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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

त्रिस्कन्ध

Dynamic Religious Series नारदस्मृति रूपान्तरकार डॉ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री एम.ए. (हिन्दी-संस्कृत) एम.ओ.एल. पी.एच.डी. DYNAMIC डायनेमिक पब्लिकेशन्स (इण्डिया) लि० 11, शिवाजी मार्ग, मेरठ (उ.प्र.)

Dynamic Religious Series नारदस्मृति © प्रकाशकाधीन Code No. : Q 3-1 ISBN-81-7933-116-4 डॉ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री Price : Rs.90.00 Published by : S.K. Rastogi for KRISHNA PRAKASHAN MEDIA (P) LTD. 11, Shivaji Road Meerut. Pin : 250001 (U.P.) Ph : 0121-2642946, 2644766, Fax : 0121-2645855 E-mail : sk_kpm@yahoo.com Type Setting by : P.M. Books, Meerut 0121-2531788 Cover Designed by : Zius Graphic Arts, Meerut. 0121-2510493 Printed at : Chawla Offset Printers, Meerut. 0121-2650274, 2661646 Cover Printed at : Dharmesh Art Process, Delhi. 011-5708762, 5708662

प्राक्कथन 'साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है और स्मृतियां अपने युग में प्रचलित प्रथाओं, परम्पराओं, मान्यताओं, धार्मिक रूढ़ियों तथा आचार-विचारों का संकलन है।' इस सन्दर्भ में देखने पर प्राचीन भारत के गौरवमय होने, अतीत के उज्ज्वल होने तथा मनु की गर्वोक्त—विश्व के लोग भारतीयों से आदर्श व्यवहार का प्रशिक्षण प्राप्त करें—पर सहसा विश्वास नहीं होता। जिस युग में स्त्रियों और शूद्रों को व्यक्ति न समझ कर वस्तु समझा जाता हो, उनका क्रय-विक्रय किया जाता हो, उन्हें बन्धक रखा जाता हो, उनसे किसी भी प्रकार की सेवा—देह-शोषण ही नहीं, देह-व्यापार तक करने-लेने की पुरुष को स्वच्छन्दता-स्वतन्त्रता हो, उन पर क्रूरतापूर्ण अत्याचार को भी अधिकार माना जाता हो, उस युग को स्वर्णिम युग मानने में हमें तो औचित्य दिखायी नहीं देता। जिस युग में न्याय-व्यवस्था तथा दण्ड-प्रणाली भेद-भावपूर्ण हो, एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों को मृदु, मध्यम और कठोर दण्ड देने का विधान हो, उस युग को स्वर्णिम युग कैसे माना जा सकता है ? जिस युग में समाज वर्ण-व्यवस्था को महत्त्व देता हो और वर्ण-व्यवस्था केवल जन्म पर आधृत हो, ब्राह्मण को उचित-अनुचित कुछ भी करने की छूट हो, राजा को उसे दण्ड देने का अधिकार तक न हो, उस युग को स्वर्णिम युग मानना क्या अटपटा नहीं लगता ? हमारे विचार में आर्य लोग जब ईरान (ईरानम्-आर्याणाम्) से भारत (दक्षिण भारत) पहुंचे होंगे, तो उस समय आर्यों में दो प्रकार के लोग रहे होंगे—गुरु तथा शिष्य। गुरु केवल शास्त्रज्ञ ही नहीं, अपितु शस्त्र-विद्या में भी पारंगत थे। राम को धनुर्विद्या सिखाने वाले विश्वामित्र थे, भीष्म और कर्ण के शिक्षक परशुराम ब्राह्मण ही थे, भृगु ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ की रक्षा की थी। वाल्मीकि ने लव-कुश को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी। द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, वसिष्ठ और भरद्वाज सभी दोनों— शास्त्र और शस्त्र-विधाओं में निष्णात थे, परन्तु मूलतः वे सभी शिक्षक ही थे, सामान्य स्थिति में वे युद्ध-संघर्ष से दूर रहकर तप-साधना और शास्त्र-चिन्तन करते थे। शिष्य ही सभी गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। आगे चलकर गुरुओं को ब्राह्मण और शिष्यों को क्षत्रिय कहा जाने लगा। आर्य विजेता थे और भारत की

जलवायु को अनुकूल पाकर वे स्थायी रूप से यहां बस गये थे। अतः उन्हें यहां के मूल निवासियों से सम्पर्क बनाना ही पड़ा होगा। आर्यों ने अपनी कूटनीति और चतुराई का आश्रय लेकर यहां के लोगों को दो वर्गों (आगे चलकर वर्ग ही वर्ण बन गया) में बांट दिया। समृद्ध और प्रबुद्ध वर्ग को विपन्न, अशिक्षित और दरिद्र वर्ग से तोड़कर अपने साथ मिला लिया, उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने, वेदाध्ययन करने और यज्ञ-यागादि करने का अधिकार देकर वैश्य (विशः = प्रजाः ऋग्वेद) के रूप में अपने साथ मिला अवश्य लिया, परन्तु आर्यों ने वैश्य के रूप में परिगणित लोगों को सदैव अपने से नीचे रखा। जिस प्रकार गुरु-रूप में मान्य ब्राह्मण ने शिष्य (क्षत्रिय) से अपने को ऊपर बनाये रखा, उसी प्रकार आर्यों ने अपने को वैश्यों से ऊपर बनाये रखा। जिस प्रकार ब्राह्मण की वरीयता को स्वीकार करना क्षत्रियों की विवशता थी, उसी प्रकार विजेता आर्यों की वरीयता को स्वीकार करना पराजित द्रविड़ों की भी विवशता थी। वस्तुतः पराजित को विजेता की साधारण उदारता भी वरदान के समान प्रतीत होती है। इतिहास में अकबर की उदारता की प्रशंसा इसका एक सजीव उदाहरण है। यहां इस तथ्य की ओर संकेत करना अप्रासंगिक न होगा कि आर्यों ने भारत में अपने पैर जमाते समय आपस में सौहार्द-सौमनस्य का अद्भुत परिचय दिया। ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग में विभक्त आर्यों ने अनार्यों के विषय में मतैक्य बनाये रखा और 'परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ' के कथन को यथार्थ में ही चरितार्थ कर दिखाया। इसी से उनकी उन्नति और प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ। द्रविड़ों में विभाजन का बीज बोने में सफल आर्यों ने शूद्रों का जमकर शोषण किया, जिसे पढ़-सुनकर किसी का भी सिर लज्जा से झुके बिना नहीं रहता। आर्यों ने भारत में अपने पैर दृढ़ता से जमा लेने के उपरान्त जिस समाज- व्यवस्था, न्याय-प्रणाली, दण्ड-संहिता, आचार-परम्परा तथा रीति-नीति का प्रवर्तन किया, उन्हीं का लिपिबद्ध रूप स्मृतियां हैं। स्मृतियों की रचना के पीछे एक अन्य मान्यता यह भी है कि जब आदिम मानव यायावरी जीवन से ऊब गया होगा व स्थायी निवास बनाने को उत्सुक हुआ होगा, तो उसके मन में अपनी आजीविका के स्थायी साधनों को खोजने की, सञ्चय की, सम्पत्ति बनाने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया होगा। इसी के साथ उसने प्राणों की, सम्मान की तथा सुरक्षा की आवश्यकता भी अनुभव की होगी। इसी तथ्य को महाभारत के शान्तिपर्व में इस प्रकार स्वीकार किया गया है— राजा चेना भवे लोके पृथिव्यां दण्डधारकः। जले मत्स्यानिभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः॥ अर्थात् राजा के भय से समाज में बड़ी मछली छोटी मछली को नहीं निगल

पाती। इस प्रकार सुरक्षा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही शासन-प्रणाली का जन्म तथा दण्ड-संहिता का प्रवर्तन हुआ होगा, जिसका लेखा-जोखा स्मृति ग्रन्थ हैं। स्मृति ग्रन्थों में कतिपय उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं— भगवान् शंकरकृत-वैशालाक्ष, देवराज इन्द्रककृत-बाहुदन्तक, देवगुरु बृहस्पतिकृत नीतिशास्त्र, दैत्यगुरु शुक्राचार्य द्वारा रचित नीतिशास्त्र, महर्षि वैशम्पायन कृत नीतिशास्त्र आदि। आज उपलब्ध स्मृतियों में प्रमुख हैं—मनुस्मृति, याज्ञवल्कवय- स्मृति, विष्णुस्मृति, नारदस्मृति आदि। स्वयं देवर्षि नारद ने निम्नोक्त पूर्ववती स्मृतिकारों का उल्लेख इस प्रकार से किया है— उपलब्ध स्मृतियों के सभी स्मृतिकारों ने समान रूप से मनु महाराज को अत्यन्त महत्त्व और गौरव दिया है। मनुस्मृति की सर्वाधिक प्रसिद्धि तथा प्रचलन भी इसकी सर्वाधिक लोकप्रियता का प्रमाण है, परन्तु 'नारदस्मृति' को देखने पर हमें अपनी धारणा को बदलना पड़ा है। इसमें जैसा संक्षिप्त, तर्कसंगत, उपयोगी, व्यावहारिक एवं आवश्यक विवेचन हुआ है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें आचार- संहिता, व्यवहार-पद, दण्ड-प्रणाली तथा राज-धर्म का जैसा उत्कृष्ट, वैज्ञानिक, तर्कपरक, युक्तियुक्त, सरल एवं संक्षिप्त परिचय दिया गया है, वह अपने आप में अनुपम एवं अद्वितीय है। स्मृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पाठकों को हमारे कथन की सत्यता का ज्ञान स्वतः हो जायेगा। इस ग्रन्थ के प्रकाशक महोदय ने इस बहुमूल्य (दुर्लभ) ग्रन्थ का अनुवाद प्रकाशित करके न केवल हिन्दी जानने वालों का, अपितु इस ग्रन्थ से अपरिचित संस्कृत के ज्ञाताओं का भी महान् उपकार किया है। आशा है कि प्राचीन साहित्य के अनुरागी प्रकाशक महोदय के इस प्रयास का अभिनन्दन करेंगे और उन्हें दुर्लभ ग्रन्थों के प्रकाशन की योजना में संलग्न रहने के लिए उत्साहित करेंगे। —रामचन्द्र वर्मा

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अध्याय/प्रकरण पृष्ठ संख्या

अनुक्रम अध्याय/प्रकरण पृष्ठ संख्या प्रथम अध्याय 11-39 द्वितीय अध्याय 40-51 तृतीय अध्याय 52-60 चतुर्थ अध्याय 61-145 2. निक्षेप प्रकरण 146-150 3. सम्भूयसमुत्थान प्रकरण 151-155 4. दत्ताप्रदानिक प्रकरण 156-159 5. अभ्युपेत्याशुश्रूषा 160-168 6. परिभाषित-अपरिभाषित वेतन-विधि 169-173 7. अस्वामि विक्रय 174-176 8. विक्रीय-असम्प्रदान 177-179 9. क्रीतानुशय 180-183 10. समय का अनपाकर्म 184-185 11. सीमा-बन्ध 186-196 12. स्त्री-पुरुष योग 192-222 13. दांया-भाग 223-235 14. साहस 236-242 15. वाक्पारुष्य एवं दण्डपारुष्य 243-249 16. द्यूत-समाह्वय प्रकरण 250-251 17. प्रकीर्णक 252-262 18. परिशिष्ट 263-275

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प्रथम अध्याय

प्रथम अध्याय इस संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार के क्षेत्र में पथ-प्रदर्शन करने के रूप में कल्याण करने के लिए तथा आचार-परम्परा की सुरक्षा के लिए¹ भगवान्² मनु ने सर्वप्रथम 'मनुस्मृति' के रूप में लोकप्रसिद्ध धर्मशास्त्र की रचना की। इस प्रकार स्मृतिकार नारद मनु को प्रथम स्मृतिकार मानते हैं और स्मृति रचना के दो उद्देश्य स्वीकार करते हैं - प्रथम, लोगों का पथ-प्रदर्शन करना, अर्थात् करणीय-अकरणीय का बोध कराकर उन्हें सत् के ग्रहण और असत् के परित्याग का दिशा-निर्देश करने के रूप में उनका कल्याण करना तथा द्वितीय, आचार परम्परा को संरक्षण प्रदान करना, अर्थात् ऋषियों की धरोहर को लुप्त होने से बचाने के रूप में उसे भावी पीढ़ी को सौंपना। मनुस्मृति की अनुक्रमणिका का परिचय देते हुए नारदजी कहते हैं- उस ग्रन्थ में एक लाख श्लोकों और एक हज़ार आठ अध्यायों में निबद्ध निम्नोक्त चौबीस प्रकरण हैं - (1) विश्व की उत्पत्ति, (2) प्राणियों का विभाजन, (3) उत्तम देश (आर्यावर्त्त) का प्रमाण-विस्तार, सीमाएं आदि, (4) राज्य परिषद् का लक्षण- गठन, स्वरूप तथा महत्त्व आदि, (5) वेदों तथा वेदांगों - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष के अनुसार विभिन्न यज्ञों - अश्वमेध आदि-तथा यागों के अनुष्ठान का विधान, (6) आचार, अर्थात् सदाचार, (7) लोक-व्यवहार, (8) कण्टकशोधन (शत्रुनाश), (9) राजा के लिए धर्म-रूप में आचरणीय नियमों का विधान, (10-11) वर्ण तथा आश्रम का विभाग, (12) विवाह, (13) न्याय, (14) स्त्रियों तथा पुरुषों के वैकल्पिक-असामान्य स्थिति में किये

  1. धर्म की रक्षा किये जाने पर वह रक्षक और हिंसा किये जाने पर वह हिंसक बन जाता है- "धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।"
  2. भगवान् शब्द का अर्थ है भग- ऐश्वर्य + वान् (ऐश्वर्य वाला)। ऐश्वर्य के अन्तर्गत विष्णु पुराण में छह विशेषताएं परिगणित हैं। एक अन्य ग्रन्थ में भी छह अन्य विशेषताओं का उल्लेख हुआ है। उत्पत्ति और प्रलय, सभी प्राणियों की गति और अगति तथा विद्या और अविद्या। इन्हीं विभिन्न विशेषताओं का अर्थ देने वाले भगवान् शब्द का प्रयोग परमपिता परमात्मा के लिए किया जाता है। वीर्य (सात्त्विक बल) यश (शुभकर्मों से अर्जित), श्री (रूप-सौन्दर्य), ज्ञान, वैराग्य (अनासक्ति) तथा समग्रता (पूर्णता)। नारदस्मृति / 11

जाने वाले—धर्म, (15) दाय-भाग, (16) श्राद्ध-कर्म, (17) शौच तथा आचार की वैकल्पिक-संकटकालीन-व्यवस्था, (18) भक्ष्य-अभक्ष्य विवेचन, (19) विक्रेय-अविक्रेय पदार्थों की मीमांसा, (20) पातक-भेद, (21-22) स्वर्ग तथा नरक का वर्णन, (23) प्रायश्चित्त-विधान तथा (24) उपनिषदों का रहस्य स्थान। नारदजी के अनुसार इतना विशाल ग्रन्थ जब उनके हाथ में आया, तो उन्होंने इसका अध्ययन करने के उपरान्त सोचा कि इतने बड़े ग्रन्थ को संभाल पाना तो मनुष्यों की शक्ति-सीमा के बाहर है। इसके अतिरिक्त इसे समझ पाना भी सरल नहीं। यह सब सोचकर महात्मा नारद ने लोगों की सुख-सुविधा की दृष्टि से सम्पूर्ण ज्ञान का बारह हज़ार श्लोकों में समाहार करके महर्षि मार्कण्डेय¹ को सौंप दिया। महर्षि मार्कण्डेय ने भी कलियुग के जीवों की आयु और शक्ति की सीमा को ध्यान में रखते हुए बारह हज़ार श्लोकों का आठ हज़ार श्लोकों में समाहार करके महर्षि भार्गव को प्रदान किया। विवेकशील महर्षि भार्गव ने आठ हज़ार श्लोकों वाले स्मृति-ग्रन्थ का अध्ययन किया और उन्हें लगा कि छोटी आयु और रोग- शोक से ग्रस्त तथा शक्तिहीन लोगों के लिए आठ हज़ार श्लोकों वाले ग्रन्थ को संभाल पाना भी सम्भव नहीं। अतः उन्होंने लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होकर आठ हज़ार श्लोकों का चार हज़ार श्लोकों में समाहार कर दिया। इस प्रकार देवों और गन्धर्वों के लिए एक लाख श्लोकों में निबद्ध स्मृति-ग्रन्थ को मनुष्यों की अल्प आयु और सीमित शक्ति के सन्दर्भ में चार हज़ार श्लोकों में समेट दिया गया। चार हज़ार श्लोकों में समाहरित स्मृति-ग्रन्थ का प्रथम पद्य है— आसीदिदं तमो' भूतं न प्राज्ञायत किंचन। ततः स्वयंभूर्भगवान् प्रादुरासोच्चतुर्मुखः ॥ प्रलयकाल में चारों ओर घना अन्धकार घिरा हुआ था। न कहीं प्रकाश का कोई चिह्न था और न ही कहीं कोई इस सम्बन्ध में कुछ जानने वाला था। इस स्थिति का अन्त करने के लिए सर्वसमर्थ चतुरानन भगवान् ब्रह्मा का आविर्भाव हुआ। ब्रह्माजी के आदेश-निर्देशानुसार-चार हज़ार श्लोकों वाले स्मृति-ग्रन्थ में निरूपित विषय को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप देने के लिए 'प्रकरण' बनाये गये। इन्हीं प्रकरणों में प्रथम प्रकरण में व्यवहार-विषय के निरूपण को स्थान दिया गया और देवर्षि नारद ने प्रस्तुत ग्रन्थ-'व्यवहारमातृका' - की रचना की। इसके प्रथम अध्याय के चौहत्तर (74) पद्य हैं।

  1. महाभारत के अनुशासन पर्व के एक उल्लेख से यह संकेत मिलता है कि देवर्षि नारद का ग्रन्थ महर्षि मार्कण्डेय के लिए उपजीव्य ग्रन्थ रहा है। "धर्मसंकटे पतितो मार्कण्डेयो नारदं पृष्ट्वाधर्मं निश्चिनोति।" अर्थात् मार्कण्डेय जब कभी धर्म के निर्णय में संकटग्रस्त हो जाते हैं, तो समाधान के लिए 'नारदस्मृति' की शरण लेते हैं। 12 / नारदस्मृति

टिप्पणी—समाहार करने वाले ऋषियों की गणना में नारद का नाम दो बार आया है। सर्वप्रथम, एक लाख श्लोकों को बारह हज़ार श्लोकों में समेटकर महर्षि मार्कण्डेय को सौंपने वाले महात्मा नारद हैं तथा सभी समाहर्ताओं के अन्त में भार्गव के चार हज़ार श्लोक वाले स्मृति-ग्रन्थ के आधार पर 'व्यवहारमातृका' के रचयिता भी नारद हैं। इन दोनों स्थानों पर नाम के साथ देवर्षि जुड़ा हुआ है— भगवान् मनुरूपनिबद्ध्य देवर्षये नारदाय प्रायच्छत् 1/2 यत्रेमामादौ देवर्षि नारदः सूत्रीयां मातृकां चकार ॥ 1/6 अब यहां विचारणीय यह है कि यह देवर्षि नारद एक ही व्यक्ति है अथवा दो भिन्न व्यक्ति हैं। भण्डारकर शोध संस्थान, मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सदाशिव के अनुसार—आश्चर्यजनक तो यह है कि नारद मनु को प्रथम स्मृतिकार मानते हैं और मनु अपने से पूर्ववर्ती दस स्मृतिकारों में नारद के नाम का उल्लेख करते हैं— "Manu refers to Narada while according to Manu Narada is one of the ten prajapatis, some of whom appear as law-givers." —Preface 10-11 प्रोफ़ेसर भण्डारकर के अनुसार—याज्ञवल्क्य ने तो नारद का उल्लेख ही नहीं किया। जगन्नाथपुरी संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. श्रद्धाकर सूपकर ने नारदस्मृति के रचयिता को देवर्षि नारद से भिन्न तथा मनु और याज्ञवल्क्य से परवर्ती माना है। डॉ. सूपकर ने स्मृतिकार नारद को भारत के प्राचीन धर्म-शास्त्रकारों में अग्रणी, प्रतिष्ठित, प्रामाणिक एवं योग्यतम न्यायशास्त्री मानते हुए लिखा है— "Narada is one of the most Prolific writers and one of the fore- most authorities on ancient Indian Dharmshastras. Narada seems to be a Pseudonym of a brilliant jurist of ancient India." —Foreward धर्मैकतानाः पुरुषा यदासन् सत्यवादिनः । तदा न व्यवहारोऽभून्न द्वेषो नापि मत्सरः ॥ 1 ॥ जब इस पृथ्वीतल के सभी निवासी धर्मनिष्ठ तथा सत्यवादी थे, तब लोगों में न तो ईर्ष्या-द्वेष का भाव था और न ही किसी की, किसी के द्वारा, किसी के प्रति किये गये अनुचित व्यवहार एवं अन्याय के विरुद्ध कोई शिकायत थी। जब सभी लोग न्यायपरायण, आचारवान्, उदार तथा शुद्ध व्यवहार करने वाले थे, तब न तो दुहाई थी और न ही न्याय के लिए गुहार थी। इस प्रकारे उस युग में मुक़द्दमेबाज़ी के अस्तित्व का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। नारदस्मृति / 13

अभिप्राय यह है कि एक समय ऐसा भी था, जब न अन्याय होता था और न उस अन्याय के विरुद्ध विवाद अथवा दावा-मुक़द्दमा डाला जाता था। इस प्रकार न प्राड्विवाक (वकील) थे, न न्यायाधीश, न न्यायालय और न ही वादी प्रतिवादी थे। टिप्पणी — हमारे विचार में ऐसे किसी युग-विशेष अथवा क्षेत्र-विशेष की कल्पना — जहां सभी लोग सदाचारी एवं सत्यवादी हों — असम्भवप्राय ही है। सभ्यता के विकास का, तन्त्र व्यवस्था के उद्गम का तथा नियम-विनियम विधायिका का तथा स्मृतियों के अस्तित्व का मूल तत्त्व ही सबलों द्वारा निर्बलों का उत्पीड़न है। हां, मात्रा अथवा परिमाण की न्यूनता-अधिकता का होना अवश्य सर्वत्र सम्भव है। लोगों द्वारा आपसी विवादों को पञ्चों द्वारा निपटाने के प्रमाण अवश्य मिलते हैं। यदि इसे ही सत्ययुग अथवा कल्पित युग मान लिया जाये, तो बात अलग है। मनुष्यों में द्वेष, मात्सर्य तथा वैर-विरोध का न होना भी अविश्वसनीय लगता है, अन्यथा नीतिकारों को यह न मानना पड़ता— मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः। त्रयस्तत्र प्रजायन्ते मित्रोदासीन शत्रवः ॥ अर्थात् किसी से, किसी भी प्रकार का, कोई सम्बन्ध न रखने वाले तपोलीन एकान्तवासी मुनि के भी प्रशंसक, निन्दक और उपेक्षक बन ही जाते हैं। नष्टे धर्मे मनुष्याणां व्यवहारः प्रवर्त्तते । द्रष्टा च व्यवहाराणां राजा दण्डधरः स्मृतः ॥ २ ॥ लोगों में धर्म के प्रति आस्था घट जाने पर उनमें राग-द्वेष, ईर्ष्या-मात्सर्य तथा वैर-विरोध के भाव पनपते हैं और फिर समर्थ पुरुषों द्वारा असमर्थों को दबाया जाता है, उनके प्रति अन्याय किया जाता है। अन्याय का शिकार बने पीड़ित व्यक्ति न्यायतन्त्र से गुहार करते हैं। इसी न्याय-याचना का नाम व्यवहार अथवा मुक़द्दमा है। उस व्यवहार में सत्य की जांच-परख का, वादी-प्रतिवादी के वक्तव्यों को सुनने-परखने का, दोष की खोज और निर्णय का तथा अपराधी को दण्ड देने के रूप में अन्याय के शिकार बने प्रार्थी को न्याय देने का कार्य राजा का अथवा उसके द्वारा नियुक्त उसके प्रतिनिधि का होता है। अपराधियों को दण्ड देने का अधिकारी होने के कारण ही राजा को 'दण्डधर' कहा जाता है। राजा को इन्द्र का प्रतिनिधि माना गया है। इन्द्र का एक नाम 'सहस्त्राक्ष' है, जिसका अभिप्राय है कि राजा सर्व-समर्थ ईश्वर का रूप होने से सब कुछ देखता, सुनता, समझता, पहचानता है और धर्मसम्मत न्याय करता है। अपराधियों को दण्डित करके और धर्म की स्थापना में सहायक बनकर ही राजा अपने 'दण्डधर' विशेषण को सार्थक करता है। निस्सन्देह धर्म का पालन करने पर बुराइयों को पनपने का अवसर नहीं मिलता। 14 / नारदस्मृति

लिखितं साक्षिणश्चैव द्वौ विधी परिकीर्त्तितौ। सन्दिग्धार्थविशुद्धयर्थं द्वयोर्विवदमानयोः ॥ ३ ॥ किसी भी विवाद में दोनों पक्षों—वादी तथा प्रतिवादी—द्वारा अपने-अपने पक्ष में प्रस्तुत तर्कों और युक्तियों को सुनने के उपरान्त सत्य के निर्णय के लिए न्यायाधिकरण के पास दो ही साधन हैं—लिखित सामग्री तथा साक्ष्य का परीक्षण। इन दोनों में से किसी एक के भी उपलब्ध होने पर ही विशुद्ध पक्ष पर पहुंचना सम्भव होता है। टिप्पणी—वसिष्ठ, विष्णु तथा याज्ञवल्क्य प्रभृति स्मृतिकारों ने तथ्य-निर्णय के लिए प्रमाण के रूप में तीन साधन माने हैं—लिखित, साक्ष्य और भोग, अर्थात् विवादित सम्पत्ति वर्तमान में किसके अधिकार में है— लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम्। —वसिष्ठ तस्य च भाववास्चित्रो भवन्ति लिखितम्, साक्षिणः समयक्रियाच। —विष्णु प्रमाणं लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति कीर्त्तितम्। —याज्ञवल्क्य सोत्तरोऽनुत्तरश्चैव स विज्ञेयो द्विलक्षणः। सोत्तरोऽभ्यधिको यत्र विलेखापूर्वकः पणः ॥ ४ ॥ प्रत्येक व्यवहार के दो रूप-भेद होते हैं—प्रथम सोत्तर, अर्थात् वादी द्वारा लगाये गये आरोप-आक्षेप का प्रतिवादी द्वारा उत्तर देने को प्रस्तुत होना। ऐसा व्यवहार सोत्तर कहलाता है। द्वितीय अनुत्तर, अर्थात् वादी द्वारा लगाये गये आरोप का प्रतिवादी द्वारा किसी भी कारण—कलह को आगे न बढ़ाने की, अर्थात् समझौते की इच्छा, खण्डन के आधार का न होना अथवा उत्तर देने में अपनी हीनता समझना आदि— से उत्तर न देना। ऐसा व्यवहार अनुत्तर कहलाता है। सोत्तर व्यवहार में तो सत्य-असत्य के निर्धारण की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु अनुत्तरित व्यवहार तो वहीं समाप्त हो जाता है। इसे अपराध-स्वीकृति भी माना जा सकता है और उपेक्षा-भाव भी। दोनों ही अवस्थाओं में उपयुक्त दण्ड का विधान करते हुए व्यवहार को तत्काल निपटाया जा सकता है। सोत्तर के पुनः दो प्रकार होते हैं—सपण तथा अपण। सपण—उत्तर देने वाले के अपने अपराधी सिद्ध होने पर, पणों का दण्ड भुगतने के लिए तैयार होने के साथ ही वादी के मिथ्या सिद्ध होने पर उसे दण्डित करने की शर्त पर किया जाने वाला उत्तर सपण कहलाता है। नारदस्मृति / 15

अपण—बिना किसी पूर्व शर्त अथवा आग्रह आदि के सामान्य रूप से दिया जाने वाला उत्तर—वादी द्वारा लगाये गये आरोप का खण्डन—अपण कहलाता है। स्मृतिकार नारद के अनुसार वादी-प्रतिवादी का व्यवहार एवं उत्तर आदि लिखित रूप में ही होना चाहिए, मौखिक कदापि नहीं होना चाहिए। विवादे सोत्तरपणे द्वयोर्यस्तत्र हीयते। स एव हि पणं दाप्यो विनयं च पराजये ॥ 5 ॥ प्रतिवादी द्वारा पण लगाकर उत्तर दिये जाने वाले तथा वादी द्वारा पण स्वीकार किये गये व्यवहार में पराजित होने वाले को न केवल निर्धारित पणों का भुगतान करना होता है, अपितु न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित दण्ड भी भुगतना पड़ता है। सारस्तु व्यवहाराणां प्रतिज्ञा समुदाहता। तद्धानौ हीयते वादी तरस्तामुत्तरो भवेत् ॥ 6 ॥ किसी भी व्यवहार में प्रतिज्ञा-रूप में जो लिपिबद्ध कर लिया जाता है, वही सार वस्तु है। उदाहरणार्थ, धन छीनने की बात लिखी जाती है, तो वही प्रतिज्ञा है। मार-पीट अथवा अंग-भंग करने की शिकायत की जाती है, तो वही प्रतिज्ञा है, पराजित होने वाला विजेता को प्रतिज्ञात ही देता है, उससे भिन्न नहीं, अर्थात् यदि धन की शिकायत की गयी है, तो जीतने वाले को पराजित होने वाले से धन ग्रहण करना होता है। यदि शरीर के किसी अंग—हाथ, पैर आदि—को क्षतिग्रस्त करने की शिकायत की गयी है, तो पराजित होने वाले को उस अंग-विशेष की क्षति- पूर्ति करनी होती है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिकायतं के सत्य सिद्ध होने पर ही वादी को विजयी माना जाता है, परन्तु शिकायत के असत्य सिद्ध होने पर वादी को पराजित माना जाता है। अभिप्राय यह है कि न तो प्रतिज्ञात से भिन्न किसी अन्य वस्तु की मांग की जा सकती है और न ही किसी भिन्न वस्तु पर विवाद किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जय-पराजय का एकमात्र आधार प्रतिज्ञात वस्तु की सत्यता-असत्यता का सिद्ध होना है। न्याय-प्रक्रिया के पांच स्वर अथवा सोपान हैं— कुलानि श्रेणयश्चैव गणाश्चाधिकृतो नृपः। प्रतिष्ठा व्यवहाराणां गुर्वेभ्यस्तत्तरोत्तरम् ॥ 7 ॥ कुल—परिवार का मुखिया अथवा प्रमाणित पुरुष। श्रेणी—विभिन्न स्थानों पर समान कार्य करने वाले व्यक्तियों—अध्यापक, श्रमिक, चिकित्सक आदि—के समुदाय का प्रमुख। 16 / नारदस्मृति

गण—एक ही जाति अथवा सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला श्रेष्ठ पुरुष। मनोनीत—आज के नियमित नियुक्ति पाने वाले न्यायाधीशों के समान ही राजा द्वारा नियुक्त योग्य न्यायविद्। स्वयं राजा—इनमें पूर्व से ऊपर-ऊपर वरीय हैं, अर्थात् कुल से श्रेणी, श्रेणी से गण, गण से अधिकृत न्यायाधीश तथा उससे ऊपर राजा है। प्रत्येक ऊपर वाला न्यायाधिकरण नीचे वाली न्यायिक संस्था के निर्णय पर पुनः विचार करने में, यहां तक कि उसके निर्णय को निरस्त करने में सक्षम है। टिप्पणी—इसी तथ्य का समर्थन याज्ञवल्क्यस्मृति में भी हुआ है- नृपेणाधिकृताः पूगाः श्रेणयोऽथ कुलानि च। पूर्वं पूर्वं गुरुं ज्ञेयं व्यवहारविधौ नृणाम्॥ नारद के गण शब्द के स्थान पर ही याज्ञवल्क्य ने 'पूग' शब्द का प्रयोग किया है। आजकल भी न्याय-व्यवस्था के पांच स्तर हैं—कनिष्ठ न्यायाधीश (सब जज), वरिष्ठ न्यायाधीश (सीनियर जज), मण्डल न्यायाधीश (सेशन जज), उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) तथा सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)। राजा का स्थान आज के राष्ट्राध्यक्ष के समकक्ष समझना चाहिए। आज जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने-क्षमायाचना को स्वीकार करने आदि का अधिकार राष्ट्रपति को है, नारद वही स्थिति राजा की घोषित करते हैं। स चतुष्पाच्चतुः स्थानश्चतुः साधन एव च। चतुर्हितश्चतुर्व्यापी चतुष्कारी च कीर्त्त्यते ॥ 8 ॥ अष्टाङ्गोऽष्टादशपदः शतशाखस्तथैव च। त्रियोनिर्द्व्यभियोगश्च द्विद्वारो द्विगतिस्तथा ॥ 9 ॥ यह विवाद-मुकदमा—चतुष्पाद, अर्थात्—धर्म, व्यवहार, चरित्र और राज- शासन, चतुः स्थानीय, अर्थात्—सभ्य-साक्षी, पुस्तक, रण तथा राजा की आज्ञा, चतुः साधन, अर्थात् चार साधनों-साम, दान, भेद और दण्ड, चतुर्हित, अर्थात् चारों वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—का हितसाधक, चतुर्व्यापी, कर्ता, साक्षी, सभ्य तथा राजा को प्रभावित करने वाला, धर्म, अर्थ, यश तथा लोकरञ्जन का साधक होने से चतुष्कारी-चार कार्यों का सम्पादक, राजा के अष्ट अंगों- सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संशय, द्वैधीभाव से सम्बन्धित होने के कारण अष्टांग (आठ अंगों वाला), ऋणदान आदि अठारह विषयों वाला होने से अष्टादशमुखी, शत-प्रतिशत शाखाओं वाला, काम, क्रोध और लोभ से उत्पन्न होने के कारण त्रियोनि है। भीतर और बाहर भयोत्पादक होने से द्विमुख, वादी-प्रतिवादी के सम्बन्ध से द्वि-द्वार तथा सत्य और छल से समन्वित रहने के कारण द्विःगति कहा जाता है। नारदस्मृति / 17

इस प्रकार नारदजी ने व्यवहार के निम्नोक्त तत्त्वों का उल्लेख किया है—पाद, स्थान, साधन, हित, व्यापकता, कार्य, अंग, पद, शाखा, अभियोग, योनि (उत्पत्ति स्थान), द्वार तथा गति। धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन को चरण माना गया है; क्योंकि इन्हीं से यह चलता-आगे बढ़ता है। इसकी स्थिति के चार स्थान हैं—सज्जन का साक्ष्य, लिखित प्रमाण, कलह-संघर्ष तथा राज्ञाज्ञा। इसे निपटाने के चार साधन—समझाना- बुझाना, कुछ देना-दिलाना, फूट डालना तथा दण्ड देना—चारों वर्गों के लोगों के हितसाधक हैं। एक साथ चारों—मुक़दमा करने वाला, साक्षी, समाज तथा प्रशासन— को प्रभावित करने वाला होने से यह चतुर्व्यापी—चारों ओर व्यापक—है। सत्यनिर्णय देने के रूप में यह धर्म, अर्थ और यश की प्रतिष्ठा तथा लोकरञ्जन आदि चारों उद्देश्यों (कार्यों) का पूरक (चतुष्कारी) है। प्रत्येक विवाद की उत्पत्ति काम से अथवा क्रोध से मानी जाती है। राजा के सन्धि, विग्रह आदि आठ अंगों के समान अभियोग भी आठ अंगों वाला होता है। इसके ऋण, दान आदि अठारह भेद हैं व सैकड़ों शाखाएं हैं। यह न केवल शारीरिक कष्ट को उत्पन्न करता है, अपितु मानसिक क्लेश-उद्वेग को भी जन्म देता है। इस प्रकार ये दो रूपों में अभियुक्त— आक्रान्त करने वाला—है। वादी-प्रतिवादी दो द्वार कहे जाते हैं तथा सत्य और छल का प्रयोग होने से इसकी दो गतियां (चालें) मानी गयी हैं। इस प्रकार प्रत्येक मुक़द्दमे के तेरह अंग होते हैं, जिनका विवरण अगले पद्यों में प्रस्तुत किया गया है। धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्। चतुष्पाद् व्यवहारोऽयमुत्तरः पूर्वबाधकः ॥ 10 ॥ लेन-देन के चार रूप-भेद हैं-धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा। धर्म से व्यवहार को, व्यवहार से चरित्र को और चरित्र से राजाज्ञा को वरीयता प्राप्त है। उदाहरणार्थ, धर्म किसी विषय-नियोग, कन्याहरण तथा द्यूत आदि-की अनुमति देता है, परन्तु फिर भी व्यक्ति उसके विरुद्ध न्यायालय में प्रार्थना करता है, तो व्यवहार चलेगा। धर्म के विरुद्ध की गयी याचना की भी सुनवाई होगी। इसी प्रकार जिसके विरुद्ध आरोप लगाया गया है, यदि उसका चरित्र निष्कलंक है और अभियोग लगाने वाले के पास प्रमाण का अभाव है, तो चरित्र को प्रबलता प्राप्त होगी, परन्तु राजाज्ञा अन्तिम प्रमाण है। उसके सामने अन्य सभी कुछ गौण है। तत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु। चरित्रं पुस्तकरणे राजाज्ञायां तु शासनम् ॥ 11 ॥ 18 / नारदस्मृति

धर्म, व्यवहार, चरित्र और शासन को निम्नोक्त रूप से परिभाषित किया गया है— धर्म—प्रतिवादी द्वारा अपने ऊपर वादी द्वारा लगाये गये आरोप को स्वीकार करना। किसी प्रकार से उसका खण्डन अथवा उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क न करना, अर्थात् समर्पण करना, अपने को अपराधी मान लेना और दण्ड ग्रहण करने को प्रस्तुत होना। व्यवहार—वादी द्वारा लगाये गये आरोप को प्रतिवादी द्वारा नकारना और साक्षियों द्वारा वादी के कथन की पुष्टि होना। चरित्र—वादी द्वारा प्रस्तुत विषय की पुष्टि के लिए लिखित प्रमाण की अपेक्षा करना। शासन—राजा द्वारा दिया गया निर्णय। टिप्पणी—नारदजी ने इन चारों में—'उत्तरः पूर्वबाधकः' कहा है, अर्थात् धर्म से व्यवहार को, व्यवहार से चरित्र को और चरित्र से भी राजा को और देश को प्रबल माना है, परन्तु हमारे विचार में तो यह उलटी गंगा बहाना है। जहां प्रतिवादी अपने ऊपर लगाये गये आरोपों का विरोध ही नहीं करता, दण्ड के लिए अपने को प्रस्तुत कर देता है, उससे उत्तम स्थिति भला और क्या हो सकती है ? यहां न तो साक्ष्य की, न लिखित प्रमाण की और न ही राजा (न्यायाधिकरण) के हस्तक्षेप की आवश्यकता है। यह तो सर्वोत्तम स्थिति मान्य होनी चाहिए। हां, सत्य को नकारने पर साक्ष्य का और साक्ष्य की अपेक्षा लिखित प्रमाण का सापेक्ष महत्त्व अवश्य है। राजाज्ञा तो सदैव अन्तिम रूप से सर्वमान्य रही है। इस प्रकार धर्म को नकारने पर ही तीनों की भूमिका प्रारम्भ होती है, धर्मपालन करने पर तो इनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। असहाय भाष्यकार ने इन चारों—धर्म, व्यवहार, चरित्र और शासन—को इस प्रकार परिभाषित किया है— धर्म—उत्तमर्ण और अधमर्ण (ऋण देने-लेने वाले) द्वारा एकान्त में लेन- देन करने पर भी दोनों का सत्य से विचलित न होना, अर्थात् ऋणकर्ता लिये गये ऋण से मुकरता तो नहीं है, परन्तु दे पाने में अपनी असमर्थता को प्रकट करता है। व्यवहार—दोनों—धनिक और ऋणकर्ता—द्वारा किसी भी समय, किसी के मन में, किसी प्रकार के दोष के आ जाने की आशंका से बचने के लिए, किसी विश्वस्त व्यक्ति को साक्षी के रूप में मध्यस्थ बनाकर लेन-देन करना। चरित्र—दोनों—लेन-देन करने वालों—द्वारा निर्धारित शर्तों और लेन-देन की राशि आदि को काग़ज़, भोजपत्र, वस्त्र अथवा काष्ठखण्ड पर अंकित करना। शासन—न्यायालय-परिसर में जाकर अधिकृत लेखक (अर्जीनवीस यानी नारदस्मृति / 19

Petition Writer ) से विधिमान्य शर्तों पर लेन-देन की राशि और शर्तों को सरकारी कागज़ पर लिपिबद्ध कराना। हमारे विचार में असहाय भाष्यकार द्वारा प्रस्तुत परिभाषाएं पूर्णतः व्यावहारिक एवं तर्कसंगत होने से अधिक मान्य होनी चाहिए। सामाद्युपायसाध्यत्वाच्चतुः साधन उच्यते। चतुर्णामाश्रमाणां च रक्षणात् स चतुर्हितः ॥ 12 ॥ व्यवहार को चतुःसाधन और चतुर्हित बताते हुए इन दोनों की व्याख्या इस प्रकार की गयी है-व्यवहार, उपाय कहे जाने वाले चार साधनों से साध्य होने के कारण चतुःसाधन कहलाता है। वे चार उपाय अथवा साधन हैं-साम, दान, भेद और दण्ड। इसी प्रकार चारों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्णों और चारों- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमों के लोगों के हितों का रक्षक होने से यह चतुर्हित कहलाता है। टिप्पणी-अपने कार्य की सिद्धि में कुशलता का नाम उपाय है और राजनीति में इनकी संख्या चार बतायी गयी है- साम-प्रिय-मधुर-वाणी से प्रबोधन । दान-धन-धरती देना अथवा अपराध क्षमा करना अथवा पुरस्कृत करना, अर्थात् कृपापात्र बनना। भेद-उपकारी को उसके मित्रों, सहायकों एवं शुभचिन्तकों से अलग- थलग कर देना। दण्ड-धन-सम्पत्ति छीन लेना, पिटवाना, जेल में डालना अथवा प्राणहरण करना। 'मत्स्यपुराण' में चार के स्थान पर निम्नोक्त सात उपाय बताये गये हैं- साम भेदस्तथा दानं दण्डं च मनुजेश्वर! उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं च पार्थिव! प्रयोगाः कथिताः सप्त तन्मे निगदतः शृणु। कर्त्तृनथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च। व्याप्नोति पादशो यस्माच्चतुर्व्यापी ततः स्मृतः ॥ 13 ॥ व्यवहार की एक विशेषता उसका चतुर्व्यापी होना है। किसी भी मुकद्दमे का चार पक्षों से सम्बन्ध बना-जुड़ा रहता है-कर्ता-रूप में वादी और प्रतिवादी, साक्षी (आज की भाषा में ज्यूरी), न्यायाधिकरण, अर्थात् धर्माधिकारियों की संस्था के सदस्य (Jury के सदस्य) तथा स्वयं राजा (न्यायाधीश) प्रत्येक व्यवहार से ये चारों सम्बन्धित रहते हैं। इस प्रकार इन चारों को व्यापने वाला होने से व्यवहार चतुर्व्यापी कहलाता है। 20 / नारदस्मृति

टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार प्रत्येक मुक़दमे के प्रक्रियागत चार चरण होते हैं— उद्घाटन—वादी-प्रतिवादी मुक़दमे का प्रारम्भ करते हैं। प्रतिष्ठापन—साक्षी मुक़दमे को स्थिरता प्रदान करते हैं। निभालन—न्यायाधिकरण के सदस्य युक्ति-प्रत्युक्ति की जांच-परख करते हैं और अपने-अपने मत प्रस्तुत करते हैं। निर्णय-विज्ञापन—न्यायाधीश (राज-प्रतिनिधि) निर्णय घोषित करता है। इस प्रकार मुक़दमा चतुष्पाद और चतुर्व्यापी है। धर्मस्यार्थस्य यशसो लोकपङ्क्तेस्तथैव च। चतुर्णां करणादेषां चतुष्कारीति चोच्यते ॥ 14 ॥ मुक़दमा चतुष्कारी—चार उपकार करने वाला—है। वह धर्म व अर्थ की रक्षा, यश का प्रसार और लोगों के पारस्परिक अनुराग में वृद्धि करता है। अन्याय के विरुद्ध न्याय का संरक्षण धर्म की रक्षा है। प्रायः प्रत्येक मुक़दमा किसी-न-किसी रूप में धन-सम्पत्ति से जुड़ा होता है। धन हड़पने वाले से पीड़ित को धन लौटवाना अर्थ की रक्षा है। मुक़दमा जीतने वाला लोक में सम्मानित होता है, उसका यश बढ़ता है। मुक़दमे के भय से लोग एक-दूसरे से द्रोह नहीं करते, स्नेह-भाव से रहते हैं। इस प्रकार मुक़दमा चार प्रकार से लोगों का हित-साधन करता है। राजा सत्पुरुषः सभ्याः शास्त्रं गणकलेखकौ। हिरण्यमग्निरुदकमष्टाङ्गः समुदाहृतः ॥ 15 ॥ मुक़दमे के आठ अंग इस प्रकार हैं—आचारनिष्ठ राजा अथवा राजा द्वारा नियुक्त-मनोनीत न्यायाधीश, न्यायाधिकरण (ज्यूरी) के सदस्य, शास्त्र, अर्थात् न्यायसंहिता (पैनलकोड), गणक (लेखाधिकारी), लेखक, हिरण्य, अर्थात् स्वर्ण (कोर्ट-फ़ीस), अग्नि और जल। टिप्पणी—(1) आज न्यायालय में जिस प्रकार वक्तव्य से पूर्व वादी- प्रतिवादी को गीता, क़ुरान अथवा बाईबल पर हाथ रखवा कर शपथ दिलायी जाती है, प्राचीनकाल में अपने वक्तव्य से पूर्व हाथ में जल लेकर, सत्यभाषण की शपथ ली जाती थी और सत्य की परीक्षा के लिए अग्नि में हाथ डाला जाता था। ऐसी मान्यता है कि सत्यवक्ता के लिए अग्नि शीतल हो जाती थी और इसके विपरीत मिथ्याभाषी के लिए दाहक हो जाती थी। इसी सन्दर्भ में आठ अंगों में जल और अग्नि परिगणित हैं। (2) असहाय भाष्यकार ने हिरण्य को हिरण्यगर्भ (ब्रह्म) का प्रतीक मानते हुए हिरण्य, जल और अग्नि को प्रत्यक्ष देवता के रूप में ग्रहण किया है। उनके नारदस्मृति / 21