भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

३० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह “सरँग ओट तजे कुल अंकुस, बदन दिये मुसकाय ।” उपर्युक्त पद मे आए ‘गिरिधरन लाल’ का प्रयोग विशेष विचारणीय हे । ५ नयन लागे तब घूँघट कैसो, लोक लाज तिनका ज्यूँ तोर्यो । नेकी बदी हूं सिर पर धारी, मन हाथी आंकुस दे मार्यो । प्रगट निसान बजाय चली, राणा राव सकल जग छोऱ्यो । मीराँ सबल धणी के सरणे, का भयो भूपति मुख मोर्यो ।।२८।। पद की तृतीय पंक्ति विशेष महत्वपूर्ण ह। मीरा सिर्फ राणा परिवार “श्वसुर कुल” का ही परित्याग नही कर रही हे, अपितु “राव परिवार” “पितृ कुल” का भी त्याग कर रही हे। ऐसी ही अभिव्यक्ति सघर्ष द्योतक एक और पद मै भी हे, जिसका प्रारम्भ होता हे “अब नाहि बिसरू म्हारे हिरदे लिख्यो हरि नाम। ” सदेश वाहक द्वारा लौट जाने का आग्रह किए जाने पर मीराँ का उत्तर है, “कर सूरापण¹ नीसरी, म्हारे कुण राणे कुण राव ।” इन दोनो ही पदो मे प्रयुक्त यह “राव” शब्द विशेष विचारणीय है । इसी पंक्ति के पूर्वार्द्ध से व्यक्त होने वाली भावना “प्रगट निसान बजाय चली” भी विरोधाभिव्यक्ति के राजस्थानी पद स० ५ म मिलती हैं। माता के प्रति मीराँ का कथन “देर नगारो² मीराँ चढ़ गयी, माता हियो मत हारी जी” यद्यपि मीराँ की दृढ भक्ति भावना अन्य पदों से भी व्यक्त होती है, तथापि इस तरह की भावना अन्य पदों म नही मिलती । १ भीष्म प्रतिज्ञा, २ ताल ठोककर ।

वियोगाभिव्यक्ति राजस्थानी में प्राप्त पद १ छोड मत जाज्यो जी महाराज, मै अबला बल नाहि गुसांई, तुम ही मेरे सिरताज । मै गुणहीन गुण नाहि गुसाँई, तुम समरथ महाराज । थॉरी होइ के किणरे¹ जाऊँ, तुम ही हिवडा² री साज³ मीराँ के प्रभु और न कोई, राखो अब के लाज । ॥२९॥ २ प्रभु जी थे कहाँ गया नेहडी लगाय, छोड गया बिस्वास सघाती,⁴ प्रेम की बाती⁵ बराय⁶ । बिरह समद⁷ मे छोड गया हो, नेह की नाव चलाय । मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय । ॥३०॥ पाठान्तर १, पिया ते कहाँ गयो नेहरा लगाय । छाँडि गयो अब कहाँ बिसोसी, प्रेम की बाती बराय । बिरह समुद्र मे छाडि गयो पिव, नेह की नाव चलाय । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम बिनि रह्यो न जाय । १ कहाँ, २ हृदय का, ३ शृंगार ४ विश्वासघात करके, ५ दीप, ६ जलाकर, ७ समुद्र।

३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ३ हो जी हरि कित गये नेह लगाय । नेह लगाय मेरो मन हर लियो, रस भरि टेर सुनाय । मेरे मन मे ऐसी आवै, म॒रुँ जहर विप खाय । छाँड़ि गयो विश्वासघात करि, नेह केरि नाव चलाय । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, रहै मधुपुरी छाय ॥३१॥ पाठान्तर १, कितहूँ गये नेह लगायै । प्रीति लगाई मेरी मन हर लीनो, रस भरि टेर सुनाई । हम से बैर प्रीति कुब्जा से, हमै न कहूँ सुहाई । मेरे तो मन मे ऐसी आवे, मरुँगी जहर विष खाई । हमकूं छाँडि गये विस्वासी, बिरह की नाव चढाई । मीराँ के प्रभु हरि'अबिनासी, रहे मधुपुरी छाई । उपर्युक्त तीनो पदों का गहरा साम्य विशेष विचारणीय है इस पद व इसके पाठान्तर पर ब्रज भाषा का प्रभाव सुस्पष्ट है। भाषा के इस अन्तर के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति पर भी पौराणिक गाथाओ का प्रभाव विचारणीय है। उपर्युक्त पद और उसके सभी पाठान्तरो मे विश्वासघात करने की भावना बहुत ही स्पष्ट हो उठती है, यह एक विचारणीय पहलू है। ४ जावो हरि निरमोहिडा, जाणी थॉरी प्रीत । लगन लगी जब प्रीत और ही, अब कुछ अँवली १ रीत । अमृत प्याय के विष क्यूँ दीजै, कूण गाँव की रीत । मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, आप गरज के मीत ॥३२॥ पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। १ उलटी ।

वियोगाभिव्यक्ति ३३ ५ थाँने काँई काँई १ कह समझावूँ, म्हाँरा बाल्हा गिरधारी । पूरब जनम की प्रीति हमारी, अब नही जात निवारी २ । सुन्दर बदन जोवते सजनी, प्रीत भई छै भारी । म्हाँरे घर पधारो गिरधारी, मगल गावै नारी । मोती चोक पुराऊँ बाल्हा ३, तन मन तो पर वारी । म्हाँरा सगपण ४ तोसूँ साँवलिया, जुग सो नही बिचारी । मीराँ कहै गोपिन को बाल्हो, हमसूँ भयो ब्रह्मचारी । चरन सरन है दासी तुम्हारी, पलक न कीजै न्यारी । ॥३३॥ पद मे व्यक्त की गयी भावना विशेष ध्यान देने योग्य है। इस भाव को प्रदर्शित करने वाला यह पद अपनी तरह का एक ही है। मीराँ के पदो मे प्राय प्राप्त टेक परम्परा (मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर) भी इसमे नही है। सम्पूर्ण पद की राजस्थानी भाषा को देखत हुए अन्तिम पक्ति मे प्रयुक्त "तुम्हारी" शब्द के बदले "थॉरी" शब्द का होना अधिक युक्ति युक्त प्रतीत होता है। ६ गिरिधर, दुनियाँ दे छै बोल । गिरिधर म्हाँरे मै गिरिधर की, कहो तो बजाऊँ ढोल । आप तो जाय विदेसाँ छाये, हमको पड गयो झोल ५ । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पिछले जनम के कोल ६ । ॥३४॥ पाठान्तर १, गिरिधर, दुनियाँ दे छै बोल ७ । दुनियों क्यो दे बोल, ये करमन के भोग । १ क्या-क्या, २ हटाई, ३ बालम, ४. ब्याह द्वारा हुए सबध ५ अनिश्चित परिस्थिति, ६ बचन, ७ ताने । ३

३४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह आप तो जाय द्वारिका छाये, हम कूँ लिख दिया जोग । मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, पिछले जनम का कोल । इस पाठ पर ब्रज भाषा का प्रभाव स्पष्ट है । पाठान्तर २, गिरिधर, दुनियाँ दे छै बोल । गिरिधर मेरा मै गिरिधर की, कहो तो बजाऊ ढोल । आप तो जाय द्वारिका छाये, हम कूँ लिख दियो जोग । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पिछले जनम का कोल । उपर्युक्त तीनो पदो पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन प्रथम दोनो पाठो का सम्मिश्रण ही इस पाठ विशेष का आधार है । ७ अपने करम को छै दोस, काकूँ दीजै उधो । सुणियो मेरी भैण¹ पडोसण, गैले² चालत लागी चोट । पहली मै ग्यान मान नही कीनो, मै ममता की बाँधी पोट । मे जाणूं हरि नाहि तजैंगे, करम लिख्यो भलि पोच । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, परो निवारोनी सोच ॥३५॥† पद की द्वितीय पक्ति मे प्रयुक्त "भैण" शब्द के बदले "बग्गड' शब्द का ही प्रयोग मिलता है । पदाभिव्यक्ति से पश्चाताप ही प्रकट होता है । इस भावना का द्योतक पद यही एक है । पाठान्तर १, अपणां करम ही का खोट, दोष काँई दीजै री आली । सुणजो री मेरी सग की सहेली, बाट चलत लागी चोट । १ बहन, २ रास्ता।

वियोगाभिव्यक्ति ३५ मै ताँ सूं बूझूँ कोई न बतावे, सब ही बटाऊँ लोग। अपणाँ दरद कूँ सब कोई जाणै, पर दुख को नाहि कोई। मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, बची चरण की ओट। पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है।† पाठान्तर २, सबी आपणाँ स्याम षोटा, दोष नही कुबज्या मे। आपन हाथि लिख न भेजे, काँई कागद का टोटा। खारी बेल के कडा फल लागा, कहा छोटा कहा मोटा। कुबज्या दासी कसराय की, वे नन्दजी का ढोटा। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरँणाँ का वोटा।† भाषा पर ब्रज का और भाव पर पौराणिक गाथाओ का प्रभाव है। पाठान्तर ३, कछु दोष नही कुबज्या ने, बिरी अपना स्याम खोटा। आप न आवे, पतिया न भेजे, कागज का काँई टोटा। नौ लख धेनु नन्द घर दूधे, माखन का नाई टोटा। आपही जाय द्वारिका छाये, ले समुँदर की ओट। कुबज्या दासी कसराय की, वे नन्द जी का ढोटा। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कुबज्या बड़ी हरि छोटा।† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का अभाव है। कुछ पक्तियो, (पक्ति स० २ और ४) के आधारपर इस पाठ को पाठ स० २ का ही विस्तृत रूप कहा जा सकता है। इस पाठ की अन्तिम पक्ति है, "मीरा के प्रभु गिरिधर नागर"। परन्तु प्रथम तीनो पाठ की अन्तिम पक्ति है "मीराँ के प्रभु हरि अविनासी" यह भी एक महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू है।

३६ मीराँ-बृहद-पद-संग्रह ८ निरमोहिडा नेह न जोडे छै। यो मन कह्यो न माने, अमृत मे बिष घोरे छै, आप'तो जाय द्वारिका छाये, हम कूँ बिरहा झोरे१ छै। कुबज्या दासी कंसराई की, सरब२ सुख लोरे छै। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, लागी प्रीत क्यूँ तोडे छै। ॥३६॥ ९ माई, मेरा पिया बिन अलूणो३ देस। राग रग सिणगार४ न भावै, खुलि रहे सिर के केस। सावण आयो साहिब दूरे, जाइ रहे परदेस। सेज५ अलूणी भवन अकेली, रैण भयकर भेस। आव सलूणे प्रीतम प्यारे, बीते जोबन बेस६। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तन मन करूँ सब पेस७। ॥३७॥ १० नातो हरि नाँव को माई, मोसूँ तनक न बिसर्यो जाई। पाना८ ज्यूँ पीली भई, लोग कहै पिड रोग। छाने९ लांघण१० मै किया जी, राम मिलण के जोग११। बाबल१२ बैद बुलाइया, पकडि दिखाई (म्हाँरी) बाहि। मूरखि वेद न जानहि, (म्हाँरे) करक कलेजा माँहि। वैद जावो घर आपणै, (म्हाँरो) नाव न लेई। मै तो दाधी१४ हरि नांव की, मोहि काहे को दुष देई। १ झकझोरना, २ सर्व, ३ नमक बिना, भावार्थ, रसहीन, ४ शृंगार, ५ सेज, ६ वयस, ७ समर्पण, ८ पत्ते, ६ छिपा कर, -१० उपवास, ११ हेतु। १२ बाबुल; पिता, १३ नाम, १४ जली हुई,

२. गिरधर गोपाल प्रेम एवं रूप-वर्णन

वियोगाभिव्यक्ति ३७ काढि करेजो मै धरू, कागा तू ले जाइ। जा देसा म्हारो पिव बसै, वे देखे तू खाइ। छनि आगनि छनि मदिरा, छनि छनि ठाढी होइ। छाइ ज्यूँ घूमत फिरू, म्हारो मरम न जाने कोइ। तन सूखि पिंजर भयौ, सूका ब्रच्छ की छांहा। आगलियारी मूँदडी म्हारे आवण लागी बाँहा। रे रे पापी पषीवडा, पीव का नाम न लेह। पिव मिलै तो मै जीवूँ, नातरि त्यागूँ (म्हारो) जीव। कोइक हरजन सामलै¹ रे, पिव कारण जिव देह। मीराँ व्याकुल ब्रहनी, पिव बिन कसौ सनेह। ॥३८॥ पाठान्तर १, नातो नाम को रे मोसूँ तनक न तोड्यो जाय। पाना ज्यूँ पीली पडी रे, लोग कहै घट रोग। छाने लाघण मै किया रे, राम मिलण के जोग। बाबल बैद बुलाइया रे, पकड दिखाई म्हाकी बाह। मूरखि बैद मरम नही जाणै, करक कलेजा माह। जा बैदा घरि आपणै रे, मेरो नाव न लेइ। मै तो दाधी विरह की रे, तू काहे को दारु² देइ। मास गले गल³ छीजिया⁴ रे, करक रह्या⁵ गल आहिँ। आगलिया रो मूँडडो रे, म्हारे, आवण लाग्यो बाहि। रहो रहो पापी पपीहरा रे, पिव को नाम न लेइ। जे कोई विरहणी साम्हले, (सजनी) पिव कारण जिव देइ। खिण मदिर खिण आगणे, खिन खिन ठाढी होइ। घायल ज्यूँ घूमूँ सदा री, म्हारी बिथा न बूझै कोइ। १ साम्हैलै, सुनले, २ दवा, ३ गल-गल कर, ४ क्रमश नष्ट हो गया, ५ आकर, गले मे आकर। *

३८ मीराँ-बृहद-पद-संग्रह काँढि कलेजा मै धरू रे, कौवा तू ले जाइ। ज्या देसा म्हारो पिव बसै, (सजनी) वे देखे तू खाड। म्हारो नातो नाव को रे, और न नातो कोड। मीराँ व्याकुल विरहणी रे, पिया दरसण दीजो मोड। ११ तै दरद नहि जान्यू, सुनि रै वैद अनारी। तू जा वैद घरि आपणै रे, तुझै खबर मोरी नाही। मोरे दरद को तू मरम नहि जाणै, करक कलेजा रे माही। 'प्राण जाण का सोच नहि मोहि, नाथ दरस द्यौ आरी¹। तुम दरसन बिन जिव यूँ तरसै, ज्यूँ जल बिन पनवारी। कहा कहू कछु कहत न आवै, सुणिज्यो आप मुरारी। मीराँ के प्रभु कबरे मिलोगे, जनम जनम की मै थारी ॥३९॥† भाषा और भाव दोनो ही के आधार पर यह पद पद स० १० की कुछ पक्तियो का गेय रूपान्तर ही सिद्ध होता है। पद के इस रूप मे पूर्वापर सम्बन्ध का भी अभाव है। इससे उपर्युक्त कथन का समर्थन ही होता है। १२ रमैया बिन मोसूँ रह्योइ न जाय। खान पान मोहि फीको सो लागै, नैणाँ रहै मुरझाइ। बार बार मै अरज करत हूँ, रैण गई दिन जाइ। मीराँ कहै प्रभु तुम मिलिया बिन, तरस तरस तन जाइ ॥४०॥ १ शीघ्र ।

वियोगाभिव्यक्ति ३९ १३ पिय बिन रह्योइ न जाइ। तन मन मेरो पिया पर वॉहूँ, बार बार बलि जाइ। निसदिन जोऊँ बाट पियाँ की, कबरे मिलोगे आइ। मीराँ के प्रभु आस तुम्हारी, लीजो कठ लगाई। ॥४१॥ उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्तियो का साम्य विचारणीय है। १४ रे पपइया प्यारे कब को बैर चितार्यो१ । मै सूती छी अपने भवन मे, पिय पिय करत पुकार्यो। दाध्या ऊपर लूण लगायो, हिवडो करवत सार्यो। उठि बैठो बृच्छ की डाली, बोल बोल कठ सार्यो। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणॉ चित्त धार्यो ॥४२॥ १५ तुम देख्या बिन कल न पडत है, भली ए बुरी कोइं लाख कहो जी। नेह को पेड़ो बोहोत करुण है, च्यारी कही दस और कहो जी। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, प्रीत करो तो बोल सहोजी। ॥४३॥† पाठान्तर १, कृष्ण मेरे नजर के आगे ठाढो रहो रे। मै जो बुरी सान और भली है, भली की बुरी मेरे दिल रह्यो रे। प्रीत को पेणूडो बहुत कठिन है, चार कही दस और कहो रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रीत करो तो मेरा बोल सहो रे।† १ बदला लिया।

४० मीराँ-बृहद-पद-संग्रह १६ म्हारो मनडो लाग्यो हरि सूं, मै आज करूँ अतर सूँ । माधोरी मूरति पलक न बिसरूँ, सो ले हिरदै धरूँ । आवन कह गये अजहूँ न अये, बिन दरसण मे तरसूँ । म्हाँरो जनम सुफल होय, जादिन हरि के चरण परसूँ । मीरा के प्रभु दरसण दीज्यो, तन मन अरपण करस्यूँ । ॥४४॥ १७ म्हाँरो मन मोह्यो छै जी स्याम सुजाण । माधुरी मूरत सूरत सुन्दरी जाणे कोटिक भान¹ । कसूॅमल पाग केसर्यो जामो, सोहै कुडल कान । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तुम बिन तलफत प्राण । ॥४५॥ १८ बाई, म्हाँरे रावल भेष । वे स्याम बहो जटाधारी, अब ही अजन रेख । स्वेत बरण रग के कथा पहर्या, भिक्षा मागा देस । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करहूँ अलख अलेख ॥४६॥+ पाठान्तर १, बाई, थाराँ नैन रावल भेख । बानी श्याम बोहो जटाधारी, अन्जन रेख । स्वेत अरुण कंथा बिराजत, माँगत देस । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करत करत अलेख ।† १. भानु, सूर्य ।

वियोगाभिव्यक्ति ४१ पाठान्तर २, बाई म्हारे नैन रावल भेष । बिना श्याम सखी मे जटाधारी, सेली अंजन रेख । सुवेद वरण अग कत्था राजै, भिक्षा मांगूं देश । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करूंगी अलख अलेख ।† उपर्युक्त तीनो ही पाठो से कोई भी अर्थ स्पष्ट नही होता । १९ डाल गयो रे गल मोहन फॉसी । ऊँची सी अटाली पर मेहुँडा बरसत, बूँद लगी जसी तीर की गॉसी । अँबुवा की डाली पर कोयल बोलत, म्हॉरो तो मरनो भयो थॉरी भयी हॉसी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, थे तो मेरा ठाकुर, मै तो थॉरी दासी ॥४७॥† उपर्युक्त पद मे वसत और वर्षा का वर्णन एक ही साथ हुआ ह, यह असगत प्रतीत होता है । पाठान्तर १, डारि गयो मन मोहन फासी । ऑबा की डाली कोयल इक बोले । मेरो मरण अरु जग केरी हॉसी । बिरह की मारी मै बन बन डोलूँ । प्राण तजूं, करवत ल्यूँ कासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर । तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी ।†

४२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह २० ओलूंडी१ लगाय गयो है ब्रज को बासी, कब मिलि जासी हे। चंपेली री डाल कोयलिया बोले, बोलत बचन उदासी हे। गोकुल ढूँढ वृन्दावन ढूढ्यो, ढूँढी मथुरा कासी हे। रैण दिवस मछली ज्यूँ तलफ, तलफ तलफ जिवडो जासी हे। जो कोई प्रभु जी नै आण मिलावै, छूटत प्राण बचासी हे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि जी मिल्या दुख जासी हे। ।।४८।। २१ ओलू थारी आवै ह्‌हो महाराज अविनासी। हो म्हाने कब रे दरस दिखासी। बिरह वियोगिन बन बन डोलूँ, करवत लूँगी कासी। निसि दिन उभी पथ निहारु, कब मोहे धीर बधासी। कृपा करो म्हारे भवन पधारो, नाही ये जिवडो जासी। मे भेद अभागण काहे को सरजी, पिया मोसूँ रहत उदासी। तुम हो हमारे अतरजामी मै (थारा) चरणा री दासी। मीराँ तो कुछ जाणत नाही, पकडी टेक निभासी। ।।४९।। इस पद की अंतिम पंक्ति सर्वथा नूतन शैली मे है,। पद की भाषा राजस्थानी प्रधान है, अत सातवी पंक्ति मे प्रयुक्त 'तुम' और 'हमारे' शब्दो के स्थान पर 'थे' और 'म्हारा' होना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। २२ परम सनेही राम की नित ओलू री आवै। राम हमारे हम है राम के, हरि बिन कछु न सुहावै। १. याद, स्मृति।

वियोगाभिव्यक्ति ४३ आवण कह गए अजहू न आए, जिवडो अति अकुलावै । तुम दरसण की आस रमैया, कब हरि दरस दिखावै । चरण कवल की लगन लगी, नित बिन दरसण दुख पावै । मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यो, आनन्द वरणूं न जावै । ॥५०॥ पद की चतुर्थ पंक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर प्राप्त है। “तुम दरसण की आस रमैया, निसि दिन चितवत जावै ।” २३ सावरिया, मोरे नैणा आगे रहिज्यो जी । म्हाने भूल मत जाज्यो जी, मोहन लगन लगी निभाज्यो जी । राणा जी भेज्यो विष रो प्यालो, सो अमृत कर पीज्यो जी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुड़न मत कीज्यो जी । ॥५१॥ † उपर्युक्त पद की प्रथम दो और अन्तिम दो पंक्तियो मे अर्थ समन्वय नही होता। द्वितीय पंक्ति मे प्रयुक्त ‘पीज्यो’ शब्द के स्थान पर ‘दीज्यो’ शब्द ही अधिक अर्थमय सिद्ध होता है। २४ सावरिया, म्हारी प्रीतडली निभाज्यो । प्रीत करो तो स्वामी ऐसी कीज्यो, अधविच मत छिटकाज्यो१ । तुम तो स्वामी गुणरा सागर, म्हारा ओगुण चित मति लाज्यो । काया गढ घेरा ज्यो पड़ या छै, ऊपर आपर खाज्यो । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित्त चरणा रखाज्यो । ॥५२। पद की तीसरी पंक्ति सर्वथा अर्थहीन प्रतीत होती है। १. दूर हटा देना।

४४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह २५ घडी एक नही आवडे¹ तुम दरसण बिन मोय। तुम ही मेरे प्राण जो, कासू जीवण होय। धान² न भावै, नीद न आवै, बिरह सतावै मोय। घायळ सी घूमत फिरु रे, मेरो दरद न जाणै कोय। दिवस तो खाय गमायो रे, रैण गमाई सोय। प्राण गमायो झूरता³ रे, नैण गमाया रोय। जो मै ऐसा जाणती, प्रीत किए दुख होय। नगर ढिढोरा पीटती रे, प्रीत न कीज्यो कोय। पथ निहारु, डगर⁴ बुहारु⁵, ऊभी मारग जोई। मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलिया सुख होई। ॥५३॥ पद की भाषा प्रधानत राजस्थानी है सिर्फ कुछ सर्वनाम खडी बोली के हैं। जैसे 'तुम' अत इनका भी राजस्थानी के अनुकूल 'थे' हो जाना ही अधिक युक्तियुक्त होगा। २६ को विरहणि को दुख जाणै हो। जा घट विरहा सोई लख⁶ है, कै कोई हरिजन मानै⁷ हो। रोगी आतर⁸ वेद बसत है, वैद ही ओखद जाणै हो। विरह करद९ उरि अतरि माही, हरि बिनि सुख काने¹⁰ हो। दुग्धा आरत फिरै दुखारी, सुरत बसी सुत मानै हो। छात्रग स्वाति बूँद मन माही, पिव पिव उकलाणै¹¹ हो। सब जग कूड़ो कंटक दुनिया दरध¹² न कोई पिछाणै हो। मीराँ के पति आप रमइया, दूजो नही कोई छाणै हो। ॥५४॥ १ चैन पडे, २ अन्न, ३ याद करते हुए, ४ रास्ता, ५ झाड दूं, साफ करदूँ, ६ अंदाज लगा लेना, ७ विश्वास कर ले, ८ अतर, ९ करक, १० काम है, छोटा है। ११ व्याकुल होना, १२ दर्द,

वियोगाभिव्यक्ति' ४५ २७ रमैया बिन नीद न आवै । नीद न आवै बिरह सतावै, प्रेम की आँच दुलावै । बिन पिया जोत मदिर अधियारो, दीपक दाय१ न आवै । पिया बिन मेरी सेज अलूणी, जागत रैण बिहावै । पिया कब रे घर आवै । दादुर मोर पपीहरा बोले, कोसल सबद सुणावै । घुमट घटा ऊलर होई आई, दामिन दमक डरावै । नैना झर लावै । कहा करु कित जाऊ मोरी सजनी, वेदण कूण बुतावै२ । बिरह नागण मोरी काया डसी है, लहर लहर जिव जावै । जडी घस लावै । को है सखी सहेली सजनी, पिय कूँ आण मिलावै । मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे मन मोहन मोहि भावै । कबै हस कर बतलावै३ । ॥५५॥ २८ साजन, म्हारी सेजडली कद आवै हो । हसि हसि बात करु हिडदा की, जब जिवड़ो जक४ पावै हो । पाचू इन्द्री बस नही मोरी, घन ज्यूँ धीर धरावै हो । कठिन विरह की पीड गुँसाई, मिलि करि तपत बुझावै हो । या अरदास५ सुणो हरि मोरी, विरहणी पल्लो बिछावै६ हो । ॥५६॥ १ पसन्द, २ बन्द कर देना, मिटा देना, ३ बात करे। ४ चैन, ५ अर्ज, प्रार्थना, ६ "पल्लो बिछावै"-दैन्य स्वीकार करना ।

४६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह २९ म्हारे घर आवो जी, राम रसिया, थारी सावरी सूरत मन बसिया। घुडला जीव पूरबो मोहन, बखतर खासा कसिया । चुन चुन कलिया सेज बिछाई; ऊपरि राखिया तकिया । सिरे- गाय की पूँछ मगायो, चावल गेया पसिया । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल मन बसिया ।।५७।।† पदाभिव्यक्ति अर्थ हीन है। ? ३० भवन पति, तुम घरि आज्यो हो। बिदा तागी तन माहिने (म्हारी) तपत बुझाज्यो हो। रोवत रोवत डोलॉत, सब रैण बिहावै हो। भूख गई, निदरा गई, पापी जीव न जावै हो। दुखिया को सुखिया करो, मोहि दरसण दीजै हो। मीराँ व्याकुल विरहणी, अब बिलम न कीजै हो। ।।५८।। पद की भाषा मुख्यत. राजस्थानी है, अत भाषा के दृष्टि कोण से 'डोलॉत' प्रयोग के बदले 'डोलता' प्रयोग ही विशेष शुद्ध है। 'डोलता' का अर्थ है घूमते हुए । ३१ बेग पधारो सावरा कठिन बनी है, आप बिना म्हारो कूण धनी है। दुखिया कूँ देख देर मत कीज्यो, देर की बिरिया और घणि है। दिन नही चेत, रैन नही निद्रा, दुसमन के हिये हरस घणि है। जमडा की फौजा प्रभु आन पड़ी है, बेग हटावो मोटा आप धनीहै। मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल बिच आन खडी है। ।।५९।।† पद मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है।

वियोगाभिव्यक्ति ' ४७ ३२ म्हारे घर होता जाज्यो राज । अब के जिन¹ टाला दे जावो, सिर पर राखूँ विराज । पावणडा² म्हाके भले ही पधारो, सब ही सुधारण काज । म्हे तो जनम जनम की दासी, थे म्हारा सिरताज । म्हे तो बुरी छा,थाके भली छै घणेरी,तुम हो एक रसराज । थाने हम सब दिन की चिंता,तुम सब के हो गरीब निवाज । सब के मुगुट सिरोमनि, सिर पर मानूँ पुण्य की लाज । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बाह गहे की लाज ॥६०। '† पाठान्तर १, होता जाज्यो राज, महलाँ म्हारे होता जाज्यो राज । मे अगुणी मेरा साहब सुगुणा, सत सवारे काज । मीराँ के प्रभु मन्दिर पधारो, कर केसरिया साज ।† इस द्वितीय पाठान्तर की भाषा अधिक शुद्ध है । प्रथम पाठ की अभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबंध का अभाव है। ३३ साजन, बेगा³ घर आज्यो जी । आदि अतर रा यार हमारा, हम को सुख लाज्यो जी । निसि दिन चित चरणा धरू, हो मनडा ते न बिसरू । नजरि परै तुजि ऊपरि, धन जोवन वारू । हो मे पतिवरता रावरी, काहू तन काजै जी । अपनी वोरि निहारि के, प्रीति निभाज्यो जी । हरि बिन सुरति कहा धरू, नित मारग जोऊ जी । १ नही, २ अतिथि, ३ शीघ्र ।

४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह सांईं तेरे कारणे, भरि नीद न सोऊ हो। बिछरिया दिन बहु भया, बेगा दरस दिखाय्जो जी। प्रीति पुराणी जाणि कै, वाही कृपा रखाय्जो जी। मेरे अवगुण देखि कै, तुम नाहि तुलाज्यो जी। मेरे कारण रावरो, मति बिडद लाज्यो जी। वा बिरिया कब होसी, कोई कहै सदेशा हो। मीराँ के उणवात रो, मति परो अनेसा हो। ॥६१॥† पदाभिव्यक्ति मे असंगति और पुनरुक्ति है। ३४ आवो मनमोहना जी जोऊ थारी बाट। खान पान मोहि नेक न भावै, नैण न लागे कपाट। तुम आया बिन सुख नाहि मेरे, दिल मे बहोत उचाट। मीराँ कहे मै भई रावरी, छाडो नही निराट¹। ॥६२॥ ३५ आवो मनमोहना जी मीठा थारां बोल। बालपना की प्रीत रमइया जी, कदे² नहि आयी थारो तोल। दरसण बिना मोहि जक³ न पड़त है, चित्त मेरो डावाडोल। मीराँ कहै मै भई रावरी, कहो तो बजाऊ ढोल। ॥६३॥ पद की द्वितीय पंक्ति से व्यक्त होती भावना विशेष विचार- णीय है। ३६ कोई कहियो रे विनती जाइकै, म्हारा प्राण पिया नाथ ने। जा दिन के बिछुरे मन मोहनं, कल न परे दिन रात नै। १ निरावलम्ब २ कभी, ३ चैन ।

वियोगाभिव्यक्ति. ४९ देस विदेस सदेश न पूगे१, बिरहिन तलफे साथ नै । प्यारा महरम दिल की जाणै, और न जाणै कोई बात नै । मीराँ दरसण कारण झूरै, ज्यूँ बालक झूरै मात नै । ॥६४॥ पद की चतुर्थ पंक्ति मे प्रयुक्त 'महरम' शब्द की अर्थ संगति नही बैठती। इस शब्द के बदले 'म्हारा' कर देने से अर्थ स्पष्ट हो जाता है। भाषा के दृष्टिकोण से भी यह गलत नही हो सकेगा क्योकि पद की भाषा राजस्थानी ही है। ३७ पतिया ने कूण पतीजै,२ आणि खबरि हरि लीजै। झूठी पतिया लिख लिख भेजे, क्या लीजै क्या दीजै। ऐसा है कोइ बाच३ सुणावै, मै बाचू तो भीजै। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कमल चित दीजै। ॥६५॥ प्रथम और तृतीय पंक्ति का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त है। प्रथम पंक्ति "पतिया ने कूण पतीजै, म्हारो असुँवा सो अचल भीजै।" तृतीय पंक्ति "ऐसा है कोई बाच सुणावै, मैं बांचू तन छीजै।" ३८ थे छो म्हारा गुण रा सागर, औगुण (म्हारा) मत जाज्यो जी। लोक न धीजै (म्हारो) मन न पतीजै, मुखडारो सबद सुणाज्यो जी। मै तो दासी जनम जनम की, म्हारे आगण रमता आज्यो जी। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेड़ो पार लगाज्यो जी। ॥६६॥† उपर्युक्त पद किसी अन्य पद का अंश मात्र प्रतीत होता है।

१ पहुचे, २ विश्वास करे ३ पढ़ कर। ४