नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
युक्तमविधेया अविनेया अतिविरूपा च तस्मात् तव न ददामीति शुल्कप्रदाने नास्त्यनृतदोषः। स्पष्ट है कि कन्या को अधिक उपयुक्त वर देने की दृष्टि से पहले प्रस्ताव को भंग करने के लिए झूठे बहाने बनाने में भी दोष नहीं माना गया। हमारे विचार में कालान्तर में कुछ दुष्ट अभिभावकों द्वारा अपने लोभ की पूर्ति के लिए इस झूठ का जमकर दुरुपयोग किया जाने लगा। नादुष्टां दूषयेत् कन्यां नादुष्टं दूषयेद्वरम्। दोषं तु सति नागः स्यादन्योन्यं त्यजतास्तयोः॥ ३१॥ दोष-रहित कन्या अथवा वर में सम्बन्ध स्थिर हो जाने के उपरान्त छिद्रान्वेषण अथवा दोष-दर्शन जहां सर्वथा अनुचित है, वहां स्पष्ट दोष दिखाई देने पर कन्या अथवा वर के त्यागने अथवा सम्बन्ध-विच्छेद करने में कोई दोष अथवा अनौचित्य नहीं है। दत्वा न्यायेन यः कन्यां वराय न ददाति ताम्। अदुष्टश्चेद्दरो राज्ञा स दण्ड्यस्तत्र चौरवत्॥ ३२॥ भली प्रकार सोच विचार करके विधिपूर्वक कन्या का वाग्दान करने के उपरान्त वर में किसी दोष के न होने पर तथा वर पक्षवालों के किसी अपराध के न करने पर भी अपने वचन से मुकरने वाले, अर्थात् वाग्दत्ता कन्या का विवाह न करने वाले कन्या के अभिभावक को प्रशासन द्वारा चोर के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति। तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं पूर्वसाहसचोदितम्॥ ३३॥ किसी दोष- असाध्य रोग से पीड़ित, बोलने में हकलाना तथा चलने में लड़खड़ाना आदि-से ग्रस्त कन्या के दोष को छिपाकर धोखे से उसे किसी के मत्थे मढ़ने वाले, अर्थात् वर पक्षवालों को अंधेरे में रखने वाले कन्या के अभिभावक (पिता आदि) को पूर्वसाहस का दण्ड देना चाहिए। अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः। स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥ ३४॥ किसी अक्षतयोनि कन्या को भुक्त (पुरुष विशेष से सम्बन्ध रखने वाली) कहकर कलंकित करने वाले, परन्तु अपने आरोप को सिद्ध करने के लिए प्रमाण न जुटा सकने वाले व्यक्ति से सौ पण दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए। प्रतिगृह्य तु यः कन्यामदुष्टामृत्सृजेन्नरः। स विनेयस्त्वकामोऽपि कन्यां तामेव चोद्वहेत्॥ ३५॥ दोषरहित कन्या के ग्रहण की सहमति देकर, अकारण उसका परित्याग करने नारदस्मृति / 203
वाले पुरुष को इच्छा न होने पर भी उससे विवाह करना पड़ता है। दीर्घकुत्सितरोगार्ता व्यङ्गा संसृष्टमैथुना। धृष्टान्यगतभावा च कन्यादोषाः प्रकीर्तिताः ॥ 36 ॥ कन्या को अग्राह्य बनाने वाले दोष निम्नलिखित हैं—
- दीर्घकाल से चले आ रहे असाध्य रोग से ग्रस्त—दमा, राजयक्ष्मा, कैंसर आदि से पीड़ित।
- कुत्सित रोग से ग्रस्त—कोढ़, सफ़ेद दाग, दाद खुजली आदि चर्म रोगों की शिकार।
- आर्त्ता—मासिक धर्म आने पर असह्य पीड़ा से कराहने वाली, क्षुधा- पीड़ित तथा दारिद्र्य की प्रतिमूर्ति।
- व्यंगा—विकलांग—अन्धी, काणी, भैंगी, लंगड़ी, कुबड़ी, टेढ़े-मेढ़े हाथ- पांव वाली।
- संसृष्ट मैथुना—विवाह से पूर्व ही पुरुष से सम्बन्ध रखने वाली, व्यभिचारिणी।
- धृष्टा—ढीठ, निर्लज्ज, अनुचित एवं अश्लील विषयों में रुचि लेने वाली, मर्यादा की रक्षा न करने वाली तथा दुस्साहस करने वाली।
- अन्यगतभावा—पुरुषों से प्रीति एवं मित्रता करने वाली, आज की भाषा में ब्वायफ्रेण्ड बनाने वाली ! उन्मत्तः पतितः क्लीबो दुर्भगस्त्यक्तबान्धवः। कन्यादोषौ च यौ पूर्वावेषं दोषगणो वरे ॥ 37 ॥ इसी प्रकार वर को अवरणीय बनाने वाले दोष निम्नलिखित हैं—
- उन्मत्त—मस्तिष्क का सन्तुलित न होकर विकारग्रस्त होना। शरीर में वात, पित्त तथा कफ के विकार से, धन के विनाश से तथा सन्निपात ज्वर से प्रायः मन अस्थिर और मस्तिष्क विकृत हो जाता है।
- पतित—निकृष्ट कर्मों के कारण जाति से बहिष्कृत तथा धर्मानुष्ठान आदि के अयोग्य घोषित।
- क्लीव—नपुंसक, रति भोग में असमर्थ।
- दुर्भग—स्त्रियों के बदले समलिंगियों अथवा पशुओं से अथवा स्त्रियों के भग के स्थान पर उनकी गुदा या मुख में मैथुन करने वाला।
- त्यक्त बान्धव—जिसके अवगुणों (दोषों) के कारण बन्धु बान्धवों ने उससे नाता ही तोड़ लिया है।
- रोगग्रस्त—पुराने असाध्य रोग से पीड़ित तथा
- विकलांग—शरीर के किसी अंग से असामान्य। 204 / नारदस्मृति
अष्टौ विवाहा वर्णानां संस्कारार्थं प्रकीर्तिताः । ब्राह्मस्तु प्रथमस्तेषां प्राजापत्यस्तथापरः ॥ ३८ ॥ आर्षश्चैव हि दैवश्च गान्धर्वश्चासुरस्तथा। राक्षसोऽनन्तरस्तस्मात् पैशाचस्त्वष्टमः स्मृतः ॥ ३९ ॥ चारों वर्णों के लोगों के विवाह के निम्नोक्त आठ भेद हैं—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष, दैव, गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच। सत्कृत्याहूय कन्यां तु दद्यात्ब्राह्मोत्वलंकृताम्। सह धर्मं चरेत्युक्त्वा प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥ ४० ॥ ब्राह्म विवाह में कन्या का पिता वर को निमन्त्रित करके उसे अपनी सुभूषित और अलंकृता कन्या सादर समर्पित करता है। प्राजापत्य विवाह में कन्या का पिता वर को कन्या समर्पित करते हुए उन दोनों को मिलकर धर्मानुचरण करने का निर्देश देता है। वस्त्रगोमिथुनाभ्यां तु विवाहस्त्वार्ष उच्यते। अन्तर्वेद्यां तु दैवः स्याहृत्विजे कर्म कुर्वते ॥ ४१ ॥ वरपक्ष से वस्त्र, गाय और वृषभ आदि लेकर कन्या का विवाह करना आर्ष विवाह कहलाता है तथा ऋत्विक् कर्म करने वाले को दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना दैव विवाह कहलाता है। इच्छन्तीमिच्छतः प्राहुर्गान्धर्वं नाम पञ्चमम्। विवाहस्त्वासुरो ज्ञेयः शुल्कसंव्यवहारतः ॥ ४२ ॥ एक-दूसरे पर अनुरक्त लड़के-लड़की को दोनों के माता-पिता द्वारा विवाह बन्धन में बांध देना गान्धर्व विवाह कहलाता है तथा शुल्क लेकर कन्या का दान, अर्थात् कन्या को बेचना—उपयुक्त पात्रता की अपेक्षा शुल्क की राशि को महत्त्व देना—आसुर विवाह कहलाता है। प्रसह्यहरणादुक्तो विवाहो राक्षसस्तथा। सुप्तप्रमत्तोपगमात् पैशाचस्त्वष्टमोऽधमः ॥ ४३ ॥ कन्या तथा उसके माता-पिता की इच्छा-अनिच्छा, सहमति-विमति आदि की अपेक्षा किये बिना बलपूर्वक कन्या का हरण करके, उससे विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहलाता है तथा सोयी हुई, मूर्च्छित अथवा प्रमत्त स्त्री से सम्भोग करके उसे विवाह के लिए विवश-सहमत करना पैशाच विवाह कहलाता है, जो क्रम की दृष्टि से आठवें स्थान पर है। एषां तु धर्म्याश्चत्वारो ब्राह्माद्याः समुदाहृताः । साधारणः स्याद् गन्धर्वस्त्रयोऽधर्म्यास्ततः परे ॥ ४४ ॥ उपर्युक्त आठ प्रकार के विवाहों में प्रथम चार—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष तथा नारदस्मृति / 205
दैव—धर्मसम्मत हैं। पांचवां गान्धर्व विवाह साधारण है, अर्थात् उसे न धर्मसम्मत कहा जा सकता है और न ही धर्म विरुद्ध। अन्य तीन--आसुर, राक्षस तथा पैशाच—अधर्म और पाप-रूप होने से निन्दनीय एवं त्याज्य हैं। परपूर्वाः स्त्रियस्त्वन्याः सप्त प्रोक्ता यथाक्रमम्। पुनर्भूर्स्त्रिविधा तासां स्वैरिणी तु चतुर्विधा ॥ 45 ॥ एक से अधिक पुरुषों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्रियों के सात प्रकार भेद हैं—इनमें तीन प्रकार की स्त्रियों को 'पुनर्भू' और चार प्रकार की स्त्रियों को 'स्वैरिणी' माना जाता है। कन्यैवाक्षतयोनिर्या पाणिग्रहणदूषिता । पुनर्भूः प्रथमा प्रोक्ता पुनः संस्कारमर्हति ॥ 46 ॥ विवाह से पूर्व अक्षतयोनि और केवल विवाहित पति से दूषित होने वाली और उसे छोड़कर फिर से दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली प्रथम 'पुनर्भू' कहलाती है। अभिप्राय यह है कि विवाह के उपरान्त पति के किसी दोष, असाध्य रुग्णता, मस्तिष्क-विकृति तथा नपुंसकता आदि के प्रकट हो जाने पर उससे सम्बन्ध- विच्छेद करके दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली स्त्री पूर्वपति की भुक्ता होने के कारण पुनर्भू मानी जाती है। कौमारं पतिमुत्सृज्य या त्वन्यं पुरुषं श्रिता। पुनः पत्युर्गृहंमियात् सा द्वितीया प्रकीर्तिता ॥ 47 ॥ अपने कुमार (छोटी आयु) पति की विवाहिता युवती अन्य पुरुष से सम्बन्ध रखती हुई पति के युवा होने पर उसके पास लौट आने वाली स्त्री दूसरे प्रकार की 'पुनर्भू' कहलाती है। कुछ प्रदेशों में छोटी आयु के लड़कों की बड़ी आयु की लड़कियों से विवाह करने और लड़कों के युवा होने तक लड़कियों के ज्येष्ठ आदि की भुक्ता बने रहने की प्रथा है। उसी के सन्दर्भ में उक्त कथन है। असत्सुः देवरेषु स्त्री बान्धवैर्या प्रदीयते । सवर्णाय सपिण्डाय सा तृतीया प्रकीर्तिता ॥ 48 ॥ पति की अकालमृत्यु हो जाने पर और देवर आदि के न होने पर अथवा उसके द्वारा ग्रहण को उद्यत न होने पर किसी सगोत्री अथवा सपिण्डी से विवाहित होने वाली स्त्री तीसरे प्रकार की 'पुनर्भू' कहलाती है। स्त्री प्रसूताप्रसूता वा पत्यावेव तु जीवति। कामाद्या संश्रयेदन्यं प्रथमा स्वैरिणी तु सा ॥ 49 ॥ पति के जीवित होते हुए सन्तानवती अथवा निस्सन्तान स्त्री अपने असमर्थ पति से असन्तुष्ट होने के कारण उसका परित्याग कर, अपनी कामवासना की तृप्ति 206 / नारदस्मृति
के लिए पर-पुरुष से सम्बन्ध स्थापित करने वाली प्रथम प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। मृते भर्त्तरि सम्प्राप्तान्देवरान्दीनपास्य या। उपगच्छेत् परं कामात् सा द्वितीया प्रकीर्तिता ॥ 50 ॥ पति की मृत्यु के उपरान्त योग्य देवरों द्वारा उसके वरण को सहमत, उनकी उपेक्षा करके अपनी रुचि के पुरुष का आश्रय ग्रहण करने वाली द्वितीय प्रकार की 'स्वैरिणी' होती है। प्राप्ता देशाद्धनक्रीता क्षुत्पिपासातुरा च या। तवाह्मित्युपगता सा तृतीया प्रकीर्तिता ॥ 51 ॥ धन से ख़रीदी गयी, दूसरे देश से आयी हुई, अर्थात् आश्रयविहीन तथा भूख-प्यास से आकुल-व्याकुल स्त्री अपने को शरण देने वाले पुरुष के प्रति कृतज्ञ भाव से समर्पित होने वाली-'आपने मुझे सहारा दिया है, अब मैं आपकी दासी हूं, आपके यथेष्ट भोग के लिए उपस्थित हूं,' इस प्रकार के भावों को प्रकट करने वाली-स्त्री तृतीय प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। देशधर्मौ निरपेक्ष्य स्त्री गुरुभिर्या प्रदीयते। उत्प्रभसाहसान्यस्मै अन्त्या सा स्वैरिणी स्मृता ॥ 52 ॥ माता-पिता आदि पूज्य अभिभावकों द्वारा देश-धर्मानुसार उपयुक्त मानकर चुने गये वर की उपेक्षा करके अपने मनोऽकूल जीवनसाथी का आश्रय लेने का दुस्साहस करने वाली स्त्री चतुर्थ प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। टिप्पणी—माता-पिता के मान-सम्मान तथा लड़के की जाति, धर्म, आयु शिक्षा-दीक्षा, कुल-परिवार तथा सामाजिक स्थिति आदि किसी बात की चिन्ता किये बिना, मन के मीत से प्रेमविवाह करने वाली आजकल की लड़कियों को चतुर्थ प्रकार की 'स्वैरिणी' मानना चाहिए। पुनर्भूर्वा विधिस्त्वेष स्वैरिणीनां प्रकीर्तितः। पूर्वा पूर्वा जघन्यासां श्रेयसी तूत्तरोत्तरा ॥ 53 ॥ पुनर्भू और स्वैरिणी स्त्रियों के स्वरूप और भेदों आदि के वर्णन को यहीं विराम दिया जाता है। यहां इतना और समझ लेना चाहिए कि पुनर्भू से पूर्व-पूर्व निन्दनीय है, अर्थात् तृतीया—विवाह के उपरान्त पति की अकालमृत्यु हो जाने पर और देवरों के न होने पर पर-पुरुष से विवाह करने वाली की अपेक्षा युवा पति की ओर न लौटने वाली द्वितीया और उसकी अपेक्षा प्रथमा—जीवित पति का परित्याग करने वाली अधिक निन्दनीय है। तृतीया का तो मात्र इतना ही दोष है कि उसने आत्मसंयम को अव्यावहारिक मानकर पुनर्विवाह को ही व्यावहारिक समझा। द्वितीया पुनर्भू यदि अपने को भोगने वाले के प्रति समर्पित हो जाती है, तो उसका नारदस्मृति / 207
भी दोष इतना ही माना जायेगा कि उसका विवाहित तो कोई और है, उसके प्रति भी उसका कुछ कर्तव्य बनता है, परन्तु इसके लिए अकेली स्त्री को दोषी न मानकर प्रचलित प्रथा की भी निन्दा करनी होगी। इस प्रकार इस द्वितीया की अपेक्षा जीवित पति से समझौता न कर पाने वाली स्त्री को सर्वथा निकृष्ट मानना होगा। विवाह के उपरान्त पुरुष में आये दोष को तो दैवी विधान समझना चाहिए और विवाह पूर्व के किसी दोष की भली प्रकार जांच परख न करने के लिए स्वयं अपने परिवार वालों को और अन्ततः भाग्य को दोषी मानना चाहिए। हां, छल कपट अथवा धोखा-धड़ी की बात अलग है। इसी प्रकार चार प्रकार की स्वैरिणी स्त्रियों में उत्तरोत्तर को निकृष्ट माना गया है। पुरुष की नपुंसकता अथवा असमर्थता को जीवन-भर के लिए सहन न कर पाने और पर-पुरुष का आश्रय लेने को स्त्री की विवशता मानना चाहिए और इसके लिए विवाह करने वाले पुरुष को दोषी ठहराना चाहिए। देह की क्षुधा की तृप्ति की इच्छा भी तो जीवन धर्म है। संयम-नियम का उपदेश देना सरल है, निभाना टेढ़ी खीर है। गुप्त रूप से पर पुरुष से सम्बन्ध रखने की अपेक्षा, तो दूसरा विवाह कहीं अधिक उचित पग है। हां, इससे पूर्वपति की नाक अवश्य कटती है, उसका पुंसत्व कलंकित होता है, जो होना ही चाहिए। इस प्रथम स्वैरिणी की अपेक्षा द्वितीय स्वैरिणी-देवरों को धता बताकर मनोऽनुकूल पुरुष का वरण करने वाली-उसकी अपेक्षा तृतीया-आश्रयदाता का वरण करने वाली और उसकी भी अपेक्षा चतुर्थी स्वैरिणी-माता पिता, देश काल प्रथा, मर्यादा आदि का अतिक्रमण कर प्रेमविवाह करने वाली अधिक निकृष्ट है। टिप्पणी—हमारे विचार में तो केवल चतुर्थ प्रकार की स्वैरिणी को ही स्वैरिणी कहना उचित है। नपुंसक पति के परित्याग को तो स्वेच्छाचरण नहीं माना जा सकता। द्वितीय स्वैरिणी की भी परिवारजनों के व्यवहार से असन्तुष्ट होकर बाहर जाने की विवशता को समझने पर स्थिति भिन्न हो सकती है। तृतीय स्वैरिणी को तो स्वैरिणी कहना ही सर्वथा अनुचित है। इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं-जहां नदी, कूप आदि से निकालने वाले चोर डाकुओं, आततायियों तथा दुराचारियों से सम्मान, प्राण आदि की रक्षा करने वाले, भय, आतंक से मुक्त करने वाले वीर एवं उदार पुरुषों के प्रति कृतज्ञतावश अथवा उनके गुणों पर मुग्ध होकर स्त्रियों ने उनसे विवाह कर लिया। ऐसी स्त्रियों को 'स्वैरिणी' कहना तो मानवता का अपमान ही करना होगा। अपत्यमुत्पादयितुस्तासां या शुल्कतो हृता। अशुल्कोपहतायां तु क्षेत्रिकस्यैव तत्फलम्॥ 54 ॥ उपर्युक्त सात प्रकार की स्त्रियां -तीन प्रकार की पुनर्भू और चार प्रकार की 208 / नारदस्मृति
स्वैरिणी, यदि धन देकर ली-दी जाती हैं, तो ऐसी गर्भवती स्त्रियों से उत्पन्न होने वाली सन्तान उत्पादक की होती है। इसके विपरीत बिना शुल्क लिये-दिये विवाह करने वाली स्त्रियों की सन्तान पर वीर्य का आधान करने वाले के स्थान पर क्षेत्र के स्वामी बने पुरुष का ही अधिकार होता है। क्षेत्रिकस्य यदज्ञातं क्षेत्रे बीजं प्रदीयते। न तत्र बीजिनां भागः क्षेत्रिकस्यैव तत्फलम्॥ 55 ॥ वीर्याधान करने वाले किसी भी पुरुष को स्त्री द्वारा गर्भधारण करने की जानकारी होने अथवा न होने पर उत्पन्न सन्तान पर एकमात्र पति का अधिकार होता है, दूसरे पुरुष-यार या द्वितीय पति आदि का नहीं। अभिप्राय यह है कि महत्त्व वीर्य का नहीं, क्षेत्र (स्त्री, भग) के स्वामित्व का है। बीज किसका है—यह विवादास्पद हो सकता है, परन्तु खेत पर स्वामित्व किसका है—यह तो निश्चित तथ्य होता है। ओघवाताहृतं बीजं क्षेत्रे यस्य प्ररोहति। फलभुक्तस्य तत् क्षेत्रं न बीजी फलभाग्भवेत्॥ 56 ॥ जिस प्रकार ऊपर से अपने खेत में फेंका गया बीज उड़कर दूसरे के खेत में जा पड़ता है, तो उस बीज से उत्पन्न उपज पर खेत के स्वामी का अधिकार होता है, बीज के स्वामी का नहीं, उसी प्रकार वीर्य का आधान करने वाले पुरुष का नहीं, अपितु गर्भ धारण करने वाली स्त्री के स्वामी का ही उत्पन्न सन्तान पर अधिकार होता है। महोक्षो जनयेद्वत्सान्यस्य गोषु व्रजे चरन्। तस्य ते यस्य ता गावो मोघं स्पन्दितमार्षभम्॥ 57 ॥ एक अन्य उदाहरण द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार का कथन है कि जिस प्रकार किसी का वृषभ किसी दूसरे के घर, गोष्ठ अथवा क्षेत्र में खड़ी- विचरण करती गाय से मैथुन कर उसे गर्भवती बनाता है और उस गाय से उत्पन्न होने वाली सन्तान पर गाय के स्वामी ही अधिकार होता है, वृषभ के स्वामी का नहीं—वृषभ का प्रयास केवल यौनतृप्ति माना जाता है—उसी प्रकार पर स्त्री से भोग करने वाला केवल यौन-सुख का आनन्द लेता है, सन्तान का स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकता। क्षेत्रिकानुमते बीजं यस्य क्षेत्रे समर्प्यते। तदपत्यं द्वयोरेव बीजिक्षेत्रिकयोर्मतम्॥ 58 ॥ क्षेत्र के स्वामी की अनुमति से उसके क्षेत्र में बीज वपन करने पर दोनों—क्षेत्र के स्वामी और वपनकर्ता—का क्षेत्र में उत्पन्न उपज (सन्तान) पर समान अधिकार होता है। नारदस्मृति / 209
न स्यात् क्षेत्रं विना सस्यं न वा बीजं विनास्ति तत्। अतोऽपत्यं द्वयोरिष्टं पितुर्मातुश्च धर्मतः ॥ ५९ ॥ वस्तुतः क्षेत्र के बिना वीर्याधान नहीं किया जा सकता और वीर्याधान के बिना खेत खाली पड़ा रहता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कृषि उपज पाने के लिए दोनों— खेत और बीज—के समान महत्त्व के अनुरूप ही स्त्री (खेत) और पुरुष (वीर्य) का अथवा शालीन भाषा में माता-पिता का एक-समान महत्त्व है। नान्यपत्यं परगृहे संयुक्तस्य स्त्रिया सह। दृष्टं संग्रहणं तज्ज्ञैर्नागतायाः स्वयं गृहे ॥ ६० ॥ दूसरे के घर में जाकर पराई स्त्री से सम्भोग करते हुए पकड़ा जाने वाला पुरुष अवश्य दण्डनीय है, परन्तु अपने घर स्वयं आयी, पराई स्त्री से सम्भोग करते हुए पकड़े गये पुरुष को दण्डित नहीं करना चाहिए। अदुष्टत्यक्तदारस्य क्लीबस्य क्षयिकस्य च। सेच्छानुपैयुषो दारामदोषः साहसे भवेत् ॥ ६१ ॥ स्त्री के किसी दोष अथवा अपराध के बिना उसका त्याग करने वाले—स्त्री के असुन्दर, अनाकर्षक अथवा मलिन होने के कारण अथवा पुरुष की किसी अन्य स्त्री में अनुरक्ति-आसक्ति के कारण उससे विरक्त—क्लीब तथा असाध्य रोगग्रस्त, अर्थात् उसकी इच्छा से मैथुन करने वाले—पुरुष को दोषी नहीं मानना चाहिए। वस्तुतः ऐसी स्त्री को तृप्त-सन्तुष्ट करना, तो भूखे को भोजन खिलाने और प्यासे को जल पिलाने के समान एक प्रकार का पुण्यकर्म है। यह तो पुरुष का दयाभाव भी हो सकता है। परस्त्रियां सहाकालेऽदेशे वा भवतोमिथः। स्थानसम्भाषणा मोदास्त्रयः संग्रहणक्रमाः ॥ ६२ ॥ असमय—रात के अंधेरे में, अस्थान—निर्जन वन में, घर के एकान्त में अथवा किसी गुप्त स्थान (झाड़ियों के पीछे, सूने पड़े दुर्ग आदि) में, 1. पराई स्त्री के साथ घूमना, फिरना, उठना-बैठना, 2. बातचीत करना तथा 3. हास्य विनोद करना अपराध है। इन तीनों क्रियाओं को ही पकड़ा जाना कहा जाता है। ऐसा करते हुए युवक युवती देखने वालों की दृष्टि में आने से बचने की चेष्टा करते हैं। नदीनां संगमे तीर्थेष्वारामेषु वनेषु च। स्त्रीपुंसौ यत्समैयातां तच्च संग्रहणं स्मृतम् ॥ ६३ ॥ दूसरों की दृष्टि से बचने के लिए स्त्रियों और पुरुषों का गुपचुप एक-दूसरे से निम्नोक्त स्थानों पर मिलना भी संग्रहण—पकड़े जाने से बचने का प्रयास— कहलाता है।
- नदियों का संगम स्थल प्रयाग आदि, 2. तीर्थ स्थल (हरद्वार आदि), 3 210 / नारदस्मृति
उद्यान तथा निर्जन वन। इन स्थानों में परिचितों के मिलने की कम सम्भावना रहती है। स्मृतिकारों के अनुसार प्रेमी युगल (युवक-युवती) इन स्थानों को अपनी प्रणयलीला के लिए सुरक्षित पाते हैं। इन स्थानों पर सशंक रूप से घूमते हुए युगलों को घर से भागे तथा अनुचित चेष्टारत मानकर पकड़ लेना चाहिए। दूतीप्रस्थापनैर्वापि लेखसम्प्रेषणैरपि। अन्यैश्च विविधैर्दोषैर्ग्राह्यं संग्रहणं बुधैः ॥ 64 ॥ बुद्धिमानों को किसी युवक-युवती को एक-दूसरे के पास सन्देशवाहक को भेजते अथवा उसके स्वागत पत्रों का आदान-प्रदान करते तथा इस प्रकार के अन्यान्य गुप्त एवं दूषित चेष्टाएं देखकर दोनों की एक-दूसरे में अनुरक्ति-आसक्ति समझकर उन्हें पकड़ लेना चाहिए। स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तथा। परस्परस्यानुमतं सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 65 ॥ पुरुष और स्त्री को एक-दूसरे के गुप्त अंगों को स्पर्श करते हुए अथवा एक- दूसरे के द्वारा किये जा रहे स्पर्श का निवारण न करते हुए, अपितु उलटे प्रोत्साहन (आंखें मटकाना, हंसना, मुख से सीटी बजाना, उछलना, गुदगुदाना, गीत गाना, रोमाञ्चित होना तथा सीत्कारना आदि) देते हुए देखकर उन्हें परस्पर अनुरक्त मानते हुए पकड़ा जा सकता है। उपकारक्रिया केलिः स्पर्शो भूषणवाससाम्। सहखट्वासनं चैव सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 66 ॥ प्रसन्न भाव से एक-दूसरे को अंगवस्त्रों का आदान-प्रदान, एक-दूसरे से हास-परिहास तथा उनकी प्रशंसा के बहाने एक-दूसरे के अंगों को छूना तथा दोनों का एक ही आसन पर एक-दूसरे के साथ सटकर बैठना आदि एक-दूसरे के प्रति आकर्षण एवं अनुराग वृद्धि के लक्षण हैं। पाणौ यश्च निगृह्णीयाद्वेण्यां वस्त्राञ्चलेऽपि वा। तिष्ठ तिष्ठेति वा ब्रूयात् सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 67 ॥ युवक द्वारा युवती के वस्त्रों व उसकी वेणी आदि को अपने हाथों में हलके से खींचना-झटकना और युवती द्वारा कृत्रिम क्रोध से मुसकराते हुए—ठहर, अभी तुझे मज़ा चखाती हूं—कहना और उसके पीछे भागना आदि चेष्टाएं दोनों की पारस्परिक अनुरक्ति के लक्षण हैं। वस्त्रैराभरणैर्माल्यैः पानैर्भक्ष्यस्तथैव च। सम्प्रेष्यमाणैर्गन्धैश्च वेद्यं संग्रहणं बुधैः ॥ 68 ॥ प्रेमी-प्रेमिका को एक-दूसरे के पास वस्त्रों, आभूषणों, पुष्पमालाओं, पेयपदार्थों, नारदस्मृति / 211
दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत्।
उत्तम भक्ष्य पदार्थों तथा अन्यान्य उपहारों का आदान प्रदान करता देखकर, उन दोनों की परस्पर अनुरक्ति का अनुमान लगाना चाहिए। दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत्। ममेयं भुक्तपूर्वेति तच्च संग्रहणं स्मृतम्॥ ६९॥ किसी युवक प्रेमी द्वारा दर्प तथा मोहवश अथवा मिथ्या आत्म-विज्ञान की इच्छा से प्रेरित होकर किसी युवती को अपनी 'भुक्ता' कहने का अर्थ, उसकी उसे पाने की उत्कट अभिलाषा ही समझना चाहिए। युवती को अन्य उपायों से पाने में असफल युवक कभी कभी उसे अपमानित-कलंकित करने से ही पाना सम्भव मानकर ऐसी ओछी हरकतें करते हैं। वस्तुतः इसे युवक प्रेमी की कुण्ठा और निराशा की परिणति ही समझना चाहिए; क्योंकि वह समझता है कि वश में नहीं आती, तो मिथ्या आरोप लगाने में क्या बुराई है। वैसे, इस प्रकार के हताश प्रेमी को ओछा व्यक्ति ही समझना चाहिए। सजात्यतिशये पुंसां दण्ड उत्तमसाहसः। मध्यमस्त्वानुलोम्येन प्रातिलोम्ये प्रमापणम्॥ ७०॥ समान वर्ण, जाति और स्थिति के व्यक्तियों द्वारा स्त्रियों पर मिथ्या आरोप लगाकर, उन्हें वश में करने की चेष्टा करने पर युवक को उत्तम साहस का दण्ड और उच्च वर्ण, जाति एवं स्थिति के पुरुष द्वारा अपने से निम्न जाति, वर्ण एवं स्थिति की स्त्री को मिथ्या कलंकित करने पर मध्यम साहस का दण्ड देना चाहिए। निम्न वर्ण जाति वाले युवक प्रेमी द्वारा अपने से उच्च वर्ण-जाति की युवती को अनुचित रूप से अपमानित करने पर पुरुष को मृत्यु-दण्ड दिया जाना चाहिए। कन्यायामस्कामायां द्वयाङ्गुलस्यावकर्तनम्। उत्तमार्या वधस्त्वेव सर्वं संग्रहणं तथा॥ ७१॥ हीन अथवा समान वर्ण, जाति तथा स्थिति की कन्या की इच्छा के विरुद्ध उसकी योनि को अंगुलि से अथवा लिंग से आहत करने वाले पुरुष के हाथ की दो अंगुलियां काट डालनी चाहिए। अपने से उन्नत वर्ण-जाति की स्त्री से बलात्कार करने वाले से न केवल उसकी सारी सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए, अपितु उसे मृत्यु दण्ड भी देना चाहिए। सकामायां तु कन्यायां सङ्गमे नास्त्यतिक्रमः। किन्त्वलंकृत्य सत्कृत्य स एवैनां समुद्वहेत्॥ ७२॥ कन्या की इच्छा एवं सहमति से उससे मैथुन करने वाला पुरुष दोषी नहीं माना जाता। हां, पुरुष को अपने द्वारा भोगी गयी कन्या को समुचित आदर देते हुए, उसे सजा-धजा कर उससे विवाह कर लेना चाहिए। टिप्पणी—विवाह पूर्व प्रेमी से यौन सम्बन्ध रखने वाली कन्या को तो 212 / नारदस्मृति
असंयत एवं उच्छृंखल ही कहा जायेगा। प्रेमान्ध व्यक्तियों की बात छोड़ दें, तो ऐसी स्त्रियों को युवक प्रायः अपने विलास की सामग्री समझते हैं, उन्हें अपनी अर्धांगिनी कदापि नहीं बनाते। माता मातृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृष्वसा। पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी स्नुषा ॥ 73 ॥ दुहिताऽऽचार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता। राज्ञी प्रव्रजिता धात्री साध्वी वर्णोत्तमा च या ॥ 74 ॥ असा मान्यतमां गत्वा गुरुतल्पग उच्यते। शिश्नस्योत्कर्तनं तस्य नान्यो दण्डो विधीयते ॥ 75 ॥ निम्नोक्त बीस सम्बन्धियों से सम्भोग करने वाले युवक के लिंग को काट देना ही इस पाप का एकमात्र दण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड नहीं है— सम्बन्धी स्त्रियां हैं—
- अपने पिता की पत्नी (माता तथा माता से भिन्न अन्य स्त्री, विमाता आदि), 2. माता की भगिनी (मौसी), 3. सासू मां, 4. मामी, 5. पिता की बहिन, बुआ, 6. चाचा की पत्नी या रखैल, 7. शिष्य की स्त्री, 8. बहिन, चाचा, मामा आदि की लड़की, 10. पुत्रवधू, 11. अपनी पुत्री, 12. आचार्य की पत्नी, 13 अपने गोत्र—दूर के चाचा, भाई आदि की बहिन, पुत्री, बहू आदि, 14. शरण में आयी हुई असहाय स्त्री, 15. रानी, 16. संन्यासिनी, 17. दायी—पालन करने वाली अथवा स्तनपान कराने वाली स्त्री, 18. उत्तमर्ण की पतिव्रता स्त्री, 19. अपने वर्ण से भिन्न वर्ण जाति की स्त्री तथा 20. भाई की पत्नी। पशुयोनावतिक्रामन् विनेयः स दमं शतम्। मध्यमं साहसं गोषु तदेवान्त्यावसायिषु ॥ 76 ॥ स्त्री पशुओं की योनि में लिंग-प्रवेश का दण्ड एक सौ पण है। गाय तथा चाण्डाल स्त्री से सम्भोग का मध्यम साहस दण्ड है। अगम्यागामिनश्चाति दण्डो राज्ञा प्रचोदितः। प्रायश्चित्तविधानं तु पापानां स्याद् विशोधनम् ॥ 77 ॥ अगम्या—सम्भोग के लिए वर्जित—विमाता, गुरुपत्नी तथा शिष्या आदि— से मैथुन करने वाला, जहां राजा द्वारा दण्डित होता है, वहां उसे अपनी शुद्धि के लिए शास्त्रों में निर्दिष्ट प्रायश्चित्त भी करना होता है। इसके बिना वह जाति से बहिष्कृत माना जाता है। स्वैरिण्यब्राह्मणी वेश्या दासी निष्कासिनी च या। गम्याः स्युरानुलोम्येन स्त्रियो न प्रतिलोमतः ॥ 78 ॥ अपने से निम्न अथवा अपने समान वर्ण की निम्नोक्त स्त्रियों से मैथुन करने नारदस्मृति / 213
वाले को कोई दोष नहीं होता। ऐसी स्त्रियों के अपने से ऊपर के वर्ण से सम्बन्धित होने पर उनसे सम्बन्ध योजना वर्जित होने से दण्डनीय अपराध है—
- स्वैरिणी—ब्राह्मणी से इतर वर्ण—क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, जाति की स्त्री।
- वेश्या—देह व्यापार से आजीविका चलाने वाली स्त्री।
- दासी—धन के व्यय से ख़रीदी गयी स्त्री तथा
- निष्कासिता—दुराचरण अथवा दुर्व्यवहार अथवा सम्बन्धों की विषमता के कारण घर से निकाली गयी महिला। आस्वेव तु भुजिष्यासु दोषः स्यात् परदारवत्। गम्या अपि हि नोपेया यत्ताः परपरिग्रहाः ॥ 79 ॥ अपने वर्ण से ऊपर के वर्ण की स्त्रियों—स्वैरिणी, वेश्या, दासी तथा निष्कासिता—के भोग्या होने पर भी निम्न वर्ण वालों को इनसे सम्भोग नहीं करना चाहिए; क्योंकि मूलतः वे अपने पति की सम्पत्ति हैं। अतः उनका उपभोग परदारमगन जैसा दण्डनीय अपराध है। अनुत्पन्नप्रजायास्तु पतिः प्रेयाद् यदि स्त्रियाः । नियुक्ता गुरुभिर्गच्छेद्देवरं पुत्र काम्यया ॥ 80 ॥ सन्तान को उत्पन्न किये बिना मृत पति की विधवा केवल सन्तान-प्राप्ति के लिए, परिवार के वृद्धजनों की अनुमति से, अपने देवर से सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। स च तां प्रतिपद्येत तथैव पुत्रजन्मतः। पुत्र जाते निवर्तेत संकरः स्यादतोऽन्यथा ॥ 81 ॥ देवर को भाभी से गर्भधारणपर्यन्त ही देह-सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए, अन्यथा उन दोनों के सम्बन्ध से उत्पन्न होने वाली सन्तान वर्णसंकर कहलायेगी। टिप्पणी—वर्णसंकर का अर्थ भिन्न-भिन्न वर्ण के पुरुष और स्त्री के समागम से उत्पन्न होने वाली सन्तान है। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य तथा क्षत्रिया के गर्भ से अथवा क्षत्रिय के वीर्य तथा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान वर्णसंकर कहलायेगी। अतः यदि भाभी के गर्भवती हो जाने के उपरान्त भी देवर उसके साथ सम्भोग में प्रवृत्त रहता है, तो वह अधम आचरण करता है और उत्पन्न सन्तान न पिता की और न ही देवर की कहला सकती है। अतः सन्तान के भविष्य के लिए स्त्री (भाभी) को आत्मसंयम अपनाने की बात कही गयी है। घृतेनाभ्यज्य गात्राणि तैलेनाविकृतेन वा। मुखान्मुखं परिहरन् गात्रैर्गात्राण्यसंस्पृशन् ॥ 82 ॥ भाभी से सम्भोग करने वाले देवर को सम्भोग से पूर्व अपने शरीर को घी तेल आदि से भली प्रकार चुपड़ लेना चाहिए। लिंग-प्रवेश-मैथुन आदि के समय 214 / नारदस्मृति
न तो उसे भाभी के शरीर को मसलना चाहिए और न ही दोनों को एक-दूसरे का चुम्बन करना चाहिए। दोनों को मैथुन को यान्त्रिक क्रिया के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए। टिप्पणी—इस सम्बन्ध में बोधायन सूत्रकार का कथन सर्वथा उपयुक्त ही है- मुखचुम्बनगात्रमर्दनादिभिः पुनः पुनः सम्भोगाशा पुत्रजन्मान्तरमपि वर्धते, तत्परिहाराय मुखचुम्बनादि निषिध्यते। इति मन्मतिः। अर्थात् मुखचुम्बन तथा शरीर मर्दन से सम्भोग की इच्छा बढ़ती है, जिसे पुत्रोत्पत्ति के उपरान्त भी रोक पाना सम्भव नहीं होता, मेरे विचार में इसी कारण से कदाचित् इन क्रियाओं का निषेध किया गया है। टिप्पणी- हमें तो यह समझ नहीं आता कि सम्भोग क्रिया में पुरुष द्वारा स्त्री के अंगों—स्तन, जंघा तथा जघन आदि—को स्पर्श-आलिंगन तथा मुख- चुम्बन आदि से बचना कैसे सम्भव है ? दो स्वस्थ युवक-युवती का एक बार सम्भोग-सुख को भोगने पर उसे सहसा छोड़ पाना भी कैसे सम्भव है ? हमें तो लगता है कि दोनों पुत्रोत्पत्ति को अपने मिलने में बाधक मानकर सन्तान-प्राप्ति के प्रति प्रयत्नशील ही नहीं होंगे। यह तो एक निर्विवाद तथ्य है कि यौन-सुख का परित्याग असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। स्त्री में मातृत्व की इच्छा अवश्य होती है, परन्तु यौन-सुख-भोग की इच्छा उससे भी अधिक प्रबल होती है। जब स्त्री को यह ज्ञात है कि उसके गुरुजन उसके गर्भधारण करते ही उसके नियुक्त देवर से मिलने नहीं देंगे, तो वह गर्भधारण को बहुत समय तक टालती जायेगी। इसके अतिरिक्त उनके गुप्त रूप से मिलने की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा सकता। इस प्रकार हम तो प्राचीनकाल में बहुप्रचलित नियोग प्रथा को सर्वथा निर्दोष नहीं मानते। पुत्र-प्राप्ति को ही महत्त्वपूर्ण मानने का अर्थ स्त्री के व्यक्तित्व को कुण्ठित करना तो नहीं होना चाहिए। उसे केवल पुत्र जनने की मशीन तो नहीं बना देना चाहिए। कुले तदवशेषे हि सन्तानार्थं न कामतः। स्त्रियं पुत्रवतीं वन्ध्यां नीरजस्कामनिच्छतीम् ॥ 83 ॥ परिवार में उपयुक्त पुरुष के अभाव में गुरुजनों को किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति— भले ही आयु में छोटा पुरुष, बड़ी आयु की स्त्री के लिए अथवा आयु में बड़ा, छोटी आयु की स्त्री के लिए-को विधवा को पुत्रवती बनाने के लिए नियुक्त करना चाहिए। जब तक स्त्री रजस्वला न हो, अपनी वंश-परम्परा को चलाने के लिए देवर आदि किसी पर-पुरुष से मिलन को सहमत न हो तथा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ न हो, तब तक नियुक्त पुरुष को उसे मैथुन के लिए निमन्त्रित नहीं करना चाहिए। कामवासना की तृप्ति के लिए सम्भोग में प्रवृत्त होने वाले स्त्री पुरुष नरकगामी होते हैं। नारदस्मृति / 215
न गच्छेद् गर्भिणीं निन्दामनियुक्तां च बन्धुभिः । अनियुक्ता तु या नारी देवराज्जनयेत् सुतम् ॥ 84 ॥ जारजातमरिक्थीयं तमाहुर्ब्रह्मवादिनः । तथानियुक्तो यो भार्या यवीयाञ्ज्यायसो व्रजेत् ॥ 85 ॥ देवर आदि को गर्भवती, लोकनिन्दित तथा बन्धुओं द्वारा अननुमत (अनुमति न दी गयी) अपनी भाभी से कदापि सम्भोग नहीं करना चाहिए। गुरुजनों द्वारा अनियुक्त देवर से पुत्रोत्पन्न करने वाली स्त्री का पुत्र 'जारज'-अवाञ्छनीय व्यक्ति के वीर्य से उत्पन्न-कहलाता है। उसे न तो पिण्डतर्पण आदि देने का और न ही उत्तराधिकारी के रूप में पैतृक सम्पत्ति पाने का अधिकार मिलता है। ऐसा पुत्र भले ही ज्येष्ठ द्वारा छोटी भाभी के उदर से अथवा कनिष्ठ भ्राता द्वारा बड़ी भाभी के उदर से उत्पन्न हुआ हो, दोनों की समान स्थिति है, अर्थात् दोनों ग्राह्य नहीं होते। ऐसा ब्रह्मवादियों का निश्चित मत है। नियोग से उत्पन्न पुत्र तभी ग्राह्य होता है, जब परिवार के प्रामाणिक वृद्धजनों ने दोनों को इस मिलन की पूर्व अनुमति दे रखी होती है, अन्यथा यह मिलन दुराचार एवं पाप ही कहलाता है और इस मिलन से उत्पन्न सन्तान का भविष्य अन्धकारमय होता है। यवीयसो वा यो ज्यायानुभौ तौ गुरुतल्पगौ। नियुक्तौ गुरुभिर्गच्छेदनुशिष्ट्यात् स्त्रियं च सः ॥ 86 ॥ अग्रज तथा अनुज भ्राता द्वारा अपनी भाभी (छोटे भाई अथवा बड़े भाई की पत्नी) के साथ सम्भोग गुरुपत्नी के साथ सम्भोग के समान जघन्य अपराध है। सन्तान-प्राप्ति के लिए परिवार के वृद्धों द्वारा ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को नियुक्त करना-भाभी के साथ समागम की अनुमति देना-तो मात्र एक आपातकालीन व्यवस्था है, निस्सन्तान मृत पुरुष के पिण्डदान, तर्पण आदि के लिए उसके क्षेत्र में उसके उत्तराधिकारी की व्यवस्था का प्रयास है। अतः इसे धार्मिक अनिवार्यता के रूप में ही देखना चाहिए। पूर्वोक्तेन विधानेन स्नुषां पुंसवने शुचिः । सकृदागर्भाधानाद्वा कृते गर्भे तथैव सा ॥ 87 ॥ अतः आप्त पुरुषों द्वारा नियुक्त ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को अपनी भाभी से केवल एक बार अथवा गर्भधारणपर्यन्त ही सम्बन्ध रखना चाहिए। उसके उपरान्त तो ज्येष्ठ भ्राता श्वसुर के समान और भ्रातृजाया बहू के समान होती है। इसी प्रकार कनिष्ठ भ्राता पुत्र के समान और भाभी मां के समान होती है। दोनों-स्त्री और पुरुष-को इसी धारणा को लेकर चलना चाहिए। अतोऽन्यथा वर्तमानः पुमान् स्त्री वापि कामतः । विनेयौ सुभृशं राज्ञा विप्लवः स्यादतोऽन्यथा ॥ 88 ॥ 216 / नारदस्मृति
राजा को स्त्री की गर्भोत्पत्ति (पुत्र-प्राप्ति) के पश्चात् भी भाभी से प्रणय- सम्बन्ध बनाये रखने वाले ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को मृत्युदण्ड देना चाहिए, अन्यथा समाज में अराजकता फैल जायेगी, धर्म-मर्यादा विशृंखलित हो जायेगी और मानव-चरित्र कलंकित हो जायेगा। ईर्ष्यासूयसमुत्थे तु सम्बन्धे रागहेतुके। दम्पती विवदीयातां न ज्ञातिषु न राजनि॥ 89 ॥ परिणय सूत्र में बंध जाने के उपरान्त पति-पत्नी को आपसी ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध अथवा राग आदि के कारण अपने जाति बन्धुओं तथा राज पुरुषों के सामने एक दूसरे को अपमानित नहीं करना चाहिए। आशय यह है कि किसी कारणवश दोनों को एक दूसरे के लिए उपयुक्त न समझने पर भी विवाह बन्धन को दैवी विधान समझकर समझौते का मार्ग अपनाना चाहिए। एक दूसरे की न्यूनता के प्रति सहानुभूति का दृष्टिकोण रखना चाहिए। इसी में गृहस्थ-जीवन की सफलता है। अन्योन्यं त्यजतोरागः स्यादन्योन्यविरुद्धयोः । स्त्रीपुंसयोर्निगूढाया व्यभिचारादृते स्त्रियाः ॥ 90 ॥ विवाह के उपरान्त स्त्री-पुरुष के एक-दूसरे से सौमनस्य एवं सौहार्द न बन पाने पर भी, दोनों को एक-दूसरे को सहन करने, दोषों की उपेक्षा करने तथा गुणों को महत्त्व देने का अभ्यास करना चाहिए। यदि स्त्री व्यभिचारिणी अथवा स्वैरिणी नहीं है, तो पुरुष को यत्नपूर्वक उसकी रक्षा करनी चाहिए। किसी साधारण दोष अथवा अपराध अथवा मनमुटाव के कारण पुरुष को स्त्री को छोड़ने का अधिकार नहीं मिल जाता। स्त्री के दुराचारिणी न होने पर, सम्बन्ध-विच्छेद करने पर भी, दोनों को समान रूप से दोषी माना जाता है। समाज दोनो को अपमानित करता है और उन्हें हीन दृष्टि से देखता है। व्यभिचारे स्त्रियां मौण्ड्यमधः शयनमेव च। कदनं वा कुवासश्च कर्म चावस्करोज्झनम् ॥ 91 ॥ व्यभिचारिणी स्त्री के सम्बन्ध बनाये रखने के आग्रह पर उसे सुधरने के अवसर देने की अवधि में उसका सिर मुंडवा देना चाहिए, उसे रात्रि में धरती पर सोना चाहिए। उसे पहनने के लिए गन्दे वस्त्र और खाने के लिए कुत्सित अन्न देना चाहिए। इसके अतिरिक्त उससे मैला साफ़ करने जैसे निकृष्ट कार्य कराने चाहिए। स्त्रीधनभ्रष्टसर्वस्वां गर्भविस्त्रंसिनी तथा। भर्तुश्च वधमिच्छन्तीं स्त्रियं निर्वासयेत् पुरात् ॥ 92 ॥ स्त्रीधन तथा पुरुष की सम्पत्ति को उजाड़ने वाली, गर्भधारण न कर सकने वाली अथवा बार बार ओषधि आदि खाकर जान-बूझकर गर्भपात करने वाली तथा पति की हत्या की योजना (विष आदि देकर) बनाने वाली स्त्री को न केवल नारदस्मृति / 217
घर से, अपितु ग्राम नगर की सीमा से भी बाहर निकाल देना चाहिए। अनर्थशीलां सततं तथैवाप्रियवादिनीम् । पूर्वाशिनीं च या भर्तुः क्षिप्रं निर्वासयेद् गृहात् ॥ 93 ॥ इसी प्रकार नित्य-प्रति कलह-क्लेश करने वाली, प्रतिदिन नये बखेड़े खड़े करके पड़ोसियों के सामने परिवारजनों को अपमानित करने वाली, पति तथा परिवारजनों को सदैव जली-कटी सुनाने वाली, अर्थात् कटुभाषिणी तथा पति के भोजन करने से पूर्व ही भोजन कर लेने वाली स्त्री को घर से निकाल देना चाहिए। वन्ध्यां स्त्रीजननीं निन्द्यां प्रतिकूलां च सर्वदा। कामतो नाभिनन्देत कुर्वन्नेवं स दोषभाक् ॥ 94 ॥ वन्ध्या, लड़कियों को ही जनने वाली, समाज में कलंकित तथा पति का अहित-चिन्तन करने वाली स्त्री की सहमति के बिना उससे सम्भोग करने वाला पुरुष दण्डनीय अपराधी होता है। अनुकूलामवाग्दुष्टां दक्षां साध्वीं प्रजावतीम् । त्यजन् भार्यामवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 95 ॥ राजा को निम्नोक्त गुणों से सम्पन्न स्त्री का त्याग करने वाले पुरुष को यथोचित कठोर दण्ड देकर स्त्री को भार्या की मर्यादा पर पुनः स्थापित करना चाहिए, अर्थात् पुरुष को अपनी पत्नी का सम्मान देने के लिए बाध्य करना चाहिए। राज का यह कर्तव्य है कि वह पुरुष को साध्वी एवं निर्दोष स्त्री के साथ अन्याय करने की छूट कदापि न दे तथा मनमानी करने पर पति कहलाने वाले पुरुष को अनुशासन की शिक्षा दे-
- पति एवं परिवाजनों के सदैव अनुकूल रहने वाली, अर्थात् शालीनता से व्यवहार करने वाली।
- मधुर एवं शिष्ट भाषण करने वाली।
- गृहकार्यकुशल।
- साध्वी, अर्थात् पतिव्रता तथा
- पुत्रवती। अज्ञातदोषेणोढा या निर्दोषा नान्यमाश्रिता । बन्धुभिः साभियोक्तव्या निर्बन्धः स्वयमाश्रयेत् ॥ 96 ॥ विवाह से पूर्व पुरुष के किसी अज्ञात दोष का विवाह के उपरान्त पता चलने पर उस दोष को झेलने अथवा उससे समझौता करने को अप्रस्तुत स्त्री को दूसरे पुरुष का वरण करने के लिए उसके बन्धुओं के पास छोड़ देना चाहिए। बन्धुओं के अभाव में उस स्त्री को स्वयं अपने लिए किसी दूसरे पुरुष की खोज के लिए स्वतन्त्र कर देना चाहिए। 218 / नारदस्मृति
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ। पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥ 97 ॥ निम्नोक्त पांच स्थितियों में स्त्री को वर्तमान पति का परित्याग तथा दूसरे पुरुष के वरण का अधिकार है—
- पति का सन्तानोत्पादन में असमर्थ होना, अर्थात् उसके शुक्र में सन्तान उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का न होना।
- पति का असमय में परलोक सिधारना।
- पति द्वारा गृहत्याग कर विरक्त-संन्यासी बन जाना।
- पति का नपुंसक सिद्ध होना, अर्थात् उसका यौन भोग न कर पाना अथवा पत्नी को तृप्त-सन्तुष्ट न कर पाना तथा
- निन्दित कर्मों के कारण समाज द्वारा अपनी जाति से बहिष्कृत हो जाना। अष्टौ वर्षाण्युदीक्षेत ब्राह्मणी प्रोषितं पतिम्। अप्रसूता तु चत्वारि परतोऽन्यं समाश्रयेत्॥ 98 ॥ क्षत्रिया षट् समास्तिष्ठेदप्रसूता समात्रयम्। वैश्या प्रसूता चत्वारि द्वे वर्षेत्वितरा वसेत्॥ 99 ॥ पति के विदेश जाने पर उसकी कोई खोज-ख़बर न मिलने पर प्रसूता (सन्तानवती) ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या स्त्री को क्रमशः आठ, छह और चार वर्षों तक उसके लौटने की, सुध-ख़बर देने की तथा निस्सन्तान ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या को क्रमशः चार, तीन और दो वर्षों तक पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस अवधि तक कुछ भी पता न चलने पर स्त्री दूसरा विवाह करने को स्वतन्त्र है। न शूद्रायाः स्मृतः काल एष प्रोषितयोषिताम्। जीवति श्रूयमाणे तु स्यादेष द्विगुणो विधिः॥ 100 ॥ शूद्रा स्त्री के पति के विदेश जाने पर, उसके लौटने और प्रतीक्षा का कोई समय निर्धारित नहीं है। विदेश गये पति के जीवित होने का निश्चय होने पर वैश्या निर्धारित समय—निस्सन्तान वैश्या के लिए दो वर्ष तथा सन्तानवती वैश्या के लिए चार वर्ष—से दुगुने वर्ष, अर्थात् सन्तानवती शूद्रा को आठ वर्षों तक और सन्तानहीना को चार वर्षों तक अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अप्रवृत्तौ तु भूतानां सृष्टिरेषा प्रजापतेः। अतोऽन्यगमने स्त्रीणामेष दोषो न विद्यते॥ 101 सन्तान के न होने पर आधे समय तक विदेश गये पति की प्रतीक्षा करने के औचित्य का आधार—सन्तान के लिए ही विवाह का किया जाना—है। जब सन्तान ही नहीं है और विदेश गया पति अपने लौटने की खोज ख़बर ही नहीं देता, तो नारदस्मृति / 219
फिर सम्बन्ध कैसा ? इसी आधार पर स्त्रियों को निर्धारित वर्षों तक प्रतीक्षा के अनन्तर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध जोड़ने में कोई दोष नहीं है। आनुलोम्येन वर्णानां यज्जन्म स विधिः स्मृतः । प्रातिलोम्येन यज्जन्म स ज्ञेयो वर्णसंकरः ॥ 102 ॥ अनुलोम से उत्पन्न सन्तान, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष द्वारा समान अथवा निम्न वर्ण की स्त्री से उत्पादित, उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य से ब्राह्मणी, परन्तु प्रतिलोम - निम्न वर्ण के पुरुष के वीर्य को धारण करने वाली उच्च वर्ण की स्त्री के उदर से उत्पन्न - सन्तान वर्णसंकर (पतित) कहलाती है। उदाहरणार्थ, क्षत्रिय पुरुष के वीर्य और ब्राह्मणी के उदर से उत्पन्न सन्तान अवैध कहलायेगी। अभिप्राय यह है कि भिन्न वर्ण जाति के स्त्री-पुरुषों की सन्तान के सम्बन्ध में महत्त्व वीर्य का है, क्षेत्र का नहीं। अनन्तरः स्मृतः पुत्रः एवं एकान्तरस्तथा । द्वयन्तरश्चानुलोम्येन तथैव प्रतिलोमतः ॥ 103 ॥ अनुलोम क्रम से ब्राह्मण के वीर्य से चारों वर्णों की स्त्रियों के उदर से उत्पन्न चारों पुत्र सवर्ण कहलाते हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय के तीन, वैश्य के दो और शूद्र का एक ही पुत्र सवर्ण होता है, इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से शूद्र के तीन पुत्र, वैश्य के दो पुत्र व क्षत्रिय का एक पुत्र असवर्ण होता है। अतः पारशवश्चैव निषादश्चानुलोमतः । अम्बष्ठो मागधश्चैव क्षत्ता च क्षत्रियात्मजः ॥ 104 ॥ अनुलोम क्रम से उच्च वर्ण (ब्राह्मण) द्वारा निम्न वर्ण की स्त्रियों - क्षत्रिया, वैश्या तथा शूद्रा-से उत्पन्न किये गये पुत्र क्रमशः उग्र, पाराशव तथा निषाद कहलाते हैं, अर्थात् ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न पुत्र 'उग्र' कहलाता है। ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय द्वारा वैश्या स्त्री से उत्पादित पुत्र 'पाराशव' कहलाता है तथा ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य द्वारा शूद्रा स्त्री से जना पुत्र 'निषाद' कहलाता है। इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से 'अम्बष्ठ,' 'मागध' और 'छत्ता' (क्षत्रियवर्ण) कहलाते हैं, अर्थात् शूद्र के वीर्य और वैश्या अथवा क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी स्त्री के उदर से उत्पन्न बालक 'अम्बष्ठ' कहलाता है, वैश्य के वीर्य और क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न बालक 'मागध' कहलाता है तथा क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पादित बालक 'छत्ता' कहलाता है। आनुलोम्येन तत्रैका द्वौ ज्ञेयौ प्रतिलोमतः । क्षत्राद्याः प्रतिलोमाः स्युरनुलोमास्त्विमे स्मृताः ॥ 105 ॥ प्राचीन दो व्यवस्थाओं - 1 उच्च वर्ण की स्त्री, उच्च अथवा समान वर्ग के अतिरिक्त किसी अन्य निम्न वर्ण की भोग्या बन ही नहीं सकती तथा 2. अपने से 220 / नारदस्मृति
एक वर्ण नीचे की स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना उचित होने—के आधार पर प्रत्येक वर्ण के पुरुष का अनुलोम से एक-एक पुत्र उत्पन्न होगा और प्रतिलोम से दो-दो पुत्र उत्पन्न होंगे। इस दृष्टि से छत्ता आदि को प्रतिलोम से उत्पन्न माना जायेगा। निम्न वर्ण के पुरुषों द्वारा उच्च वर्ण की स्त्रियों से उत्पादित सन्तान 'अनुलोमज' कहलाती है। ससंकरः श्वपाकाद्यास्तेषां त्रिःसप्त वै मताः । सवर्णो ब्राह्मणोपुत्रः क्षत्रियायामनन्तरः ॥ 106 ॥ संकर पुरुष के वीर्य और संकर स्त्री के उदर से जन्म लेने वाला बालक ‘श्वपाक' कहलाता है। इनकी तीन अथवा सात जातियां हैं। इसी प्रकार उग्र पुरुष द्वारा क्षत्ता से जनित बालक ‘श्वपाक' तथा वैदेहक द्वारा अम्बष्ठा स्त्री से जनित बालक 'सवर्ण' होता है, परन्तु ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से जनित बालक को सवर्ण बनाने के लिए उसका अभिषेक करना पड़ता है। अम्बष्ठोग्रौ तथा पुत्रावेवं क्षत्रियवैश्ययोः। एकान्तरस्तु चाम्बष्ठो वैश्यायां ब्राह्मणात् सुतः ॥ 107 ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय के वीर्य और वैश्या स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक ‘अम्बष्ठ' और वैश्य के वीर्य और शूद्रा स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक 'उग्र' कहलाता है। टिप्पणी—मनु आदि अन्य स्मृतिकारों का मत नारद से कुछ भिन्न है। उनके अनुसार—अनुलोम से, अर्थात् क्षत्रिय द्वारा वैश्या से उत्पन्न पुत्र 'अम्बष्ठ', वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न 'मागध' और शूद्र के वीर्य और क्षत्रिया के उदर से उत्पन्न 'क्षत्रा' अथवा 'क्षत्ता' कहलाते हैं। अम्बष्ठः आनुलोम्येन क्षत्रियस्य वैश्यायां जातः। मागधो वैश्यात् क्षत्रियायां जातः। क्षत्ता शूद्रात् क्षत्रियायां जातः । शूद्रायां क्षत्रियात्तद्वन्निषादो नाम जायते । शूद्रा पारशवं सूते ब्राह्मणाद्व्यन्तरं सुतम् ॥ 108 ॥ क्षत्रिय द्वारा शूद्रा स्त्री से प्राप्त बालक 'निषाद' तथा ब्राह्मण द्वारा शूद्रा स्त्री से प्राप्त बालक 'पारशव' कहलाता है। शूद्रा के दोनों पुत्रों में भी यही अन्तर है, अर्थात् शूद्रा ने ब्राह्मण के वीर्य से गर्भधारण किया है, तो उत्पन्न पुत्र 'पारशव' कहलायेगा और यदि उसने क्षत्रिय के वीर्य से गर्भ धारण किया है, तो उत्पन्न होने वाला बालक 'निषाद' कहलायेगा। आनुलोम्येन वर्णानां पुत्रा होते प्रकीर्तिताः । सूतश्च मागधश्चैव सुतावायोगवस्तथा ॥ 109 ॥ इसी प्रकार अनुलोम सम्बन्ध, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष के वीर्य से और निम्न वर्ण की स्त्री के उदर से जन्म लेने वाले 'सूत,' 'मागध' तथा 'अयोगव' आदि कहलाते हैं। नारदस्मृति / 221
प्रतिलोम्येन वर्णानां क्षत्तृवैदेहकावपि। अनन्तरः स्मृतः सूतो ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सुतः ॥ 110 ॥ इसी सन्दर्भ में प्रतिलोम सम्बन्ध—निम्न वर्ण के पुरुष द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री के उदर से उत्पन्न—बालक 'क्षत्ता' और 'वैदेह' कहलाते हैं। क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के उदर से प्राप्त बालक 'अनन्तर' कहलाता है। मागधायोगवौ तद्वद् द्वौ पुत्रौ वैश्यशूद्रयोः । ब्राह्मण्यान्तरं वैश्यात् सूते वैदेहकं सुतम् ॥ 111 ॥ वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न बालक 'मागध' और शूद्र द्वारा वैश्या से उत्पन्न बालक 'आयोगव' कहलाता है। वैश्य द्वारा ब्राह्मणी से उत्पन्न बालक 'एकान्तर' होता है, उसका दूसरा नाम 'वैदेहक' भी है। क्षत्तारं क्षत्रिया शूद्रात् पुत्रमेकान्तरं तथा। द्वयन्तरः प्रातिलोम्येन पापिष्ठः संकरे सति ॥ 112 ॥ शूद्र के वीर्य को धारण करने वाली क्षत्रिया 'क्षत्ता' नामक एकान्तर पुत्र को जनती है। प्रतिलोम्य में संकर होने पर, अर्थात् उस क्षत्ता द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री को गर्भवती बनाने पर उत्पन्न बालक 'पापिष्ठ' कहलाता है। चाण्डालो जायते शूद्राद् ब्राह्मणी यत्र मुह्यति। तस्माद्राज्ञा विशेषेण स्त्रियो रक्ष्यास्तु संकरात् ॥ 113 ॥ अपनी मर्यादा की रक्षा न करने वाली, अर्थात् शूद्र से सम्भोग कराने वाली ब्राह्मणी 'चाण्डाल' को जन्म देती है। इस प्रकार उच्च वर्ण के पुरुषों और निम्न वर्ण की स्त्रियों अथवा निम्न वर्ण के पुरुषों और उच्च वर्ण की स्त्रियों के समागम से वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न होती है, जो सामाजिक विकास के मार्ग में बाधक सिद्ध होती है। अतः राजा को इस प्रकार के सम्बन्धों को निरुत्साहित करने का वातावरण तैयार करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का द्वादश प्रकरण समाप्त ॥ 222 / नारदस्मृति