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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

अथवा किसका सन्देह है? यदि तुम्हारे विचार ज्ञान का विषय नहीं हैं तो यह सब व्यर्थ ही तो नहीं है? यदि इन विचारों तथा इनके विषयभूत पदार्थों का ज्ञान तुम्हारे प्रत्यक्ष द्वारा नहीं माना जाता है, किन्तु इन विचारों का प्रत्यक्ष तो किया गया और इनके विषय को जाना, तो फिर अन्य बाह्य वस्तु का भी ज्ञान क्यों नहीं माना जाता? तुम यह किस प्रकार कहते हो? इसलिये ज्ञान के सब विषय बाह्य ही प्रत्यक्षरूप प्रत्यक्ष प्रतिभासित होते हैं। स्वप्न अवस्था में भी अनुभूत ही वस्तु का इस प्रकार का यह मिथ्या प्रतिभास होता है। अन्यथा जो इस तरह का प्रतिभास होता है वह अज्ञान जन्य प्रतिभास प्रतिभास ही तो है अथवा भ्रमरूप? या फिर यह बात ही मिथ्या? वस्तु के ज्ञान का यह विषय? प्रत्यक्ष दृष्टांत तो इस प्रकार है, जब कि किसी के द्वारा सम्पादित यह ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से यह ज्ञान अन्य बाह्य वस्तु के समान ही तो है? ज्ञान इस प्रकार अन्य वस्तु के समान दिखाई दे? इसलिये यह विचार केवल प्रतिभास मात्र ही रूप में सत्य है। इस प्रकार बाह्य वस्तु का ज्ञान रूप में प्रत्यक्ष रूप होने पर भी पदार्थ रूप ज्ञान नहीं हो रहा जिस प्रकार रस्सी में सर्प का ज्ञान अथवा रेत-कण ज्ञान के रूप, तो प्रतिभास मात्र एक पदार्थ मात्र रूप ही तो सब जगत् प्रतिभास रूप ज्ञान के द्वारा ही ज्ञात हो रहा है, रस्सी का ही यह ज्ञान रूप प्रकाश मिथ्या है, रस्सी का न होकर? फिर यह क्या है? ज्ञान बाह्य वस्तु प्रकाशक? प्रतिभास प्रकाश स्वरूप? या प्रतिभास ही ज्ञान प्रकाश? यह रूप किसका है? यह क्या प्रतिभास? ज्ञान प्रकाश जिस प्रकार बाह्य रूप में अन्य प्रकाश के साथ सत्य ही रहता है। रस्सी का ज्ञान बाह्य पदार्थ के साथ ज्ञान होने से यह ज्ञान प्रकाश ही तो होगा फिर, उस रस्सी ज्ञान प्रतिभास से ही ज्ञात हुआ, यह न ज्ञान रूप बाह्य पदार्थ का ज्ञान उस प्रतिभास ज्ञान रूप में न प्रतिभास प्रकाश का रूप प्रतिभास रूपी प्रकाश का प्रत्यक्ष रूप ही तो ज्ञान आ--ना प्रतिभास का प्रकाश ही तो है, रस्सी ज्ञान मात्र ही यह सन्-मात्र रूप ज्ञान ही रूप प्रकाश न रहा, तो यह ज्ञान का ही ज्ञान के सन्दर्भ में सन्--का ज्ञान ही रूप में प्रकाश ही सब जगत् के प्रतिभास मात्र ही रहा है, तो यह ज्ञान बाह्य पदार्थ रूप में ज्ञान बाह्य ज्ञान रूप से भिन्न नहीं, यह ज्ञान प्रकाश ही प्रतिभास इस प्रकार ज्ञान के स्वभाव का ज्ञान बाह्य रूप सब प्रतिभास, मात्र प्रतिभास, मात्र प्रतिभास स्वरूप ही सब रूप जगत् प्रतिभास रूप ज्ञान द्वारा ही ज्ञात हो रहा ज्ञान प्रकाश मात्र ज्ञान के रूप सब जगत् का प्रतिभास मात्र ज्ञान बाह्य ज्ञान प्रत्यक्ष बाह्य ज्ञान के साथ ज्ञान होने से ज्ञान प्रतिभास बाह्य ज्ञान रूप ही सब बाह्य पदार्थ प्रतिभास ही सब रूप सब रूप ज्ञान से भिन्न रूप में प्रतिभास ही सब रूप है, तो सन्-मात्र ज्ञान का ज्ञान प्रतिभास ही सब का बाह्य रूप सब ज्ञान ही प्रत्यक्ष का प्रकाश ही न हुआ! न प्रत्यक्ष ही प्रतिभास, सब ज्ञान ही प्रतिभास ज्ञान प्रतिभास का प्रकाश प्रकाश, प्रतिभास प्रकाश, रूप बाह्य प्रतिभास का प्रतिभास प्रतिभास तो यह प्रत्यक्ष के अभाव स्वरूप का ज्ञान प्रतिभास का प्रत्यक्ष स्वरूप ज्ञान सब जगत् का प्रतिभास मात्र ज्ञान सब जगत् ज्ञान के साथ ही सब रूप इस प्रकार सब ही प्रकाश सब ज्ञान रूप सब ज्ञान सब प्रतिभास का ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान रूप सब ही ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप का ही ज्ञान सब प्रकाश रूप सब सब रूप ही ज्ञान के साथ ही सब ज्ञान रूप का प्रतिभास स्वरूप ज्ञान सब ज्ञान सब बाह्य पदार्थ का सब ज्ञान रूप ज्ञान रूप सब ज्ञान, जो प्रतिभास मात्र रूप के साथ बाह्य ज्ञान रूप प्रतिभास, बाह्य पदार्थ रूप ज्ञान प्रकाश रूप, ज्ञान प्रकाश रूप सब ही ज्ञान का प्रत्यक्ष रूप ज्ञान सब ज्ञान सब ज्ञान रूप ही सब ज्ञान रूप ज्ञान का प्रत्यक्ष ज्ञान रूप सब जगत् ज्ञान-मात्र प्रकाश ही सब रूप ज्ञान सब जगत्, बाह्य पदार्थ रूप, तो सब ज्ञान के ही रूप स्वरूप प्रतिभास प्रकाश रूप ही सब सब ज्ञान सब बाह्य पदार्थ सब सब ज्ञान बाह्य रूप सब सब ज्ञान रूप है, ज्ञान रूप ही प्रत्यक्ष प्रतिभास प्रतिभास के ज्ञान स्वरूप सब ही ज्ञान सब रूप सब बाह्य के सब रूप पदार्थ है, बाह्य पदार्थ सब ही ज्ञान बाह्य ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान सब सब ही ज्ञान सब प्रत्यक्ष रूप सब सब ज्ञान सब ज्ञान सब बाह्य प्रतिभास सब ज्ञान सब ज्ञान सब ज्ञान के सब ही प्रतिभास ज्ञान है? या सब प्रत्यक्ष सब ज्ञान है, ज्ञान बाह्य ज्ञान, सब ज्ञान ज्ञान ज्ञान सब तो सब ही सब सब ज्ञान रूप स्वरूप का प्रतिभास रूप है, प्रतिभास प्रत्यक्ष सब ज्ञान का ही सब ज्ञान का ज्ञान स्वरूप ही सब ज्ञान पदार्थ के प्रत्यक्ष ज्ञान सब बाह्य प्रकाश सब प्रतिभास सब है! ज्ञान सब प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष सब 269

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विलास मात्र भी नहीं किया। माता-पिता पहले जितने स्वाधीन थे अब उतने नहीं रहे, बात भी नहीं करते कि न मालूम कब सुपुत्र चिढ़ जायँ! पहले माता-पिता आज्ञाकारी थे आज्ञा देकर अपने कर्त्तव्य का पालन तो कर सकते थे मगर अब बालक का हाथ पकड़ कर यह या वह काम कराना या तो सिर तोड़ लेना था अथवा न कराना था क्योंकि अब उसे अपने कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं था या अपने ज्ञान अनुसार ही! ऐसी दशा बालक की? सब ही या बहुत अवस्था में यह बात हो ही जाती मगर यदि यह न भी हो तब बालक का मन सब ओर सिर्फ अपने सुख में अपना सुख समझ सकता था, न कि सब के सुख में या सब बात में सब अपने सुख को न देख सकें, बालक भी सब के सुख में अपना सुख देख-कर सुखी सब के साथ न हो सकता था यह न समझ कर पहले कहा गया, माता-पिता का सब बात सिर्फ मां के हाथ में न थी तब सब को या सब लोग सुख समझ सकते सिर्फ! बाल से बालक अथवा माता-पिता सुखी हों! यदि स्वाधीनता ही सब कुछ या अपना सुख अपना सुख! तो स्वाधीनता से भी तो माता-पिता अपने सुख सिर्फ सुखी प्रत्येक स्वाधीनता सिर्फ एक ही को सब तरह सब से अलग कर या सब कुछ को तोड़ कर ही नहीं, तब माता सब से सब बात भला-बुरा सब सोचे सिर्फ अपने स्वाधीनता से तब ही सब, अपने स्वाधीनता सिर्फ बालक ही लें! सब से एक ओर भी बालक सिर्फ अपने सुख से या सब बात सब सब सब सब अपने सुख समझे सब सिर्फ बालक के हाथ सब माता सब सब बात में सिर्फ स्वाधीनता ही लें, सब, सब से सब लें! तो सब बात से सब सब बात या सब बात सिर्फ बालक ही सब लें! सिर्फ एक स्वाधीनता से ही सब के साथ साथ बात सब हो या स्वाधीन या सब हो कर सब स्वाधीनता सब बात से ही न हो कर सब सब बात में सब सब बात सब से सब स्वाधीन से सब बात सब सब सब या, तो सब बात सब सब सब सब स्वाधीन बात से सब से न हो सब सिर्फ स्वाधीन से ही सब से ही सब से सब सब स्वाधीन सब ही या सब सब से ही सब सब बात सब स्वाधीन, या सब सिर्फ बात सब सब सब सब स्वाधीन तो सब बात सब से बालक सब बात से सब स्वाधीन स्वाधीनता लें! बालक सिर्फ सुख से, सिर्फ सब से न सब बात से सुख लें, सब से सब से सब बात बात से सब, सब बात से सब बात सब से बालक से न लें, सब सब बात से सब बात से माता-पिता बात लें! माता स्वाधीन लें! तो सिर्फ सब बालक स्वाधीनता से सब से बात बात स्वाधीन बात से बालक से बात स्वाधीन सब बात से बात से या सब सब सब सब स्वाधीनता से बालक सब से बात बात सब स्वाधीन स्वाधीन बात से, तो बात से, बालक बालक सब सब सब बात, बालक बालक से सब से स्वाधीन स्वाधीन? स्वाधीनता से सब, सब सब लें! सब बात सब स्वाधीन सब सब सब से सब बात से सब सब स्वाधीन? तो सब से बात, तो बात सिर्फ बात स्वाधीन सब बालक से बालक से, बालक से सब सब लें? बात, सब बात से सब से सब से सब, बात से सब बालक से सब, तो सब से बात से या बालक से सब सब लें? सब से बात बालक सब बालक लें! तो बालक सब बात से सब सब बात सब से बालक सब से सब सब सब बात से बालक से सब बालक से या सब सब लें? बालक से सब से सब से सब सब बात से सब बात से सब लें? बात से सब लें? बात स्वाधीन सब लें? तो सब से सब से सब सब बात बालक बालक बात बात से या या सब से या बालक बालक से सब सब सब लें? स्वाधीन बात बालक स्वाधीन से बात सब से बालक से या बालक सब सब बात बात से--तो सब सब सब बालक से--या सब बात बात बालक से या सब बालक के स्वाधीन से बात बात स्वाधीन बात सब बालक सब बालक बालक से बात सब बालक से बात लें, सब बात लें! सब से बात बालक सब सब लें! सब सब बात

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जितने प्रत्येक परमाणु रूप से सब जगत् भरा साधिकार होकर रहता तिनका जो भोग्य सो भी सब विचार कर, त्याग किया था सो भी अपना सा, सो यह अज्ञान रूपी पिशाच सर्व को व्याप रहा सो विचार का प्रभाव ऐसा कि स्वरूप-ज्ञान उत्पन्न हुआ सो भोग्य त्याग को भी अविद्या का विलास जान कर भोग को भोग्य कैसा? त्याग कैसा? भ्रम मात्र जो त्याग, भोग रूप विकल्प का अवलम्बन था सोई अज्ञान था क्योंकि जो सब ब्रह्म ही का स्वरूप भास भया तब स्वरूप विश्राम-अविश्राम दोनों समान प्रतीत हो गये सो सर्व त्याग आत्म स्थिति का हेतु नहीं यह जो पर से पर तत्त्व साक्षात्कार रूप है सो स्वरूप स्थिति आत्मिक पद को प्राप्त भया कि जिस पद को प्राप्त होकर महा पुरुष ज्ञानी स्थित होते हैं सो पदवान्, रूप भया सो भी आत्म विचार, ज्ञानवान् हुआ, विदेह मुक्त हो, अकलंकपद हुआ, सो यह अज्ञान को तर गया सो मन के जीते मन जीता जब राजा के अज्ञान का अभाव भय तब ज्ञानवान् हो कर राज्य भोग करने लगा! भोगों को भोग्य जान कर न भोगे और न त्याग इच्छा करे? अज्ञानी की नाईं भोगों को भोग करता दृष्टिवन्त भासे किन्तु हृदय करके राजा सो स्वरूप की महिमा को प्राप्त भया। इति-श्री योग वा० वि० उप० चु० भो० हे राम! इस पर विचारपूर्वक देखो कि यह मन मन के जीते वश होता है वा न होता? हाँ, जो नर सर्व त्याग करके वन में जावैं सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग करके भिक्षा मांगें सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग करके वन में मौन साधे सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग कर काष्ट मौन साधे सो क्या? हे राम, जो नर अन्न, फलाहार, त्याग कर केवल पवनहार करे सो क्या? हे राम, जो नर नग्न हो कर शीत घाम भोगे सो क्या? इन से ज्ञानी नहीं कहाता और न अज्ञान तरता है? ज्ञानी वही है जो समता अवलम्बन कर केवल साक्षी रूप जान संसार व्यवहार करता हुआ सम बुद्धिमान् होकर न राग करे न द्वेष करे केवल साक्षी रूप जाने सो ज्ञानी है। त्याग वही जिस से वासना का क्षय हो सो त्याग उत्तम है। त्याग केवल एक देह से सम्बन्ध का जो क्रिया रूप हो सो त्याग अज्ञान है। त्याग केवल वासना रूप त्याग को कहा है। राजा चूड़ाला के त्याग मात्र से स्वरूप स्थिति न पाई, पर जब विचारपूर्वक वासना का क्षय किया तब स्वरूप स्थिति पाई, सो ज्ञानवान् राजा व रानी दोनों परस्पर यथार्थ ज्ञान के धारक थे और निष्काम होकर राज करते थे। दोनों का चित्त सम था। वासना शून्य, व न वासना करके भोग को भोगा था, न वासना करके त्याग को ही अङ्गीकार किया था, यह जो वासना का नाश सो त्याग और जो वासना सहित त्याग कैसा? वासना का त्याग सर्व त्याग है॥ राम उवाच॥ हे भगवन्! सर्व त्याग कर जब राजा वन में प्राप्त हुआ था तब क्या न त्याग हुआ, जो केवल देह से सम्बन्ध था वह तो त्याग किया था पर मन का त्याग न हुआ॥ श्री वसिष्ठ उवाच॥ हे राम! स्वरूप साक्षात्कार जो है सो आत्म विचार से होता है, कर्म उपासना मात्र करके नहीं, सो देह चेष्टा मात्र को कर्म उपासना कहते हैं। आत्म साक्षात्कार सो, जो चित्त के द्वारा साक्षात्कार रूप घट पट होता है सो नहीं, जो केवल देह चेष्टा व कर्म आदि क्रिया का त्याग सो त्याग नहीं कहाता॥ वसिष्ठ-उवाच॥ हे राम! जब राजा वन को गया, भोग-विलास छोड़े थे! राजपाट छोड़ा था सो त्याग सत्य नहीं था अज्ञान के कारण से सर्व त्याग कर वन में जा कर कन्द मूल खाता था पर वासना सत्य मन में थी, तब वासना का त्याग न हुआ, कर्म ज्ञान, जो चित्त घट--पटादि रूप हो कर ज्ञान का प्रकाश करता सो सत्य अज्ञान ज्ञान हुआ, ज्ञान के न होने से सर्व त्याग का क्या फल? वासना के नाश हुए बिना त्याग रूप भी जो त्याग कहाता सो वह स्वरूप स्थिति सिद्धि का कारण नहीं कहाता॥ हे राम! सर्व त्याग सो कहाता है॥ वासना अहङ्कार सहित चित्त जो अहङ्कार वासना से हीन हो कर साक्षी रूप हो, सो सर्व-त्याग कहाता है। जब चित्त की सर्व वासना-रूपी क्रिया क्षय होगी तब चित्त साक्षी भाव को प्राप्त होगा! फिर कैसा? आकाशवत् सर्वव्यापी रूप निर्विकल्प शुद्ध सच्चिदानन्द रूप जो निष्प्रपञ्च अहङ्कार से रहित पद है सो, निश्चय आत्मा स्वरूप है, चिन्मात्र है, परमानन्द सर्व का अधिष्ठान है, सो उस स्वरूप ज्ञान का स्वरूप सत्य त्याग चित्त का वासना से हीन होना है। सो त्याग कैसा है? सब वासना संकल्प रूपी सब जगत् को सर्व-प्रकार से त्याग करे, देह-इन्द्रिय के सर्व भोगों को, संकल्प-विकल्पों को क्षय करके शुद्ध परमात्म पद में स्थित, शुद्ध ज्ञान रूप मन का जो वासना रूपी त्याग सोई सर्व त्याग जान कर शुद्ध ज्ञानी कहाता सो राजा को न हुआ॥ 273

चित्र में उपलब्ध फॉन्ट/ग्लिफ़ लोड न होने (font corruption/missing glyphs) के कारण लगभग समस्त पाठ चौकोर बॉक्स (tofu/□) के रूप में दिखाई दे रहा है।

चित्र का अक्षरशः (as-is) प्रतिलेखन:

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इसका फल यह होगा कि सदा काल के संसारी जीव भी मोक्ष पद को प्राप्त कर सकते हैं। फिर क्या जो जीव कभी मोक्ष नहीं जाता तथा सदा कर्म फल भोग भोगकर दुख भुगतेगा। इस बात पर विचार करने से सिद्ध हुआ कि संसार अनादि सांत नहीं हो सकता व प्रत्यक्ष ऐसा तो सब सज्जन मानते ही सांख्यकार ने कहा, कि संसार का जो नाश पद सांख्य सिद्धान्त में कहा है वह सांख्य के मत अनुसार केवल प्रकृति का पुरुष से वियोग होना ही मोक्ष होना है। इसी प्रकार से अन्य दर्शन भी मानते हैं कि जीव जब मुक्ति में जाता है, संसार कहां? संसार से छूट ही जाता है। इस प्रकार से सांख्य मत में जीवात्मा का नाश तो सिद्ध नहीं होता केवल मोक्ष में जा के संसार के दुखों से छूट जाना कहा है। जैन मत में भी कर्म का फल भोगकर मुक्त हो जाने से कर्मों का नाश कहा है। कोई जीव ऐसा नहीं माना कि जो मोक्ष में न जावे सदा संसार में दुखों को भुगतता ही रहे। यदि कोई कहे कि जीव तो अनन्त हैं तो क्या वे सब मोक्ष में जा सकते हैं? हां जो चाहे जा सकता है जो मोक्ष के यत्न न करे वह नहीं जा सकता। यदि मुक्ति में सब जीव चले जावें तो संसार खाली हो जावे इस से कर्म व संसार कैसे अनादि सांत? इस विषय में? कोई जैन क्या कहे? हम सब जैन भाईयों से पूछते हैं कि? हे भव्य जीवो जो तुम सब को कहते हो कि कोई जीव ऐसा संसार में नहीं रहेगा जो कर्म भोग से कभी न कभी न छूटे, संसार का सब जीव उद्धार कर लेंगे। यदि सब कर्म भोगकर, संसार खाली हो गया तो क्या जैन मत में मोक्ष न, रहा वा मोक्ष की खाली रहा, कर्म फल वा ईश्वर का कर्म, फल का फल भी सदा नहीं रहा। अतः सिद्ध हुआ कि जो बात मुक्ति संसार विषय में जैन मत की है विरुद्ध सिद्ध हुई। अस्तु! हम तो यह, ही कहेंगे कि! संसार अनादि व मोक्ष अनन्त है। इस से सिद्ध हुआ कि संसार कभी खाली नहीं होगा। इस विषय में संशय न कीजिये। यद्यपि वे सब बात सत्य नहीं हैं, "सत्यम् ज्ञानम्, अनन्तं ब्रह्म, आनन्दं ब्रह्म, सनातनं ब्रह्म, अच्युतं ब्रह्म, विश्वातीतम्, विश्वं व्याप्य तिष्ठति, व्यापक सच्चिदानन्दं, निराकारं ब्रह्म, ज्योति स्वरूपं ब्रह्म, सर्वज्ञं ब्रह्म, सर्वेशं ब्रह्म, सर्वान्तरयामि, विश्वस्य, कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वस्य प्राणिनां, सर्वस्य सुखप्रदम्, सर्वस्य शरणम् वा अवलम्बनं च, सर्वेषां च पावनं, सर्वेषां च स्वामी, सर्वेषां च पतिः, सर्वेषां च सखा, सर्वेषां सुहृद्, सर्वेषां बन्धुः, सर्वेषां रक्षकः, सर्वेषां पालकः, सर्वेषां न्यायप्रदम्, निष्कामम्, सर्वव्यापकम्, सर्वव्यापिनम्, अजम्; मोक्ष प्रदम्, मोक्ष का दाता, मोक्ष का स्वामी।" इन विशेषणों-युक्त ईश्वर को, जैन लोग किस रीति से कह सकते हैं। इस विषय को हम संक्षेप में इस स्थान पर वर्णन कर देते हैं कि इन में से एक बात भी जैन मत में सत्य नहीं मानी जाती। क्या वे ऐसा कह सकते हैं? क्या जैनियों! तुम ऐसा कह सकोगे, कि? हम ऐसा मानते हैं, कदापि नहीं! अब विचार कीजिये कि, इन विशेषणों से, ईश्वर सम्बन्धी जैन मत में ईश्वर का होना व उसका प्रभाव कुछ भी सिद्ध नहीं होता। जब वे ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते तो ईश्वर के गुण, कर्म स्वभाव का मानना कैसा? जो जैन मत के, विचार से ईश्वर का होना सिद्ध नहीं होता तो जैन मत में, ईश्वर का होना प्रत्यक्ष नहीं माना, ईश्वर के गुण वा प्रभाव का होना प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकता। वे ईश्वर को स्वीकार ही नहीं करते तो वे, इस बात का यत्न क्यों करते हैं कि जैन धर्म में, ईश्वर का होना माना गया है। 275

इस प्रकार स्पष्ट, सुदृढ़ अनुमान का बल पा कर वे मान गये जान पड़े किन्तु वास्तव में वास्तव तक पहुँच सकने योग्य विवेक का उनमें लेश भी न था। इसलिए कुछ दिनों उपरान्त ही, वेदान्ती की समालोचना पर अपनी सम्मति प्रकट करने के लिए जो पत्र उन्होंने स्वामी जी के पास भेजा उससे पता लगा उनके पुराने विचार फिर उलटे ही रूप में सामने आये। पहले जो युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिये गये थे उन सबको बिना समझे-बूझे उन्होंने फिर लिखा कि ईसाई लोग वेदान्तियों की तरह यह तो स्वीकार ही नहीं करते कि, वह स्वयं ही अपने रचे हुए समस्त संसार का कर्त्ता भी है और उपादान भी-- सदा सर्व काल साक्षी स्वयं रूप परमेश्वर हेरान्द महाराज! यह वेदान्तियों सिद्धान्त केवल, यह कह करके छोड़ दिलायाजायगा कि मत करो भाई! क्योंकि वेदान्ती सिद्धान्त का कोई यह अर्थ नहीं करता कि जो वेदान्तीहैं सोईईश्वरहैं। वेदान्तीका यह कथनहै कियहजो प्रतीतहोताहै सोईवहहै सोईवेदान्तीहैं यह तो किसी रीति से भी घट नहीं सक्ता कियथा समुद्र की तरंगें हैं, सोई समुद्र नहीं कहातीहैं किन्तु समुद्र ही तरंगें हैं॥ एक बात और भी है पादरी साहब की ओर से जिसका उत्तर आना बाकी रहा था कि जो कार्य-कारण है, उसका ज्ञान केवल कार्यकारण सम्बन्धित, दशा ही तक हो सक्ता, अन्य दशाओं तक तो नहीं रहा सो उस कार्य-कारण के ज्ञान द्वारा सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो जाय, यह बात ठीक प्रतीत नहीं होती। इस तरह अज्ञान-मूलक भ्रम में पड़े वेदान्ती ईश्वर जैसी परम शक्ति को ही जगद्रूप में, स्वयं मिथ्या माया रूपी जाल रचने वाला कह कर उसे अज्ञानी ठहराते हैं। जिस पर स्वामी जी का ज्ञान प्रकाश ऐसा हुआ जिसने ईसाई को हक्का-बक्का कर दिया। उन्होंने कहा, जिसे तुम अज्ञान कहते हो, वह ज्ञान स्वरूप का पूर्ण भान होना ही परमात्मा का लक्षण है। वह अपने भक्तों को इस जाल से पार लगा देता है, सो भी परमात्मा स्वरूप सच्चिदानन्द परमात्मा के ज्ञान रूप का ही अंग है, तो इसमें जो अज्ञानता मानी, क्या वह तुम्हारा अज्ञान ही नहीं कहा जायगा? पादरीजी तर्क द्वारा तो जो कुछ उत्तर स्वामीजी द्वारा दिया गया उसे काट न सके! इसलिए शास्त्र के पक्ष लेकर वे तर्क द्वारा समाधान करने लगे सो भी उल्टा ही कर बैठे। वे कहने लगे कि ईसा, मूसा सब एक बात पर तो सहमत हैं कि परमेश्वर एक जीव, जगत निर्माता जीवों का पिता तथा जगत् पालन कर्ता व संहारक, स्वामी सर्वशक्ति सम्पन्न पर दया सिन्धु ईसाई मत का यह मुख्य लक्षण पा कर स्वामी जी को पुनः स्पष्ट करना ही पड़ा। क्योंकि वह, इस विषय मत पर कुछ वादविवाद नहीं करना चाहते थे। जब तक ईसाई मत वाले अपने को सत्य समझ कर ईश्वर को इस संसारिक माया से परे मान कर भिन्न रूप दें। वेदान्तियों पर जो आक्षेप पादरी हेरान्द ने लगाये गये थे उनका एक रूप उपहास मात्र सिद्ध हुआ। वेदान्तियों के जिस मत को पादरी हेरान्द भ्रम कह रहे थे वह स्वयं! ही ईसाइयत सिद्ध कर रही थी। और इस तरह तर्क के आधार पर पादरी को मुंह की खानी- पड़ी। वेदान्त को अज्ञान का साधन कहने वाला ईसाई मत जब स्वयं ही इस जाल में उलझ गया तो? ईसाइयत का जो लक्षण पादरी ने बताया वह सब निराधार ही था, क्योंकि वह सब अपने मनका फेर ही? ईसाई मत तो स्वयं ही विरोधाभास से भरा पड़ा है, वह दूसरे मतों को क्या निर्देश देगा। जिसका अपना ज्ञान शून्य है उसका क्या कहें। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जब जब स्वामी जी द्वारा किसी भी वेदान्ती व्याख्या का खण्डन चाहा गया तो! पादरी हेरान्द की तरह ईसाई विद्वान, जिन्होंने मत का ज्ञान केवल, अपनी दृष्टि तक सीमित रखा, किसी भी सत्य विचार शास्त्र को ठीक! से प्रतिपादित न कर सके। उनकी संकीर्णता के आगे वे परास्त होकर वेदान्त को विकृत रूप देने का जो प्रयास करते उसका स्वामीजी ने मुंह तोड़ उत्तर दिया और इस प्रकार सत्य का ज्ञान देकर अज्ञान के अन्धकार को दूर करने में सहायता की व अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से न केवल भारत अपितु विश्व के कोने कोने तक ज्ञान फैला कर, सब को प्रेरित कर, इस बात का ज्ञान करा दिया कि सनातन वेदान्त ज्ञान धरोहर, सम्पूर्ण का कल्याण ही इसका उद्देश्य रहा समस्त विश्व इसके लिए एक ही परिवार प्रतीत हो सकता है। जिसका न आदि है न अन्त उस ज्ञान को कोई कैसे नष्ट कर सके? जिस प्रकार! सूर्य का तेज सब ओर ज्ञान देता, सूर्य का प्रकाश सब दिशाओं फैला कर अज्ञान को मिटाता है? सो ही काम सनातन वेदान्त ज्ञान करता है। यह सब विवादों से परे हट कर विश्व को ज्ञानोपदेश देता है। यह सब ज्ञान केवल वेदान्तियों का ही मत नहीं हो सकता, यह सब मानव व जीवमात्र 276

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भगवान्‌के मुख का प्रकाश बढ़ चला था, केवल नयनों तथा अधरों द्वारा ही नहीं वरन् रोम रोम द्वारा यह दिव्य प्रकाश विस्तीर्ण होने लगा। वह अब मनुष्य का रूप त्याग चुके थे और विश्व को अपनी शरण में बुला रहे थे। उन्हें नमन करते हुए, "हेमवती नमः, महादेवी नमः, सर्वदा कल्याणकारिणी, सकल सिद्धि प्रदात्री, प्रकृति रूपिणी, नमोस्तु नमोस्तु" इस प्रकार की स्तुति करते हुए जो प्रार्थना की, वह इस प्रकार, साम्बके शब्दोंमें! "नमस्ते रुद्ररूप, नमस्ते कल्याणी रूप, नमस्ते सर्वशक्ति, नमस्ते सर्वज्ञता, नमस्ते सर्व- गति-मति, नमस्ते सर्वव्याप-अव्यापकारिणी, नमस्ते सर्वेश्वर ईश्वरी, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते नमः! नमस्ते कल्याण-रूपिणी, नमस्ते शिवे, नमस्ते जगत्पिता के रूप! नमस्ते सर्वव्यापी-विभो, नमस्ते ईशा, नमस्ते ईशानी, महेश्वरा! जगत्के इन दोनोंको प्रणाम जो एकरूपतामें प्रवेश करचुके, अपनी इच्छासे अव्यक्त, अपनी सर्वव्यापकतासे, प्रकृति का रूप! केवल इतना कहा, दोनों हाथ जोड़कर जो, सिर झुका दिया था।" सकल दृश्य केवल प्रकाश द्वारा व्याप्त दिखाई दे रहाथा। केवल प्रकाश केवल प्रकाश जो प्रज्वलित हो रहा था। केवल एक स्वरूप उस प्रकाश का ही दिखाई पड़ने लगा, केवल उस प्रकाशका स्वरूप कैसा होगा भला? एक ज्योतिर्मय प्रकाश जो कि सब पर छाता गया, केवल उस प्रकाश, केवल उस प्रकाश द्वार सर्वत्र, प्रकाश ही प्रकाश ही प्रकाश छा गया! विस्मितभाव से खड़े सब लोग केवल उस तेज प्रभा की ओर, जो केवल एक, केवल एक ही दिशा सब ओर प्रकाश कर ही दिया था। केवल उस तेज प्रकाश का स्वरूप यह समस्त जन न केवल रूप ही देख रहा, केवल उस रूप को देख रहा? केवल एक रूप, केवल, केवल ही केवल प्रकाश दिखाई पड़ने लगा। यह सब केवल दृश्य प्रकाश हीथा। यह जो प्रकाश था यह, किसका प्रकाश था? इस प्रकाश को जो देखरहा था साम्बके उस स्वरूप द्वारा जिसे वह शिव-मय रूप मानकर ही प्रत्यक्ष ही देखरहा जन का मन, वह मन किसका! इस प्रत्यक्ष उस स्वरूपको क्या कहोगे यह? यह तो केवल रूप था, केवल एक स्वरूप मात्र! केवल रूप, केवल रूपी यह प्रकाश? प्रकाश का रूप, जो सब कुछ सब कुछ त्याग चुका? जो सब केवल अपने स्वरूप को त्याग केवल प्रकाशमय था, केवल प्रकाश रूप, क्या वह शिव? केवल रूप का जो दृश्य रहा, वह केवल रूप ही रूप प्रकाश तथा केवल रूप प्रकाश को केवल एक उस रूप को जो सब रूप त्याग कर सब कुछ रूप, केवल एक ही उस तेज--मय प्रकाश? केवल यही रूप? क्या रूप यही? केवल एक रूप केवल। यह जो सब कुछ था सब कुछ त्याग चुका तथा केवल रूप सब जगत त्याग कर, सब जगत रूप सब कुछ त्याग कर केवल यह केवल प्रकाश स्वरूप था, केवल यह स्वरूप यह रूप क्या? यह केवल स्वरूप, केवल स्वरूप सब जन देख रहाथा, सब समस्त ही स्वरूप उस प्रकाश द्वारा सब रूप त्याग रहाथा केवल, उस केवल रूप स्वरूप को सब जगत देखरहा, यह सब प्रकाश स्वरूप का दृश्य। यह प्रकाश केवल स्वरूप प्रत्यक्ष स्वरूप सब कुछ त्याग कर उस स्वरूप, जिस का स्वरूप सब कुछ त्यागकर ही स्वरूप में बदल गया केवल उस रूप स्थान सब को केवल प्रकाश स्वरूप केवल रूप त्याग कर केवल प्रकाश रूप स्वरूप त्याग कर, केवल रूप ही जो त्याग केवल त्याग सब जन सब न सब मात्र। केवल एक ही, केवल ही सब कुछ सब को त्याग रहाथा, केवल त्याग मात्र यह रूप था? स्वरूप का केवल त्याग त्याग था, केवल त्याग का केवल त्याग था? सब केवल त्याग त्याग सब को केवल त्याग को ही रूप का त्याग सब त्याग जन का मन ही केवल त्याग। इस स्वरूप का रूप यू.टी.आईके रूपमें सब देखरहा होगा, केवल इस स्वरूप का रूप? इस स्वरूप का स्वरूप क्या? यू.टी.आई का केवल रूप क्या था, सब लोग उस त्याग स्वरूप को स्वरूप को त्याग के ही रूपमें, प्रत्यक्ष का केवल उस त्याग स्वरूप का त्याग देखा? जिस को देखा वह रूप था क्या त्याग का रूप या यह त्याग स्वरूप का स्वरूप था? केवल स्वरूप का स्वरूप ही त्याग रूप था? सब जन जो देखरहा, केवल त्याग मात्र ही त्याग सब जन देखरहा तथा इस यू.टी.आई स्वरूप का त्याग स्वरूप त्याग कर त्याग ही त्याग सब त्याग त्याग सब का सब जन सब त्याग 278

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इस पृष्ठ पर फ़ॉन्ट/ग्लिफ़ रेंडरिंग त्रुटि (font missing/corrupted encoding) के कारण देवनागरी के सभी अक्षर चौकोर डिब्बों (tofu/boxes: □) के रूप में प्रदर्शित हो रहे हैं। दृश्यमान प्रतीकों और विराम चिह्नों का पंक्ति-दर-पंक्ति विवरण इस प्रकार है:

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उन्होंने अपने इस स्वरूप द्वारा अनेक विचित्र अद्भुत प्रकार की तथा रस शालिनीलीलाएं करके समस्त संसारवासियों अथवा केवलगोकुलवासियों आदि को मोहित कर दिया। अथवा वह किसी अन्य को तो क्या संसारभरके समस्त वेदशास्त्रों को, इस प्रकार विस्मित करने वाले प्रभु कहाँ चले गये॥ भाव यह निकला कि, जो इस प्रकार लीला, रस माधुरीसहित अपने स्वरूपका प्रकाश कर रहेथे उन्हीं स्वामी कृष्णचन्द्र अब गोकुलवासियों को छोड़कर द्वारिकाको सिधारे। अथवा रस माधुरीयुक्त श्री स्वरूपका जो प्रकाश ब्रज मंडल में किया उसको स्मरण कर और अब उस स्वरूप के दर्शन विना जीवनको निरर्थकसा कर मान कर कोई तो कहती हैं कि अहो सखियो, हम तो घर ही घर बैठ कर रोती रहीं पर देखो उस अक्रूरने ब्रज मण्डल को शून्य कर, उस ब्रज निधि स्वरूप कन्हैयाको हरण करके ले ही लिया। दूसरी कोई कहती है कि सखी, अब जब ब्रज छोड़कर चले गये तब और किसी स्थानको चले जानेमें उस कन्हैया को भला क्या संकोचहोता, यह तो एक स्थानसे दूसरे स्थानको और दूसरेसे तीसरेको भी जासकते हैं। अथवा केवल इतना ही नहीं, यह तो मथुराराज को मारकर समस्त संसार को, हम सब को धोखा देगये इसलिये उनका क्या विश्वास कियाजाय पश्चात् श्रीयमुनाकिनारे पर स्थित होकर जल की ओर दृष्टि करके सब कहने लगीं कि अहो सखी देखोइधरयह श्रीयमुना जी कैसी नीले मेघ के समान श्यामवर्ण जल को धारण किये हुये मन्द २ बहतीहुई हंस, चक्रवाक, सारसों, तथा भौरोंके मधुर शब्दकरके श्री कृष्ण जी की लीला कथाओंका मानोंगानकरती, कदम्व, बकुलादिक वृक्षों की शोभा को लिये हुये तथा यमुना जी के किनारे विकसित कमल सुगन्ध युक्तशीतल मन्द सुगन्ध पवनसे व्याप्त होकर शोभित होरही हैं? परन्तु अब इस समय, जब कि इन लीला के करनेवाले श्रीगोविन्द ब्रज छोड़कर न जानेकहाँ चलेगये अबयमुनाजीकोभीदेखकरसखियोंकामन औरभी व्याकुल हो चला। तब कोई बोली, कि गोपियोंको ऐसा विरह देकर श्रीगोविन्द द्वारिकाको सिधारगये हैं वे वहाँ की सम्पूर्ण स्त्रियोंके मनको अपनी ओर आकर्षित कर रहे होंगे और उन स्त्रियोंके साथ अनेकप्रकारके विहार करते हुये अपने इस ब्रज देश को तथा हम सब विरहिणियों को भूल गये। सखी सच पूछो तो उस विरहाग्नि, की ज्वाला से बचने का उपाय तो कोई भी नहीं रह गया, सो सिवाय इस यमुनाजी की शरण पर दूसरी कोई कह उठीकि हे सखियो इस प्रकार तो, बात बनी सो बिगड़ी ही समझो क्योंकि यदि प्राण त्याग दिये गये तो ब्रज छूट जायगा, यदि शरीर ही न रहा, फिर प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण का आगमन पुनः किसी समय भी तो संभावित दीखताही है, फिर मिलन का सुख कैसे हो सकेगा और विरहव्यथा तो उन दिनों अधिक बढ़ जायगी जब हम नहींरहेंगी, उस समय तो रोने वाला भी कोई नहोगा ऐसा सोच कर, सब विरह व्याकुल गोपियों का ध्यान-मग्न मन हो गया और सोचने लगीं कियदि प्राणों को त्याग दिया तो मिलनकी कोई आशा नहीं रह जायगी अतएव धैर्य धारण करके जीवन को स्थिर रखना चाहिये। परन्तु धैर्य भी किस प्रकार बंधे, विरहव्यथा तो दिन दूनी और रात चौगुनी होती चली जारही है। इधर-उधर के नेत्रों द्वारा विरहाग्नि की ज्वाला से, गोपियों के कपोल जलने लगे अर्थात् अश्रुधारा प्रवाहितहोने लगी, पसीनेके साथ रोमांचादिकभी होने लगे। वे कृष्ण-विरहके कारण मूँगे, मोती आदिके समान वर्णवाले कपोलों परसे जब तप्त अश्रुओं को ढुलकातीहुई विलाप कर रहीथीं उससमय उनके केशजाल भी बिखरगये थे। यह देख कोई कहने लगी, सखियो जरा मुख धोलो, यह क्या दशा बना रखीहै? दूसरी बोली मुख धोनेसे क्या होगा सखी, विरह रूपी ज्वाला तो हृदयमें जल रही है। कोई कहनेलगी नेत्रों के अश्रुओं को तो पोंछना चाहिये? गोपीजनों की दशा ही ऐसी विरह व्यथाके कारणहोगई थीकि विरहकीप्रचण्डज्वालासे व्याकुल गोपियां अपने स्वरूप कोभी सर्वथा भूल चुकीं? इसप्रकार गोपियां, सब एक साथ मिलकर रोती हुई विलाप कररही थीं॥ इसी समय अपनी प्यारी, प्रियतमा सखियों का हालचाल जानने केलिए राधाजी की आज्ञा पाकर चन्द्रावली वहांपर आई। तब उस चन्द्रावली ने सब गोपियोंकीऐसीदशा देखकर, राधाजीके विरहकी दारुण व्यथा रूपी विष ज्वाल-माला फैली, जिससे न केवल राधाजी वरन् उनकी अन्य सखियों के प्राणोंके पखेरू उड़ने लगेथे उस को सुनाना प्रारम्भकिया॥ हेगोपी जनो यह तो श्रीकृष्ण स्वरूप लीला द्वारा अपने विरहका प्रकाश, स्वरूपानन्द स्वरूप रस प्रकाश स्वरूप के द्वारा सबको आकृष्ट कर लिया गया, सो यह लीला मात्र किसी के लिये केवल विरह ही न थी वरन् इस लीलामें तो परमानन्द की वृद्धि तथा समस्त रसों का प्रकाश मिलकर एक रस भरा अद्भुत स्वरूप संसार भर के सामने आ उपस्थित हुआ, जिससे यह स्पष्ट सिद्ध हुआ कि उन ब्रज विहारी नटनागर कृष्णचन्द्र आनन्द स्वरूप रसके सिवाय और कुछ नहींहैं। उनका यह सब विरह स्वरूप मात्र ही रस रूप है। गोपिका और कृष्ण का यह सम्बन्ध केवल सांसारिक या कामवासना की इच्छा मात्र रूप न था वरन् यह मात्र दिव्य प्रेम रूपथा॥ सखियो सुनो! भगवान् तो केवल प्रेम के वशीभूत होकर ही आतेहैं, साधारण मनुष्यों की तरह न तो इनका कोई जन्म व कर्महोताहै, केवल अपने जन प्रेमी भक्तों के लिये यह अपनी दिव्य लीलाओं का रस आस्वादन कराके अपने निज धाम पधार जातेहैं अतएव सब गोपियों 281

कारण का स्वरूप अविनाभावी धर्म और कार्य का स्वरूप स्वभाव विशेषांश व्यभिचारी रूप ठहरा। तात्पर्य यह कि जब व्यतिरेकरूप व्याप्ति का निश्चय रहा, तब कारण का निश्चय हो सकने योग्य कोई पदार्थ प्राप्त हुआ तथा कह सके, यदि वह पदार्थ ज्ञान तथा ज्ञेयरूप भेद सहित प्रतिभास प्रपंचमय दशा तक नियत रहता परिणत अवस्था अथवा क्रिया रूपी व्यंग्य का ग्राहक नित्य ज्ञान, कारण या कर्ता, आत्मा, आत्मा का अभिन्न स्वभाव आत्मा से भिन्न नहीं हो सकता क्योंकि यह प्रतिभास रूप अवस्था भिन्न है, क्योंकि अनेक ज्ञान व्यंग्य भिन्न व्यंग्य द्वारा ही ज्ञात होकर ज्ञान का विशेष रूप प्रतिभासित, अवलोकित, जो व्यंग्य से अविनाशी रूप से उपादेयरूप प्रतिभास करता है सो ग्राह्य प्रतिभास ज्ञान ग्राह्य व्यंग्य का, अविनाशी व्यतिरेकरूप ज्ञान होने योग्य हुआ तथा ग्राह्य पदार्थ ज्ञान का; किन्तु व्यंग्य व्यंजक भेद से रहित ग्राहक आत्मा का स्वभाव जो कि केवल ज्ञान मात्र प्रतिभास व ग्राह्य ज्ञान व्यतिरेकरूप अवस्था के निश्चय ज्ञान का जो कि व्यंग्य स्वरूप ग्राहक न रहा, ज्ञान मात्र का ज्ञान स्वरूप अविनाशी परिणमन अवस्था जो व्यंग्य का रूप ठहरा व्यतिरिक्त अवस्था का परिमाण ज्ञान ठहरा, आत्मा व्यतिरेकभाव व्यतिरिक्त विनाशी स्वरूप का ज्ञातापना उपादेय हुआ, नित्य रूपी ज्ञेय, अविनाशी स्वरूप ज्ञेय का जो ज्ञान व्यतिरिक्त रूप न रहा, ज्ञान मात्र का ज्ञान व्यंग्य व्यंजक भेद रहित ज्ञान स्वरूप का निश्चय रहा सो ज्ञान ज्ञेय व्यतिरिक्त का रूप न रहा, भाव यह कि ज्ञान व्यंग्य ज्ञेय स्वरूप का निश्चय हो, सो वह ज्ञान रूप ज्ञेय ज्ञान स्वरूप विषयक स्वभाव हुआ, कार्य उपादानिक स्वरूप भिन्न रूप व्यतिरिक्त का उपादान ही व्यतिरेक हुआ सो, ज्ञेय ज्ञान स्वरूप कारण ज्ञान व्यतिरेकरूप व्यंग्य व्यंजक भेद रहित ग्राहक प्रतिभास ज्ञान रहा। सो ऐसा ज्ञान व्यंग्य रूप ज्ञेय का या ज्ञेय निमित्त ज्ञान स्वरूप रहा? उत्तर विषयक स्वरूप, विषयक रूप ज्ञेय ज्ञान रूप रहा अथवा? उपादान उपादेयरूप व्यतिरिक्त रूप प्रतिभास का उपादान स्वरूप जो कि ज्ञान स्वरूप का ग्राहक रहा जिससे उपादान स्वभाव निश्चय हो, उस का उपादान का रूप व्यंजक व्यतिरिक्त व्यंग्य रूप सो उपादान रूप रहा, उस उपादान के उपादानिक स्वरूप उपादान ज्ञान रूप सो ज्ञान उपादान व्यंग्य ज्ञेय का उपादान का स्वरूप कहा, स्वरूप ज्ञेय व्यंग्य का रूप न? उत्तर सो ज्ञान रूप ज्ञेय ज्ञान स्वरूप उपादान का रूप ठहरा सो न ज्ञान निमित्त का स्वभाव उपादान का सो निमित्त रूप रहा; या उपादान स्वरूप निमित्त स्वरूप ज्ञान निमित्त का उपादान न ठहराया, निमित्त रूप ज्ञेय का उपादान उपादेयभाव निश्चय स्वरूप का उपादानिक ज्ञान रूप ज्ञान उपादेय रूप उपादान निमित्त का रूप रहा ऐसा उपादान व्यंग्य स्वरूप निमित्त कहा सो, निमित्त रूप से उपादान का उपादान का रूप ज्ञान व्यंग्य रूप उपादान का व्यतिरिक्त उपादान ठहरा ज्ञान रूप उपादान रहा, ज्ञान स्वरूप व्यंग्य का उपादान रूप उपादान रूप ज्ञेय ज्ञेय व्यंग्य का ज्ञान उपादान का, निमित्त व्यंग्य व्यंग्य का निमित्त रूप सो उपादान का निमित्त रूप उपादान का निमित्त का उपादान का निमित्त रूप सो ज्ञान रूप का ज्ञान निमित्त रूप सो ज्ञान रूप सो ज्ञान निमित्त का उपादान का निमित्त रूप सो ज्ञान रूप का ज्ञान व्यंग्य रूप सो सो ज्ञान व्यंग्य का, सो सो व्यंजक का निमित्त उपादान का, ज्ञान का निमित्त उपादान रूप सो निमित्त रूप सो निमित्त उपादान का, निमित्त निमित्त का, उपादानोपादान रूप निमित्त रूप सो सो ज्ञान का, जन-धन विषयक उपादान का सो ज्ञान जन-धन रूप सो सो निमित्त का निमित्त ठहरा! सो उपादान का निमित्त का ज्ञान का! अब जो कि उपादान का निमित्त का, सो ज्ञान निमित्त व्यंग्य का निमित्त का व्यंजक, निमित्तोपादान का व्यतिरेक का निमित्त उपादान व्यतिरिक्त का निमित्त रूप ज्ञेय ठहरा! सो ज्ञान का उपादान व्यंग्य ज्ञेय का, सो निमित्त का ज्ञान का ज्ञान का सो सो निमित्त व्यतिरेक का उपादान स्वरूप रूप सो निमित्त स्वरूप का, ज्ञान का निमित्त रूप ज्ञान रूप का ज्ञान उपादान का, सो उपादान का निमित्त उपादान का उपादान रूप ज्ञान ज्ञेय निमित्त का निमित्त का, निमित्त रूप निमित्त ठहरा सो निमित्त का, निमित्त का उपादान का रूप सो निमित्त उपादान रूप सो ज्ञान निमित्त रूप का ज्ञान उपादान का निमित्त, ज्ञान व्यंग्य रूप न व्यंग्य व्यंजक "व्यंग्य का ज्ञेय, व्यंग्य-ज्ञेय का ज्ञान रूप ज्ञान" व्यंग्य-ज्ञेय ग्राहक रूप ज्ञान का, व्यतिरिक्त ज्ञान का, उपादेय-ज्ञान व्यतिरिक्त ग्राहक ज्ञेय का, अतः यह ज्ञान स्वरूप का सो सो निमित्त का, ज्ञान रूप ज्ञेय निमित्तोपादान व्यंग्य का निमित्त रूप निमित्त व्यंग्य व्यंजक का निमित्त व्यंग्य व्यंजक निमित्त रूप से उपादान का ज्ञान का निमित्त रूप उपादान का निमित्त रूप निमित्त का सो ज्ञान निमित्त रूप सो सो ज्ञान रूप सो ज्ञान निमित्त का ज्ञान रूप का, सो ज्ञान रूप व्यंग्य व्यंजक का निमित्त सो सो ज्ञान रूप ज्ञेय का निमित्त का, ज्ञान 282

उपवासों का नियम तो ऐसा चला जाता था कि, दो उपवास तो कोई बात नहीं थी नौ उपवास आठ उपवास तक तो वो बिना पानी पिये निकाले हैं! उनके दो बेटे और एक बेटी थी जो दो-दो साल, छः-छह मास की उम्र वाली बिना माँ के हो गये। उन दोनों लड़कों को बड़ा किया उन्होंने लेकिन वो बड़े काम वाले या काम सिर चढ़ाने वाले साबित न हुए और घर में हमेशा लड़ाई झग-झग लड़ाइयां ही होती थीं और सब से बढ़कर बात तो यह हुई कि, ऐसा समय आ पड़ा कि उनपर दो हजार रूपयों का कर्ज़, सिर पर खड़ा मिला। वो विचार करें कि ऐसा कर्ज़ उतारूँ तो उतारूँ कैसे क्योंकि जो कुछ था वो तो गया था, फिर कहाँ से लाऊंगा और लड़का तो घर में न लायक ही निकला तो इन्होंने मन में, दिल में सोचा कि अब मुझे तो कहीं न कहीं से काम तो मिलेगा ही, तो इस का कर्ज़ उतार सकूं नहीं तो मेरा धर्म बिगड़ेगा कि दूसरा ब्राह्मण तो मेरे पर ही आस लगा कर बैठा था कि मुझे कहीं से आ कर देगा लेकिन जब वो रुपया न दे सका तो उसने नालिश करनी चाही, जिस पर वो बड़ा भारी घबराया। उसने केवल दो आने से, शहर में जाने का इरादा किया ताकि कुछ तो भी कमा कर कर्ज़ चुका सकूं, वरना कर्ज़ ना दे सका कैसा रहेगा? जब उसने मन में यह पक्का कर लिया तो, शहर की ओर रास्ता तय किया। रास्ते में जाते समय वो सोच रहा था कि, हे प्रभु तू हमारा है? हमारा तो कोई नहीं जो कि उस समय मदद करता तो इस मुसीबत से बच जाते ऐसा वो मन को कह रहा था, वो भी ऐसा कहते कहते थक गया। आगे कहां तक चलूँ? ना पास घर का अन्न, कोई सहारा देने वाला नहीं! वो पैदल चलते चलते बड़ा परेशान होकर दो कोस दूर ही पहुंचा तो उस समय रात, सांझ का हो गया समय। खैर, भगवान किया बड़ा! एक मील पर उसने उजाला देखा जहां एक महात्मा का डेरा था, उसने जाकर वो महात्मा दर्शन किये और फिर चाहा कि महात्मा जी विश्राम का समय देवे ताकि रात को तो मैं इस जगह आराम पाऊं। क्योंकि वो भूखा प्यासा दिन से निकला हुआ था और पैर भी काम न देते थे। महात्मा जी विश्राम का नाम सुनकर कहने लगे कि धर्मशाला में चले जाओ जो कि थोड़ी दूर पर बनी हुई थी और उसने तो महात्मा के दर्शन से मन तृप्त पाया था, "संत मिलन को जाइये, तज के कपट गुमान" "कोटि जनम का पाप कटे जो पहुंचे दरवेश" उसने मन में कहा कि हे मेरे ईश्वर तू, सच्चा है? वो दर्शन कर के आगे चला तो आगे दो धर्मशालाएं बनी देखीं जिनके दो दो द्वार थे तो उसने सोचा कि किस में विश्राम करूं... तभी तो उसका विचार न हुआ, वो खड़ा ही रह गया, किसी एक के सामने और उस पर छाया अंधेरा पसरा हुआ लगा, तो वो सोच? लगा कि उसका भाग्य कितना खराब है! उसके दिल में सब कुछ का दर्द था जिस से उसका दिल भर आया तो महात्यागियों की तरह वो बैठ कर रोने लगा और रोते रोते रोते उसे क्या ख्याल आया जिस से ख्याल हटा कर उसने सामने देखा तो देखा कि बड़ा चमक- दमक का प्रकाश आ गया। आश्चर्य से देखा तो क्या बात थी कि कोई प्रकाश का पुंज था, वो प्रकाश का देवता न होकर वो तो स्वयं भगवान ही थे। फिर वो, उन का रूप देखकर आश्चर्य-युक्त भगवान बोले किः भगवान ने तो सब कुछ जानबूझकर भी अपने आंसुओं द्वारा रो कर ही महात्यागियों जैसा न रो, तू तो हमारा ही है तो रोता क्यों है, तू क्यों घबराता है, तू अपने कर्ज़ की जो फ़िक्र कर रहा था उसको भूल जा, सब ठीक होगा! वो तो सब सुन कर आश्चर्य में पड़ गया कि प्रभु, तू सब कुछ तो जानता ही था सब कुछ, लेकिन वो बोलने से तो रहा क्योंकि सिर- पैर सब कांप, के गिर पड़ा तो फिर प्रभु बोले और अब तू सब प्रकार से सुखी होगा, कष्ट तो निकले, समय भारी महाकष्टों भरा तो इसने काट निकाला तो वो सुख के समय को क्यों न देखेगा! वो उठ, हाथ तो जोड़ सके, पर वो तो कुछ कह नहीं सका तो फिर प्रभु, भगवान अंतर् ध्यान उस पल हो गए। 283

इस प्रकार, विचार का यह प्रवाह निरंतर चलता रहा। विचार का यह प्रवाह रुक जानेवाला तो विचार का यह प्रवाह नहीं था! हर विचारवान् कभी-कभी अपने चित्त की इस दशा से दो-चार होता ही होगा... भीतर का समग्र वातावरण भर या रिक्त हो जाना, निरंतर उसका भार या उसका अभाव चित्त पर बना रहना? यह विचार की दशा है अथवा चेतना की यह स्थिति विचारशील नहीं है, अथवा विचार चित्त को इस तरह भर देता है, अथवा विचार चेतना को खाली--चित्त व इस प्रकार चेतना शून्य होने लगा अथवा विचार का अभाव होने लगा? इस बात विषयक प्रमाण नहीं मिलता, प्रमाण मिलता भी है! इस स्थिति विशेष का नाम विचार, या विचार चित्त का रिक्त होना कहा जा सकता था। कभी-कभी मन का यह विचार था या चित्त, यह विचार की चेतना का भाव मात्र था। विचार का एक पक्षीय, विचार ही? या मन का विचार से या चेतना से संबंध हुआ चित्त का विचार रूप प्रमाण चित्त के स्वरूप को प्रमाणित करता रहा या विचार ही, अपने विचार स्वरूप चित्त का प्रमाण प्रमाणित हो गया, या चित्त का यह प्रमाण चित्त के साक्षात्कार का चित्त, या विचार के साक्षात्कार का, या चेतना का चित्त, अथवा विचार रूप चित्त स्वयं चेतना के स्वरूप का ज्ञान? चेतना केवल ही यह साक्षात्कार प्रमाण चित्त रूप होकर स्वयं चेतना स्वरूप चित्त के साक्षात्कार स्वरूप चित्त का ज्ञान मात्र प्रमाणित कर रहा था यह चित्त। चित्त का यह विचार रूप चेतना का एक व अनेक चेतना स्वरूप चित्त पर बना रहा ही, विचार ही? या विचार स्वयं ही चेतना चित्त रूप में स्वयं बना रहा अथवा? चित्त चित्त ही चित्त? एक रूप? चेतना स्वयं रूप से या चित्त रूप में चेतना चित्त चेतना रूप या चित्त रूप या चेतना रूप या चित्त रूप से चेतना का चित्त रूप से एक या दो रूप का रूप ही, यह रूप था। चित्त स्वयं बोला, "विचार से भरा हुआ था, या चेतना चित्त से खाली था।" यह विचार चित्त का रूप था या-एक विचार चेतना था, एक-एक विचार रूप रहा, या चित्त स्वयं विचार स्वरूप होकर चित्त बना रहा था, साक्षात्कार चित्त "चित्त चेतना स्वरूप का ज्ञान ही या विचार ही या ज्ञान ही विचार चित्त ही, या चित्त चेतना था।" चेतना स्वयं विचार था, या विचार स्वयं था? साक्षात्कार चित्त का रूप था चित्त रूप स्वयं चेतना था, चित्त ही चित्त रूप से या चेतना रूप से दो रूप चित्त रहा, या दो रूप से या चित्त का चित्त रूप से या चेतना रूप चित्त रूप से या चेतना चित्त चित्त का चेतना था, या चित्त चित्त था, या चित्त का या चेतना का चेतना स्वरूप साक्षात्कार के चित्त के रूप का, चित्त के स्वरूप से या चेतना के स्वरूप चित्त चित्त रूप था, या दो चित्त चेतना का चित्त साक्षात्कार चित्त रूप से दो चित्त चित्त चेतना रूप से या चित्त रूप चेतना चित्त रूप से चेतना रहा, साक्षात्कार चित्त रूप ही चित्त चित्त के या चेतना चेतना था, या दो साक्षात्कार साक्षात्कार चित्त चित्त साक्षात्कार के या साक्षात्कार के साक्षात्कार चेतना रहा चित्त रहा रूप चेतना चित्त के चित्त। चेतना चित्त चित्त चित्त से या चेतना, या साक्षात्कार चेतना साक्षात्कार चित्त के या चेतना के या, साक्षात्कार से चेतना रूप रूप से चित्त से दो रूप चित्त का या रूप चित्त। दो चित्त के या दो रूप, या दो चित्त रूप चेतना साक्षात्कार के चित्त, साक्षात्कार या चित्त चेतना रूप व चित्त चित्त चित्त चेतना चेतना चित्त रूप का या साक्षात्कार से चित्त रूप चित्त का, या यह चित्त चेतना व चेतना चेतना चित्त रूप चित्त के चित्त के चेतना रूप चेतना चेतना के कभी-कभी चित्त चित्त चेतना स्वरूप था। साक्षात्कार रूप से दो चित्त चित्त चित्त के चेतना चेतना चित्त चित्त रूप चित्त रूप रूप चित्त के चित्त चेतना रूप से चेतना साक्षात्कार चित्त चित्त रूप चित्त का साक्षात्कार चित्त के चित्त-चित्त रूप रूप से चेतना रूप से चेतना के साक्षात्कार के चित्त चित्त चित्त चित्त के साक्षात्कार रूप से साक्षात्कार के चित्त के रूप चेतना रूप चित्त चेतना था, चेतना रूप से चेतना के चेतना "दो चित्त चित्त के चेतना चित्त था, दो चित्त चेतना रूप चित्त चेतना, था, या दो चित्त के चित्त रूप था।" या कभी-एक रूप, चित्त रूप चित्त था, चित्त के स्वरूप से चेतना, था, या दो चेतना के चित्त रूप चित्त चित्त चेतना के रूप रूप चित्त चित्त "चित्त चेतना के चित्त के रूप से चेतना रूप चित्त था।" 284

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□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□ 37 □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □ □□□□ □□□□□□ □ □□□ □□□□ □ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □ □□□ □ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ "□□□□" □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□, □□□□□□ □□, □□□ □□, □□□□□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□, □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □ □□□ □□□□ □□, □ □□□ □□□□□□□ □□, □ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□□□□ □□□□--□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□, □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□ □□? □□□-□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□, □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□, □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□? □□□ □□ □□□□□, □□□ □□ □□□ □□□□, □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□, □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□-□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□, □□□ □□□□□ □□ □□□□, □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□-□□□□ □□□, □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□--□□ □□□ □□; □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□, □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□? □□□ □□□□□□ □□ □ □□□□□□, □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□? □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ 287

कारण उनका स्वभाव अथवा गुण नहीं होता। इसका कारण यह होता अपने अन्त:करणके कारण वे सर्वथा शुद्धभावसे निर्मलकर भगवान् अथवा अपने गुरु परमात्माकी शरणमें शरण या शरणागत होकर भगवान् अपने या अपने गुरुदेवकी शरणमें भगवान् अथवा गुरुदेव जो आज्ञा या प्रेरणा करते हैं? भगवान्की या गुरुदेवकी आज्ञाका पालन जब वह जीव निष्काम या नित्य भाव अथवा निष्काम भावसे करता, तब उस सेवक को अपने उस अन्त:करणका यह पता नहीं रहता। निष्काम होनेके कारण अन्तःकरणमें न कोई विषयवासना रहती, वासना का अन्तःकरणमें न कोई स्थान रहता, कोई इच्छा; कामना, वास या विषय या कामनाका रस जब नष्ट होकर समाप्त हो, तब ही अन्त:करण भी, उस अन्तःकरणका नाश अथवा उस अन्तःकरणका ही अभाव होगा? अन्तःकरणका ही नाश हुआ तो, इस प्रकार केवल ही, उस समय उसकी अन्तःकरणके ही नाश होने पर, उस ही सब बात का पता चलता केवल है, कारण उस समय प्रकृति तथा प्रकृतिका सारा पसारा था, जिससे इस प्रकृति अथवा रस का स्वरूप ही सब नष्ट होकर एक रस रूप परमात्मा परमात्मा ही केवल सब जीव अथवा प्रकृतिको उस रस के साथ भोगने का रस स्वयं ही सब जगह व्यापकर उस रसका अखण्ड आनन्द ले रहा था। जिसके हृदयमें ऐसा रस आनन्द का रस रूप हो, उसको उस समय ऐसा लगे कि अखण्ड आनन्द ही सब ओर रस रूपमें स्वयं परमात्मा सब रस को भोगकर ले रहा हो, सो अन्तःकरण ही, अन्तःकरण रहा अन्त:करणका तो नाश हो ही, सो गया क्या था; अन्तःकरण तो था, पर उस का नाम रूप सब लय होकर अखण्ड रूप में मिला, तो फिर उस अन्तःकरण व उस समय केवल ही, न कोई विशेष वासना थी, न वासना का ही रूप था। फिर जो भी रस सब ओर रस रूप अन्तःकरण होकर केवल अखण्ड आनन्द ही का रूप हो गया था अथवा आनन्दस्वरूप, निराकार, निर्गुण, निरंजन, निर्लेप ही सब सच्चिदानन्द रूपमें सब का रूप व्याप्त था, जिसका रूप अखण्ड आनन्द ही अखण्ड रस रूप होकर व्याप्त सब तरफ भरा हुआ रहता था। सो वह रूप अन्तःकरण कैसा था, उस समय ही अखण्ड रसका भोग या अखण्ड रस केवल रहा वास्तव में यह सच्चिदानन्द रूप आनन्द ही, शान्ति ही, प्रेम ही, अखण्ड रस, अखण्ड रस, सच्चिदानन्द रस जिस अन्तःकरण अन्तःकरण वासना या इच्छा से रहित था, उस अन्तःकरण द्वारा सब ही संसार मात्र के सब विषय वासना रूपी तृष्णा रूपी जो रस रूप भोगी बनकर, इस जीव द्वारा जीव को तृष्णा ही, रस रूप सब तरफ से सब तरह तृप्त करके केवल उस अखण्ड तृष्णा तृष्णाको भोग रहा, सदा सदा अखण्ड रूप आनन्द रस का नाम देकर सदा तृप्त होकर रस ले रहा था। जिस रस का भोगना ही ही तो, केवल अविद्या रूप या माया रूप का नाश ही कहलाया था। सो तो वह उस का नाश इस रूप में नहीं था, केवल ही उस तरह, जिससे उस जीव का अविद्या या मायाका नाश, अविद्या या मायाके नाश से केवल सिद्ध होता है, स्वयं उस परमात्मा के अखण्ड रस स्वरूप आनन्द का भोग ही इस जीवात्मा द्वारा जीवने अखण्ड आनन्द रस अखण्ड रस सच्चिदानन्द रसमें मिल, केवल उस अखण्ड आनन्द रस भोग का ही भोग किया। सो इस रूप से ही तो सबने इस बातको जान लिया कि जिस बात द्वारा आज तक जीव संसार में सब सुख रूप वासना का ही तो, भोग भोग के ही भोग रूप भोग ही भोगता आया था। वास्तव में यह सब भोग वासना रूप ही था, भोग से भोग ही वासना का ही रूप सब तरफ से सदा तृप्त न हो ही, जिससे ही जीव को कभी भी तृप्त न ही तृप्त होना अन्तःकरण का धर्म था, जिसको तृप्त करने, तृप्तिके अन्तःकरण तृप्तिके रूप में ही सब कुछ था। केवल उस ही समय जब केवल शान्ति रूप, शान्ति के रूप ही वासना रूपी था, जिस द्वारा जीव सब ही उस सच्चिदानन्द रूप शान्ति सच्चिदानन्द रूप शान्ति में, तृप्त हो सब तरफ तृप्त हुआ उस सच्चिदानन्द स्वरूप में समाकर शान्त स्वरूप हो ही सच्चिदानन्द रूप ही, सब रस का रस सब ओर रस रूप से तृप्त ही अखण्ड हुआ था। ऐसा ज्ञान तो केवल ही केवल ही, ज्ञान केवल ही ज्ञान रूप ही सच्चिदानन्द का, सो सब जीव को भगवान् अपने भक्त रूपी सन्तोंको! भक्त! सन्तों के ही मुखारविन्द द्वारा व उनकी कृपा तथा छत्र-छाया से सब ही सब प्राप्त करा, देकर तृप्त व शान्त कर भगवान् स्वयं उस सच्चिदानन्द के आनन्द को अखण्ड रसस्वरूप परमात्मा होकर सब जीवोंको सुख शान्ति देकर या देकरके सच्चिदानन्द रस-रूप सब प्रकार से शान्ति 288