मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
ब्रह्मसाक्षात्कारका फल
| अस्य परमात्मज्ञानस्य फलमिदमभिधीयते— | इस परमात्मज्ञानका यह फल बतलाया जाता है— |
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भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥
उस परावर (कारणकार्यरूप) ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इस जीवकी हृदयग्रन्थि टूट जाती है, सारे संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ८ ॥
| भिद्यते हृदयग्रन्थिरविद्यावासनाप्रचयो बुद्ध्याश्रयः कामः “कामा येऽस्य हृदि श्रिताः” (क० उ० २ । ३ । १४, वृ० उ० ४ । ४ । ७) इति श्रुत्यन्तरात्। हृदयाश्रयोऽसौ नात्माश्रयः भिद्यते भेदं विनाशमायाति । छिद्यन्ते सर्वज्ञेयविषयाः संशया लौकिकानामामरणान्तु गङ्गास्रोतोवत्प्रवृत्ता विच्छेदमायान्ति । अस्य विच्छिन्नसंशयस्य निवृत्ताविद्यस्य यानि विज्ञानोत्पत्तेः प्राक्तनानि जन्मान्तरे चाप्रवृत्त- | “इसके हृदयमें जो कामनाएँ आश्रित हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिके अनुसार ‘हृदयग्रन्थि’ बुद्धिमें स्थित अविद्यावासनामय कामको कहते हैं। यह हृदयके ही आश्रित रहनेवाली है आत्माके आश्रित नहीं । [उस आत्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेपर यह] भेद अर्थात् नाशको प्राप्त हो जाती है। तथा लौकिक पुरुषोंके ज्ञेय पदार्थविषयक सम्पूर्ण सन्देह, जो उनके मरणपर्यन्त गङ्गाप्रवाहवत् प्रवृत्त होते रहते हैं, विच्छिन्न हो जाते हैं। जिसके संशय नष्ट हो गये हैं और जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है ऐसे इस पुरुषके जो विज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व जन्मान्तरमें किये हुए कर्म फलोन्मुख नहीं हुए |
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७६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| फलानि ज्ञानोत्पत्तिसहभावीनि<br>च क्षीयन्ते कर्माणि । न त्वेत-<br>ज्जन्मारम्भकाणि प्रवृत्तफलत्वात् ।<br>तस्मिन्सर्वज्ञेऽसंसारिणि परावरे<br>परं च कारणात्मनावरं च<br>कार्यात्मना तस्मिन्परावरे साक्षा-<br>दहमस्मीति दृष्टे संसारकारणो-<br>च्छेदान्मुच्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥ | हैं और जो ज्ञानोत्पत्ति के साथ-<br>साथ किये जाते हैं वे सभी नष्ट हो<br>जाते हैं; किन्तु इस ( वर्तमान )<br>जन्मको आरम्भ करनेवाले कर्म<br>क्षीण नहीं होते, क्योंकि उनका<br>फल देना आरम्भ हो जाता है ।<br>तात्पर्य यह है कि उस सर्वज्ञ<br>असंसारी परावर—कारणरूपसे<br>पर और कार्यरूपसे अपर ऐसे उस<br>परावरके 'यह साक्षात् मैं ही हूँ' इस<br>प्रकार देख लिये जानेपर संसारके<br>कारणका उच्छेद हो जानेसे यह<br>पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ |
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| उक्तस्यैवार्थस्य सङ्क्षेपाभि-<br>धायका उत्तरे मन्त्रास्त्रयोऽपि— | आगेके तीन मन्त्र भी पूर्वोक्त<br>अर्थको ही संक्षेपसे बतलाने-<br>वाले हैं— |
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ज्योतिर्मय ब्रह्म
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥
वह निर्मल और कलाहीन ब्रह्म हिरण्मय ( ज्योतिर्मय ) परम कोशमें विद्यमान है । वह शुद्ध और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थोंकी ज्योति है और वह है जिसे कि आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं ॥ ९ ॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
| हिरण्मये ज्योतिर्मये बुद्धि-विज्ञानप्रकाशे परे कोशे कोश इवासेः, आत्मस्वरूपोपलब्धिस्थानत्वात्; परं तत्सर्वाभ्यन्तरत्वात् तस्मिन् विरजमविद्याद्यशेषदोषरजोमलवर्जितं ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् सर्वात्मत्वाच्च । निष्कलं निर्गताः कला यस्मात्तन्निष्कलं निरवयवम् इत्यर्थः । | हिरण्मय—ज्योतिर्मय अर्थात् बुद्धिवृत्तिके प्रकाशरूप परमकोशमें, जो आत्मस्वरूपकी उपलब्धिको स्थान होनेके कारण तलवारके कोश (म्यान) के समान है और सबसे भीतरी होनेके कारण श्रेष्ठ है, उसमें विरज—अविद्यादि सम्पूर्ण दोषरूप मलसे रहित ब्रह्म विराजमान है, जो सबसे बड़ा तथा सर्वरूप होनेके कारण ब्रह्म है। वह निष्कल है; जिससे सब कलाएँ निकल गयी हों उसे निष्कल कहते हैं अर्थात् वह निरवयव है । |
| यस्माद्विरजं निष्कलं चातस्तच्छुभ्रं शुद्धं ज्योतिषां सर्वप्रकाशात्मनामग्न्यादीनामपि तज्ज्योतिरवभासकम् । अग्न्यादीनाम् अपि ज्योतिष्टमन्तर्गतब्रह्मात्मचैतन्यज्योतिर्निमित्तमित्यर्थः । तद्धि परं ज्योतिर्यदन्यानवभास्यम् आत्मज्योतिस्तद्यदात्मविद आत्मानं स्वं शब्दादिविषयबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणं ये विवेकिनो विदुर्विजानन्ति त आत्मविद- | क्योंकि ब्रह्म विरज और निष्कल है इसलिये वह शुभ्र यानी शुद्ध और ज्योतियों—अग्नि आदि सम्पूर्ण प्रकाशमय पदार्थोंका भी ज्योतिः—प्रकाशक है । तात्पर्य यह है कि अग्नि आदिका ज्योतिर्मयत्व भी अपने अन्तर्वर्ती ब्रह्मात्मचैतन्यरूप ज्योतिके ही कारण है । जो किसी अन्यसे प्रकाशित न होनेवाला आत्मज्योति है वही परम ज्योति है, जिसे कि आत्मवेत्ता—जो विवेकी पुरुष आत्मा अर्थात् अपनेको शब्दादि विषय और बुद्धिप्रत्ययोंका साक्षी जानते हैं |
७८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
स्तद्विदुरात्मप्रत्ययानुसारिणः । यस्मात्परं ज्योतिस्तस्मात्त एव तद्विदुर्नेतरे बाह्यार्थप्रत्ययानुसारिणः ॥ ९ ॥ | वे आत्मानुभवका अनुसरण करनेवाले आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं। क्योंकि वह परम ज्योति है इसलिये उसे वे ही जानते हैं; दूसरे बाह्य प्रतीतियोंका अनुसरण करनेवाले पुरुष नहीं जानते ॥ ९ ॥
कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्युच्यते— | वह ज्योतियोंका ज्योति किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है—
ब्रह्मका सर्वप्रकाशकत्व
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥
वहाँ (उस आत्मस्वरूप ब्रह्ममें) न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा या तारे। वहाँ यह बिजली भी नहीं चमकती फिर यह अग्नि किस गिनतीमें है ? उसके प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ॥ १० ॥
न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति । तद्ब्रह्म न प्रकाशयति इत्यर्थः । स हि तस्यैव भासा सर्वमन्यदनात्मजातं प्रकाशयति | वहाँ—अपने आत्मस्वरूप ब्रह्ममें सबको प्रकाशित करनेवाला सूर्य भी प्रकाशित नहीं होता अर्थात् वह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । वह (सूर्य) तो उस (ब्रह्म) के प्रकाशसे ही अन्य सब अनात्मपदार्थोंको
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७९ |
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| इत्यर्थः । न तु तस्य स्वतः प्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः ।<br><br>किं बहुना; यदिदं जगद्भाति तत्तमेव परमेश्वरं स्वतः भारूपत्वाद्भान्तं दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निं दहन्तमनुदहति न स्वतःस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि जगद्विभाति ।<br><br>यत एवं तदेव ब्रह्म भाति च विभाति च कार्यगतेन विविधेन भासातस्तस्य ब्रह्मणो भारूपत्वं स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य कर्तुं | प्रकाशित करता है, उसमें स्वतः प्रकाश करनेका सामर्थ्य है ही नहीं। इसी प्रकार वहाँ न तो चन्द्रमा या तारे ही प्रकाशित होते हैं और न यह बिजली ही; फिर हमें साक्षात् दिखलायी देनेवाला यह अग्नि तो हो ही कैसे सकता है ?<br><br>अधिक क्या ? यह जो जगत् भासता है वह स्वयं प्रकाशरूप होनेके कारण उस परमेश्वरके प्रकाशित होनेपर उसीके पीछे प्रकाशित—देदीप्यमान हो रहा है। जिस प्रकार अग्निके संयोगसे जल और उल्मुक (अंगारा) आदि अग्निके प्रज्वलित होनेपर उसके कारण जलाने लगते हैं—स्वतः नहीं जलाते उसी प्रकार यह सूर्य आदि सम्पूर्ण जगत् उस (परब्रह्म) के प्रकाश—तेजसे ही प्रकाशित होता है।<br><br>क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये वह ब्रह्म ही कार्यगत विचित्र प्रकाशसे विशेषरूपसे प्रकाशित हो रहा है। इससे उस ब्रह्मकी प्रकाशरूपता स्वतः ज्ञात हो जाती है। जिसमें स्वयं प्रकाश नहीं है वह दूसरेको भी प्रकाशित नहीं |
८० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| शक्नोति । घटादीनामन्यावभासकत्वाददर्शनाद्भारूपाणां चादित्यादीनां तद्दर्शनात् ॥ १० ॥ | कर सकता, क्योंकि घटादि पदार्थोंमें दूसरोंको प्रकाशित करना नहीं देखा जाता तथा प्रकाशस्वरूप सूर्य आदिमें वह देखा जाता है ॥ १० ॥ |
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| यत्तज्ज्योतिषां ज्योतिर्ब्रह्म तदेव सत्यं सर्वं तद्विकारं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमात्रमनृतमितरदित्येतमर्थं विस्तरेण हेतुतः प्रतिपादितं निगमनस्थानीयेन मन्त्रेण पुनरुपसंहरति । | जो ब्रह्म ज्योतियोंका ज्योति है, वही सत्य है तथा सब कुछ उसीका विकार है जो विकार केवल वाणीका आरम्भ और नाममात्र है अतः अन्य सभी मिथ्या है—ऊपर विस्तार और हेतुपूर्वक कहे हुए इस अर्थका इस निगमनस्थानीय मन्त्रसे पुनः उपसंहार करते हैं— |
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ब्रह्मका सर्वव्यापकत्व
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥११॥
यह अमृत ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं-वायीं ओर है तथा ब्रह्म ही नीचे-ऊपर फैला हुआ है । यह सारा जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥
| ब्रह्मैवोक्तलक्षणमिदं यत्पुरस्तादग्रे ब्रह्मैवाविद्यादृष्टीनां प्रत्यवभासमानं तथा पश्चाद्ब्रह्म तथा दक्षिणतश्च तथोत्तरेण तथैवाध- | यह जो अविद्यामयी दृष्टिवालोंको सामने दिखायी दे रहा है वह उपर्युक्त लक्षणोंवाला ब्रह्म ही है । इसी प्रकार पीछे भी ब्रह्म है, दायीं और बायीं ओर भी ब्रह्म है तथा |
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८१ |
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| स्तादूर्ध्वं च सर्वतोऽन्यदिव कार्या- | नीचे-ऊपर सभी ओर कार्यरूपसे |
| कारेण प्रसृतं प्रगतं नामरूपवद् | नामरूपविशिष्ट होकर फैला हुआ |
| अवभासमानम् । किं बहुना ब्रह्मैव | वह ब्रह्म ही अन्य पदार्थोंके समान |
| इदं विश्वं समस्तमिदं जगद्वरिष्ठं | भास रहा है । अधिक क्या ? यह |
| वरतमम् । अब्रह्मप्रत्ययः सर्वो- | विश्व अर्थात् सारा जगत् श्रेष्ठतम |
| ऽविद्यामात्रो रज्ज्वामिव सर्प- | ब्रह्म ही है । यह सम्पूर्ण अब्रह्मरूप |
| प्रत्ययः । ब्रह्मैवैकं परमार्थसत्यम् | प्रतीति रज्जुमें सर्पप्रतीतिके समान |
| इति वेदानुशासनम् ॥ ११ ॥ | अविद्यामात्र ही है । एकमात्र ब्रह्म |
| ही परमार्थ सत्य है—यह वेदका | |
| उपदेश है ॥ ११ ॥ |
इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
समाप्तमिदं द्वितीयं मुण्डकम् ।
६
तृतीय मुण्डक (प्रथम खण्ड) - द्वा सुपर्णा व सत्यमेव जयते
तृतीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
प्रकारान्तरसे ब्रह्मनिरूपण
| परा विद्योक्ता यया तदक्षरं पुरुषाख्यं सत्यमधिगम्यते । यदधिगमे हृदयग्रन्थ्यादिसंसारकारणस्यात्यन्तिकविनाशः स्यात् । तद्दर्शनोपायश्च योगो धनुराद्युपादानकल्पनयोक्तः । अथेदानीं तत्सहकारीणि सत्यादिसाधनानि वक्तव्यानीति तदर्थमुत्तरारम्भः । प्राधान्येन तत्त्वनिर्धारणं च प्रकारान्तरेण क्रियते अत्यन्तदुरवगाह्यत्वात्कृतमपि । तत्र सूत्रभूतो मन्त्रः परमार्थवस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्यते— | जिससे उस अक्षर पुरुषसंज्ञक सत्यका ज्ञान होता है उस परा विद्याका वर्णन किया गया, जिसका ज्ञान होनेपर हृदयग्रन्थि आदि संसारके कारणका आत्यन्तिक नाश हो जाता है । तथा धनुर्ग्रहण आदिकी कल्पनासे उसके साक्षात्कारके उपाय योगका भी उल्लेख किया गया । अब उसके सहकारी सत्यादि साधनोंका वर्णन करना है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । यद्यपि ऊपर तत्त्वका निश्चय किया जा चुका है तो भी अत्यन्त दुर्बोध होनेके कारण उसका प्रधानतासे दूसरी तरह फिर निश्चय किया जाता है । अतः परमार्थवस्तुको समझनेके लिये पहले इस सूत्रभूत मन्त्रका उपन्यास (उल्लेख) करते हैं— |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
समान वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षी
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥
साथ-साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी एक ही वृक्षका आश्रय करके रहते हैं । उनमें एक तो स्वादिष्ट (मधुर) पिप्पल (कर्मफल) का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है ॥ १ ॥
| द्वा द्वौ सुपर्णा सुपर्णौ शोभनपतनौ सुपर्णौ पक्षिसामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा सयुजौ सहैव सर्वदा युक्तौ सखाया सखायौ समानाख्यानौ समानाभिव्यक्तिकारणावेवंभूतौ सन्तौ समानम् अविशेषोपलब्ध्यधिष्ठानतयैकं वृक्षं वृक्षमिवोच्छेदनसामान्याच्छरीरं | [जीव और ईश्वररूप] दो सुपर्ण—सुन्दर पर्णवाले अर्थात् [नियम्य-नियामकभावकी प्राप्तिरूप] शोभन पतनवाले* अथवा पक्षियोंके समान [वृक्षपर निवास तथा फलभोग करनेवाले] होनेसे सुपर्ण—पक्षी तथा संयुज—सर्वदा साथ-साथ ही रहनेवाले और सखा यानी समान आख्यानवाले अर्थात् जिनकी अभिव्यक्तिका कारण समान है ऐसे दो सुपर्ण समान—सामान्यरूपसे [दोनोंकी] उपलब्धिका कारण होनेसे एक ही वृक्ष—वृक्षके समान उच्छेदमें समानता होनेके कारण शरीररूप |
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* ईश्वर सर्वज्ञ होनेके कारण नियामक है तथा जीव अल्पज्ञ होनेसे नियम्य है । इसलिये उनमें नियम्य-नियामकभावकी प्राप्ति उचित ही है ।
८४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३ ]
| वृक्षं परिषस्वजाते परिष्वक्त- | वृक्षपर आलिङ्गन किये हुए हैं, |
| वन्तौ सुपर्णाविवैकं वृक्षं फलोप- | अर्थात् फलोपभोगके लिये पक्षियोंके |
| भोगार्थम् । | समान एक ही वृक्षपर निवास करते हैं । |
| अयं हि वृक्ष ऊर्ध्वमूलोऽवा- | अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ |
| क्शाखोऽश्वत्थोऽव्यक्तमूलप्रभवः | सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलका आश्रय- |
| क्षेत्रसंज्ञकः सर्वप्राणिकर्मफला- | भूत यह क्षेत्रसंज्ञक अश्वत्थवृक्ष |
| श्रयस्तं परिष्वक्तौ सुपर्णाविवा- | ऊपरको मूल और नीचेकी ओर |
| विद्याकामकर्मवासनाश्रयलिङ्गो- | शाखाओंवाला है । उस वृक्षपर |
| पाध्यात्मेश्वरौ । तयोः परिष्वक्त- | अविद्या, काम, कर्म और वासनाके |
| योरन्य एकः क्षेत्रज्ञो लिङ्गो- | आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप उपाधिवाले |
| पाधिवृक्षमाश्रितः पिप्पलं कर्म- | जीव और ईश्वर दो पक्षियोंके समान |
| निष्पन्नं सुखदुःखलक्षणं फलं | आलिङ्गन किये निवास करते हैं । |
| स्वाद्वनेकविचित्रवेदनास्वादरूपं | इस प्रकार आलिङ्गन करके रहने- |
| स्वाद्वत्ति भक्षयत्युपभुङ्क्तेऽविवे- | वाले उन दोनोंमेंसे एक— |
| कतः । अनश्नन्नन्य इतर ईश्वरो | लिङ्गोपाधिरूप वृक्षको आश्रित |
| नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सर्वज्ञः | करनेवाला क्षेत्रज्ञ पिप्पल यानी |
| सर्वसत्त्वोपाधीरीश्वरो नाश्नाति । | अपने कर्मसे प्राप्त होनेवाला सुख- |
| प्रेरयिता ह्यसावुभयोर्भोज्य- | दुःखरूप फल, जो अनेक प्रकारसे विचित्र अनुभवरूप स्वादके कारण स्वादु है, खाता—भक्षण करता यानी अविवेकवश भोगता है । किन्तु अन्य—दूसरा, जो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप सर्वज्ञ मायोपाधिक ईश्वर है, उसे ग्रहण न करता हुआ नहीं भोगता । यह तो साक्षित्वरूप सत्तामात्रसे भोक्ता और |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
| भोक्त्रोर्नित्यसाक्षित्वसत्तामात्रेण । स त्वनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति पश्यत्येव केवलम् । दर्शनमात्रं हि तस्य प्रेरयितृत्वं राजवत् ॥१॥ | भोग्य दोनोंका प्रेरक ही है । अतः वह दूसरा तो फल-भोग न करके केवल देखता ही है—उसका प्रेरकत्व तो राजाके समान केवल दर्शनमात्र ही है ॥ १ ॥ |
ईश्वरदर्शनसे जीवकी शोकनिवृत्ति
| तत्रैवं सति— | अतः ऐसा होनेसे— |
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-
ऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य
महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥
[ ईश्वरके साथ ] एक ही वृक्षपर रहनेवाला जीव अपने दीन-स्वभावके कारण मोहित होकर शोक करता है । वह जिस समय [ ध्यानद्वारा ] अपनेसे विलक्षण योगिसेवित ईश्वर और उसकी महिमा [ संसार ] को देखता है उस समय शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥
| समाने वृक्षे यथोक्ते शरीरे पुरुषो भोक्ता जीवोऽविद्याकाम-कर्मफलरागादिगुरुभाराक्रान्तो-ऽलाबुरिव सामुद्रे जले निमग्नो निश्चयेन देहात्मभावमापन्नोऽयम् एवाहममुष्य पुत्रोऽस्य नप्ता कृशः | समान वृक्षपर यानी पूर्वोक्त शरीरमें अविद्या, कामना, कर्मफल और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होकर समुद्रके जलमें डूबे हुए तूँवेके समान निमग्न—निश्चयपूर्वक देहात्मभावको प्राप्त हुआ यह भोक्ता जीव 'मैं यही हूँ', 'मैं अमुकका पुत्र हूँ', 'इसका नाती हूँ', 'कृश हूँ', |
८६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३
| स्थूलो गुणवान्निर्गुणः सुखी दुःखीत्येवंप्रत्ययो नास्त्यन्योऽस्मादिति जायते म्रियते संयुज्यते वियुज्यते च सम्बन्धिबान्धवैः ।<br><br>अतोऽनीशया न कस्यचित् समर्थोऽहं पुत्रो मम विनष्टो मृता मे भार्या किं मे जीवितेनेत्येवं दीनभावोऽनीशा तया शोचति सन्तप्यते मुह्यमानोऽनेकैरनर्थप्रकारैरविवेकतया चिन्तामापद्यमानः।<br><br>स एवं प्रेततिर्यङ्मनुष्यादियोनिष्वाजवं जवीभावमापन्नः कदाचिदनेकजन्मसु शुद्धधर्मसञ्चितनिमित्ततः केनचित्परमकारुणिकेन दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्मचर्यसर्वत्यागशमदमादिसम्पन्नः समाहितात्मा सन् जुष्टं सेवितमनेकैर्योगाग्मैः | 'स्थूल हूँ', 'गुणवान् हूँ', 'गुणहीन हूँ', 'सुखी हूँ', 'दुःखी हूँ' इत्यादि प्रकारके प्रत्ययोंवाला होनेसे तथा 'इस देहसे भिन्न और कुछ नहीं है' ऐसा समझनेके कारण उत्पन्न होता, मरता एवं अपने सम्बन्धियोंसे मिलता और बिछुड़ता रहता है।<br><br>अतः अनीशावश—'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया और स्त्री भी मर गयी, अब मेरे जीवनसे क्या लाभ है ?'—इस प्रकारके दीनभावको अनीशा कहते हैं, उससे युक्त होकर अविवेकवश अनेकों अनर्थमय प्रकारोंसे मोहित अर्थात् आन्तरिक चिन्ताको प्राप्त हुआ वह शोक यानी सन्ताप करता रहता है।<br><br>इस प्रकार प्रेत, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें निरन्तर लघुताको प्राप्त हुआ वह जिस समय अनेकों जन्मोंमें कभी अपने शुद्ध धर्मके सञ्चयके कारण किसी परम कारुणिक गुरुके द्वारा योगमार्ग दिखलाये जानेपर अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, सर्वत्याग और शम-दमादि-से सम्पन्न तथा समाहितचित्त होकर ध्यान करनेपर अनेकों योगमार्गों और |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| कर्मभिश्च यदा यस्मिन्काले पश्यति ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणाद्विलक्षणमीशमसंसारिणम् अशनायापिपासाशोकमोहजरामृत्यतीतमीशं सर्वस्य जगतोऽयमहमस्म्यात्मा सर्वस्य समः सर्वभूतस्थो नेतरोऽविद्याजनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मेति विभूतिं महिमानं च जगद्रूपम् अस्यैव मम परमेश्वरस्येति यदैवं द्रष्टा तदा वीतशोको भवति सर्वस्माच्छोकसागराद्विप्रमुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः ॥ २ ॥ | कर्मोंद्वारा सेवित अन्य—वृक्षरूप उपाधिसे विलक्षण ईश्वर यानी भूख, प्यास, शोक, मोह और जरा-मृत्यु आदिसे अतीत संसारधर्मशून्य सम्पूर्ण जगत्के स्वामीको 'मैं यह सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सबके लिये समान आत्मा ही हूँ, अविद्याजनित उपाधिसे परिच्छिन्न दूसरा मायात्मा नहीं हूँ' इस प्रकार देखता है तथा उसकी महिमा यानी जगत्रूप विभूतिको 'यह इस परमेश्वरस्वरूप मेरी ही है' इस प्रकार [जानता है] उस समय वह शोकरहित हो जाता है—सम्पूर्ण शोकसागरसे मुक्त हो जाता है अर्थात् कृतकृत्य हो जाता है ॥२॥ |
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| अन्योऽपि मन्त्र इममेवार्थमाह सविस्तरम्— | दूसरा मन्त्र भी इसी बातको विस्तारपूर्वक बतलाता है— |
यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं
कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय
निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥
जिस समय द्रष्टा सुवर्णवर्ण और ब्रह्माके भी उत्पत्तिस्थान उस जगत्कर्ता ईश्वर पुरुषको देखता है उस समय वह विद्वान् पाप-पुण्य दोनोंको त्यागकर निर्मल हो अत्यन्त समताको प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥
८८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३
| यदा यस्मिन्काले पश्यः पश्यतीति विद्वान्साधक इत्यर्थः। पश्यते पश्यति पूर्ववद्रुक्मवर्णं स्वयंज्योतिःस्वभावं रुक्मस्येव वा ज्योतिरस्याविनाशि कर्तारं सर्वस्य जगत ईशं पुरुषं ब्रह्मयोनिं ब्रह्म च तयोनिश्चासौ ब्रह्मयोनिस्तं ब्रह्मयोनिं ब्रह्मणो वापरस्य योनिं स यदा चैवं पश्यति तदा स विद्वान्पश्यः पुण्यपापे बन्धनभूते कर्मणी समूले विधूय निरस्य दग्ध्वा निरञ्जनो निर्लेपो विगतक्लेशः परमं प्रकृष्टं निरतिशयं साम्यं समतामद्वयलक्षणं द्वैतविषयाणि साम्यान्यतोऽर्वाञ्च्येवातोऽद्वयलक्षणमेतत्परमं साम्यमुपैति प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥ | जिस समय देखनेवाला होनेके कारण पश्य—द्रष्टा विद्वान् अर्थात् साधक रुक्मवर्ण—स्वयंप्रकाशस्वरूप अथवा सुवर्णके समान जिसका प्रकाश अविनाशी है उस सकल जगत्कर्ता ईश्वर पुरुष ब्रह्मयोनिको—जो ब्रह्म है और योनि भी है अथवा जो अपर ब्रह्म (ब्रह्मा) की योनि है उस ब्रह्मयोनिको इस प्रकार पूर्ववत् देखता है उस समय वह विद्वान् द्रष्टा पुण्य-पाप यानी अपने बन्धनभूत कर्मोंको समूल त्यागकर—भस्म करके निरञ्जन—निर्लेप अर्थात् क्लेशरहित होकर अद्वयरूप परम—उत्कृष्ट यानी निरतिशय समताको प्राप्त हो जाता है । द्वैतविषयक समता इस अद्वैतरूप साम्यसे निकृष्ट ही है; अतः वह अद्वैतरूप परम साम्यको प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥ |
श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञ
किं च— । तथा—
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति
विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा-
नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
यह, जो सम्पूर्ण भूतोंके रूपमें भासमान हो रहा है प्राण है। इसे जानकर विद्वान् अतिवादी नहीं होता। यह आत्मामें क्रीडा करनेवाला और आत्मामें ही रमण करनेवाला क्रियावान् पुरुष ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठतम है ॥ ४ ॥
| योऽयं प्राणस्य प्राणः पर ईश्वरो ह्येष प्रकृतः सर्वैर्भूतैर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तैः, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया, सर्वभूतस्थः सर्वात्मा सन्नित्यर्थः, विभाति विविधं दीप्यते । एवं सर्वभूतस्थं यः साक्षादात्मभावेनायमहमस्मीति विजानन्विद्वान्नवाक्यार्थज्ञानमात्रेण स भवते भवति न भवतीत्येतत् किमतिवाद्यतीत्य सर्वानन्यान वदितुं शीलमस्येत्यतिवादी । | यह जो प्राणका प्राण परमेश्वर है वह प्रकृत [परमात्मा] ही सम्पूर्ण भूतों—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियोंके द्वारा अर्थात् सर्वभूतस्थ सर्वात्मा होकर विभासित यानी विविध प्रकारसे देदीप्यमान हो रहा है। 'सर्वभूतैः' इस पदमें इत्थंभूतलक्षणा तृतीया* है। इस प्रकार जो विद्वान् उस सर्वभूतस्थ प्राणको 'मैं यही हूँ' ऐसा साक्षात् आत्मस्वरूपसे जाननेवाला है वह उस वाक्यके अर्थज्ञानमात्रसे भी नहीं होता। क्या नहीं होता ? [इसपर कहते हैं—] अतिवादी नहीं होता। जिसका स्वभाव और सबको अतिक्रमण करके बोलनेका होता है उसे अतिवादी कहते हैं। |
* इत्थंभूतलक्षणे (२।३।२१) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ तृतीया विभक्ति हुई है। किसी प्रकारकी विशेषताको प्राप्त हुई वस्तुको जो लक्षित कराता है
| ९० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक ३ |
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| यस्त्वेवं साक्षादात्मानं प्राणस्य प्राण विद्दानतिवादी स न भवतीत्यर्थः । सर्वं यदात्मैव नान्यदस्तीति दृष्टं तदा किं ह्यसावतीत्य वदेत् । यस्य त्यपरम् अन्यदृष्टमस्ति स तदतीत्य वदति । अयं तु विद्वानात्मनोऽन्यन्न पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । अतो नातिवदति । | तात्पर्य यह कि जो इस प्रकार प्राणके प्राण साक्षात् आत्माको जाननेवाला है वह अतिवादी नहीं होता । जब कि उसने यह देखा है कि सब आत्मा ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है तब वह किसका अतिक्रमण करके बोलेगा ? जिसकी दृष्टिमें कुछ और दीखनेवाला पदार्थ है वही उसका अतिक्रमण करके बोलता है । किन्तु यह विद्वान् तो आत्मासे भिन्न न कुछ देखता है, न सुनता है और न कुछ जानता ही है । इसलिये यह अतिवादन भी नहीं करता । | | किं चात्मक्रीड आत्मन्येव च क्रीडा क्रीडनं यस्य नान्यत्र पुत्रदारादिषु स आत्मक्रीडः। तथात्मरतिरात्मन्येव च रती रमणं प्रीतिर्यस्य स आत्मरतिः । क्रीडा बाह्यसाधनसापेक्षा, रतिस्तु | यही नहीं, वह [आत्मक्रीड, आत्मरति और क्रियावान् हो जाता है।] आत्मक्रीड—जिसकी आत्मामें ही क्रीडा हो, अन्य स्त्री-पुत्रादिमें न हो उसे आत्मक्रीड कहते हैं; तथा जिसकी आत्मामें ही रति— रमण यानी प्रीति हो वह आत्मरति कहलाता है । क्रीडा बाह्य साधनकी अपेक्षा रखनेवाली होती है और |
वह 'इत्थंभूतलक्षण' कहलाता है; उसमें तृतीया विभक्ति होती है । जैसे 'जटाभिस्तापसः' ( जटाओंसे तपस्वी है ) इस वाक्यमें जटाओंके द्वारा तपस्वी होना लक्षित होता है; अतः 'जटा' में तृतीया विभक्ति है । इसी प्रकार 'सर्वभूत' शब्दसे ईश्वरका सब भूतोंमें स्थित होना लक्षित होता है ।
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१ |
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| साधननिरपेक्षा बाह्यविषयप्रीतिमात्रमिति विशेषः । तथा क्रियावाञ्ज्ञानध्यानवैराग्यादिक्रिया यस्य सोऽयं क्रियावान् । समासपाठ आत्मरतिरेव क्रियास्य विद्यत इति बहुव्रीहिमत्वर्थयोरन्यतरोऽतिरिच्यते । | रति साधनकी अपेक्षा न करके बाह्य विषयकी प्रीतिमात्रको कहते हैं—यही इन दोनोंमें विशेषता (अन्तर) है । तथा क्रियावान् अर्थात् जिसकी ज्ञान, ध्यान एवं वैराग्यादि क्रियाएँ हों उसे क्रियावान् कहते हैं । किन्तु ['आत्मरति-क्रियावान्' ऐसा] समासयुक्त पाठ होनेपर 'आत्मरति ही जिसकी क्रिया है' [ऐसा अर्थ होनेसे] बहुव्रीहि समास और 'मतुप्' प्रत्ययका अर्थ—इन दोनोंमेंसे एक (मतुप् प्रत्ययका अर्थ) अधिक हो जाता है । |
| केचित्त्वग्निहोत्रादिकर्मब्रह्मविद्ययोः समुच्चयार्थमिच्छन्ति । <br>(समुच्चयवादिमत-खण्डनम्) <br>तच्चैष ब्रह्मविदां वरिष्ठ इत्यनेन मुख्यार्थवचनेन विरुध्यते । न हि बाह्यक्रियावानात्मक्रीड आत्मरतिश्च भवितुं शक्तः, कश्चिद्वाह्यक्रियाविनिवृत्तो ह्यात्मक्रीडो भवति बाह्यक्रियात्मक्रीडयोर्विरोधात् । न हि तमःप्रकाशयोर्युगपदेकत्र स्थितिः संभवति । | कोई-कोई (समुच्चयवादी) तो [आत्मरति और क्रियावान् इन दोनों विशेषणोंको] अग्निहोत्रादि कर्म और ब्रह्मविद्याके समुच्चयके लिये समझते हैं । किन्तु उनका यह अभिप्राय 'ब्रह्मविदां वरिष्ठः' इस मुख्यार्थवाची कथनसे विरुद्ध है । बाह्यक्रियावान् पुरुष आत्मक्रीड और आत्मरति हो ही नहीं सकता । कोई भी पुरुष कभी-न-कभी बाह्य क्रियासे निवृत्त होकर ही आत्मक्रीड हो सकता है, क्योंकि बाह्य क्रिया और आत्मक्रीडाका परस्पर विरोध है । अन्धकार और प्रकाशकी एक स्थानपर एक ही समय स्थिति हो ही नहीं सकती । |
९२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३
| . तस्मादसत्प्रलपितमेवैतदनेन ज्ञानकर्मसमुच्चयप्रतिपादनम् । "अन्या वाचो विमुञ्चथ" (मु० उ० २।२।५) "संन्यासयोगात्" (मु० उ० ३।२।६) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । तस्मादयम् एवेह क्रियावान्यो ज्ञानध्यानादि-क्रियावानसंभिन्नार्यमर्यादः संन्यासी । य एवंलक्षणो नातिवाद्यात्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावान्ब्रह्मनिष्ठः स ब्रह्मविदां सर्वेषां वरिष्ठः प्रधानः ॥ ४ ॥ | अतः इस वचनके द्वारा यह ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन मिथ्या प्रलाप ही है। यही बात "अन्या वाचो विमुञ्चथ" "संन्यासयोगात्" इत्यादि श्रुतियोंसे भी सिद्ध होती है। अतएव इस जगह उसीको 'क्रियावान्' कहा है जो ज्ञान-ध्यानादि क्रियाओंवाला और आर्यमर्यादाका भंग न करने-वाला संन्यासी है। जो ऐसे लक्षणोंवाला अनतिवादी, आत्म-क्रीड, आत्मरति और क्रियावान् ब्रह्मनिष्ठ है वही समस्त ब्रह्मवेत्ताओं-में वरिष्ठ यानी प्रधान है ॥ ४ ॥ |
आत्मदर्शनके साधन
| अधुना सत्यादीनि भिक्षोः सम्यग्ज्ञानसहकारीणि साधनानि विधीयन्ते निवृत्तिप्रधानानि— | अब भिक्षुके लिये सम्यग्ज्ञानके सहकारी सत्य आदि निवृत्तिप्रधान साधनोंका विधान किया जाता है— |
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥
खंड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३
यह आत्मा सर्वदा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जिसे दोषहीन योगिजन देखते हैं वह ज्योतिर्मय शुभ्र आत्मा शरीरके भीतर रहता है ॥ ५ ॥
| सत्येनानृतत्यागेन मृषावदनत्यागेन लभ्यः प्राप्तव्यः । किं च तपसा हीन्द्रियमनैकाग्रतया "मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः" ( महा० शा० २५० । ४ ) इति स्मरणात् । तद्धह्यनुकूलमात्मदर्शनाभिमुखीभावात्परमं साधनं तपो नेतरच्चान्द्रायणादि । एष आत्मा लभ्य इत्यनुषङ्गः सर्वत्र । सम्यग्ज्ञानेन यथाभूतात्मदर्शनेन ब्रह्मचर्येण मैथुनासमाचारेण । नित्यं सत्येन नित्यं तपसा नित्यं सम्यग्ज्ञानेनेति सर्वत्र नित्यशब्दोऽन्तर्दीपिकान्यायेन अनुषक्तव्यः । | [ यह आत्मा ] सत्यसे अर्थात् अनृत यानी मिथ्या-भाषणके त्यागद्वारा प्राप्त किया जा सकता है । तथा "मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है" इस स्मृतिके अनुसार तप यानी इन्द्रिय और मनकी एकाग्रतासे भी [ इस आत्माकी उपलब्धि हो सकती है], क्योंकि आत्मदर्शनके अभिमुख रहनेके कारण यही तप उसका अनुकूल परम साधन है—दूसरा चान्द्रायणादि तप उसका साधन नहीं है [ इसके सिवा ] सम्यग्ज्ञान—यथार्थ आत्मदर्शन और ब्रह्मचर्य—मैथुनके त्यागसे भी नित्य अर्थात् सर्वदा [ इस आत्माकी प्राप्ति हो सकती है]; यहाँ 'एष आत्मा लभ्यः' ( इस आत्माकी प्राप्ति हो सकती है) इस वाक्यका सर्वत्र सम्बन्ध है। 'सर्वदा सत्यसे', 'सर्वदा तपसे' और 'सर्वदा सम्यग्ज्ञानसे' इस प्रकार अन्तर्दीपिकान्यायसे ( मध्यवर्ती दीपकोंके समान ) सभीके साथ 'नित्य' शब्दका सम्बन्ध लगाना चाहिये; |
९४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३
| वक्ष्यति च—"न येषु जिह्मम- | जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद्में) |
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| नृतं न माया च" (प्र० | कहेंगे भी *'जिन पुरुषोंमें अकुटिलता, |
| उ० १।१६) इति । | अनृत और माया नहीं है' इत्यादि । |
| कोऽसावात्मा य एतैः साध- | जो आत्मा इन साधनोंसे प्राप्त |
| नैर्लभ्य इत्युच्यते । अन्तःशरीरे- | किया जाता है वह कौन है— |
| ऽन्तर्मध्ये शरीरस्य पुण्डरीकाकाशे | इसपर कहा जाता है—'अन्तः- |
| ज्योतिर्मयो हि रुक्मवर्णः शुभ्रः | शरीरे' अर्थात् शरीरके भीतर |
| शुद्धो यमात्मानं पश्यन्त्युपलभन्ते | पुण्डरीकाकाशमें जो ज्योतिर्मय |
| यतयो यतनशीलाः संन्यासिनः | सुवर्णवर्ण शुभ्र यानी शुद्ध आत्मा |
| क्षीणदोषाः क्षीणक्रोधादिचित्त- | है, जिसे कि क्षीणदोष यानी |
| मलाः । स आत्मा नित्यं सत्या- | जिनके क्रोधादि मनोमल क्षीण हो |
| दिसाधनैः संन्यासिभिर्लभ्यते । | गये हैं वे यतिजन—यत्नशील |
| न कादाचित्कैः सत्यादिभिः | संन्यासीलोग देखते अर्थात् उपलब्ध |
| लभ्यते । सत्यादिसाधनस्तु- | करते हैं । तात्पर्य यह है कि वह |
| त्यर्थोऽयमर्थवादः ॥ ५ ॥ | आत्मा सर्वदा सत्यादि साधनोंसे ही |
| संन्यासियोंद्वारा प्राप्त किया जा | |
| सकता है—कभी-कभी व्यवहार | |
| किये जानेवाले सत्यादिसे प्राप्त नहीं | |
| होता । यह अर्थवाद सत्यादि | |
| साधनोंकी स्तुतिके लिये है ॥ ५ ॥ |
सत्यकी महिमा
सत्यमेव जयति नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
* इस भविष्यत्कालिक उक्तिसे विदित होता है कि उपनिषद्भाष्यके विद्यार्थियोंको प्रश्नोपनिषद्के पश्चात् मुण्डकका अध्ययन करना चाहिये ।