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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पाप बतलाने लगा, वह पाप अपने ऊपर ले, जान बूझ जान कर विष खाए सो मरे ही मरे, बाल अवस्था में विद्या न अभ्यास करे, तो परलोक में वह सब जन में तिरस्कार पाए ऐसा है, सो ईश्वर के हाथ सब कुछ नहीं जो जीव के भाग्य में है वही जीव को मिलेगा सो कर्म ही बलवान् है ईश्वर के जानने वालो ऐसा जानो, ज्ञान विचार बिना जो नर जन्म सो वृथा है, ज्ञान से सर्व उत्तम पदार्थ को पावे अज्ञान से नर, पशु के सो बराबर, ज्ञानी जन सदा काल सुखी व मानी पदार्थ पाता है जो, तो विचार कर मन में, विषय के त्यागे से सब सुखकारी जो मन शुद्ध व निर्मल करेगा सब काम सिद्ध करेगा जो मन मैला, भय भयावना तो वह नरक वास में गिरेगा जो मन शांत व सब सुख व सब आनन्द व रूप, जहां न धूप, तृष्णावली व सब आपदा छूटेगी? ज्ञानी सो जन जो अचल सो मन को जन करे, सो मन को ब्रह्म--सो मिलावे, सो स्वरूप, सो स्वरूप-- आदि अन्त सब एक रस, ईश्वर सो सब रूप जान सर्व रूप घट घट सब घटों विषे एक काल जाने, सो नर सब काम-क्रोध से छूट के सदा सुखी? कोई नर अज्ञानी हो सो पछतावे? सो बात सुनो, अज्ञान का नाश जो विचार से स्वरूप विचार कर सो ज्ञान पावे तो स्वरूप सदा आनन्द से आनन्द--धाम सदा सो सो सदा सो स्वरूप पद--को सो पावे जहां अविद्या का नाश सदा काल रहे सो सो सब विकार घट घट से समाप्त हो स्वरूप में मिल सदा सो परमानन्द स्वरूप-- सो सदा सो वास जो वास सो वास सो वास सो वास सो जन जन सो सब विकारों से सो ज्ञानवान् सदा सर्व काल से रूप ज्ञान करे सो जन सब जाने, सब नाम सो, ज्ञान से जाने घट सो जन सो, अज्ञान से अज्ञान विकार सदा सो सो सो जन से अज्ञान से ज्ञान कल्याण सब जन जाने ज्ञान से सदा, ज्ञान से मुक्ति सो, जो ज्ञान से स्वरूप का ध्यान सदा कर सो नर सब फल-रूप को न सो पावे? ऐसा सब नर जान ध्यान सो कर स्वरूप को पावे! जो ज्ञान से ध्यान न करे अविद्या के जाल में फंसे, ज्ञान बिना कोई न तर सो नर जो काम क्रोध सदा काम बाधा से अज्ञान घट सदा काल रहे न सुख सो! जो ज्ञान करे सो नर सो मुक्ति को पावे, कहो, मुक्ति कौन सी? कौन मुक्ति से? ज्ञान से क्या? ज्ञान सब को सो मुक्ति विचार से नर को, अज्ञान से अज्ञान से मुक्त सब नर सो ज्ञान सब जान, सो ज्ञानी, स्वरूप के सब विकार ज्ञान से समाप्त ज्ञान सब घट को ज्ञान से समाप्त है, अज्ञान बिना ज्ञान को ज्ञान से मुक्ति ज्ञान सब, जो ज्ञान सब घट सब जाने सो, स्वरूप के स्वरूप सदा सो स्वरूप ज्ञान से स्वरूप सो सदा सो सब सो अज्ञान से सो सो सो स्वरूप प्रकाश प्रकाश प्रकाश प्रकाश सब अज्ञान ज्ञान ज्ञान सदा सब सो सदा सो ज्ञान सो, स्वरूप ज्ञान सब सब अज्ञान से सो अज्ञान से सो ज्ञान सो सो सो सदा प्रकाश सो सदा प्रकाश! ज्ञान का वास सो स्वरूप स्वरूप सब सब अज्ञान ज्ञान सो सो, सब सब अज्ञान से ज्ञान सो सदा ज्ञान सब रूप से सब सब अज्ञान से सो सदा ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान सब घट सो ज्ञान ज्ञान से सो सदा ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो, सो स्वरूप सो स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सब घट सो सो अज्ञान सदा सब सो सो अज्ञान सो सब सो काल-काल, सब सो ज्ञान सो सो सो ज्ञान सो सो सो ज्ञान सब स्वरूप सब सब, अज्ञान स्वरूप सो सो ज्ञान सो सो स्वरूप से सब ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान सो सो ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान सब सो, स्वरूप सदा स्वरूप सो ज्ञान सो सो सब सो सब ज्ञान प्रकाश सो सो सो सो सो ज्ञान व ज्ञान सो स्वरूप स्वरूप सब सब ज्ञान सब सो ज्ञान सो, अज्ञान सब अज्ञान सब सो ज्ञान सो सो सब स्वरूप सब स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सो स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान सो स्वरूप सो स्वरूप सब, सब सो ज्ञान, सो ज्ञान सब सो! सो सब ज्ञान सो ज्ञान, सब स्वरूप ज्ञान सब सब सब स्वरूप सदा सब ज्ञान सब सो ज्ञान ज्ञान सो सो ज्ञान सो सब सो सो ज्ञान सदा सो सदा सदा सदा सब सब सो स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान सब ज्ञान

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ब्राह्मण लोग बहुत चंचल स्वभावके तो होते ही हैं। यदि उनपर दया न की जाय तो उनका पेट कैसे भरेगा, इसी से बड़े बड़े विद्वान राजा युधिष्ठिर सरीखे इनके चरण छूकर पूजा करते हैं। अब तुमको भी तो यह उचित था, जो तुम इनको एक लाख मोहरें दे देते? इसमें तुम्हारा क्या बिगड़ जाता? यह सुनकर राजा हँसा, और दो लाख मोहरें उन दोनों को दीं, पश्चात् राजाने पूछा पहिले तो आवश्यकतानुसार मांगने पर भी तुमने एक दम कुछ नहीं दिया था, पश्चात् दो लाख दे दिया इसका क्या कारण था? तब उसने उत्तर दिया, हे राजन् पहिले तो आपने अपना बल विक्रम देख कर मांगा था, सो तो कोई किसीके देने योग्य नहीं था पश्चात् जो मांगा वह उस विद्या रूप पराक्रम का फल था, सो मैने दे दिया। सो सुमति सेठ, तू भी तो ऐसा काम कर जिससे कोई विद्या आवे। विद्या रूपी धन की प्राप्ति बिना उद्योग के नहीं हो सकती। व्यर्थ का हठ छोड़ दे। इस संसार में विद्या ही सार वस्तु है, जिसके पास विद्या नहीं वह पशु के समान है, सो तू भी विद्या का उपार्जन कर। सुमति सेठ के उस मित्रने उसे इस प्रकार बहुत कुछ समझाया। तब सेठ ने अपने मित्र से, हे मित्र! आपकी कृपा से आज मुझे ज्ञान हुआ, अन्यथा अज्ञान रूपी अन्धकार सुमति सेठ ने अपने घर पर जाकर बहुत विचार किया और निश्चय किया कि विद्या प्राप्त करना चाहिये। तब वह उस पंडित के पास गया और प्रार्थना करने लगा कि महाराज मुझे भी विद्या दीजिये, जिससे मेरा अज्ञान दूर हो। उस पंडित ने कहा, विद्या तो तुझे दे दूंगा, परन्तु तू दक्षिणा क्या देगा? सुमति ने कहा जैसी आपकी आज्ञा होगी वैसी दूंगा, सो महाराज, मुझे कोई ऐसा श्लोक सिखा दीजिये जिसका अर्थ अच्छा हो? तब उस पंडित ने कहा, सहसा विदधीत न क्रियां... इस प्रकार एक श्लोक सिखाया और उसका अर्थ भी बताया। सुमति उस श्लोक का अर्थ समझकर घर आया, श्लोक का अर्थ यह था कि बिना विचारे एक दिन राजा, दो-चार आदमियों को साथ लेकर शिकार को गया, दिन-भर शिकार खेलकर जब लौटा और अपनी रानी के महल में गया, देखा नाई... ने सोचा कि युवराज तो छोटा है, युवराज को मारकर, महारानी को मारकर मैं राजपाट पर अधिकार कर लूंगा और राजा बनूंगा, यह विचारकर नाईने जहर मिला दिया और मालिश करने लगा। नाईने मालिश करना प्रारम्भ कर दिया। राजाने मालिश कराते कराते दीवार पर देखा। दीवारमें सोने के दो शब्द लिखे हुए थे—सहसा न क्रियां विदधीत अर्थात् बिना विचारे कोई काम न करो, इसका भाव नाईने राजा से पूछा तो राजाने कहा बिना विचारे काम करने से हानि होती है, पश्चात् पछताना पड़ता है। राजा ने नाई से कहा तूने यह बात क्यों पूछी? नाई डर गया, उसने हाथ जोड़कर कहा क्षमा हो महाराज, मुझसे बड़ा अपराध हुआ। राजा ने पूछा क्या? नाईने सब बात कह दी और कहा कि यह सब मन्त्री ने सिखाया था। राजा ने मन्त्री को बुलाया और पूछा तूने ऐसा काम क्यों कराया? मन्त्री डर गया और उसने सब बात सच-सच कह दी। राजा ने मन्त्री को बहुत डांटा और नाई को छोड़ दिया और मन्त्री को देश निकाला दे दिया। इस प्रकार राजा ने मन्त्र का चमत्कार इस प्रकार उस, एक श्लोक द्वारा राजा अपनी जान बचा सका। जिस प्रकार राजा विचारशील था उसी प्रकार उस सुमति सेठ ने भी उस मन्त्र का अर्थ विचार कर बड़ा लाभ उठाया। सेठ के पास एक सेवक था जो बहुत ईमानदार था, परन्तु उस सेवक की स्त्री बहुत चंचल थी, उसने सेठानी से कहा तू अपने पति को विष देकर मार डाल और राजा से विवाह कर ले, राजा तुझको पटरानी बनावेगा। सेठानी मूर्ख थी, उसने इस बात को स्वीकार कर लिया, और एक दिन भोजन में विष मिला दिया। जब सेठ भोजन करने बैठा तब उस श्लोक का स्मरण आया कि बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिये? तब उसने भोजन की परीक्षा की तो देखा कि भोजन में विष मिला हुआ था। तब सेठ ने अपनी स्त्री से पूछा, तूने यह क्या किया? तब स्त्री रोने लगी और बोली मुझे क्षमा कीजिये। सेठ ने उस श्लोक का धन्यवाद किया। सुमति सेठ उस श्लोक के बल से बच गया, सो हे राजन्! बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिये। जो काम बिना विचारे किया जाता है उसका फल बुरा ही होता है, इसलिये सदा सोच-समझ कर काम करना चाहिये। जो मनुष्य बिना विचारे काम करते हैं, वे अन्त में पछताते हैं। अतएव हमें भी कोई काम बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिये। इस प्रकार विद्याधरने सुमति सेठ की कथा राजा को सुनाई और कहा कि हे राजन्! तू क्यों व्यर्थ चिन्ता करता है? विद्या से सब कुछ सिद्ध होता है। 25

केवल इतना ही तो चाहा था कि सब के सब प्रेम से साथ रहें तो सारा जग सुखमय, सब तरफ शान्ति ही शान्ति हो? शान्ति क्यों? जो पिता सब को न तो खिला सके, न ही अपने साथ रखकर अपना प्यार दे सके तथा जब चाहे लात मारकर, न तो मकान देवे, न ही कपड़ा ऐसा पिता ही न होवे तो क्या बुरा है, न ऐसा पिता इस तरह से सब बच्चे प्यार से एक छत नीचे ही तो रह रहे हैं सुख, शान्ति सब आपस में प्यार, प्रेम, शान्ति ही शान्ति, शान्ति माता तो सदा चाहती? शान्ति की चाह किसे नहीं? पर पिता तो ऐसा नहीं जिसे सुख चैन, शान्ति सुख, शान्ति सदा ही सब बच्चे चाहते रहते हैं। माता के इन सब विचारों तथा इन सब बातों से लगता है, कि सब ही उस पिता परमात्मा जिसने सब, सब सन्तान माता सब को सब ही कुछ सुखदायक पदार्थ बनाकर इन सबका अधिकारी कर सब कुछ सब सुख ही तो दिए सुखपूर्वक रहने अधिकार दे दिया जिसको माता ने सब कुछ सुख सम्पद दिया है, सब ही सुख से सब को दिया पिता ने सुख, पिता सब पदार्थों तथा सब प्रकार से सुख ही? शान्ति ही? पर सब सन्तान तो सुख से शान्ति से रह ही रहे, मातापिता सब को तो सुख शान्ति तथा सब सुख शान्ति देकर सब कुछ, सब तरह सुखपूर्वक सब सुखों शान्ति पूर्वक ही सुखी चाहते हैं? पर पिता तो सब, सब तरह से सब ही प्रकार सुख, पर सब सुख सब को सब कुछ देकर सदा एक रूप सदा सदा सुख शान्ति दे? जिसके यह माता पिता सन्तान ही सन्तान हैं, पिता तो कभी सब सब समय सदा ही सब सब तरह से सदा सुखी चाहता माता बच्चों के सुख से तो सब तरह सदा खुश, शान्ति सदा सब तरह से सब बच्चे माता पिता के सुख से सदा ही सब सुखी क्यों न हों? सब तो सही, मगर सब सुख तो सब पिता द्वारा माता पिता द्वारा सब को तो माता पिता, पिता माता को ही सब से अधिक प्यार से सब सुखी? माता सब, सब सन्तान व पिता ही सब को प्रेम, पर सब सन्तान मातापिता के आज्ञा सदा सब, शान्ति सदा सन्तान बने माता तू--तू ही सदा सब बच्चों सदा अपने प्यार तू--तू ही सदा सब बच्चों सदा खुश, शान्ति सदाचार सब ही सब कर रही पिता माता पिता से, शान्ति से? पर सब पिता से, जो पिता ही तो सब कुछ सब दाता है, सदा सब सन्तान का पिता तू--तू ही, सब का, पिता ही, पिता सब कुछ पिता सदा ही, पर सब पिता सन्तान सब पिता सदा एक ही सन्तान, पिता ही सन्तान का पिता तू--सन्तान सन्तान ही, मातापिताजी को, भूलना ही? यह सन्तान सब की, पर सब सन्तान पिता सब माता पिता? सन्तान सब माता सब सन्तान पिता द्वारा सन्तान सब को सब ही सन्तान बना सब सबने पिता सब सन्तान को तो माता पिता का ही सब प्यार अधिकार से अधिक प्यार ही, पर ही सब सब ही सब माता पिता सब सब प्यार सन्तान तू--पिता अधिकार सन्तान सन्तान सब, सदा, अधिकार सन्तान सब को सब माता पिता सन्तान सन्तान सब। पिता सब का सदा पिता ही तो पिता ही सन्तान का सब ही पिता परमात्मा ही सब पिता का परमात्मा जन्म-मरण सन्तान से तो न्यारा, पिता सब सदा ही सब सब व सब पिता सदा ही सन्तान सब रूप सब, पिता माता सब रूप सब, सब सन्तान सब परमात्मा व परमात्मा सन्तान सब प्रकार सब सन्तान सब सन्तान ही सब तरह माता सन्तान रूपी ही सन्तान सन्तान, मातापिता सन्तान सन्तान ही तो सदा सब तू--तू सन्तान, पर पिता तो सब ही सब का सन्तान ही रूप ही सब रूप सन्तान सदा ही सब का, पर पिता परमात्मा का तो सब रूप सन्तान सन्तान सब ही रूप ही, पर पिता सन्तान को सदा सन्तान रूप सन्तान ही सब को, पर सदा सन्तान सब सदा सन्तान ही सब रूप सब। पिता तो तू सब का पिता, तू ही माता परमात्मा पिता सदा पिता सब ही पिता सदा ही पिता सब सन्तान को तो सब पिता पिता सब सन्तान को पिता सब पिता परमात्मा, सन्तान परमात्मा ही तो ही ही पिता सब पिता सब परमात्मा पिता। पिता सन्तान का सब रूप? सब रूप ही पिता, पिता ही सन्तान सब सन्तान ही सन्तान रूप सब ही, पिता परमात्मा, पिता परमात्मा--परमात्मा ही सदा सब, शान्ति ही सदा सब, 26

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जगत की समस्त वासनाएं छूट जायँ, उसका नाम क्या है? कषायों उपशान्त हो जायँ, उनकी मन्द स्थिति हो, उसका नाम क्या है? फिर देश-सर्व विरत सम्यक्त्व को प्रमाण किया गया, तो जो लोग ऐसा कहेंगे, मिथ्यादृष्टि का त्याग सम्यक् मिथ्यात्व में सम्यक्त्व प्रगट होने पर होगा इसलिए उसे ही या सम्यक्त्व से पहले जो कुछ दान या पूजा रूप या तपश्चरण रूप किया था या त्याग किया, वह सम्यक् त्याग नहीं, या सम्यक्त्व पहले नहीं, तो उसका जो होगा, वह व्यर्थ गया, या सम्यक् सम्यक्त्व हो देश-सर्व विरत रूप सम्यक्त्व को प्रमाण किया गया, प्रथम सम्यक् का ऐसा स्वरूप या त्याग या सम्यक् के उपशम या सम्यक् रूप जानना चाहिए, अनन्ता-नुबन्धी का अभाव पश्चात प्रत्याख्यान का देशप्रत्याख्यान, तो देश-सर्व रूप किया तो मिथ्यात्व सम्यक्त्व रूप हो सम्यक्त्व नाम हो ही गया! तो विरत सम्यक् नाम उस ही का तो नाम है तो इस प्रकार सम्यक् हुआ, सम्यक्त्व हुआ, पश्चात सम्यक्त्व रूप से देश सम्यक्त्व सम्यक् होगा? सम्यक्त्व रूप तो हुआ, पर उस से सम्यक्त्व सम्यक् रूप विरत सम्यक्त्व को प्रमाण किया या तो विरत सम्यक् नाम सम्यक्त्व रूप को ही सम्यक्त्व का विरत का होगा, सम्यक् ही? तो फिर विरत सम्यक् तो विरत रूप ही हुआ और सम्यक् सम्यक्त्व रूप नाम सम्यक्त्व रूप हुआ विरत रूप तो उस सम्यक्त्व रूप नाम हुआ या सम्यक्त्व विरत का सम्यक् विरत रूप प्रमाण ही? तो जो विरत विरत सम्यक् ही रहा फिर वह तो सम्यक् ही ना हुआ सम्यक्त्व नाम रूप हुआ तो सम्यक्त्व के पश्चात विरत हुआ होगा उस को विरत सम्यक् नाम ही कहा जाय सम्यक्--सम्यक् होगा, विरत विरत, विरत, विरत! विरत का विरत ही हो जाय विरत नाम उस सम्यक् विरत का? तो सम्यक्त्व विरत नाम नाम सम्यक्--सम्यक् विरत का विरत ही प्रमाण तो विरत का विरत विरत ही? विरत हुआ, तो जो विरत सम्यक् विरत हुआ, तो विरत विरत नाम को विरत विरत नाम रहा उस विरत का सम रूप सम्यक् रूप प्रमाण हो गया प्रमाण रहा, विरत विरत ही? सो ऐसा जानना, सम्यक् सम्यक्त्व से सब विरत रूप हो, जो उस सम्यक्त्व रूप से, सो विरत सब विरत रूप विरत विरत हो सम्यक्त्व का ही विरत विरत ही? भला, सम्यक्त्व सम्यक्त्व से सम्यक्, विरत का सम्यक्त्व सम्यक्त्व का विरत ही सम्यक् हो न जाय, सम्यक्त्व से ही रहा, उस विरत रूप का उस विरत का सम्यक्त्व ही रूप रहा, सम्यक् का उस रूप का विरत विरत का सम्यक्त्व विरत रूप न होकर ही सम्यक् विरत विरत का सम रूप? पश्चात विरत विरत का विरत रूप हो, उस विरत विरत का न उस रूप का ही सम्यक् विरत सम्यक्त्व प्रमाण विरत का विरत रूप सम्यक्त्व प्रमाण न होकर सम्यक्त्व सम्यक्त्व सम्यक्त्व नाम तो ही विरत सम्यक्--सम्यक् ही? तो जो विरत रूप विरत ही रहा तो सो विरत का सम सम्यक्त्व ही ना हुआ, या सम्यक्--सम्यक् ही का सम्यक् सम्यक्--सम्यक्? तो सो ही तो सम रूप उस विरत सम्यक्--सम्यक् ही का सम रूप विरत रहा, या सम्यक्त्व रूप विरत का ही विरत तो उस विरत का विरत ही, सम्यक्त्व का सम्यक् रूप उस विरत का विरत रूप ही या विरत रूप का ही विरत विरत रूप सम्यक्त्व हो, या विरत ही विरत, उस ही का विरत रूप ही उस विरत विरत, विरत विरत सम्यक्त्व तो ही सो उस सम्यक्--सम्यक् ही? या सम्यक्--सम रूप का उस विरत प्रमाण, विरत ही रहा सो, उस विरत प्रमाण रहा, उस विरत रूप सम्यक्त्व का सम रूप या विरत सम्यक्त्व सम्यक्त्व रूप ही सम्यक्त्व नाम सम का सम्यक् सम्यक्? उस का सम्यक् का नाम ही विरत का, तो सो ही उस सम्यक् विरत? सम्यक्त्व ही रूप ही विरत, सम्यक्त्व विरत नाम उस ही का सम्यक्त्व नाम विरत का सम रूप रूप हो, सम्यक्त्व सम्यक्त्व सम्यक्त्व ही सम्यक्त्व का विरत सम्यक्त्व का ही स्व--रूप सम्यक्--का सम रूप ही उस ही विरत का, पश्चात उस रूप का ही रूप उस विरत सम्यक्त्व प्रमाण ही उस सम्यक्--सम्यक् का ही रूप सम्यक्--का सम्यक्त्व सम्यक्त्व प्रमाण का ही विरत ही रहा, विरत ही तो विरत का विरत का विरत ही, विरत रूप रूप का विरत रूप विरत सम्यक् विरत विरत का सम्यक्त्व, सो सम्यक् विरत विरत विरत विरत का सम्यक्त्व, सो विरत विरत 29

विचार करके देख लो संसार का इतिहास उठाकर, जिसने माता--पिता का तिरस्कार या अनादर अथवा उनकी बात नहीं मानी और उनका दिल दुखाया हो, तो कभी शान्ति पूर्वक रह नहीं सकेगा या उसका वंश अथवा वह कभी भी सुखी रह सके यह नहीं कह सके, लेकिन जो कोई हृदय रूपी गुरु आज्ञा धारण करके माता पिता की सेवा और आज्ञा का पालन करते हैं वह सुख का आनन्द हमेशा पाते रहते हैं और सदा उन पर भगवान की कृपा भी बनी ही रहती व यश पाते, और अन्त में उस परम आनन्द धाम को पाते, राम का उदाहरण प्रत्यक्ष पर आज तो संसार स्वार्थी, कपटी व पाखण्डी बनता, विचार ही बिल्कुल विपरीतार्थ दिशा में बदल व विपरीत दिशा में सोचने लग पड़े जिसका नतीजा है, कि वह कभी सुखपूर्वक शान्ति से रह तो ही नहीं सकता है, बल्कि अशान्ति से भरा रहता व दुःख भोग रहा क्योंकि सच्चाई के पथ से भटक ही गया, हर एक इन्सान पर आज माया ऐसी सवार हो रही व ऐसा प्रभाव डाल रखा कि कोई भी सच, शान्ति का दम नहीं भर रहा बल्कि स्वार्थ के वशीभूत होकर, चाहे सन्तान, चाहे कोई अपना सम्बन्धी अपने स्वार्थ के वश होकर ही आज माता पिता को अपने घर अपने पास रख या सेवा कर या फिर अपने से पृथक करके दुःखी कर रहे कई सन्तान तो केवल व सोचे कि माता पिता अपनी सारी जिन्दगी की कमाई मुझे, या जो कुछ भी उनके पास जायदाद पैसा रुपया हो वह सब ही मुझे दे दिया जाये चाहे, मेरे ही भाई और बहन को न मिले और उनका कोई भी हिस्सा न रहे जो केवल मैं अपने पास रखूँ जिससे मैं अपना गुजारा चलाता रहूँ व, तो सन्तान केवल अपने स्वार्थ खातिर बाप से प्यार तो जताती या कहती कि पिताजी आप हमारे साथ रहिये ताकि जायदाद अपने ही हाथ में आ सके; जब देखा या बाप, तो फिर उनका आदर भाव खत्म हो गया या छोड़ दी उनकी सेवा या दूर भगा दिया जायदाद ले, फिर क्या रहा आज तो सारा संसार ही ऐसा स्वार्थी बन, फिर शान्ति का पाठ कहाँ मिलेगा माता पिता को देखना भी कई सन्तान नहीं पसन्द करती व जब माँ बाप वृद्ध होकर किसी सहारे या भोजन के मोहताज हो जाते तब--तो उन्हें या छोड़ दिया जाता बाहर या फिर, वृद्धा आश्रम भेज कर छुटकारा पा लिया लो! लेकिन यदि वे खुद भी विचार करके देखें कि कल हम भी तो माता पिता की श्रेणी में ही आ गये हैं सन्तान के, कल को जब हम बूढ़े होंगे? तो क्या वह भी ऐसा बर्ताव हमारे साथ करेगी तब क्या शान्ति मिलेगी? विचार करो इन्सानों विचार जो भी संसार में आया है उसको यह शरीर छोड़ कर एक दिन जाना अवश्य ही पड़ेगा! तो फिर यह दुनिया दो--दिनों, थोड़ी देरकी खातिर क्यों पाप के भारी कर्म कर अपना ही बुरा कर रहे इस सच को समझो जी, इन्सानों, सच्चाई के पथ पर चल कर सच्चाई--धर्म, दया, नम्रतापूर्वक व्यवहार करो हर इन्सान से तभी सुख, ही सुख सब जगह ही पाओगे आज हर घर परिवार में एक दूसरे पर ईर्ष्या क्रोध जलने की अग्नि सुलगाये, एक दूसरे को न देख कर खुश बल्कि ईर्ष्या जलते ही हैं, हर एक घर आज नरक बना हुआ है भाई, नरक कहाँ मिलेगा! स्वर्ग तो शान्ति में, तो शान्ति का मूल क्या है? आज भाई--भाई की जान का बैरी बना हुआ या भाई भाई को आपस में दो--फाड़ कर रहे, एक ही माँ का सन्तान भाई ही भाई--परिवार को उजाड़ने, मारने में, अपना बड़प्पन रूप पाखण्ड को ही अपना मान--शान समझ मनुष्य ही तो इन्सान का ही गला घोंट या तो इन्सान उस रब को केवल मात्र परमात्मा जानकर ही सब कुछ समझ कर निर्वाह करता या तो यह सोच समझ कर त्याग करता, दयावान् बनता, परोपकारी बन, अपना जीवन, तो सब सम्भव निर्वाह हो ही जाता जिस पर सदा उस दाता की कृपा बनी रहती पर आज उल्टा पाठ ही, इन्सान पढ़ रहा जिससे इन्सानियत इन्सान रूप में है? आज इन्सान पाश्विक, रूप धारण करता जा रहा, जिस सच इन्सान को पहचानना है, उस सच्चाई को भूल बैठा मनुष्य, जिस के लिए बार बार यह दुनिया में ही इन्सान का जन्म दिया है परमात्मा ने जिस से हर एक मुक्ति पा, उस का ध्यान लगा मुक्ति रूप जन्म--मरण बन्धन से ही सदा--सदा छूट--कर छुटकारा 30

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□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□, □□□-□□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□? □□□ □□□□-□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□? □□□□ □□□□□ □□? □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□? □□□□□ □□, □□□□□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□? □□□, □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□, □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□! □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□-□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□-□□□ □□□ □□□□-□□□□, □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□! □□□-□□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□--□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□, □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □ □□, □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□, □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □ □□□, □□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□□ □□□□□ □□□□ □□□□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □ □ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□, □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□

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लेकिन विस्मय केवल इसी पर निर्भर न था कि संन्यासी सब का सब भोजन कर गया जिस भोजन करने वाले में साधारण व्यक्ति पचास मिनट लगाता उसे संन्यासी ने दस मिनट में, उस सब भोजन को इस प्रकार समाप्त कर दिया था कि जैसे भोजन था, ही नहीं या फिर न जाने सब का सब भोजन कहाँ समा गया, पर सब लोग इस देखकर यह निश्चय करने लगे थे, यह भी, न तो संन्यासी का यह पहला काम पहले कभी का किया हुआ संन्यासी का खेल था। वह खेल केवल था, जिसे दिखलाकर सब संन्यासी का विश्वास कर रहे थे, सब का ध्यान अपनी तरफ कर लिया। वह संन्यासी यह विश्वास सब लोगों अथवा एकत्र जन पर इस प्रकार जम, जमने जा रहा था! केवल इतना नहीं, जो कुछ भी वह संन्यासी अपने मुख से कह रहा था, एकत्र जन पर उस एकत्र जन समुदाय पर उसका ही प्रभाव पड़ना! जमना! सब लोग जो संन्यासी के पास एकत्र थे, वह सब इस प्रकार उस ओर जा रहे थे मानों उनका, जो कुछ सोच विचार उस बात अथवा इस ओर उस समय हो रहा था, केवल वह समाप्त हो रहा था और जो कुछ वह सब संन्यासी कह रहा था, सब एकत्र जन उस पर ही विश्वास न केवल, बल्कि सब उस प्रकार केवल उस पर विश्वास करने अथवा करने के ही योग्य थे, जो वह संन्यासी कह दिया करता था। इस ओर सब एकत्र न केवल थे, पर उन एकत्र अथवा संन्यासी के बीच में यह अंतर पड़ता जा रहा था कि वह सब संन्यासी को देख-देखकर प्रसन्न केवल होते ही न रह जाते थे बल्कि संन्यासी के उस खेल-तमाशे अथवा खेल पर विश्वास करके संन्यासी पर अपना विश्वास इस प्रकार से कर रहे थे कि वह संन्यासी को केवल एक ऐसा व्यक्ति ही मानकर न रह रहे थे, जो केवल पेट भरने के ही लिए संन्यासी बनकर घूमता फिर रहा हो अथवा जिसे केवल भोजन से, या सब प्रकार की सांसारिक सुख-भोग से मोह वह केवल यह देख प्रसन्न थे, जो वह संन्यासी भोजन कर रहा था, जिसे वह न केवल एक साधारण जन से अधिक खा रहा था बल्कि साधारण व्यक्ति से अधिक? उस सब पर अविश्वास तो, था ही नहीं सब लोगों को उस समय जो एकत्र थे, पर वे सब जो कुछ भी अविश्वास इस बात पर कर रहे थे अथवा कर रहे थे कि क्या वह संन्यासी सच, में भोजन था, या भोजन से, या केवल पेट, में भोजन न--था सब का सब ही! जिसे सब एकत्र लोग समाप्त हुआ देख रहे थे, केवल विस्मय ही सब को हो रहा था। संन्यासी के मुख पर वह तेज चमक रहा था, जिस मुख-तेज पर एकत्र जन सब प्रकार मुग्ध होकर उस ओर देख रहे थे और संन्यासी की बात शांत होकर सुन रहे थे। जिसे संन्यासी केवल एक खेल समझ रहा था! संन्यासी जिसे सब कुछ न समझकर केवल एक खेल समझ रहा था! पर जो सब एकत्र लोग वहां संन्यासी को, उस संन्यासी को सब कुछ जानकर मान रहे थे। केवल इतना ही नहीं संन्यासी सब लोगों को वह सब सुना रहा था जिसे वह उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर न केवल न केवल कह रहा था, बल्कि जो कुछ सब उस उत्तर-पश्चिम की ओर देख रहे थे अथवा संन्यासी को उस दिशा की ओर मुंह किए हुए सब लोग एकत्रित थे, जिसे संन्यासी सब प्रकार से कह रहा। संन्यासी को भोजन सब लोग अब तक साधारण भोजन मात्र कहते आ रहे थे। केवल यह ही, साधारण भोजन संन्यासी को केवल पेट भरने वाला कहा गया था, अथवा लोग, जिसे भोजन कह रहे थे वह केवल पेट भरने वाला भोजन था उत्तर- पश्चिम दिशा की ओर संन्यासी उस उत्तर-दिशा की ओर देख रहा था। संन्यासी का भोजन सब ने न केवल देखा, न सब लोगों को उस प्रकार का भोजन ही समझा जा रहा था अथवा, भोजन सब ने देखा, पर संन्यासी केवल पेट का भोजन ही न समझा जा रहा था। पर आश्चर्य, इस बात का था कि वह सब भोजन पेट का ही भोजन था! वह भोजन सब लोग जिसे, पेट का भोजन ? कह रहे थे कि वह संन्यासी केवल, पेट भरने भर को भोजन कर ही रहा था? क्या वास्तव में, वह भोजन था? क्या संन्यासी का, वह भोजन था? इस ओर का भोजन सब को समझ में आ रहा था कि भोजन था, भोजन सब को पेट भरने का भोजन लग रहा था, पर वह भोजन संन्यासी का था, संन्यासी के ही उस भोजन को स्वीकार कर रहा, पर वह स्वयं पेट से भोजन कर रहा था या पेट को भोजन दिया जा रहा था! सब लोग देख रहे थे, केवल 35

पापो मरणतोऽपि! मी काय करू? या पातकातून मी निसटणार कसा ना, कारण मला सर्व माहिती पण मी फार पूर्वी एका ग्रंथकाराकडून एका साधू व संतांची जी माहिती वाचली ती फार विचित्र होती! साधूचा हा धर्म असतो की तो माणसाला पाप व संकट या दोहोंतून ही तारील व संकटा या जगातील नसून त्या परलोकीच्या जरी तो संकटात पडून ही पाप तर करतोच करतो ना, कारण तो तसे करीत असता जर तो त्यात पडला तर तो पापाच्या या पापातून मुक्त कसा होऊ शकतो असा विचार करून जेव्हा एखादा साधू या जगात येतो, तेव्हा तो स्वतः या संकटात पडून त्या पाप्यास त्या पापातून सोडवितो. आणि म्हणूनच साधूविषयी जे काही म्हटले जाते ते सर्व काही खोटे नाहीं! या विचाराने मला त्या साधूचा विचार आला की तो मला पापमुक्त करू शकत नाही म्हणून मी त्याच्या जवळ गेलो नाही. मी त्या साधूला पूर्वी पाहिले होते पण मी त्याच्याकडे गेलो नाही. कारण एका साध्या पापी माणसाला साधू सोडवू शकतो, पण माझ्यासारख्या पापी माणसाला सोडवू शकत नाही! कारण हा विचार असा आहे की, एका पापी माणसाला सोडविण्याकरिता त्या साधूला स्वतः पापी व्हावे लागते! जर पापी व्हावे लागले तर तो साधू कसा? जर साधू झाला नाही, तर तो मला सोडवू शकत नाही. या अशा विचाराने मी स्वतःच पापी होण्याचे पत्करले व त्याचा परिणाम असा झाला की, त्या पापातून मुक्त होण्याचा मार्ग मी शोधू लागलो! या विचाराने मला असे वाटले की या पापाचे प्रायश्चित्त तरी काय असावे? जर मी स्वतः मेलों--तर मला या जगातील सर्व दुःखापासून सुटका होईल! पण जर मी आत्महत्या केली--तर माझे नाव मला कधी पुसून टाकता येणार नाही आणि तो पापाचा डाग तसाच राहील! त्यापेक्षा असे केले तर बरे होईल की मी स्वतःच एका न्यायाधीशापुढे जाऊन उभे राहावे आणि सर्व हकीकत त्याला सांगावी आणि त्याला सांगावे की तू मला फाशीची शिक्षा दे. यामुळे माझे नाव तरी पुसले जाईल आणि मला शांती मिळेल! असा विचार करून मी स्वतः न्यायालयात जाण्याचे ठरविले! पण मी न्यायालयात गेलो नाही कारण जर मी न्यायालयात गेलो तर लोक मला हसतील आणि म्हणतील की हा मेला--हा खुनी आहे आणि तो लोकांचे तोंड पाहाण्यास समर्थ नसल्यामुळे न्यायालयात आला आहे. शेवटी मी शांत बसून विचार केला की आपण स्वतः न्यायालयात न जाता, आपण असे काही करावे, ज्यामुळे पोलिसांना माझी खरी हकीकत कळेल आणि ते मला पकडतील! या एका उपायाने मला बरे वाटले आणि मी या उपायाचा अवलंब केला. असा विचार करून मी शांत बसलो. तोच मला समोरून एक लहान मुलगा येताना दिसला. त्याला पाहून माझ्या मनातील पापी विचार जागा झाला. मी त्याला पकडून विचारले की, तू कोठे चालला आहेस? त्याने सांगितले की, मी घरी चाललो आहे. मी म्हटले, "तू घरी का जातोस?" त्याने सांगितले, "माझी आई वाट पाहात आहे म्हणून मी घरी चाललो आहे." यावर मी त्याला म्हटले, "तू घरी जाऊ नकोस--माझ्याबरोबर चल." त्या मुलाने नकार दिला, पण मी त्याला सोडले नाही. शेवटी त्या मुलाने मला शिवी दिली आणि जोराने ओरडू लागला. त्याबरोबर मी त्याचा गळा आवळला आणि तो जागीच ठार झाला! नंतर मी त्या मुलाच्या प्रेताची विल्हेवाट लावली. याप्रमाणे मी दुसरा खून केला आणि नंतर मला पश्चात्ताप झाला. आता मला वाटू लागले की, आपण या जगात राहण्यास योग्य नाही. मी आता मरणारच! मला आता कोणीही सोडवू शकत नाही. मी स्वतःच स्वतःला मारून घेतो आणि या जगातील सर्व पापातून मुक्त होतो! शेवटी मी असा निश्चय केला की, आपण विष खाऊन मरून जावे! याप्रमाणे मी विष खाल्ले पण त्या विषाचा माझ्या शरीरावर काहीच परिणाम झाला नाही! आता मला काय करावे ते सुचेना! मी घरात गेलो, दार लावून घेतले आणि विचार करू लागलो की, आपण आता काय करावे? विचार करता करता मला झोप लागली. सकाळी उठून पाहतो तो दारावर कोणीतरी थाप मारीत असल्याचे ऐकू आले. मी दार उघडले आणि पाहतो तो पोलिस दारात उभे होते! पोलिसांनी मला अटक केली आणि मी सुटकेचा निःश्वास सोडला. मला फाशीची शिक्षा झाली आणि मी आता मरणार! मला फाशीची शिक्षा झाल्याचे ऐकून, ती तरुणी ओरडली आणि म्हणाली, देवा, हे काय झाले? तो तरुण पुढे म्हणाला, "बाई, शांत राहा, घाबरू नका. तुम्ही आता सुखरूप आहात. त्या दुष्टाला योग्य ती शिक्षा झाली आहे. चला, आपण आपल्या घरी जाऊ."

सुनो ! हम विश्वास पूर्वक कहते कहते थक गये कि भगवान सदा प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ रहते तथा हमारी सहायता तो करो, पर सम्भवतः विश्वास नहीं होता। जरा सोचो हमारे जीवन निर्वाह की चिन्ता स्वयं भगवान को ही करनी पड़ती है। अन्यथा हम असहाय होकर क्या कर सकते हैं। हमारा जन्म, पालन-पोषण भी एक ऐसा कार्य है, जिससे यह स्पष्ट पता लग जाता है कि ईश्वर ही प्रत्यक्ष होकर यह सब कार्य करते हैं। अतः अविश्वास का प्रश्न केवल एक बात बता दीजिये कि जब आपका जन्म हुआ तो क्या आप स्वयं ही उपस्थित हो गये, या आपके लिए भोजन पानी हवा आदि की सब प्रकार पहले प्रबंध था। अथवा किसी बात की कमी थी। यदि यह सब कुछ सत्य है, और निश्चित सत्य है। भगवान का यह सब प्रत्यक्ष रूप से आपके जीवन निर्वाह में सहयोग था तो क्या अब उन्होंने अपना सहयोग देना बन्द कर दिया, जो इस तरह भयभीत रहते हो? वास्तव में यह केवल आपकी अज्ञानता का ही प्रमाण है, जो अपने भगवान सम्बन्धी विचार, ज्ञान को विकसित करने की चेष्टा नहीं करते। जीवन व्यतीत करते-करते भी, यदि हम प्रभु की ओर अपनी दृष्टि रखें, भगवान्‌ सदा ही हमारे साथ हैं। वे हमारे लिए सब कुछ करते हुए भी कभी अहङ्कार नहीं करते। बस, यह देखना है कि प्रभु का ही आधार है। यह भाव मन में बैठाने का प्रयत्न करना ही जीवन का ध्येय है। भगवान पर विश्वास न रहने का फल ही यह है कि मनुष्य अपनी भलाई ! अपने विचार भगवान्‌ ओर ही समर्पित कर नियमित रूप से ध्यान करें। तब उस समय का वातावरण स्वयं ही पवित्र हो जायेगा, सो भी ऐसा जिसका प्रभाव कभी नष्ट होनेवाला नहीं होता। इस प्रकार जब हम प्रभु के प्रति अपनी लगन को बढ़ाते रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे प्रति अपनी कृपा को बढ़ाते रहेंगे। अतः प्रभु का स्मरण सदा करना चाहिये। जिस प्रकार एक पतङ्गा अग्नि को देखकर, उसमें कूद पड़ता है। इस प्रकार की लगन यदि ईश्वर के साथ रखी जाये तो अवश्य ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। संसार के माया-जाल में फंसकर मनुष्य प्रभु से विमुख हो जाता है। जो कि ईश्वर के प्रति किये गये उपकार का फल उलटा देना है। ईश्वर ने यदि संसार बनाया तो हमें सहयोग देने के लिए, न कि अपने स्वरूप को भूल जाने के लिए। अतएव, भगवान्‌ सदा हमारे साथ रहते हैं, इस पर विश्वास न होना ही मनुष्य की भारी भूल है। जब कभी भी संकट आये, तब यही समझें, 'भगवान्‌ ही परीक्षा ले रहे हैं।' प्रभु की लगन ही ईश्वर से मिला सकती है। इस प्रकार प्रभु से सम्बन्धित हो कर विचार करने पर मालूम होगा कि भगवान्‌ से तो हमारा नित्य का नाता है, जिस का कभी वियोग नहीं हो सकता। इस प्रकार यदि प्रभु का चिन्तन किया जाये तो हम निश्चय ही पाप-कर्मों से छूट सकते हैं। जब प्रभु हमारे साथ हर समय है तो परमात्मा का ध्यान सदा बना रहना चाहिये। ईश्वर सर्वव्यापी है। यह जानकर जब इस बात का निश्चय हो जाता है तो प्रभु के प्रति लगन बढ़ती है। जो कुछ इस संसार में दिखाई देता है, वस्तुतः वह सब उस शक्ति-सम्पन्न का चमत्कार मात्र ही तो है। प्रभु की कृपा से ही ज्ञान का प्रकाश होता है। यदि प्रभु की कृपा न होती, तो हम अज्ञान के अन्धकार में भटकते रहते। अतः प्रभु के प्रति लगन ही हमारा जीवन ध्येय होना चाहिये। हमें सदा इस बात का विचार रखना चाहिये, कि यह संसार नाशवान्‌ है। प्रभु ही नित्य- स्वरूप है। जो सदा हमारे कल्याण के लिए तत्पर रहता है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के पश्चात् मनुष्य के मन में शंकायें उत्पन्न नहीं होतीं। ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान्‌ है। ईश्वर सब जगह व्याप्त है, उसका न आदि है न अन्त, परमात्मा सदैव ही विद्यमान रहता है। प्रभु के दर्शन करने का साधन केवल प्रेम है। ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना होना ही प्रभु-दर्शन का कारण बनता है। मनुष्य केवल प्रभु की शरण में जाने पर, प्रभु के प्रति समर्पित होकर ही प्रभु को पा सकता है। इस प्रकार जब भगवान्‌ की कृपा से मनुष्य का संशय दूर हो जाता है, तो फिर शंका कैसी? वह तो प्रेम में डूब जाता है। प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम का फल यह होता है कि प्रभु को कभी भी नहीं भूला जा सकता। प्रभु-दर्शन से बढ़कर संसार में और कोई आनन्द नहीं हो सकता। प्रभु-दर्शन पाकर मनुष्य कृत-कृत्य हो जाता है। ईश्वर के प्रति इस प्रकार की निष्ठा रखने वाले भक्त का जीवन ही सफल है। भक्त, भगवान्‌ का दास बन जाता है।

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इस बात का फैसला, स्वामी राम और राम महाराज ने, दोनों संप्रदायों की उपस्थिति निर्णय पत्र लिख लिखा करके कर न्यायालय से भी प्रमाणित करवा कर ही तय कर दिया गया, जिससे कि भविष्य कभी कोई विवाद या द्वन्द न खड़ा हो सके, पर हां जी, यह तय हो जाने पश्चात् भी श्री स्वामी जी के शिष्य, इन को अपना गुरू ही मानते व पूजते महाराज श्री मंगल-दास जी स्वयं जीवन पर्यन्त नित्य प्रति प्रात स्नान करने जाते, तब सर्वप्रथम् स्वामी शरण देवाचार्य महाराज की समाधि पर प्रणाम अवश्य ही किया करते और हर समय समाज में इन तीनो संतो व गुरु जी, का सम्मान समाज में ऐसा दिलाते कि जिससे किसीको संकोच या सन्देह न रहे, इसलिये संत, भक्तगण सब दोनों संतों सामान आदर देते, किन्तु अपनी निजी निष्ठा केवल महाराज श्री मंगल दासजी में, ही मानते कि जिनका शिष्यत्व उन लोगों ने स्वच्छा से स्वीकर व धारण किया था। पश्चात् स्वामी जी ने जो जो वचन ले या फरमा दिये थे, उनको हमेशा निभाते रहे। और अपनी निजी शक्ति व योग्यता के अनुसार हमेशा समाज हित का कार्य करते रहे। संतो भक्तों को नाम दान उपदेश दिया सो अलग रहा पर समाज कल्याण के हित में कार्य और बढ़ कर किया जिसके विषय में आगे हम पाठक को अवगत करा यहां पर हम जन साधारण पाठकों की समझ में आने हेतु यह भी व्यक्त कर देना उचित समझते हैं। कि जिस समय स्वामी शरण देवाचार्य जी महाराज नित्य लीला में लीन हुए उस समय समाधि पर जो जो सामान दिया गया था उस समय का, किसी कारण वश फोटो नहीं खींचा गया था। अतः यह सब सामान स्वामी जी को भेंट किया! ऐसा फोटो स्वामी शरणदेवा समाधि गद्दी व श्री संत! से भेट करा दिया गया व कैसा? अज्ञानता वश गलत प्रचार किया गया जिस पर पाठक ध्यान नदेवे। अब केवल आप को इस बात का पूर्ण निश्चय कर लेना चाहिये! स्वामी राम जी द्वारा जो कुछ किया गया सो केवल श्री राम द्वारा रचित विधान स्वरूप हुआ यह सब प्रभु की ही लीला थी सो सो ही सब हुआ स्वामी भगवान स्वरूप पूज्यपाद स्वामी शरण देवाचार्य जी महाराज का किसी भक्त विशेष से कोई द्वेष भाव? कभी नहीं हो सका न होना ही संभव रहा, क्योंकि उस समय सारा जगत ही, उनके लिये तो सिर्फ परमात्मा का ही रूप रहा, सिर्फ उस ही समय स्थिति को सम्भालने के लिये ही जो जो विधान हुआ होगा वही सबको मान्य रहा पर स्वामी श्री मंगल दास जी महाराज के हृदय में जो आदर, व सत्कार गुरु चरणो भगवान देवाचार्य महाराज प्रति सदैव रहा व उस पर अमल भी किया, तथा सत्कार स्वरूप अपने गद्दी पर हमेशा श्री स्वामी जी, महाराज की फोटोयुक्त तस्वीर रखी तथा उसे साक्षात स्वरूप समझ कर ही, रोज उस पर हार, धूप दीप व भोग नैवेद्य लगा कर सब को चरणामृत रूप में तो दिया, सो वर्तमान तक भी यह क्रम सब तरफ चालू चला आया देखा गया पर इसके विपरित भी क्या ऐसा सम्भव? हो सका यदि हम ऐसा कहे कि स्वामी मंगल दास जी को इस बात का तो पश्चाताप रहा होगा और प्रायश्चित रूप उन्होंने यह सब कुछ किया तो ऐसा सोचना कदापि भी सत्य रूप को नहीं प्रकट कर रहा बल्कि यह तो उनका हृदय स्वरूप भाव स्वतः प्रभु भक्ति रूपी उदार हृदय था! जो केवल आत्मिकभाव लिये ही था निष्ठा मन भाव स्वयं उनका अपना कर्तव्य समझ कर कर रहे थे न कि किसी के दबाव में अथवा किसी लोभ लालच में आकर ऐसा कर रहे थे; क्योंकि ऐसा करने से उनका जो लक्ष्य सदा निष्काम सेवा स्वरूप था, जिसे समाज के लिये आदर्श उप--देश, मिला यह बात भी निर्विवाद, सत्य है कि जो मनुष्य जैसा कार्य करेगा व पायेगा, जो जैसा बोयेगा वही फल पायेगा, दूसरा उस को नहीं ले जा सकता, यह बात तो केवल ही नहीं अपितु पूर्ण सत्य रूप में हम सब,मानव जाति पर लागू होती देखी जाती, जिसे कर्मफल कहा जाता है। इसलिए भी, यह तो तय रहा कि जन-हित में किया गया कार्य कभी निष्फल या अकारथ ही सिद्ध नहीं होता, देर भले ही लग जाय पर परिणाम तो रूप व अच्छा फल ही प्राप्त होता है जो समाज को देखकर सुखी हो, यह वास्तविकता ही सच है जो सदैव अमर रहने का रूप इस नश्वर जगत छोड़ स्वामी मंगल जी ने जो भी कुछ किया उसका भी फल उनको सुयश रूप में प्राप्त हुआ जिसका ही फल, आज सारा संसार देख रहा है, कि आज कोई ऐसा संत समाज या स्थान होगा जहां मंगल धाम, मंगल निकेतन, मंगल चिकित्सालय न बना देखा गया हो, जहां मरीजों को लाभ मिल रहा, असहाय जन लाभ उठा रहे हैं तो उन को, मंगल स्वरूप ही नजर आ रहा है। मानव के तन भगवान द्वारा दिये जाते, व मनुष्य को जन-कल्याण रूपी इस तन से व साधन का सद-उपयोग करके संत, भक्त जन, अपने नाम रोशन कर

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भाग 3 (पृष्ठ 41-60)

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कहना पड़ा होगा, हाँ, न्याय संगत अधिकार देने की बात कही जाय अथवा किया जाय तो वह बात सुन कर हँसेगा, सिर धुनने लगेगा या कान बन्द कर लेगा। जो प्रत्येक को रूप, रस, गन्ध स्पर्श! का ज्ञान, वाणी शक्ति से मुक्त कर दे? उसके बाद भी हम यह न सोच सकें तो, सो तो सो ही गये होंगे? हम तो सो गये, मगर वो जागा ही, जिस ने प्रत्येक को ज्ञान से भी वंचित कर डाला तथा यह न सोचे कि हम भी कभी जागेंगे? उठ कर खड़े तो नहीं होंगे? जब से उठ कर वो सब कुछ कर डाला जिसका परिणाम हम भोगते रहे, फिर भी हमारी अक्ल पर तो ताला लगा रहा, न तो हम ने अपने अस्तित्व को, न ही उस की राह को जाना जो समाज को, देश को आगे लेकर जाती है? वो लोग अधिकार दे या न दे मगर उनका तो फर्ज बनता था सो उन्होंने किया, हम लोग अपना फर्ज भूलते जीवन तो समाज का था, उस वक्त जिस प्रकार से अन्धविश्वास बढ़ ही गया था कि लोग या तो वो सब जानते नहीं थे, जिस कारण समाज से बहिष्कार या समाज निष्कासित कर दिये जाने का भय बना रहता, क्योंकि बहुत सारे अत्याचार तो केवल इसी, से डर कर लोग सहन कर रहे थे, उस वक्त उन लोगों क्या वो अधिकार था? क्या वो समाज से बहिष्कृत नहीं हो रहे? वो अकेले पड़ गये थे मगर वो, उस वक्त वो समाज से बहिष्कार को नहीं, अपने विचार प्रवाह को ज्यादा महत्व दे रहे थे? हालांकि समाज से ही तो वो सब डर रहे थे, सो जन-जागृति का बिगुल, समाज को ही जगा कर तथा समाज के ही लोगों को जगाकर बताया गया कि वो जो कर रहे हैं, वो सब सो रहे हैं! जब जगाया जा रहा, उनकी राह सरल की जाती हो तो, वो सो ही रहे हैं! जाग जाओ, इस प्रकार के संदेश जन तक लोग पहुंचाते रहे, मगर उस अन्धविश्वास को, उस वक्त समाप्त कर पाना बड़ा कठिन दायित्व! उस वक्त निर्वहन किया गया! जो प्रकाश उन के द्वारा इन लोगों को मिला वो लोग प्रकाश को प्रकाशित तो कर सके, पर अन्धकारमय उस राह को जिसे समाज पर थोपकर यह दिखाया जा रहा था सब कुछ, अन्धविश्वास से ग्रसित हो समाज के ही लोग कर रहे थे। इस से बड़ा क्या होगा, कि लोग अपने हक अधिकार को पहचान नहीं, उस वक्त पा रहे! वो प्रकाश उन के ही अन्धकारमय के उस स्वरूप को सामने लाया, जो केवल अपने लाभ के लिये ऐसा किया जा रहा था अथवा सो सोचा जा रहा था! वो लोग समाज सुधारक बन कर सामने तो आये, समाज की बहुत सारी ऐसी प्रथाओं को तो दूर कर सके! उस काल में भी लोग, सब के अन्धविश्वास से मुक्त तो नहीं मगर कुछ तो थे जो उन सब बातों को जान चुके थे, इस लिये समाज को एक रोशनी मिली तो प्रकाश फैलता गया, जब रोशनी से राह को देखा गया, तो लोगों समझ कर उस राह को अपनाया जिस कारण आज हम सब कुछ बन सके हैं। यदि हम समाज के लिये कुछ-कुछ भी कर पाते हैं तो उस विचार को तो माना ही जा रहा है। जिसकी शुरुआत उन लोगों ने की, क्या विचार वो सब था? हालांकि! उस का स्वरूप, वो आज तो नहीं? जो सब हम देख रहे हैं, वो स्वरूप तो आज का नहीं? वक्त के साथ बदल गया सब। मगर सच, क्या हमारा समाज आज-कल सही की तरफ जा रहा है? कुछ लोग आज भी तो अन्धविश्वास अथवा अंध विश्वास फैलाकर, तथा अंधविश्वासी बनाकर ही समाज को दिशा-हीन तो नहीं कर रहे? कुछ लोग तो ऐसा कर ही रहे हैं, अन्धविश्वास को अपनाकर हम उन लोगों को बढ़ावा दे सकते हैं अन्यथा नहीं! उस वक्त के, स्वरूप से तो वर्तमान का रूप सही नहीं, अंधविश्वास केवल रूप तो बदल गया मगर उस स्वरूप को सब लोग आज भी नहीं समझ पा रहे हैं कि क्या है और क्या नहीं! हालांकि वो ही, इस बात को नहीं मान कर अपनी राह बना रहे होंगे। वो, उन बातों को छोड़ कर आगे बढ़ रहे तो उनका तो कल्याण हो ही गया, पर जो अन्धविश्वास के साथ आगे बढ़ा होगा, 43