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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

२४८ पद्मावत। शाह आय चितोरगढ़ बाजां । हस्ती सहसबीस सँगगाजा ॥ उनई आय दोउ दल गाजे । हिन्दू तुरुक दोउसमें बाजे ॥ दोउसमुंद्रदधि उदधि अपारा । दोनों मेरु खंखड पहारा ॥ कोप जो झार दुहूँदिश मेली । औ हस्ती हस्तहिं सो पेली ॥ आंकुश चमक बीज असवाजहिं। गरर्जाहंहस्तिमेघजनुगाजहिं ॥ दो० धर्ती स्वर्ग दोऊ दल, जूझहिं ऊपर जूझ । कोई टरै न टारै, दोनों वज्र समूह ॥ खण्डपैंतीसवां सुलह राजा और वादशाह ॥ हस्तिंहि साँहस्ती हठगाजहिं । जनु परवत परवतसोंबाजांहं ॥ कोउ गयंद न टारें टरहीं । टूटहिं दांत मूँड़ गिरंपरहीं ॥ परबतआय जो परहिं तराहीं । दलं महँ चांपखेहँ मिलजाहीं ॥ कोइ हस्ती असवारहिं लेहीं । सूँड़ समेट पांय तर देहीं ॥ कोइ असवारसिंह दै मारहिं । हन मस्तक सों सूँड़ उतारहिं ॥ गैब गयंदैं तनगगनें पसीजा । रुधिरे चले धर्ती सबभीजा ॥ कोइ मैमत सँभारहिं नाहीं । तबजाने जब गुदशिरेंखाहीं ॥ दो० गगन रुधिर जसवरसे, धर्तीभीज मिलाय । शिरधरटूटंबिलाहिंतस, पानी वेगेँ विलाय ॥ उठो बज्रजूझे जस सुना । तेहिंते अधिकै भयो चौगुना ॥ बाजहिं खङ्ग उठी डर आगी । भुइँजर चही स्वर्ग कहँ लागी ॥ चमकहिं बीज होय उजियारा । जेहि शिरपरै होय दुइ फारा ॥ सेनमेघ अस दुहुँदिशि गाजा । खङ्गजोबीजबीजें असवाजा ॥ पहुंचा १ हाथी २-६-७-८ बराबर ३ समुद्र दही का ४ पहाड़ ५ फ़ौज ६ धूर १० शेर ११ गरूर १२ हाथी १३ आसमान १४-२१ खून १५ भेजा शिरका १६ जल्द १७ भारी लड़ाई १८ बहुत १९ तलवार २० वादल सी फ़ौज २२ बिजुली २३ ॥

पद्मावत । २४६ बरसहिं सेल बान होय कांदों । जस बरसै सावन औ भादों ॥ लपटहिं कोप परहिं तरवारी । औ गोला ओला जस भारी ॥ जूझै बीर लिखौं कहँ ताई । लै अप्सरै १ कैलास सिधाई ॥ दो० स्वामि काज जो जूझै, सोइगये मुख रातै २। जो भागे संत छांड़ के, मँसिमुखचढ़ैबरातै ॥ भा संग्राम नभा अस काऊ । लोहे दुहुँदिशि भयो अगाऊ ॥ कन्दहि कोदहिपुरं भुँइँपरे। रुधिरसलिलैं'होय सायर भरे ॥ आनंद व्याह करै मसखावा । अभभख जन्मजनमकहँ पावा॥ चौंसठ योगिन खप्पर पूरा । बुकेंजम्बुकै घर बाजहिं तूरा ॥ गृद्ध चील्ह सब मण्डपछावहिं । काककलोलकरहिंऔगावहिं॥ आज शाहहठभैनी बिवाही । पाई भुक्ति जैसि मनचाही ॥ जेहिं जस मांसू अखा परावा । तस तेहिकर लै औरहिं खावा॥ दो० काहू साथ न तनको, सकत मुवे सब पोष । ओछे १५ पूरजू जानत, जो नहिंआवतजोष ॥ चांद न टरै सूर सो कोपा । दूसरि छत्र सौहिं १७ के रोपा ॥ सुना शाह अस भयो समूहा । पेले सब हस्तिनें के जूहा ॥ आज चन्द्र तोर करौं निपांतूं । रहै न जगमहँ दूसर द्यूतू ॥ सहसें किरन होय किरनपसारा। छेंका चांदे जहांलग तारा ॥ ढेरै लोहे दरपन भा आवा । घटघट जानों भोंचु देखावा ॥ बहु क्रोधित सेनों हलधाई । अगिन पहार जरत जनु आई ॥ इन्द्रलोक की परी १ गालिका २ लाल ३ सियाही ४ ईश्वरके सामने ५ लड़ाई ६ तलवार की विजुली से बहुत लोग ज़मीन में गिरे ७ पानी ८ ता- लाव ९ भेड़िया १० सियार ११ फ़ौज १२-२३-२५खुराक १३ तनसाथ नहींजाता चाहे मोटा हो १४ ओछा पेटफरता-जोदाना है अन्दाज़ रखता १५ सूर्य्य १६सा- मने १७ गुस्सा १८ हाथी १६ नाश २० हज़ार २१ तथा राजा २२ तलवार २४ ॥

२५० पद्मावत । खड्गैं बीज सब तुर्क उठाई । ओड़नें चन्दकमल करैं पाई ॥ दो० जग मग अनी देखके, धाय दृष्टि तेहि लाग । छुवे होय जो लोहे, माझँ आव तेहि आग॥ सूरजेँ देख चांद मन लाजा । विकसतैंकमलकुमुदँ भाराजा॥ पहिलहिचन्दआवनिशिपँाई। दिनदिनेरै सो कौन बड़ाई ॥ अह्रै जो नखतचांदसँग तपी। सूरे की दृष्टिगगनैमँहँ छिपी ॥ की चिंता राजा मन बूझा । जेहिसो स्वर्ग न धर्तीजूझा ॥ गढ़पति उत्तरलड़े नहिं धाई। हाथपरें गढ़ हाथ पराई ॥ गढ़पतिइन्द्रगगनगढ़ काजा । दिवसे न निसरइँनिकरराजा॥ चन्द्रसयनिरहिनखतहिंमांझा । सूर्य्यनसौंहि होयचहिसांझा॥ दो० देखा चन्द्र भोर भा, सूरज के बड़ भाग । चांदफिराभागढ़पति, सूर्य्यगगनगढ़लाग ॥ कटकैं असूझअलवलशाही । आवत कोइ न सँभारै ताही ॥ उदह समुद्र जस लहरे देखी । नयनदेख मुखजाय नलेखी ॥ केते बजावत उतरे घाटी । केते बजावत मिलगये माटी ॥ केतेहिं नितहिं देइनवसाजा। कबहुँ न साज घटै तस राजा ॥ लाखजाहिँआवहिंनवलाखा । फरै भरै उपैनी नइशाखा ॥ जो आवै गढ़ लागै सोई । थिर है रहै न पावै कोई ॥ उमर अमीर रहे जहँ ताई । सबही वांट अलंगै पाई ॥ दो० लाग कटकैं चारहुँ दिशि, गढ़सोपराइकदाहुँ । सूर्य्यगहन भा चांदहिं, चांदभयोजसराहु ॥ सूर्य्य १-११-१२ ढाल २-हाथ ३ फ़ौज ४-१६-२५ निगाह ५ बीच ६ तथा बादशाह ७ खिलना ८ कोकविली ६ रात १०-१७ नज़र १३ आस- मान १४-१५ दिन १६ सामने १८ दरिया आगका २० हमेशा २१ पैदा होना २२ क़िला तथा दुनिया २३-हद २४-आग २६ तथा राजा २७ ॥

पद्मावत । २५१ अथवादिवसैं सूरै भा बासा। परीरयैनि शंशिउवा अकासा॥ चांद छत्रै दय बैठो आय। चहुँदिश नखत दीन्ह छिटकाय॥ नखत अकाशा हिं चढ़े दिपाई। ततत लूका परहिं बुझाई॥ परहिं सेल जसपरहिं विजाँगी। पहर्नहिं पहन वाज उठआगी॥ गोला पर गोला ढरकावहिं। खून करत चारहुँ दिशि आवहिं॥ उनई घटा वर्ष भर लाई। ओला टपकैं परे बुझाई॥ तुरकन मुख फेरैं गढ़ लागी। एक मरे दूसर होय आगी॥ दो० नृपति बार्न सनमुख परहिं, सकै न कोई गाँढ़। उनई शाह सेनें सब, रही भोर लग ठाढ़॥ भयो विहान भानुं पुनि चढ़ा। सहसैं किरन जैसो विधि १४ गढ़ा॥ भा धावा गढ़ लीन्ह गरेरी। कोपा कटकै लाग चहुँफेरी॥ बान करोर एक मुख छूटहिं। बाजैहिं जहाँ फोकल हि फूटहिं॥ नखत गगने जस देखे घने। तस गढ़ फाटहिं बानहिं हने॥ बानवेध साही किये राखा। गढ़ भा गरुड़ फुलावै पांखा॥ उड़गाकीरै कठिने हियवाला। तोपै लहैं होय मुखराताँ॥ पीठ दीन्ह तेहिं बानहिं लागे। चांपत जाहिं पगहिं पग आगे॥ दो० चार पहर दिन जूझ भा, गढ़ न टूट तस बांक। गरू होत पै आवै, दिन दिन नाकहिं नाक॥ छैका कोट जोर अस कीन्हा। घुसा नगर सुरंग तहँ दीन्हा॥ गरगंजे बांध कमाँनै धरीं। बज्र अगिन मुख दारू भरीं॥ हवशी रूमी और फिरङ्गी। बड़ बड़ गुनी और तेहिसङ्गी॥ ... दिन १ सूर्य २ रात ३ चांद ४ तथा रतनसेन ५ गोला ६ आग ७ पत्थर ८ राजा के तीर ६ सामने १० फ़ौज ११-१५ सूर्य १२ हज़ार १३ ईश्वर १४ पहुँचना १५ आसमान १७ राजा के हवास को तोता उड़ गया १८ मुश्किल १६ मुँह लाल २० घेरा क़िला २१ मरहला २२ तोपें २३॥

२५२ | पद्मावत । जेहिकी ज्योति जाहिं उपराहीं । जहँ ताकहिं चूकहिं तहँ नाहीं ॥ अष्टधात के गोला छूटहिं । गिरि पहाड़ चून होय फूटहिं ॥ इकवारहिं सब छूटहिं गोला । गरजै गगनं धर्तिसबडोला ॥ फूटे कोटँ फूट जनु शीला । उड़हिं बुर्ज जायँ सब पीसा ॥ दो० लंका रावटै जस भई, दाह पड़ा गढ़ सोय । रावणभालेंजोजरलिखो, कहुकिमअजरसोहोय॥ राजाकेर लाग गढ़ धुई । फूटे जहां सँवारहि सोई ॥ बांकी वरसहिं वानकै फेरइ । रातहिं कोट चित्र कै लेइ ॥ गाजे गगनं चढ़ा जस मेघा । वरसहिं वज्र सलिलको ठेघा ॥ सौसौ मनकें वरसहिं गोला । वरसहिं टपकतीरजसचोला ॥ जानहु परी स्वर्ग हत गाजाँ । फाटी धर्ति आय जो नाजाँ ॥ गरगजें चूर चूर होय परहीं । हस्तिं घोर मानुप संहरहीं ॥ सबहिं कहा अब परलै आवा । धर्ती स्वर्ग जूझ तस लावा ॥ दो० उठो वज्र सनमुख जरे, होय इक डङ्गोईं लाग । जगत जरै चारहुँदिशा, कोरे बुझावै आग ॥ तबहूँ राजा हिये १७ न हारा । राजपँवैरै १८ पर रचा अखारा ॥ सौहें शाह कर बैठक जहां । सामहिं नाच करावै तहां ॥ जंत्रपखावजं २० आदिजोबाजा । सुरैमन्दिर २१ खावै २२ भलसाजा ॥ बीनें २३ निपातककमायजें २४ गहे । बाजउमरेंती २५ अति कहकहे ॥ चंगें २६ उपंगें २७ नाँदें २८ सुरै २९ तूरा । सुहैरं ३१ बंसै ३२ बाजे भल तूरों ॥ आसमान १-७ क़िला २ राख ३ माथा ४ ढांक बनानेवाला ५ तसवीर ६ कड़े पत्थर के गोले ८ आसमान से बिजुली गिरी ६ पहुँचना १० मर- हता ११ हाथी १२ मरना १३ क़यामत १४ पत्थर १५ इक तरफ़ा १६ दिल १७ खास महल १८ सामने १६ नाम बाजा २०-२१-२२-२३-२४-२५-२६- २७-२८-२६-३०-३१-३२ ॥

पद्मावत । २५३ हुडुकैबाज डफैबाज गँभीरा । औ बाजहिं भलझाँझमँजीरा ॥ तन्त वितन्त शुश्रैं घनतारा । बाजहिं शब्द होय झनकारा ॥ दो० जग शृंगार मनमोहन, पातुर नाचहिं पांच । बादशाह गढ़ छेंका, राजा भूला नाच ॥ बीजा नगर केर सब गुनी । करहिं अलाप बुद्धि चौगुनी ॥ प्रथमँ रागभैरौँ ६ तेहि कीन्हा । दूसरे मालकोसँ पुनि लीन्हा ॥ रागहिंडोलँ सो तिसरे गाई । चौथे मेघ मलार सोहाई ॥ पँचयें शिरी १० राग भलाकिया । छठयें दीपकै उठा बरदिया ॥ छह्रो राग गाये भल गुनी । औ गाई छत्तिस रागिनी ॥ ऊपर भई सो पुतली नाचहिं । तर भये तुर्क कमानैं खाँचहिं ॥ काढ़ा माथा घुमरौँ झुमरा । तर भये देख मीर औ उमरा ॥ दो० सुनसुन शीशैंधुनहिं सब, करमलिमलिपछिताहिं । कब हम हाथ चढ़हिं यहि, कै तब यहदुखजाहिं ॥ छह्रों राग गावैं पातुरैंनी । पुनि तेहिकीन्ह लियेरागिनी ॥ भाकल्यानें कान्हरौ कीन्हीं । रागविहागै किदारौ लीन्हीं ॥ ललितैं बँगलाँ गीतहिंसोई । आसाँवरी भयो सब कोई ॥ धनाशिरी २४ सोहो २५ सोकीन्हीं । भयोबिलावलै मारूँ लीन्हीं ॥ रामकली २६ गुनकली सोहाई । सारँग औ विभासैं मुँहआई ॥ नितमलौरै जौ मिला सुनाई । श्यामै गूजरी पुनि भलगाई ॥ पुरैवी औ देसाखै कुरारी । ३४ तोड़ी ३५ गौड ३६ सोभईनिरारी ॥ दो० गौरी ३७ गौराँ तरवनै, सिद्ध अलापहिं ऊँच । .नामबाजा १-२-३ मोटे बहुत तार ४ पहिले ५ नाम राग ६-७-८-६- १०-११ मुसलमानलोग तोपें मारते थे १२ जिसने राजा की फ़ौजसे शिर निकाला वह वहीं रहा १३ शिर १४ हाथ १५ तवायफ़ १६ नाम राग रागिनी १७ से ४० तक ॥

२५४ पद्मावत । तहां तीर कहँ पहुँचहिं, दृष्टि जहां न पहुँच ॥ पातुरिन नाच दीन्ह जो पीठी। पड़गइसोंहैं शाहकी दीठी¹ ॥ देखत शाह सिंहासन गूँजा। कवल गमिर्गचन्द्र² तेहि मूँजा ॥ छांड़हि बान जाहिं उपराहीं। गर्व केर शिर सदा तराहीं ॥ बोलत बान लाख भा ऊंचा। कोई कोट कोई पौंवरैं सो पहुँचा ॥ जहांगीर कन्नौज का राजा। वहक बान पातुरिके लागा ॥ बाजाँ बान जांघ जस नाचा। जिवगा स्वर्ग पराभुइँ सांचा ॥ उड़सों नाच नचिनया मारा। रहँसे तुर्क बाज कै तारा ॥ दो० जो गढ़ साज़हि लाखदश, कोटि सँवारहिं कोट। बादशाह जब चाहैं, बनै न एको ओट ॥ राजैं पौंवेरैं अकास चलाई। पैरों बाँध चहुँफेर ललाई ॥ सेतबन्धे जस राघव बाँधा। परा फेर भुइँ भार न कांधा ॥ हनुमत है सब लाग गुहारा। आवहिं चहुँदिशि चले पहारा ॥ श्वेत फटकैं जस लागे गढ़ा। बांध उठाय चहूँ गढ़ मढ़ा ॥ खंड खंड ऊपर होय पटाऊ। चित्रै अनेक अनेक कटाऊ ॥ सीढ़ी होत जाहिं बहु भांती। जहां चढ़े हस्तिर्न की पांती ॥ भाग रगर्ज कस कहत न आवा। जनहुँ उठाय गगन लै लावा ॥ दो० राहु लाग जस चांदहि, गढ़ लागा तस बांध। सब धड़ लील ठाढ़भा, रहा जाय गढ़ कांध ॥ राजसभा सब मन्त्री बैठी। देखन जाय मुन्दभइ दीठी¹ ॥ उठा बांध तस सब गढ़ बांधा। कीजे बेगेँ² भार जस कांधा ॥ निगाह १-३-२१ सामने २ हिरन का बच्चा ४ गरूर ५ क़िला ६ दरवाज़ा ७ पहुँचा ८ आसमान ६-२० मौक़ूफ़ १० खुश ११ फ़ौज से बादशाह की तोपें चलीं १२ राजा के क़िला में भूँचाल पड़ा १३ पुल १४ श्रीरामचन्द्रजी १५ सफ़ेद पत्थर १६ तसवीर १७ हाथी १८ मरहला १६ जल्द २२ ॥

पद्मावत । २५५ उपजी आग आग जस बोई । अब मतैं छीन आननहिं होई ॥ भा त्योहार जो चांचर जोरी । खेल फाग अब लाई होरी ॥ समन्द फागमेलैं शिर धूरी । कीन्ह जो शाकाँ चाही पूरी ॥ चन्दन अगर मलयगिरि काढ़ा । घर घर कीन्ह सरौ रच ठाढ़ा ॥ जून्हरें कहँ साजा रनवासू । जेहिंसतहियें कहां तेहिआंसू ॥ दो० पुरुषन खड्गँ सँवारी चन्दन खौरीं देह । मेहरिनि सेंदुर मेला चहहिं भई जर खेहँ ॥ आठ वरष गढ़ छेंका रहा । धन सुलतान कि राजामहा ॥ आय शाह अँवरेंउँ जोलाई । फरे झरे पै गढ़ नहिं पाई ॥ हठ जोरी तब जून्हर होई । पद्मिनी पावन मिन्नतें सोई ॥ यहि बिधि ढील दीन्ह तबताई । देहली की अरदाँसैं आई ॥ पछम हरवें दीन्ह जो पीठी । सो अब चढ़ा सौंहैं कैदीठी ॥ जेहिमुइँमाथगगनें शिरलागा । थाने उठे आवसब भागा ॥ वहां शाँहँ चितोरगढ़ छावा । यहां देश अब भयो परावा ॥ दो० परत दृष्टि जेहि पंथै में, बाढ़ा वेर बबूर । निशि अँधियारीजायतब, वेगैं उठै जो सूरै ॥ सुनाशाह अरदासँ जो पढ़ी । चिन्ता आन आनचिंतचढ़ी ॥ तब आगो मन चीते कोई । जो आपन चेता कुछ होई ॥ मन झूठा जिव हाथ पराई । चिन्ता एक भई दुइ ठाई ॥ गढ़ सो उरझ जाय तब छूटा । होय मिलाव कि सोगढ़ टूटा ॥ डरपोक १ फागखेलों २ बहादुरी ३ चिता ४ मौत ५ दिल ६ मर्दों ने तलवारली ७ औरत ८ खाक ९ चारा १० शाह समझा कि वे मरे ११ मुश- किल १२ अरज़ी १३नाममुलुक १४ सामने १५ आसमान १६ अलाउद्दीन १७ निगाह १८ राह १६ रात २० जल्द २१ सूर्य २२ अरज़दास्त २३ ॥

यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

२५६ पद्मावत । पाहने कर रंबि पाहन हीरा । वेधों ३ रतन पान दै बीरा ॥ सुरजों सेतें कहा यहि भेजै । पलट जाहु अब मानहु सेऊ ॥ कहु तोसों पद्मिन ना लेऊँ । जो राकंहि छांड़ गढ़ देऊँ ॥ दो० आपन देशखाहु निहचलें, और चंदेरी ८ लेहु । समुद्र समन्दर्तन कीन्ह तोहि, ते पांचोनग देहु ॥ सुरजा पलट सिहें चढ़गाजा । आज्ञौ जाय कही जहँ राजा ॥ अबहूँ हिये १२ समभरे राजा । वादशाह सो जूझन छाजा ॥ जाकर देहिरी पृथ्बी सेई । चहै तो मारे औ जिव लेई ॥ पिंजर महँ तू लीन्ह परेवों । गढैंपति सोत्राचै के सेव्यौ ॥ जवलग जीभ अहे मुखतोरे । सँवर उघेल विनय करजोरे ॥ पुनि जो जीभ पकड़ जिवलेई । को खोले को बोलै देई ॥ आगे जस हमीर मैसन्ती । जो तस करेसि तोर भायन्ती ॥ दो० देख काल्ह गढ़ टूटे, राज वही कर होय । कर सेवा शिरनाय के, घरन घाल बुधि खोय ॥ सुरजों जस हमीर मनताका । और निवाही आपनशाकों ॥ वह अस हौं शकवँन्दी नाहीं । हौं सो भोजँ विक्रमै उपराहीं ॥ बरस सात महँ अन्न न खांगौं । पानि पहारचुवै बिन मांगा ॥ तेहि ऊपर जो पै गढ़ टूटा । सत शंकवँन्दी केर न छूटा ॥ सोरह लाख कुँवर हैं मोरे । पतँग परहिं जस दीप अँजोरे २७ ॥ जेहि दिन चांचर वाहों जोरी । समँदो २८ फागमेल के होरी ॥ पत्थर १ सूर्य २ मारडालना ३ नाम पहलवान ४-६ भेद ५ मुलाक़ात ६ यक़ीन ७ नाम मुल्क ८ तोहफ़ा ६ शेर १० हुक्म ११ दिल १२ जानवर प- रिन्द १३ क़िलादार १४ ख़िदमत १५ ताबेदारी १६ नामराजा १७-२०- २३-२४ अहङ्कारी १८ बहादुरी २१ बहादुर २२-२६ कमी २५ रोशनी २७ फागखेलों २८ ॥

पद्मावत । ३५७ दैके दर्शन जो राखत जीउ। सोकसे आवहिंभोसकपीउ ॥ दो० अबहूँ जून्हरै साँजके, कीन्ह चहूँ उजियार। होरी खेलों रन कठिन, कोउन समेटहिद्वारै ॥ अन राजा सो जरै नियानों। बादशाह की सेवै न माना ॥ बहुताहिंग्रसगढ्कीन्हसँजोना। अंत भई लंका जस रवना ॥ जेहि दिन वह छैके गढ़घाटी। होय अब ओही दिन माटी॥ तू जानेसि जल चुवै पहारू। वह रोवै मन सँवर संहारू ॥ सोतंहि सोत ऐस गढ़ रोवा। कस होइहै जो होइहै धुवा ॥ सँवर पहाड़ सो ढारै आंसू। पै तोहि सूझ न आपन नाशू ॥ आज काल्ह चाहे गढ़ टूटा। अबहुँ मान जो चाहस छूटा ॥ दो० है जो पाँच नग तोसों, लै पांचों कर भेंट। मरुँ सो एकगुन मानै, सब औगुनकर मेट॥ अन सुरजा को भेदे पारा। बादशाह बड़ अहै हमारा ॥ औगुन मेट सकहि पुनि सोई। औजो कीन्ह चहै सो होई ॥ नग पांचों का देउँ भँडारों। इसकन्दर सो वाचै दारों ॥ जो यह वचन तुहिं माथे मोरे। सेवैं करों ठाढ़ करें जोरे ॥ पै बिन सेसैं न असमनमाना। सत बोल बाचोंपरमाना ॥ कीन्हजो गुरुँलीन्हजगभारू। तेहिक बोल नहिं टरै पहारू॥ नायन मांझ भँवर इत ग्रीवा। सुरजहिं कहां सुन्द भईजीवा॥ दो० सुरजैं सतकीन्ह छल, बैनहिं मीठी मीठ । राजा कर मन माना, मानी तुरत बसीठं ॥ .. क्या किसी को मुँह दिखावेंगे १ मौत २ राख ३ आखिर ४ खिदमत ५- १३ नाश ६ सूराख ७ शायद ८ सच है ६ खज़ाना १० नाम बादशाह ११-१२ हाथ १४ क़सम १५ मज़बूत १६ भारी १७ नामपहलवान १८ वात १६ क़ासिद २०॥

२५८ पद्मावत । हंस कनकें¹ पींजर हत आना । औ अमृतनग² परसपषानाँ³ ॥ और सुनों⁴ सोने की डांडी । शार्दूलैं रूपेकी कांडी ॥ दीन्ह बसीठ सुरजा लै आई । बादशाह पहँ आन मिलाई ॥ ऐ जग सूर⁵ भूँमि उजियारी । विनतीकरहिकागर्मसिकारी⁶ ॥ बड़ परताप तोर जग तपा । नवों खण्ड तुहिंके न छिपा ॥ कोहंबोह दोनों तोहि पाहां । मारोसि धूप जियावसिछाहां ॥ जनमनसूर⁹ चांदे¹⁰ सो रूसों¹¹ । गहनैं¹² गिरासा पड़ा मँजूसों¹³ ॥ दो० भोर होय जो लागै, उठै रोरे¹५ किये काग । मसि¹६ छूटैसबश्यैनि की, कागोंजायँअभाग ॥ कर बिनती आज्ञाँ असपाई । कागहिंसे आपहिंमसिलैआई ॥ पहिले धनुष नवै जबै लागी । काग न लेइदेख सुरभागी ॥ अबहूँ तेहिसुर साँहैं²¹ न होहीं । देखहिंधनुपचलहिंफिरओहीं ॥ तेहि कागहिंकी कौन बसीठी । जो मुख फेर चलहिंदैपीठी ॥ जो सरसाँहैं होहिं संग्रामी । कितबकँ होतश्वेत²⁶ वैश्यामा ॥ करहिं न आपन ऊजर केशाँ²⁸ । फिरफिर कहहिं परारसँदेशा ॥ काग नाग पै दोनों बांकी । अपैंनीचलतश्यामभयआंकी ॥ दो० मेटजाय नहिं मसि कबहुँ, भये श्याम वे अङ्ग । सहसैं बार जो धोवहू, तहू न मेट कलङ्क³³ ॥ सोना १ पारसपत्थर २ हाविन्ददस्ता ३ लाल शेर ४ पिंजरा ५-१४ सूर्य ६ ज़मीन ७ काला कौआ तथा राजा ८ गुस्सा-मेहरवानी ६ सूर्य तथा बादशाह १० तथा राजा ११ गुस्सा १२ पकड़ाहुआ १३ हाज़िर १५ सियाही १६-२०-३१ रात १७ कौआ की सियाही दूर होजायगी १८ हुक्म १६ निशानेपर २१ देवता २२ मुक़ाबिल २३ वकालत २४ सामने २५ लड़ाई २६ बगुला २७ सफ़ेद २८ बाल २६ आपही काले होते ३० हज़ार ३२ ऐब ३३ ॥

पद्मावत। २५६ अब सेवाँ जो आय जोहारी । अबहूँ देख श्वेते कहिकारी ॥ कहो जाय जो सांचन डरना । जहवांशरणनाहिंतहँ मरना ॥ काल्ह आव गढ़ ऊपर भानू । जो दै धनुषै साँह हिय बानू ॥ पान बसीठे मया कर पाई । लीन्ह पान राजा पहँ आई ॥ जस हम भेंट कीन्ह गा कोहूं । सेवा मांझ प्रीति अरु छोहू ॥ काल्ह शाह गढ़ देखे आवा । सेवा करहु जैसो मनभावा ॥ गुनें सोच लैसो वोहितें बोझा । जहँवां धनुषबान तहँ सूझा ॥ दो० भा आयसु अस राजघर, बेगींकरो रसोय । तस सँभार रस मिलवहु, जेहि सुप्रीतिरसहोय॥ खण्ड पैंतीसवां ज्याफत बादशाह ॥ लागे मेढ़ा बड़ औ छोटी । घरघर आनी जहँजहँ मोटी ॥ हिरनरोझे लगनीं बनवसी । चंत्र कोन लाखे औसेंसी ॥ तीतर बटई लवा न वाची । सारसगुंजें पुछारे जोनाची ॥ धरी परेवाँ पांडुकें हेरी । केंहा कँदरो उतरें बगेरी ॥ हारल चरजें आय दन्दपरे । बन कंकरी जलकंकरी धरे ॥ चकई चकवा केंपें बिदारे । नकटों लेदी सोन सलौरे ॥ मोट बड़े सब टोइ टोइ धरे । ऊनर दूबर खडगें न चढ़े ॥ दो० कंठपरी जब झूरी, रक्त छुरा होय आस । कित आपन तनपोषी, भखा परावा मांस ॥ धरे मच्छ पढ़ना औ रोहू । धीमर धरतकरै नहिं छोहूं ॥ खिदमत १-६ सफ़ेद २ पनाह ३ सूर्य ४ कमान तीरधरदे ५ क़ासिद ६ गुस्सा ७ मेहरबानी ८ रस्सी १० नांच ११ हुक्म १२ जल्द १३ चकरा १४ पाढ़ा १५ नांम जानवर १६ से ३४ तक । तलवार ३५ पालना ३६ दया ३७ ॥

५. देवपाल युद्ध, महारानी पद्मिनी का जौहर व उपसंहार

२६० पद्मावत । संधे सुगंधे घरे जल बाँढ़े। टेंगर्ने मुंवे टॊय सब काढ़े॥ सींग मंगोर बीन सब घरे। पतरों बहुतवांब बनगंरे॥ मारेचरैके चाहैं परहाँसी। जलतज कहां जायजलवासी॥ मनहोय मीनैं चरा सुखचारा। परा जाल को दुख निरवारा॥ माटी खाय मच्छ नहिं बाची। बाचहिं काहभोग सुखनाची॥ मारे कहँ सब अस कै पाले। को उबार तेहि सरवैरै घाले॥ दो० यहि दुख कंतहिं १६ सारकी, अगमनरक्त न देह। पंथैं भुलाय आयजलपाछे, छूटे जगत सनेह॥ देखत गोहूँ कर हिय फाटा। आनी तहां होय जेहि आटा॥ तब पीसै जब पहिले धोय। कांपर छान माड़ै भल होय॥ करलें चढ़ाहि तेहि पाकहिंपूरी। मूठी मांझ रहै सौ जोरी॥ जानहु तैसे श्वेते अरु उजरी। नयनूचाहिअधिकवहकुँदेरी॥ मुख मेलतखन जाहिं बिलाई। सहसैं स्वाद सो पावजोखाई॥ लुचई पोय पोय घिव भेई। पाछे चहन खांड़ सो जेई॥ पूरी सुहारी करे घिव चुवा। छुवत बिलायडरहिं को छुवा॥ दो० कही न जाय मिठाई, कहत मीठ सत बांत। खात अघात न कोई, हेबरै जाय सिरात॥ रींधे चावल बरन न जाहीं। बरन बरनैं सबसुगँधबसाहीं॥ रायभोगै औ काजरै रानी। झिनवाँ रुदवाँ दाउदखानी॥ कपूरे काटकंजेरी रतनौरी। मधुकरैं ढेलौं जीरौं सारी॥ क़िस्म जानवर दरियायी १ से १३ तक । मछली १४ तालाव १५ खां- विन्द न मुख डालके पहिलेसे खून बदन में नरक्खा १६ राह भूलके पानी में फंसे झूठी दुनिया की मुहब्बत में १७ रोटी १८ कराही १६ गर्म २० सफ़ेद २१ मुलायम २२ हज़ार २३ बर्फ़ २४ तरहबतरह २५ क़िस्म चावल २६ से ३६ तक॥

पद्मावत। ३६१ घोखांड़ो औ कुँवरें विरासू। रामदासैं आवै अतिबासू ॥ कही सो सोंधी लाची बाकी। सुगंधी बगरी बरहन पाकी ॥ कड़हन चढ़हन बंदे मनमिला। औसंसार तिलक खँडवलो॥ राजहंसैं औौर हंसी भोरी। रूपें मंजरी औगुनें गोरी ॥ दो० सोरह सहसँ बरनअस, सुगंध बासना छूट। मधुकैरं पहुपँ सुजानके, आयपरे सब टूट ॥ निरमलै मास अनूप वघारा। तेहिके अब बरनो परकारौ ॥ कटवां घटवां मिला सो वासू। सीझा आनो भांति गिरासू ॥ बहुती सोंधी घृतहि वघारा। औ तहँ कँडुँहि पीस उतारां ॥ सेंधा लोन परा सब हांडी। काटी कन्दमूलै की आंड़ी ॥ सोवा सौंफ उतारहिं धनियाँ। तेहितेअधिकंआवबासनियाँ ॥ पानि उतारहिं ताकहं ताका। घृत परेह रहा तस पाका ॥ औौर लीन्ह मांसू के खांड़ा। लागे चढ़े सो बड़बड़ हांडा ॥ दो० छागर बहुत रामूची, धरी सराँगैंहि भूंज। जो अस जेवन जेवै, उठै सिंह अस गूंज ॥ भूज समोसा घी महँ काढ़े। लौंग मिर्च तेहि भीतर ठाढ़े ॥ औ जो मांस अनूप सो बांय। भयेफैरं फूलआंव औ भांय ॥ नारँग दाड़िमैं तुरंज जँभीरा। औ हिन्दवाना बालम खीरा ॥ कटहर बड़हर तेउ सँवारे। नारियल दाखैं खजूर छुहारे ॥ औ जानवन्त खचीचौं होहीं। जो जेहि वरन स्वादसोओहीं ॥ सिरका भेय काढ़ जनु आने। कमलजोभयेरहहिंबिकसौने ॥ क़िस्मचावल १ से १७ तक। हज़ार १८ भँवरा १६ फूल २० साफ़ २१ घेमानिन्द २२-२६ क़िस्म २३ केसर २४ अदरक व पियाज वगैरह २५ बहुत २६ लोहे की सीख २७ शेर २८ फल-फूल आंव और बैंगन मांसके बनायेगये ३० अनार ३१ अंगूर ३२ नाम मेवाफ़सली ३३ खिलना ३४ ॥

२६२ पद्मावत । कीन्ह मसूरो धनै सो रसोई। जो कछु सब मांसू सो होई ॥ दो० बौरी आय एकारी, लिये सबैकइ छह । सब रस लीन्ह रसोई, अब मोकहँ को पूछ ॥ काटी मच्छ मेल दँधि धोई। औ बघार चहुँ बार निचोई ॥ कड़वे तेल कीन्ह बसै वारू। मेथी घृतसों दीन्ह वघारू ॥ युक्त युक्त सब मच्छ उतारे। आंव चीर तेहिमाझँ उतारे ॥ औ परेहें तेहि चटपट राखा। सोरस सुरस पाव जो चाखा ॥ भांति भांति तहँ खांड़ा तरे। अंडा तल तल बीहड़ँ धरे ॥ कहँकहँ परा कपूर बसाई। लौंग मिरच तेहि ऊपर लाई ॥ घीवटांक महि सौध सिरावा। पंखें वघार कीन्ह अरदावो ॥ दो० घृत परेहें रहा तस, हाथ पहुँच लहि बोड़। बूढ़खाय नौयौवन, सौ मेहरी की ओड़ ॥ भांति भांति सीझी तरकारी। कयो भांति कुम्हड़े के फारी ॥ भइ भूँजी लौका परबती। रैता कीन्ह काटिकै रैती ॥ चूक लायके- रींधे भांटा। अरवी कहँ भलअरहेनें बांटा ॥ तुरइ चचेंड़े ढेढ़स तरे। जीर धुंगार मेल सब धरे ॥ परवर कुँदुरुं भूंजे ठाढ़े। बहुते घिव चुरचुरै के काढ़े ॥ कडुई काढ़ करेला काटे। अदरक मेल तरे के खोटे ॥ रींधे ठाढ़ सेवके फारे। छौंक साग पुनि सौंध उतारे ॥ दो० सीझी सबतरकारी, भा जेवन सब ऊँच। धौंका रुचै शाह कहँ, केहिपर दृष्टि पहुँच ॥

  • मसूरकी खिचड़ी १ पद्मावत २-३ दही ४ भूनना ५ बीच ६ इससब से ७ अलग ८ केसर ६ चिड़िया १० गलाना ११ बहुत घीडाला १२ कह- कश १३ तलना १४-१५ खटाई डाल के १६ तय्यार १७ निगाह १८ ॥

पद्मावत । २६३ घृत कराही भीतर परा । भांति भांति सब पाकहिंबरा ॥ एकहि आंदि मिर्च सों पीठी । औ जो दूध खांड़ सो मीठी ॥ भई मुंगौछै³ मिरचहिं परीं । कीन्ह मुंगौरौं औ करपॅरीं ॥ भई मिथौरीं सिरका परा । सोंठ लायके खरसों धरा ॥ मीठ महीव औ जीरा लावा । भीज बरा नैनू जनु खावा ॥ खण्डहि कीन्ह आंब चरपरा । लौंग इलाची सों खण्डबरा ॥ कढ़ी सँवारी और फुलौरी । औ खंडवानी लाय बरोरी¹⁰ ॥ दो० पान कतर छौके रुकौछ, हींग मिर्च औ आंदे । एक खण्ड जो खावै, पावै सहंसैं सवाद ॥ तहरी पाक बोनें औ गरी । परी चिरौंजी औ खरहॅरी ॥ औ घृत भूंज के पाका पेठा । भाअमृत करम्ब कर मीठौ ॥ चंबकैं लोहड़ा औटा खोवा । भा हलुवा घिवकरे निचोवा ॥ शिखरन सौंध छनाई काढ़ी । जामा दही दूध सों साढ़ी ॥ और दही के मुरंडाँ बांधे । औ संधानैं बहुभांती सांधे ॥ भइ जो मिठाई कही न जाई । मुख मेलतखन जाय बिलाई ॥ मतलईं झालैं और मरकोरी । माठ पेराकैं और बुंदोरी ॥ दो० फेनी पापर भूंजे, भय अनेक परकारै । भइजारेँ भिजियाबर, सीझी सब ज्योनार ॥ जेत प्रकार रसोई बखानी । तब भइ सबपानी सो सानी ॥ पानी मूलैं परेखो²⁴ कोई । पानी बिना स्वाद नहिं होई ॥ अमृतपान यहि अमृतआना । पानी सो घंट रहै पराना ॥ तरहबततरह १-२२ अदरक २-११ किस्मखाने की ३-४-५-६-६-१० पियाला ७ दही ८ हज़ार १२ नाममेवा १३-१४ शंकर का किवाम बनाके पकाया १५ लोहे की कराही १६ लाडू १७ अचार १८ किस्म मिठाई १६- २०-२१ खीर २३ जड़ २४ देखना २५ बदन २६ ॥

२६४ पद्मावत । पानी दूध सो पानी घीव । पानि घटे घट रहै न जीव ॥ पानी माँझे समानी ज्योती । पानी उपजैन माणिक मोती ॥ पानीमहँ सब निरमलं कला । पानी जोछुवै होय निरमला ॥ सो पानी मन गर्व न करई । शीश नाय घालें पै धरई ॥ दो० मुहम्मद नीर गंभीर जो, सो तेहि मिलहि समन्द । भरै ते भारी होरहे, लूछहिं वाजहिं द्वन्द ॥ सीझ रसोई भयो विहानू । गढ़ देखे गवने सुलतानु ॥ कमल सुहाय शूर सँग लीन्हा । राघव चेतन आगे कीन्हा ॥ ततखन आय बेवान जो पहुँचा । मनसाँ अधिक गगन से ऊँचा ॥ उघरी पँवरैं चला सुलतान् । जानहु चला गगन कहँ भानू ॥ पँवरी सात सात खण्ड वांके । सातों खण्ड गाढ़े दुइनाके ॥ आज पँवर मुख भा निरमरा । जो सुलतान आय पँगधरा ॥ जानु उरेह काट सब काढ़े । चित्रैं मूरतें विनवहिं ठाढ़े ॥ दो० लख लख बैठ पँवरियों, जेहिते नवहिं करोर । जेहिं सब पँवर उघारे, ठाढ़ भये कर जोर ॥ खण्ड अड़तीसवां किला वर्णन वादशाह ॥ सातों पँवरी कनक कैं केवारा । सातहुँ पर वाजहिं घरियारा ॥ सातहिं रंग सो सातों पँवरी । तब तहँ चढ़े फिरै नव भँवरी ॥ खंड खंड साज पलँग औ पीढ़ी । जानहु इन्द्रलोककी सीढ़ी ॥ चन्दन वृक्ष सुहाई छाहां । अमृत कुण्ड भरा तेहि माहां ॥ बदन १ चीज २ पैदा होना ३ जवाहऱात ४ पाकसाफ़ ५-६ ग़रूर ७ शिर ८ पानी ६ डोल १० बहादुर ११ नामभाट १२ तुरंत १३ हवादार १४ बहुत १५ आसमान १६-१८ दरवाज़ा १७ सूर्य्य १६ क़दम २० तसवीर २१ दरवान २२ हाथ २३ सोना २४ पेड़ २५ ॥

पद्मावत । २६५ फरे खजीजाँ दाड़िमें दाखौँ। जो वहं पंथै जाय सो चांखा ॥ कनकैकै छत्र सिंहासन साजा। पैठत पँवरें मिला लै राजा ॥ चढ़ाशाह चढ़ चितौर देखा। सब संसार पाँयँतर लेखा ॥ दो० देखा शाह गगनैं गढ़, इन्द्रलोक के साज। कहीराज फिरताकर, स्वर्ग करें जो राज ॥ चढ़ गढ़ ऊपर सङ्गत देखी। इन्द्रपुरी सो जान बिशेखी ॥ ताल तलावा सरवरें भरे। औअम्बरोंउँ चहुँदिशिफरे ॥ कुवां बावरी भांतिहि भांती। मढ़मएडप तहँतहँ बहुँपांती ॥ रॉयैं राग घरघर सुख चाऊ। कनकैमँदिरनगकीन्हजड़ाऊ॥ निशिनँ दिनबाजहिंमन्दिरतूरैं। रहसकूद सब लोग सेंदूरैं ॥ रतनैं पदारथ नग जो बखाने। घूरन महँ देखे अहिरानें ॥ मँदिर मँदिर फुलवारी बारी। बारबोरै तहँ चित्रैं सँवारी ॥ दो० पांसासोरैंकुँवरसबखेलांहिं, श्रवनैंहींगीतउनाहिं। चैन चाउ तस देखा, जनु गढ़ छेका नाहिं ॥ देखत शाह कीन्ह तहँ फेरा। जहाँ मंदिर पद्मावत केरा ॥ आसपास सरवरं चहुँ पासा। मँदिरमाँझेजनुलागअकासा॥ कनकैकै सँवार नगहिंसबजरा। गगनैंचन्द जनु नखतहिंभरा॥ सरवरैं चहुँदिशि पुरइनफूली। देखा बौंरि रहा मन भूली ॥ कुँवरिलाख दुइवार अँगौरे। दुहुँदिशि पँवरैं ठाढ़ करैंज़ोरे ॥ शारदूलैं दुहुँ दिशि गढ़काढें। कलकँजँहि जानहुँ रिसठाढ़े ॥ जानवन्त लिये चित्रैं कटाऊ। वहँतकपँवैरै सोलागजड़ाऊ ॥ नाममेवा १ अनार २ अंगूर ३ राह ४ सोना ५-१२-२२ दरवाज़ा ६- १६-२५-२७-३२ आसमान ७-८-२३ तालाब ९-२०-२४ बगीचा १० अमीरउमरा ११ रात १३ नामवाज़ा १४ जवाहिरात १५ तसवीर १७-३१ चौसर १८ मकान १६ चीज २१ पेशवाई २६ हाथ२८लाल शेर २६ डकारना ३०॥

२६६ पद्मावत । दो० शाह मंदिर अस देखा, जनु कैलास अनूपे । जाकर अस धौराहरं, सो रानी केहिरूप ॥ नांघत पौंवेरै गये खण्ड साता । सतयें भूमि बिम्बावन राताँ ॥ आंगन शाह ठाढ़भा आय । मंदिर छांह अति शीतल पाय ॥ चहूँ पास फुलवारी बारी । माझँ सिंहासन धरा सँवारी ॥ जनु वसन्त फूला सब सोने । हँसाहिं फूल विकसहिं फर लोने ॥ जहां जो ठांव दृष्टिमहँ आवा । दर्पण भाव दरश दिखरावा ॥ तहां पौंट राखा सुलतानी । बैठ शाह मन जहां सो रानी ॥ कमल सुभाय सूरै सों हँसा । सूरका मन चांदें पहँ बसा ॥ दो० सोपै जानै नयन रस, हिरदयँ प्रेम अँगूर । चन्द जो बसै चकोरचित, नयन हि आव न सूरै ॥ रानी धौराहरै उपराहीं । करहिं दृष्टि नहिं करहिं तराहीं ॥ सखी सरेखी १७ साथहिं बैठी । तपै सूर शशि आव न दीठी २० ॥ राजा सेव करै करें जोरे । आज शाह घर आवा मोरे ॥ नट नाटक पतुरनि औ बाजा । आय अखाड़ सबै महँ साजा ॥ प्रेमक लुब्धै बहिर औ अन्धा । नाच कूद जानहु सब धन्धा ॥ जानहु काठ नचावै कोई । जोजें नाच न परगटै होई ॥ परगट कहि राजा सों बाता । गुँसै प्रेम पद्मावत राताँ ॥ दो० गीत नाद जस धन्धा, दहकै विरह की आंच । मन की डोर लागत हँ ठाईं, जहां सो गँहि पुनि २ खांच ॥ बेमिसाल १ महल २-१५-१८ दरवाज़ा ३ ज़मीन ४ लाल ५-२५ ठंडा ६ बीचोबीच ७ खिलना ८ खूबसूरत ६ तख़्त १० सूर्य ११-१४-१८ तथा पद्मा- वत १२ दिल १३ निगाह १६-२० होशियार १७ चांद १६ हाथ २१ भरा- हुआ २२ ज़ाहिर २३ छिपा २४ जलना २६ पकड़ना २७ रस्सी २८ ॥

पद्मावत । २६७ गोरो बादल राजा पाहां। रावतैं दोऊ दोउ जनुबाहां ॥ आय श्रवणैं राजाके लागी। मूँसि न जाहिंपुरुषजो जागी ॥ बांचा पुरुषै तुर्क हम बूझा। परगटं मेरैं गुप्त छलं सूझा ॥ तुव नहिं करो तुर्क सो मेरूं। छलपै करहिं अंतके फेरू ॥ बेरी कठिनं कुटिलजसंकांटा। सोम कोपरहि जांरहि आटा ॥ शंभु कोटैं जो पाय अंगोटी। मीठी खांड़ जेंवाये रोटी ॥ हम सों ओछे कै पावा बातू। सूले गये सँग रहे न पातू ॥ दो० यहिसोकृष्ण बलराजजस, कीन्हचहै घरबांध। हम विचार अस आवहिं, मेरहिं दीजे न कांध॥ सुन राजा यहि बात न भाई। जहां मेर तहं नहिं असमाई ॥ मन्दहि भल जो करे भलसोई। अन्तहि भलाभली कर होई ॥ शत्रुँ जो विष दय चाहै मारा। दीजे नोन जान बिष सारा ॥ विष दीन्हें विषघर होय खाय। लोन देखहों लोन बिलाय ॥ मारै खड़ैंग खड़ग कर लिये। मारै लोन नाय शिर दिये ॥ कँवरों विषजो पण्डवनै दीन्हा। अन्तहिदांव पण्डवन लीन्हा॥ जो छल करै वही छलबाजाँ। जैसे सिंहँ मँजूषा साजा ॥ दो० राजैं लोन सुनाव्रा, लाग दोहों जस लोन । आयकुहाय मंदिर कहँ, सिंह जान औगोन ॥ नाममन्त्री १ सरदार २ कान ३ चोरी होजाना ४ क़ौल बादशाह ५ जा- हिर ६ मेल ७-१०-१७ छिपा ८ दग़ा ६ सख्त ११ दुश्मन १२-१८ क़िला १३ घेरना १४ तथा बादशाहको बे मुरव्वत पाया १५ जड़ १६ तलवार १६ दुर्योधन २० राजा युधिष्ठिर आदिक २१ पहुँचना २२ एक ब्राह्मण ने शेर को जो पिंजरे में बन्दथा निकाल लिया शेर ने उसको खाने चाहा उसने कहा कि भलाई के बदले बदी न करना चाहिये जब तकरार होनेलगी तब एक गीदड़ ने आके पंचायत की और कहा कि हम सूरत असली देखें तब फैसला करेंगे जब शेर पिंजरे में चलागया ब्राह्मणने खिड़की बन्द कर ली गीदड़ ने कहा कि ऐ ब्राह्मण अब घरजाउ यही फैसला है २३ ॥