भारतकोश
संग्रह पर लौटें

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

१५४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सत्जन या सन्त कहते हैं। तथा इनमें जो भक्तिमयी उत्कृष्ट वृत्ति सर्वात्मना अपने इष्ट परमात्मा में पराकाष्ठा तक पहुँच जाती हो वही भक्ति की पराकाष्ठा रूप सद्वृत्ति हैं। संत आचार्यों को समान, अपने आराध्य देव के समान, माता और पिता के समान, अपने विश्वस्त मित्र की तरह, अपने स्वामी के समान तथा अपने शासक नृप के समान देखते हुए उनके अनुरूप प्रीति रखना चाहिए॥५३-५५॥ श्रुत्वैव सहसोत्थानम्प्रत्युत्थानं सुदूरतः । दर्शनानुभवप्रीतिः प्रणिपातोऽभिवादनम् ॥५६॥ इनके आगमन को सुनते ही बिना किसी विलम्ब के अपने स्थान से उठ जाना चाहिए तथा दूर तक आगे चलकर इनकी अगवानी करना चाहिए, इनके दर्शन के साथ अपनी प्रीति का अनुभव तथा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार अथवा अभिवादन करना चाहिए॥५६॥ नीचैः संश्लेषणं हस्तदानं मार्गप्रदर्शनम् । पश्चात्पार्श्वपुरोयानञ्जयालोकाभिभाषणम् ॥५७॥ झुककर विनयपूर्वक उनके हाथ को लेते हुए किसी बात को बतलाना चाहिए तथा बाद में उनकी बाजू से आगे चलकर उनकी जय का उद्घोषण आदि करना चाहिए॥५७॥ गृहोपनयनञ्चान्तर्देशक्रमणमासनम् । पादावनेजनञ्चार्घ्योपहारः स्वागतादि च ॥५८॥ उन्हें अपने निवास पर लाना चाहिए तथा घर के सभी कक्षादि स्थानों पर उन्हें ले जाना चाहिए तथा योग्य आसन पर उन्हें बिठाकर उनके पादप्रक्षालन, अर्घ्योपहार तथा स्वागतादि प्रस्तुत करना चाहिए॥५८॥ प्रसादनं क्षमापणञ्च प्रीतिसङ्कथनानि च । उपासनं प्रश्रयणमात्मात्मीय निवेदनम् ॥५९॥ उनके प्रसादन हेतु प्रसीद जैसे शब्दों का कथन विनयपूर्वक करना चाहिए तथा क्षमा प्रार्थना कर प्रीतिपूर्वक संभाषण करना चाहिए, उनके समीप ही स्वयं को बैठना, विनय तथा आत्मीयभाव का निवेदन करना चाहिए॥५९॥ आज्ञाम्यर्थनमालोकनिर्देशवचनादरः । साधनं सम्पदादिष्टादरोऽनिष्टनिवर्तनम् ॥६०॥ किसी कार्य के होने पर उनसे आज्ञा कीजिये कहना, उनके द्वारा देखने आने पर उनके आज्ञा वचनों पर आदर करते हुए उनके लिये शाकफलादि भोजनयोग्य सामग्री का पकाना आदि कार्य के साथ ( इष्ट आदर तथा उसी से अपना अनिष्ट का

निवारण बतलाना चाहिए)॥६०॥ विरहानर्थपीडावमाननाद्यसहिष्णुता । दास्याभिमानोऽनुव्रज्या श्रवणं कीर्तनं स्मृतिः ॥६१॥ भक्तिज्ञानसमाचारवैराग्याद्यनुमोदनम् । सङ्गेच्छोपगमनमन्वक्स्थानासनादिकम् ॥६२॥ उनके विरुद्ध की, उनकी अर्थहानि की, उनकी पीड़ा की, उनके किसी द्वेषी जन द्वारा किये गये तिरस्कार की असहिष्णुता का निवेदन करना चाहिए तथा उनके दास्य का अपना निश्चय तथा उसका अभिमान बतला कर उसके अनुगमन, उनके योगक्षेम तथा गुणों का श्रवण, स्वयं उनकी बातों का तथा नामादि का उल्लेख कर बात करना तथा उनकी पिछले गौरव का स्मरण करना, उनके द्वारा आचरित या बुद्ध भक्ति, ज्ञान का तथा वैराग्यमय आचारादि का अनुमोदन करना, उन्हीं के उद्देश्य से उनके समीप जाना तथा उनके पीछे स्थित होना, बैठना आदि करना चाहिए॥६१-६२॥ समानसुखदुःखत्वं मिथश्चार्थ-विचिन्तनम् । क्रियाकाले तु वरणं सदस्याग्रे तु पूजनम् ॥६३॥ परिषत्सु च सान्निध्यं संविदाञ्च प्रवर्तनम् । तथास्यानुज्ञापूर्वञ्च सर्वार्थेषु प्रवृत्तयः ॥६४॥ उनके सुख तथा दुःखों में अपनी समान स्थिति निदर्शित करना, परस्पर किसी शास्त्रादि अर्थ पर विचार करना (या उसमें सहयोग करना) स्वयं के यज्ञादि अनुष्ठानों के सम्पादन में उनका योग्य स्थिति में वरण करना, श्रेष्ठ सदस्य के रूप में उनकी अनुरूप अर्चना, परिषद् या सभा में उनके समीप रहना, उनकी किसी शास्त्रादि प्रतिज्ञा के होने पर उनका विषयादि प्रवर्तन करना तथा सभी अपेक्षित कार्यों में उनकी आदेशमयी अनुज्ञा के अनुरूप कार्यों का सम्पादन करना॥६३-६४॥ प्रच्छादनञ्च दोषाणां गुणानां ख्यापनन्तथा । क्वचिच्चैवाप्यधर्मेण कृच्छ्रेणाप्यर्थसाधनम् ॥६५॥ एताश्चान्याश्च विविधा वृत्तयो रसनिर्भराः । विष्णुभक्तेषु वृत्त्याख्यतरोर्हि फलसम्पदः ॥६६॥ उनके स्खलन या दोषों का प्रच्छादन करना तथा गुणों का प्रख्यापन करना तथा आवश्यक होने पर किसी अवसर पर कष्ट के उपस्थित हो जाने पर किसी अधर्म की भी किञ्चिद् वृत्ति का आश्रय लेकर उद्दिष्ट अर्थ साधन कर लेना। ये सभी तथा इन्हीं के

१५६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता समान कुछ दूसरी भी भक्ति से प्रेरित तथा संचालित वृत्तियां है जिनकी प्रवृत्ति रखी जाए। ये ही विष्णु भक्तों में वृत्तिनामक वृक्ष की रसपूर्ण फलवृत्ति या सम्पत्ति कहलाती है॥६५-६६॥ सतामाचार्यमुख्यानामपचाराः पृथग्विधाः । असतामिव संसर्गात्ससूलफलनाशनाः ॥६७॥ सन्तभूत वैष्णव तथा आचार्यों के विषय में होनेवाले अपचारों को अलग रूपवाले समझना चाहिए जो असज्जन के संसर्गवत् मूलसहित फल के विघातक होते हैं॥६७॥ दास्यामृतरसास्वादतृर्षादत्यन्तमेशितुः । वैरस्येन विरुद्धानां हानं वैराग्यमुच्यते ॥६८॥ परमेश्वर श्रीहरि के दास्यरूप अमृत के आस्वादन की तृष्णा के कारण अत्यन्त विरस लगने वाले संसार के त्याग करनेवाला तथा संसार को विघ्न माननेवाला भाव 'वैराग्य' कहलाता है॥६८॥ श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण स्मृतिभिस्तत्वदर्शिभिः । दर्शितान्यर्थतत्वानि न हि मन्दधियो विदुः ॥६९॥ ब्रह्मरुद्रमुखा देवा विविधाश्च महर्षयः । मनुष्या नागयक्षाश्च सिद्धविद्याधरास्तथा ॥७०॥ तत्तत्कार्योपपत्त्यर्थ शासनाच्च जगत्पतेः । रजस्तमोऽभिभूत्या च जगुः शास्त्राण्यनेकंशः ॥७१॥ विपरीतार्थतत्वानि क्षुद्रनानाफलानि च । अपवर्गकथावन्ति मोहनान्यद्भुतानि च ॥७२॥ तत्वदर्शीजन के द्वारा वेदादि, पञ्चरात्र, स्मृति, पुराण तथा इतिहासादि के द्वारा दृष्टितत्व या अपेक्षित अर्थों का तात्विक रूप दिखलाया गया है परन्तु उसे मन्दबुद्धि जन तात्विकरस में समझने में अक्षम हैं। अतएव जगत्पति श्रीविष्णु के निदेश के कारण ब्रह्मा तथा रुद्र आदि देवों ने तथा अनेक विभिन्न मतों वाले महर्षिगण ने, मनुष्य, नाग, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर आदि ने अपेक्षित अनेक कार्यों तथा प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिये तथा रजोगुण एवं तमोगुण से अभिभूत क्रियाओं से युक्त अनेक उपाय भूत ऐसे तन्त्रादि शास्त्रों का कथन किया जिनमें वास्तविकता से परे विपरीत अर्थ तथा तत्वों का मिश्रण भरा हुआ है तथा जिनके लिये अनेक छोटे छोटे उद्देश्यों की पूर्ति देनेवाले फल हैं तथा जिनमें मोक्ष प्राप्ति तक की बाते कहीं हुई हैं, ऐसे अद्भुत एवं बुद्धि को मोहित करनेवाले विवरण या अर्थ उनमें कहे गये हैं॥६९-७२॥

हिन्दीटीकासहित १५७ अपरेषामपि पुनस्तत्तन्मार्गानुसारिणाम् । धर्मवादच्छलोपेता ये च स्युर्ग्रन्थविस्तराः ॥७३॥ हरेरालोकहीनानामद्यापि किल पश्यत । तेषु तेष्ववगाहेन भवन्ति ज्ञानविप्लवाः ॥७४॥ इसके अतिरिक्त कुछ अन्य हैरण्यगर्भ, पशुपत आदि आगमों के जो पूर्वकथित शास्त्रों से भिन्न हैं तथा ये धर्मवाद के छलों से भरे हुए हैं। इनके समान ही अन्य जो ग्रन्थ तथा उनके तात्विक विस्तार मूलक ग्रन्थ है वे भी धर्मवाद का भ्रम उत्पन्न करनेवाले हैं। ये सभी श्रीविष्णु के तात्विक ज्ञानमय प्रकाश से रहित हैं जिन पर श्रीहरि की दृष्टि नहीं तथा ऐसे अनेक प्रबन्ध ग्रन्थ तथा उनके विस्तार से तात्पर्य दिखलाने वाले प्रबन्धों के अनुशीलन करने से ज्ञान का विप्लव होता है यह तत्व ध्यान देने योग्य हैं॥७३-७४॥ वेदानां सोपनिषदां पौरुषेयत्वचिन्तनम् । पञ्चरात्रे च सकले तन्त्रान्तरसमत्वधीः ॥७५॥ ऐसे ग्रन्थों तथा प्रबन्धादि में उपनिषद् के सहित सभी वेदों को पौरुषेय प्रतिपादित करने की मति या तर्कादि दिये गये हैं। समग्र पञ्चरात्र जैसे आगम या तन्त्र को इसी आधार पर अन्य तन्त्रोंकी समान कोटि में रखकर उनके समान रूप से मानने की बुद्धि होती है॥७५॥ वृद्धानाञ्चैव मुक्तानां नित्यानाञ्च तथात्मनाम् । अच्युतादन्यशेषत्वशङ्का च समताभ्रमः ॥७६॥ जिन शिवादि देवों में अच्युत श्रीनारायण की समता बुद्धि आ जाती है तथा वृद्ध, मुक्त तथा नित्यभूत जीवों की अन्य शेष के समान स्थिति की आशंका को दिखलाकर जहाँ समता कही है॥७६॥ तस्य चान्येशितव्यत्वबुद्धिर्विश्वपृथक्त्वधीः । विभूति-गुण-रूपादि विशेषविरहभ्रमः ॥७७॥ और इस प्रकार उन श्रीनारायण का अन्य इष्टदेव के समान ही महत्व तथा ज्ञान को दिया जाता है तथा उनकी विभूति, गुण तथा रूपादि विशेष से रहित तत्व से विश्व से अपृथत्व की बुद्धि दिखलाकर भ्रम उत्पन्न किया जाता है॥७७॥ अन्यतो जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयचिन्तनम् । योगानाञ्चैव सर्वेषां नित्यादेः कर्मणस्तथा ॥७८॥ ज्ञान-भक्त्यङ्ग-सत्सेवा तत्वानां चाविचिन्तनम् । विरुद्धानाञ्च सर्वेषामपायत्वविमर्शनम् ॥७९॥

१५८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथाऽनादेरविद्यायाः स्वरूपस्यानिरूपणम् । हरेरालोकनान्तायास्तस्याश्चान्यनिवर्त्य-धीः ॥८०॥ फलानां चान्यतः प्राप्तिश्चिन्ता निःश्रेयसस्य च । हरेः कैङ्कर्य सम्प्राप्तिर्व्यतिरिक्तामृतत्वधीः ॥८१॥ विशेषेणाप्यनर्थेषु देहादिष्वर्थतामतिः । इत्यादयो बहुविधा महापापाः कुदृष्टयः ॥८२॥ जगत् की उत्पत्ति आदि का श्रीनारायण के अतिरिक्त किसी अन्य से निरूपण करना तथा सभी कर्म, ज्ञान तथा भक्ति योगों का तथा नित्यादि पदार्थों तथा कर्मों एवं नैमित्तिक कर्मों का भी इसी प्रकार नारायण से भिन्न उपादान के रूपों में चिन्तन करना तथा दान या दृष्टि, शंख चक्रादि अंकों, सत्सेवा आदि के तत्वों की विचिन्तना से दूर हट जाना और सभी विरोधी उपायों, तत्वों (दृष्टि, अंक, सत्सेवा के विरुद्ध उपायों का जैसे महत् तत्व आदि का स्वरूपादि विचार करना। इसी प्रकार अनादि माया स्वरूप अविद्या का स्वरूपगत विचार न करना तथा उसी अविद्या की श्रीहरि के दर्शन या प्राप्ति के बाद निवृत्ति होने की स्थिति को न मानकर किसी अन्य उपाय से निवृत्ति का ज्ञान रखना। इसी प्रकार मोक्षरूप फल की श्रीहरि के अतिरिक्त किसी दूसरी विधि से प्राप्ति मानना और श्रीहरि के दासभाव की प्राप्ति से भिन्न अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्ति की स्थिति का चिन्तन करना या उसे मानना। ये सभी तथा इनके अतिरिक्त देहादि स्थूल पदार्थों में विशेषरूप में आत्मत्व की निष्ठा बुद्धि रखना आदि ये अनेक प्रकार के कुदृष्टि रूप महाघातक हैं जो भ्रमोत्पादक तथा श्रीहरि की भक्ति में बाधक हैं॥७८॥ हरेः प्रियतमं ज्ञानं सन्तो ज्ञानधना ह्यतः । तथैव चापचाराणां काष्ठा ज्ञानविपर्ययः ॥८३॥ अतएव श्रीहरि को एक तो सत् दृष्टि वाला ज्ञान तथा इस ज्ञान के रखने वाले सन्त ही प्रिय हैं। इसी प्रकार अपकारों की पराकाष्ठा (अधिक प्रमाण में आचरण होते रहना) इस ज्ञान की विरोधी स्थिति होती है (जो हेय है)॥८३॥ ज्ञानस्य कर्मणा गुप्तिर्हतं ज्ञानमकर्मणा । प्रवृत्त्या प्रतिषिद्धेषु ज्ञानं कर्म च नश्यति ॥८४॥ सत् ज्ञान का संरक्षण विहित कर्म के द्वारा होता है तथा कर्मों के आचरण न करने पर ज्ञान का भी हनन हो जाता है, क्योंकि यदि प्रवृत्ति इनमें अवरुद्ध हो जाए तो उनमें कर्म तथा सत्ज्ञान का भी विनाश हो जाता हैं॥८४॥

हिन्दीटीकासहित १५९ अचिन्ता च विनिन्दा च मतिपूर्वञ्च वर्जनम् । विहितानाञ्च धर्माणां सर्वज्ञात्मावघातकम् ॥८५॥ स्वरूपस्य विनाशाय रुचिर्निन्द्येषु कर्मसु । विषयेषु च सर्वेषु लौल्यं विष-मधु-स्पृहा ॥८६॥ विष्णोर्विद्वेषयुक्तस्य वैमुख्यं प्रतिपत्तिषु । प्रवृत्तिश्चापचारेषु सम्यगात्मविनाशनम् ॥८७॥ इसलिए वास्तविक तत्वों का चिन्तन न करना, ऐसी धर्मादि प्रवृत्ति की निन्दा या तर्कादि के सहारे से ऐसे तत्वों का बुद्धिपूर्वक प्रतिरोध करना तथा विहित धर्म तथा कर्माचरणों का ऐसी सर्वत्र आत्स्या से विघात करना उसके स्वरूप के नाश करनेवाला है। इसी प्रकार जो निन्द्य (त्याज्य) कर्मों में रुचि रखना तथा सभी विषयादि में रुचि तथा लौल्य वृत्ति रखना विषपूर्ण मधु की स्पृहा के करने जैसी विघातक होती है। इसके अतिरिक्त जो श्रीनारायण के प्रति द्वेषभाव या अनास्था से युक्त है तथा इनके सम्यक् ज्ञान से जो विमुख है, जो दोषों या अपचारों में स्वार्थवश प्रवृत्ति रख रहा हो तो ये सभी कार्य आत्मविनाशक होते हैं॥८५-८७॥ अन्य-तान्त्रिकदेवानां संसर्गप्रतिपत्तिषु । प्रवृत्तिरच्युतैकान्त्यनियमाध्वरनाशिनी ॥८८॥ इसी प्रकार अन्य तन्त्रादि में निर्दिष्ट उपास्य देवों में निष्ठा, उनके उपासकों के साथ संसर्ग तथा उनकी आचार तथा कर्मादि विधि में ज्ञान तथा ज्ञानपूर्वक प्रवृत्ति रखना ये सभी कार्य श्रीनारायण के अनन्यभाव (एकात्य) के नियमरूप यज्ञ को विनाश करनेवाले कहे गये हैं॥८८॥ लक्षणानि हि पुष्पाणि मुकुन्दचरणार्चने । तदभावपरीभावौ प्रध्वंसनकरावुभौ ॥८९॥ शंखचक्रादि अंकनरूप लक्षणों का धारण करना श्रीहरि के चरणों में अर्पित अर्चना के पुष्प हैं तथा इनको न धारण करना या इनका तिरस्कार करना, ये दोनों कार्य श्रीनारायण के एकान्त्यभाव के विघातक हैं॥८९॥ अन्यपुण्ड्राङ्कनादीनां धारणं दृष्टिनाशनम् । परचिह्नव्रणं गात्रे भ्रंशाय नरकाय च ॥९०॥ अन्य आगमों में बतलाए हुए चिन्ह तथा पुण्ड्रादि का अंकन तथा धारण करना श्रीहरि की दृष्टि में विघातक है। अतएव दूसरे चिन्हों का शरीर पर रहना केवल व्रणमात्र है जो उसका पतन करता और नरक प्राप्ति करवाने वाला होता है॥९०॥

१६० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सतामसेवनान्नित्यमसताञ्च निषेवणात् । क्षीयन्ते चाथ नश्यन्ति ज्ञान-वैराग्य-भक्तयः ॥९१॥ सत्सेवा के भाव से प्रेरित न होकर सज्जनों (वैष्णव सन्तों) की सेवा न करने तथा अन्य सन्तभूत असन्तों के संसर्ग तथा सेवन करने से ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति क्षीण होकर बाद में नष्ट हो जाते हैं॥९१॥ महापचारो देवस्य भक्तानाम्भुवि शार्ङ्गिणः । धर्मरक्षानियुक्तानां समयस्य व्यतिक्रमः ॥९२॥ श्रीहरि नारायण देव के भक्तों का पृथ्‍वी पर अपचार या उनकी उपेक्षारूप दोष का आचरण धर्म की रक्षा से नियुक्त जन की मर्यादा का उल्लंघन होता है॥९२॥ एते चान्ये च विविधा ह्यपचाराः सुदुःसहा । वैराग्यं वर्जनं तेषां लज्जामानमदादिभिः ॥९३॥ अतएव इन बतलाये गये तथा इसी प्रकार के दूसरे उपचार असह्य होते हैं (अतएव इनका आचरण छोड़ देना ही उचित है)। इनके प्रति वैराग्य रखना उचित है तथा इनकी वर्जना है जो लज्जा, मान तथा मद आदि के द्वारा होती है॥९३॥ वृत्तेर्हि जीवितं गुप्तिः सारो वैराग्यमुच्यते । वैराग्ययुक्ता हि नरा यजन्त्यप्रच्युतान्तराः ॥९४॥ वृत्ति का निरन्तर जीवन है उसका संरक्षण करना और संरक्षण का सारभूत तत्व वैराग्य है क्योंकि वैराग्य से युक्त मनुष्य ही बिना किसी प्रयुक्ति या आपदाओं के बीच में आये निर्बाध रूप से श्रीहरि का यजन करने में समर्थ होते हैं॥९४॥ अनुज्झितक्रियायोगा ज्ञानवैराग्यशालिनी । इति भक्तिमयी वृत्तिः पुनरेव प्रपञ्चिता ॥९५॥ जिनमें कर्मयोग निरन्तर बना रहता है तथा ज्ञान और वैराग्य समृद्ध होकर प्रकाशित है ऐसी भक्तिमयी जो वृत्ति है पुनः यहां उसे हमने और भी स्पष्ट दिखला दिया है॥९५॥ इत्थं किलात्मनो न्यासाज्जातो वृत्त्याख्यपादपः । असौ फलमयः सेव्यस्तन्न चोत्पद्यते विना ॥९६॥ इस प्रकार आत्मभर के न्यासयोग से वृत्तिरूप वृक्ष जन्म प्राप्त करता है जिसे फल से सम्पन्न रूप में अवश्य सेवन करना चाहिए जिससे पुनः उत्पत्ति (जन्मादि) की प्राप्ति न हो॥९६॥

हिन्दीटीकासहित १६१ सुसूक्ष्मत्वाद्दुरापत्त्वान्महत्त्वाद् गौरवादपि । ममायं परमो धर्मः प्रोक्तः स्थित्यै पुनः पुनः ॥९७॥ अत्यन्त सूक्ष्म रहनेवाले, कष्ट से प्राप्त होनेवाले, महत्व सम्पन्न तथा गौरव पूर्ण होने के कारण मैंने इस परमतत्वभूत धर्म को बार बार इसीलिये दिखलाया कि इसकी स्थिति दृढ़ हो सके॥९७॥ वृत्तिं सन्तोऽनुभूयेमामनुरूपां हि चात्मनः । परत्र चानुमोदन्ते परमेण विपश्चिताः ॥९८॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ सज्जन सन्तजन आत्मा के अनुरूप इस वृत्ति का अनुभव करने पर उस वैकुण्ठ लोक में परमज्ञान के साथ प्रसन्नभाव से आनन्द प्राप्त करते रहेंगे॥९८॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्र की भारद्वाजसंहिता के परिशिष्टभूत चतुर्थ अध्याय की ‘तत्त्वप्रकाशिका’ नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त शुभमस्तु

नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहितास्थ-पद्यानामनुक्रमणिका पृष्ठे | पृष्ठे अङ्कितं क्वचिदप्येवं ६० | अनेनैव हि कर्माद्याः २६ अगम्यागमनं हिंसा ७० | अन्ते चैषां प्रकुर्वीत १२१ अग्नीषोमौ हि चक्राब्जौ ६० | अन्यचिह्नाङ्कितान् ७६ अग्नौ तु परमे व्योम्नि १५० | अन्यतन्त्रैकसिद्धानि ७१ अङ्गभावेन शुद्धानां ९२ | अन्यतान्त्रिकदेवानां १५९ अचिन्ता च विनिन्दा १४९ | अन्यतो जगदुत्पत्ति १५७ अजिह्वा सात्विकी १३९ | अन्यथैवाभिमन्यते ८९ अज्ञैःकुदृष्टिभि ९५ | अन्यपुण्ड्राङ्कनादीनां १५९ अतः प्रपत्तिरेवेह ४२ | अन्ये त्ववैष्णवाः सर्वे ८० अतोऽन्यत्राशु ३८ | अन्येषां त्रिदशादीनां ७२ अतो देहस्य कालु ४६ | अन्वयादपि चैकस्य ३१ अत्र केचित् परं तत्वं ८८ | अपचाराँश्च विविधान् ७३ अथ कश्चिदनुग्राह्य १३८ | अपचारे गुरूणाञ्च १२० अथ पुष्पं फलञ्चास्य १५२ | अपदिश्य पितॄन् देवान् ९५ अथ वृत्तिमिमां ८३ | अपरत्वेन चाप्येता ९२ अथ स्त्रीशूद्रसङ्कीर्णा ३७ | अपराधेषु सर्वेषु ११८ अथ स्वकर्मनिरतः ४८ | अपरीक्ष्य चिरं क्षेत्रं १३९ अथानुकूल्यमुख्या ४७ | अपरेषामपि पुन १५७ अयेह बान्धवास्तस्य ८५ | अपिचेत् सेवनपरो ९७ अथैतत् परमर्षीणां १३२ | अबुद्ध्वा परमात्मानं १२९ अथैनममरास्तत्र ८४ | अभक्तमच्युतस्यापि ८२ अथैवं ब्राह्मणो विद्वा ५३ | अभागवतसंसर्गो ४५ अथौपनिषदं चार्थं ५५ | अभीप्सन् विविधान् ३० अधिकप्रीतिरर्चाया ५० | अभ्यर्थितो जगद्धात्र्या ८५ अधिकैः सदृशैर्वापि ६६ | अयञ्च योगो वेदेपु २६ अनन्तज्ञानशक्त्यादि २७ | अयुक्सूत्रैर्व्यतीस्यूतं ६३ अनन्यरतिरव्यन्तं ४१ | अर्चादिष्वर्चयन् ४१ अनादेर्मोहकलना १४८ | अर्चिरादिकया गत्या ८४ अनादेर्वासनायोगा ३८ | अर्च्योऽर्चायां हरि १३५ अनिष्टानां निवृत्त्यर्थ ५९ | अविज्ञातार्थतत्वस्य ३० अनीश्वरोऽहमीशो १०६ | अविज्ञाय सदा शुद्धं ३८ अनुकूलेऽहर्निशुभे ११३ | अवैष्णवं न वन्देत ८२ अनुज्झित क्रियोयोगा १६० | अवैष्णवस्य भुक्तवान्नं १२० अनुज्ञाताः स्त्रियश्चैव १०७ | अवैष्णवात् स्वधर्मस्थात् ८०

हिन्दीटीकासहित १६३ पृष्ठे | पृष्ठे अवैष्णवाद्द्वैष्णवाद् वा १०१ | इत्थं किलात्मनोन्यासा १६० अवैष्णवेभ्यो यत् किञ्चित् १११ | इत्थं प्रसादाद्देवर्षे ८६ अशक्तमपि च स्मर्तु ८३ | इत्थं वर्णाश्रमादीनां १५० अशुद्धा ब्रह्मरुद्राद्या ९१ | इत्येतत परमं गुह्यं ८६ अशुभं रुक्षमासक्तं ७६ | इत्येतत् सकलं काण्डं १५२ अष्टमात् षोडशाब्दाद् वा १०० | इत्यैतैर्लक्षणैर्युक्ता ९४ अष्टोत्तरशतावृत्त्या १२१ | इत्येवं शान्तयः प्रोक्ता १२३ असच्छास्त्राभियोगे तु १२० | इह श्रुत्यादिनियता ३९ असतः प्रतिगृह्णीयात् ११९ | इहैव फलरूपाया १४८ असतां गुणकर्माणि ८३ | ईशभक्तिफलोपाया ८९ असद्दृष्टिं परिहरेत् ५० | ईशे न्यस्तभराणां हि १३२ अस्वन्त्र्नाः सदा नार्यः १३४ | उक्तान्येतानि कर्माणि ८३ अहमस्मि तवैवेति २७ | उच्चैस्तरोदति विपुलो १४६ आचार्यप्रमुखान्नित्यं १२४ | उपवीतं सदा ब्राह्म ७८ आचार्यवद्दैवतवान् १५३ | उपवेश्याथ देवेशं ११० आचार्यश्रोपसन्नाय ३७ | उपासनाविधौ धर्मा ८५ आचार्यायाहरेदर्थान् ६३ | उपासितगुरोर्वर्ष १०८ आचार्योऽपि तथा शिष्यं ६६ | उपास्य वैष्णवान्नित्यं ११५ आज्ञामभ्यर्थनमालोक १५४ | उपेत्यायतनं विष्णो ५७ आतिष्ठेत् पारमैकान्त्य १२४ | ऊर्ध्वपुण्ड्रं ललाटे तु ६२ आत्मनो ह्यतिनीचस्य ६५ | ऊर्ध्वपुण्ड्रान्तरालस्याँ १०० आत्मानं निक्षिपति २९ | ऊनधीः समताशङ्का ४५ आत्यन्तिकमनिष्टानां २७ | ऋचा दक्षिणतः कुर्या १०८ आदिष्टा एव चान्यार्चा १४३ | ऋजूनि स्फुटपार्श्वानि ६१ आदिष्टा पुण्ड्रमन्त्रार्चा १४३ | ऋद्ध्या समृद्ध्या कीर्त्या १२३ आदौ गुरूणां विज्ञान १४६ | एकदेशयुतोऽप्यन्य ११७ आनन्त्याच्चतुरो १२२ | एकस्यापि हि धर्मस्य १०४ आनुकूल्यस्य संसर्गा ४३ | एकां पुनश्च सर्वेण १०९ आप्लुतः सम्मितालाप ८४ | एकान्ती शक्तितः कुर्वन् ४५ आब्रह्मलोकाल्लोकानां १०६ | एकायना व्रजन्तोऽपि १२८ आमा ह्यतप्ततनवः १०० | एकायने ह्यधिकृता १२७ आरम्भे कर्मणां सिद्धयै १०४ | एकैकं वापि नैकान्ती ९३ आर्त्तानामाशुफलदा २१ | एतानन्यांश्च विविधा ४६ आसनेषु यथाकामं १२१ | एताश्चान्याश्च विविधा १५५ इच्छाप्रकृत्यनुगुणे ६४ | एते चान्ये च विविधा १६० इति भागवतस्योक्ताः ४६ | एवं गदा धनुः खड्गं १०९ इति संस्कारसम्पन्नः १२३ | एवं चतुर्विधामेनां ४४ इति हस्तपदे सांख्यं ८६ | एवं नित्यानि कर्माणि ५३ इतिहासपुराणज्ञः १०२ | एवं विद्वानेकदापि १३६

१६४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे एवं विधस्वधर्मेण १०६ | गुणासहास्त्यजन्त्यार्या- १४० एवं स्वकर्मणि ज्ञाने ६७ | गुरुणा योऽभिमन्येत- ३२ एषां नामानि रूपाणि १११ | गुरुरस्य परं स्थैर्य- १३८ एषा च त्रिविधा ज्ञेया २९ | गुरुंस्तदर्चान् शिष्यान्- १२३ ऐच्छञ्च नियतञ्चेति १२८ | गुरूणामन्तिमतिथौ- ८५ करणे प्रतिषिद्धानां ११९ | गुरोरपह्नवात् त्यागात्- ७९ करिष्यन् वैष्णव नाम ११२ | गुरोश्च पत्नीपुत्रादि- ६६ करेण स्पर्शयन् गात्रं ३६ | गृहे यस्यान्यदेवार्चा- ७४ कर्म ज्ञानञ्च भक्तिश्च १०५ | गृहोपनयनश्वान्त- १५४ कल्पिताः कर्मबन्धेन १२५ | चक्राम्बुजगदाशार्ङ्ग- ७५ कामं मतानि चान्येषां ७३ | चतुरो वासुदेवादीन्- १२२ कामं लोकप्रमाणस्य- ३२ | चतुर्भुजमुदाराङ्गं- ५७ किमप्यत्राभिजायन्ते- ३४ | चतुष्टयी महाशान्ति- ११८ कुदृष्टयो बहुविधा- १४२ | छन्दांसि सरहस्यानि- ७१ कुदृष्टिकल्पितान् देवा- १२३ | ज्ञानं ज्ञेयञ्च तत्वेन- ७१ कुर्यात् सर्वत्र कर्मान्ते- ११० | ज्ञानन्तु स्वपरोपाय- ७१ कुर्याद् रक्षाविधानञ्च- ७७ | ज्ञानकर्मक्रियामन्त्र- ८५ कुर्वन्ति वैष्णवार्थाय- १०३ | ज्ञानतस्त्वनुपेतस्य- ३२ कुर्वाणश्च सदा वृत्ति- ५८ | ज्ञानभक्त्यङ्गसत्सेवा- १५७ कुर्वीत परमां भक्ति- ६४ | ज्ञानयोगस्य विज्ञानं- १४७ कृतानुकूल्यसङ्क- २९ | ज्ञानस्य कर्मणा गुप्ति- १५८ कृता यज्ञाः समस्ताश्च- ५२ | ज्ञानानन्दमयोज्ञन्तो- १०६ कृतिनां वीतमोहानां- ३९ | ज्ञानानन्दमयो नित्यः- १०६ कृत्वानुयागं कुर्वीत- ५१ | ततः परिगृहीतेन- ११६ कृत्वाभिगमनं पूर्व- ५१ | ततः प्राप्य जगन्नाथं- ८४ कृत्वा मन्त्रान्वयं तत्र- १३७ | ततः शुद्धं परं ब्रह्म- ९१ केचित्तु सत्वसम्पन्ना- ८८ | ततः समर्पिते शेषे- ११५ केचिच्चतुर्णां पूर्वेषां- ११६ | ततः सम्पूज्य देवेशं- ११३ केचित् सर्वेश्वरं- ३८ | ततः स्वकाले स्वाध्याय- ११६ केनोपायेन भगवन्- २५ | ततश्च देवदेवेशं- ४९ केशवादीन् द्वादशसु- १११ | ततश्च व्यापकान् मन्त्रा- ११४ क्रमाच्च वृद्धयमानन्तं- १३८ | ततो दिव्यञ्च हारिद्र- ६३ क्रमाप्तभगवन्मन्त्र- १०१ | ततो न्यासस्य चाङ्गानां- ८६ क्रियते चास्य पुत्राद्यैः- ८५ | तत्तत्कार्योपपत्त्यर्थं- १५६ क्रोधलोभमदालस्य- ९४ | तत्र तत्र स्मरन् मन्त्रै- ६२ क्षीर्णायुर्ज्ञानशक्तिवा- १०५ | तत्रान्यतमहोमान्ते- ११६ गजाननाद्यैः सहितं- १२२ | तथा कुदृष्टिकृपण- १२३ गायेदास्फोटये नृत्यैत्- ५८ | तथानादेरविद्याया- १५८ गीतवादित्रघण्टादि- ७४ | तथा भगवतो व्यूह- १४७

हिन्दीटीकासहित १६५ पृष्ठे | पृष्ठे तथा मध्येऽस्य चत्वारि- १११ | दर्शयन्त इव श्रेयो- १४१ तथा रुद्रेण कथितं- ७२ | दानहोमजपार्चानाः- ११८ तथा वैश्यःस्वधर्मथो- ५३ | दासभूतं यदात्मानं- ६० तथा स्वकर्मशास्त्रेश- १४३ | दास्यं हि नामकरण- ७८ तथा हिवाक् शची दुर्गा- ९१ | दास्यामृतरसास्वाद- १५६ तथैवात्मपृथिव्याद्या- ९१ | दिव्यलोकस्य सम्प्राप्त्या- १४८ तदन्यस्पर्शवैराग्य- ९४ | दिव्यानां मानुषाणाञ्च- १५१ तदप्रीतिकराण्याशु- १२३ | दिव्यार्चायतनग्रामः- १५१ तदाज्ञाकरणे प्रीतिः- ९४ | दीपांच दत्वायाम्यर्च्य- १०९ तदेवं भगवान् प्रीतः- ४२ | दुर्निमित्तमये पापे- १०३ तदेवं स्वोचितैरेव- ३७ | दृप्ताः प्रपद्य लक्ष्मीशं- १३२ तन्त्रं समाप्य देवेशं- ११० | देवतानाञ्च यथात्म्यं- ९७ तमसाभिप्लुता येषां- १३९ | देवतान्तरशेषन्तु- १२० तमसो भस्म रजसो गन्धः- ७७ | देवर्षिभूतनामतया- ९७ तमेवं मत्वा भोक्तारं- ५१ | देशकालकुलादीनां- ६९ तस्मात् कुदृष्टिभिर्वाह्यै- १४१ | देहकृन्मन्त्रविन्न स्यात्- ९९ तस्मादाराधनं विष्णो- ११७ | देहस्यात्यन्तिकलये- ४४ तस्य चान्येशितव्यत्व- १५७ | देहात्मस्वर्गनरक- १४२ तस्यैवात्यन्तिकं दास्ये- ४५ | दैवेषु पित्र्येषु तथा- ८१ तानिसर्वाण्यशेषा- ४४ | द्रव्याणां भुक्तभोगानां- ७४ तापः पुण्ड्रं तथा नाम- १०८ | द्वितीयमासनं विष्णो- १४९ तापयिष्यन् गुरुः शिष्यं- १०८ | धर्मच्छद्मभृतो धर्मान्- १४१ तापस्तपांसि तीर्थानि- ११७ | धर्मो वर्णाश्रमादीनां- ८८ तामसं नग्नमेकान्तु- ७८ | धारयिष्यैस्ततः- ११० तुल्याभिजनचारित्रा- ९४ | धारयेदूर्ध्वपुण्ड्राँश्च- ६१ तृष्णाम्प्रियाः क्रियाः १३४ | धारयेन्नान्यचिह्नानि- ७५ तेषा तद्वचनं श्रुत्वा- २६ | धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्वक्ताद्यै- १२४ तेषां न परिशुद्धानि- ९७ | ध्यात्वा नारायणं देवं- ४८ ते ह्यशुद्धतमाः सर्वे- १२६ | ध्यानेन मन्त्रयोगेन- ९९ व्यक्ताचारस्त्यक्तदृष्टिः- ९६ | ध्यायन्नाधारशक्त्यादि- १२१ त्यागेन कर्मणां स्वस्य- १५० | न कश्चित् प्रतिगृह्णीया- ८१ त्रयोदश द्वादश वा- ६१,१११ | न कर्म हीनं ज्ञानेन- ४३ त्रय्या विहितसंस्कारा- ९० | न खल्वपि दशादेश- ८४ त्रिधा सर्वत्र विस्तार- ६२ | न चक्राद्यङ्कनं नेज्या- ९९ त्रिभिः प्रजापतेर्भक्तः- ९३ | न च क्रियान्तरङ्गाणां- ७० त्रैविद्यानां सदामिश्राः- १२६ | न च मन्त्रोपजीवी- ७३ दक्षिणोदरबाह्वंसे- ६२ | न चन्दनादिभिर्गन्धै- ७६ दण्डवत् प्रणमेद्भूभौ- ७३ | न च भागवत- ७७ दर्भक्षौमसूत्रवस्त्रांक- ७९ | न च मैत्रीं प्रकुर्वीत- ८२

१६६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता

पृष्ठेपृष्ठे
न चैकस्मिन्भजेत् साम्यं८१निन्दितक्रियया हाना-१२७
न जन्मनो नाध्ययनात्-९९निबोधत महाप्राज्ञः-१५०
न जातिभेदं न कुलं-२८नियोक्ता भगवान् विष्णुः-८९
न जातु परमां वृत्तिं-६८निरीश्वराः कर्मफला-१०५
न जातु मन्त्रदा नारी-३४निघृष्य मृत्स्नां विधिवत्-१११
न तथा विविधैर्दानै-१३१निवेदयेच्च भुञ्जानो-५०
न देवतान्तरपरा-४४निवेद्य वस्त्रेच नवे-११२
न परीक्ष्य वयो वन्द्या-१३१निवेद्य यदि तद्भूयः-५०
न परैः सङ्करं कुर्यात्-१३६निश्चितेऽनन्यसाध्यस्य-२६
न पापेन न पुण्येव-६९निषिद्धान्तर्गतान्येव-४३
न प्रपत्तेः परा विद्या-९८निष्पादनं रक्षणञ्च-१५१
न मत्तोन्मत्तपतित-३५निहीनान् प्राकृतेभ्योऽपि-१४४
न विद्या केवलार्थाय-९८नीचैः संश्लेषां हस्त-१५४
न विपत्तिषु वैक्लव्यं-७०नोपभोक्तव्यमन्नाद्य-९५
न विषज्वरभूतादि-६९न्यस्ताशेषभरः श्रीशे-८०
न वृत्तेरधिकामृद्धिं-६९न्यासनिर्धूतपाप्मानः-१२७
नश्यन्ति सकलाः क्लेशाः-६१न्यासलिङ्गावताङ्गेन-३०
न सांख्येन न योगेन-९३न्यासस्तीर्थाभिगमनं-१४५
नाचार्यः कुलजातोऽपि-३३न्यासस्य सर्वयोगस्य-१३७
नातिसङ्गः परिचरेत्-५०न्यासाख्यं परमं मन्त्रं-११४
नाथस्य रूपविभव-१५१न्यासिनो न्यास एव-३५
नाद्रियेत पुराणादीन्-७२न्यासे वाप्यर्चने वापि-३२
नानाकामहतज्ञाना-१०५न्यासे हि देहिनोऽपायै-१४०
नानाफलक्रियायोग-१३०पङ्क्तौ समाजे ग्रामादौ-८२
नानाविधेषु ज्ञानेषु-१४२पञ्चरात्रं महद्दिव्यं-५५
नामदासादिशब्दान्तं-११२पञ्चायुधाब्जताक्षर्यादि-१५३
नारायणैकनिष्ठा ये-९३पत्युर्ज्ञानमयी वृत्ति-१५३
नारायणैकशरणाः-९०पद्मबीजमयी माला-१५३
नारी वा पुरुषो वापि-१३२परं भागवतं वर्त्म-१०५
नास्तिकः संशयी मूढः-१४२परमाख्याथ वैयूही-११८
निक्षिप्यात्मानमात्मीय-४०परमात्मा हरिः स्वामी-१०२
निघर्षणादि विधिवत्-६१परमीप्सुस्तमेवार्थ-११४
निजधर्मानुरोधेन-६६परमैकान्तिनां धर्मः-१०४
नित्यं गुरुमुपासीत-६४परमैकान्तिनां नित्या-१३५
नित्यं विष्णुपं कर्म-११५परसम्बन्धविज्ञानं-१४७
नित्यमच्युतभक्तानां-९८परस्य पुंसः श्रीशस्य-१४६
नित्यमर्चाजपध्यान-१०२परस्य ब्रह्मणस्तस्य-५६
नित्योप्तकेशा निभृता-५४परित्यज्याखिलान्-३०
निधाय वह्नौ प्रत्येकं-१०९परिवर्हविभूषास्त्र-१४६

हिन्दीटीकासहित १६७ | पृष्ठे | | पृष्ठे | | परिपत्सु च सान्निध्यं— | १५५ | प्रभाते दिव्यलोकस्थं— | १०१ | | परीत्य सह शिष्येण— | १११ | प्रभुं भक्तपराधीनं— | ५७ | | परीवाराँश्च सेवेत— | ५८ | प्रशस्तं भगवद्भक्तं— | ५१ | | पवित्राण्यब्जबीजानि— | ६३ | प्रशासितुरशेषाणां— | २७ | | पश्चिमे स्वेन मन्त्रेण— | १०८ | प्रसादनं क्षमापञ्च— | १५४ | | पाखण्डशैवशाक्तादि— | ४५ | प्रसादनानामीशस्य— | १३० | | पातकानि समस्तानि— | ७१ | प्राकृताद्यैः परिहृतो— | १४० | | पातकेन कुदृष्टान्य— | ९६ | प्राङ्मुखस्योपविष्टस्य— | १०९ | | पादोदकं भगवतो— | ५८ | प्राज्यैः प्रियतमैर्भोगैः— | १०३ | | पीत्वानैकान्तिनां सोमं— | १२० | प्रातरुत्थाय विधिवत्— | ४९ | | पुण्येऽनुकूले समये— | ३७ | प्रातर्माध्यन्दिने साय— | १०० | | पुनरेवं मुनिश्रेष्ठ— | १४५ | प्राप्तुं लक्ष्मीपतेर्दास्यं— | १३८ | | पुरराष्ट्राभिवृद्ध्यर्थं— | ५९ | प्राप्तुमिच्छन् परां— | २८ | | पुराणान्यवगाहेत— | ५६ | प्राप्याभिगमनं दृष्ट्वा— | १३५ | | पूर्वमेव यथान्यायं— | ४९ | प्रायश्चित्तं तु परम— | ५२ | | पूर्ववत् स्थण्डिलं कृत्वा— | ११२ | प्रायेण धर्मान् व्यामिश्रान्— | १२६ | | पूर्वेषामुत्तरेषाञ्च— | १३२ | प्रायो गुणवशादेष— | २७ | | प्रकृतिं पुरुषं योगं— | ७२ | प्रीतिरूपाँस्तथा विष्णो— | ६८ | | प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे— | ६४ | प्रीतिसंहृष्टसर्वाङ्ग— | ५७ | | प्रक्षाल्य पञ्चगव्येन— | १०९ | प्रीत्यप्रीतिसमायोगं— | ८२ | | प्रच्छादनञ्च दोषाणां— | १५५ | फलानाञ्चान्यतः प्राप्तिः— | १५८ | | प्रजापालनरूपञ्च— | ५३ | बहुजन्मकृतैः पुण्यैः— | ३९ | | प्रणयेन तथा व्यूहै— | ६२ | बालमूकजडान्धांश्च— | ३१ | | प्रणामं स्पर्शनं सेवां— | ७५ | बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं— | ७३ | | प्रणामः कीर्तनं वापि— | ३१ | बाह्याः सदसतां नास्ति— | ९२ | | प्रणामाङ्गनमुख्येन— | ३० | बाह्या निर्देवताश्चैव— | ९३ | | प्रतप्तैर्भगवद्दिव्या— | १५३ | वाह्यानां जिह्मदृष्टीनां— | ८० | | प्रतिष्ठां सर्वधर्माणां— | ५४ | बाहोर्ललाटे शिरसि— | ५९ | | प्रत्येकञ्च यथारूपं— | १११ | बुद्ध्वाऽपि परमात्मानं— | १२९,१२९ | | प्रथमासनसंस्कारो— | १४९ | ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्राः— | २८ | | प्रधानं स्थण्डिलं मध्ये— | १२३ | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च— | ५४ | | प्रधानमहदादीनां— | १४७ | ब्रह्मरुद्रदिगीशार्क— | ६८ | | प्रपत्तिं कारयन्त्येव— | २८ | ब्रह्मरुद्रमुखा देवा— | १५६ | | प्रपत्तिरानुकूल्यस्य— | २९ | ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः— | ५९ | | प्रपत्तेर्ह्यात्मनिक्षेपो— | ४२ | ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यै— | ४९ | | प्रपन्नमपि यं कञ्चित्— | १३१ | भक्तिज्ञानसमाचार— | १५५ | | प्रपन्नस्यापि हि पुन— | ४४ | भक्तिप्रकाण्डविस्तारो— | १४६ | | प्रपन्नैश्चान्यभजना— | ८१ | भक्तिस्तु विविधा भोगा.— | १४५ | | प्रपित्सुर्मन्त्रनिरतं— | ३३ | भगवच्चरणाम्भोजा— | १४८ |

१६८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे भगवद्रूपिणं ध्यात्वा— ११२ | यथा यथा निषेवेत— १३३ भजने चान्यदेवानां— ११९ | यथा रागादयो दोषा— १४८ भरद्वाजो महातेजाः— १४५ | यथार्हं विहितैस्तस्तैः— ४८ भर्तुरासनदानाद्यै— १३४ | यथैव भगवान् विष्णु— १३१ भविष्यन्ति कलौ केचि— १०५ | यथैवाश्रमणः पूर्वे— १२८ भावनानान्तु कालुष्यात्— ९२ | यदीच्छन् प्रतिकूलानि— ३० भाषाख्या लौकिकाः मन्त्रा— ३६ | यदैकान्त्यङ्गता विष्णौ— ८९ भिन्नोऽन्यनाथो— १४३ | यन्येकदिवसे पञ्च— ११७ भूमाविव परे पुंसि— १४६ | यद्वा परमसंस्काराः— १३४ भूयः स्फुटतरं वक्ष्ये— १२५ | यश्चायमात्मनिक्षेपः— १३० भूय एवार्षिभिः पृष्टो— ८८ | यश्चेमां संहितां पुण्यां— ८७ भोजयेद्वैष्णवान् नित्यं— ५० | यस्तु प्राप्य गुरोर्विद्यां— ९७ मत्प्रत्यक्षं तदेवास्ति— १४२ | यां सिद्धिं वैष्णवैर्मन्त्रैः— ३६ मन्त्रं नियतमग्न्याणां— ३७ | यात्रादिषु च सेवेत— ५७ मन्त्रवत्तु हुतं— ११५ | यायाच्छुद्धेन मार्गेण— १२८ मन्त्रसंस्कारमुक्तस्य— ११८ | यास्तत्र तत्र श्रूयन्ते— १०३ मन्यते च स्वकीयान्नः— ४० | या स्वधर्मेष्वभिरतिः— ४१ मरणं जन्मने यस्य— ९८ | युग्मैर्विवर्तितं रौद्र— ७८ महापचागे देवस्य— १६० | ये च भागवता मन्त्रा— ५१ महाभागवतो मन्त्रैः— १३६ | ये च भुक्तोज्झिता भोगा— ५८ मत्स्यं कूर्मं वराहञ्च— १२२ | ये चोपकुर्वते ज्ञानं— ६६ मुनयः सत्वनिष्ठानां— ९३ | ये तु वाकन्निष्ठनिष्ठाः— ९० मूलजं गन्धसारादि— ७७ | ये त्ववैष्णवभर्त्तव्या— ९६ मूलस्कन्धमया वेदा— ५६ | ये नात्मानमनात्मानं— ९७ य आत्मनां परो वेद्य— १५१ | येषां शास्त्रेषु गाढापि— १३९ यः प्रपन्नोऽपि लक्ष्मीशं—— ७७ | योऽसौ मन्त्रवरं— ६५ यः शरण्यमशेषाणां— १३० | योगक्षेमविधिर्नित्य— १४९ यजस्व नित्यमात्मेशं— ११५ | योजयिष्यन् गुरुः शिष्यं— ११५ यजेच्छुद्धानशुद्धान् वा— ९२ | यो दिव्यशास्त्रमन्त्रेषु— ९६ यजेत पुरुषं साक्षा— ४९ | राजसांस्तामसांश्चैव— ७८ यज्ज्ञानपूर्वं न्यसनं— १४० | रौद्रव्रतादिनियतै— ७७ यत्तु विश्वपतेर्विष्णो— १३० | लक्षणानामकरणे— ११९ यत्प्रव्रजन्ति तत् षष्ठ— १५० | लक्षणानि स्फुटान्येव— ६३ यत्र काव्ययवा देशे— ९८ | लक्षणानि हि पुष्पाणि— १५९ यत्राविविक्तैः शब्दैस्तु— १०३ | लक्ष्मणामपचारेण— १५३ यथा कामफला यज्ञा— १२९ | लोभाद् वा वा यदि वा मोहात्— १३९ यथानुजीवी नृपतिं— ६४ | वदन्ति धर्मान् व्यामिश्रान्— १२५ यथा पूर्वाकृतीन्नित्या— १०१ | वदन्तोऽपि गुणान् विष्णो— १३३ यथा पृथग्विधा वर्णा— ८९ | वनस्थाश्रमसम्प्राप्ति— १४९

हिन्दीटीकासहित १६९ पृष्ठे | पृष्ठे वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि- ७० | वृक्षादीनाञ्च सर्वेषां- ७६ वर्जयेदन्यदेवानां- ७४ | वृत्तिं सन्तोऽनुभूयेमां- १६१ वर्ज्याः पाषण्डशैवाद्यै- ७४ | वृत्तिर्भगवतां हि- ११७ वर्णाश्रमपराश्चैव- ५४ | वृत्तिश्च विहिताचार- ४० वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं- ७६ | वृत्तेर्हिजीवितं गुप्ति- १६० वासःस्रग्गन्धधूपादि- १०१ | वृत्यङ्गमेवञ्च ततो- ८६ वासुदेवं प्रपन्नानां- ३९ | वृद्धानाचारसम्पन्ना- ६६ विद्यार्थसम्प्रयोगोऽपि- ८१ | वृद्धानाञ्चैव मुक्तानां- १५७ विद्या विभूषणं पुंस- ९९ | वेदवेदाङ्गतत्व- १०२,१४३ विनिन्दितः प्रशस्तो वा- ७० | वेदवेदान्तविज्ञानं- ४२ विनैव प्रतिषिद्धेन- ६९ | वेदवेद्यः स भगवान्- ५६ विपरीतार्थतत्वानि- १५६ | वेदानां सोपनिषदां- १५७ विप्रानैकान्तिनः प्राज्ञा- १२१ | वैदिका इव चाप्यन्ये- १४१ विमर्श इह दुःखानां- १४८ | वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव- ३५,३६ विमानमण्डपोद्यान- १४७ | वैराग्यतीरसुभगा- १४५ विरहानर्थपीडावमान- १५५ | वैवाहिको विधिर्धर्मो- १४९ विवाहयज्ञाध्ययन- ९५ | वैष्णवस्याङ्गशय्यायां- ९८ विशिष्टः परमैकान्ती- ८३ | व्यवस्थां पदवर्णादि- ५५ विशुद्धं वैष्णवं बिम्बं- १३६ | व्यामिश्रं पञ्चरात्रेऽपि- १२६ विशुद्धज्ञानकर्माणः- ९० | व्यामिश्रांश्चापि शुद्धांश्च- १२९ विशुद्धज्ञानसलिलां- १४५ | व्यामुग्धमतयः केचित्- १२५ विशुद्धपरिवारस्य- १२७ | व्यूहांश्चतुर्षु तान्- १११ विशुद्धयेद्विष्णुभक्तस्य- ५२ | व्रज तस्यैव चरणौ- ११४ विशेषाद्विष्णुभक्तेषु- ७९ | शङ्खचक्रप्रधानं हि- ६० विशेषेणाप्यनर्थेषु- १५८ | शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यै- ७५ विश्वात्मन्यात्मनो न्यासं- ३४ | शरण्यमिज्यं लक्ष्मीशं- ७१ विष्णोस्तत्संश्रयणाञ्च- १५३ | शान्तिं पुण्येपु देशेषु- १२१ विष्ण्वर्चनरहिते ग्रामे- ७३ | शान्तोऽनसूयुः श्रद्धावान्- ३५ विष्णोः सेवेत तीर्थानि- ५२ | शालग्रामशिलायान्तु- १३५ विष्णोरायतनान्नौ वा- ६० | शास्त्रादिषु सुदृष्टापि- ३२ विष्णोरूर्ध्वतया क्षेत्रे- ६१ | शिष्टैर्वर्णाश्रमादीनां- ५५ विष्णोर्ध्यानप्रणामार्चा- ६८ | शिष्यपुत्रकलत्राणां- १०० विष्णोर्निवेदितान्नाद्यै- ५२ | शुद्धव्यामिश्रपात्राणां- १३७ विष्णोर्विद्वेषयुक्तस्य- १५९ | शुद्धादीनान्तु धर्माणां- १२७ विष्वक्सेनः स्मृतो नेता- ६८ | शुद्धो मिश्रस्तथान्यौ वा- १२७ विहिताचरणं कर्म- ४३ | शुश्रूषमाणः शूद्रोऽपि- ५३ विहितान्तर्गतान्येव- ४३ | श्रद्धापूतभवैद्यस्य- १४० विहितैवमुपावृत्ति- १५१ | श्रीभूमिलीलासहितं- ११५ वीर्यं स्वकर्मधीर्दृष्टिः- १३३ | श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण- १५६

१७० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे श्रुतिस्मृतीतिहासाद्यै— १५१ | सर्वेषामुपचाराणा— १३५ श्रुत्वा तु सकलान् धर्मान्— २५ | सर्वैश्च लक्षणैर्युक्त— ९६ श्रुत्वादौ नारदात् सम्य— ८७ | स शिष्योऽथ गुरुः— ११४ श्रुत्वैव सहसोत्थान— १५४ | साङ्गान् वेदानधीयीत— ५४ श्रूयतां सम्प्रवक्ष्यामि— २६ | सात्विकं नाम शुद्धानां— ७८ श्रूयते यत्र यष्टव्या— ९० | साधनत्वाभिमत्या— ४५ श्रौतदिव्यार्षकल्पानां— ११६ | साप्सरो भूरिसङ्घस्य— १४७ संवत्सरमुपासीत— १३८ | सामान्या च विभक्ता च— १३३ संहारादिक्रमं कुर्या— ११४ | सुसूक्ष्मत्वादूहापत्वा— १६१ संहितोपनिषद्वस्मिं— ८६ | सेव्योऽयं कर्महस्ता— १३३ स एकान्त्यन्यविमुखो— ८० | सैषा सुदृष्टिर्व्याख्य— १४९ स एवोपर्युपर्यस्य— ४१ | स्तुतिर्नतिः परिक्रामः— १५१ सकृदेव कृतो न्यासो— १३२ | स्तोत्राणि कल्पनामानि— ५६ स च सर्वेषु लोकेषु— ८४ | स्त्रियः शूद्रादयश्चैव— ३४ सतां निषेवणं वापि— १३४ | स्त्रीणाञ्च पतिमित्रा— ३५ सतां पादोदकं पात्रे— १३७ | स्थानानि सैकतान्यत्र— ११० सतामनवकाशत्वात्— ९५ | स्थाने हेत्याहुतीनान्तु— ११३ सतामसेवनान्नित्य— १६० | स्थापनार्चनयात्रादि— १५१ सतामाचार्यमुख्यानां— १५६ | स्नानञ्च गुरुणा यत्र— ६५ सतामुत्क्रमणादेश्च— १५० | ज्ञातेभ्यश्च यथाकामं— १२१ सत्वजा मानसी— ३१ | स्नानप्रसाधनहविः— १५१ सत्सेवनमसत्सेवा— १०४ | स्वतः सङ्कल्पतश्चापि— १२८ सद्ब्रह्म वासुदेवाख्यै— १०२ | स्वपापसम्भवादेव— ३८ सन्तः सतोऽनुगृह्णन्ति— १०१ | स्वयं देहानुकूलानि— ६५ सन्तोऽनुपनतारब्ध— १३७ | स्वयं ब्रह्माणि निक्षिप्तान्— ११३ सप्तपूरुषविज्ञेये— ३३ | स्वयं वा भक्तिसम्पन्नो— ३३ समर्पितात्मनः श्रीशे— १३१ | स्वरूपरूपविभव— ५७ समानसुखदुःखत्वं— १५५ | स्वरूपस्य विनाशाय— १५९ समाप्तानि च कर्माणि— ४८ | स्वल्पापि हन्ति भूयांसं— १०४ समाश्रितो दास्यरतिः— ५४ | स्वाध्यायेनापि विदुषा— १३६ समित्पुष्प हविस्तोय— ९५ | स्वाभाविकोऽस्य सम्बन्धः— ४१ सम्भूय च कुले श्लाघ्ये— १३३ | स्वेशसम्बन्धविज्ञानं— ८० सर्वत्राग्निमुखस्यान्ते— १२२ | हरेः प्रियतमं ज्ञानं— १५८ सर्वपातकसम्प्राप्तौ— १२० | हरेः शुद्धतनोः शुद्धं— १२६ सर्वभूतान्तरात्मान— १२५ | हरेरालोकहीनानां— १५७ सर्वमङ्गलसंयुक्त— ११० | हरेराश्रितवात्सल्य— ५८ सर्वसंस्कारसंस्कारो— १०२ | हविर्निवेद्य देवाय— १०९ सर्वात्मना हि या वृत्तिः— १५३ | हीनाः परमसंस्कारैः— ११८ सर्वेषां याग एवायं— १३५ | हीनाहीनतमाश्रैव— ३१

कर्मकाण्ड सम्बन्धी हमारे कुछ प्रकाशन अन्त्येष्टि श्राद्ध कर्म पद्धति (संस्कृत) पत्राकार व पुस्तकाकार उपाकर्म पद्धति मूल "श्रावणी कर्म" के लिये परमोपयोगी ग्रह शांति-हिन्दी टीका सहित (शुक्ल यजुर्वेदोक्त)—इसमें मातृस्थापन पूजन आभ्युदीपक श्राद्ध पद्धति और ग्रहशांति है। यह यज्ञोपवीत तथा विवाहादि शुभ कर्म में बहुत उपयोगी है गौडीय श्राद्ध प्रकाश महानिबन्ध—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, (मूलमात्र, पत्राकार) सभी श्राद्ध, पितृकर्म संबंधी सभी वैष्णवादि पूजनादिकों का अपूर्व संग्रह नित्य कर्म प्रयोग माला—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, नित्य नियम के ६२ विषयों सहित। संस्कृत में प्रेत मञ्जरी—हिन्दी टीका सहित। वैतरणी दान प्रेतदाहविधि, दशाहादि श्राद्ध, एकादशाहश्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शय्यादानादि सपिंडी श्राद्ध, षोडश, मासिक श्राद्ध प्रयोग, त्रयोदशाहपद दानादि है। पुस्तकाकार व पत्राकार दोनों में उपलब्ध व्रतोद्यापन प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। मूलमात्र पत्राकार व सजिल्द में उपलब्ध सुगम विवाह पद्धति—(गंगाधारी)—हिन्दीटीकासहित सर्वदेव प्रतिष्ठा प्रकाश—पं० चतुर्थीलालजीकृत। सम्पूर्ण देवताओं की सर्वोत्तम प्रतिष्ठा विधि और प्रतिष्ठोपयोगी अनेकों प्रकार के कुंड, मण्डल, यंत्र आदि के चित्र बनाने तथा रंग पूरने की विधि भी है। संस्कार प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें षोडश संस्कार, लुप्त संस्कार प्रायश्चित, व्रात्यप्रायश्चित प्रयोग, पुनरुपनमन प्रकार इत्यादि सभी विषय है। मूल मात्र संस्कृत में। सजिल्द वासिष्ठी हवन पद्धति—हिन्दी टीका सहित विष्णु पूजन विधि—हिन्दी टीका सहित विवाह सोपांगविधि—'वालोवोधिनी' नामक हिन्दी टीका सहित शांति प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें गणपत्यादि पूजन, पुण्याह वाचन, कलश स्थापनादि और विनायकादि ३० शांति प्रयोग तथा वास्तु शांति तथा वास्तु शांति प्रयोगादि समन्त्रक हैं। मूल मात्र पत्राकार सकाम शिवपूजन विधान हिन्दीटीकासहित—वैदिक, तांत्रिक मन्त्रों से शिव पूजन स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) प्रायः समस्त शुभकर्मों में पढ़ा जाता है। संध्योपासन—हिन्दीटीकासहित देवर्षि पितृतर्पण सहित हरिद्रामातृका पूजा—विवाहादि मंगल करने योग्य (चातुर्थीलाली) उपनयनपद्धति—सटिप्पणीका नवीन आवश्यक विषयों से अलंकृत 'यज्ञोपवीत संस्कार' कराने के लिये परमोयोगी

हमारे यहाँ से प्रकाशित कुछ रामानुज सम्प्रदाय-ग्रंथ अर्चावतार स्थल वैभव दर्पण-दिव्य देश तीर्थ यात्रा हि.टी.स. आल्वन्दार स्तोत्र-सान्वय हिन्दी टीका सहित ............ रामपटल-हिन्दीटीका सहित ............. द्राविडाम्नाय दिव्यप्रबंध-(संस्कृत अनुवाद) अनुवादक श्रीकांची जगदाचार्यसिंहासनाधीश प्रतिवादिभयंकर श्रीमदण्णङ्गराचार्य। सुदर्शनशतक-हिन्दी टीका और सुदर्शनकवच............ (बृहत्) स्तोत्ररत्नावली-प्रथम भाग ............. श्री गोंदाभक्ति चालीसा-(नवीन प्रकाशन) .......... धर्म शास्त्र-ग्रंथ आन्हिक कर्म सूत्रावली (मूलमात्र) शुक्ल यजुर्वेदी माध्यनन्दिन वाजसनेयि शाखा क्लों के लिये परमोपयोगी ........ कर्मविपाक-(नक्षत्र चरणगत) हिन्दी टीका सहित ........ धर्मसिन्धु-पं० मिहिरचन्द्रजी कृत हि .टी . सहित तथा पूर्वोक्त सर्वालंकारों से विभूषित। निर्णय सिन्धु-पं. ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत- हि.टी . सहित ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड भा .टी (बृहज्ज्योतिषार्णवान्तर्गत षष्ठ मिश्रस्कन्धोक्त) हिन्दी टीका सहित ........ व्रतराज-(दैवज्ञ कुल भूषण, याज्ञिक शिरोमणि संगमेश्वरोपाव्ह श्री विश्वनाथ शर्मा विरचित) सौभाग्य लक्ष्मी-हि .टी . सहित। इसमें लक्ष्मीदेवी के प्रसन्न करने के आधनीत स्त्रभूतो, कवच व सदाचारों का वर्णन है।

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त (blank) पृष्ठ है।