मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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अपराध लगाकर कि उसी ने दारुवर्मा आदि शिल्पियों की नियुक्ति की थी, फांसी के दण्ड से दण्डित किया गया। इसी भांति चन्दनदास को आपके परिवार को छिपाकर अपने घर में रखने के आरोप में स्त्री-पुत्रादि सहित कारागार में डाल दिया गया।
इसी बीच शकटदास को लेकर सिद्धार्थक वहाँ आ जाता है। शकटदास बतलाता है कि प्रिय मित्र सिद्धार्थक की ही कृपा से मेरे प्राण बच सके। इस उपकार के बदले राक्षस मलयकेतु द्वारा प्रेषित आभूषण को अपने शरीर से उतारकर सिद्धार्थक को दे देता है। सिद्धार्थक राक्षस से प्रार्थना करता है कि मैं इस स्थान पर अपरिचित हूँ। अतएव अभी आप इसे अपने पास रख लें—जब मुझे आवश्यकता पड़ेगी, आपसे ले लूंगा। अब सिद्धार्थक राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसी के पास रहने लगता है।
इसके अनन्तर विराधगुप्त राक्षस को पुनः सूचना देता है कि मलयकेतु के भाग आने के पश्चात् चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट उत्पन्न हो गई है। इसी कारण अब चन्द्रगुप्त चाणक्य के आदेशों को पूर्ववत् नहीं मानता है।
तत्पश्चात् राक्षस उसी वेश में विराधगुप्त को 'स्तनकलश' से सन्देश कहने के लिये कुसुमपुर भेजता है। सन्देश यह है कि तुम अपनी स्तुतियों द्वारा चन्द्रगुप्त को चाणक्य के विरोध में भड़काने का प्रयत्न करना तथा यदि कोई गुप्त सूचना हो तो करभक द्वारा मेरे पास भेजना।
इसके पश्चात् तीन आभूषण खरीदे जाते हैं। तदनन्तर राक्षस करभक को कुछ आदेश देकर कुसुमपुर भेज देता है।
तृतीय अङ्क—पाटलिपुत्र में कंचुकी द्वारा घोषणा की जाती है कि महाराज चन्द्रगुप्त की आज्ञा है कि कौमुदी-महोत्सव के अवसर पर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) को भली भांति से सजाया जावे।
तदनन्तर वह सुगांग नामक महल की छत से नगर की शोभा का निरीक्षण करता है, किन्तु उसे नगर में कोई चहल-पहल दृष्टिगोचर नहीं होती है। कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का कोई चिह्न तक नहीं दिखलायी पड़ता है। कंचुकी द्वारा यह ज्ञात होने पर, कि आर्य चाणक्य ने कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का विरोध कर दिया है, वह आर्य चाणक्य को बुलवाता है।
चाणक्य के निवास स्थान पर पहुँचकर कंचुकी उसे चिन्तित अवस्था में पाता है। चाणक्य सोच रहा है कि राक्षस को किस भांति वश में किया जाय।
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वह सोचता है कि मेरे गुप्तचरो से मलयकेतु घिरा हुआ है । अब मैं चन्द्रगुप्त के साथ कृत्रिम-कलह उत्पन्न करक राक्षस को मलयकेतु से अलग कर दूँगा । इसी बीच कंचुकी चन्द्रगुप्त का सन्देश चाणक्य से कह देता है । चाणक्य कंचुकी से पूछता है कि क्या चन्द्रगुप्त को कौमुदी-महोत्सव के न मनाये जाने सम्बन्धी मेरे आदेश का पता लग गया है ? कंचुकी द्वारा 'हा' कह दिये जाने पर वह क्रोधा-वेश में चन्द्रगुप्त के समीप चल देता है ।
चाणक्य के आ जाने पर चन्द्रगुप्त उन्हे प्रणाम कर उचित आसन पर बैठाता है । चाणक्य उसे सार्वभौम सम्राट होने सम्बन्धी आशीर्वाद देता है । चन्द्रगुप्त द्वारा कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछे जाने पर चाणक्य उत्तर देता है—यह बात मन्त्री से सम्बद्ध है । तुम सचिवायत्त सिद्धि हो, अत तुमको कारण जानने से क्या प्रयोजन ? इसी मध्य दो वैतालिक राजा की स्तुति करते हुये श्लोक पाठ करते हैं । इनमे प्रथम राजा का अपना व्यक्ति है तथा दूसरा राक्षस का आदमी है—स्तनकलश । यह दूसरा वैतालिक स्तुति के बहाने से चन्द्रगुप्त को चाणक्य से फोड़ने की बात कहता है । चाणक्य इसे समझ लेता है । चन्द्रगुप्त दोनो को प्रभूत धनराशि पारितोषिक रूप में देने का आदेश दे देता है । चाणक्य इसका निषेध करता है । इस पर चन्द्रगुप्त कहता है "आप पग-पग पर मेरे कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं । अतएव यह राज्य मेरे लिये राज्य न होकर, एक प्रकार का बन्धन ही बन गया है ।" चाणक्य उत्तेजना के साथ कहता है—तो तुम अपना कार्य स्वय ही देखो, मैं भी अपने श्रोत्रिय सम्बन्धी कार्य मे सलग्न हो जाऊगा । राजा पुनः कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछता है । चाणक्य कहता है—हमारे भद्रभट आदि सेनाध्यक्ष मलयकेतु से जाकर मिल गये हैं तथा आक्रमण की तैयारी मे व्यस्त हैं । उक्त स्थिति मे हमारे लिये सैन्य-सज्जा करना उचित है अथवा कौमुदी-महोत्सव का मनाना ? चन्द्रगुप्त पुन प्रश्न करता है कि आपने मलयकेतु एव राक्षस को भाग जाने का अवसर क्यो दिया ? इसका भी चाणक्य द्वारा उत्तर दिया जाता है किन्तु उससे चन्द्रगुप्त को सन्तोष नही होता है और वह कहता है—मैं आपसे तर्क-वितर्क नही करना चाहता हूँ, मैं तो आपसे अधिक राक्षस को ही प्रशंसनीय समझता हूँ क्योकि उसने पाटलिपुत्र में रहते हुये हमारे व्यक्तियो को फोड लिया और हम कुछ न
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कर सके । इस पर चाणक्य अत्यधिक क्रुद्ध हो जाता है और कहता है कि यदि तुम राक्षस को मुझसे अधिक योग्य समझते हो तो यह शस्त्र मन्त्री राक्षस को ही दे दो। यह कहकर शस्त्र को पृथ्वी पर पटककर चला जाता है।
तदनन्तर चन्द्रगुप्त अपने कंचुकी वैहीनरि को आज्ञा देता है कि राज्य में घोषणा कर दो कि आज से चन्द्रगुप्त ने चाणक्य को मन्त्रि-पद से अलग कर दिया है। वह अपना राज-काज स्वयं देखेगा।
राक्षस का गुप्तचर 'स्तनकलश' इस कृत्रिम कलह को वास्तविक समझता है। कंचुकी भी इस कलह को वास्तविक ही समझता है।
चतुर्थ अङ्क—राक्षस का गुप्तचर करभक पाटलिपुत्र से आता है। वह द्वारपाल से राक्षस से मिलने के निमित्त कहता है। किन्तु रात्रि में देर तक जागने के कारण राक्षस शिरोवेदना से पीड़ित है। अतः द्वारपाल उसे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिये कहता है।
इधर शयनागार में पड़ा हुआ राक्षस सोच रहा है कि सम्पूर्ण रात्रियाँ जागते-जागते ही व्यतीत हो रही हैं। जिस काम को करने की सोचता हूँ वही चाणक्य की कुटिल नीति के कारण विफल हो जाता है। यह राजनीति भी एक विचित्र प्रकार का नाटक है। संभव है कि चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त में फूट उत्पन्न हो जाय। अवसर पाकर द्वारपाल करभक के आगमन की सूचना राक्षस को देता है। वह उसे अन्दर बुलवा लेता है। इसी बीच राक्षस की शिरोवेदना का समाचार पाकर मलयकेतु भी भागुरायण के साथ वहाँ जाता है। (यह भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर है और मलयकेतु का कपट मित्र। वह आते समय मार्ग में कुछ ऐसी बातें करता रहा था कि जिससे प्रभावित होकर मलयकेतु और राक्षस में फूट पड़ जाय। मार्ग में मलयकेतु ने भागुरायण से पूछा कि भद्रभट इत्यादि ने जो मुझसे यह कहा था कि हम लोग मन्त्री राक्षस द्वारा आपके आश्रय में नहीं आये हैं। हम लोग सेनापति शिखरसेन द्वारा आपके आश्रय में आये हैं—इसका क्या अभिप्राय है? इसके उत्तर में भागुरायण कहता है—राक्षस की शत्रुता चाणक्य से है न कि चन्द्रगुप्त से। यह हो सकता है कि चन्द्रगुप्त चाणक्य को अपने मन्त्री पद से पृथक् कर दे और राक्षस अपने मित्र चन्दनदास की रक्षा के निमित्त चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ले। यदि यह बातें
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सत्य हो जायँ तो आप हम लोगो पर अविश्वास न कर बैठे—इस कारण उनका कथन है कि शिखरसेन द्वारा ही आपके आश्रय मे आये हैं।) किन्तु वे दोनो करभक को राक्षस से पाटलिपुत्र का समाचार बतलाते हुये सुनकर छिप जाते हैं और दोनो का वार्तालाप सुनते हैं। करभक कौमुदी-महोत्सव से सम्बन्धित चाणक्य एव चन्द्रगुप्त की कलह का सम्पूर्ण वृतान्त राक्षस को बतलाता है। तत्कालीन अन्य घटनाओ का भी वर्णन करता है और अन्त मे कहता है कि इसी कलह के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त ने मन्त्री राक्षस के गुणो की प्रशसा कर चाणक्य को मन्त्रिपद से हटा दिया। चन्द्रगुप्त चाणक्य से इस कारण भी कुपित है कि उसने भागते हुये मलयकेतु और मन्त्री राक्षस की उपेक्षा की। चाणक्य अभी पाटलिपुत्र मे ही है, किन्तु यह शीघ्र ही तपोवन चला जायगा, ऐसा सुना जाता है।
उपर्युक्त समाचार पर राक्षस को विश्वास नही होता है। किन्तु शकटदास उसे समझाता है कि यह बात सम्भव हो सकती है क्योकि प्रतिज्ञा पूरी करने मे किन महान् कष्टो का सामना करना पडता है, यह चाणक्य जानता है। अत अब वह नगर म भी न रहेगा, तपोवन चला जायेगा।
इन सभी बातो का विपरीत अर्थ लगाकर भागुरायण मलयकेतु के मन मे राक्षस के प्रति सन्देह उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है और बतलाता है कि राक्षस चन्द्रगुप्त से प्रेम करता है। वह इसी प्रतीक्षा में है कि चाणक्य यदि चला जायगा तो चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनकर सारा कार्य करेगा।
इसके पश्चात् राक्षस के आदेश से शकटदास के साथ करभक विश्राम करने चला जाता है तथा मलयकेतु राक्षस के समक्ष उपस्थित होकर उसके सिर-दर्द का हाल पूछता है। राक्षस कहता है कि "जब तक आपको महाराज पद से सुशोभित नही देख लेता हूँ तब तक मेरा सिर-दर्द कैसे ठीक हो सकता है (अर्थात् तब तक मुझे चैन कहाँ ?)" यह सुनकर मलयकेतु पूछता है कि हमको अब कितने दिनों तक आक्रमण के अवसर की प्रतीक्षा करनी होगी ? राक्षस उत्तर देता है कि विलम्ब करने की कोई आवश्यकता नहीं है। शीघ्र ही शत्रु-विजय के निमित्त प्रस्थान किया जाय क्योकि चाणक्य चन्द्रगुप्त से पृथक् हो गया है तथा सचिवायत्तसिद्धि वाला होने के कारण चन्द्रगुप्त के लिये यह एक बडा भारी
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संकट है। अतः हमारी सफलता को निश्चित ही समझिये। यह सुनकर मलयकेतु अपनी सैन्य-शक्ति की प्रशंसा करता है और तदनन्तर चला जाता है।
तदनन्तर राक्षस आक्रमण के शुभ मुहूर्त्त को जानने के निमित्त ज्योतिषी को बुलवाना चाहता है। उसी समय क्षपणक जीवसिद्धि, जो एक ज्योतिषी भी है, वहाँ आ जाता है। वह मुहूर्त्त बतलाता है कि पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के पश्चात् पूर्ण चन्द्रोदय होने पर, 'बुध' नक्षत्र का योग होने पर तथा केतु के उदय होकर अस्त हो चुकने पर प्रस्थान करना उचित है। राक्षस अन्य ज्योतिषियो से भी परामर्श लेने के लिये क्षपणक से आग्रह करता है। इस पर क्षपणक रुष्ट होकर चला जाता है।
पंचम अङ्क— चाणक्य का गुप्तचर सिद्धार्थक, जो राक्षस की सेवा में रह रहा था, राक्षस से प्राप्त आभूषण के साथ कुसुमपुर के लिये जा रहा है। मार्ग मे उसकी भेंट क्षपणक जीवसिद्धि से हो जाती है। वह सिद्धार्थक को बतलाता है कि तुम भागुरायण से मुद्रा (पारपत्र) प्राप्त किये बिना कुसुमपुर नहीं जा सकते हो। मैं भी मुद्रा-प्राप्ति हेतु भागुरायण के समीप जा रहा हूँ। इस पर सिद्धार्थक कहता है कि मैं तो मन्त्री राक्षस का सेवक हूँ, इस कारण मुझे मुद्रा की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके पश्चात् सिद्धार्थक क्षपणक से कार्य-सिद्धि सम्बन्धी आशीर्वाद चाहता है। क्षपणक आशीर्वाद देता है। फिर दोनों अपने-अपने मार्ग की ओर चल देते हैं।
जिस समय क्षपणक-जीवसिद्धि भागुरायण के समीप पहुँचता है उसी समय मलयकेतु भी भागुरायण से मिलने वहाँ आता है। किन्तु वह भागुरायण के सामने होने से पूर्व भागुरायण एव जीवसिद्धि की परस्पर चल रही बातचीत को छिपकर सुनता है। जीवसिद्धि भागुरायण से कहता है कि मैं राक्षस से बहुत दूर चला जाना चाहता हूँ जिससे कि उसका नाम तक भी मुझे सुनने को प्राप्त न हो। इसका कारण यह है कि मैं कुसुमपुर में रहते समय दुर्भाग्य से राक्षस का मित्र बना और फिर उसके कथनानुसार विषकन्या का प्रयोग कर मैने पर्वतेश्वर की हत्या करवा दी। फलस्वरूप चाणक्य ने मुझे निर्वासित कर दिया। अब भी राक्षस कुछ ऐसा ......रे द्वारा करवाना चाहता है कि जिसके परिणाम स्वरूप मुझे कहीं ......च न कर जाना पड़े।
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उपर्युक्त बातो का श्रवणकर मलयकेतु को विश्वास हो जाता है कि मेरे पिता को राक्षस ने ही मरवाया है। भागुरायण जीवसिद्धि से कहता है कि आप मुद्रा ले लीजिये, किन्तु कुमार मलयकेतु के समीप चलकर यह सब बातें उससे कह दीजिये। इसी बीच मलयकेतु अपने को प्रकट कर देता है और कहता है कि मैने सब सुन लिया है। उसका पितृ-जन्य दुःख दूना हो गया। क्षपणक वहाँ से चला जाता है। अब भागुरायण चाणक्य के आदेश "राक्षस के प्राणो की सर्वथा रक्षा की जाय" का स्मरण करते हुये मलयकेतु को समझाने लगता है कि राजनीति में शत्रु और मित्र स्वार्थवश हुआ करते हैं। उस समय राक्षस सर्वार्थसिद्धि को राजा बनाना चाहता था। इस कारण वह पर्वतेश्वर को चन्द्रगुप्त से भी अधिक शत्रु मानता था। अब वह बात नहीं है। अतः आप नन्द-राज्य को वापिस लेने के समय तक शान्त रहिये।
इसी बीच बिना मुद्रा के बाहर जाता हुआ सिद्धार्थक पकड़ा जाता है और भागुरायण तथा मलयकेतु के समक्ष लाया जाता है। उसके हाथ में एक पत्र है जिस पर राक्षस की मोहर लगी हुई है। भागुरायण मलयकेतु को यह पत्र दिखलाता है तथा सिद्धार्थक के सही-सही उत्तर न देने पर उसे पिटवाता है। पिटते समय उसकी काँख से एक आभूषणो की पेटी गिर जाती है। उस पेटी से वही आभूषण निकलता है जिसे मलयकेतु ने राक्षस के पहनने के निमित्त भेजा था। अधिक पूछे जाने पर वह कहता है कि राक्षस ने वह पत्र तथा यह आभूषण देकर मुझे चन्द्रगुप्त के समीप भेजा है।
पत्र मे लिखित तथा सिद्धार्थक द्वारा मौखिक कहा गया संदेश था—(वस्तुत सिद्धार्थक चाणक्य का गुप्तचर है।) आप द्वारा प्रेषित तीन आभूषण प्राप्त हो गये हैं। मेरे पांच प्रिय मित्रो—चित्रवर्मा, पुष्कराक्ष, सिंहनाद, सिन्धुषेन और मेघनाद—में से प्रथम तीन तो मलयकेतु का राज्य चाहते हैं तथा शेष दो क्रमशः गजसेना और कोष को चाहते हैं। अतः इनकी इच्छा की पूर्ति कीजिये। पत्र की रिक्तता के निवारणार्थ यह आभूषण प्रेषित हैं।
इसके पश्चात् मलयकेतु राक्षस को बुलवाने के लिये प्रतीहारी को भेजता है। राक्षस युद्ध-यात्रा के लिये व्यूह-रचना के प्रकार के बारे में सोच रहा है। उसी समय प्रतीहारी सूचना देती है कि मलयकेतु आपसे मिलना चाहते हैं।
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राक्षस मलयकेतु के पास जाते समय उन आभूषणों में से एक को धारण कर लेता है कि जिनको उसने क्रय किया था । जब राक्षस मलयकेतु के समीप पहुँच जाता है तब आवश्यक शिष्टाचार के अनन्तर मलयकेतु राक्षस की आक्रमण सम्बन्धी योजना को जानना चाहता है । राक्षस योजना बतलाता है—सबसे आगे वह स्वयं रहेगा, उसके पीछे खश और मगध की सेनाये, मध्य में गान्धार, अन्त में चीन तथा हूणों से युक्त शक राजा लोग और शेष कौलूतादि पाँच राजा मलयकेतु की रक्षा करेंगे । इस योजना को सुनकर मलयकेतु सोचता है कि जो मेरे मारने के लिये नियुक्त हैं वही मेरे रक्षक बनाये जा रहे हैं ।
अब मलयकेतु राक्षस से पुनः पूछता है कि आपने सिद्धार्थक को कुसुमपुर क्यों भेजा है ? इसको भागुरायण और अधिक स्पष्ट करते हुये कहता है कि आपने पत्र, आभूषण तथा मौखिक संदेश देकर सिद्धार्थक को चन्द्रगुप्त के पास क्यो भेजा है ? साथ ही वह पत्र भी उसे पढने को देता है तथा आभूषण भी दिखलाता है और सिद्धार्थक को भी उसके समक्ष उपस्थित करता है । पत्र देखकर राक्षस कहता है कि यह पत्र उसका नहीं है, यह शत्रु का प्रयोग है । हाँ, यह आभूषण सिद्धार्थक को इनाम के रूप में मैंने अवश्य दिया था । इस पर अंकित मुद्रा भी कपट मुद्रा ही है । इतना सुनकर भागुरायण सिद्धार्थक से पूछता है कि यह पत्र किसका लिखा हुआ है ? सिद्धार्थक उत्तर देता है—शकटदास का । राक्षस बडा दुःखी हो जाता है और कहता है कि यदि शकटदास ने लिखा है तो मेरा ही लिखा समझिये । मलयकेतु शकटदास को बुलाना चाहता है किन्तु भागुरायण “कहीं वास्तविकता न खुल जाय—इस भय से” शकटदास को न बुलवाकर उसके लेख की प्रतिलिपि मँगवाता है । प्रतिलिपि उस पत्र से मिल जाती है । अब राक्षस के मन में शकटदास के बारे में सन्देह उत्पन्न हो जाता है । इस बीच मलयकेतु राक्षस के द्वारा धारित आभूषण को देखकर पूछता है कि यह आभूषण तो पिता जी का है ? राक्षस उत्तर देता है कि इसे मैने खरीदा है । अब मलयकेतु को विश्वास हो जाता है कि यह आभूषण चन्द्रगुप्त द्वारा भिजवाये गये तीन आभूषणो में से एक है ।
इसके अनन्तर मलयकेतु राक्षस पर अभियोग लगाता हुआ कहता है कि आपने ही विषकन्या भेजकर मेरे पिता को मरवाया था । इसका प्रमाण जीव-
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सिद्धि है। जीवसिद्धि का नाम सुनते ही राक्षस आश्चर्य में पड़ जाता है और सोचता है कि यह भी शत्रु का ही आदमी निकला।
तदनन्तर मलयकेतु शिखरसेन को (जो वस्तुत चाणक्य का ही गुप्तचर है।) आज्ञा देता है कि चित्रवर्मा, पुष्कराक्ष, सिंहनाद सुषेण और मेघनाद—इन पांचों राजाओ को मार डालो। ये पाँचो मार दिय जाते हैं। फिर मलयकेतु राक्षस से कहता है —
“गच्छ, समाश्रीयता सर्वात्मना चन्द्रगुप्त”
अर्थात् जाओ, पूर्णरूप से चन्द्रगुप्त का आश्रय लो। शोक-संतप्त राक्षस चित्रवर्मा आदि राजाओ का वध सुनकर दुःखी होता है तथा अपने परम मित्र चन्दनदास को छुड़ाने के निमित्त चला जाता है।
षष्ठ अङ्क—सिद्धार्थक मलयकेतु के शिविर से लौट आया है तथा उसने वहाँ की पूरी घटना से चाणक्य और चन्द्रगुप्त दोनो को ही अवगत करा दिया है। इसके पश्चात् वह अपने मित्र समिद्धार्थक के समीप गया। मित्र द्वारा पूछे जाने पर सिद्धार्थक कहता है कि चाणक्य के भद्रभट, पुरुषदत्त, हिङ्गरात आदि गुप्तचरों ने मलयकेतु को कैद कर लिया है तथा राक्षस मलयकेतु के शिविर से निकलकर पुनः पाटलिपुत्र में आ गया है। राक्षस के पीछे भी चाणक्य का गुप्तचर उदुम्बर लगा हुआ है। चाणक्य के आदेशानुसार हम दोनो को चन्दनदास को वध्यभूमि मे ले जाकर मार डालना है।
तत्पश्चात् एक पुरुष, जो चाणक्य का गुप्तचर है, राक्षस के समक्ष फांसी लगाने का अभिनय करता है। राक्षस अपने घनिष्ठ मित्र का पता लगाने हेतु पाटलिपुत्र के जीर्ण उद्यान मे आया हुआ है। वहाँ पर बैठा हुआ वह सोच रहा है कि भाग्य ने हमारे सभी प्रयत्नों को विफल कर दिया है। नन्द वंश के नष्ट हो जाने पर पर्वतेश्वर को आधार बनाकर महाराज नन्द के राज्य को वापिस ले लेने का मैंने प्रयत्न किया। किन्तु दुर्भाग्य से उनके भी दिवंगत हो जाने पर मैंने मलयकेतु को अपना आधार बनाया। किन्तु मुझे सदैव असफलता ही मिली। अब क्या किया जाय? इतने में अचानक ही उसकी दृष्टि उस कृत्रिम फांसी लगाने वाले पुरुष पर पडती है। वह उसके समीप जाकर पूछता है कि तुमको क्या कष्ट है कि जिसके कारण तुम फांसी लगा रहे हो?
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बड़े दुःख के साथ वह उत्तर देता है कि इस नगर में जिष्णुदास नामक एक सेठ है जो कि मेरा परम मित्र है। उसने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान में दे दी है और वह अग्नि में जल मरने के लिये नगर से बाहर चला गया है। अतः उसकी मृत्यु के समाचार को सुनने से पूर्व ही मैं अपना प्राणान्त कर देने के लिये फाँसी लगा रहा हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष के मित्र के मरने के कारण को जानना चाहता है। पुरुष बतलाता है—मेरे मित्र का एक अभिन्न मित्र चन्दनदास इसी नगर का निवासी है। उसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने यहाँ छिपा रखा है। चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त द्वारा बार-बार मांगे जाने पर भी वह राक्षस के परिवार को उनके संरक्षण में नहीं दे रहा है। अतः उसे फाँसी का दण्ड दिया गया है। इसी कारण उसका मित्र जिष्णुदास उसकी मृत्यु से पूर्व ही अपने को अग्नि मे भस्मसात् कर देना चाहता है। और मैं भी अपने मित्र जिष्णुदास के मरने से पूर्व ही मर जाना उचित समझता हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष से कहता है कि तुम जाकर जिष्णुदास को मरने से रोको। मैं भी चन्दनदास के प्राणों की रक्षा अपनी तलवार से करूँगा। बाद में जब वह पुरुष यह जान लेता है कि यही मन्त्री राक्षस हैं तो वह उनके पैरों पर गिर जाता है और कहता है—"आप तलवार द्वारा चन्दनदास को बचाने का उपाय न करें क्योकि शकटदास सम्बन्धी घटना के पश्चात् बधिक लोग अत्यधिक सतर्क हो गये हैं। यदि वे लोग वध्यस्थल पर सशस्त्र आते हुये किसो को देख लेते हैं तो वध्य व्यक्ति को तुरन्त ही मार डालते हैं।" इसके अनन्तर वह पुरुष चला जाता है।
तदनन्तर राक्षस सोचता है कि चाणक्य महान् कूटनीतिज्ञ है। यदि उसने अपनी योजना के अनुसार शकटदास को मेरे समीप भिजवाया था तो उसको मारने के लिये नियुक्त वधिको को क्यों प्राणदण्ड दिया ? और यदि शकटदास उसकी योजना का अंग नहीं है तो उसने मेरे विरुद्ध ऐसा कूट-पत्र क्यों लिखा ?
इस भाँति सोचता हुआ राक्षस निश्चय करता है कि यदि शस्त्र-बल से चन्दनदास को बचाना कठिन है तो मैं उसके छुटकारे के लिये आत्मसमर्पण ही कर देना उचित समझता हूँ।
सप्तम अङ्क—वधिको के साथ वध्यवेष को धारण किये हुये चन्दनदास
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चला जा रहा है। उसके साथ उसकी स्त्री और बच्चे भी चल रहे हैं। एक वधिक आगे-आगे यह घोषणा करता हुआ चल रहा है कि हट जाना लोगो, हट जाओ। यदि तुम लोगो को अपने प्राण, धन-सम्पत्ति तथा परिवार से मोह हो तो विष के सदृश राजद्रोह से अपने को बचाये रहो।
वध्यस्थान पर पहुँचकर चन्दनदास अपनी पत्नी को समझाता है कि मुझे यह दण्ड किसी अनुचित आचरण के कारण नही दिया गया है, मित्र के कार्य से ही मुझे यह दण्ड मिला है। अतः यह रोने का समय न होकर प्रसन्नता का है। अब तुम वापिस घर जाओ। रुदन करता हुआ उसका पुत्र उसे प्रणाम करते हुये अपने भावी कर्तव्य के बारे में उससे पूछता है। चन्दनदास कहता है— "बेटा ! वहाँ जाकर रहना, जहाँ चाणक्य न पहुँच सके।" इतने में वधिक चन्दनदास से कहता है "सेठ जी ! शूली गढ चुकी है, तैयार हो जाइये।" यह सुनते ही चन्दनदास की पत्नी चिल्लाने लगती है—"लोगो, बचाओ रे बचाओ !" इसी समय राक्षस आकर वहाँ उपस्थित हो जाता है और वधिको से कहता है—"चन्दनदास को मत मारो और दुष्ट चाणक्य से कह दो कि राक्षस आ गया है वह यहाँ वध्यशाला में स्थित है।"
यह समाचार पाकर चाणक्य आता है। वह राक्षस के चरणो का स्पर्श कर प्रणाम करता है। राक्षस कहता है कि मैं चाण्डालों द्वारा छुआ जा चुका हूँ अतः मुझे न छुइये। यह सुनकर चाणक्य उसे बतलाता है कि ये चाण्डाल नहीं हैं। इनमें से एक तो आपका सेवक सिद्धार्थक है और दूसरा राजपुरुष है जिसका नाम भुसिद्धार्थक है। इन्हीं दोनों के द्वारा विश्वास उत्पन्न कर शकटदास द्वारा, बिना उसके कुछ भी जाने-बूझे, मैंने ही वह कूट-पत्र लिखवाया था। भद्रभट, जीवसिद्धि आदि सभी मेरे ही गुप्तचर हैं। जीर्ण उद्यान में फाँसी लगाने वाला पुरुष भी मेरा ही गुप्तचर था। यह सब कार्य मैंने आपसे चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध स्थापित करने के निमित्त किया है।
इतने में चन्द्रगुप्त भी वहाँ आ जाता है और विनीत भाव से राक्षस को प्रणाम करता है। राक्षस उसे विजयी होने का आशीर्वाद देता है।
इसके पश्चात् चाणक्य राक्षस से कहता है कि यदि आप वस्तुतः चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो इस शस्त्र को ग्रहण कर चन्द्रगुप्त के मन्त्रि-पद को
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स्वीकार कीजिये। लाचार होकर राक्षस शस्त्र ग्रहण कर लेता है। इसी समय एक पुरुष आकर सूचना देता है कि भद्रभट, भागुरायण आदि के द्वारा कैदी के रूप में बँधा हुआ मलयकेतु द्वार पर उपस्थित है। किन्तु चाणक्य उस पुरुष से कहता है कि अब इस बारे में राक्षस से निवेदन करो। राक्षस द्वारा यह कहे जाने पर कि मैं मलयकेतु के समीप कुछ समय तक रह चुका हूँ, अतः इसके प्राण न लिये जायं; चन्द्रगुप्त मलयकेतु को जीवनदान देता है तथा उसे अपने पैतृक राज्य पर स्थापित करा देता है।
तदनन्तर चाणक्य चन्दनदास को सभी नगरों का 'जगत्-सेठ' बना देता है। वह दुर्गपाल एवं विजयपाल को बुलाकर आदेश देता है कि हाथी-घोड़ों को छोड़कर सभी लोगों को बन्धन-मुक्त कर दिया जाय। अब केवल मेरी शिखा का ही बन्धन हो क्योंकि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी है। यह कहकर वह अपनी चोटी (शिखा) बाँध लेता है।
अन्त में राक्षस भरतवाक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को पुनः आशीर्वाद देता है।
इतिवृत्त (कथावस्तु) सम्बन्धी सूक्ष्म आलोचना—इस भाँति इसकी कथा-वस्तु का अध्ययन करने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस का इतिवृत्त (कथावस्तु) वस्तुतः चातुर्यपूर्ण एवं सुसम्बद्ध तथा सप्रयोजन है। जो व्यक्ति प्रथम बार ही मुद्राराक्षस का अध्ययन कर रहा हो अथवा उसका अभिनय देख रहा हो उसे छठे अङ्क तक विभिन्न क्रिया-कलापों का, कार्यों के घात-प्रतिघातों का, राजनैतिक दाँव-पेंच सम्बन्धी युद्धो का, विश्रृङ्खलित-सा प्रतीत होने वाला जाल-सा प्रतीत होगा। किन्तु जैसे-जैसे मुख्य कथानक आगे की ओर बढ़ता जायगा वैसे ही वैसे सम्पूर्ण विश्रृङ्खलित कार्य-कलाप एक दिशा की ओर अग्रसर होते हुये दृष्टिगोचर होगा तथा सप्तम अङ्क में पहुँचकर वे सभी कार्य-कलाप एकत्रित होकर प्रयोक्ता को अभीष्ट फल प्रदान करते हुये दिखलाई देंगे। सम्पूर्ण क्रिया-कलाप राक्षस को ही वश में करने हेतु किया गया प्रतीत होता है तथा अन्त में परिणाम भी यही होता है कि राक्षस चाणक्य के समक्ष आत्म-समर्पण कर देता है।
मुद्राराक्षस का छोटे से छोटा भी ऐसा कार्य अथवा पात्र नहीं है जो कथानक को आगे बढ़ाने में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान न करता हो अथवा
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जिसके अभाव में नाटक का कथानक अपूर्ण न रह जाता हो। इस नाटक में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जिसकी कि अपनी स्वतन्त्र सत्ता हो। सभी कार्य परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। कथावस्तु की ऐसी सफल तथा चातुर्यपूर्ण योजना सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य के नाटकों में कठिनता से ही उपलब्ध होगी। सम्पूर्ण योजना का गठबन्धन ऐसा सुसम्बद्ध दृष्टिगोचर होता है कि कहीं भी शिथिलता का दर्शन होना सम्भव नहीं है। प्रो० वेबर के मतानुसार सम्पूर्ण संस्कृत-साहित्य में घटना-सामञ्जस्य का इससे उत्तम उदाहरण मिलना सर्वथा असम्भव ही है।
विशाखदत्त ने अङ्कों का विभाजन दृश्यों के आधार पर किया है। उनकी यह अपनी मौलिकता है। अन्य नाटकों में अङ्कों का विभाजन पात्रों को आधार मान कर किया गया है। प्रमुख पात्र प्रारम्भ से अन्त तक रङ्गमञ्च पर प्रायः बने रहते हैं। किन्तु मुद्राराक्षस में ऐसा नहीं हुआ है। इसमें दृश्यों को आधार मानकर अङ्कों का विभाजन किया गया है। इस दृष्टि से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कथावस्तु की योजना के साथ ही साथ दृश्य विधान भी विलक्षण तथा सुव्यवस्थित है।
मुद्राराक्षस का नेता (नायक)
इस नाटक में 'नेता' विषयक प्रश्न विवादास्पद है। कुछ विद्वान् इसका नेता (नायक) चन्द्रगुप्त को मानते हैं तथा कुछ चाणक्य को। चाणक्य को नेता मानने वालों की संख्या अधिक है।
साहित्य-शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार फल का भोक्ता (अथवा प्राप्तिकर्त्ता) ही नेता कहलाता है। परम्परा भी इसी प्रकार की चली आ रही है। मुद्राराक्षस में भी फल का भोक्ता चन्द्रगुप्त है, राक्षस उसी का मन्त्री बनता है तथा अपनी सेवाओं को उसने चन्द्रगुप्त को ही अर्पित किया है। इसके विपरीत चाणक्य का अस्तित्व चाणक्य रूप में ही अवशिष्ट रह गया है। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने चन्द्रगुप्त को ही मुद्राराक्षस का नायक स्वीकार किया है।
अधिकांश विद्वानों का कथन है कि परम्परा की दृष्टि से चन्द्रगुप्त को भले ही नेता मान लिया जाय किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से नेता के बारे में विचार करने पर
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तथा चाणक्य की चारित्रिक विशेषताओं का सम्यक् अध्ययन करने पर चाणक्य ही प्रस्तुत नाटक का नेता (नायक) सिद्ध होता है । नाटककार विशाखदत्त का अभिमत भी चाणक्य को ही नायक मानने की ओर परिलक्षित होता है । नाटक में स्थान-स्थान पर ऐसे संकेत उपलब्ध होते हैं कि जिनसे चाणक्य का ही नेता होना युक्तिसंगत प्रतीत होता है । छठे अंक में उसकी नीति का एक उद्धरण देखिये :—
“जयति जयनसज्जं या अकृत्वा च सैन्यं
प्रतिहतपररक्षा आर्यचाणक्यनीतिः ॥” ६।१॥
यदि फल प्राप्ति सम्बन्धी बात को ही प्रमुख मान लिया जाय तो भी चाणक्य का ही नायक होना सिद्ध हो जाता है क्योंकि नन्द वंश को समूल नष्ट कर देने सम्बन्धी प्रतिज्ञा की पूर्ति कर लेने के अनन्तर शिखाबन्धन रूप फल का भोक्ता वही है ।—वह स्वयं कहता है :—
“पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं बध्यते शिखा ॥” ७।१७ ।
चाणक्य के इस कथन से ही उसका नायक होना स्वयं प्रतिध्वनित होता है । राक्षस को विवश कर चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनाने रूपी फल की प्राप्ति भी चाणक्य को ही हुई है ।
नायक में जिन गुणों का होना अपेक्षित है, वे सभी चाणक्य में विद्यमान हैं । इसके अतिरिक्त नायक का चरित्र सम्पूर्ण नाटक में क्रमशः विकास को प्राप्त होता जाय, यह भी आवश्यक है । ऐसा क्रमिक विकसित चरित्र चाणक्य का ही दृष्टिगोचर होता है, चन्द्रगुप्त का नहीं । चन्द्रगुप्त के चरित्र का तो विकसित स्वरूप प्रायः नगण्य रूप में ही परिलक्षित होता है । अतः इस आधार पर भी चाणक्य का ही नायक होना सिद्ध होता है ।
नाटक का “मुद्राराक्षस” नाम भी इसी पक्ष की पुष्टि करता है । “मुद्रया गृहीतो राक्षसो यस्मिन् तत् मुद्राराक्षससन्नाम नाटकम्” । चाणक्य ने ही मुद्रा का प्रयोग किया है । उसी की सफल राजनीति का यह चमत्कार है कि मुद्रा के द्वारा राक्षस पकड़ा ज
नाटककार विश ने से पूर्व लिखे गये “अभिज्ञानशाकुन्तल” तथ
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‘मृच्छकटिक’ जैसे रूपकों ( नाटको ) का अध्ययन किया होगा तथा उनसे प्रभावित हुए होगे। इन दोनो में क्रमशः अंगूठी सम्बन्धी तथा मिट्टी की गाडी सम्बन्धी छोटी सी घटनाये ही नाटको की कथावस्तु में निर्णायक सिद्ध हुई हैं। ऐसी घटनाओ सम्बन्धी तत्त्वो का प्रवर्त्तन नायक द्वारा ही हुआ करता है। नायक-नायिका अथवा नायक-प्रतिनायक ही इस प्रकार की घटनाओं के दो छोर सिद्ध हुआ करते हैं। ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ की अँगूठी सम्बन्धी घटना ही नायक एव नायिका के चरित के विकास में प्रमुख है। इसी भांति ‘मृच्छकटिक’ में मिट्टी की गाड़ी ही नायक, नायिका एव प्रतिनायक के चरित को विकसित करती है। इसी प्रकार ‘मुद्राराक्षस’ मे भी मुद्रा सम्बन्धी घटना ही चाणक्य ( नायक ) एव राक्षस ( प्रतिनायक ) के चरित्रो को विकसित करने का प्रमुख आधार है। अत इस नाटक का नायक चाणक्य को ही समझा जाना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
चरित्र-चित्रण—चरित्र-चित्रण की दृष्टि से इस नाटक को अनूठा ही कहा जा सकता है। नाटककार ने चरित्रो के विकास को एक नवीन रूप में चित्रित करने का सफल प्रयास किया है। यदि इस नाटक में अन्य विशेषतायें न होती, केवल चरित्र-चित्रण ही होता तब भी यह नाटक ग्राह्य एव उपादेय होता। इस नाटक में अधिकांश पात्र युगल रूप मे चित्रित किये गये हैं। दो पात्रो के पारस्परिक विरोध तथा सघर्ष में ही प्रत्येक पात्र का चरित्र विकसित हुआ है। जैसे—कूटनीति के प्रयोक्ता चाणक्य और राक्षस, परस्पर विरोधी गुणो को धारण करने वाले राजा चन्द्रगुप्त तथा राजा मलयकेतु, भागुरायण और सिद्धार्थक। चाणक्य को नन्दवंशीय राजाओ के प्रति प्रबल प्रतिशोध की भावना से युक्त चित्रित किया गया है। वह उनके समूल विनाश के लिए उद्यत है। उसका सर्वाधिक कृपापात्र चन्द्रगुप्त है। किन्तु राक्षस की स्थिति पूर्णतया इसकी उलटी ही दृष्टिगोचर होती है—वह नन्दवश के प्रति सच्ची श्रद्धा एव भक्ति से परिपूर्ण है। वह चन्द्रगुप्त को नष्ट कर राज्य को पुन नन्दवंशीय राजाओ को दिलवाने का इच्छुक है। वह चाणक्य द्वारा प्रयुक्त नीति से सघर्ष करने वाला है।
नाटककार विशाखदत्त ने ऐसे चरित्रो की उद्भावना की है जो कि नाटकीय होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होते हैं, यथार्थ होते हुए भी जो आदर्श हैं,
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नाटक की प्रस्तावना में :—
“क्रूरग्रहः सकेतुः सम्पूर्णमण्डलमिदानीम्। अभिभवितुमिच्छति बलात्”
इन शब्दों को श्रवणकर और यह समझकर कि “शत्रु चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है” उसका क्रोध जाग्रत हो जाता है और वह तडपता हुआ कहने लगता है :—
“आः क एष मयि स्थिते चन्द्रमभिभवितुमिच्छति ?”
वह निरीह तथा स्वार्थहीन व्यक्ति है। इतने बड़े साम्राज्य का प्रधान मन्त्री होने पर भी उसे अपने मुख-समृद्धि की चिन्ता नहीं है। “सादा जीवन उच्च विचार” ही उसके जीवन का लक्ष्य है। चन्द्रगुप्त के कंचुकी के शब्दों में उसकी इस विशेषता का स्पष्ट परिचय मिलता है :—
“अहो ! राजाधिराजमन्त्रिणो गृहभूतिः !!-कुतः।
उपलशकलमेतद्भे दकं गोमयानां
वटुभिरुपहृतानां बर्हिषां स्तोम एषः।
शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिरभि—
विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम् ।।” ३।१५।।
निरीहाणामीशस्तृणमिव तिरस्कारविषयः ।।” ३।१६।।
उसने अपने प्रयत्न से समूल नन्दवंश का नाश कर चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी पर बिठा दिया किन्तु फिर भी स्वयं निर्लिप्त ही रहा।
वह दैव (भाग्य) में विश्वास नहीं करता है। चन्द्रगुप्त के मुख से जब वह यह सुनता है कि नन्दवंश का विनाश दैव ने किया ( श्लोक सं० ३।२६ से पूर्व ) तो वह कहता है :—
“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”।
इसके साथ ही उसे अपने पुरुषार्थ पर ही पूर्ण विश्वास है।
वह गुणग्राहक भी है। शत्रु के गुणों की भी प्रशंसा वह निःसंकोच भाव से करता है। वह राक्षस के गुणों से पूर्णतया प्रभावित है। इसीलिये वह यह जानता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधान मन्त्री यदि राक्षस को बना दिया जायेगा तो उसका शासनकाल पूर्ण शान्ति तथा निश्चिन्तता से बीतेगा तथा कोई अन्य राजा