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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
१०२मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

वह विशुद्धचित्त आत्मवेत्ता मनसे जिस-जिस लोककी भावना करता है और जिन-जिन भोगोंको चाहता है वह उसी-उसी लोक और उन्हीं-उन्हीं भोगोंको प्राप्त कर लेता है। इसलिये ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाला पुरुष आत्मज्ञानीकी पूजा करे ॥ १० ॥

यं यं लोकं पित्रादिलक्षणं मनसा संविभाति संकल्पयति मह्यमन्यस्मै वा भवेदिति विशुद्धसत्त्वः क्षीणक्लेश आत्मविन्निर्मलान्तःकरणः कामयते यांश्च कामान्प्रार्थयते भोगांस्तं तं लोकं जयते प्राप्नोति तांश्च कामान्संकल्पितान्भोगान् । तस्माद्विद्वुषः सत्यसंकल्पत्वादात्मज्ञमात्मज्ञानेन विशुद्धान्तःकरणं ह्यर्चयेत् पूजयेत्पादप्रक्षालनशुश्रूषानमस्कारादिभिर्भूतिकामो विभूतिमिच्छुः। ततः पूजार्ह एवासौ।१०।विशुद्धसत्त्व—जिसके क्लेश* क्षीण हो गये हैं वह निर्मलचित्त आत्मवेत्ता जिस पितृलोक आदि लोककी मनसे इच्छा करता है अर्थात् ऐसा सङ्कल्प करता है कि मुझे या किसी अन्यको अमुक लोक प्राप्त हो अथवा वह जिन कामना यानी भोगोंकी अभिलाषा करता है उसी-उसी लोक तथा अपने सङ्कल्प किये हुए उन्हीं-उन्हीं भोगोंको वह प्राप्त कर लेता है। अतः ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाला पुरुष उस विशुद्धचित्त आत्मज्ञानीका पाद-प्रक्षालन, शुश्रूषा एवं नमस्कारादिद्वारा पूजन करे, क्योंकि विद्वान् सत्यसङ्कल्प होता है। इसलिये (सत्यसङ्कल्प होनेके कारण) वह पूजनीय ही है ॥१०॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये तृतीयमुण्डके
प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥


* क्लेश मनोविकारोंको कहा है। वे पाँच हैं; यथा—
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः । (योग० २ । ३)
१ अविद्या, २ अस्मिता, ३ राग, ४ द्वेष और ५ अभिनिवेश—ये क्लेश हैं।

तृतीय मुण्डक (द्वितीय खण्ड) - ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मैव भवति

द्वितीय खण्ड

आत्मवेत्ताकी पूजाका फल

यस्मात्—क्योंकि—

स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम
यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामा-
स्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥

वह (आत्मवेत्ता) इस परम आश्रयरूप ब्रह्मको, जिसमें यह समस्त जगत् अर्पित है और जो स्वयं शुद्धरूपसे भासमान हो रहा है, जानता है। जो निष्काम भावसे उस आत्मज्ञ पुरुषकी उपासना करते हैं वे बुद्धिमान्लोग शरीरके बीजभूत इस वीर्यका अतिक्रमण कर जाते हैं। [अर्थात् इसके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं] ॥ १ ॥

स वेद जानातीत्येतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म परममुत्कृष्टं धाम सर्वकामानामाश्रयमास्पदं यत्र यस्मिन् ब्रह्मणि धाम्नि विश्वं समस्तं जगन्निहितमर्पितं यच्च स्वेन ज्योतिषा भाति शुभ्रं शुद्धम् । तमप्येवमात्मज्ञं पुरुषं ये ह्यकामा विभूतितृष्णावर्जिता मुमुक्षवःवह (आत्मवेत्ता) सम्पूर्ण कामनाओंके परम यानी उत्कृष्ट आश्रयभूत इस पूर्वोक्त लक्षणवाले ब्रह्मको जानता है, जिस ब्रह्मपदमें यह विश्व यानी सम्पूर्ण जगत् निहित—समर्पित है और जो कि अपने तेजसे—शुद्धरूपसे प्रकाशित हो रहा है। उस इस प्रकारके आत्मज्ञ पुरुषकी भी जो लोग निष्काम अर्थात् ऐश्वर्यकी तृष्णासे रहित होकर यानी मुमुक्षु होकर परमदेवके,

१०४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


सन्त उपासते परमिव सेवन्ते ते शुक्रंन्नृबीजं यदेतत्प्रसिद्धं शरीरोपादानकारणमतिवर्तन्त्यतिगच्छन्ति धीरा धीमन्तो न पुनर्योनिं प्रसर्पन्ति “न पुनः कचिद्रतिं करोति” इति श्रुतेः। अतस्तं पूजयेदित्यभिप्रायः॥१॥समान उपासना करते हैं वे धीर—बुद्धिमान् पुरुष शुक्र यानी मनुष्यदेहके बीजको, जो कि शरीरके उपादान कारणरूपसे प्रसिद्ध है, अतिक्रमण कर जाते हैं; अर्थात् फिर योनिमें प्रवेश नहीं करते, जैसा कि “फिर कहीं प्रीति नहीं करता” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः तात्पर्य यह है कि उसका पूजन करना चाहिये ॥१॥

निष्कामतासे पुनर्जन्मनिवृत्ति

मुमुक्षोः कामत्याग एव प्रधानं साधनमित्येतद्दर्शयति—मुमुक्षुके लिये कामनाका त्याग ही प्रधान साधन है—इस बातको दिखलाते हैं—

कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्वि- हैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥

[ भोगोंके गुणोंका ] चिन्तन करनेवाला जो पुरुष भोगोंकी इच्छा करता है वह उन कामनाओंके योगसे वहाँ-वहाँ (उनकी प्राप्तिके स्थानोंमें) उत्पन्न होता रहता है। परन्तु जिसकी कामनाएँ पूर्ण हो गयी हैं उस कृतकृत्य पुरुषकी तो सभी कामनाएँ इस लोकमें ही लीन हो जाती हैं ॥ २ ॥

कामान्यो दृष्टादृष्टविषयान् कामयते मन्यमानस्तद्गुणांश्चि-जो पुरुष काम अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट अभीष्ट विषयोंकी, उनके गुणोंका मनन—चिन्तन करता

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५


न्त्यानः प्रार्थयते स तैः कामभिः कामैर्धर्माधर्मप्रवृत्तिहेतुभिर्विषयेच्छारूपैः सह जायते तत्र तत्र । यत्र यत्र विषयप्राप्तिनिमित्तं कामाः कर्मसु पुरुषं नियोजयन्ति तत्र तत्र तेषु तेषु विषयेषु तैरेव कामैर्वेष्टितो जायते ।<br><br>यस्तु परमार्थतत्त्वविज्ञानात् पर्याप्तकाम आत्मकामत्वेन परिसमन्तत आप्ताः कामा यस्य तस्य पर्याप्तकामस्य कृतात्मनोऽविद्यालक्षणादपररूपादपनीय स्वेन परेण रूपेण कृत आत्मा विद्यया यस्य तस्य कृतात्मनस्त्विहैव तिष्ठत्येव शरीरे सर्वे धर्माधर्मप्रवृत्तिहेतवः प्रविलीयन्ति विलयम् उपयान्ति नश्यन्तीत्यर्थः । कामास्तज्जन्महेतुविनाशान्न जायन्त इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥हुआ, कामना करता है वह उन कामनाओं अर्थात् धर्माधर्ममें प्रवृत्ति करानेके हेतुभूत विषयोंकी इच्छारूप वासनाओंके सहित वहीं-वहीं उत्पन्न होता है; अर्थात् जहाँ-जहाँ विषयप्राप्तिके लिये कामनाएँ पुरुषको कर्ममें नियुक्त करती हैं वह वहीं-वहीं उन्हीं-उन्हीं प्रदेशोंमें उन कामनाओंसे ही परिवेष्टित हुआ जन्म ग्रहण करता है ।<br><br>परन्तु जो परमार्थतत्त्वके विज्ञानसे पूर्णकाम हो गया है, अर्थात् आत्मप्राप्तिकी इच्छावाला होनेके कारण जिसे सब ओरसे समस्त भोग प्राप्त हो चुके हैं उस पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुषकी सभी कामनाएँ [लीन हो जाती हैं] अर्थात् जिसने विद्याद्वारा अपने आत्माको उसके अविद्यामय अपररूपसे हटाकर अपने पररूपसे स्थित कर दिया है उस कृतात्माके धर्माधर्मकी प्रवृत्तिके समस्त हेतु इस शरीरमें स्थित रहते हुए ही लीन अर्थात् नष्ट हो जाते हैं । अभिप्राय यह है कि अपनी उत्पत्तिके हेतुका नाश हो जानेके कारण उसमें फिर कामनाएँ उत्पन्न नहीं होतीं ॥ २ ॥
१०६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

आत्मदर्शनका प्रधान साधन—जिज्ञासा

यद्येवं सर्वलाभात्परम आत्म-इस प्रकार यदि और सब
लाभोंकी अपेक्षा आत्मलाभ ही
लाभस्तल्लाभाय प्रवचनादयउत्कृष्ट है तो उसकी प्राप्तिके लिये
प्रवचन आदि उपाय अधिकतासे
उपाया बाहुल्येन कर्तव्या इतिकरने चाहिये—ऐसी बात प्राप्त
प्राप्त इदमुच्यते—होनेपर यह कहा जाता है—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३ ॥

यह आत्मा न तो प्रवचन (पुष्कल शास्त्राध्ययन) से प्राप्त होने योग्य है और न मेधा (धारणाशक्ति) अथवा अधिक श्रवण करनेसे ही मिलनेवाला है। यह (विद्वान्) जिस परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा करता है उस (इच्छा) के द्वारा ही इसकी प्राप्ति हो सकती है। उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपको व्यक्त कर देता है ॥ ३ ॥

योऽयमात्मा व्याख्यातोजिस इस आत्माकी व्याख्या
की गयी है, जिसका लाभ ही परम
यस्य लाभः परः पुरुषार्थो नासौपुरुषार्थ है वह वेदशास्त्रके अधिक
वेदशास्त्राध्ययनबाहुल्येन प्रवच-अध्ययनरूप प्रवचनसे प्राप्त होने
नेन लभ्यः। तथा न मेधयायोग्य नहीं है। इसी प्रकार वह
मेधा—ग्रन्थके अर्थको धारण
ग्रन्थार्थधारणशक्त्या। न बहुनाकरनेकी शक्ति अथवा 'बहुना
श्रुतेन नापि भूयसा श्रवणे-श्रुतेन' यानी अधिक शास्त्रश्रवणसे
नेत्यर्थः।ही मिल सकता है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७


केन तर्हि लभ्य इत्युच्यते—यमेव परमात्मानमेवैष विद्वान्वृणुते प्राप्तुमिच्छति तेन वरणेनैष परमात्मा लभ्यो नान्येन साधनान्तरेण । नित्यलब्धस्वभावत्वात् ।तो फिर वह किस उपायसे प्राप्त हो सकता है ? इसपर कहते हैं—जिस परमात्माको यह विद्वान् वरण करता अर्थात् प्राप्त करनेकी इच्छा करता है उस वरण करनेके द्वारा ही यह परमात्मा प्राप्त होने योग्य है; नित्यप्राप्तस्वरूप होनेके कारण किसी अन्य साधनसे प्राप्त नहीं हो सकता ।
कीदृशोऽसौ विदुष आत्मलाभ इत्युच्यते । तस्यैष आत्माविद्यासञ्छन्नां स्वां परां तनुं स्वात्मतत्त्वं स्वरूपं विवृणुते प्रकाशयति प्रकाश इव घटादिविद्यायां सत्यामाविर्भवतीत्यर्थः । तस्मादन्यत्यागेनात्मलाभप्रार्थनैवात्मलाभसाधनमित्यर्थः ॥३॥विद्वान्को होनेवाला यह आत्मलाभ कैसा होता है—इसपर कहते हैं—यह आत्मा उसके प्रति अपने अविद्याच्छन्न परस्वरूपको यानी स्वात्मतत्त्वको प्रकाशित कर देता है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार प्रकाशमें घटादिकी अभिव्यक्ति होती है उसी प्रकार विद्याकी प्राप्ति होनेपर आत्माका आविर्भाव हो जाता है। अतः तात्पर्य यह है कि अन्य कामनाओंके त्यागद्वारा आत्मप्रार्थना ही आत्मलाभका साधन है ॥ ३ ॥

आत्मदर्शनके अन्य साधन

आत्मप्रार्थनासहायभूतान्येतानि च साधनानि बलाप्रमादतपांसि लिङ्गयुक्तानि संन्याससहितानि । यस्मात्—लिङ्गयुक्त अर्थात् संन्यासकें सहित बल, अप्रमाद और तप—, ये सब साधन आत्मप्रार्थनाके सहायक हैं । क्योंकि—

१०८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो

न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां-

स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥

यह आत्मा बलहीन पुरुषको प्राप्त नहीं हो सकता और न प्रमाद अथवा लिङ्ग (संन्यास) रहित तपस्यासे ही [मिल सकता है]। परंतु जो विद्वान् इन उपायोंसे [उसे प्राप्त करनेके लिये] प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा ब्रह्मधाममें प्रवेश करा देता है ॥ ४ ॥


यस्मादयमात्मा बलहीनेन बलप्रहीणेनात्मनिष्ठाजनितवीर्यहीनेन न लभ्यो नापि लौकिकपुत्रपश्वादिविषयसङ्गनिमित्तप्रमादात् , तथा तपसो वाप्यलिङ्गाल्लिङ्गरहितात् । तपोऽत्र ज्ञानम्; लिङ्गं संन्यासः। संन्यासरहिताज्ज्ञानान्न लभ्यत इत्यर्थः । एतैरुपायैर्बलाप्रमादसंन्यासज्ञानैर्यतते तत्परः संन्प्रयतते यस्तु विद्वान्विवेक्यात्मवित्तस्य विदुष एष आत्मा विशते संप्रविशति ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥यह आत्मा बलहीन अर्थात् आत्मनिष्ठाजनित शक्तिसे रहित पुरुषद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है; न लौकिक पुत्र एवं पशु आदि विषयोंकी आसक्तिके कारण होनेवाले प्रमादसे ही मिल सकता है और न लिङ्गरहित तपस्यासे ही । यहाँ तप ज्ञान है और लिङ्ग संन्यास । तात्पर्य यह कि संन्यासरहित ज्ञानसे प्राप्त नहीं होता । जो विद्वान् यानी विवेकी आत्मवेत्ता तत्पर होकर बल, अप्रमाद, संन्यास और ज्ञान—इन उपायोंसे [उसकी प्राप्तिके लिये] प्रयत्न करता है उस विद्वान्का यह आत्मा ब्रह्मधाममें सम्यक् रूपसे प्रविष्ट हो जाता है ॥४॥

खण्ड २ ] • शाङ्करभाष्यार्थ १०९


आत्मदर्शीकी ब्रह्मप्राप्तिका प्रकार

कथं ब्रह्म संविशत इत्युच्यते—विद्वान् किस प्रकार ब्रह्ममें प्रविष्ट होता है सो बतलाया जाता है—

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः

कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।

ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा

युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥

इस आत्माको प्राप्तकर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त और प्रशान्त हो जाते हैं। वे धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्मको सब ओर प्राप्त कर [ मरणकालमें ] समाहितचित्त हो सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं ॥ ५ ॥

| संप्राप्य समवगम्यैनमात्मा- | इस आत्माको सम्यक् प्रकारसे | | नमृषयो दर्शनवन्तस्तेनैव ज्ञानेन | प्राप्तकर—जानकर ऋषि अर्थात् | | तृप्ता न बाह्येन तृप्ति- | आत्मदर्शनवान् लोग, शरीरको पुष्ट | | साधनेन शरीरोपचयकारणेन | करनेवाले किसी बाह्य तृप्तिसाधनसे | | कृतात्मानः परमात्मस्वरूपेणैव | नहीं बल्कि उस ज्ञानसे ही तृप्त | | निष्पन्नात्मानः सन्तो वीतरागाः | हो कृतात्मा—जिनका आत्मा | | वीतरागादिदोषाः प्रशान्ता | परमात्मस्वरूपसे ही निष्पन्न हो गया | | उपरतेन्द्रियाः । | है ऐसे होकर तथा वीतराग— | | त एवंभूताः सर्वगं सर्वव्या- | रागादि दोषोंसे रहित और प्रशान्त | | पिनमाकाशवत्सर्वतः सर्वत्र प्राप्य | यानी उपरतेन्द्रिय हो जाते हैं। | | —नोपाधिपरिच्छिन्नेनैकदेशेन, | ऐसे भावको प्राप्त हुए वे लोग | | | सर्वग—आकाशके समान सर्व- | | | व्यापक ब्रह्मको, उपाधिपरिच्छिन्न | | | एक देशमें नहीं, बल्कि सर्वत्र |

.११०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
किं तर्हि? तद्ब्रह्मैवाद्वयमात्मत्वेन प्रतिपद्य धीरा अत्यन्तविवेकिनो युक्तात्मानो नित्यसमाहितस्वभावाः सर्वमेव समस्तं शरीरपातकालेऽप्याविशन्ति भिन्ने घटे घटाकाशवदविद्याकृतोपाधिपरिच्छेदं जहति । एवं ब्रह्मविदो ब्रह्मधाम प्रविशन्ति ॥ ५ ॥प्राप्त कर—फिर क्या होता है ? उस अद्वयब्रह्मको ही आत्मभावसे अनुभव कर, वे धीर यानी अत्यन्त विवेकी और युक्तात्मा—नित्य समाहितस्वभाव पुरुष शरीरपातके समय भी सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं; अर्थात् घटके फूट जानेपर घटाकाशके समान वे अपने अविद्याजनित परिच्छेदका परित्याग कर देते हैं। इस प्रकार वे ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मधाममें प्रवेश करते हैं ॥ ५ ॥

ज्ञातज्ञेयकी मोक्षप्राप्ति

किं च—तथा—

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः

संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।

ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले

परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥

जिन्होंने वेदान्तजनित विज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे संन्यासयोगसे यत्न करनेवाले समस्त शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकमें देह त्याग करते समय परम अमरभावको प्राप्त हो सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

वेदान्तजनितविज्ञानं वेदान्तविज्ञानं तस्यार्थः परमात्मावेदान्तसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान वेदान्तविज्ञान कहलाता है। उसका अर्थ यानी विज्ञेय परमात्मा
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ१११
विज्ञेयः सोऽर्थः सुनिश्चितो येषांहै। वह अर्थ जिन्हें अच्छी तरह
ते वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः।निश्चित हो गया है वे 'वेदान्त-
ते च संन्यासयोगात्सर्वकर्मपरि-विज्ञानसुनिश्चितार्थ' कहलाते हैं।
त्यागलक्षणयोगात्केवलब्रह्मनिष्ठा-वे संन्यासयोगसे—सर्वकर्मपरित्याग-
स्वरूपाद्योगाद्यतयो यतनशीलाःरूप योगसे अर्थात् केवल ब्रह्मनिष्ठा-
शुद्धसत्त्वाः शुद्धं सत्त्वं येषांस्वरूप योगसे यत्न करनेवाले और
संन्यासयोगात्ते शुद्धसत्त्वाः । तेशुद्धसत्त्व—संन्यासयोगसे जिनका
ब्रह्मलोकेषु—संसारिणां ये मरण-सत्त्व (चित्त) शुद्ध हो गया है ऐसे वे
कालास्तेऽपरान्तास्तानपेक्ष्य मुमु-शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकोंमें परामृत—
क्षूणां संसारावसाने देहपरित्याग-परम अमृत यानी अमरणधर्मा ब्रह्म
कालः परान्तकालस्तस्मिन्परा-ही जिनका आत्मस्वरूप हैं ऐसे
न्तकाले साधकानां बहुत्वान्ब्रह्मैवजीवित अवस्थामें ही परामृत यानी
लोको ब्रह्मलोक एकोऽप्यनेकवद्ब्रह्मभूत होकर दीपनिर्वाण अथवा
दृश्यते प्राप्यते वा, अतो बहुवचनं[घटके फूटनेपर] घटाकाशके समान
ब्रह्मलोकेष्विति ब्रह्मणीत्यर्थः—परिमुक्त यानी निवृत्तिको प्राप्त हो
परामृताः परममृतममरणधर्मकंजाते हैं। वे सब परि अर्थात्
ब्रह्मात्मभूतं येषां ते परा-सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं।
मृता जीवन्त एव ब्रह्मभूताःकिसी अन्य गन्तव्य देशान्तरकी
परामृताः सन्तः परिमुच्यन्ति परिअपेक्षा नहीं करते। संसारी पुरुषों-
समन्तात्प्रदीपनिर्वाणवद् घटा-के जो अन्तकाल होते हैं वे
'अपरान्तकाल' हैं उनकी अपेक्षा
मुमुक्षुओंके संसारका अन्त हो
जानेपर उनका जो देहपरित्याग-
का समय है वह 'परान्तकाल' है।
उस परान्तकालमें वे ब्रह्मलोकोंमें—
बहुत-से साधक होनेके कारण यहाँ
११२मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३ :
काशवन्निवृत्तिमुपयान्ति । परिमुच्यन्ति परिसमन्तान्मुच्यन्ते सर्वे न देशान्तरं गन्तव्यम् अपेक्षन्ते ।<br><br>“शकुनीनामिवाकाशे जले वारिचरस्य च । पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानवतां गतिः”<br>(महा० शा० २३९ । २४) ।<br><br>“अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः” इति श्रुतिस्मृतिभ्यः ।<br><br>देशपरिच्छिन्ना हि गतिः संसारविषयैव परिच्छिन्नसाधनसाध्यत्वात् । ब्रह्म तु समस्तत्वान्न देशपरिच्छेदेन गन्तव्यम् । यदि हि देशपरिच्छिन्नं ब्रह्म स्यान्मूर्तद्रव्यवदाद्यन्तवदन्याश्रितं सावयवम् अनित्यं कृतकं च स्यात् । न त्वेवंविधं ब्रह्म भवितुमर्हति । अतस्तत्प्राप्तिश्च नैव देशपरिच्छिन्ना भवितुं युक्ता । अपि चाविद्यादि-ब्रह्मलोक यानी ब्रह्मस्वरूप लोक एक होनेपर भी अनेकवत् देखा और प्राप्त किया जाता है । इसीलिये ‘ब्रह्मलोकेषु’ इस पदमें बहुवचनका प्रयोग हुआ है, अतः ‘ब्रह्मलोकेषु’का अर्थ है ब्रह्ममें ।<br><br>“जिस प्रकार आकाशमें पक्षियोंके और जलमें जलचर जीवके पैर (चरणचिह्न) दिखायी नहीं देते उसी प्रकार ज्ञानियोंकी गति नहीं जानी जाती”<br>“[मुमुक्षुलोग] संसारमार्गसे पार होनेकी इच्छासे अनध्वग (संसारमार्गमें विचरण न करनेवाले) होते हैं ।” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे भी यही प्रमाणित होता है ।<br><br>परिच्छिन्न साधनसे साध्य होनेके कारण संसारसम्बन्धिनी गति देशपरिच्छिन्ना ही होती है । किन्तु ब्रह्म सर्वरूप होनेके कारण किसी देशपरिच्छेदसे प्राप्तव्य नहीं है । यदि ब्रह्म देशपरिच्छिन्न हो तो मूर्तद्रव्यके समान आदि-अन्तवान्, पराश्रित, सावयव, अनित्य और कृतक सिद्ध हो जायगा । किन्तु ब्रह्म ऐसा हो नहीं सकता । अतः उसकी प्राप्ति भी देशपरिच्छिन्ना नहीं हो सकती; इसके सिवा ब्रह्मवेत्ता लोग अविद्यादि-संसार-
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११३
संसारबन्धापनयनमेव मोक्षम् इच्छन्ति ब्रह्मविदो न तु कार्यभूतम् ॥ ६ ॥बन्धनकी निवृत्तिरूप मोक्षकी ही इच्छा करते हैं, किसी कार्यभूत पदार्थकी नहीं ॥ ६ ॥

मोक्षका स्वरूप

किं च मोक्षकाले—तथा मोक्षकालमें—

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥

[ प्राणादि ] पन्द्रह कलाएँ ( देहारम्भक तत्त्व ) अपने आश्रयोंमें स्थित हो जाती हैं, [ चक्षु आदि इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ] समस्त देवगण अपने प्रतिदेवता [ आदित्यादि ] में लीन हो जाते हैं तथा उसके [ सञ्चितादि ] कर्म और विज्ञानमय आत्मा आदि सब-के-सब पर अव्यय देवमें एकीभावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

या देहारम्भिकाः कलाः प्राणाद्यास्ताः स्वां स्वां प्रतिष्ठां गताः स्वं स्वं कारणं गता भवन्तीत्यर्थः । प्रतिष्ठा इति द्वितीयाबहुवचनम् । पञ्चदश पञ्चदशसंख्याका या अन्त्यप्रश्नपरिपठिताः प्रसिद्धा देवाश्च देहाश्रयाश्चक्षुरादिकरणस्थाः सर्वे प्रतिदेवतास्वादित्यादिषु गता भवन्तीत्यर्थः ।जो देहकी आरम्भ करनेवाली प्राणादि कलाएँ हैं वे अपनी प्रतिष्ठाको पहुँचती अर्थात् अपने-अपने कारणको प्राप्त हो जाती हैं । [ इस मन्त्रमें ] 'प्रतिष्ठाः' यह द्वितीया विभक्तिका बहुवचन है । पन्द्रह प्रसिद्ध कलाएँ जो [ प्रश्नोपनिषद्के ] अन्तिम ( षष्ठ ) प्रश्नमें पढ़ी गयी हैं तथा देहके आश्रित चक्षु आदि इन्द्रियोंमें स्थित समस्त देवता अपने प्रतिदेवता आदित्यादिमें लीन हो जाते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।
११४मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
यानि च मुमुक्षुणा कृतानि कर्माण्यप्रवृत्तफलानि प्रवृत्तफलानामुपभोगेनैव क्षीयमाणत्वाद्विज्ञानमयश्चात्माविद्याकृतबुद्ध्याद्युपाधिमात्मत्वेन मत्वा जलादिषु सूर्यादिप्रतिबिम्बवदिह प्रविष्टो देहभेदेषु, कर्मणां तत्फलार्थत्वात्, सह तेनैव विज्ञानमयेनात्मना, अतो विज्ञानमयो विज्ञानप्रायः; त एते कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मोपाध्यपनये सति परेऽव्ययेऽनन्तेऽक्षये ब्रह्मण्यकाशकल्पेऽजेऽजरेऽमृतेऽभयेऽपूर्वेऽनपरेऽनन्तरेऽबाह्येऽद्वये शिवे शान्ते सर्व एकीभवन्त्यविशेषतां गच्छन्ति एकत्वमापद्यन्ते जलाद्याधारापनय इव सूर्यादिप्रतिबिम्बाः सूर्ये घटाद्यपनय इवाकाशे घटाद्याकाशाः ॥ ७ ॥तथा मुमुक्षुके किये हुए अप्रवृत्तफल कर्म—क्योंकि जो कर्म फलोन्मुख हो जाते हैं वे उपभोगसे ही क्षीण होते हैं—और विज्ञानमय आत्मा, जो अविद्याजनित बुद्धि आदि उपाधिको आत्मभावसे मानकर जलादिमें सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान यहाँ देहभेदोंमें प्रविष्ट हो रहा है, उस विज्ञानमय आत्माके सहित [ परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं ], क्योंकि कर्म उस विज्ञानमय आत्माको ही फल देनेवाले हैं। अतः विज्ञानमयका अर्थ विज्ञानप्राय है। ऐसे वे [ सञ्चितादि ] कर्म और विज्ञानमय आत्मा सभी, उपाधिके निवृत्त हो जानेपर आकाशके समान, पर, अव्यय, अनन्त, अक्षय, अज, अजर, अमृत, अभय, अपूर्व, अनन्य, अनन्तर, अवाह्य, अद्वय, शिव और शान्त ब्रह्ममें एकरूप हो जाते हैं—अविशेषता अर्थात् एकताको प्राप्त हो जाते हैं, जिस प्रकार कि जल आदि आधारके हटा लिये जानेपर सूर्य आदिके प्रतिबिम्ब सूर्यमें तथा घटादिके निवृत्त होनेपर घटाकाशादि महाकाशमें मिल जाते हैं ॥ ७ ॥

खण्ड २ ] : शाङ्करभाष्यार्थ ११५


ब्रह्मप्राप्तिमें नदी आदिका दृष्टान्त

किं च— । तथा—

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे-
ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥

जिस प्रकार निरन्तर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपको त्यागकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

यथा नद्यो गङ्गाद्याः स्यन्द-<br>माना गच्छन्त्यः समुद्रे समुद्रं<br>प्राप्यास्तमदर्शनमविशेषात्मभावं<br>गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति नाम च<br>रूपं च नामरूपे विहाय हित्वा<br>तथाविद्याकृतनामरूपाद्विमुक्तः<br>सन्विद्वान्परादक्षरात्पूर्वोक्तात्परं<br>दिव्यं पुरुषं यथोक्तलक्षणमुपैति<br>उपगच्छति ॥ ८ ॥जिस प्रकार बहकर जाती हुई गङ्गा आदि नदियाँ समुद्रमें पहुँचने-पर अपने नाम और रूपको त्यागकर अस्त—अदर्शन यानी अविशेष भावको प्राप्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् अविद्याकृत नाम-रूपसे मुक्त हो पूर्वोक्त अक्षर (अव्याकृत) से भी पर उपर्युक्त लक्षणविशिष्ट पुरुषको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है

ननु श्रेयस्यनेके विघ्नाः<br>प्रसिद्धा अतः क्लेशानामन्यतमे-<br>नान्येन वा देवादिना च विघ्नितोशङ्का—कल्याणपथमें अनेकों विघ्न आया करते हैं—यह प्रसिद्ध है। अतः क्लेशोंमेंसे किसी-न-किसी-के द्वारा अथवा किसी देवादिद्वारा
११६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
ब्रह्मविद्प्यन्यां गतिं मृतो गच्छति न ब्रह्मैव ।विघ्न उपस्थित कर दिये जानेसे ब्रह्मवेत्ता भी मरनेपर किसी दूसरी गतिको प्राप्त हो जायगा—ब्रह्मको ही प्राप्त न होगा ।
न; विद्ययैव सर्वप्रतिबन्धस्यापनीतत्वात् । अविद्याप्रतिबन्धमात्रो हि मोक्षो नान्यप्रतिबन्धः, नित्यत्वादात्मभूतत्वाच्च। तस्मात्—**समाधान—**नहीं, विद्यासे ही समस्त प्रतिबन्धोंके निवृत्त हो जानेके कारण [ ऐसा नहीं होगा ] । मोक्ष केवल अविद्यारूप प्रतिबन्धवाला ही है, और किसी प्रतिबन्ध-वाला नहीं है, क्योंकि वह नित्य और सबका आत्मस्वरूप है । इसलिये—

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥

जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है । उसके कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता । वह शोकको तर जाता है, पापको पार कर लेता है और हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

स यः कश्चिद् द्वै लोके तत्परमं ब्रह्म वेद साक्षादहमेवास्मीति स नान्यां गतिं गच्छति । देवैरपि तस्य ब्रह्मप्राप्तिं प्रति विघ्नो न शक्यते कर्तुम् । आत्मा ह्येषां सइस लोकमें जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है—‘वह साक्षात् मैं ही हूँ’ ऐसा समझ लेता है, वह किसी अन्य गतिको प्राप्त नहीं होता । उसकी ब्रह्मप्राप्तिमें देवतालोग भी विघ्न उपस्थित नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो उनका

'खण्ड २ ] : शाङ्करभाष्यार्थ ११७


भवति । तस्माद्ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति ।<br><br>किं च नास्य विदुषोऽब्रह्मवित्कुले भवति । किं च तरति शोकमनेकेष्टवैकल्यनिमित्तं मानसं सन्तापं जीवन्नेवातिक्रान्तो भवति । तरति पाप्मानं धर्माधर्माख्यम् । गुहाग्रन्थिभ्यो हृदयाविद्याग्रन्थिभ्यो विमुक्तः सन्नमृतो भवतीत्युक्तमेव भिद्यते हृदयग्रन्थिरित्यादि ॥ ९ ॥आत्मा ही हो जाता है। अतः ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है।<br><br>तथा इस विद्वान्‌के कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता और यह शोकको तर जाता है अर्थात् अनेकों इष्ट वस्तुओंके वियोगजनित सन्तापको जीवित रहते हुए ही पार कर लेता है तथा धर्माधर्मसंज्ञक पापसे भी परे हो जाता है। फिर हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त हो अमृत हो जाता है, जैसा कि 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि मन्त्रोंमें कहा ही है ॥ ९ ॥

विद्याप्रदानकी विधि

अथेदानीं ब्रह्मविद्यासम्प्रदानविध्युपदर्शनेनोपसंहारः क्रियते।तदनन्तर अब ब्रह्मविद्याप्रदानकी विधिका प्रदर्शन करते हुए [ इस ग्रन्थका ] उपसंहार किया जाता है—

तदेतदृचाभ्युक्तम्—

क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः
स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः ।
तेषामेवैषां ब्रह्मविद्यां वदेत
शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥

११८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

यही बात [आगेकी] ऋचाने भी कही है—जो अधिकारी क्रियावान् श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ और स्वयं श्रद्धापूर्वक एकर्षि नामक अग्निमें हवन करनेवाले हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका अनुष्ठान किया है उन्हींसे यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिये ॥ १० ॥

तदेतद्विद्यासम्प्रदानविधान-यह विद्यासम्प्रदानकी विधि
मृचा मन्त्रेणाभ्युक्तमभिप्रका-[आगेकी] ऋचा यानी मन्त्रने भी
शितम्—प्रकाशित की है—
क्रियावन्तो यथोक्तकर्मा-जो क्रियावान्—जैसा ऊपर
नुष्ठानयुक्ताः, श्रोत्रिया ब्रह्म-बतलाया गया है वैसे कर्मानुष्ठानमें
निष्ठा अपरस्मिन्ब्रह्मण्यभियुक्ताःलगे हुए, श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ
परब्रह्मबुभुत्सवः स्वयमेकर्षि-यानी अपरब्रह्ममें लगे हुए और
नामानमग्निं जुह्वते जुह्वति श्रद्द-परब्रह्मको जाननेके इच्छुक तथा
धन्तः श्रद्दधानाः सन्तो ये तेषाम्स्वयं श्रद्धायुक्त होकर एकर्षि नामक
एव संस्कृतात्मनां पात्रभूतानाम्अग्निमें हवन करनेवाले हैं उन्हीं
एतां ब्रह्मविद्यां वदेत ब्रूयात्शुद्धचित्त एवं ब्रह्मविद्याके पात्रभूत
शिरोव्रतं शिरस्यग्निधारणलक्षणम्,अधिकारियोंको यह ब्रह्मविद्या
यथाथर्वणानां वेदव्रतं प्रसिद्धम्,बतलानी चाहिये, जिन्होंने कि
यैस्तु यैश्च तच्चीर्णं विधिवद्यथा-शिरपर अग्नि धारण करनारूप
विधानं तेषामेव च ॥ १० ॥शिरोव्रतका—जैसा कि अथर्व-
वेदियोंका वेदव्रत प्रसिद्ध है—
विधिवत्—शास्त्रोक्त विधिके
अनुसार अनुष्ठान किया है, उन्हींसे
यह विद्या कहनी चाहिये ॥ १० ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९


उपसंहार

तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

उस इस सत्यका पूर्वकालमें अङ्गिरा ऋषिने [ शौनकजीको ] उपदेश किया था। जिसने शिरोव्रतका अनुष्ठान नहीं किया वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता। परमर्षियोंको नमस्कार है, परमर्षियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥

तदेतदक्षरं पुरुषं सत्यमृषि-<br>रङ्गिरा नाम पुरा पूर्वं शौनकाय<br>विधिवदुपसन्नाय पृष्टवत उवाच ।<br>तद्वदन्योऽपि तथैव श्रेयोऽर्थिने<br>मुमुक्षवे मोक्षार्थं विधिवदुपसन्नाय<br>ब्रूयादित्यर्थः । नैतद्ग्रन्थरूपम्<br>अचीर्णव्रतोऽचरितव्रतोऽप्यधीते<br>न पठति । चीर्णव्रतस्य हि विद्या<br>फलाय संस्कृता भवतीति ।उस इस अक्षर पुरुष सत्यको अंगिरानामक ऋषिने पूर्वकालमें अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए प्रश्नकर्ता शौनकजीसे कहा था। उनके समान अन्य किसी गुरुको भी उसी प्रकार अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए कल्याणकामी मुमुक्षुपुरुषको उसके मोक्षके लिये इसका उपदेश करना चाहिये—यह इसका तात्पर्य है। इस ग्रन्थरूप उपदेशका 'अचीर्णव्रत' पुरुष—जिसने कि शिरोव्रतका आचरण न किया हो—अध्ययन नहीं कर सकता, क्योंकि जिसने उस व्रतका आचरण किया होता है उसीकी विद्या संस्कारसम्पन्न होकर फलवती होती है।

१२० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


समाप्ता ब्रह्मविद्या, सा येभ्यो ब्रह्मादिभ्यः पारम्पर्यक्रमेण संप्राप्ता तेभ्यो नमः परमऋषिभ्यः परमं ब्रह्म साक्षाद्दृष्टवन्तो ये ब्रह्मादयोऽवगतवन्तश्च ते परमर्षयस्तेभ्यो भूयोऽपि नमः । द्विर्वचनमत्यादरार्थं मुण्डकसमाप्त्यर्थं च ॥ ११ ॥यहाँ ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । वह जिन ब्रह्मा आदिसे परम्परा-क्रमसे प्राप्त हुई है उन परमर्षियोंको नमस्कार है । जिन्होंने परब्रह्मका साक्षात् दर्शन किया है और उसका बोध प्राप्त किया है वे ब्रह्मा आदि परम ऋषि हैं; उन्हें फिर भी नमस्कार है । यहाँ 'नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः' यह द्विरुक्ति ऋषियोंके अधिक आदर और मुण्डककी समाप्तिके लिये है ॥११॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये तृतीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥

समाप्तमिदं तृतीयं मुण्डकम् ।

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावाथर्वणमुण्डकोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥

शान्तिपाठः

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!