मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८३ वाक्यसंबन्धपदगतयोरेकवचनयोर्विवक्षितसङ्घत्वं दर्शितं । तच्चात्र विध्युद्देशरूपमभिप्रेत- मिति, विध्युद्देश एवेत्यनेन दर्शितम् । सम्बन्धशब्देन चात्र कर्म्मव्युत्पत्त्या विशेषणविशेष्य- रूपौ सम्बन्धिनावभिप्रेतौ एष हि गुणो भवतीत्यर्थवादप्राशस्त्यप्रदर्शनम् । यतस्ततो भूति- रितिवदिति कस्यचिच्छङ्का स्यात्तद्वयुदासार्थं—विध्युद्देशोत्यापितानामेकेत्याद्युक्तम् । नायमभिसंबन्धो विवक्षित इत्यादिना यत्प्रबन्धेन विध्युद्देशस्य प्राशस्त्याक्षेपकत्वं निराकृतम्, तस्य प्रकृतैकवाक्यतासिद्धिप्रयोजनतां दर्शयन्स्वाभिप्रेतं सूत्रार्थमुपसंहरति—तस्मादिति । अनेनैवं सूत्रं व्याख्यातं विधेयभावनांशाप्रतिपादकत्वेऽपि तदनुष्ठापकानां विधीनामङ्ग- मर्थवादा स्युः । केनोपकारेणेत्याक्षिप्ते; स्तुत्यर्थेनेत्युक्तम् । विधिनानुष्ठानसिद्ध्यर्थं स्तुते- रुपकारकत्वेऽभिहिते विधिमात्रेणानुष्ठानसिद्धेः किं स्तुत्येत्याशङ्कानिराकरणार्थमर्थवादानां धर्म्मप्रमोपयोगित्वसिद्धावतिक्लिष्टलाक्षणिकस्तुत्यर्थत्वाङ्गीकारकारणं विधिनैकवाक्यत्वादि- त्यनेनोक्तमिति ॥ ७ ॥ भा० प्र०-विधिनाः स्तुति साकाङ्क्ष विधि के साथ 'तु' शब्द पूर्वपक्ष का व्यावर्तक है 'एकवाक्यत्वात्' प्रयोजन साकाङ्क्ष अर्थवादों की एकवाक्यता होने से “विधीनां” विधि- विहित कर्म कलापों की प्रशंसा रूप प्रयोजन हेतु या प्रशंसा रूप प्रयोजन साकाङ्क्ष लाक्षणिक अर्थ के द्वारा “स्युः” अर्थवाद सार्थक या सफल होते हैं । विधिवाक्य प्रशंसा सापेक्ष हैं एवं अर्थवाद प्रयोजनसापेक्ष हैं, अतः अर्थवाद विधिवाक्य के साथ एकवाक्य अर्थात् मिलित होकर विधिविहित कर्मों की प्रशंसा रूप प्रयोजन के द्वारा प्रयोजनवान् अर्थात् सार्थक या सफल होने से प्रमाण हैं । आशय यह है कि—पूर्वपक्षी ने अर्थवादवाक्यों का अप्रामाण्य सिद्ध करने का प्रयास किया था, अतः सिद्धान्ती ने इसके उत्तर में कहा है कि अर्थवाद अप्रमाण नहीं है । कारण, स्वाध्यायविधि से ही अवगत है कि वेद के विधि, मन्त्र, नामधेय एवं अर्थवाद ये सभी अंश प्रमाण हैं, वेद का एक अक्षर भी निष्प्रयोजन नहीं है । विधि के प्रामाण्य का विश्लेषण पूर्व में ही किया है । अर्थवाद का प्रामाण्य प्रस्तुत प्रसङ्ग के द्वारा सिद्ध किया जा रहा है । क्योंकि, पूर्वपक्षी ने अर्थवाद वाक्यों का आनर्थक्य प्रदर्शित कर इनके अप्रामाण्य की सिद्धि करने की चेष्टा की है । प्रत्यक्ष या अनुमान से सिद्ध लौकिक फल के विषयों में ही पुरुष का स्वतः सिद्ध अनुराग के कारण स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है; और उस फल के साधन अर्थात् जिस उपाय से फल की प्राप्ति हो सकती है; उसमें जीव प्रवृत्त होता है । किन्तु, स्वर्गादि अलौकिक फल प्रत्यक्षगम्य या अनुमान सिद्ध न होने से उसके उपायभूत यागादि क्रियाओं में भी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं हो सकती है । अतः, “भूतिकामो यजेत', 'अभ्युदय चाहने वाला व्यक्ति याग करे' इस विधिवाक्य को सुनकर अभ्युदयरूप फल के साधन या उसके उपायभूत याग में पुरुष की प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी वह बलवती प्रवृत्ति नहीं होती है । इसमें कष्ट ही होगा वह अनिष्ट है; अर्थात्
८४ मीमांसादर्शनम् [ सू० अनभिप्रेत यागानुष्ठानरूप दुःख में अवसान लाभ करेगा—यह सोच कर निष्प्रभ हो जाता है। फलतः, प्रवृत्ति उत्पादन करने वाली विधि की शक्ति भी कुण्ठित हो जाती है। अतः, ऐसी स्थिति में कुछ ऐसे साधन की आवश्यकता होती है, जिससे पुरुष की प्रवृत्ति बलवती हो जाय, और फल की सुन्दरता का बोध होने से पुरुष की प्रवृत्ति तीव्र हो जाय-यह स्वाभाविक है। अतः, फल की प्रशंसा करने पर उन विषयों में पुरुष की आकाङ्क्षा अधिक होने लगती है। इसका परिणाम यह होता है कि फलप्राप्ति के उपायों को केवल क्लेशरूप फल को देने वाला मानकर उससे निवृत्त नहीं होता है, अतः अर्थवाद- वाक्य से फल की प्रशंसा या प्रशस्तता अर्थात् सौन्दर्य-बोधन करने पर पुरुष की प्रवृत्ति बलवती हो जाती है। पुरुष की प्रवृत्ति बलवती होने पर विधिशक्ति भी अव्याहत होती है। इसलिए अर्थवाद विधिशक्ति का उत्तम्भक या उत्तेजक होता है। "वायव्यं श्वेतमाल- भेत पशुकामः” (तै० सं० २।१।१।१) “अभ्युदय की कामना रखने वाला व्यक्ति वायु- देवता के उद्देश्य में श्वेत छाग का वध करे", इस विधिवाक्य को सुनकर प्रथमतः पुरुष की क्रिया में प्रवृत्ति अवश्य होती है, किन्तु, अनन्तर, अनिष्ट की उत्प्रेक्षाकर प्रवृत्ति से निवृत्त हो जाता है, अतः बाद की श्रुति में कहा है "वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता" वायु अति- क्षिप्र 'शीघ्रगामी' देवता है अर्थात् यतः वायु देवता क्षिप्रतम है, अतः, वायु जिस यज्ञ का देवता होता है, उस यज्ञ का फल भी अतिक्षिप्री अर्थात् शीघ्र ही होता है। इस अर्थवाद वाक्य को सुनने पर अनिष्ट की आशङ्का से स्तम्भित प्रवृत्ति पुनः तीव्र हो जाती है, इसलिए, विधिवाक्य वैधविषय में पुरुष की प्रवृत्ति को उत्पन्न कराने के लिए अर्थवाद की अपेक्षा करता है और अर्थवाद वाक्य स्वयं निरर्थक होने पर भी अर्थात् निष्प्रयोजन होने से विधिविहित प्रयोजनों के द्वारा अपनी प्रयोजनीयता का निर्वाह करने के लिए विधि की अपेक्षा करते हैं। इस प्रकार विधिवाक्य और अर्थवाद 'नष्टाश्वदग्ध- रथन्यायः'१' से परस्पर मिलकर एक प्रयोजन का निर्वाह करते हैं। इसी प्रकार निन्दात्मक अर्थवाद वाक्य भी निषेध्य विषय की प्रशस्तता का बोधन कर निषेध्य विषय से शीघ्र निवृत्ति करने के लिए साधन होता है, फलतः निषेध विधि की सहायता कर १. मार्ग में दो व्यक्ति अपने-अपने रथ से कहीं की यात्रा कर रहे थे, भाग्यवश एक व्यक्ति के रथ से घोड़ा भाग गया है, वह रथ को आगे ले जाने में असमर्थ थे, दूसरे रथयात्री के पास घोड़ा था; किन्तु उसका रथ टूट गया था, वह भी आगे की यात्रा में असमर्थ था, एक का रथ घोड़े के बिना निष्कर्म था और दूसरे का अश्व रथ के बिना निष्कर्म था, इस सन्दर्भ में दोनों ने विचार किया कि एक का घोड़ा और दूसरे का रथ परस्पर मिलाकर उपयोग में लिया जाय तो दोनों का प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। इसी प्रकार अर्थवाद वाक्य और विधिवाक्य परस्पर मिलकर एक ही प्रयोजन के सिद्ध कराने में समर्थ होते हैं।
७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८५ निषेध्य विषय से निवृत्त करा देता है, निषेधविधि और निन्दात्मक अर्थवाद का परस्पर सम्प्रयोग से दोनों की एक प्रयोजनता सिद्ध होती है। इसी प्रकार विधि और अर्थवाद की कल्पना करनी चाहिए, जहां अर्थवाद है, किन्तु विधि नहीं है, वहां विधि का विचार करना चाहिए। इस प्रसङ्ग में आचार्य शङ्कर का मत इस प्रकार है:-पूर्वपक्ष में कहा गया है कि वेदवाक्य क्रिया के प्रतिपादक न हो तो वे अनर्थक अर्थात् निष्प्रयोजन हैं। यह कथन जैमिनि के १।२।१ सूत्र के आधार पर किया गया है और इस पूर्वपक्ष के अनुसार वेद के अर्थवाद वाक्यों का अर्थात् 'सोऽरोदीत्' इस निन्दावाक्य आदि का भी अप्रामाण्य सिद्ध होता है। इस पूर्वपक्ष का सिद्धान्तवाक्य "विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः। (१।२।७) यह सूत्र है, जिसका विश्लेषण प्रस्तुत कर चुका हूँ। इसके सन्दर्भ में आचार्य ने कहा है कि मन्त्रों का जिस तरह विधिवाक्यों के साथ पदैकवाक्यता न रहने पर भी उनके साथ विधिवाक्य की वाक्यैकवाक्यता रहने से उनका प्रामाण्य रहता है, विधि के साथ किसी प्रकार सम्बन्ध न रहने पर ही उनका प्रामाण्य नहीं हो सकता है। इसी प्रकार प्रकृत में उपनिषदों का भी विधि के साथ वाक्यैकवाक्यता होने से प्रामाण्य हो सकता है और वे उपनिषद् वाक्य क्रियाविधि के ही अङ्ग होकर रहते हैं। यह सत्य है कि क्रिया के साथ असम्बद्ध रह कर स्वतन्त्र रूप में ब्रह्मप्रतिपादक होने पर उनका प्रामाण्य नहीं रह सकता है पदैकवाक्यता और वाक्यैक वाक्यता निम्नलिखित है। दर्शपूर्णमास प्रकरण में छः वाक्यों का निर्देश है, स्वर्गकामी व्यक्ति दर्शपूर्णमास याग करें, इसके बाद समिधो यजति आदि वाक्य हैं। प्रथम दृष्टि मे ये सभी वाक्य परस्पर निराकाङ्क्ष रहकर अपने-अपने अर्थ की अवगति कराते हैं, किसी वाक्य का किसी वाक्य के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है। किन्तु, एक प्रकरण में पठित हैं, अतः, इनका निश्चय ही कोई सम्बन्ध है, यह प्रतीत होता है। इसीलिए इन वाक्यों में गुण- प्रधानभाव या अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना करनी पड़ती है, अन्यथा एक प्रकरण में पाठ निरर्थक होगा। इस प्रकार मूलभूत दर्शपूर्णमासयाग-बोधक-वाक्य के साथ समिध् आदि अङ्गबोधक वाक्यों का सम्बन्ध होने पर भी सभी वाक्यों का अपने-अपने अर्थ में अव्याहत तात्पर्य है। यही इनमें वाक्यैकवाक्यता है। पदैकवाक्यता का स्वरूप सर्वथा भिन्न है। अर्थवाद वाक्यों से प्रथम प्रतीत अर्थ ही मूल विधि वाक्य के साथ अन्वित होने के समय परित्यक्त हो जाता है, एवं समग्र वाक्यों से लक्षित एक निन्दा या प्रशंसा रूप अर्थ विधि वाक्यार्थ में प्रविष्ट हो जाता है। अतः, इन दोनों एक वाक्यताओं में अतिशय भेद है। इस दृष्टान्त के अनुरूप वेद के मन्त्र भागों के साथ ब्राह्मणभागान्तर्गत विधि वाक्य की भी वाक्यैकवाक्यता होती है। मन्त्र भाग में देवता या यागसंक्रान्त वस्तु के परिचायक वाक्य का भी अपना स्वार्थरक्षणपूर्वक
८६ : मीमांसादर्शनम् [ सू० ब्राह्मण भाग के विधिवाक्य के साथ अन्वय होता है । ब्राह्मण भाग के विधि में “ऐन्द्रं हविर्जुहोति” अर्थात् इन्द्र देवता के उद्देश्य से घृत दान करे और मन्त्र भाग में “वज्रहस्तपुरन्दरः इन्द्रो वृत्रम् अवधीत्” अर्थात् इन्द्र के हाथ में वज्र है और उस वज्र से वृत्र का वध किया । इस स्थल में विधिवाक्य के द्वारा अवगत अर्थ इन्द्र के विशेषण के रूप में अन्वित होकर वाक्यार्थ में प्रविष्ट हो जाता है । अतः मन्त्र भाग के साथ विधिवाक्य की वाक्यैकवाक्यता ही सम्भव है । इसी के आधार पर भाष्यकार ने उपनिषद् का सादृश्य प्रदर्शन करते हुए क्रियाविधिशेषत्व का वर्णन किया है । पूर्वपक्षियों ने यह आशंका की है कि ब्राह्मण भाग के अर्थवाद और मंत्र भाग के मंत्र के समान वेदान्तवाक्यके क्रिया सम्बद्ध न होने पर वेदान्त का प्रामाण्य नहीं रहेगा । इस प्रसङ्ग में यह कहा जा सकता है कि वेदान्त वाक्य के क्रियापरक न होने पर भी ब्रह्मस्वरूपविधिपरक हो सकता है और ऐसा होने पर “विधिना त्वेकवाक्यत्वात्” इस जैमिनिसूत्र के सिद्धान्त की रक्षा भी हो सकती । अप्रवृत्त प्रवर्त्तक ही विधि होती है— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उत्पत्ति विधि किसी को प्रवृत्त नहीं करती है, केवल अज्ञात- विषय की ज्ञापक ही उत्पत्ति विधि होती है । जैसे “अग्निहोत्रं जुहुयात्” अर्थात् अग्निहोत्रहोम करे यह वाक्य अज्ञात अग्निहोत्र की कर्त्तव्यता का ही ज्ञापन करता है, क्योंकि इतिकर्त्तव्यता या स्वरूपादि का जब तक वर्णन नहीं होता है तब तक वह किसी को प्रवृत्त नहीं कर सकता है, अतः, उत्पत्ति विधि के द्वारा अप्रवृत्त-प्रवर्त्तकता के समान ही अज्ञात-ब्रह्मज्ञापक-वेदान्त में विधि क्यों नहीं होगी ? ऐसी स्थिति में वेदान्त का ब्रह्म विषय में प्रमाण होगा ही । परिनिष्ठित अर्थात् सिद्ध वस्तु में विधि कैसे सम्भव है ? विधि का विषय क्रिया ही होती है, सिद्ध वस्तु नहीं । उत्पत्ति विधि साक्षात् प्रवर्त्तक भले ही न हो क्रिया- बोधक होने से विनियोग विधि के साथ मिलित होकर प्रयोग विधि के रूप में परिणत होती है । ब्रह्मस्वरूपज्ञापक वेदान्त-वाक्य वैसा नहीं है । अतः उत्पत्ति विधि के समान ब्रह्मस्वरूप-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्य-प्रमाण नहीं हो सकता है । कोई भी अनागत अर्थात् उत्पाद्य भाव को ही विषय करता है । प्रकृत में भाव शब्द का अर्थ भावना होता है । जिस पुरुष-व्यापार के द्वारा किसी कार्य के करने में प्रवृत्ति उत्पन्न होती है—वही भावना है । णिच्प्रत्ययान्त √भू धातु से भाव अर्थ में घञ् प्रत्यय कर 'भाव' शब्द सिद्ध होता है । इसी भाव का अर्थ भावना है । केवल √भू धातु से घञ् प्रत्यय करने पर जो भाव शब्द की निष्पत्ति होती है उस भाव शब्द का अर्थ उत्पत्ति होता है । भावनाबोधक ही विधि होती है । भावना अनागत और उत्पाद्य दोनों होती है । उत्पाद्यत्व का हेतु ही अनागतत्व है । यह विधि चार प्रकार की है—अधिकार, विनि- योग, प्रयोग और उत्पत्ति । अधिकार विधि पुरुष के साथ फल का सम्बन्ध अवगत कराती है । यदि अन्य पुरुष को फल की प्राप्ति होती है तो फल के जनक कार्य में कर्त्ता
७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८७ की प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। अतः, कर्ता के साथ फल का सम्बन्ध बताना आवश्यक है और यह अधिकारी विधि के द्वारा होता है। विनियोग विधि क्रिया फल जनक होती है, इसी की अवगति कराती हुई प्रधानक्रिया के साथ अवान्तर क्रिया का अङ्गाङ्गिभाव या गुणप्रधानभाव को भी अवगत करती है। प्रयोग विधि अनेक अवान्तर अङ्गक्रियाओं का पूर्वापर भाव प्रदर्शन करती है। क्योंकि अङ्गक्रियाओं का एक साथ अनुष्ठान सम्भव नहीं है, अतः, इनमें क्रम आवश्यक है। इस विधि से उसी क्रम का प्रदर्शन होता है। इसीलिए इस विधि को अनुष्ठापन भी कहा जाता है। उत्पत्ति कहने से कर्म के स्वरूप का ज्ञान होता है, अतः, इन कर्म के स्वरूपों का ज्ञान जिस विधि से होता है—वहीं उत्पत्ति विधि है। पूर्वोक्त विधियों में सिद्ध वस्तु प्रतिपादक ब्रह्मविषयक ज्ञान का अन्तर्भाव सम्भव नहीं है। यदि यह कहा जाय कि कर्मविधि के प्रकरण में ये वाक्य नहीं कहे गये हैं, अर्थात् कर्मकाण्ड प्रकरण के मध्य में वेदान्त वाक्य नहीं कहे गये हैं, इसलिए भिन्न प्रकरण में पठित वाक्य के साथ एकवाक्यता सम्भव ही नहीं है। पूर्वपक्षी ने इसके समाधान में कहा है कि उपनिषद् में कथित उपासना विधि उपलब्ध है; और उसी प्रकरण में ब्रह्मबोधक वाक्य भी पठित है, अतः, उपासना विधि का यह शेष है। आचार्य शङ्कर ने अपने भाष्य में एवं उसकी व्याख्याओं में इसका विस्तृत विश्लेषण किया है। “तत्तु समन्वयात्”, (बा० सू० १।१।४) का भाष्य द्रष्टव्य है। अन्य प्रमाणों से अज्ञात ब्रह्म का ही प्रतिपादन उपनिषद् के उपक्रम, उपसंहार आदि वाक्यों से उपलब्ध है। 'तत्केन कं पश्येत्' आदि श्रुति वाक्यों से कारक और फल का निराकरण होने से कर्ता का भी निराकरण हो जाता है। 'अहं ब्रह्मास्मि' यह याज्ञिक भावना करने पर यज्ञ की सिद्धि सम्भव ही नहीं है। परिनिष्ठित ब्रह्म प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय नहीं है। अतः, लौकिक वाक्य घट, पट आदि सिद्ध वस्तु का प्रतिपादक होने से अनुवादक या सापेक्ष होने से अप्रमाण होने पर भी प्रकृत में यह दोष नहीं है। इसी प्रकार उपासना विधि शेष भी नहीं है, क्रिया कारक आदि द्वैतज्ञान का सर्वथा विलयन हो जाने से वह ब्रह्म किसी प्रकार भी उपास्य और उपासक नहीं हो सकता है। परिनिष्ठित वेद वाक्यों के अप्रामाण्य का प्रश्न भी नहीं है, क्योंकि, उपनिषद् से बोधित आत्मा और ब्रह्म का एकत्व विज्ञान भी सर्वदुःख निवृत्तिरूप मोक्ष का उत्पादक है, अतः ब्रह्म- प्रतिपादक वेदान्त के प्रामाण्य का प्रत्याख्यान उचित नहीं है। क्योंकि वेद का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है। वेद ही ब्रह्म विषय में प्रमाण है अर्थात् ब्रह्म ही वेदानुशास्त्र का प्रतिपाद्य है। 'तत्तु समन्वयात्' सूत्र में अनेक भाष्य हैं। आचार्य शंकर के मत का दिग्दर्शन मात्र किया है। उपासना परक सिद्धान्त में समन्वय की भिन्न प्रक्रिया है। इस विषय की वहीं से अवगति करे ॥ ७ ॥
८८ मीमांसादर्शनम् [ सू० तुल्यं च साम्प्रदायिकम् ॥ १.२.८ ॥ शा० भा०—अथोच्येत प्राक् स्तुतिपदेभ्यो निराकाङ्क्षाणि विधायकानि विधिस्वरूपत्वात् । स्तुतिपदानि तु प्रमादपाठ इति । तन्न । एवमर्थावगमात् । तुल्यं च साम्प्रदायिकम् । सम्प्रदायः प्रयोजनं येषां धर्माणाम्, सर्वे ते विधिपदा- नामर्थवादपदानां च तुल्याः । अध्यायानध्ययने, गुरुमुखात्प्रतिपत्तिः, शिष्यो- पाध्यायता च । सर्वस्मिन्नेवंजातीयकेऽविधानार्थे तुल्यमाद्रियन्ते । स्मरणं च दृढम् । अतो न प्रमादपाठ इति ॥ ८ ॥ भा० वि०—ननु तुल्यं चेति च शब्देन विधिनात्वेकवाक्यत्वादित्यनेन यः स्तुत्यर्थत्वमर्थवादानामुपयोग उक्तस्तत्रैव युक्त्यन्तरं समुच्चीयत इति प्रतीयते, तच्चायुक्तम्, तुल्यसाम्प्रदायिकत्वस्य भवितव्यं प्रयोजनेनेत्येतावन्मात्रसाधकत्या स्तुत्यर्थत्वासाधकत्वादित्याशङ्क्य नानेन स्तुत्यर्थत्वे हेत्वन्तरं समुच्चीयते, किन्तु स्तुत्यर्थत्वान्नानुपयोग इत्यनुपयोगपरिहार उक्तस्तत्रैव हेत्वन्तरमिति दर्शयितुं तामेवानुपयोगपरिचोदनामनुवदति—अथेति । स्तुतिप्रतिपादकत्वेना- भिमतेभ्यः प्राग्विधायकानि विधिपदानीति शेषः, तत्र 'हेतुर्विधिसरूपत्वादिति, अर्थवादमनपेक्ष्यैव विधिपर्यवसायिवसन्तादिवाक्यसारूप्यादित्यर्थः, किमर्थानि तर्हि तानीत्याह—स्तुतीति । प्रमादपतितानि अबुद्धिपूर्वाधीतानि अनर्थका- नीत्यर्थः, अत्रेतिरध्याहार्यः, तत्र पूर्वोपपादितोपयोगप्रतीतं परिहारमन्तर्भाव्य, तेन परिहान्तरसमुच्चये च शब्दं व्याख्यातुं पूर्वसूत्रोक्तमनुपयोगपरिहारं स्मार- यति—तन्नेति । तत्र हेतुः—एवमिति । पूर्वोक्तप्रकारेण स्तुत्यर्थतया अर्थवत्वाव- गमादित्यर्थः, न केवलमर्थवत्त्वावगमादनुपयोगासंभवः, साम्प्रदायिकतुल्यत्वा- च्चेत्येतत्सूत्रगतं च शब्दं योजयति—तुल्यं चेति । साम्प्रदायिकपदार्थं दर्शयन्वा- क्यार्थमाह—सम्प्रदाय इति । सम्प्रदायो अध्ययनं प्रयोजनं येषां भावानामध्या- यानध्ययनादीनामित्यर्थः सम्प्रदायाख्याध्ययनानुग्राहकत्वं च धर्माणाम् । 'तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च श्रुतिचोदितैः । वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यस्सरहस्यो द्विजन्मना ॥ इति स्मृत्या विनियोगादवगन्तव्यम् । ननु योऽर्थवादानर्थक्यमभ्युपैति, तस्य साम्प्रदायिकतुल्यत्वमप्यसिद्धमिति शङ्कां साम्प्रदायिकान् धर्मान् विवृण्वन् परिहरति—अध्यायेत्यादिना । अध्यायान- ध्ययनपरिच्छेदपरिसमाप्त्यादावुत्थानादिः गुरुमुखात् प्रतिपत्तिः ग्रहणं तन्नियम इति यावत् । शिष्योपाध्यायतो अधीहि भो इत्याद्युपसदनक्रियायां कर्तृकर्मभावः, १. स्वरूपत्वादिति० मु० भा० पु० पा० ।
८ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८९ च शब्देन भैक्षाचरणगुरुशुश्रूषाऽधश्शय्यादयो गृह्यन्ते, ते सर्वे सर्वस्मिन् वायुर्वे क्षेपिष्ठेत्येवं जातीयके वायव्यं श्वेतमित्यादिविधिवाक्यैः तुल्यमाद्रियन्ते आदर- णेनानुष्ठातृभिरनुष्ठीयन्त इत्यर्थः, भवत्वध्ययनानुग्राहकधर्माणामर्थवादेष्वप्यादरः तथापि कथमानर्थक्यपरिहारः तत्राह-अविघ्नार्थमिति- 'अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी । ब्रह्माष्टमीपौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ इत्यादिस्मृतेः तावद्विघ्नहेतुद्ध्यायनिरासेनाक्षरग्रहणं साधयतः सम्प्रदायस्या- नध्यायादिनियमजातमनुग्राहकमवगम्यते, न च निष्प्रयोजनस्य विघ्नेन किंचित् कार्यं तत्र क्लेशपरिहाराय विघ्नस्यैव युक्ततरत्वात्, तेनैषां धर्माणां सम्प्रदाया- विघ्नार्थमादरेणानुष्ठीयमानत्वात् सप्रयोजनार्थवादाध्ययनस्यावसीयत इति भावः। नन्वादरस्य स्मृतिमूलत्वाभिधानात्, तस्याश्च मूलरहितत्वात् कथं प्रयोजन- वत्त्वाध्यवसायः, स्मरणाच्चेति स्मृत्यधिकरणे वक्ष्यमाणन्यायेन वेदमूलत्वा- दृढमिति वेदमूल एवायमादर इत्यर्थः। वेदमूलश्चादरः प्रयोजनवत्त्वाद्भेदाव- गताहते न सम्भवतीति सामान्येन प्रयोजनावगमान्नानर्थक्यमर्थवादानामित्याह- अत इति। यस्मान्न प्रमादपाठः, तस्मात्प्रयोजनविशेषाकाङ्क्षायां स्तुत्यर्थेनार्थ- वत्त्वं भविष्यतीति हेत्वर्थेन इति शब्देनेति दर्शितम्। अथवा साम्प्रदायिकधर्मादिरान्यथानुपपत्त्या प्रयोजनवत्त्वमुक्त्वा, इदानीं यदेवेदं वेदस्य स्मरणं धारणात्मकपालनापरपर्यायं साम्प्रदायिकम्, तेनाप्यध्येतृ- पुरुषवर्त्तिप्रयोजनवत्त्वाभिप्रायोनुमानपूर्वकं प्रयोजनत्वप्रतिपादकवाक्यानुमानात् नानर्थक्यम् इत्यन्यथा सूत्रं व्याचष्टे-स्मरणं चेत्यादिना। इतिशब्देन पूर्ववद्विशेष- पर्यंवसानं दर्शितम् ॥ ८ ॥ त० वा०-चशब्दव्याख्यानार्थं परिचोदनोपन्यस्ता। आनर्थक्यमेवास्त्विति। तन्नैव। कुतः ? पूर्वोक्तेन न्यायेनार्थस्यावगम्यमानत्वात् । अथ वा तन्नेत्यवच्छिद्यैवमर्थावगमादित्युक्तप्रकारपरामर्शः। किं च तुल्यं चेत्ति योजना। संप्रदायानुग्रहार्थं धर्मजातम्। तत्संबन्धस्मरणात्। स्वर्गादिसंयो- गाच्च। न चास्य प्रयोजनवत्संनिहिताध्ययनपरित्यागेनार्थत्वे प्रमाणमस्ति। संप्रदायाङ्गत्वेऽपि चाविघ्नस्याऽऽकाङ्क्षितत्वात्। तादर्थ्यस्मरणाच्चाविघ्नार्थ- त्वम्। न ह्यान्यत्कल्प्यमानं स्वाध्यायेतिकर्त्तव्यतानुगुणं भवति। यदि तावत्स्वर्गः कल्प्येत, ततः पुरुषार्थत्वमेवाऽऽपद्यते। अथ पुनः क्रतुफलसिद्धिरेवं पठिते वेदे भवतीति। एवमपि दूरस्थोपकारितैव। तस्मात्संप्रदायस्याक्षरग्रहणं साधयतो नियमजातमनुग्राहकम् ।
९० मीमांसादर्शनम् [ सू० न च निष्प्रयोजनस्याविघ्नेन कार्यं वरं तादृशस्य विघ्नमेवोत्पन्नं येन क्लेशोऽपि तावन्न स्यात् । यतस्ते सप्रयोजनैर्विधिवाक्यैस्तुल्यमेवाऽऽद्रियन्ते । तेनावश्यं तद्वदेव प्रयोजनवन्त्यपीति । नियमस्मृतेश्च वेदमूलत्वाद्द्वेदकृत एवाय- मादरः । स च प्रयोजनवत्त्वाहते नोपपद्यत इति, प्रयोजनवत्त्वमपि सामान्येना- नुमायाऽर्थाद्वा कल्पनैकदेशत्वाद् १.४.२४ सूत्र इति । सामर्थ्यतोऽर्थवादानां स्तुतिर्नाम प्रयोजनविशेषो लभ्यते । स्मरणं च दृढमित्येतेदेवाऽऽह । अथ वा यदेवेदं ग्रन्थस्मरणं परिपालनात्मकम्, तेनाध्येतृपुरुषप्रयोजनवत्त्वा- भिप्रायप्रतिपत्तिपूर्वकं प्रयोजनवत्त्वानुमानम् । सम्भाव्यते च कुतश्चिद्वाक्यादियं प्रतिपत्तिरिति, नाप्रमाणम् । अन्यथा हि निष्प्रयोजनान्येतानीति केचित्परित्य- ज्यार्थवादान्विधिमात्रं प्रतिपद्येरन् । तत्र दृढस्मरणमेतेषु न स्यात् । अस्ति तु तत् । तस्मान्न प्रमादपाठः । ततश्चार्थवन्त इति । तुल्यं च सांप्रदायिकमित्यस्यापरा व्याख्या । सम्प्रदायः प्रयोजनं यस्य वाक्यस्य, येन प्रवर्तितः सम्प्रदायः, तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्येतत्स्वाध्याय- त्वाविशेषाद्विध्यर्थवादयोस्तुल्यं यः प्रागुक्तेन न्यायेन प्राक् पुरुषार्थसिद्धेरवस्थातुं न लभ्यत इति, शक्त्यनुसारेण स्थितमर्थवादानां स्तुत्यर्थत्वमिति ॥ ८ ॥ न्या० सु०-सामान्योपयोगप्रतिपादनं विनाऽर्थवादानां द्वारविशेषोपयोगप्रतिपादनाशक्तेः सामान्योपयोगप्रतिपादनार्थमेतत्सूत्रं पूर्वं कार्यमपि प्रथमसूत्रव्युत्पादिताध्ययनविधिदृष्टार्थत्व- बलेन सामान्योपयोगस्य सिद्धस्य विशेषोपयोगमन्तरेणानिर्वाहात्, तत्सम्भवप्रदर्शनोत्तरकालं कृतम् । तत्र भाष्यकारीयपरिचोदनोपन्यासस्य प्रयोजनमाह-चशब्देति । तुल्यासाम्प्र- दायिकत्वस्यादृष्टार्थत्वेऽप्युपपत्तेः पूर्वप्रतिज्ञातस्तुल्यार्थत्वासाधकत्वाद्विध्येकवाक्यत्वलक्षणस्तु- त्यर्थत्वसाधकहेतुसमुच्चयार्थं चशब्दाद्योगात्प्रमादपाठत्वशङ्कानिराकरणार्थार्थवत्त्वावगम- लक्षणहेत्वन्तरसमुच्चयार्थत्वेन चशब्दो भाष्यकृता व्याख्यात इत्यर्थः । परिचोदनार्थं व्याचष्टे-आनर्थक्यमेवेति । निराकरणभाष्यं व्याचष्टे-तत्रैवमिति । एवं त्वर्थावगमप्रकारानुक्तेः साकाङ्क्षत्वप्रसङ्गादपरितोषेणाऽन्यथा छेदं करोति- अथ वेति । अनेन च विधिना त्वेकवाक्यत्वादित्येतदेव सूत्रं प्रमादपाठत्वशङ्कानिराकरणे अपि योजितम् । विध्येकवाक्यत्वेन स्तुत्यर्थतयाऽर्थवत्त्वावगमादप्रमादपाठत्वनिराकरण एव हेत्वन्तरसमुच्चयार्थं तुल्यं साम्प्रदायिकत्वं योजयति-किं चेति । साम्प्रदायिकशब्दव्याख्या- नार्थमनध्यायादिधर्म्माणां वेदाध्ययनाख्यसम्प्रदायप्रयोजनत्वं भाष्यकृतोक्तमुपपादयति- सम्प्रदायेति । तादर्थ्यस्मरणादिति- 'तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च श्रुतिचोदितैः । वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥'
प्रकरणपठितस्यापि तस्य स्वरूपे कार्यं चानुपयोगादध्ययनेनैव फलवत्कर्म्मावबोधं
इत्यादिना धर्म्मजातस्य सम्प्रदायार्थत्वस्मरण।दित्यर्थः पुरुषार्थत्वं तु निष्प्रमाणक- मित्याह—स्वर्गादिति । नन्वध्ययनस्वरूपे, तत्कार्ये च ग्रहणे धर्म्मजातस्यानुपयोगात्तत्पूर्व्व- कज्योतिष्टोमादिकर्म्माङ्गत्वं भविष्यत्यत आह—न चास्येति । एतच्च द्वादशाधिकरण- सिद्धमुक्तं तत्र ह्याध्यायानध्ययनाय द्वादशाध्यायाधिकरणार्थं संग्रहादिधर्म्मजातस्याध्ययन- प्रकरणपठितस्यापि तस्य स्वरूपे कार्यं चानुपयोगादध्ययनेनैव फलवत्कर्म्मावबोधं भावयेदित्यध्ययननियमस्याना रभ्य विहितस्याप्यध्ययन जनितज्ञानोपस्थापितज्ञेयकर्म्माङ्गतया सामर्थ्योपबृंहितेन सन्निधिनावधारणात्, तद्द्वारा कर्म्माङ्गत्ववावगतेरमावास्यादौ कर्म्माङ्ग- भूतयाज्यानुवाक्यादिमन्त्रोच्चारणं न कार्यमिति । मन्त्राणां कर्मसंयोगे स्वधर्मेण प्रयोगः स्यात्, धर्म्मस्य तन्निमित्तत्वादितिसूत्रेण पूर्वपक्षयित्वा प्रकरणेनाध्ययनाङ्गतयाऽवधारि- तस्यान्यार्थत्वे प्रमाणाभावादविघ्नपरिसमाप्त्यर्थत्वेन तदुपयोगसम्भवात्कर्म्माङ्गत्वाभावेन कर्म्मकालेऽध्यायानध्ययनादिधर्म्मनादरेणामावास्यादावपि कर्म्माङ्गमन्त्रोच्चारणं कार्यं- मिति विद्यां प्रतिविधानाद्वा, सर्व्वकालं प्रयोगः स्यात् कर्म्मार्थत्वात्प्रयोगस्येति सूत्रेण सिद्धान्तयिष्यते । केनोपकारेणाध्ययनाङ्गत्वं कर्म्मजातस्येत्यपेक्षायामविघ्नार्थत्वं भाष्य- कृतोक्तमुपपादयति--सम्प्रदायाङ्गत्वेऽपि चेति । विघ्ने सत्यध्ययनेनाक्षरग्रहणस्य कर्त्तुम्- शक्यत्वात्, तत्सिद्ध्यर्थमविघ्नमेवापेक्षितम्—तादर्थ्यस्मरणाच्चेति । ‘अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी । ब्रह्माष्टमौ पौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥’ इत्यादिना धर्म्मजातस्याविघ्नार्थत्वस्मरणादित्यर्थः । प्रकरणावगताध्ययनाङ्गत्वा- न्यथानुपपत्त्याप्यविघ्नोऽर्थतोऽवसीयत इत्याह—न हीति । एतदेव प्रपञ्चयति—यदि तावदिति । नन्वध्ययनजनितज्ञानसाध्यकर्म्मानुष्ठानजन्या- पूर्वार्थत्वेऽपि धर्म्मजातस्य व्रीहिसाध्ययागापूर्वत्वेऽपि प्रोक्षणस्य व्रीह्यर्थत्वाविघातवदध्यय- नाङ्गत्वाविघातः स्यादत आह—अथ पुनरिति । व्रीहीणां यागापूर्वार्थत्वात्तदुत्पत्त्युपयोगि- प्रोक्षणादिधर्म्मग्राहकत्वं युक्तम् । अध्ययनस्य क्रत्वनङ्गत्वान्न तत्साम्यमिति भावः । कः पुनरध्ययनस्याविघ्नेनोपकारो जन्यत इत्यपेक्षायामक्षरग्रहणाख्यकार्ययोग्यतालक्षणमुपकारं दर्शयितुमाह—तस्मादिति । तुल्यसाम्प्रदायिकत्वस्य प्रकृतानर्थक्यनिराकरणोपयोगितां दर्शयति—न चेति । न चाध्ययनादिधर्मनियमस्मृतेर्निर्मूलत्वेनाप्रामाण्यं शङ्क्यम्, स्मृत्य- धिकरणे स्मृतीनां वेदमूलत्वस्य वक्ष्यमाणत्वादित्याह—नियमस्मृतेश्चेति । तुल्यसाम्प्रदायि- कत्वसाधितसामान्योपयोगोपसंहारपूर्वकं तस्य पूर्वसूत्रोक्तस्तुत्यर्थत्वलक्षणविशेषोपयोग- सिद्धयुपयोगितामाह—स चेति । अत्रैवार्थे स्मरणं च दृष्टमित्यादिभाष्यं योजयति— स्मरणं चेति । इतिकरणः प्रभृत्यर्थः, तत्र स्मरणं च दृष्टमिति वेदशब्दत्वाभिधाने योजितम् ; अतो न प्रमादपाठ इति सामान्योपयोगोपसंहारे इतिकरणः, तस्य विशेषो- पयोगित्वे यस्मान्न प्रमादपाठः । अतः कारणात्प्रयोजनविशेषापेक्षायां सामर्थ्यात्स्तुत्यर्थतार्थ- वादानां सिध्यतीतिकरणो हेत्वर्थे व्याख्येय इत्यर्थः ।
९२ मीमांसादर्शनम् [ सू० साम्प्रदायिकशब्दो वा धारणाऽध्ययनपरतयानेन भाष्येण व्याख्यायत इत्याह-अत वेति । यत्त्वस्मिन्व्याख्याने पुरुषाधीनप्रामाण्यप्रसङ्गादित्यादिना दूषणं पूर्वसूत्रव्याख्योप- क्रमेऽभिहितम्, तत्परिहरति-सम्भाव्यते चेति । पूर्वोक्तमध्ययनविधिप्रमाणकं सर्वस्य यदस्य प्रयोजनवदर्थपर्यवसायित्वमेतत्सूत्राऽढं कर्तुमध्ययनविधिपरतया साम्प्रदायिकशब्दं स्वयं व्याचष्टे-तुल्यं चेति । उनयोरपि व्याख्यायोरतत्सूत्रोक्तस्य सामान्योपयोगस्य पूर्वसूत्रोक्त- विशेषोपयोगसिद्धयर्थत्वप्रतिपादनार्थमतो नेत्यादिभाष्यमिति दर्शयितुं ग्रन्थशेषः ॥ ८ ॥ भा० प्र०-यह सन्देह स्वाभाविक है कि विधिवाक्य न रहने पर अर्थवाद वाक्य सप्रयोजन नहीं हो सकते हैं, और प्राशस्त्यज्ञापक अर्थवाद वाक्यों की सहायता के बिना भी विधिवाक्य प्रवृत्ति-जनक हो सकता है, क्योंकि, बाद में किसी कारण से पुरुष की प्रवृत्ति कुण्ठित होने पर भी विधिवाक्य के सुनने पर प्रथम प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । ऐसी स्थिति में अर्थवादों को प्रमाद से पठित मानने पर भी कार्य चल सकता है, क्योंकि पूर्वोक्त रीति से अर्थवाद वाक्यों के प्रति अनेक आपत्तियाँ उत्थापित हो सकती हैं । इसी आशङ्का के उत्तर में कहा गया है-"तुल्यं तु साम्प्रदायिकम्" । साम्प्रदायिक अर्थात् अनध्याय आदि नियमों का पालन करते हुए गुरु शिष्य क्रम में वेद का अध्ययन आ रहा है, अर्थवाद भी इसी रूप में अध्ययन का विषय है और अर्थवाद वाक्यों का वेदत्व भी सभी ने दृढ़तापूर्वक स्वीकार किया है । अतः, अर्थवाद वाक्य को प्रामादिक पाठ नहीं कहा जा सकता है । अनवधानतावश वेदाध्ययन के मध्य में अर्थवाद वाक्यों ने स्थान प्राप्त कर लिया है-यह नहीं कहा जा सकता है । इसलिए अर्थवाद प्रमादवश पठित होने से अप्रमाण है-यह नहीं कहा जा सकता है । तुल्य = समान या एक रूप । च शब्द का अर्थ हेतु है । साम्प्रदायिक=गुरु शिष्य परम्परा से प्राप्त अध्ययन । अर्थात् अर्थवाद वाक्य भी गुरु शिष्य परम्परा क्रम में विद्यात्मक वेद के अध्ययन के समान है । अथवा अर्थवाद भी विधि के समान ही वेद के ही अन्तर्गत होने से उनका अप्रामाण्य नहीं कहा जा सकता है ॥ ८ ॥ अप्राप्ता चानुपपत्तिः प्रयोगे हि विरोधः स्याच्छब्दार्थ- स्तवप्रयोगभूतस्तस्मादुपपद्येत ॥१.२.९॥ शा० भा०-अपि च यैषाऽनुपपत्तिरुक्ता शास्त्रदृष्टविरोधादित्येवमाद्या सा, सोऽरोदीदित्येवमादिषु न प्राप्नोति । कुतः ? प्रयोगे हि स्तेयादीनामुच्यमाने विरोधः स्यात् । शब्दार्थस्तवप्रयोगभूतः । तस्मादुपपद्यते-स्तेनं मनोऽनृतवादिनी वागिति ॥ ९ ॥ भा० वि०-एवं सूत्रद्वयेन स्वसिद्धान्तकथनेनानर्थक्यसूत्रोक्तदोषं निरस्योत्तर- सूत्रोक्तदोषान्तरपरिहारार्थमप्राप्ता चेत्यादिसूत्रम् । तत्र न केवलं स्तुत्यर्थत्वेनानर्थक्य-
९ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ९३ परिहार एव त्वदुक्तदोषान्तराप्राप्तिश्चेति च शब्दं व्याकुर्वन् प्रतिज्ञां व्याचष्टे— अपि चेति । यद्यपि पूर्वं स्तेयादिवाक्यमुदाहृत्य शास्त्रदृष्टविरोधो दर्शितः, तथापि सोऽरोदीदित्यादिष्वपि सो विशेषादनुसन्धेयः इति वक्तुमाह—सोऽरो- दीदिति । प्रश्नपूर्वकं प्रयोगे हीत्यादीत्यादिहेतुं व्याचष्टे—कुत इत्यादिना प्रयोगः अनुष्ठानः, कर्त्तव्यतेति यावत् । तस्मिन् हि प्रयोगे स्तेयादोनां रोदनवपोत्खनन- दिङ्मोहस्तेयानृतवदनादीनाम् उच्यमानेकल्प्यमाने शास्त्रदृष्टविरोधः स्यात् न चासौ कल्प्यत इत्यर्थः । ननु श्रुतस्यार्थस्य प्रयोजनवत्त्वाय विधिः कल्पनीय इत्याशङ्कयापाकरणार्थं शब्दार्थस्त्वप्रयोगभूत इतीदं व्याचष्टे शब्दार्थ इति । सूत्रे तुशब्दश्शङ्काव्यावर्त्तकः, वाच्यार्थविषयोऽर्थशब्दः तेषु सोऽरोदीदित्यादिषु प्रयुज्यतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या प्रयोजन-प्रयोगः, विवक्षितश्चार्थः प्रयोजनं भवतीति लक्षणया प्रयोगशब्देन विवक्षितत्वमुक्तम् प्रयोगमप्राप्तोऽप्रयोगभूतः अविवक्षित इत्यर्थः । एतदुक्तं भवति विवक्षितार्थस्य हि प्रयोगवत्त्वसिद्धयेऽध्याहारादिनानुष्ठान- कल्पना अयं तु न विवक्षितः, तेन कल्पकाभावान्नाध्याहारादिभिर्विधिकल्पनेति, यस्मान्न विधिकल्पना, तस्मान्न शास्त्रदृष्टविरोधादीत्युपसंहारभागं व्याचष्टे— तस्मादिति । स्तेयादिवाक्यं रोदनादिवाक्यस्याप्युपलक्षणं गुणवादस्त्वित्यनेन त्रयोऽर्थाः सूचिताः । तत्र प्रथमं तावच्छब्दार्थस्त्वप्रयोगभूत इत्यन्तेन विवक्षयार्थभावना- नुपयोग उक्ते कथं नामोपयोगः इत्यपेक्षायां गुणस्य वाद इति षष्ठीसमासाश्रयणेन स्तुत्यर्थत्वं सिद्धान्तसूत्रोक्तं पूर्वसूत्रनैराकाङ्क्ष्यात्यनेन स्मारितम्, तत्रापि स्वार्था- सत्यत्वे कथं स्तुतिरित्त्यपेक्षायां गुणाद्वाद इति पञ्चमीसमासाश्रयणेन स्वार्थं- सत्यत्वानादरोऽप्यनेनाभिधीयते, तथा भवतु स्तुत्यर्थत्वम्, तथापि कथं क्वचित् विधेयस्तुतिपरत्वम् अविधेयगतायाः स्तुतेः भिन्नविषयत्वादित्यपेक्षायां गौण्या- वृत्त्याप्यनेनोच्यते ॥ ९ ॥ त० वा०—उक्तदोषपरिहारोऽतः परम् । शास्त्रदृष्टविरोधिका याऽत्रानुपपत्ति- र्विधिकल्पनायामुक्ता तामस्मत्पक्षमप्राप्तां मन्यामहे । अथवेदं स्तुतिव्याख्यानं तामनुपपत्तिमप्राप्तमिति व्याख्येयं येषां ह्रस्वः पाठः । प्रयोगे ह्यनुष्ठाने रोदनवपोत्खननदिङ्मोहस्तेयानृतवादादीनां कल्प्यमाने विरोधः स्यात् । अस्माकं तु पुनर्य एषां शब्दानां श्रोतोऽर्थः, स नैव विवक्षितः । न चाध्याहारादिभिर्विधिः, किं तर्हि ? स्तुतिमात्रं विवक्षितः । न च तद्विरुध्यते । तस्मादुपपद्येत ।
९४ मीमांसादर्शनम् [ सू० अथ वा शब्दार्थस्त्विति विधायकशब्दानुग्रहार्थः सन्नयमर्थवादो न स्वार्था- नुष्ठानेन सम्बध्यते, प्रयोगमप्राप्तोऽप्रयोगभूतस्तस्मादुपपद्येत । त्रयोऽत्र पाठाः । अप्राप्तां चानुपपत्तिमित्यत्र मन्यामह इति वाक्यशेषः, अप्राप्तं चानुपपत्तिमित्यपरः, तत्रास्मद्व्याख्यानमित्यध्याहारः । अप्राप्ता चानुपपत्तिरित्यपरः तत्रास्मत्पक्षे विज्ञायेति ॥ ९ ॥ न्या० सू०-सूत्रद्वयेनैव सिद्धान्तसिद्धेरुत्तरसूत्रानर्थक्यमाशङ्क्य पूर्वपक्षनिराकरण- परतया सामान्यतो व्याचष्टे— उक्तेति । अप्राप्तामनुपपत्तिमिति द्वितीयान्तं पदद्वयं साकाङ्क्षत्वादध्याहारेण व्याचष्टे-शास्त्रेति । ह्रस्वपाठे अन्यथाध्याहारमाह-अथ वेति । प्रयोगे हीति सूत्रावयवव्याख्याभाष्ये स्तेयादीनामित्यादिशब्देन पूर्वोपन्यस्तस्य रोदनादेरपि ग्रहणमिति व्याचष्टे-प्रयोगे हीति । सूत्रशेषं व्याचष्टे—अस्माकं पुनरिति । श्रौतार्थाभिप्रायोऽर्थशब्दः प्रयुज्यतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या प्रयोजनवचनः प्रयोगशब्दः अविवक्षितस्वार्थः प्रयोजनं न भवतीत्यप्रयोगशब्देना- विवक्षितत्वमुक्तम् । नन्वनुष्ठानविवक्षायां विरोधापत्तेस्तत्परिहारार्थं तस्यैवाविवक्षा वाच्या । न श्रौतार्थाविवक्षात आह—न चेति । अतः शब्दार्थे चशब्दः, निपातानामनेकार्थत्वात् । विवक्षितत्वे हि श्रौतस्यार्थस्य प्रयोजनवत्त्वसिद्धयेऽध्याहारादिनानुष्ठानकल्पना स्यात्; यतःस्वसौ न विवक्षितः अतः कल्पकामावान्नाध्याहारादिभिर्विधिकल्पनेत्यर्थः । अनेन चानुष्ठानाविवक्षार्थं श्रौतार्थाविवक्षेत्युक्तम् । किं तर्हि विवक्षितमित्यपेक्षायामुत्तरसूत्रे वक्ष्य- माणं स्तुत्यर्थत्वमाकाङ्क्षानिवृत्तयेऽभिहितम् । ननु स्तुतेरपि श्रौतार्थकत्प्यत्वादविवक्षितस्य चासत्यत्वेन कल्पकत्वायोगात्तद्विवक्षा- पत्तेरपरिहार्यो विरोधोऽत आह--न चेति । असत्येनापि स्तुत्येनापि स्तुत्युपपत्तेर्वक्ष्य- माणत्वान्नास्मत्पक्षे श्रौतार्थविवक्षापत्तिरिति भावः । स्तुत्यर्थत्वमेव वाशब्दार्थस्त्वित्यनेनो- च्यत इत्यन्यथा व्याचष्टे--अथ वेति । तदानुष्ठानवचन एव प्रयोगशब्दः प्राप्तशब्दार्थे च भूतशब्द इति, न स्वार्थानुष्ठानेनेत्यादिनोक्तम् । ननु भाष्यकारेणाप्राप्ता चाऽऽनुपपत्तिरिति प्रथमान्तमेव पदद्वयं पठितम्, कथं भवतान्यदेव पाठद्वयं व्याख्यातमत आह-त्रयोऽत्रेति । पाठत्रयविवेकार्थं पूर्वोक्तवाक्यशेषस्मरणायोत्तरो ग्रन्थः ॥ ९ ॥ भा० प्र०-अर्थवाद वाक्य प्रमादपठित अर्थात् वेद से बहिर्भूत नहीं है—इसका युक्तिपूर्वक विवेचन कर पूर्वपक्षियों के द्वारा उत्थापित विरोध का परिहार प्रदर्शित किया जा रहा है । पूर्वपक्षी ने "शास्त्रदृष्टविरोधाच्च" इस सूत्र से जिस दोष का आपादन किया है—वह ठीक नहीं है । कारण, अर्थवाद का स्वार्थ में तात्पर्य नहीं है । "सोऽरोदीत्" "प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्", "दिशो न प्राजानन्", "स्तेनं मनः, अनृतवादिनी वाक्", इत्यादि अर्थवाद वाक्य यदि स्वार्थबोधित क्रिया को कर्तव्य के रूप में सूचित
१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ९५ करते तब इन अर्थवादों से रोदन, अपनी वपा का छेदन, दिङ्मोह, स्तेय या मिथ्या- वादन आदि कर्तव्य के रूप में बोधित होते । तभी पूर्वपक्षी के द्वारा कथित दोष सङ्गत होता और शास्त्रदृष्टविरोध का कथन सङ्गत होता । किन्तु रोदन आदि अर्थवाद के शब्दों का अर्थ मात्र होता है । इस प्रकार अर्थवाद के अर्थ अविवक्षित हैं, क्योंकि, अर्थवाद स्वार्थ में तात्पर्य रहित है । इसलिए, जिस रूप में अर्थवाद वाक्यों की सप्रयोजनता का निर्देश पूर्वक प्रामाण्य का स्थापन किया है—वह सर्वथा युक्तियुक्त ही है । अर्थवाद वाक्यों का तात्पर्य-निरूपण किया जा रहा है । 'अप्राप्ता'=प्राप्त नहीं, 'च' और, "अनुपत्ति" शास्त्रदृष्टविरोधरूप युक्तिहीनता, "प्रयोगे" क्रिया का विधायक होने पर, "शब्दार्थः" शब्द का स्वार्थ, 'तु' किन्तु, 'अप्रयोगाभूत'' क्रिया का विधायक नहीं है, "तस्मात्" इसलिए, "उपपद्यते" युक्तियुक्त होता है । अर्थवाद वाक्यों का जिस रूप में अर्थ का निर्देश किया गया है, उससे मेरे पक्ष में किसी प्रकार युक्ति का विरोध सिद्ध नहीं हो रहा है । क्योंकि, अर्थवाद यदि अपने अर्थभूत क्रिया का प्रतिपादक होता, तब विरोध होता, किन्तु, अर्थवाद स्वार्थ- बोधित क्रिया का प्रतिपादक नहीं है, अतः, जिस रूप में उनकी सप्रयोजनता से प्रामाण्य का निर्देश किया गया है, वह उपपन्न होता है ॥ ९ ॥ गुणवादस्तु ॥१.२.१०॥ शा० भा०--यदुक्तं विधेयस्य प्ररोचनार्था स्तुतिरिति । तदिह कथमवकल्प्येत यत्रान्यद्विधेयमन्यच्च स्तूयते । यथा वेतसशाखायाऽवकाभिश्चाग्निं विकर्षतीति वेतसावके विधीयेते । आपश्च स्तूयन्ते-आपो वै शान्ता इति । तदुच्यते । गुणवादस्तु । गौण एष वादो भवति, यत्संबन्धिनि स्तोतव्ये संबन्ध्वन्तरं स्तूयते । अभिजनो ह्येष वेतसावकयोः । ततस्ते जाते । अभिजनसंस्तवेन चाभिजातः स्तुतो भवति । यथाऽश्मकाभिजनो देवदत्तोऽश्मकेषु स्तूयमानेषु स्तुतमात्मानं मन्यते । एवमत्रापि द्रष्टव्यम् । अथ सोऽरोदीदिति कस्य विधेः शेषः । तस्माद् बर्हिषि रजतं न देयमित्यस्य । कुतः। साकाङ्क्षत्वात्पदानाम् । सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमित्यत्र स इति प्रकृतापेक्षः । तत्प्रत्ययात् । तस्य यदश्रुवशार्यंतेति तस्येति पूर्वप्रकृतापेक्ष एव । उपपत्तिश्चोपरितनस्य, यो बर्हिषि रजतं दद्यात्पुराऽस्य संवत्सराद् गृहे रोदनं भवतीति । अस्य हेतुत्वेनायं प्रतिनिर्दिश्यते- 'तस्माद्बर्हिषि रजतं न देयमिति' । एवं सर्वाणि साकाङ्क्षाणि कथं विधेरुपकुर्वन्तीति ? गुणवादेन । रोदनप्रभवं रजतं वर्हिषि ददतो रोदनमापद्यते । तत्प्रतिषेधस्य गुणो यदरोदनमिति । कथं पुनरुदत्यरोदीदिति भवति, कथं वाऽनश्रुप्रभवे रजतेऽश्रुप्रभवमिति वचनम्,
९६ मीमांसादर्शनम् [ सू० पुराऽस्य संवत्सरादसति रोदने कथं रोदनं भवतीति ? तदुच्यते । गुणवादस्तु । गौणा एते शब्दाः । रुद्र इति रोदननिमित्तस्य शब्दस्य दर्शनाद्यदरोदीदित्युच्यते । वर्णसारूप्यान्निन्दन्नश्रुप्रभवमप्यश्रुप्रभवमित्याह । निन्दन्नेव च धनत्यागे दुःख- दर्शनात्पुराऽस्य संवत्सराद् गृहे रोदनं भवतीत्याह । तथा यः प्रजाकामः पशुकामो वा स्यात्स एतं प्राजापत्यं तूपरमालभेत इत्याकाङ्क्षितत्वादस्य विधेः शेषोऽयं स आत्मनो वपामुदक्खिददिति । कथं गुणवादः । इत्थं नाम, नाऽसम्पशवो यदात्मनो वपामुदक्खिददिति । एतच्च कर्मणः सामर्थ्यं यदग्नौ प्रहृतमात्रायां वपायामजस्तूपर उदगात्, इत्थं बहवः पशवो भवन्तीति । कथं पुनरनुत्खिन्नायां वपायां प्रजापतिरात्मनो वपामुदक्खिद- दित्याह । उच्यते । असद् वृत्तान्तान्वाख्यानं स्तुत्यर्थेन प्रशंसाया गम्यमानत्वात् । इहान्वाख्याने वर्तमाने द्वयं निष्पद्यते-यच्च वृत्तान्तज्ञानम्, यच्च कस्मिंश्चित्प्ररो- चना द्वेषो वा । तत्र वृत्तान्तान्वाख्यानं न प्रवर्तकं न निवर्तकं चेति प्रयोजना- भावादनर्थकमित्यविवक्षितम् । प्ररोचनया तु प्रवर्तते द्वेषाच्चिन्निवर्तत इति तयो- विवक्षा । वृत्तान्तान्वाख्यानेऽपि विधीयमाने आदिमत्तादोषो वेदस्य प्रसज्येत । कथं पुनरिदं निरालम्बनमन्वाख्यायत इति । उच्यते । नित्यः कश्चिदर्थः प्रजापतिः स्याद् वायुराकाश आदित्यो वा स आत्मनो वपामुदक्खिददिति-वृष्टिं, वायुं, रश्मिं वा । तामग्नौ प्रागृह्लात्, वैद्युते आर्बसे लौकिके वा । ततोऽज इत्यन्नम्, बीजम्, विरुद् वा । तमालभ्य-तमुपयुज्य प्रजाः पशून्प्राप्नोतीति गौणाः शब्दाः । आदित्यः प्रायणीयश्चरुरादित्य उदयनीयश्चरुरित्यस्य विधेः शेषो, देवा वै देवयजनमध्यवसाय दिशो न प्राजानन्नित्याकाङ्क्षितत्वात् । सर्वव्यामोहानाभा- दित्यश्चरुर्नाज्ञायिता अपि दिङ्मोहस्येति स्तुतिः । कथमसति दिङ्मोहे दिङ्मोह- शब्द इति । उच्यते । अप्राकृतस्य बहोः कर्मसमूहस्योपस्थितत्वाद गौणो मोह- शब्दोऽग्रधारणावकाशदानादिभिर्ज्ञापयतीति गौणता ॥ १० ॥ भा० वि०-तत्र भाष्यकारः-एषामर्थानां पूर्वसूत्रसङ्गतिं क्रमं चानाहत्यानन्त- रोक्तेऽर्थे सूत्रं व्याख्यातुं वृत्तानुवादपूर्वकं शङ्कामाह-यदुक्तमिति । सिद्धान्तसूत्र इति शेषः इहेत्युक्तं विषयं दर्शयति-यत्रेति । ननु कुत्रैवं भिन्नविषयत्वं विधिस्तुत्यो- रत आह-यथेति । सूत्रमुत्तरत्वेनावतारयति-तदुच्यत इति । गुणाद्वाद इति । पञ्चमीसमासं दर्शयन्व्याचष्टे-गौण इति । एष वाव इत्येतद्विवृणोति-यदिरिति सम्बन्धिनि वेतसावकारूपे विकारे स्तोतव्ये सम्बन्धन्तरमब्रूया प्रकृतिः स्तूयते यदेषः स्तुतिवादी गौण औपचारिक इत्यर्थः, प्रकृतिविकारभावमुपपादयति- अभिजन इति । अभिजायतेऽस्मादिति व्युत्पत्त्योत्पत्तिस्थानम् अभिजनः एष
सूत्रं योजयितुं पृच्छति—अथेति । यद्यविवक्षितस्वार्थाः सोरोदीदित्येवमादयो
१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ९७ अनासक्तोऽर्थः तत्र हेतुस्ततः इति जायते दृश्यते यत इति शेषः । ततः किम् ? अत आह—अभिजनेति । एतदेव दृष्टान्तेनोपपादयति—यथेति । काश्मीरशब्दो जनपदविशेषवाची, एवमिति । वेतसशाखया वकाभिश्चाग्निं विकर्षति, आपो वै शान्ताः, शान्ताभिरेवास्य शुचं शमयति इति श्रूयते । तदा वेतसावकयोः विधेयत्वेन स्तुत्यङ्गत्त्वम् तदर्थैवापां स्तुतिरिति निश्चयाच्छान्ताभिरिति सहयोग- तृतीयाश्रयेणाद्भिः सहचरितो वेतसावकारूपो विकारः प्रकृतिगुणेन शान्तत्वा- दस्य यजमानस्य शुचं दुःखं शमयतीति वेतसावकयोरेवानेन स्तुतिरित्यर्थः, एवमन्तिमेऽर्थे सूत्रं योजयित्वा आदिममध्यमयोरप्यर्थयोः सोऽरोदीदित्युदाहरणे सूत्रं योजयितुं पृच्छति—अथेति । यद्यविवक्षितस्वार्थाः सोरोदीदित्येवमादयो नार्थभावनाङ्गम्, ततो अर्थवादा वक्तव्याः, न च विध्येकवाक्यत्वं विनार्थवादत्व- मिति वाच्यो विधिशेषाभाव इत्यर्थः । यज्ञकर्मणि रजतदाननिषेधशेषत्वेन निन्दार्थवादत्वं समर्थयन्नाह—तस्मादिति । शेषशेषिभावे प्रमाणं पृच्छति— कुत इति । उत्तरमाह—साकाङ्क्ष्यत्वादिति । अवान्तरपदवर्गाभिप्रायः पदशब्दः बहुवचनेन तेषां प्रत्येकं साकाङ्क्षत्वमुक्तम् अन्यथा हि पुरास्य संवत्सराद् गृहे रोदनं भवतीत्येतावत्तैव निषेधसिद्धेरितरानर्थक्यात् प्रत्येकं साकाङ्क्षत्वमुप- पादयति—सोऽरोदीदित्यादिना । देवासुरा संयत्ता आसन्, ते देवा विजयमुप- यन्तो नौवामं वसु न्यदधत, इदमुनो भविष्यति, यदि नो जेष्यन्तीति, तदग्निरभ्य- कामयत, तेनापाक्रामत्, तद्देवा विजित्याववरुत्समाना अन्वायन् तदस्य सहसा दित्सन्तेत्यत्र प्रकृतो योऽग्निः, तदपेक्ष इत्यर्थः कुतः ? तत्प्रत्ययादिति । स इत्युक्ते तस्य प्रकृतस्य प्रत्ययात् प्रतीयमानत्वादित्यर्थः । यद्वा स इत्यस्य सर्वनामस्थपाठात् कथं प्रकृतापेक्षत्वमित्याशङ्क्याह— तत्प्रत्ययादिति । सर्वनामतच्छब्दादेशेन स इत्यनेन स्थानिनस्तच्छब्दस्य प्रत्ययादित्यर्थः । ततश्च देवासुरादिवाक्येन सहरोदनवाक्यस्यैकवाक्यत्वं सिद्ध- मिति भावः—तस्येति । तथोत्तरस्मिन् अपि वाक्ये तस्य प्रकृतस्य रुदतो रुद्र- स्याग्नेः यदश्रु पतितम् तद्रजतमभवदित्यत्र तस्येतिशब्दः प्रकृतापेक्षः, ततश्च तस्यापि पूर्वेणैकवाक्यतेति भावः, सर्वस्यास्य सन्दर्भस्य निन्दावाक्येनैकवाक्यत्व- माह—उपपत्तिश्चेति । उपरितनस्थेयमुक्तेति शेषः । च शब्दो हेतौ यस्मादिय- मुपपत्तिः, तस्मादुपपादकस्योपपाद्येनैकवाक्यता युक्तेत्यर्थः कोऽसावुपारितनो ग्रन्थः यमाह—यो बर्हिषीति । ननु रजतस्याश्रुकार्यत्वेऽपि रोदनोत्पादकत्वे कारणाभावात् कथमियमुप- पत्तिरत्त आह—हेतुत्वेनेति । अयमिति रोदनप्रभवत्वरूपोऽर्थः । कारणानुरूप- त्वात् कार्याणाम्, रजतस्य च रोदनमृकाश्रुप्रभवत्वात् तद्दानाद्रोदनोत्पत्तिरिति ७
९८ मीमांसादर्शनम् [ सू० हेतुत्वेन निर्देशादुपपत्तिरेवेयमित्यर्थः । सोपपत्तिकस्य निन्दावाक्यस्य निषेध- वाक्यैकवाक्यत्वम् दर्शयितुम् पुनर्निषेधवाक्यं पठति—तस्मादिति । तच्छब्दस्यो- पपत्तिकनिन्दापरामर्शकः सापेक्षत्वेनैकवाक्यत्वं निगमयति—एवमिति । ततश्च विध्येकवाक्यत्वादर्थवादत्वोपपत्तिरिति भावः । साकाङ्क्षत्वमङ्गीकृत्योपकारा- भावेन विध्येकवाक्यत्वमाक्षिपति—कथमिति । यद्यपि निन्दानिषेधयोरेवेह साकाङ्क्षत्वेनोपकारकत्वेन चैकवाक्यत्वं व्युत्पाद्यते, तथापि सर्वोदाहरणाना- मेकवाक्यत्वसाधारणोऽयं ग्रन्थ इति सूचयितुमुपलक्षणार्थं विधिग्रहणम् । आदिमेऽर्थे सूत्रं योजयन्नुत्तरमाह—गृहेति । हि शब्दः प्रसिद्धौ प्रसिद्धं हि बहुक्षीरादिवाक्यस्य गुणवादेन विधिशेषत्वम्, तद्वदत्रापि रोदनोत्पादकगुणवादेन निन्दाया निषेधशेषत्वमित्यर्थः । निन्दामेवोपपादयति—रोदनेति । दोषसङ्कीर्त्त- नात्मकत्वान्निन्दायाः गुणशब्दानुपपत्तिमाशङ्क्याह—तदिति । निवृत्तिफले हि निषेधे निन्दार्थमुच्यमाना दोषा गुणा एव निवृत्त्युपयोगित्वादित्याशयः । निरालम्बननिन्दानुपपत्त्या निषेधशेषत्वमाक्षिपति—कथं पुनरिति । न खल्वग्नि- ररोदीदित्यत्रेदमेव वाक्यं प्रमाणम्, अस्य निषेधशेषत्वाभ्युपगमात्, प्रमाणा- न्तराभावात् च रोदनमकुर्वति तस्मिन् कथम् रोदीति शब्दः रोदनकर्तृत्त्ववाची शब्द इत्यर्थः । तस्य यदश्रु तद्रजतमित्यस्यापि निरालम्बनत्वादाह—कथं देति । एवमुपपादकवाक्यस्य निरालम्बनत्वमुक्त्वोपपाद्यास्यापि तदाह—पुरेति । मध्यमेऽर्थे सूत्रं योजयन्नुत्तरमाह--तदुच्यत इति । गुणाद्वादो गुणवाद इति व्याचष्टे--गौण इति । एष अरोदीदित्यादिः तत्रारोदीदित्यस्य तावदालम्बन- माह—रुद्र इति । रोदनं निमित्तं यस्येति विग्रहः, रुद्रशब्दस्तावदग्नौ प्रसिद्धः-- "त्वमग्ने रुद्रो असुरो महोदिवः, रुद्रो वा एष, यदग्निः ।" इति मन्त्रब्राह्मणयोः प्रयोगदर्शनात्, तत्र च रोदिते रोदनार्थत्वाद्वप्रत्ययस्य च कर्त्रर्थत्वात् रोदनकर्तृवाची रुद्रशब्दोऽगम्यते । तस्मात् सिंहगुण इव देवदत्तः सिंहशब्देन रुद्रशब्देनाग्निर्विषयीक्रियमाणोऽरोदीदित्युच्यत इत्यर्थः, अश्रुप्रभव- वचनस्यालम्बनमाह वर्णति । वर्णसारूप्याच्छुक्लत्वादिलक्षणादश्रुप्रभवमित्याह । प्रकृतिविकारयोरेव प्रायस्सारूप्यदर्शनात्, इह च सारूप्यादुत्प्रेक्षया प्रकृति- विकारभावमाहेत्यर्थः । किमर्थं निन्दन्निन्दाहेतोः निन्दार्थमिति यावत्, पुरास्येत्यस्यापि सालम्बन- माह—निन्दन्निति । लोके हि धनत्यागनिमित्तमत्यन्तोदारस्यापि गृहजनः पीड्यते, तेन धनत्यागसामान्याद्रोदनोपन्यासो गौणः न मुख्यः । निन्दार्थत्वेन च मुख्यार्थाभावो न दोष इत्यर्थः ।
१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ९९ वपोत्खननवाक्येऽपि द्वेधा सूत्रं योजयितुं विध्येकवाक्यत्वं तावदाह-तथेति । रोदनवाक्यस्य निषेधशेषत्वदृष्टान्तार्थस्तथाशब्दः 'स आत्मन' इत्यादि तूपरमा- लभेतेत्यस्य विधेश्शेषः तेनाकाङ्क्षितत्वादिति योजना । ननु कथमस्य विध्यपेक्षितार्थविषयत्वम्, येन तदाकङ्क्षितत्वं स्यादिति चोदयति—कथमिति । सूत्रेणोत्तरमाह—इत्थं नामेति । विशिष्टफलत्वादिदं कर्म. स्वावयवोत्कर्तनेनापि कृतम्, तत्कर्तव्यं धनसामादिनेति किमु वक्तव्यमित्यर्थः । तामग्नौ प्रागृह्णादिति वाक्योक्तं गुणान्तरमाह—एतच्चेति । एतत् एतादृशं प्रहृतमात्रायां प्रक्षिप्तमात्रायां ······· 'प्रभूतपश्वादिफलत्वमनेनोक्तमिति हृदयम् । इदानीमस्मिन्नुदाहरणेऽन्यथा सूत्रं व्याख्यातुं निरालम्बनस्तुत्यनुपपत्तिं शङ्कते--कथमिति । पूर्ववत्प्रमाणाभावादनुत्खिन्नायामित्यर्थः, उपलक्षणञ्चैतत् उत्तरवाक्यानामपि निरालम्बनत्वेन क·······वक्तवाभावस्य यथा सोऽरोदी- दित्यादीनां गौणोऽर्थ आलम्बनम्, नैव प्रजापतिवपाखननादिवाक्यानां लभ्यते, तेनार्थान्यत्वात् स्तुतिलक्षणया प्ररोचनानुपपत्तिरित्यभिसन्धिः । किमिदमसत्तार्थेन स्तुत्यसंभवचोद्यम् ? किंवा निरालम्बनान्वाख्यानानुपपत्ति- चोद्यम् ? तत्राद्यं परिहरति--असद्दिति । स्तुत्यर्थेनोपयुज्यत इति शेषः । कुत इत्यत आह—प्रशंसेति । यद्यर्थवादावगतस्यार्थस्य प्ररोचनहेतुत्वं ततोऽर्थाभावेन प्राशस्त्यलक्षणाभावात् सा न स्यात् शब्द एव त्ववान्तरव्यापारीकृतार्थ- प्रत्ययः प्ररोचयति, ततश्च विनाप्यर्थं तत्प्रत्ययेनैव प्राशस्त्यावगमात् प्ररोचना- सिद्धिरित्यभिसंहितम् । ननु प्राशस्त्यवदर्थवादस्यापि गम्यमानत्वात् कथमभावः तत्राह-इह त्विति । अर्थवादमात्रोक्तिः प्ररोचनेति वृत्तान्तज्ञानजनितप्राशस्त्याप्राशस्त्यज्ञानाभ्यां प्ररोचनाद्वेषावित्यर्थः । ततः किम् ? अत आह--तत्रेति । अविवक्षितं वृत्तान्त- रूपेऽर्थे इति शेषः, नैतद् वृत्तान्तपरमिति यावत्, प्रवृत्त्यादिप्रयोजनत्वात्, प्ररोच- नादिपरत्वं तु न युक्तमित्याह--वृत्तान्तेति । अन्वाख्यापन इति अन्वाख्यानम् । वृत्तान्तरूपेऽन्वाख्याने विधीयमाने=तात्पर्येण प्रतिपाद्यमाने वेदस्यादिमत्तादोषः आदिमतोऽर्थस्य प्रतिपादनादित्यर्थः, अतश्चाविवक्षितवैवार्थं तज्ज्ञानादेव प्राशस्त्यसिद्धेः प्ररोचनासिद्धिरिति समुदायार्थः । नन्वस्त्वर्थज्ञानमात्रस्य स्तुत्युपयोगित्वम्, निरालम्बनं तु ज्ञानमन्वाख्यानं वा न संभवतीति द्वितीयं शङ्कते--कथमिति । इदमन्वाख्यानमन्वाख्यायते क्रियत इत्यर्थः । निरालम्बनत्वमात्रमेवमपि कथञ्चित् परिहर्तुं शक्यमित्युत्तर- माह—नित्य इत्यादिना । "प्रजापतिर्वा इदमेक आसीत्" इत्यादौ प्रजापतिशब्दः प्रजा पातीति व्युत्पत्त्या विकल्पेन वाय्वादिवचन इत्यर्थः, स आत्मन इत्यत्र
१०० मीमांसादर्शनम् [ सू० वपाशब्दस्यालम्बनमाह—स इत्यादिना । वायोः प्रजापतेर्वृष्टिवर्पामध्यवर्ती सारविषयत्वाद्वपाशब्दस्य वायुमध्यवर्तित्वात् तद्धेतुकत्वाच्च वृष्टेः तथाकाशस्य वायुर्वपा । अवकाशाभावे वायोरप्रवृत्तेस्तन्मध्यवर्तित्वाद्वयुरहितस्यापवरका- काशस्यो दुःखोत्पादकत्वेन तत्सारत्वाच्च । तथादित्यस्य रश्मिर्वपा रश्मेरा- दित्यावयवत्वेन तन्मध्यवर्तित्वाद्राश्म्यायत्तत्वेन प्रकाशस्य सारत्वाच्चेत्यर्थः । तामग्नावित्यस्यालम्बनमाह-तामग्नावित्यादिना । तत्रापि यथाक्रमं विद्युदग्नौ वृष्टेर्वपायाः प्रक्षेपकल्पना तस्याविन्धनत्वप्रसिद्धेः, आर्बीसे शारीरे जाठरे अग्नी वायोर्निक्षेपकल्पना आन्तरत्वसामान्यात्, लौकिके अग्नौ रश्मेर्वपाया निक्षेप- कल्पना, आदित्यो वा अस्तं यदग्निमप्रविशतीति श्रुतेः स्वरूपेण चादित्यस्य स्वर्गस्थस्य भूमिष्ठाग्निप्रवेशासंभवात्, रश्मिद्वारा तत्प्रवेशोपपत्तेश्चेत्यर्थः । ततोऽ- जस्तूपर इत्यस्यालम्बनमाह—तत इति । अजत्वमन्नादीनां सामान्याकारेण द्रष्टव्यम्, तत्र व्रीह्यादिरूपस्यान्नस्य विद्युद्वृष्टिसंयोगाज्जन्यऊष्मणोदकेन च विना तज्जन्यादर्शनादूष्मणश्च तेजो गुणत्वात् विद्युतश्च तेजस्त्वादुपचारा- त्तज्जन्याभिधानम्, वायुजाठराग्निसंयोगाच्चरमधातुरूपस्य बीजस्य जन्यजाठ- राग्निपाचितस्यान्नरसस्य व्यानाख्येन वायुना विण्मूत्रादिभ्यो विविक्तीकृतस्य चरमधातुरूपेण परिणामात् बीजकारणत्वं जाठरादेः रश्मिलौकिकाग्निसम्बन्धा- द्वीरुधन्म उष्मजन्यत्वेन व्रीह्यादिवत् भौमाग्निजन्यत्वात्, निदाघकालजन्यत्वेन च वीरुधां रश्मिजन्यत्वावगमादित्यर्थः । निगमयति—इत्येधमिति । शब्दाः प्रजापतिशब्दप्रभृतयः, तं स्वायै देवताया आलभेत, ततो वै स प्रजाः पशूनसृजतेत्यस्यालम्बनमाह-तन्निति । आलभ्येत्यस्य व्याख्यानमुपयुज्येति प्राप्येत्यर्थः । असृजतेत्यस्यालम्बनमुक्तम् । प्राप्नुवन्तीति सर्वप्रजानां व्रीह्यादिपरिणामप्रभवत्वादन्नस्य तद्धेतुत्वं बीजादेस्तु स्पष्टमेव प्रजादि- कारणत्वं तेनालभेतेत्यादयोऽपि शब्दा गौणा एवेत्यर्थः । दिङ्मोहोदाहरणेऽपि सूत्रं योजयितुं विधिशेषत्वं तावदाह—आदित्य इति । कर्मसु कौशलेन दीव्यन्तीति देवा=ऋत्विजः, देवयजनं=यज्ञभूमिः । भवतु विधि- शेषत्वम्, तथापि कथं स्तुतिरित्याशङ्क्य गुणवादादित्याह—सर्वेति । प्रमाणान्त- रानिवर्त्योऽपि हि दिङ्मोह आदित्यचरुणा निवर्त्यते, किमुतान्ये व्यामोहा इति व्यामोहनिर्वर्तकत्वेन स्तुतिरित्यर्थः, निरालम्बनस्य दिङ्मोहपदस्य कथं स्ताव- कत्वमित्याह—कथमिति । सूत्रेणोत्तरमाह-अप्राकृतस्येति । प्रकृतावनभ्यस्तस्या- नेकस्य कर्मराशेर्बुद्धौ सन्निहितत्वात् कथमेनमविदितं करिष्याम इत्याकुलोभाव- सम्भवेन लौकिका इव कर्तव्यतामूढाः ऋत्विजोऽप्याकुलत्वसामान्यात् गौण्यावृत्त्या दिङ्मूढा इत्युच्यन्त इत्यर्थः ।
१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १०१ नन्वेवं ‘दिशो न प्राजानन्’ इति दिङ्मोहाभिधानस्य सालम्बनत्वेऽपि पथ्यां स्वस्तिमयजन् प्राचीमेव दिशं प्राजानन्, अग्निना दक्षिणा, सोमेन प्रतीचीम्, सवित्रोदीचीम्, दित्योर्ध्वमिति दितेर्दिग्भेदज्ञापकत्वोक्तेः किमालम्बनमत आह— अवधारणेति । अवधारणार्थमवकाशदानमवधारणावकाशदानम्, आदिशब्देन तत्फलप्रणिधानविचारावुक्तौ, प्रायणीयायां हि दर्शपूर्णमासविकृतौ प्रायः प्राकृतान्यभ्यस्तान्येव कर्माण्येव क्रियन्ते, ततश्च तत्समय एव भविष्यत्स्व- नभ्यस्तेषु कर्मस्ववधारणार्थं प्रणिधानादिसम्भवात् प्रायणीयायां चादित्यः प्रायणीय इत्यादित्यचरुविधानाददितिः ज्ञापयतीति गौण औपचारिक एष- वाद इत्यर्थः ॥ १० ॥ त० वा०—यत्र तावद्विधिस्तुत्योरेकविषयता तत्रोपपद्यतां नाम सम्बन्धः, विषयनानात्वे तु कथमिति ? गुणादित्याह । यत्क्रियायाः संबन्धिनि स्तोतव्ये, तत्संबन्ध्यन्तरं स्तूयते । अथ वा यद्विकारे प्रकृतिसंबन्धिनि विधानार्थं स्तोतव्ये, तत्संबन्ध्यन्तरं प्रकृतिः स्तूयते । तत्र तद्द्वारेणापि लोके वेदे च स्तुतिसिद्धेः प्रकारान्तरता । तस्माददोषः । एतस्यास्तु स्तुतेरर्थमुपरिष्टाद्वक्ष्यति शान्ताभिरद्भिः संबद्धो विकारः शान्तिहेतुर्भवन्द्यजमानस्य कष्टं शमयतीति । गुणवादसूत्रेण शुद्धेनैव तावद्रोदनाद्युदाहरणत्रयपरिहारः । शेषसूत्राण्यप्ये- तदुक्तोपपादनार्थतया संभन्त्स्यन्ते । तत्रोदाहृतानां गौणतानिमित्तं किंचिदिहैव वक्ष्यते, परं तु तत्सिद्धिसूत्रे । सोऽरोदीदिति साकाङ्क्षत्वेनैकवाक्यता विधिस्तु- त्योः प्रत्यवयवं कथ्यते । स इति प्रकृतापेक्षः । कुतः ? तत्प्रत्ययात् । तद्धि प्रकृतं प्रतीयते । अथ वा तच्छब्दस्य प्रकृतग्राहित्वं प्रसिद्धम् । स इत्युक्ते तच्छब्दप्रत्ययात्स एवार्थः । एवं तस्य यदश्रु, तद्रजतमिति संबन्धः । सर्वा नेयमुपरितनस्य निन्दा- ग्रन्थस्योपपत्तिरिति तदनन्तरं तदभिधानमुपपद्यते । कोऽसौ ग्रन्थः ? तं दर्शयते । यो बर्हिषि रजतं दद्यात्पुराऽस्य संवत्सराद् गृहे रोदनं भवेदिति । केन हेतुना तदेवं भवतीति ? तदुपपाद्यते, कारणानुरूपत्वात्कार्यस्य, रोदनप्रभवरजतदाना- द्रोदनोत्पत्तिस्तस्मान्न देयमिति सकलमदानस्योपपत्तिरिति । निन्दया तच्छेषत्व- मर्थवत् । गुणवादस्तु शब्दालम्बनं रुद्रशब्दोत्थापितविज्ञानवशेन रोदनसामा- न्यतोऽदृष्टकल्पना । अश्रुुणश्च शौक्ल्याद्यदि नामैतत्कठिनं भवेत्ततो रजतसदृशं भवेदित्युत्प्रेक्ष्य तत्प्रभवनिन्दा । धनत्यागेनात्यन्तोदारस्यापि गृहजनः पीड्यत इति तत्सामान्याद्वा रोदनोपन्यासः । एवं येन केनचिदालम्बनेन निन्दाविज्ञानो- त्पत्तिः प्रतिषेधोपकारिणीति, मुख्यार्थाभावेऽप्यदोषः ।
१०२ मीमांसादर्शनम् [ सू० एवं वपोत्खननादिवाक्ययोजना। स्वात्मवपोत्कर्तनेनापि हि विशिष्टप्रयोज- नार्थं कर्माणि क्रियन्ते, किमुत बाह्यधनत्यागेनेति स्तुतिः। यथा नेत्रमप्युद्धृत्यायं ददातीति लोकेऽपि त्यागिनं स्तुवन्तीति। वृत्तान्तपर्यवसायी च वेदस्तत्र प्रामाण्यमप्रतिपद्यमानः स्तुतौ सत्यत्वान्नान्यत्रान्वेषणमर्हतीति निष्प्रयोजनो- पाख्यानसत्यतया नार्थेन। शब्दभावनाङ्गं वार्थवादाः। सा च प्रवृत्तिविज्ञान- मात्रेणैवोपयुज्यते, नार्थेन। अर्थात्मिकायां तु सर्वत्राविसंवादः सिद्ध एव। अथोच्येत असदन्वाख्यानेन स्तुतिनिन्दात्वमिति सुतरां तत्र प्रतीयते। कामं परमार्थे वक्तारो भवन्ति काऽत्र स्तुतिर्निन्दा वा, सत्यमेवैतदिति। असत्ये तु यस्मादन्यत्र दुष्टमप्यवधृतमिह गुणवन्तमिति ब्रवीत्यतो नूनं मे प्ररोचयति, तथा गुणवन्तं सन्तं निन्दति निवर्तयितुमिति। ततश्चैवं विदित्वा यो यस्यानति- क्रमणीयः, तदनुरोधेन स तथा प्रवर्त्तते। वेदश्च प्रमाणमिति स्थितम्। तेन प्रवृत्तिनिवृत्यनुग्रहणीये स्वसंवेद्येऽर्थे पुंसः प्रशस्ताप्रशस्तज्ञाने भवतः। इह ते वेदेनोत्पादिते। तस्मात्तदनुरूपं व्यवहर्त्तव्यमिति। लोकेऽपि यां क्रियां फलान्तर- युक्तां मेधादिहेतुत्वेनाऽऽसां मन्यन्ते तस्यां कञ्चित्प्रवर्त्तयन्तस्तदभिप्रेतं सौभाग्यादि- फलमसत्यमप्युपन्यस्य नियुञ्जते। तत्प्रवृत्तश्चेतरोऽपि क्रियाश्रयं फलं प्राप्नोति। यद्यपि च प्रतिपत्ता जानाति नैतदत्र पारमार्थिकं फलं मदभिप्रायानुसारेणैतै- रुपन्यस्तं सर्वथा त्वपुरुषार्थे मां न प्रवर्त्तयन्ति, तदसत्यं नामैतत्किमप्यन्यद- वाप्स्यामीति ज्ञात्वाऽनुतिष्ठति। एवं वेदेऽपि विधिना तावत्फलमवगमितमर्थ- वादात्स्वसत्येन नाम प्ररोचयन्तु न तद्गते सत्यासत्यत्वे किञ्चिद् दूषयतः, प्रवर्त्तनमात्रोपकारित्वात्। यत्तु परस्ताद्विवक्ष्यति, तद्विधेरुपरीगतमिति निश्चित्य नैव विद्वांसो न प्रवर्त्तन्ते। तरमादुपाख्यानासत्यत्वमतन्त्रम्। न हि शुक्तिकादृष्टसत्यरजतो यदि रजतान्तरं तद्देशे लभते ततोऽभिसंधीयते। शुक्ति- कावस्तु किञ्चिदालम्बनं श्रुतिसामान्यमात्रेण सर्वत्र योजनीयम्। यथेह महाभूतानि प्रजाः पान्तीति प्रजापतित्वेनोच्यन्ते। वाय्वादीनां यथा- संख्येन मध्यवर्त्तिनः सारावृष्ट्यादयो वपाः, तामग्नाविति तेनैव क्रमेण वैद्युते वृष्टिम्, अर्बीसे शरीरान्तर्वर्त्तिनि वायुमन्तश्चरत्वसामान्याद्रश्मिं लौकिके तदाप्यायनात्तस्य। ततोऽज इति बीजादीनां सामान्येनानादित्वादजत्व- प्रसिद्धेः तमालभ्य प्राप्य प्रजाः पशूनाप्नोति। सर्वप्रजानां व्रीह्यादिपरिणाम- प्रभवत्वादित्यालम्बनम्। एतस्मिंस्तु प्रक्रमे सत्यं सालम्बनता, किं तु स्तुतित्वमेव हीयते। अतः स्तुतित्वात्यागेनैव स्वार्थसत्यतां वर्णयामः। मन्त्रार्थवादेतिहासप्रामाण्यात्सृष्टि- प्रलयाविष्येते, तत्र सृष्ट्यादौ प्रजापतिरेव योगी तस्मिन्काले पुण्यकर्मोद्भवमभ्युप-