मे जोत मिलाय ॥१७१॥† “ऐ मीराँ थारो भायलो गोपाल” पक्ति विशेष ध्यान देने योग्य है। प्रथम पक्ति के आधार पर यह पद, पद स० ४ का पाठान्तर ही ही प्रतीत होता है परन्तु शेष पदाभिव्यक्ति सर्वथा भिन्न पडती है। ९ राणा जी महल पधारिया जी, कर केस दिया साज । राणी जी पाछा फिर गया जी, राणो जी जान्या म्हासूँ लाज । राणो जी बूझे काई ओ लागै गोपाल । राणी जी मुजरा करो सनमुख उबास्या । म्हे छाँ राणी चितोड़ का, और बरब्साँगाँ थॉने राज । मीराँ ने बुझो काई ओ लागे गोपाल । साध सत हिरदे बसे, हथलेवो को लाग्यो पाप । राणा जी बूझे काई ओ लागै गोपाल । द्योढया मे बझो काई ओ लागै गोपाल । राणा जी खडग सवाँरिया ले खाडो तरवार । किसडी मीराँ ने राणो जी मारसी, हो गई एक हजार । मीराँ ने बूझो काई ओ लागै गोपाल । राणा जी बतलावै काई ओ लागै गोपाल ॥ १७२ ॥ पदाभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा जी के “महल” मे पधारने पर 'राणी जी' के लौट जाने के कारण राणा को भ्रम होता है। नववधू की लज्जा का यह भ्रम शीघ्र ही शका मे परिणत हो जाता है और राणा यह जानने को उत्सुक हो उठते है कि “गोपाल” और “राणी जी” के बीच क्या सबध है। मीराँ का उत्तर भी स्पष्ट है “साध सत हिरदै बसै, हथलेवो को लाग्यो पाप”। अस्तु, राणा मीराँ को मार डालने का एक बार फिर निष्फल प्रयास करते हैं। इस पंद मे और पद सं० ५ मे गहरा साम्य है। दोनो ही पदो से व्यक्त भावनाएँ और घटनाएँ एक सी हैं। अस्तु, बहुत सम्भव है कि दोनो ही पद स्वतन्त्र पद न होकर एक ही पद के रूपान्तर मात्र हो ।
संघर्षोभिव्यक्ति १०१ १० म्हाने बोल्याँ मति मारो जी राणा यो लैइ थारो देस । मीराँ महलाँ से ऊतरी कोई सात सहेल्या माय । खेलत पायो काँकरो कोई सेवा सालगराम । साध जी आया पावणा¹ कोई मीराँ के दरबार । जाजम² दीनो बैसणो³ कोई ढाल्यो⁴ दीनो ढाल⁵ । जैर पियालो राणां जी भेज्यो झ्झो मीराँ ने प्याय । कर चरणामृत पी गई मीराँ, थे जाणो दीनानाथ । साँप पिटारो राणा जी भेज्यो, दीज्यो मीराँ ने जाय । कर खगवालो⁶ पहिरियो कोई हो गयो नोसर हार । राणा जी कागद भेजियो कोई द्यो⁷ मीराँ ने जाय । साधॉ की सगत छोड़ द्यो मीराँ बैठो राण्या रे भाय । काढ कटारो राणा जी भेज्यो, दूजी भेजी तरवार । एक मीराँ की दोय करा, दो की हो गई च्यार । राणो मीराँ से यो कहे जी, किस्यो⁷ थाँरो भगवान । राज पाट सब छोडस्याँ कोई म्है भी भजा भगवान । कच्चो रग उड जाय जै छी, पक्को रंग नही जाय । मीराँ कै रग गोपाल को जी, अब छुटना को नाय । म्हॉने ताना मत मारो हो, राणा यो लेइ थारो देस । ।।१७३।।† प्राप्त इतिहास के अनुसार मेडता और उसके आसपास की भूमि “मीराँ बाई रो देस” कहलाता है। अत उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति और पदो से सर्वथा भिन्न पडती है। अन्य पदाभिव्यक्तियो के आधार पर यही स्पष्ट होता है कि मेडता जाने के हेतु ही मीराँ चित्तौड त्याग करती है। परन्तु मेडता न जाकर सीधे द्वारका चली जाती है। ज्यो १ अतिथि, २ दरी, ३ आसन, ४ मूँज के बनाये हुए छोटे पलग, मचिया, ५ बिछा दिया, ६ सर्प, ७ कौन सौ।
३. विरह-वेदना एवं प्रेम-निवेदन
१०२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ही राणा को यह मालूम होता है त्यो ही वे सदेशवाहक को भेजकर मीराँ को लौटाने का निष्फल प्रयास करते हैं। उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से मीराँ का मेडता जाना ही सिद्ध होता है। इस तरह का विरोधाभास उपस्थित करने वाला यही एक पद प्राप्त है। मीराँ द्वारा किया गया गृह-त्याग मेडते से ही हुआ ऐसा वर्णन अन्य कुछ पदो मे भी मिलता है। प्राप्त इतिहास मे यही एक ऐसा पहलू है जिस पर सभी विद्वान् एक स्वर से सहमत है। साथ ही, यही एक ऐसा पहलू है जहाँ के प्राप्त वृत्तान्त और प्राप्त पदो की अभिव्यक्ति मे समन्वय होता है। अस्तु पूर्वापर सबध पर दृष्टि रखते हुए, यही पदाभिव्यक्ति विशेष प्रामाणिक प्रतीत होती है।
११
गरुड चढ हरि आंए मीराँ के पास । आनन्द तूर बजाय के, पूरी मन की आस । राणा मोपर कोपियो, म्हॉरी तक तक सेज । लाज लागे छे म्हाँको, दीजो पीहर भेज । मीराँ महल से ऊतरी, राणे पकरियो हाथ । हथलेवा रो नात रो, परत न मानूं बात । मीराँ रथ सिणमार के, ऊँटा कसिया थात । डावो मेल्याँ मेडतो, पेलाँ पोखर जात । कुल की तारण अस्तरी, मुरड़ चली राठौड़ । राणा मो पर कोपिया, रती न राख्यो मोद । ले जाती बैकुण्ठ मे, समझ्यो नही सिसोद । मीराँ मुक्त दुहेलडी राम की, जैसे खाँडे की धार । कोई सन्त जन बिरला, ऊतरे भव कें पार । मीराँ ने प्रभु गिरिधर मिलियो, नागर नन्दकिसोर । तन मन् धन सब अरपिया चरण कमल की ओर ॥१७४॥†
पद मे पूर्वापर संगति का अभाव है। प्रथम दो पक्तियो की भाषा खड़ी बोली से प्रभावित है। राजमहलो मे अप्रिय स्थिति के कारण
सघर्षाभिव्यक्ति १०३ ही मीराँ चित्तौड त्याग कर अपने पीहर, मेडते जाने का आग्रह करती है। तत्पश्चात सहसा ही मीराँ द्वारा मेडता त्याग का भी वर्णन है। मीराँ की मानसिक स्थिति के चित्रण से पद का अन्त हो जाता है। एक इसी पद मे नही अपितु गृह-त्याग की स्थिति का चित्रण करनेवाले प्राय सभी पदो मे ऐसा ही वर्णन मिलता है। “डावो तो मेल्यो मेडतो” जैसी अभिव्यक्ति सभी पदो मे मिलती है। किस ओर पद से इस 'डांवो' दिशा का ज्ञान हो यह जानना सरल नही प्रतीत होता। "सूधा द्वारका जाय" "पुष्कर न्हावा जाय" "पेला पोखर जात" "पूठ दयी चित्तोड" या "राणा जी पडया जूनागढ रे मारग ओ" जैसी अभिव्यक्तियाँ मीराँ द्वारा की गयी यात्रा के मार्ग को इगित करती है। प्राप्त सामग्री के आधार पर मीराँ द्वारा की गई वृँन्दावन की यात्रा प्रामाणिक नही सिद्ध होती। इतना ही नही, यह भी लक्षित होता है कि मीराँ चित्तौड त्याग कर मेडता जाती है और फिर एक दिन मेडता भी त्याग कर द्वारिका की ओर पैर बढाती है।" मीराँ का प्रामाणिक वृत्तान्त जानने के लिए इन विशेष पहलूओँ पर खोज होना विशेष आवश्यक है। १२ ओ ल्यो राणा जी देस थॉरो, बन मे कुटिया बनस्यां । राणा जी म्हेतो गोविन्द का गुण गास्यां । राणा जी म्हे तो साधा कं सग रहस्यां । राणा जी रूसे म्हारो कुछए न बिगडै, हर रूस्या मरजास्या । विष को प्यालो राणा जी भेज्यो, कर चरणामृत भी जास्या । सिसोदिया म्हे तो साधा के संग रहस्या । ओत्यो राणा जी म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां । सिसोदिया म्हे तो साधां ये संग रहस्यां ॥१७५॥ यह पद भी प्रथम पक्ति के आधार पर “राणाजी बोल्याँ मति मारो" (पद सं० ३) का ही रूपान्तर प्रतीत होता है, परन्तु शेष पद मे कोई साम्य नही है। मीराँ के साधु-संग का गहरा विरोध और तज्जन्य