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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

॥ श्रीहरिः ॥ 1183

संक्षिप्त

नारदपुराण

( सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी )


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० २०७६ अठारहवाँ पुनर्मुद्रण ४,०००
कुल मुद्रण ८२,५००

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॥ श्रीहरिः ॥

निवेदन

भारतीय संस्कृत-साहित्य अनन्त ज्ञान-गरिमासे परिपूर्ण है। उसके असीम ज्ञान-सिन्धुसे उपलब्ध हुए पुराणोंको अमूल्य रत्नराशिके रूपमें अत्यन्त सम्मान और गौरवशाली स्थान प्राप्त है। इसीलिये पुराणोंके सेवन (श्रवण, अनुशीलन)- को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है।

गीताप्रेसने 'कल्याण' के माध्यमसे विशेषाङ्कोंके रूपमें समय-समयपर अनेक पुराणोंको जनहितमें प्रकाशित किया है। इन्हें सर्वजन-सुलभ करानेके उद्देश्यसे लागतसे भी कम मूल्यमें इनका केवल सरल हिन्दी-अनुवाद उपलब्ध किया गया। पश्चात् श्रद्धालु पाठकोंकी माँगपर इधरमें कुछ वर्षोंसे इनका पुनर्मुद्रण भी हुआ है और आगे भी इस क्रमको बनाये रखनेका विचार है।

'कल्याण'-वर्ष २८वेंके विशेषाङ्कके रूपमें 'नारद-विष्णुपुराणाङ्क' (सन् १९५४ ई० में) प्रकाशित हुआ था। बादमें यह पुनर्मुद्रित भी किया गया। 'नारदपुराण' तथा 'विष्णुपुराण' एकहीमें संयुक्त होनेसे इसका कलेवर पर्याप्त बड़ा (लगभग आठ सौ पृष्ठोंका) था। फलस्वरूप इसका अध्ययन समयसाध्य और पाठकोंके लिये असुविधाजनक था। अतः इसे ध्यानमें रखते हुए प्रेमी पाठकोंके सुविधार्थ इसे अब अलग-अलग दो भागोंमें प्रकाशित करनेका विचार किया गया है। तदनुसार यह केवल 'नारदपुराण' आप सबकी सेवामें प्रस्तुत है।

'नारदपुराण' में कल्याणकारी श्रेष्ठ विषयोंका उल्लेख है। इसमें वेदोंके छहों अङ्गों—(शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द-शास्त्रों)—का विशद वर्णन तथा भगवान्‌की सकाम उपासनाका भी विस्तृत विवेचन है। भगवान्‌की सकाम आराधना भी उत्तम है। सकाम उपासक धीरे-धीरे निष्काम

भाव बननेपर भगवद्भक्तिके उत्कर्षके बाद अन्तमें भगवत्प्राप्ति कर लेनेमें समर्थ हो जाता है। आशा है आत्म-कल्याणकामी पाठकों और सभी श्रद्धालु, जिज्ञासुजनोंके लिये प्रस्तुत इस ‘नारदपुराण’ का अध्ययन विशेष उपयोगी सिद्ध होगा।

अतः सभी भगवत्प्रेमी महानुभावों और श्रद्धालु पाठकोंसे हमारा विनम्र निवेदन है कि इसके अधिकाधिक अध्ययनसे विशेष पारमार्थिक लाभ उठाना चाहिये।

$—प्रकाशक$

श्रीहरिः

विषय-सूची

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
पूर्वभाग<br>प्रथम पाद<br><br>१- सिद्धाश्रममें शौनकादि महर्षियोंका सूतजीसे प्रश्न तथा सूतजीके द्वारा नारदपुराणकी महिमा और विष्णुभक्तिके माहात्म्यका वर्णन .....................................................१७९- बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय तथा अदितिकी तपस्या .....................................५०
२- नारदजीद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति.......२११०- अदितिको भगवद्दर्शन और वरप्राप्ति, वामनजीका अवतार, बलि-वामन-संवाद, भगवान्‌का तीन पैरसे समस्त ब्रह्माण्डको लेकर बलिको रसातल भेजना ...............५२
३- सृष्टिक्रमका संक्षिप्त वर्णन; द्वीप, समुद्र और भारतवर्षका वर्णन, भारतमें सत्कर्मानुष्ठानकी महत्ता तथा भगवदर्पणपूर्वक कर्म करनेकी आज्ञा......२४११- दानका पात्र, निष्फल दान, उत्तम-मध्यम-अधम दान, धर्मराज-भगीरथ-संवाद, ब्राह्मणको जीविकादानका माहात्म्य तथा तड़ाग-निर्माणजनित पुण्यके विषयमें राजा वीरभद्रकी कथा ...५९
४- श्रद्धा-भक्ति, वर्णाश्रमोचित आचार तथा सत्सङ्गकी महिमा, मृकण्डु मुनिकी तपस्यासे संतुष्ट होकर भगवान्‌का मुनिको दर्शन तथा वरदान देना ..........................२९१२- तड़ाग और तुलसी आदिकी महिमा, भगवान् विष्णु और शिवके ज्ञान-पूजनका महत्त्व एवं विविध दानों तथा देवमन्दिरमें सेवा करनेका माहात्म्य ........६४
५- मार्कण्डेयजीको पिताका उपदेश, समय-निरूपण, मार्कण्डेयद्वारा भगवान्‌की स्तुति और भगवान्‌का मार्कण्डेयजीको भगवद्भक्तोंके लक्षण बताकर वरदान देना .....................................................३४१३- विविध प्रायश्चित्तका वर्णन, इष्टापूर्तका फल और सूतक, श्राद्ध तथा तर्पणका विवेचन .................................................६८
६- गङ्गा-यमुना-संगम, प्रयाग, काशी तथा गङ्गा एवं गायत्रीकी महिमा ...................३८१४- पापियोंको प्राप्त होनेवाली नरकोंकी यातनाओंका वर्णन, भगवद्भक्तिका निरूपण तथा धर्मराजके उपदेशसे भगीरथका गङ्गाजीको लानेके लिये उद्योग ............................................७३
७- असूया-दोषके कारण राजा बाहुकी अवनति और पराजय तथा उनकी मृत्युके बाद रानीका और्व मुनिके आश्रममें रहना ........................................४११५- राजा भगीरथका भृगुजीके आश्रमपर जाकर सत्सङ्ग-लाभ करना तथा हिमालयपर घोर तपस्या करके भगवान् विष्णु और शिवकी कृपासे गङ्गाजीको लाकर पितरोंका उद्धार करना ...............८१
८- सगरका जन्म तथा शत्रुविजय, कपिलके क्रोधसे सगर-पुत्रोंका विनाश तथा भगीरथ-द्वारा लायी हुई गङ्गाजीके स्पर्शसे उन सबका उद्धार..........................................४४१६- मार्गशीर्ष माससे लेकर कार्तिक मासपर्यन्त उद्यापनसहित शुक्लपक्षके द्वादशी-व्रतका

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
वर्णन .....................................................८७वर्णन .....................................................१३४
१७- मार्गशीर्ष-पूर्णिमासे आरम्भ होनेवाले लक्ष्मीनारायण-व्रतकी उद्यापनसहित विधि और महिमा ....................................९३३१- मोक्षप्राप्तिका उपाय, भगवान् विष्णु ही मोक्षदाता हैं—इसका प्रतिपादन, योग तथा उसके अङ्गोंका निरूपण.............१३७
१८- श्रीविष्णुमन्दिरमें ध्वजारोपणकी विधि और महिमा ..............................................९५३२- भवबन्धनसे मुक्तिके लिये भगवान् विष्णुके भजनका उपदेश ..................१४५
१९- हरिपञ्चक-व्रतकी विधि और माहात्म्य ...९७३३- वेदमालिको जानन्ति मुनिका उपदेश तथा वेदमालीकी मुक्ति .......................१४८
२०- मासोपवास-व्रतकी विधि और महिमा ....९९३४- भगवान् विष्णुके भजनकी महिमा—सत्सङ्ग तथा भगवान्‌के चरणोदकसे एक व्याधका उद्धार............................१५१
२१- एकादशी-व्रतकी विधि और महिमा—भद्रशीलकी कथा...............................१००३५- उत्तङ्कके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान्‌की आज्ञासे उनका नारायणाश्रममें जाकर मुक्त होना .........१५४
२२- चारों वर्णों और द्विजका परिचय तथा विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्मका वर्णन ...........................................१०४३६- भगवान् विष्णुके भजन-पूजनकी महिमा .१५९
२३- संस्कारोंके नियत काल, ब्रह्मचारीके धर्म, अनध्याय तथा वेदाध्ययनकी आवश्यकताका वर्णन ............................१०६३७- इन्द्र और सुधर्मका संवाद, विभिन्न मन्वन्तरोंके इन्द्र और देवताओंका वर्णन तथा भगवद्भजनका माहात्म्य..............१६१
२४- विवाहके योग्य कन्या, विवाहके आठ भेद तथा गृहस्थोचित शिष्टाचारका वर्णन१०९३८- चारों युगोंकी स्थितिका संक्षेपसे तथा कलिधर्मका विस्तारसे वर्णन एवं भगवन्नामकी अद्भुत महिमाका प्रतिपादन१६३
२५- गृहस्थ-सम्बन्धी शौचाचार, स्नान, संध्योपासन आदि तथा वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म..........................११०द्वितीय पाद
२६- श्राद्धकी विधि तथा उसके विषयमें अनेक ज्ञातव्य विषयोंका वर्णन ...........११७३९- सृष्टितत्त्वका वर्णन, जीवकी सत्ताका प्रतिपादन और आश्रमोंके आचारका निरूपण..............................................१६९
२७- व्रत, दान और श्राद्ध आदिके लिये तिथियोंका निर्णय.................................१२२४०- उत्तम लोक, अध्यात्मतत्त्व तथा ध्यानयोगका वर्णन...............................१७३
२८- विविध पापोंके प्रायश्चित्तका विधान तथा भगवान् विष्णुके आराधनकी महिमा...............................................१२५४१- पञ्चशिखका राजा जनकको उपदेश......१७७
२९- यमलोकके मार्गमें पापियोंके कष्ट तथा पुण्यात्माओंके सुखका वर्णन एवं कल्पान्तरमें भी कर्मोंके भोगका प्रतिपादन .............................................१३०४२- त्रिविध तापोंसे छूटनेका उपाय, भगवान् तथा वासुदेव आदि शब्दोंकी व्याख्या, परा और अपरा विद्याका निरूपण, खाण्डिक्य और केशिध्वजकी कथा, केशिध्वजद्वारा अविद्याके बीजका प्रतिपादन ...........................................१८२
३०- पापी जीवोंके स्थावर आदि योनियोंमें जन्म लेने और दुःख भोगनेकी अवस्थाका

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
४३- मुक्तिप्रद योगका वर्णन१८७व्यासजीके पास आकर भागवतशास्त्र पढ़ना४१७
४४- राजा भरतका मृगशरीरमें आसक्तिके कारण मृग होना, फिर ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण होकर जड-वृत्तिसे रहना, जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद१९२<br>तृतीय पाद<br>५८- शैवदर्शनके अनुसार पति, पशु एवं पाश आदिका वर्णन तथा दीक्षाकी महत्ता४२१
४५- जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद—परमार्थका निरूपण तथा ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानका उपदेश१९७५९- मन्त्रके सम्बन्धमें अनेक ज्ञातव्य बातें, मन्त्रके विविध दोष तथा उत्तम आचार्य एवं शिष्यके लक्षण४२९
४६- शिक्षा-निरूपण२०१६०- मन्त्र-शोधन, दीक्षाविधि, पञ्चदेवपूजा तथा जपपूर्वक इष्टदेव और आत्मचिन्तनका विधान४३२
४७- वेदके द्वितीय अङ्ग कल्पका वर्णन—गणेश-पूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्धका निरूपण२१६६१- शौचाचार, स्नान, संध्या-तर्पण, पूजागृहमें देवताओंका पूजन, केशव-कीर्त्यादि मातृका-न्यास, श्रीकण्ठमातृका, गणेशमातृका, कला-मातृका आदि न्यासोंका वर्णन४३६
४८- व्याकरण-शास्त्रका वर्ण२२५६२- देवपूजनकी विधि४४३
४९- निरुक्त-वर्णन२५५६३- श्रीमन्महाविष्णु-सम्बन्धी अष्टाक्षर, द्वादशाक्षर आदि विविध मन्त्रोंके अनुष्ठानकी विधि४५२
५०- त्रिस्कन्ध ज्योतिषके वर्णन-प्रसङ्गमें गणित-विषयका प्रतिपादन२६२६४- भगवान् श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न-सम्बन्धी विविध मन्त्रोंके अनुष्ठानकी संक्षिप्त विधि४५६
५१- त्रिस्कन्ध ज्योतिषका जातकस्कन्ध३०१६५- विविध मन्त्रोंद्वारा श्रीहनुमान्‌जीकी उपासना, दीपदानविधि और कामनानाशक भूतविद्रावण-मन्त्रोंका वर्णन४६४
५२- त्रिस्कन्ध ज्योतिषका संहिताप्रकरण (विविध उपयोगी विषयोंका वर्णन)३३९६६- भगवान् श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मन्त्रोंकी अनुष्ठान-विधि तथा विविध प्रयोग४७४
५३- छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचय३९४६७- श्रीकृष्ण-सम्बन्धी विविध मन्त्रों तथा व्यास-सम्बन्धी मन्त्रकी अनुष्ठानविधि४९०
५४- शुकदेवजीका मिथिलागमन, राजभवनमें युवतियोंद्वारा उनकी सेवा, राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका सत्कार और शुकदेवजीके साथ उनका मोक्षविषयक संवाद४०७६८- श्रीनारदजीको भगवान् शङ्करसे प्राप्त हुए युगल-शरणागति-मन्त्र तथा राधाकृष्ण-युगलसहस्र-नाम-स्तोत्रका वर्णन५०१
५५- व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए 'प्रवह' आदि सात वायुओंका परिचय देना तथा सनत्कुमारका शुकको ज्ञानोपदेश४११
५६- शुकदेवजीको सनत्कुमारका उपदेश४१५
५७- श्रीशुकदेवजीकी ऊर्ध्वगति, श्वेतद्वीप तथा वैकुण्ठधाममें जाकर शुकदेवजीके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान्‌की आज्ञासे शुकदेवजीका

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
चतुर्थ पादउसके पाठ, श्रवण तथा दानका माहात्म्य......................................५४३
६९- नारद-सनातन-संवाद, ब्रह्माजीका मरीचिको ब्रह्मपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ-श्रवण एवं दानका फल बताना ..................................५२१८४- मत्स्यपुराणकी विषय-सूची तथा इस पुराणके पाठ, श्रवण और दानका माहात्म्य .......................................५४४
७०- पद्मपुराणका लक्षण तथा उसमें वर्णित विषयोंकी अनुक्रमणिका ....................५२३८५- गरुडपुराणकी विषय-सूची और पुराणके पाठ, श्रवण और दानकी महिमा ........५४५
७१- विष्णुपुराणका स्वरूप और विषयानुक्रमणिका .............................५२४८६- ब्रह्माण्डपुराणका परिचय, संक्षिप्त विषय-सूची, पुराण-परम्परा, उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल ............................५४६
७२- वायुपुराणका परिचय तथा उसके दान एवं श्रवण आदिका फल .................५२५८७- बारह मासोंकी प्रतिपदाके व्रत एवं आवश्यक कृत्योंका वर्णन .............५४८
७३- श्रीमद्भागवतका परिचय, माहात्म्य तथा दान-जनित फल...........................५२६८८- बारह मासोंके द्वितीया-सम्बन्धी व्रतों और आवश्यक कृत्योंका निरूपण .......५५१
७४- नारदपुराणकी विषय-सूची, इसके पाठ, श्रवण और दानका फल ..................५२८८९- बारह महीनोंके तृतीया-सम्बन्धी व्रतोंका परिचय .......................................५५२
७५- मार्कण्डेयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण एवं दानका माहात्म्य...............५२९९०- बारह महीनोंके चतुर्थी-व्रतोंकी विधि और उनका माहात्म्य ......................५५३
७६- अग्निपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल.............५३०९१- सभी मासोंकी पञ्चमी तिथियोंमें करनेयोग्य व्रत-पूजन आदिका वर्णन ................५५७
७७- भविष्यपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य ........५३१९२- वर्षभरकी षष्ठी तिथियोंमें पालनीय व्रत एवं देवपूजन आदिकी विधि और महिमा ........................................५५९
७८- ब्रह्मवैवर्तपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दान आदिकी महिमा .५३२९३- बारह मासोंके सप्तमी-सम्बन्धी व्रत और उनके माहात्म्य ........................५६१
७९- लिङ्गपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल .................५३३९४- बारह महीनोंकी अष्टमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा ..........................५६४
८०- वराहपुराणका लक्षण तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य .............५३४९५- नवमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा ........................................५६८
८१- स्कन्दपुराणकी विषयानुक्रमणिका, इस पुराणके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य.......................................५३५९६- बारह महीनोंके दशमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा ..........................५७०
८२- वामनपुराणकी विषय-सूची और उस पुराणके श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य.......................................५४२९७- द्वादश मासके एकादशी-व्रतोंकी विधि और महिमा तथा दशमी आदि तीन दिनोंके पालनीय विशेष नियम ...........५७२
८३- कूर्मपुराणकी संक्षिप्त विषय-सूची और

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
९८- बारह महीनोंके द्वादशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा तथा आठ महाद्वादशियोंका निरूपण........................५७६१०९- रुक्माङ्गद-धर्माङ्गद-संवाद, धर्माङ्गदका प्रजाजनोंको उपदेश और प्रजापालन तथा रुक्माङ्गदका रानी संध्यावलीसे वार्तालाप ....................................................६०५
९९- त्रयोदशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा ..................................................५८१११०- रानी संध्यावलीका पतिको मृगोंकी हिंसासे रोकना, राजाका वामदेवके आश्रमपर जाना तथा उनसे अपने पारिवारिक सुख आदिका कारण पूछना ....................................................६०८
१००- वर्षभरके चतुर्दशी-व्रतोंकी विधि और महिमा ..................................................५८४१११- वामदेवजीका पूर्वजन्ममें किये हुए 'अशून्य शयन व्रत'को राजाके वर्तमान सुखका कारण बताना, राजाका मन्दराचलपर जाकर मोहिनीके गीत तथा रूप-दर्शनसे मोहित होकर गिरना और मोहिनीद्वारा उन्हें आश्वासन प्राप्त होना ....................................................६१०
१०१- बारह महीनोंकी पूर्णिमा तथा अमावास्यासे सम्बन्ध रखनेवाले व्रतों तथा सत्कर्मोंकी विधि और महिमा....................................५८७११२- राजाकी मोहिनीसे प्रणय-याचना, मोहिनीकी शर्त तथा राजाद्वारा उसकी स्वीकृति एवं विवाह तथा दोनोंका राजधानीकी ओर प्रस्थान ........................६१२
१०२- सनकादि और नारदजीका प्रस्थान, नारदपुराणके माहात्म्यका वर्णन और पूर्वभागकी समाप्ति...................................५९२११३- घोड़ेकी टापसे कुचली हुई छिपकलीकी राजाद्वारा सेवा, छिपकलीकी आत्मकथा, पतिपर वशीकरणका दुष्परिणाम, राजाके पुण्यदानसे उसका उद्धार ...........................६१४
उत्तरभाग११४- मोहिनीके साथ राजा रुक्माङ्गदका वैदिश नगरको प्रस्थान, राजकुमार धर्माङ्गदका स्वागतके लिये मार्गमें आगमन तथा पिता-पुत्र-संवाद ...................................६१७
१०३- महर्षि वसिष्ठका मान्धाताको एकादशी-व्रतकी महिमा सुनाना ...........................५९५११५- धर्माङ्गदद्वारा मोहिनीका सत्कार तथा अपनी माताको मोहिनीकी सेवाके लिये एक पतिव्रता नारीका उपाख्यान सुनाना ..६१९
१०४- तिथिके विषयमें अनेक ज्ञातव्य बातें तथा विद्धा तिथिका निषेध........................५९६११६- संध्यावलीका मोहिनीको भोजन कराना और धर्माङ्गदके मातृभक्ति-पूर्णवचन .....६२३
१०५- रुक्माङ्गदके राज्यमें एकादशी-व्रतके प्रभावसे सबका वैकुण्ठ-गमन, यमराज आदिका चिन्तित होना, नारदजीसे उनका वार्तालाप तथा ब्रह्म-लोक-गमन .........५९८११७- धर्माङ्गदका माताओंसे पिता और
१०६- यमराजके द्वारा ब्रह्माजीसे अपने कष्टका निवेदन और रुक्माङ्गदके प्रभावका वर्णन ....................................................६००
१०७- ब्रह्माजीके द्वारा यमराजको भगवान् तथा उनके भक्तोंकी श्रेष्ठता बताना..............६०२
१०८- यमराजकी इच्छा-पूर्ति और भक्त रुक्माङ्गदका गौरव बढ़ानेके लिये ब्रह्माजीका अपने मनसे एक सुन्दरी नारीको प्रकट करना, नारीके प्रति वैराग्यकी भावना तथा उस सुन्दरी 'मोहिनी'का मन्दराचलपर जाकर मोहक संगीत गाना ........................................६०२

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
मोहिनीके प्रति उदार होनेका अनुरोध तथा पुत्रद्वारा माताओंका धन-वस्त्र आदिसे समादर ...................६२४१२६- मोहिनीका संध्यावलीसे उसके पुत्रका मस्तक माँगना और संध्यावलीका उसे स्वीकार करते हुए विरोचनकी कथा सुनाना .................................६४१
११८- राजाका अपने पुत्रको राज्य सौंपकर नीतिका उपदेश देना और धर्माङ्गदके सुराज्यकी स्थिति .................६२६१२७- रानी संध्यावलीका राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत करना, राजाका मोहिनीसे अनुनय-विनय, मोहिनीका दुराग्रह तथा धर्माङ्गदका राजाको अपने वधके लिये प्रेरित करना.............................६४५
११९- धर्माङ्गदका दिग्विजय, उसका विवाह तथा उसकी शासन-व्यवस्था .............६२७१२८- राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत देख मोहिनीका मूर्च्छित होना और पत्नी, पुत्रसहित राजा रुक्माङ्गदका भगवान्के शरीरमें प्रवेश करना ....................६४७
१२०- राजा रुक्माङ्गदका मोहिनीसे कार्तिकमासकी महिमा तथा चातुर्मास्यके नियम, व्रत एवं उद्यापन बताना .........६२९१२९- यमराजका ब्रह्माजीसे कष्ट-निवेदन, वर देनेके लिये उद्यत देवताओंको रुक्माङ्गदके पुरोहितकी फटकार तथा मोहिनीका ब्राह्मणके शापसे भस्म होना ...............६४८
१२१- राजा रुक्माङ्गदकी आज्ञासे रानी संध्यावलीका कार्तिकमासमें कृच्छ्रव्रत प्रारम्भ करना, धर्माङ्गदकी एकादशीके लिये घोषणा, मोहिनीका राजासे एकादशीको भोजन करनेका आग्रह और राजाकी अस्वीकृति ..................६३२१३०- मोहिनीकी दुर्दशा, ब्रह्माजीका राजपुरोहितके समीप जाकर उनको प्रसन्न करना, मोहिनीकी याचना ........................६५०
१२२- राजा रुक्माङ्गदद्वारा मोहिनीके आक्षेपोंका खण्डन, एकादशी-व्रतकी वैदिकता, मोहिनी-द्वारा गौतम आदि ब्राह्मणोंके समक्ष अपने पक्षकी स्थापना .............६३५१३१- मोहिनीको दशमीके अन्तभागमें स्थानकी प्राप्ति तथा उसे पुनः शरीरकी प्राप्ति .....६५३
१२३- राजाके द्वारा एकादशीके दिन भोजनविषयक मोहिनी तथा ब्राह्मणोंके वचनका खण्डन, मोहिनीका रुष्ट होकर राजाको त्यागकर जाना और धर्माङ्गदका उसे लौटाकर लाना एवं पितासे मोहिनीको दी हुई वस्तु देनेका अनुरोध करना ...........................६३७१३२- मोहिनी-वसु-संवाद—गङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन.......................६५५
१२४- राजा रुक्माङ्गदका एकादशीको भोजन न करनेका ही निश्चय........................६३९१३३- गङ्गाजीके दर्शन, स्मरण तथा उनके जलमें स्नान करनेका महत्त्व...............६५८
१२५- संध्यावली-मोहिनी-संवाद, रानी संध्यावलीका मोहिनीको पतिकी इच्छाके विपरीत चलनेमें दोष बताना ..............६४०१३४- कालविशेष और स्थलविशेषमें गङ्गास्नानकी महिमा ......................६६०
१३५- गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान, तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके दानोंकी महिमा...........................६६२
१३६- एक वर्षतक गङ्गार्चन-व्रतका विधान और माहात्म्य, गङ्गातटपर नक्त-व्रत

[ ११ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
करके भगवान् शिवका पूजन, प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको शिवाराधन तथा गङ्गा-दशहराके पुण्य-कृत्य एवं उनका माहात्म्य ............. ६६४बलभद्र तथा सुभद्राके और भगवान् नृसिंहके दर्शन-पूजन आदिका माहात्म्य ७०३
१३७- गयातीर्थकी महिमा ......................... ६७११४९- श्वेतमाधव, मत्स्यमाधव, कल्पवृक्ष और अष्टाक्षर-मन्त्र, स्नान, तर्पण आदिकी महिमा ........................................... ७०७
१३८- गयामें प्रथम और द्वितीय दिनके कृत्यका वर्णन, प्रेतशिला आदि तीर्थोंमें पिण्डदान आदिकी विधि और उन तीर्थोंकी महिमा ............................................. ६७४१५०- भगवान् नारायणके पूजनकी विधि ....... ७१०
१३९- गयामें तीसरे और चौथे दिनका कृत्य, ब्रह्मतीर्थ तथा विष्णुपद आदिकी महिमा ............................................. ६७९१५१- समुद्र-स्नानकी महिमा और श्रीकृष्ण-बलराम आदिके दर्शन आदिकी महिमा तथा श्रीकृष्णसे जगत्-सृष्टिका कथन एवं श्रीराधा-कृष्णके उत्कृष्ट स्वरूपका प्रतिपादन ....................................... ७१३
१४०- गयामें पाँचवें दिनका कृत्य, गयाके विभिन्न तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् महिमा ... ६८२१५२- इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नानकी विधि, ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राके अभिषेकका उत्सव ....... ७१५
१४१- अविमुक्त क्षेत्र—काशीपुरीकी महिमा .... ६८६१५३- अभिषेक-कालमें देवताओंद्वारा जगन्नाथजीकी स्तुति, गुण्डिचा-यात्राका माहात्म्य तथा द्वादश यात्राकी प्रतिष्ठा-विधि ................................... ७१७
१४२- काशीके तीर्थ एवं शिवलिङ्गोंके दर्शन-पूजन आदिकी महिमा .................... ६८९१५४- प्रयाग-माहात्म्यके प्रसङ्गमें तीर्थयात्राकी सामान्य विधिका वर्णन .................... ७२०
१४३- काशी-यात्राका काल, यात्राकालमें यात्रियोंके लिये आवश्यक कृत्य, अवान्तर तीर्थ और शिवलिङ्गोंका वर्णन ........... ६९११५५- प्रयागमें माघ-मकरके स्नानकी महिमा तथा वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य .......................................... ७२२
१४४- काशीकी गङ्गाके वरणा-सङ्गम, असी-सङ्गम तथा पञ्चगङ्गा आदि तीर्थोंका माहात्म्य ......................................... ६९४१५६- कुरुक्षेत्र-माहात्म्य ........................... ७२६
१४५- उत्कलदेशके पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमा, राजा इन्द्रद्युम्नका वहाँ जाकर मोक्ष प्राप्त करना ............................................ ६९५१५७- कुरुक्षेत्रके वन, नदी और भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य तथा यात्राविधिका क्रमिक वर्णन ................................... ७२७
१४६- राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति ............................................. ६९६१५८- गङ्गाद्वार (हरिद्वार) और वहाँके विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य ........................... ७३२
१४७- राजाको स्वप्नमें और प्रत्यक्ष भी भगवान्‌के दर्शन तथा भगवत्प्रतिमाओंका निर्माण, वर-प्राप्ति और प्रतिष्ठा .................... ६९८१५९- बदरिकाश्रमके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा . ७३३
१४८- पुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्राका समय, मार्कण्डेयेश्वर शिव, वट-वृक्ष, श्रीकृष्ण,१६०- सिद्धनाथ-चरित्रसहित कामाक्षा-माहात्म्य ७३६
१६१- प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य तथा उसके अवान्तर तीर्थोंकी महिमा ................................. ७३७

[ १२ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१६२- पुष्कर-माहात्म्य७४०१६९- अवन्ती—महाकालवनके तीर्थोंकी महिमा७५७
१६३- गौतमाश्रम-माहात्म्यमें गोदावरीके प्राकट्यका तथा पञ्चवटीके माहात्म्यका वर्णन७४२१७०- मथुराके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य७५८
१६४- पुण्डरीकपुरका माहात्म्य, जैमिनिद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति७४३१७१- वृन्दावन-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोंके सेवनका माहात्म्य७६०
१६५- परशुरामजीके द्वारा गोकर्णक्षेत्रका उद्धार तथा उसका माहात्म्य७४९१७२- पुरोहित वसुका भगवत्कृपासे वृन्दावन-वास, देवर्षि नारदके द्वारा शिव-सुरभि-संवादके रूपमें भावी श्रीकृष्णचरितका वर्णन७६३
१६६- श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य७५११७३- मोहिनीका सब तीर्थोंमें घूमकर यमुनामें प्रवेशपूर्वक दशमीके अन्तर्भागमें स्थित होना तथा नारदपुराणके पाठ एवं श्रवणकी महिमा७६५
१६७- सेतु-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा७५५
१६८- नर्मदाके तीर्थोंका दिग्दर्शन तथा उनका माहात्म्य७५६

[ १३ ]

चित्र-सूची

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
इकरंगे ( लाइन )२७- अतिथि-सत्कार .............................११६
१- नैमिषारण्यमें सूतजी महर्षियोंको कथा सुना रहे हैं..................................१९२८- श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणका पूजन ........११९
२९- ग्रहणके समय जप करना चाहिये........१२३
२- नारदजी और सनकादि कुमार प्रार्थना कर रहे हैं .................................२२३०- प्रायश्चित्त .................................१२७
३- श्रीनारायणके अङ्गोंसे त्रिदेवोंका प्रादुर्भाव .२५३१- विष्णु-पूजनसे सर्वपाप-नाशपूर्वक भगवत्प्राप्ति................................१२९
४- मृकण्डु ऋषिको भगवद्दर्शन .............३३३२- पापियोंके नरकका मार्ग ....................१३१
५- मार्कण्डेयका भगवान्‌को प्रणाम ...........३५३३- पुण्यात्माओंका मार्ग .......................१३२
६- गङ्गा और गायत्री..........................४१३४- सभी अवस्थाओंमें दुःख...................१३६
७- राजा बाहुकी पत्नीको और्व मुनिका सती होनेसे रोकना ...............................४३३५- सबमें भगवान्‌..............................१३९
३६- प्रणवमें भगवान्‌............................१४४
८- कपिलके नेत्रानलसे सगरपुत्र भस्म हो गये ...............................४९३७- हाथ, पैर, नेत्र आदिकी सफलता ........१४५
३८- जानन्ति और वेदमाली ....................१५०
९- दैत्योंकी लगायी आगसे सुदर्शनचक्रद्वारा अदितिकी रक्षा.............................५१३९- महर्षि उत्तङ्क और गुलिक ................१५३
१०- अदितिको भगवान्‌के द्वारा माला-दान .....५५४०- उत्तङ्कको भगवद्दर्शन .....................१५८
११- वामनजीका बलिसे भूमि माँगना ..........५७४१- परिक्रमा...................................१६०
१२- धर्मराज और भगीरथ......................६१४२- इन्द्र और सुधर्म ...........................१६१
१३- विष्णु, शिव आदिकी सेवासे भगवत्प्राप्ति६२४३- चारों युगोंके साधन .......................१६७
१४- नरक-यन्त्रणा .............................७६४४- चारों आश्रम................................१७१
१५- पापनाशक उपाय .........................८१४५- शरीरादिकी रथरूपमें कल्पना.............१७५
१६- महर्षि भृगुके आश्रममें भगीरथ............८६४६- मुनि पञ्चशिख और राजा जनक .........१७८
१७- भगीरथको शिव-दर्शन.....................८८४७- केशिध्वज और खाण्डिक्य ................१८५
१८- पूजन, ब्राह्मण-भोजन, फलादि-दान........९३४८- भगवान् विष्णु..............................१९१
१९- श्रीलक्ष्मी-नारायण-पूजन, हवन.............९३४९- राजा भरत और मृग-शिशु...............१९३
२०- ध्वजारोपण................................९५५०- जड़भरत और राजा रहूगण ..............१९७
२१- दीपदान ...................................९९५१- निदाघ और ऋभु..........................२००
२२- भद्रशीलके द्वारा खेलमें भगवत्पूजन .....१०१५२- सर्वग्रास चन्द्रग्रहणका दृश्य .............२०२
२३- ब्राह्मणके कर्म...........................१०५५३- खण्ड सूर्यग्रहणका दृश्य..................२०३
२४- गुरुके चरणोंमें नमस्कार .................१०८५४- सूर्यग्रहण .................................२०३
२५- किस-किस समय शिखा खुली न रहे .११०५५- पञ्चशलाकाचक्र ...........................३७०
२६- त्रिकाल गायत्रीका ध्यान ................११४५६- शुकदेवजी राजा जनकके द्वारपर ........४०८
५७- शुकदेवजी जनकके प्रमोदावनमें..........४०८

[ १४ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
५८- शुकदेवजी और राजा जनक .............४०८८६- पुराण-दान .....................................५२४
५९- शुकदेवजी और व्यासजी .................४१२८७- पुराण-श्रवण.....................................५२६
६०- शुकदेवजीको भगवद्दर्शन .................४१८८८- भागवत-दान ...................................५२७
६१- श्रीदेवी और भूदेवीके साथ भगवान् नारायणका ध्यान....................४५४८९- गायोंके साथ पुराण-दान .......................५२८
६२- श्रीसीतारामका ध्यान .......................४५६९०- मार्कण्डेयपुराण-दान............................५२९
६३- कल्पवृक्षके नीचे श्रीसीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामका ध्यान ...........................४५८९१- अग्निपुराण-दान .................................५३०
६४- सिंहासनारूढ सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामका ध्यान ...........................४५९९२- भविष्यपुराण-दान ..............................५३१
६५- पुष्पकविमानपर श्रीसीतारामका ध्यान ....४६०९३- वाराहपुराण-दान ...............................५३४
६६- कल्पवृक्षके नीचे श्रीसीतारामका ध्यान ..४६१९४- राजा अम्बरीष और दुर्वासा मुनि .........५३६
६७- श्रीरामका ध्यान करते हनुमान्‌जीका ध्यान....................................४६६९५- स्कन्दपुराण-दान ..............................५४२
६८- वीर हनुमान्‌का ध्यान ......................४६७९६- कूर्मपुराण-दान .................................५४४
६९- कपीश्वर हनुमान्‌का ध्यान ................४७३९७- समुद्र-मन्थन ...................................५४५
७०- श्रीकृष्णका प्रातःकालीन ध्यान ............४७८९८- गरुडपुराण-दान .................................५४६
७१- श्रीकृष्णका मध्याह्नकालीन ध्यान ..........४७९९९- देवी-पूजन.....................................५५०
७२- श्रीकृष्णका सायंकालीन ध्यान ............४८०१००- शिव-पूजन ....................................५५२
७३- मुरारिभगवान्‌का ध्यान ......................४८४१०१- गणेश-पूजन ..................................५५४
७४- गोपालयन्त्र ................................४८५१०२- मत्स्यभगवान्‌की पूजा..........................५५७
७५- अष्टभुज महाकृष्णका ध्यान ...............४९२१०३- कपिला गौका पूजन ...........................५६०
७६- नन्दनन्दन श्रीकृष्णका ध्यान ..............४९३१०४- सूर्य-पूजन ....................................५६२
७७- गोपालकृष्णका ध्यान ......................४९३१०५- श्रीराधाका पूजन और उसका फल ......५६६
७८- श्रीकृष्णभिषेकका ध्यान ....................४९४१०६- श्रीरामका पूजन, ब्राह्मण-भोजन और उसका फल ...................................५६९
७९- बाल-गोपालका ध्यान ......................४९५१०७- गङ्गादशहरा-स्नान.............................५७०
८०- श्रीकृष्ण-बलरामका ध्यान ....................४९६१०८- विष्णु-पूजन ....................................५७३
८१- व्रजराज-कुमारका ध्यान....................४९७१०९- द्वादश ब्राह्मण-भोजन .........................५७७
८२- गुरुपुत्र प्रदान करते श्रीकृष्णका ध्यान ...४९८११०- शिव-पार्वती-पूजन ..............................५८१
८३- श्रीदेवी, भूदेवीके साथ गरुड़पर बैठे भगवान् विष्णुका ध्यान ...................४९९१११- नृसिंह-पूजन ...................................५८४
८४- भगवान् व्यासका ध्यान .....................५००११२- वट-प्रदक्षिणा ..................................५८८
८५- ब्रह्माजी और मरीचि ........................५२१११३- दीपदान ........................................५९१
११४- राजा मान्धाता और महर्षि वसिष्ठ ........५९५
११५- ब्रह्माकी सभामें चित्रगुप्त, यम और नारदजी ........................................५९९
११६- ब्रह्माकी सभामें नारीकी उत्पत्ति ...........६०३
विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
११७- राजा रुक्माङ्गदकी घोषणा ................६०७१३८- कालिका-पूजन ..................................६९२
११८- रुक्माङ्गद और महर्षि वामदेव ...........६०९१३९- इन्द्रद्युम्नको स्वप्नमें भगवद्दर्शन ............६९९
११९- रुक्माङ्गदका पर्वतके पास पहुँचना .......६१२१४०- बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्रा ............७०४
१२०- रुक्माङ्गदका छिपकलीके शरीरपर पानी डालना ....................................६१५१४१- वट-पूजन ........................................७०८
१२१- छिपकलीका दिव्य शरीर-धारण ..........६१७१४२- वे ही श्रीराम हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं .....७१४
१२२- मोहिनीको पीठपर पैर रखकर धर्माङ्गदने घोड़ेपर चढ़ाया .................६२०१४३- रथ-यात्रा ........................................७१९
१२३- पतिव्रताका पतिसहित देवलोक-गमन ...६२२१४४- प्रयाग-सङ्गम-स्नान ............................७२४
१२४- धर्माङ्गदका माताओंको समझाना ..........६२५१४५- कुरुक्षेत्र ...........................................७३१
१२५- धर्माङ्गदका पिताके सामने मणि रखना .६२७१४६- गरुडको भगवद्दर्शन ............................७३४
१२६- गाय एक घड़ा दूध देती ....................६२९१४७- रुक्मिणी-पूजन .................................७३९
१२७- त्रिरात्र-व्रतमें दान ...........................६३११४८- गौतमपर शिव-कृपा ............................७४२
१२८- मोहिनीकी ब्राह्मणोंसे बात ...................६३६१४९- जैमिनि ऋषिपर शिव-कृपा .................७४४
१२९- देवताओंको विष्णु-दर्शन .....................६४३१५०- ऋषियोंको परशुरामजीके दर्शन ............७५०
१३०- राजाको पुत्र-हत्यासे भगवान्‌का रोकना .६४७१५१- विश्वामित्रकी यज्ञ-रक्षा .........................७५१
१३१- ब्राह्मणके पास मोहिनीको लेकर देवताओंका जाना .............................६५२१५२- श्रीरामजी धनुष तोड़ रहे हैं .................७५२
१३२- गङ्गा-स्नानसे शिवधामकी प्राप्ति ...........६५८१५३- वानरोंकी सम्पातीसे भेंट ....................७५३
१३३- गङ्गाजी ...........................................६६३१५४- सीताजीकी अग्नि-परीक्षा .....................७५३
१३४- गङ्गामें प्राण-त्याग करनेवालोंको देवताओंका नमस्कार .......................................६७०१५५- श्रीराम-दरबारमें लव-कुशका रामायण-गान ...................................७५४
१३५- फल्गु नदीके तटपर श्राद्ध ....................६७६१५६- लक्ष्मणजी दुर्वासा मुनिको रोक रहे हैं..७५५
१३६- श्रीरामद्वारा दशरथजीको पिण्डदान ........६८११५७- विश्रामघाटमें स्नान करनेसे विष्णुलोककी प्राप्ति ...........................७५९
१३७- काशी-मुक्ति ....................................६८७१५८- गोवर्धन ब्राह्मणको भगवद्दर्शन .............७६२
१५९- वसुको श्यामसुन्दरके दर्शन .................७६४
१६०- मोहिनीका यमुनामें प्रवेश ....................७६६

(चित्र: देवर्षि नारद एवं चार कुमार—सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार)

पूर्वभाग

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

श्रीनारदमहापुराण

पूर्वभाग

प्रथम पाद

सिद्धाश्रममें शौनकादि महर्षियोंका सूतजीसे प्रश्न तथा सूतजीके द्वारा नारदपुराणकी महिमा और विष्णुभक्तिके माहात्म्यका वर्णन

ॐ वेदव्यासाय नमः<br>नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥ १॥<br>भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा सरस्वतीदेवीको नमस्कार करके भगवदीय उत्कर्षका प्रतिपादन करनेवाले इतिहास-पुराणका पाठ करे।<br>वन्दे वृन्दावनासीनमिन्दिरानन्दमन्दिरम्।<br>उपेन्द्रं सान्द्रकारुण्यं परानन्दं परात्परम्॥ २॥<br>जो लक्ष्मीके आनन्द-निकेतन भगवान् विष्णुके अवतार-स्वरूप है, उस स्नेहयुक्त करुणाकी निधि परात्पर परमानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम वृन्दावनवासी श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यं यस्यांशा लोकसाधकाः।<br>तमादिदेवं चिद्रूपं विशुद्धं परमं भजे॥ ३॥<br>ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जिसके स्वरूप हैं तथा लोकपाल जिसके अंश हैं, उस विशुद्ध ज्ञानस्वरूप आदिदेव परमात्माकी मैं आराधना करता हूँ।<br>नैमिषारण्य नामक विशाल वनमें महात्मा शौनक आदि ब्रह्मवादी मुनि मुक्तिकी इच्छासेतपस्यामें संलग्न थे। उन्होंने इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था। उनका भोजन नियमित था। वे सच्चे संत थे और सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये पुरुषार्थ करते थे। आदिपुरुष सनातन भगवान् विष्णुका वे बड़ी भक्तिसे यजन-पूजन करते रहते थे। उनमें ईर्ष्याका नाम नहीं था। वे सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और समस्त लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले थे। ममता और अहङ्कार उन्हें छू भी नहीं सके थे। उनका चित्त निरन्तर परमात्माके चिन्तनमें तत्पर रहता था। वे समस्त कामनाओंका त्याग करके सर्वथा निष्पाप हो गये थे। उनमें शम, दम आदि सद्गुणोंका सहज विकास था। काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े, सिरपर जटा बढ़ाये तथा निरन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वे महर्षिगण सदा परब्रह्म परमात्माका जप एवं कीर्तन करते थे। सूर्यके समान प्रतापी, धर्मशास्त्रोंका यथार्थ तत्त्व जाननेवाले वे महात्मा नैमिषारण्यमें तप करते थे। उनमेंसे कुछ लोग यज्ञोंद्वारा यज्ञपति भगवान् विष्णुका यजन करते थे। कुछ लोग ज्ञानयोगके साधनोंद्वारा

१८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

ज्ञानस्वरूप श्रीहरिकी उपासना करते थे और कुछ लोग भक्तिके मार्गपर चलते हुए परा-भक्तिके द्वारा भगवान् नारायणकी पूजा करते थे।

एक समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका उपाय जाननेकी इच्छासे उन श्रेष्ठ महात्माओंने एक बड़ी भारी सभा की। उसमें छब्बीस हजार ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले) मुनि सम्मिलित हुए थे। उनके शिष्य-प्रशिष्योंकी संख्या तो बतायी ही नहीं जा सकती। पवित्र अन्तःकरणवाले वे महातेजस्वी महर्षि लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही एकत्र हुए थे। उनमें राग और मात्सर्यका सर्वथा अभाव था। वे शौनकजीसे यह पूछना चाहते थे कि इस पृथ्वीपर कौन-कौन-से पुण्यक्षेत्र एवं पवित्र तीर्थ हैं। त्रिविध तापसे पीड़ित चित्तवाले मनुष्योंको मुक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है। लोगोंको भगवान् विष्णुकी अविचल भक्ति कैसे प्राप्त होगी तथा सात्त्विक, राजस और तामस—भेदसे तीन प्रकारके कर्मोंका फल किसके द्वारा प्राप्त होता है। उन मुनियोंको अपनेसे इस प्रकार प्रश्न करनेके लिये उद्यत देखकर उत्तम बुद्धिवाले शौनकजी विनयसे झुक गये और हाथ जोड़कर बोले।

शौनकजीने कहा— महर्षियो! पवित्र सिद्धाश्रम-तीर्थमें पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजी रहते हैं। वे वहाँ अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा विश्वरूप भगवान् विष्णुका यजन किया करते हैं। महामुनि सूतजी व्यासजीके शिष्य हैं। वे यह सब विषय अच्छी तरह जानते हैं। उनका नाम रोमहर्षण है। वे बड़े शान्त स्वभावके हैं और पुराणसंहिताके वक्ता हैं। भगवान् मधुसूदन प्रत्येक युगमें धर्मोंका ह्रास देखकर वेदव्यास-रूपसे प्रकट होते और एक ही वेदके अनेक विभाग करते हैं। विप्रगण! हमने सब शास्त्रोंमें यह सुना है कि वेदव्यास मुनि साक्षात् भगवान् नारायण ही हैं। उन्हीं भगवान् व्यासने सूतजीको पुराणोंका उपदेश दिया है। परम बुद्धिमान् वेदव्यासजीके द्वारा भलीभाँति उपदेश पाकर सूतजी सब धर्मोंके ज्ञाता हो गये हैं। संसारमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई पुराणोंका ज्ञाता नहीं है; क्योंकि इस लोकमें सूतजी ही पुराणोंके तात्त्विक अर्थको जाननेवाले, सर्वज्ञ और बुद्धिमान् हैं। उनका स्वभाव शान्त है। वे मोक्षधर्मके ज्ञाता तो हैं ही, कर्म और भक्तिके विविध साधनोंको भी जानते हैं। मुनीश्वरो! वेद, वेदाङ्ग और शास्त्रोंका जो सारभूत तत्त्व है, वह सब मुनिवर व्यासने जगत्के हितके लिये पुराणोंमें बता दिया है और ज्ञानसागर सूतजी उन सबका यथार्थ तत्त्व जाननेमें कुशल हैं, इसलिये हमलोग उन्हींसे सब बातें पूछें।

इस प्रकार शौनकजीने मुनियोंसे जब अपना अभिप्राय निवेदन किया, तब वे सब महर्षि विद्वानोंमें श्रेष्ठ शौनकजीको आलिङ्गन करके बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें साधुवाद देने लगे। तदनन्तर सब मुनि वनके भीतर पवित्र सिद्धाश्रमतीर्थमें गये और वहाँ उन्होंने देखा कि सूतजी अग्निष्टोम यज्ञके द्वारा अनन्त अपराजित भगवान् नारायणका यजन कर रहे हैं। सूतजीने उन विख्यात तेजस्वी महात्माओंका यथोचित स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् उनसे नैमिषारण्यनिवासी मुनियोंने इस प्रकार पूछा—

ऋषि बोले— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सूतजी! हम आपके यहाँ अतिथिरूपमें आये हैं, अतः आपसे आतिथ्य-सत्कार पानेके अधिकारी हैं। आप ज्ञान-दानरूपी पूजन-सामग्रीके द्वारा हमारा पूजन कीजिये। मुने! देवतालोग चन्द्रमाकी किरणोंसे निकला हुआ अमृत पीकर जीवन धारण करते हैं; परंतु इस पृथ्वीके देवता ब्राह्मण

* पूर्वभाग-प्रथम पाद * १९


आपके मुखसे निकले हुए ज्ञानरूपी अमृतको पीकर तृप्त होते हैं। तात! हम यह जानना चाहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् किससे उत्पन्न हुआ? इसका आधार और स्वरूप क्या है? यह किसमें स्थित है और किसमें इसका लय होगा? भगवान् विष्णु किस साधनसे प्रसन्न होते हैं? मनुष्योंद्वारा उनकी पूजा कैसे की जाती है? भिन्न-भिन्न वर्णों और आश्रमोंका आचार क्या है! अतिथिकी पूजा कैसे की जाती है, जिससे सब कर्म सफल हो जाते हैं? वह मोक्षका उपाय मनुष्योंको कैसे सुलभ है, पुरुषोंको भक्तिसे कौन-सा फल प्राप्त होता है और भक्तिका स्वरूप क्या है? मुनिश्रेष्ठ सूतजी! ये सब बातें आप हमें इस प्रकार समझाकर बतावें कि फिर इनके विषयमें कोई संदेह न रह जाय, आपके अमृतके समान वचनोंको सुननेके लिये किसके मनमें श्रद्धा नहीं होगी?

सूतजीने कहा— महर्षियो! आप सब लोग सुनें। आपलोगोंको जो अभीष्ट है, वह मैं बतलाता हूँ। सनकादि मुनीश्वरोंने महात्मा नारदजीसे जिसका वर्णन किया था, वह नारदपुराण आप सुनें। यह वेदार्थसे परिपूर्ण है—इसमें वेदके सिद्धान्तोंका ही प्रतिपादन किया गया है। यह समस्त पापोंकी शान्ति तथा दुष्ट ग्रहोंकी बाधाका निवारण करनेवाला है। दुःस्वप्नोंका नाश करनेवाला, धर्मसम्मत तथा भोग एवं मोक्षको देनेवाला है। इसमें भगवान् नारायणकी पवित्र कथाका वर्णन है। यह नारदपुराण सब प्रकारके कल्याणकी प्राप्तिका हेतु है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका भी कारण है। इसके द्वारा महान् फलोंकी भी प्राप्ति होती है, यह अपूर्व पुण्यफल प्रदान करनेवाला है। आप सब लोग एकाग्रचित्त होकर इस महापुराणको सुनें। महापातकों तथा उपपातकोंसे युक्त मनुष्य भी महर्षि व्यासप्रोक्त इस दिव्य पुराणका श्रवण करके शुद्धिको प्राप्त होते हैं। इसके एक अध्यायका पाठ करनेसे अश्वमेध यज्ञका और दो अध्यायोंके पाठसे राजसूय यज्ञका फल मिलता है। ब्राह्मणो! ज्येष्ठके महीनेमें पूर्णिमा तिथिको मूल नक्षत्रका योग होनेपर मनुष्य इन्द्रिय-संयमपूर्वक मथुरापुरीकी यमुनाके जलमें स्नान करके निराहार व्रत रहे और विधिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे तो इससे उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसीको वह इस पुराणके तीन अध्यायोंका पाठ करके प्राप्त कर लेता है। इसके दस अध्यायोंका भक्तिभावसे श्रवण करके मनुष्य निर्वाण मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यह पुराण कल्याण-प्राप्तिके साधनोंमें सबसे श्रेष्ठ है। पवित्र ग्रन्थोंमें इसका स्थान सर्वोत्तम है। यह बुरे स्वप्नोंका नाशक और परम पवित्र है। ब्रह्मर्षियो! इसका यत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिये। यदि मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसके एक श्लोक या आधे श्लोकका भी पाठ कर ले तो वह महापातकोंके

२० * संक्षिप्त नारदपुराण *

समूहसे तत्काल मुक्त हो जाता है।

साधु पुरुषोंके समक्ष ही इस पुराणका वर्णन करना चाहिये; क्योंकि यह गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय है। भगवान् विष्णुके समक्ष, किसी पुण्य क्षेत्रमें तथा ब्राह्मण आदि द्विजातियोंके निकट इस पुराणकी कथा बाँचनी चाहिये। जिन्होंने काम-क्रोध आदि दोषोंको त्याग दिया है, जिनका मन भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लगा है तथा जो सदाचारपरायण हैं, उन्हींको यह मोक्षसाधक पुराण सुनाना चाहिये। भगवान् विष्णु सर्वदेवमय हैं। वे अपना स्मरण करनेवाले भक्तोंकी समस्त पीड़ाओंका नाश कर देते हैं। श्रेष्ठ भक्तोंपर उनकी स्नेह-धारा सदा प्रवाहित होती रहती है। ब्राह्मणो! भगवान् विष्णु केवल भक्तिसे ही संतुष्ट होते हैं, दूसरे किसी उपायसे नहीं। उनके नामका बिना श्रद्धाके भी कीर्तन अथवा श्रवण कर लेनेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो अविनाशी वैकुण्ठ धामको प्राप्त कर लेता है। भगवान् मधुसूदन संसाररूपी भयंकर एवं दुर्गम वनको दग्ध करनेके लिये दावानलरूप हैं। महर्षियो! भगवान् श्रीहरि अपना स्मरण करनेवाले पुरुषोंके सब पापोंका उसी क्षण नाश कर देते हैं। उनके तत्त्वका प्रकाश करनेवाले इस उत्तम पुराणका श्रवण अवश्य करना चाहिये। सुनने अथवा पाठ करनेसे भी यह पुराण सब पापोंका नाश करनेवाला है। ब्राह्मणो! जिसकी बुद्धि भक्तिपूर्वक इस पुराणके सुननेमें लग जाती है, वही कृतकृत्य है। वही सम्पूर्ण शास्त्रोंका मर्मज्ञ पण्डित है तथा उसीके द्वारा किये हुए तप और पुण्यको मैं सफल मानता हूँ; क्योंकि बिना तप और पुण्यके इस पुराणको सुननेमें प्रेम नहीं हो सकता। जो संसारका हित चाहनेवाले साधु पुरुष हैं, वे ही उत्तम कथाओंके सुननेमें प्रवृत्त होते हैं। पापपरायण दुष्ट पुरुष तो सदा दूसरोंकी निन्दा और दूसरोंके साथ कलह करनेमें ही लगे रहते हैं। द्विजवरो! जो नराधम पुराणोंमें अर्थवाद होनेकी शङ्का करते हैं, उनके किये हुए समस्त पुण्य नष्ट हो जाते हैं। विप्रवरो! मोहग्रस्त मानव दूसरे-दूसरे कार्योंके साधनमें लगे रहते हैं, परंतु पुराणश्रवणरूप पुण्यकर्मका अनुष्ठान नहीं करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो मनुष्य बिना किसी परिश्रमके यहाँ अनन्त पुण्य प्राप्त करना चाहता हो, उसको भक्तिभावसे निश्चय ही पुराणोंका श्रवण करना चाहिये। जिस पुरुषकी चित्तवृत्ति पुराण सुननेमें लग जाती है, उसके पूर्वजन्मोपार्जित समस्त पाप निस्संदेह नष्ट हो जाते हैं। जो मानव सत्सङ्ग, देवपूजा, पुराणकथा और हितकारी उपदेशमें तत्पर रहता है, वह इस देहका नाश होनेपर भगवान् विष्णुके समान तेजस्वी स्वरूप धारण करके उन्हींके परम धाममें चला जाता है। अतः विप्रवरो! आपलोग इस परम पवित्र नारदपुराणका श्रवण करें। इसके श्रवण करनेसे मनुष्यका मन भगवान् विष्णुमें संलग्न होता है और वह जन्म-मृत्यु तथा जरा आदिके बन्धनसे छूट जाता है।

आदिदेव भगवान् नारायण श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता तथा पुराणपुरुष हैं। उन्होंने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त कर रखा है। वे भक्तजनोंके मनोवाञ्छित पदार्थको देनेवाले हैं। उनका स्मरण करके मनुष्य मोक्षपदको प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मणो! जो ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु आदि भिन्न-भिन्न रूप धारण करके इस जगत्की सृष्टि, संहार और पालन करते हैं, उन आदिदेव परम पुरुष परमेश्वरको अपने हृदयमें स्थापित करके मनुष्य मुक्ति पा लेता है। जो नाम और जाति आदिकी कल्पनाओंसे रहित हैं, सर्वश्रेष्ठ तत्त्वोंसे भी परम उत्कृष्ट हैं, परात्पर पुरुष हैं, उपनिषदोंके द्वारा