भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

(२०४) पञ्चतन्त्रम् ।

(२०४) पञ्चतन्त्रम् ।

आता है, सो नहीं जानते कि, आज क्या वटनिवासी पक्षियोंका संक्षय होगा या नहीं" । इस प्रकार बहुत प्रकार विचार कर उसी क्षणमें लौटकर उस वटवृक्षपर जाकर सब पक्षियोसे बोला- "भो ! यह दुरात्मा लुब्धक जाल और चावल हाथमें लिये आता है, सो सब प्रकार इसका विश्वास मत करना यह जाल फैलाकर चावल बिखेरेगा । वे चावल तुम सब कालकूट विषकी समान जानना"। उसके ऐसा कहनेपर वह लुब्धक वटके तले आय जाल फैलाकर सिन्धुवारकी समान चावलोको बिखेरकर थोड़ी दूर जाकर एकान्तमें स्थित हुआ, तब वहां स्थित हुये वे पक्षी लघुपतनकके वाक्यरूपी अर्गलासे निवारित हुए उन चाव- लोको हलाहल विषके अंकुरोंकी समान देखते हुए एकान्तमें स्थित भये । इसी समय चित्रग्रीव नाम कपोतराजा सहस्रकुटुम्बके सहित प्राणयात्राके निमित्त घूमता हुआ उन चावलोंको दूरसेभी देखता हुआ लघुपतनकसे निवारित होकर भी जिह्वाके चंचलतासे भक्षणके लिये प्राप्त होकर परिवार सहित बन्धनमें पडा । अच्छा कहाभी है- जिह्वालौल्यप्रसक्तानां जलमध्यनिवासिनाम् । अचिन्तितो वधोऽज्ञानां मीनानामिव जायते ॥ ३ ॥ जिह्वाके लालचमें प्रसक्त हुए जलके मध्यमें रहनेवालों मच्छियोंकी समान अज्ञानियोंका अचिन्तित वध होता है ॥ ३ ॥ अथवा दैवप्रतिकूलतया भवति एवं, न तस्य दोषोऽस्ति । उक्तञ्च- अथवा दैवकी प्रतिकूलतासे ऐसा होता है उसका दोष नहीं है । कहा है- पौलस्त्यः कथमन्यदारहरणे दोषं न विज्ञातवान् रामेणापि कथं न हेमहरिणस्यासम्भवो लक्षितः । अक्षैश्चापि युधिष्ठिरेण सहस प्राप्तो ह्यनर्थः कथं प्रत्यासन्नविपत्तिमूढमनसां प्रायो मतिः क्षीयते ॥ ४ ॥ रावणने दूसरेकी स्त्रीके हरनेका दोष क्यों न जाना, रामचन्द्रने सुवर्णके हरिणकी असंभवता क्यों न जानी, युधिष्ठिरने अक्षोंके खेलनेसे एक साथ अनर्थ क्यों न जाना, प्रायः विपत्ति आनेसे मूढमन होजाने वालोंकी बुद्धि क्षीण होजाती है ॥ ४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२०५) तथाच- और देखो- कृतान्तपाशबद्धानां दैवोपहतचेतसाम् । बुद्धयः कुब्जगामिन्यो भवन्ति महतामपि ॥ ५ ॥ कृतान्त पाशमे बंधे हुए, दैवसे हतचित्त, महत्पुरुषोकी बुद्धिभी कुटिलगा- मिनी होजाती है ॥ ५ ॥ अत्रान्तरे लुब्धकस्तान् बद्धान् विज्ञाय प्रहृष्टमनाः प्रोद्यत- यष्टिः तद्वधार्थं प्रधावितः । चित्रग्रीवोऽपि आत्मानं सपरि- वारं बद्धं मत्वा लुब्धकमायान्तं दृष्ट्वा तान् कपोतानूचे- "अहो ! न भेतव्यम् । उक्तञ्च- इस अवसरमें वह लुब्धक उनको बँधा हुआ जानकर प्रसन्न मन लकडी उठाये हुए उनके वधके निमित्त धावमान हुआ, चित्रग्रीवभी अपनेको बँधा हुआ और लुब्धकको आया हुआ देखकर उन कबूतरोंसे बोला,-"भो ! डरना न चाहिये। कहा है- व्यसनेष्वेव सर्वेषु यस्य बुद्धिर्न हीयते । स तेषां पारमभ्येति तत्प्रभावादसंशयम् ॥ ६ ॥ सब प्रकारके व्यसन प्राप्त होनेमें जिसकी बुद्धि हीन नहीं होती है उसके प्रभावसे वह निःसन्देह उसके पार होजाता है ॥ ६ ॥ सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता । उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥ ७ ॥ सम्पत्ति और विपत्तिमें महात्मा एकरूप रहते हैं सूर्य उदय और अस्तमेंभी लाल रहता है ॥ ७ ॥ तत्सर्वे वयं हेलया उड्डीय सपाशजाला अस्य अदर्शनं गत्वा मुक्तिं प्राप्नुमः, नो चेद्भयविक्लवाः सन्तो हेलया समु- त्पातं न करिष्यथ, ततो मृत्युमवाप्स्यथ । उक्तञ्च- सो हम सब लीलासेही उडकर पाशजाल सहित इसके अदर्शनको प्राप्त होकर छूटें । और नहीं तो भयसे व्याकुल हो लीलासेही न उडोगे तो मृत्युको प्राप्त होगे। कहाहै-

( २०६ ) पश्चतन्त्रम् ।

( २०६ ) पश्चतन्त्रम् । तन्तवोऽप्यायता नित्यं तन्तवो बहुलाः समाः । बहून्बहुत्वादायासात्सहन्तीत्युपमा सताम् ॥ ८ ॥” तन्तुभी नित्य विस्तीर्ण हैं और बहुतसे तुल्यरूप तन्तु बहुतसे परिश्रमोंको सहन कर लेते हैं, यही महात्माओंकी उपमा है ॥ ८ ॥” तथानुष्ठिते लुब्धको जालमादाय आकाशे गच्छतां तेषां पृष्ठतो भूमिस्थोऽपि पर्य्यधावत । तत ऊर्द्धाननः श्लोक- मेनमपठत्– वैसा करने पर वह लुब्धक जालको लेकर आकाशमें जाते हुए उनके पीछे पृथ्वीमें स्थित हुआभी धावमान हुआ। और ऊपरको मुखकर यह श्लोक पढ़ने लगा- जालमादाय गच्छन्ति संहताः पक्षिणोऽप्यमी । यावच्च विवदिष्यन्ते पतिष्यन्ति न संशयः ॥ ९ ॥ मिले हुए यह पक्षी मेरे जालको लेकर उड़ते हैं और जब पतित होंगे तब सब मेरे वशमें हो जांयगे ॥ ९ ॥ लघुपतनकोऽपि प्राणयात्राक्रियां त्यक्त्वा किमत्र भविष्य- तीति कुतूहलात् तत्पृष्ठलग्नोऽनुसरति । अथ दृष्टेरगोचरतां गतान् विज्ञाय लुब्धको निराशः श्लोकमपठन् निवृत्तश्च । लघुपतनकभी आजीविकाको छोड़कर इसमें क्या होगा इस कुतूहलसे उसके पीछे लगा चला । तब उनके दृष्टिपथसे अतीत होनेपर उन्हें गया जानकर लुब्धक यह श्लोक पढता हुआ। निवृत्त हुआ– न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं प्रयत्नेन । करतलगतमपि नश्यति यस्य हि भवितव्यता नास्ति १०॥ “जो नहीं होनहार है वह नहीं होती जो होनहार है वह यत्नसे होतीही है जिसकी भावी ( होनहार ) नहीं है हाथमें स्थित हुआ भी वह पदार्थ नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥ तथाच– तैसेही पराङ्मुखे विधौ चेत्स्यात्कथञ्चिद्द्रविणोदयः । तत्ततोऽन्यदपि संगृह्य याति शंखनिधिर्यथा ॥ ११ ॥

तत्सर्वैरपि स्वस्थैर्गम्यतां महिलारोप्यस्य प्रागुत्तरदिग्भागे

भाषाटीकासमेतम् । (२०७) विधिके पराङ्मुख होनेमें किस प्रकार धनका उदय हो सकता है वह औरकोभी ग्रहण कर शंखनिधि ( न छिपाई ) की समान नष्ट हो जातीहै ॥११॥ तदास्तां तावत् विहङ्गामिषलोभो यावत् कुटुम्बवर्त्तनो- पायभूतं जालमपि मे नष्टम्” । चित्रग्रीवोऽपि लुब्धकमदर्श- नीभूतं ज्ञात्वा तानुवाच-“भो ! निवृत्तः स दुरात्मा लुब्धकः । तत्सर्वैरपि स्वस्थैर्गम्यतां महिलारोप्यस्य प्रागुत्तरदिग्भागे तत्र मम सुहृत् हिरण्यको नाम मूषकः सर्वेषां पाशच्छेदं करिष्यति । उक्तञ्च- पक्षियोंके मासका लोभ तो अलग रहा कुटुम्बकी आजीविकाका उपायभूत मेरा जालभी नष्ट हुआ” । चित्रग्रीवभी लुब्धकको नेत्रोंसे अलक्षित देखकर उनसे बोला,-“भो ! वह दुरात्मा लुब्धक निवृत्त हुआ । सो सब स्वस्थ होकर महिलारोप्यके उत्तर दिशाकी ओर चलो वहा, मेरा सुहृत् हिरण्यक नाम मूष- कराज सबके पाश छेदन करेगा । कहाहै- सर्वेषामेव मर्त्यानां व्यसने समुपस्थिते । वाङ्मात्रेणापि साहाय्यं मित्रादन्यो न सन्दधे ॥ १२ ॥” सम्पूर्ण मनुष्योंको व्यसन उपस्थित होनेमे वाणीमात्रकीभी सहायताको मित्रके विना कौन कर सकता है ॥ १२ ॥” एवं ते कपोताः चित्रग्रीवेण सम्बोधिताः महिलारोप्ये नगरे हिरण्यकबिलदुर्गं प्रापुः । हिरण्यकोऽपि सहस्रमुख- बिलदुर्गं प्रविष्टः सन् अकुतोभयः सुखेन आस्ते, अथवा साधु इदमुच्यते । इस प्रकार चित्रग्रीवसे कहे हुए वे कबूतर महिलारोप्य नगरमें हिरण्यकके बिलदुर्गको प्राप्त हुए । हिरण्यक भी सहस्र मुखके बिलदुर्गमें प्रविष्ट हुआ निर्भय सुखसे रहताथा । अथवा अच्छा कहाहै कि- अनागतं भयं दृष्ट्वा नीतिशास्त्रविशारदः । अवसन्मूषकस्तत्र कृत्वा शतमुखं बिलम् ॥ १३ ॥ वे आये हुए भयका देखनेवाला नीतिशास्त्रमें पंडित मूषिक सौ मुखका बिल बनाकर आनन्दसे रहताथा ॥ ३ ॥

( २०८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २०८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः । सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ १४ ॥ डाढसे रहित जैसे सर्प, मदसे हीन जैसे हाथी, इसी प्रकार दुर्गहीन राजा सबके वशीभूत हो जाताहै ॥ १४ ॥ तथाच- तैसेही- न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् । तत्कर्म सिध्यते राज्ञां दुर्गेणैकेन यद्रणे ॥ १५ ॥ न सहस्र हाथियोंसे न लाख घोड़ोंसे वह कार्य सिद्ध होता है जो युद्धमें एक किलेसे सिद्ध होताहै ॥ १५ ॥ शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः । तस्माद्दुर्गं प्रशंसन्ति नीतिशास्त्रविदो जनाः ॥ १६ ॥” किलेमें स्थित धनुषधारी एकही सौसे युद्धकर सकता है इस कारण नीति- शास्त्रके ज्ञाता दुर्गकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥” अथ चित्रग्रीवो बिलमासाद्य तारस्वरेण प्रोवाच-“भो भो मित्र हिरण्यक ! सत्वरमागच्छ । महती मे व्यसनावस्था वर्त्तते”। तच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि बिलदुर्गान्तर्गतः सन् प्रोवा- च,-“भोः ! को भवान् ? किमर्थमायातः ? किं कारणम् ? कीदृक् ते व्यसनावस्थानम् ? तत् कथ्यताम्”इति । तच्छ्रुत्वा चित्रग्रीव आह.-“भोः ! चित्रग्रीवो नाम कपोतराजोऽहं ते सुहृत् । तत् सत्वरमागच्छ गुरुतरं प्रयोजनमस्ति” । तत् आकर्ण्य पुलकिततनुः प्रहृष्टात्मा स्थिरमनाः त्वरमाणो नि- ष्क्रान्तः । अथवा साधु इदमुच्यते- तब चित्रग्रीव बिलके निकट जाय ऊंचे स्वरसे बोला,-“भो भो मित्र हिरण्यक ! शीघ्रआओ मुझे बड़ी कष्टकी अवस्था वर्तमान है” । यह सुनकर हिरण्यक भी बिलदुर्गमें प्राप्त हुआ ही बोला,-“भो आप कौन हो ? क्यों आये हो ? क्या कारण है ? कैसी तुमको विपत्ति है सो कहो”। यह सुनकर

भाषाटीकासमेतम् । (२०९) चित्रग्रीव बोला,-"भो ! चित्रग्रीव नामवाला कपोतोका राजा मैं तेरा सुहृद हू । सो शीघ्र आओ । मेरा बहुत बडा कार्य है"। यह सुनकर पुलका- यमान शरीर प्रसन्नात्मा स्थिर मन शीघ्रता करता हुआ निकला । अथवा यह अच्छा कहा है- सुहृदः स्नेहसम्पन्ना लोचनानन्ददायिनः । गृहे गृहवतां नित्यं नागच्छन्ति महात्मनाम् ॥ १७ ॥ सुहृत् (मित्र) स्नेहसे सम्पन्न नेत्रोके आनन्द देनेवाले महात्मा गृहस्थियोंके घरोमे नित्य नहीं आते हैं ॥ १७ ॥ आदित्यस्योदयं तात ताम्बूलं भारती कथा । इष्टा भार्या सुमित्रं च अपूर्वाणि दिने दिने ॥ १८ ॥ हे तात ! सूर्यका उदय, ताम्बूल, महाभारतकी कथा, इष्ट स्त्री, सुन्दर मित्र यह दिन दिन अपूर्वही होते हैं ॥ १८ ॥ सुहृदो भवने यस्य समागच्छन्ति नित्यशः । चित्ते च तस्य सौख्यस्य न किञ्चित्प्रतिमं सुखम् ॥ १९ ॥ जिसके घरमें नित्यही सुहृद् आते है उसके चित्तमे उसके बराबर और कुछ सुख नहीं है ॥ १९ ॥ अथ चित्रग्रीवं सपरिवारं पाशबद्धमालोक्य हिरण्यकः सविषादमिदमाह-“भोः किमेतत् ?” स आह-“भो ! जानन्नपि किं पृच्छसि ? उक्तञ्च यतः- तब चित्रग्रीवको परिवारसहित पाशमे बन्धा हुआ देखकर हिरण्यक विषाद- पूर्वक यह वचन बोला,-“भो ! यह क्या है ?” वह बोला,-“भो ! जानकर भी क्या पूछता है ? कहा है कि- यस्माच्च येन च यदा च यथा च यच्च यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म । तस्माच्च तेन च तदा च तथा च तच्च तावच्च तत्र च कृतान्तवशादुपैति ॥ २० ॥ १४

( २१० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २१० ) पञ्चतन्त्रम् । जिससे जिस करके जब जैसा जो जितना जहां शुभ अशुभ अपना कर्म किया है तिससे तिसकरके तब तैसा सो तितना तवतक तहाही कालकी प्रेर- णासे प्राप्त होता है ॥ २० ॥ तत् प्राप्तं मया एतद्बन्धनं जिह्वालौल्यात् । साम्प्रतं त्वं सत्वरं पाशविमोक्षं कुरु" । तदाकर्ण्य हिरण्यक आह- सो यह मुझे बन्धन जिह्वाकी चंचलतासे प्राप्त हुआ है, इस कारण तू शीघ्र पाश मोक्षण कर" । यह सुनकर हिरण्यक बोला- “अध्यर्द्धायोजनशतादामिषं वीक्षते खगः । सोऽपि पार्श्वस्थितं दैवाद्बन्धनं न च पश्यति ॥ २१ ॥ आधे (अधिक) १५० सो योजनसे जो पक्षी मांसको देखता है वहभी प्रारब्धसे निकट स्थित हुए बन्धको नहीं देखता है ॥ २१ ॥ तथाच- तैसेही- रविनिशाकरयोर्ग्रहपीडनं गजभुजङ्गविहंगमबन्धनम् । मतिमतां च निरीक्ष्य दरिद्रता॑ विधिरहो बलवानिति मे मतिः ॥ २२ ॥ सूर्य चन्द्रभी ग्रहसे पीडित होते हैं, हाथी सर्प पक्षि बन्धनमें पडते हैं, तथा बुद्धिमानोंको दरिद्र देखकर दैवही बलवान् है यह मेरी बुद्धि है ॥ २२ ॥ तथाच- औरभी- व्योमैकान्तविचारिणोऽपि विहगाः सम्प्राप्नुवन्त्यापदं बध्यन्ते निपुणैरगाधसलिलान्मीनाः समुद्रादपि । दुर्णीतं किमिहास्ति किं च सुकृतं कः स्थानलाभे गुणः कालः सर्वजनान्प्रसारितकरो गृह्णाति दूरादपि ॥ २३ ॥ एकान्त, आकाशमें विचरनेवाले पक्षीभी आपत्तिको प्राप्त होते हैं, चतुर पुरुषोंद्वारा अगाध जलवाले समुद्रसे मछलीभी बांध ली जाती हैं । इस संसारमें दुर्नेय क्या है ? सुकृत क्या है ? स्थान लाभमें भी क्या गुण है ? काल हाथ फैलाये हुए दूरसे सबको ग्रहण करता है ॥ २३ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२११) एवमुक्त्वा चित्रग्रीवस्य पाशं छेत्तुमुद्यतं स तमाह-"भद्र मा मैवं कुरु, प्रथमं मम भृत्यानां पाशच्छेदं कुरु तदनु ममापि च"। तच्छ्रुत्वा कुपितो हिरण्यकः प्राह-'भो ! न युक्तमुक्तं भवता यतः स्वामिनोऽनन्तरं भृत्याः"। स आह,- "भद्र ! मा मैवं वद, मदाश्रयाः सर्वे एते वराकाः, अपरं स्व- कुटुम्बं परित्यज्य समागताः । तत् कथमेतावन्मात्रमपि सम्मानं न करोति । उक्तञ्च- ऐसा कह चित्रग्रीवके पाश छेदन करनेको उद्यत हुए उससे बोला-"भद्र ! ऐसा मतकरो, पहले मेरे भृत्योंके पाश छेदन करो पीछे मेरे भी" यह सुन क्रोध कर हिरण्यक बोला-"भो ! आपने युक्त नहीं कहा कारण कि, स्वामीके अन- न्तर भृत्य होते हैं"। वह बोला-"भद्र ! ऐसा मत कहो यह सब क्षुद्र मेरे वशमें हैं और यह अपना कुटुम्ब त्याग कर मेरे साथ आये हैं । सो कैसे इत- नाभी इनका सन्मान न करूं। कहा है- यः सम्मानं सदा धत्ते भृत्यानां क्षितिपोऽधिकम् । वित्ताभावेऽपि तं दृष्ट्वा ते त्यजन्ति न कर्हिचित् ॥ २४ ॥ जो राजा भृत्योंका सदा अधिक सन्मान करता है वे धनके अभावमें भी उसको कभी त्यागन नहीं करते हैं ॥ २४ ॥ तथाच- और देखो- विश्वासः सम्पदां मूलं तेन यूथपतिर्गजः । सिंहो मृगाधिपत्येऽपि न मृगैः परिवार्यते ॥ २५ ॥ विश्वासही सम्पत्तियोंकी जड है इससेही हाथी यूथपति कहलाता है सिंह मृगाधिपति होकरभी मृगोंसे परिवारित नहीं होता है ॥ २५ ॥ अपरं मम कदाचित् पाशच्छेदं कुर्वतस्ते दन्तभंगो भवति अथवा दुरात्मा लुब्धकः समभ्येति । तत् नूनं मम नरकपात एव । उक्तञ्च- और फिर कदाचित् मेरे पाश छेदन करनेमें तेरे दात भग होजाय अथवा यह दुरात्मा लुब्धकही आजाय तो अवश्य मेरा नरकमें पतन होगा । कहा है-

(२१२) पञ्चतन्त्रम् ।

(२१२) पञ्चतन्त्रम् । सदाचारेषु भृत्येषु संसीदत्सु च यः प्रभुः । सुखी स्यान्नरकं याति परत्रेह च सीदति ॥ २६ ॥ जो प्रभु सदाचारवाले भृत्योंके दुःखी होनेमें सुखी होता है वह परलोकमें नरकको जाता और यहांभी दुःखी होता है ॥ २६ ॥ तच्छ्रुत्वा प्रहृष्टो हिरण्यकः प्राह-"भोः ! वेद्मि अहं राजधर्मम् । परं मया तव परीक्षा कृता । तत् सर्वेषां पूर्व पाशच्छेदं करिष्यामि । भवानपि अनेन विधिना बहुकपोतपरिवारो भविष्यति । उक्तञ्च- यह सुनकर प्रसन्न हो हिरण्यक बोला- "भो ! मैं राजधर्म जानता हूं परंतु मैंने तेरी परीक्षा की थी । सो पहले अन्य सबोंके पाश छेदन करूंगा, आपभी इस विधिसे बहुत कपोतके परिवारवाले होंगे । कहा है- कारुण्यं संविभागश्च यस्य भृत्येषु सर्वदा । सम्भवेत्स महीपालस्त्रैलोक्यस्यापि रक्षणे ॥ २७ ॥ जिसकी भृत्योंमें सदा करुणा समविभाग है वह राजा त्रिलोकीके रक्षण करनेमें भी समर्थ होता है ॥ २७ ॥ एवमुक्त्वा सर्वेषां पाशच्छेदं कृत्वा हिरण्यकःचित्रग्री- वमाह-"मित्र ! गम्यतामधुना स्वाश्रयं प्रति भूयोऽपि व्यसने प्राप्ते समागन्तव्यम्" । इति तान् संप्रेष्य पुन- रपि दुर्गं प्रविष्टः । चित्रग्रीवोऽपि सपरिवारः स्वाश्रयम गतत् । अथवा साधु इदमुच्यते- यह कह सबकेही पाश छेदन करके हिरण्यक चित्रग्रीवमे बोला-"मित्र ! अब अपने स्थानको पधारो फिरभी दुःखप्राप्तिमें आना," इस प्रकार उनको भेजकर अपने दुर्गमें प्रवेश करगया, चित्रग्रीवभी परिवारसहित अपने आश्रयको गया । अथवा यह सत्य कहा है- मित्रवान्साधयत्यर्थान्दुःसाध्यानपि वै यतः । तस्मान्मित्राणि कुर्वीत समानान्येव चात्मनः ॥ २८ ॥ मित्रवान् जिससे कि, कठिन कार्योंको साध लेते हैं इसकारण अपने समान मित्रोंको करना चाहिये ॥ २८ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२१३) लघुपतनकोऽपि वायसः सर्वं तं चित्रग्रीवबन्धमोक्ष- मवलोक्य विस्मितमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! बुद्धि- रस्य हिरण्यकस्य शक्तिश्च दुर्गसामग्री च तत् ईदृगेव विधिः विहंगानां बन्धनमोक्षात्मकः । अहं च न कस्यचित् विश्वसिमि चलप्रकृतिश्च । तथापि एनं मित्रं करोमि । उक्तञ्च- लघुपतनक कौआ सम्पूर्ण उस चित्रग्रीवके बन्ध मोक्षणको देख विस्मितमनसे विचार करने लगा, 'अहो ! इस हिरण्यककी बुद्धि शक्ति और दुर्गसामग्री देखो इस प्रकार बन्धन मोक्षात्मक विहगोंकी विधि देखो ? मैं किसीका विश्वास नहीं करता चंचलप्रकृति हूं । तो भी इसको मित्र करूंगा । कहा है- अपिसम्पूर्णतायुक्तैः कर्त्तव्याः सुहृदो बुधैः । नदीशः परिपूर्णोऽपि चन्द्रोदयमपेक्षते ॥ २९ ॥ सम्पूर्णता युक्त होकरभी पंडितोंको सुहृद बनाने चाहिये परिपूर्ण सागरभी चन्द्रोदयकी अपेक्षा करता है ॥ २९ ॥ एवं सम्प्रधार्य पादपादवतीर्य बिलद्वारमाश्रित्य चित्र- ग्रीववच्छब्देन हिरण्यकं समाहूतवान् । “एहि एहि भो हिरण्यक ! एहि” । तच्छब्दं श्रुत्वा हिरण्यको व्यचिन्तयत् । "किमन्योऽपि कश्चित् कपोतो बन्धनशेषस्तिष्ठति येन मां व्याहरति” । आह च,-“भोः को भवान् ?” स आह,-“अहं लघुपतनको नाम वायसः” । तत् श्रुत्वा विशेषादन्तर्लीनो हिरण्यक आह,-“भोः ! द्रुतं गम्यतां अस्मात् स्थानात्” वायस आह-"तव पार्श्वे गुरुकार्येण समागतः, तत् किं न क्रियते मया सह दर्शनम् ?” हिरण्यक आह,-“न मेऽस्ति त्वया सह सङ्गमेन प्रयोजनम्” इति । स आह, “भोः ! चित्र- ग्रीवस्य मया तव सकाशात् पाशमोक्षणं दृष्टं तेन मम महती प्रीतिः सञ्जाता । तत् कदाचित् ममापि बन्धने जाते तव पार्श्वात् मुक्तिर्भविष्यति । तत् क्रियतां मया सह मैत्री” । हिरण्यक आह.-“अहो ! त्वं भोक्ता । अहं ते भोज्यभूतः। तत्

( २१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

का त्वया सह मम मैत्री तत् गम्यतां, मैत्री विरोधभावात् कथम् ? उक्तञ्च- ऐसा विचार वृक्षसे उतर कर बिलके द्वारे आय चित्रग्रीवकी समान शब्द करके हिरण्यकको बुलाता हुआ "आओ २ भो हिरण्यक ! आओ"। उस शब्दको सुनकर हिरण्यक विचार करने लगा "क्या और कोई कबूतर बंधा रहगया, जिससे मुझे बुलाता है"। और बोला-"भो ! आप कौन हो ?" । वह बोला-"मैं लघुपतनक नाम काकहूं" । यह सुन अन्तर लीन होकर हिर- ण्यक बोला-"भो ! इस स्थानसे बहुत शीघ्र गमन करो" काक बोला,-"बड़े कार्यकेलिये तुम्हारे पास आया हू, फिर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते हो" । हिरण्यक बोला-"तुम्हारे साथ मिलनेसे मेरा कुछभी प्रयोजन नहीं है"। काक बोला,-"चित्रग्रीवका मैने तुमसे पाशमोक्षण देखा है उस कारण मुझको बड़ी प्रीति हुई है, सो कदाचित् मेरा बंधन होनेसे तुम्हारे निकटसे छुटकारा होगा, सो मेरे साथ मित्रता करो" । हिरण्यक बोला-"भो ! आश्चर्य है कि, तू मेरा भोजन करनेवाला और मैं तेरा भोज्य पदार्थ हूं । सो कैसी तुम्हारे साथ मेरी मित्रता ? सो जाओ विरोधभावसे मित्रता कैसी ? कहा है- ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् । तयोर्मैत्री विवाहश्च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ ३० ॥ जिनका समान धन, जिनका समान कुलहो उन्हीकी मित्रता और विवाह होना उचित है विरुद्धका नहीं ॥ ३० ॥ तथाच- और देखो- यो मित्रं कुरुते मूढ आत्मनोऽसदृशं कुधीः । हीनं वाप्यधिकं वापि हास्यतां यात्यसौ जनः ॥ ३१ ॥ जो मूढ कुबुद्धि अपने असदृश मित्रोंको करता है हीन वा अधिक करता: है वह हास्यताको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ · तत् गम्यताम्"इति । वायस आह,-"भो हिरण्यक ! एषोऽहं तव दुर्गद्वारे उपविष्टः । यदि त्वं मैत्रीं न करोषि ततोऽहं प्राणमोक्षणं तवाग्रे करिष्यामि । अथवा प्रायोपवे-

भाषाटीकासमेतम् । ( २१५ ) शनं मे स्यात्" इति । हिरण्यक आह-"भोः ! त्वया वैरिणा सह कथं मैत्रीं करोमि ? उक्तञ्च- .सो जाओ" कौआ बोला-"भो हिरण्यक ! यह मैं तुम्हारे बिलद्वारमें पडाहू । जो तुम मेरे साथ मित्रता न करोगे तो तुम्हारे आगे इसीक्षण प्राण त्यागन करूंगा । अथवा मेरा बैठना प्राण त्यागनेके लिये होगा," हिरण्यक बोला,- "भो ! तुझ वैरीके साथ मेरी कैसी मित्रता ? कहा है- वैरिणा न हि सन्दध्यात्सुश्लिष्टेनापि सन्धिना । सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ ३२ ॥" मनोहर और सन्धिकी इच्छा करनेवाले वैरीसे सन्धि न करे अच्छा तप्त पानीभी अग्निको शान्त करही देता है ॥ ३२ ॥" वायस आह,-"भोः! त्वया सह दर्शनमपि नास्ति । कुतो वैरं तत् किमनुचितं वदसि," हिरण्यक आह- "द्विविधं वैरं भवति सहजं कृत्रिमञ्च । तत् सहजवै- री त्वमस्माकम् । उक्तञ्च- काक बोला,-"तुम्हारे साथ दर्शनभी नहीं है वैर कैसे सो कैसे अनुचित कहतेहो" । हिरण्यक बोला,-"दो प्रकारका बेर होता है (एक सहज) स्वाभा- विक एक (कृत्रिम) कर्मसे किया, सो तुम हमारे स्वाभाविक बैरीहो । कहा है- कृत्रिमं नाशमभ्येति वैरं द्राक्कृत्रिमैर्गुणैः । प्राणदानं विना वैरं सहजं याति न क्षयम् ॥ ३३ ॥” कृत्रिम वैर झटही कृत्रिम गुणोंसे जाता रहता है स्वाभाविक वैर प्राणदानके विना नहीं जाता है ॥ ३३ ॥” वायस आह,-"भो! द्विविधस्य वैरस्य लक्षणं श्रोतु- मिच्छामि । तत् कथ्यताम्" । हिरण्यक आह,-'भोः! कारणे न निर्वृत्तं कृत्रिमम् । तत्तदर्होपकारकरणाद्गच्छ- ति । स्वाभाविकं पुनः कथमपि न गच्छति । तद्यथा नकुलसर्पाणां, शष्पभुङ्नखायुधानां, जलव ह्नेः -- दैत्यानां, सारमेयमार्जारणाम्, ईश्वरदरिद्राणां, सप-

( २१६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २१६ ) पञ्चतन्त्रम् । त्नीनां, लुब्धकहरिणानां, श्रोत्रियभ्रष्टक्रियाणां, मूर्ख- पण्डितानां, पतिव्रताकुलटानां, सज्जनदुर्जनानाम्। न कश्चित् केनापि व्यापादितः, तथापि प्राणान् सन्ता- पयन्ति । काक बोला-“भो ! दो प्रकारके बैरके लक्षण सुननेकी इच्छा करता हूं सो कहो” हिरण्यक बोला,-“भो ! जो कारणसे निष्पन्न होजाय वह कृत्रिम है उसके योग्य साधनोंसे वह निवृत्त हो जाता है । और स्वाभाविक फिर किसी प्रकारसे नहीं जाता है । सो जैसा न्योले सर्पका, तृणभोजी नखायुधोंका, जल अग्निका, देव दैत्योंका, कुत्ते बिल्लोका, महान् और दरिद्रीका, सौतोंका, लुब्धक हरिणोंका, वेदपाठी और भ्रष्ट क्रियावालोंका, मूर्ख पंडितोंका, पतिव्रता कुलटाओंका, सज्जन दुर्जनोंका । सो किसीको किसीने मार नहीं डाला तोभी प्राणोंको तो सन्ताप देते हैं । वायस आह,- कौआ बोला,- “कारणान्मित्रतां याति कारणादेति शत्रुताम् । तस्मान्मित्रत्वमेवात्र योज्यं वैरं न धीमता ॥ ३४ ॥ कारणसेही मित्र और कारणसेही शत्रु होजाता है इस कारण बुद्धिमान्‌को मित्रताही करनी चाहिये वैर नहीं ॥ ३४ ॥ तस्मात् कुरु मया सह समागमं मित्रधर्मार्थम् ।” हिरण्यक आह,-“भोः ! श्रूयतां नीतिसर्वस्वम्- इस कारण मेरे साथ मित्रधर्म अर्थात् मित्रता करो” हिरण्यक बोला,-“भो ! नीतिका सर्वस्व सुनो- सकृद्दुष्टमपीष्टं यः पुनः सन्धातुमिच्छति । स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ ३५ ॥ जो एकबारही दुष्ट हुए मित्रके साथ फिर सन्धिकी इच्छा करता है वह मृत्युको ही ग्रहण करता है जैसे गर्भको खच्चरी ॥ ३५ ॥ अथवा गुणवानहं न मे कश्चित् वैरियातनां करिष्यति एतदपि न सम्भाव्यम् । उक्तञ्च-

भाषाटीकासमेतम्। (२१७) अथवा मैं गुणवान्‌हूं मुझको वैर यातना कुछ नहीं करेगी यह सम्भावना न करनी। कहा है- सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिनेः मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम् । छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिंगलम् अज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः ॥३६॥” सिंहने व्याकरणके निर्माता पाणिनीके प्रिय प्राणोंको नष्ट किया और मीमां- साके बनानेवाले जैमिनि मुनिको सहसा हाथीने मार डाला और छन्दःशास्त्रके ज्ञाता पिंगलक ऋषिको सागरके किनारे नाकेने निगल लिया, अज्ञानसे आवृ- तचित्त अति क्रोधी कीटादिको गुणोंसे क्या प्रयोजन है ॥ ३६ ॥” वायस आह,-“अस्त्येतत तथापि श्रूयताम् । काक बोला,-यह तो योंही है तथापि सुनो- उपकाराच्च लोकानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां मैत्री स्याद्दर्शनात्सताम् ॥ ३७ ॥ उपकारसे लोकोंकी निमित्तसे मृगपक्षियोंकी, भय और लोभसे मूर्खोंकी और दर्शन करतेही सत्पुरुषोंकी मित्रता होती है ॥ ३७ ॥ मृद्घट इव सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति । सुजनस्तु कनकघट इव दुर्भेद्यः सुकरसन्धिश्च ॥ ३८ ॥ मट्टीके घटकी समान सुखसे तोडने योग्य और फिर जुडनेके अयोग्य दुर्जन होता है सुजन सोनेके घडेकी समान दुर्भेद्य और शीघ्र जुड जानेवाला हो- ता है ॥ ३८ ॥ इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि यथा रसविशेषः । तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानान्तु विपरीता ॥ ३९ ॥ ईखके अग्रभागमें क्रमसे जैसे रसविशेष होता जाता है इसी प्रकार सुजनों- की मित्रता होती है दुर्जनोंकी इसके विपरीत होती है ॥ ३९ ॥ तथाच- तैसेही- आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् ।

(२१८) पञ्चतन्त्रम् ।

(२१८) पञ्चतन्त्रम् । दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ॥ ४० ॥ प्रारम्भमें बहुत फिर क्रमसे न्यून, पहले थोडी क्रमसे बढती हुई दिनके पूर्वार्द्ध और परार्धसे भिन्न हुई छायाकी समान दुष्ट और भलोंकी मित्रता होती है॥४०॥ तत् साधुरहमपरं त्वां शपथादिभिर्निर्भयं करिष्यामि” । स आह,-“न मे अस्ति ते शपथैः प्रत्ययः । उक्तञ्च- सो मै साधु हूं और तुझको शपथादिसे निर्भय करूंगा" वह बोला,- "मुझे शपथका विश्वास नहीं है। कहाहै- शपथैः सन्धितस्यापि न विश्वासं व्रजेद्विपोः । श्रूयते शपथं कृत्वा वृत्रः शक्रेण सूदतः ॥ ४१ ॥ शपथसे सन्धिका प्राप्त हुए शत्रुके विश्वासमें न जाय सुना जाता है कि, शपथ करकेभी इन्द्रने वृत्रासुरको मार डाला ॥ ४१ ॥ न विश्वासं विना शत्रुुर्देवानापि सिद्धयति । विश्वासात्त्रिदशेन्द्रेण दितेर्गर्भो विदारितः ॥ ४२ ॥ विश्वासके बिना शत्रु देवताओंकोभी सिद्ध नहीं होता है, विश्वाससेही इन्द्रने दितिका गर्भ नष्ट करादिया ॥ ४२ ॥ अन्यच्च- औरभी- बृहस्पतेरपि प्राज्ञस्तस्मान्नैवात्र विश्वसेत् । य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यं च सुखानि च ॥ ४३ ॥ जो बुद्धिमान् अपनी बुद्धि, आयु और सुखकी इच्छा करे वह बृहस्पतिके विश्वासमेंभी न जाय ॥ ४३ ॥ तथाच- और देखो- सुसूक्ष्मेणापि रन्ध्रेण प्रविश्याभ्यन्तरं रिपुः । नाशयेच्च शनैः पश्चात्प्लवं सलिलपूरवत् ॥ ४४ ॥ शत्रु बहुत सूक्ष्ममार्गसे भीतर प्रवेश कर शनैः २ नाश करे जिस प्रकार जलका पूर शनैः २ भरकर नावको पूर्ण करता है ॥ ४४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२१९) न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ ४५ ॥ अविश्वासीका विश्वास न करे, विश्वासीकाभी बहुत विश्वास न करे, कारण कि, विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मूलसहित नष्ट कर देता है ॥ ४५ ॥ न बध्यते ह्यविश्वस्तो दुर्बलोऽपि बलोत्कटैः । विश्वस्ताश्चाशु बध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ॥ ४६ ॥ अविश्वासी दुर्बलकोभी बलवान् बली नहीं बाध सक्ता, विश्वासी बलवान्भी दुर्बलोंसे बाधलिये जाते हैं ॥ ४६ ॥ सुकृत्यं विष्णुगुप्तस्य मित्राप्तिर्भार्गवस्य च । बृहस्पतेरविश्वासो नीतिसन्धिश्चिधा स्थितः ॥ ४७ ॥ तीन प्रकारकी नीति सधी होती है चाणक्यका सम्यक् कार्यानुष्ठान करना, परशुरामका मित्रलाभ और बृहस्पतिका मत है विश्वास न करना यह तीन प्रकारकी नीतिसंधी है ॥ ४७ ॥ तथाच- तैसेही- महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु । भार्यासु सुविरक्तासु तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ४८ ॥" बडे अर्थसार परभी शत्रु का जो विश्वास करता है और विरक्त भार्याका जो विश्वास करता है उनके अन्ततक ही उसका जीवन है ॥ ४८ ॥”- तच्छ्रुत्वा लघुपतनकोऽपि निरुत्तरः चिन्तयामास । "अहो ! बुद्धिप्रागल्भ्यमस्य नीतिविषये । अथवा स एव अस्योपरि मैत्रीपक्षपातः”। स आह-“भो हिरण्यक ! यह सुन लघुपतनकभी निरुत्तरहो विचारने लगा, "अहो नीतिविषयमें कितनी तीक्ष्ण इसकी बुद्धि है, अथवा वह इसपर मित्रताका पक्षपात है” और बोला-"भो हिरण्यक ! सतां साप्तपदं मैत्रमित्याहुर्विबुधा जनाः । तस्मात्त्वं मित्रतां प्राप्तो वचनं मम तच्छृणु ॥ ४९ ॥

( २२० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २२० ) पञ्चतन्त्रम् । पंडित जन कहते हैं कि, सत्पुरुषोंकी सातपग संग चलनेसेही मित्रता होती है इस कारण मित्रताको प्राप्त हुआ तू मेरा वचन सुन ॥ ४९ ॥ दुर्गस्थेनापि त्वया मया सह नित्यमेव आलापो गुणदोषसुभाषितगोष्ठी कथाः सर्वदा कर्त्तव्या यद्येवं न विश्वसिषि" । तच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि व्यचिन्तयत् । “विदग्धवचनोऽयं दृश्यते लघुपतनकः सत्यवाक्यश्च, तद्युक्तमनेन मैत्रीकरणम् । परं कदाचित् मम दुर्गे चर- णपातोऽपि न कार्य्यः । उक्तञ्च- दुर्गस्थानमें स्थित हुएही तेरा मेरे साथ नित्यही वार्तालाप, गुणदोष सुन्दर वचन गोष्ठीकी कथा सदा करनी चाहिये । जो इस प्रकार विश्वास नहीं करता है तो" यह सुनकर हिरण्यक भी विचारने लगा । "चतुर वचनवाला यह लघुपतनक दिखता है और सत्यवादी है सो इसके साथ मित्रता करना भला है, परन्तु कभी मेरे दुर्गमें चरणभी न रखे. कारण कि,- भीतभीतः पुरा शत्रुर्मन्दं मन्दं विसर्पति । भूमौ प्रहेलया पश्चाज्जारहस्तोऽङ्गनास्त्विव ॥ ५० ॥" प्रथम भयभीत शत्रु भूमिमे मन्द मन्द चलता है पीछे लीलासे शीघ्रतासे गमन करता है जैसे स्त्रियोंके अंगपर जारका हाथ ॥ ५० ॥” तच्छ्रुत्वा वायस आह-“भद्र ! एवं भवतु" । ततः प्रभृति द्वौ तौ अपि सुभाषितगोष्ठी सुखमनुभवन्तौ तिष्ठतः । परस्परं कृतोपकारौ कालं नयतः । लघुपत- नकोऽपि मांसशकलानि मेध्यानि बलिशेषाणि अन्यानि वात्सल्याहृतानि पक्वान्नविशेषाणि हिरण्य- कार्थमानयति । हिरण्यकोऽपि तण्डुलान् अन्यांश्च भक्ष्यविशेषान् लघुपतनकार्थं रात्रौ आहृत्य तत्का- लाया तस्य अर्पयति । अथवा युज्यते द्वयोरपि एतत् । उक्तञ्च- यह सुन काक बोला- "भद्र ! ऐसाही हो" उस दिनसे लेकर वे दोनों सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव करते स्थित रहे, लघुपतनक भी मांसखण्ड पवित्र

भाषाटीकासमेतम् । (२२१) बलिशेष अन्य पदार्थ प्रेमसे लाये हुए विशेष पक्वान्न हिरण्यकके वास्ते लाकर देता, हिरण्यक तन्दुल और भक्ष्यविशेष लघुपतनकके निमित्त रात्रिमें लाकर तत्काल रात्रिमें आये हुएके निमित्त अर्पण करता । अथवा दोनोकी यह बात युक्त है । कहा है- ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति । भुंक्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥ ५१ ॥ देता है, ग्रहण करता है, गुप्त कहता है, पूछता है, भोजन करता खवाता है यह छ.प्रकार प्रीतिका लक्षण है ॥ ५१ ॥ नोपकारं विना प्रीतिः कथञ्चित्कस्यचिद्भवेत् । उपयाचितदानेन यतो देवा अभीष्टदाः ॥ ५२ ॥ कहीं भी किसीकी प्रीति उपकारके विना नहीं होती है उपयाचित दान (अर्थात् मेरा यह कार्य सिद्ध होगा तो यह दूंगा) से देवता भी अभीष्ट देते हैं ॥ ५२ ॥ तावत्प्रीतिर्भवेल्लोके यावद्दानं प्रदीयते । वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् ॥ ५३ ॥ लोकमें जबतक दान दिया जायगा तभीतक प्रीति होती है बछडा दूधका क्षय देखकर माताको त्याग देता है ॥ ५३ ॥ पश्य दानस्य माहात्म्यं सद्यः प्रत्ययकारकम् । यत्प्रभावादपि द्वेषी मित्रतां याति तत्क्षणात् ॥ ५४ ॥ दानका माहात्म्य तत्काल विश्वास दिलानेवाला है देखो जिसके प्रभावसे द्वेषी उसी क्षण मित्रताको प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥ पुत्रादपि प्रियतरं खलु तेन दानं मन्ये पशोरपि विवेकविवर्जितस्य । दत्ते खले तु निखिलं खलु येन दुग्धं नित्यं ददाति महिषी ससुतापि पश्य ॥ ५५ ॥ विवेकवर्जित पशुकोभी दान पुत्रसे अधिकतार प्रिय मानता हू जिससे कि, वेत्य खलके देनेपरभी सपुत्र भेंस पालकको नित्य दूध देती है ॥ ५५ ॥

( २२२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २२२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

किं बहुना- बहुत कहनेसे क्या है- प्रीतिं निरन्तरां कृत्वा दुर्भेद्यां नखमांसवत् । मूषको वायसश्चैव गतौ कृत्रिममित्रताम् ॥ ५६ ॥ दुर्भेद्य नख मांसकी समान निरन्तर प्रीति कर देखो मूषक और वायस कृत्रिम मित्रताको प्राप्त हुए ॥ ५६ ॥ एवं स मूषकस्तदुपकाररञ्जितः तथा विश्वस्तो यथा तस्य पक्षमध्ये प्रविष्टः तेन सह सर्वदैव गोष्ठीं करोति । अथ अन्य- स्मिन्नहनि वायसोऽश्रुपूर्णनयनः समभ्येत्य सगद्गदं तमुवाच,- “भद्र हिरण्यक ! विरक्तिः सञ्जाता मे सांप्रतं देशस्य अस्य उपरि, तदन्यत्र यास्यामि”। हिरण्यक आह,-“भद्र ! किं विरक्तेः कारणम् ?” स आह,-“भद्र ! श्रूयताम् । अत्र देशे महत्या अनावृष्ट्या दुर्भिक्षं सञ्जातम् । दुर्भिक्षत्वात् जनो बुभुक्षापीडितः कोऽपि बलिमात्रमपि न प्रयच्छति । अपरं गृहे गृहे बुभुक्षितजनैः विहङ्गानां बन्धनाथ पाशाः प्रगुणी- कृताः सन्ति । अहमपि आयुःशेषतया पाशेन बद्ध उद्धरितो- ऽस्मि । एतद्विरक्तेः कारणम्। तेनाहं विदेशं चलित इति बा- ष्पमोक्षं करोमि”। हिरण्यक आह-“अथ भवान् क प्रस्थितः?” स आह,-“अस्ति दक्षिणापथे वनगहनमध्ये महासरः तत्र त्वत्तोऽधिकः परमसुहृत् कूर्मो मन्थरो नाम । स च मे मत्स्यमांसखण्डानि दास्यति, तद्भक्षणात् तेन सह सुभा- षितगोष्ठीसुखमनुभवन् सुखेन कालं नेष्यामि । न अहमत्र विहङ्गानां पाशबन्धनेन क्षयं द्रष्टुमिच्छामि । उक्तञ्च- इसप्रकार वह मूषक उसके उपकारसे रंजित हुआ ऐसे विश्वासको प्राप्त हुआ कि, उसके सहित सदा गोष्ठी करता। फिर किसी एक दिन काक आंखोंमें आंसूभरे उसके निकट आय गद्गद स्वरसे उससे बोला,-“भद्र हिरण्यक ! इस देशपर अब मुझे वैराग्य हुआहै सो और स्थानमें जाऊंगा”, हिरण्यक बोला,-“भद्र ! वैराग्यका कारण क्याहै ?” वह बोला,-“भद्र ! सुनो इस देशमें बड़ी अना-

भाषाटीकासमेतम् । (२२३)

वृष्टिसे दुर्भिक्ष होगयाहै दुर्भिक्षसे भूखसे पीडित कोई मनुष्य बलिमात्रभी नहीं देताहै और घरघरमें भूखे जनोंने पक्षियोंके बाधनेको पाशे लगा रक्खेहैं मैभी 'आयुके शेष रहनेसे पाशसे बधकर निकल आया, यह वैराग्यका कारण है इससे मैं विदेशको चला इसकारण असू त्यागताहू" । हिरण्यक बोला,-“तो आप कहा जायगे?"। वह बोला-“दक्षिणदिशामें गहनवनके मध्यमें बडा सरोवर है। वहा तुमसेभी अधिक परम सुहृत् कूर्म मन्थरक नामवालाहै, वह मुझे मत्स्योंके मासखण्ड देगा । उनको भक्षण करता उसके सग सुन्दर आलापका सुख अनुभव करता सुखने समय बिताऊगा, मै यहां पक्षियोंकी पाश वधनासे क्षय -देखनेको असमर्थ हू । कहाहै- अनावृष्टिहते देशे शस्ये च प्रलयं गते । धन्यास्तात न पश्यन्ति देशभङ्गं कुलक्षयम् ॥ ५७ ॥ देशके अनावृष्टिसे क्षय होनेमें; धान्यके नष्ट होनेमें, तथा देशभंग और कुलके क्षयको नहीं देखतेहैं वेही हे तात ! धन्यहैं ॥ ५७ ॥ कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् । को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥ ५८ ॥ समर्थ पुरुषोंको क्या महत्कार्य है, व्यापारियोको क्या दूरहै, विद्वानोको कौन- स विदेशहै और प्रियवादियोंको कौन दूसराहै कोई नहीं है ॥ ५८ ॥ विद्वत्वञ्च नृपत्वञ्च नैव तुल्यं कदाचन । स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान्सर्वत्र पूज्यते ॥ ५९ ॥ " विद्वत्ता और राजापन कभी बराबर नहीं होसक्ते राजा अपने देशमें ही पूजित होताहै और विद्वान् सर्वत्र पूजित होताहै ॥ ५९॥" हिरण्यक आह,-“यदि एवं तदहमपि त्वया सह गमि- ष्यामि । ममापि महद्दुःखं वर्त्तते” । वायस आह,-“भोः! तव किं दुःखम् ? तत्कथय” । हिरण्यक आह,-“भोः ! बहु- वक्तव्यमस्ति अत्र विषये । तत्र एव गत्वा सर्वं सवि- स्तरं कथयिष्यामि" । वायस आह,-"अहं तावत् आकाशगतिः तत्कथं भवतो मया सह गमनम्” । स आह,-“यदि मे प्राणान् रक्षसि तदा स्वपृष्ठमा-