पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
( १०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तस्य अग्रे स्थितः । अथ तं प्रज्वलितात्मा भासुरको भर्त्सयन्नाह,—"रे शशकाधम ! एकतस्तावत् त्वं लघुः प्राप्तोऽपरतः वेलातिक्रमेण, तदस्मादपराधात् त्वां निपात्य प्रातः सकलान्यपि मृगकुलानि उच्छेदयिष्यामि" । अथ शशकः सविनयं प्रोवाच,—"स्वामिन् ! नापराधो मम,न च सत्त्वानाम्, तत् श्रूयतां कारणम्" । सिंह आह—"सत्वरं निवेदय यावत् मम दंष्ट्रान्तर्गतो न भवान् भविष्यति" इति । शशक आह—"स्वामिन्! समस्तमृगैरद्य जातिक्रमेण मम लघुतरस्य प्रस्तावं विज्ञाय ततोऽहं पञ्चशशकैः समं प्रेषितः । ततश्च अहमागच्छन्नन्तराले महता केनचिदपरेण सिंहेन विवरान्निर्गत्य अभिहितः—"रे ! क्व प्रस्थिता यूयम् ? अभीष्टदेवतां स्मरत"। ततो मयाभिहितम्—"वयं स्वामिनो भासुरकसिंहस्य सकाशे आहारार्थं समयधर्मेण गच्छामः" । ततः तेन अभिहितम्—"यद्येवं तर्हि मदीयमेतद्वनं मया सह समयधर्मेण समस्तैरपि श्वापदैर्वर्त्तितव्यम् । चौररूपी स भासुरकः । अथ यदि सोऽत्र राजा ततो विश्वासस्थाने चतुरः शशकानत्र धृत्वा तमाह्वय द्रुततरमागच्छ, येन यः कश्चिदावयौर्मध्यात् पराक्रमेण राजा भविष्यति स सर्वानितान् भक्षयिष्यति" इति । ततोऽहं तेनादिष्टः स्वामिसकाशमभ्यागतः, एतत् वेलाव्यतिक्रमकारणम् । तदत्र स्वामी प्रमाणम्" । तच्छ्रुत्वा भासुरक आह—"भद्र ! यदि एवं तत् सत्वरं दर्शय मे तं चौरसिंहम्, येन अहं मृगकोपं तस्य उपरि क्षिप्त्वा स्वस्थो भवामि । उक्तञ्च—
तब उनके यह वचन सुनकर भासुरक बोला--"अहो तुमने सत्य कहा, परन्तु यदि मेरे बैठेहुए नित्य एक जीव न आवेगा तो अवश्यही सबको खा जाऊंगा"। तब वे ऐसाही करेंगे यह प्रतिज्ञा करके निरुद्वेग होकर उस वनमे निर्भय फिरने लगे । प्रति दिन एक क्रमसे उनके पास जाता वृद्ध या वैराग्ययुक्त वा शोकग्रस्त वा पुत्र कलत्रके नाशसे भीतहुआ उनके मध्यसे उनके भोजनके
भाषाटीकासमेतम् । ( १०५ )
निमित्त मध्यान्ह समय प्राप्त होता था । तब कभी जातिके क्रमसे खरगोशकी वारी आई वह सब मृगोंसे प्रेरित हुआ इच्छा न करनेपरभी शनै २ जाता उसके मारनेके उपायको चिन्ता करता हुआ समयको बिताकर व्याकुल हृदयसे जबतक जाताहै, तबतक मार्गमें जाते हुए उसने कूपदेखा । जब कूपपर गया तब उसमे अपनी परछाही देखकर उसने मनमे विचार किया कि, "यह एक उत्तम उपाय है मैं भासुरकको क्रोधित कराकर इस कूपमें गिराऊंगा" तब यह कुछ दिनशेषरहे भासुरकके समीप प्राप्तहुआ । सिंहभी समयके बीतनेसे भूखसे शुष्ककंठ क्रोधमें भरा जीभको चाटता हुआ विचारता था, "अहो प्रभात ही भोजनके निमित्त यह वन निर्जीव कर दूंगा" इसप्रकार उसके विचारते वह खरगोश शनै २ जाय प्रणामकर उसके आगे स्थित भया । तब प्रज्वलित आत्मा भासुरक उसे घुड़कताहुआ बोला-"रे नीच खरगोश ! एक तो तू लघु दूसरे समयको बिताकर आया हे इस अपराधसे तुझको मारकर सबेरे सभी मृगोका नाश करूंगा" । तब खरगोश विनयपूर्वक बोला-"स्वामिन् ! इसमें न मेरा अपराध न अन्यजीवोंका है सो कारण सुनिये । सिंह बोला,-"शीघ्र निवेदन कर जबतक तू मेरी दाढोंके अन्तर्गत न होता है"। खरगोश बोला,-"स्वामिन् ! संपूर्ण मृगोंने आज जातिक्रमसे मेरा अति लघु कलेवर जानकर पाच खरगोशोंसहित मुझे आपके पास भेजा । सो मैं आता हुआ मार्गमें एक अन्य सिंहने विवरसे निकल कर कहा,-"रे तुम कहा जातेहो ? अपने इष्टदेवताका स्मरण करो" । तब मैने कहा-"हम स्वामी भासुरकके पास उसके भोजनको प्रतिज्ञार्थमैसे जाते हैं" उसने कहा-"जो ऐसा है तो यह वन मेरा है, मेरे साथ प्रतिज्ञासे सब जीवोको वर्तना चाहिये, चोर है वह भासुरक । और जो वह यहाका राजा है तो विश्वासके निमित्त चार खरगोशोंको यहा रखकर उसे बुलाकर बहुतशीघ्र आधा इससे हम दोनोके बीचमें जो कोई पराक्रमसे राजा होगा वही इन सबंको खायगा" सो मैं उसकी आज्ञासे स्वामीके पास आया हू यह समयके उल्लंघनका कारण है सो इसमे स्वामीही प्रमाण हैं"। यह सुनकर भासुरक बोला,-"भद्र ! जो ऐसा है तो शीघ्र मुझे उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मैं इन मृगोके कोपको उसके ऊपर छोडकर स्वस्थ होऊ । कहा है-
( १०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भूमिर्मित्रं हिरण्यञ्च विग्रहस्य फलत्रयम् । नास्त्येकमपि यद्येषां न तं कुर्यात्कथञ्चन ॥ २४९ ॥
भूमि, मित्र, सुवर्ण यह तीन विग्रहके फल हैं और जो इनमेंसे एकभी न हो तो वहां विग्रह न करे ॥ २४९ ॥
यत्र न स्यात्फलं भूरि यत्र च स्यात्पराभवः । न तत्र मतिमान्युद्धं समुत्पाद्य समाचरेत् ॥ २५० ॥"
जहां विशेष फल न मिले और पराभव हो, मतिमान्को चाहिये कि, वहां युद्ध न करे ॥ २५० ॥"
शशक आह—"स्वामिन् ! सत्यमिदम्, स्वभूमिहेतोः परिभवाच्च युध्यन्ते क्षत्रियाः, परं स दुर्गाश्रयः, दुर्गान्निष्क्रम्य वयं तेन विष्कम्भिताः । ततो दुर्गस्थो दुःसाध्यो भवति रिपुः । उक्तञ्च—
खरगोश बोला,—"स्वामिन् ! यह सत्य है, अपनी भूमिके हेतु परिभवसे क्षत्रिय युद्ध करते हैं, परन्तु वह दुर्गमें रहता है, दुर्गमेंसे निकलकर उसने हमको रोक-लिया, इससे दुर्गमें स्थित शत्रु दुःसाध्य होता है । कहाहे कि—
न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् । यत्कृत्यं साध्यते राज्ञां दुर्गेणैकेन सिध्यति ॥ २५१ ॥
जो कार्य सहस्र हाथी, लक्ष घोड़ोंसे सिद्ध नहीं होता है, वह एक दुर्गसे राजाओंका कार्य सिद्ध होताहै ॥ २५१ ॥
शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः । तस्माद्दुर्गं प्रशंसन्ति नीतिशास्त्रविचक्षणाः ॥ २५२ ॥
किलेमें स्थित एक धनुषधारी सौसे युद्ध करसकता है, इस कारण नीति-शास्त्रके जाननेवाले दुर्गकी प्रशंसा करते हैं ॥ २५२ ॥
पुरा गुरोः समादेशाद्धिरण्यकशिपोर्भयात् । शक्रेण विहितं दुर्गं प्रभावाद्विश्वकर्मणः ॥ २५३ ॥
प्रथम गुरुकी आज्ञासे हिरण्यकशिपुके भयसे इन्द्रने विश्वकर्माकी सहायतासे दुर्ग निर्माण कियाथा ॥ २५३ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १०७ )
तेनापि च वरो दत्तो यस्य दुर्गं स भूपतिः ।
विजयी स्यात्ततो भूमौ दुर्गाणि स्युः सहस्रशः ॥ २५४ ॥
और उसनेभी यह वर दिया था कि, जिसके दुर्ग होगा वही राजा विजयी होगा इस कारण पृथ्वीमें सैकड़ों दुर्ग होगये ॥ २५४ ॥
दंष्ट्राविरहितो नागो मदहीनो यथा गजः ।
सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ २५५ ॥”
जैसे डाढोसे रहित सर्प, मदसे हीन हाथी इसी प्रकार दुर्गहीन राजा शीघ्र अन्योंके वशमें होजाता है ॥ २५५ ॥”
तच्छ्रुत्वा भासुरक आह—“भद्र ! दुर्गस्थमपि दर्शय तं चौरसिंहं येन व्यापादयामि । उक्तञ्च-
यह सुनकर भासुरक बोला,—“भद्र ! किलेमे स्थितभी उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मै उसे मारडालू । कहा है—
जातमात्रं न यः शत्रुं रोगञ्च प्रशमं नयेत् ।
महाबलोऽपि तेनैव वृद्धिं प्राप्य स हन्यते ॥ २५६ ॥
जो उत्पन्न होतेही शत्रु और रोगको अपने वशमे नहीं करता है, वह महाबली हो तथापि उसके साथ वृद्धिको प्राप्तहोकर हनन करता है ॥ २५६ ॥
तथाच—
औरभी कहा है—
उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्यः पथ्यमिच्छता ।
समौ हि शिष्टैराम्नातौ वर्त्स्यन्तावामयः स च ॥ २५७ ॥
हितकी इच्छा करनेवाले पुरुषको उठे हुए शत्रुको उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, श्रेष्ठ पुरुषोंने वृद्धिको प्राप्त होते हुए शत्रु और रोग समान कहे हैं ॥ २५७ ॥
अपिच—
और देखो—
उपेक्षितः क्षीणबलोऽपि शत्रुः
प्रमाददोषात्पुरुषैर्मदान्धैः ।
साध्योऽपि भूत्वा प्रथमं ततोऽसौ
असाध्यतां व्याधिरिव प्रयाति ॥ २५८ ॥
( १०८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
उपेक्षा करनेसे क्षीणबलवालाभी शत्रु मदान्ध पुरुषोंके प्रमाददोषोंसे प्रथम साध्य होकर भी पीछे व्याधिकी समान असाध्य होजाताहै॥ २९८ ॥
तथाच-
तैसेही-
आत्मनः शक्तिमुद्वीक्ष्य मानोत्साहश्च यो व्रजेत् ।
बहून् हन्ति स एकोऽपि क्षत्रियान्भार्गवो यथा ॥२५९॥"
जो अपनी शक्तिको देखकर मान और उत्साहको प्राप्त होता है, वह एकभी बहुतोंको मार सकता है, जैसे क्षत्रियोंको परशुराम ॥ २९९ ॥"
शशक आह-“अस्त्येतत्तथापि बलवान् स मया दृष्टः तत् न युज्यते स्वामिनस्तस्य सामर्थ्यमविदित्वा गन्तुम्। उक्तञ्च-
शशक बोला-“यह तो है, परन्तु तौभी वह मैंने बलवान् जाना है, विना उसकी सामर्थ्य देखे स्वामीको वहां जाना उचित नहीं है । कहाहै-
अविदित्वात्मनः शक्तिं परस्य च समुत्सुकः ।
गच्छन्नभिमुखो नाशं याति वह्नौ पतङ्गवत ॥ २६० ॥
जो अपनी और दूसरेकी शक्तिके विना जाने समुत्सुक होकर सन्मुख जाता है वह अग्निमें पतंगकी समान जाकर नष्ट होता है ॥ २६० ॥
यो बलात्प्रोन्नतं याति निहन्तुं सबलोऽप्यरिम् ।
विमदः स निवत्र्तेत शीर्णदन्तो गजो यथा ॥ २६१ ॥"
जो सबलभी बलसे प्रवल शत्रुके मारनेको जाता है वह विमद होकर दांत टूटे हाथीकी समान निवृत्त होता है ॥ २६१ ॥"
भासुरक आह-“भोः ! किं तव अनेन व्यापारेण, दर्शय मे तं दुर्गस्थमपि”। अथ शशक आह-“यद्येवं तर्हि आगच्छतु स्वामी”। एवमुक्त्वा अग्रे व्यवस्थितः। ततश्च तेन आगच्छता यः कूपो दृष्टोऽभूत् तमेव कूपमासाद्य भासुरकमाह- “स्वामिन् ! कस्ते प्रतापं सोढुं समर्थः । त्वां दृष्ट्वा दूरतोऽपि चौरसिंहः प्रविष्टः स्वं दुर्गम्, तदागच्छ येन दर्शयामि” इति। भासुरक आह-“दर्शय मे दुर्गम्”। तदनु दर्शितस्तेन कूपः। ततः सोऽपि मूर्खः सिंहः कूपमध्ये आत्मप्रतिबिम्बं जलम-
भाषाटीकासमेतम् । ( १०९ )
ध्यगतं दृष्ट्वा सिंहनादं मुमोच । ततः प्रतिशब्देन कूपमध्याद्द्विगुणतरो नादः समुत्थितः। अथ तेन तं शत्रुं मत्वा आत्मानं तस्य उपरि प्रक्षिप्य प्राणाः परित्यक्ताः । शशकोऽपि हृष्टमनाः सर्वमृगान् आनन्द्य तैः सह प्रशस्यमानो यथासुखं तत्र वने निवसति स्म। अतोऽहं ब्रवीमि--“यस्य बुद्धिर्बलं तस्य” इति ।
भासुरक बोला,-“भो ! तुझे इस बातसे क्या उस किलेमे स्थितभी उसे मुझे दिखा” । तब शशक बोला,-“जो ऐसा है तो आओ स्वामी ” यह कहकर आगे चला । तब उसने आतेमें जो कूप देखा था उसी कूपको प्राप्त होकर वह भासुरकसे बोला,-“स्वामिन् ! आपका प्रताप कौन सह सकताहै । तुमको देखकर दूरसेही वह चोर सिंह अपने दुर्गमें प्रविष्ट हुआ है सो आओ मैं दिखाऊ” भासुरक बोला,-“मुझे वह दुर्ग दिखाओ” तब इसने वह कूप दिखलाया। तब वहभी मूर्ख सिंह अपने प्रतिबिम्बको कूपमें स्थित देख सिंहनाद करता भया उसकी प्रतिध्वनिसे कुएसे दूना नाद उठा । उससे वह उसको शत्रु मानकर अपनेको उसके ऊपर डालकर प्राण छोडता भया । खरगोशभी प्रसन्न मनहो सब मृगोको आनंदित कर उनके साथ प्रशंसितहो यथासुखसे उस वनमे रहने लगा। इससे मैं कहताहू “जिसको बुद्धि है उसको बल है ।”
तद्यदि भवान् कथयति, तत्तत्रैव गत्वा तयोः स्वबुद्धिप्रभावेण मैत्रीभेदं करोमि”। करटक आह--“भद्र ! यदि एवं तर्हि गच्छ, शिवास्ते पन्थानः सन्तु, यथाभिप्रेतमनुष्ठीयताम्” । अथ दमनकः सञ्जीवकवियुक्तं पिंगलकमवलोक्य तत्रान्तरे प्रणम्याग्रे समुपविष्टः । पिंगलकोऽपि तमाह--“भद्र ! किं चिरात् दृष्टः?” दमनक आह--“ न किञ्चिद्देवपादानामस्माभिः प्रयोजनम्, तेन अहं नागच्छामि। तथापि राजप्रयोजनविनाशमवलोक्य सन्दह्यमानहृदयो व्याकुलतया स्वयमेव अभ्यागतो वक्तुम् । उक्तञ्च-
सो यदि आप कहें तो वहा जाकर उनका अपनी बुद्धिके प्रभावसे मैत्रीभेद करूं” । करटक बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो जाओ, तुम्हारे मार्ग
( ११० ) पञ्चतन्त्रम् ।
मंगलकारीहों, अभिलषित अनुष्ठान करो”। तब दमनक संजीवकसे अलग पिंगलकको देखकर उसी समय प्रणामकर आगे बैठा, पिंगलक उससे बोला,—“भद्र ! बहुत दिनोंमें क्यों दिखे ?” दमनक बोला,—“श्रीमान्के चरणोंका हमसे कुछभी प्रयोजन नहीं है, इससे मैं नहीं आताहूं । तथापि राजप्रयोजनका नाश देखकर संदिग्ध हृदय हो व्याकुलतासे स्वयं ही कहनेको आयाहूं। कहा है—
प्रियं वा यदि वा द्वेष्यं शुभं वा यदि वाशुभम् । अपृष्टोऽपि हितं वक्ष्येद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥ २६२ ॥ ”
प्यारा वा द्वेषी शुभ या अशुभ बिना पूछे हितू उससे कहै जिसके पराभवकी इच्छा न हो ॥ २६२ ॥”
अथ तस्य साभिप्रायं वचनमाकर्ण्य पिंगलक आह—“किं वक्तुमना भवान् ? तत्कथ्यतां यत्कथनीयमस्ति” स प्राह—“देव ! सञ्जीवको युष्मत्पादानामुपरि द्रोहबुद्धिरिति विश्वासगतस्य मम विजने इदमाह—“भो दमनक ! दृष्टा मया अस्य पिंगलकस्य सारासारता तदहमेनं हत्वा सकलमृगाधिपत्यं त्वत्सांचिव्यपदवीसमान्वितं करिष्यामि” इति। पिंगलकोऽपि तद्वज्रसारप्रहारसदृशं दारुणं वचः समाकर्ण्य मोहमुपगतो न किञ्चिदपि उक्तवान् दमनकोऽपि तस्य तमाकारमालोक्य चिन्तितवान् । “अयं तावत्सञ्जीवकनिबद्धरागः तन्नूनमनेन मन्त्रिणा राजा विनाशमवाप्स्यतीति । उक्तञ्च—
तब उसके अभिप्राय सहित वचनोंको सुनकर पिंगलक बोला,—“तुम क्या कहना चाहते हो, सो जो कथनीय हो सो कहो”। वह बोला,—“देव ! संजीवक आपके चरणोंमें द्रोहबुद्धि रखता है, यह उसने मेरेकूं विश्वाससे एकान्तमें कहा है—“भो दमनक ! मैने इस पिंगलक राजाकी सारासारता देखी सो मै इसको मारकर सब मृगोंका आधिपत्य तुझे मंत्रीपद देकर करूंगा ”। पिंगलकभी वह वज्रसारके प्रहारकी समान दारुण वचनको सुनकर मोहको प्राप्त होकर कुछभी न कहता भया, दमनक उसके आकारको देख विचारने लगा। “यह तो संजीवकमें अनुरागी है, सो अवश्य इस मंत्रीसे राजा नाशको प्राप्त होगा। कहाभी है—
भाषाटीकासमेतम् । (१११)
एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदाद्दास्येन निर्विद्यते । निर्विण्णस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा स्वातन्त्र्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणेष्वपि द्रुह्यते ॥ २६३॥
जिस समय राजा एकही मन्त्रीको राज्यमे प्रमाण करता है, तब उसको मोहसे मद प्राप्त होता है, वह मदसे दास्यतासे निर्वेदताको प्राप्त होता है, निर्वेदताको प्राप्त हुए मनुष्योके हृदयमें स्वतन्त्रताकी इच्छा प्रवेश करती है और उस इच्छासे मन्त्री राजाको प्राणोंसेभी अलग कर देता ॥ २६३ ॥
तत् किमत्र युक्तम्” इति। पिंगलकोऽपि चेतनां समासाद्य कथमपि तमाह-“दमनक ! सञ्जीवकस्तावत् प्राणसमो भृत्यः स कथं ममोपरि द्रोहबुद्धिं करोति?”। दमनक आह-“देव ! भृत्यो भृत्य इति अनैकान्तिकमेतत् । उक्तञ्च-
सो यहा क्या युक्त है”! पिंगलकभी चेतनाको प्राप्त होकर उससे बोला - “दमनक ! सजीवक तो मेरा प्राणोकी समान प्रिय भृत्य है वह किस प्रकार मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होगा?”। दमनक बोला-“देव भृत्य सदा भृत्य नहीं हो सकता । कहा है-
न सोऽस्ति पुरुषो राज्ञां यो न कामयते श्रियम् । अशक्ता एव सर्वत्र नरेन्द्रं पर्युपासते ॥ २६४ ॥ ”
राजाके यहा वह पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीकी इच्छा न करे सर्वत्र अशक्त होकर पुरुष राजाकी उपासना करते हैं ॥ २६४ ॥”
पिंगलक आह-“भद्र ! तथापि मम तस्योपरि चित्तवृत्तिर्न विकृतिं याति । अथवा साधु चेदमुच्यते-
पिंगलक बोला,-“भद्र ! तोभी मेरी उसके ऊपर चित्तवृत्ति विकारको नहीं प्राप्त होती । अथवा ठीक कहा है--
अनेकदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः । कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः ॥ २६५ ॥”
अनेक दोषोंसे दूषित होकरभी अपना शरीर किसको प्यारा नहीं है जो अपने संग अनुचित बर्ताव करके प्रिय हो वही प्रिय है ॥ २६५ ॥”
(११२) पञ्चतन्त्रम् ।
दमनक आह-"अत एव अयं दोषः । उक्तञ्च-
दमनक बोला,-"इसीसे तो यह दोष है । कहाभी है-
यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोपयति पार्थिवः ।
अकुलीनः कुलीनो वा स श्रियो भाजनं नरः ॥ २६६ ॥
राजा जिसके ऊपर अधिक कृपादृष्टि करता है अकुलीन हो वा कुलीन वह मनुष्य लक्ष्मीका भागी होता है ॥ २६६ ॥
अपरं केन गुणविशेषेण स्वामी सञ्जीवकं निर्गुणकमपि निकटे धारयति?! अथ देव ! यदि एवं चिन्तयसि महाकायो यमनेन रिपून् व्यापादयिष्यामि, तदस्मात् न सिध्यति, यतोऽयं शष्पभोजी, देवपादानां पुनः शत्रवो मांसाशिनः । तत् रिपुसाधनमस्य साहाय्येन न भवति । तस्मादेनं दूषयित्वा हन्यताम्" इति । पिंगलक आह--
इस कारण कौनसे गुणसे स्वामी निर्गुण संजीवकको अपने निकट धारण करते हो? सो देव ! यदि ऐसा विचारते हो कि, यह महाकायवान् है इसके द्वारा शत्रुओंको मारूंगा सोभी इससे सिद्ध नहीं होता कारण कि, यह घासभक्षी और श्रीमान्के चरणशत्रु मांसभक्षी हैं सो इसकी सहायतासे शत्रु साधन नहीं हो सकता है सो इसको दूषित कर मारिये" । पिंगलक बोला-
"उक्तो भवति यः पूर्वं गुणवानिति संसदि ।
तस्य दोषो न वक्तव्यः प्रतिज्ञाभंगभीरुणा ॥ २६७ ॥
"यह गुणवान् है सभामे जिसके लिये ऐसा कहा है प्रतिज्ञाके भंगसे डरने- वालेको उसके दोष कहने उचित नहीं हैं ॥ २६७ ॥
अन्यच्च-
और भी-
मया अस्य तव वचनेन अभयप्रदानं दत्तम् । तत्कथं स्वयमेव व्यापादयामि । सर्वथा सञ्जीवकोऽयं सुहृदस्माकं न तं प्रति कश्चित् मन्युरिति । उक्तञ्च-
मैंने तो तेरे वचनसेइसको अभय दिया है फिर कैसे स्वयं इसको मारूं। सब प्रकार यह सञ्जीवक सुहृत् है हमारा कुछभी उस पर क्रोध नहीं है। कहा है कि-
भाषाटीकासमेतम् । (११३)
इतः स दैत्यः प्राप्तश्रीनैत एवार्हति क्षयम् ।
विषवृक्षोऽपि संवर्द्धर्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ॥ २६८ ॥
( तारकासुरसे पीडित उसके वधार्थी देवताओं प्रति ब्रह्माका वचन है ) कि, वह दैत्य मुझसे ऐश्वर्य प्राप्त कर चुका है वधके योग्य नहीं है कारण कि, स्वय बढ़ाया हुआ विषवृक्षभी ( आप ) नहीं काटाजाता ॥ २६८ ॥
आदौ न वा प्रणयिनां प्रणयो विधेयो
दत्तोऽथवा प्रतिदिनं परिपोषणीयः ।
उत्क्षिप्य यत्क्षिपति तत्प्रकरोति लज्जां
भूमौ स्थितस्य पतनाद्भयमेव नास्ति ॥ २६९ ॥
प्रथम तो प्रणयिजनोंको प्रणय ( प्रेम ) नहीं करना चाहिये और करे तो फिर प्रतिदिन उसका पालन करे जो करके छोड़ा जाता है वह लज्जा करताहै कारण कि, पृथ्वीमे स्थितको गिरनेका भय नहीं है ॥ २६९ ॥
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः ।
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ २७० ॥
जो उपकारियोंका भला करता है उसके उपकारीपनमें क्या गुणहै जो अपकारियोंमें साधु है सत्पुरुषोने उसीको साधु कहा है ॥ २७० ॥
तद्द्रोहबुद्धेरपि मया अस्य न विरुद्धमाचरणीयम्" । दमनक आह-"स्वामिन् ! नैष राजधर्मो यद्द्रोहबुद्धेरपि क्षम्यते । उक्तञ्च-
सो इस द्रोहबुद्धिपरभी मैं विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा"। दमनक बोला,- "स्वामिन् ! यह राजधर्म नहीं है कि, द्रोहबुद्धिको क्षमा किया जाय। कहाभी है-
तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् ।
अर्द्धराज्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥ २७१ ॥
तुल्यधन, तुल्य सामर्थ्य, मर्म जाननेवाले उद्योगी अर्धराज हरनेवाले भृत्यको जो नहीं मारताहै वह मारा जाता है ॥ २७१ ॥
अपरं त्वया अस्य सखित्वात् सर्वोऽपि राजधर्मः परित्यक्तो राजधर्माभावात सर्वोऽपि परिजनो विरक्तिं गतो यः
८
( ११४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सञ्जीवकः शष्पभोजी, भवान् मांसादः तव प्रकृतयश्च । यत्तव अवध्यव्यवसायबाह्यं कुतस्तासां मांसाशनम् । यद्रहितास्ताः त्वां त्यक्त्वा यास्यन्ति । ततोऽपि त्वं विनष्ट एव अस्य सङ्गत्या पुनस्ते न कदाचित् आखेटके मतिर्भविष्यति । उक्तञ्च-
और आपने तो इसकी मित्रतासे सम्पूर्ण ही राजधर्म त्यागन करदियाहै । राजधर्मके अभावसे सम्पूर्ण परिजन विरक्त होकर गये, जो यह संजीवक तृणभोजी आप मांसभक्षी और आपके प्रकृति ( कुटुम्ब ) भी, जो कि अब मांस भक्षण तुम्हारे पराक्रमसे बाह्य होगयाँ ( तुम उद्योग नहीं करतेहो ) तो फिर वह मांस कहासे खायेंगे इसकारण वे तुमको त्यागन कर चलेजावेंगे । इसीसे तुम विनष्ट होंगे । इसकी संगतिस तुम्हारी आखेटमें कभी बुद्धि नहीं होगी । कहाहै-
यादृशः सेव्यते भृत्यैर्यादृशांश्चोपसेवते ।
कदाचिन्नात्र सन्देहस्तादृग्भवति पूरुषः ॥ २७२ ॥
जब जो जैसे भृत्योंसे सेवन किया जाता है वा जो जैसोंको सेवन करता है इसमें सन्देह नहीं वह पुरुष वैसाही होजाताहै ॥ २७२ ॥
तथाच-
तैसेही-
सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते ।
स्वातौ सागरशुक्तिकुक्षिपतितं तज्जायते मौक्तिकं
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणः संवासतो जायते ॥ २७३ ॥
तपेहुए लोहेपर पडेहुएँ जलका नाममात्रभी नहीं विदित होता है और वही कमलपत्रके ऊपर मोतीके आकारमें स्थितहुआ शोभा पाता है, स्वातिनक्षत्रमें सागरमें सीपीमें प्रवेशकर वही मोती होजाता है, प्रायः संगतिसे अधम, मध्यम, उत्तम गुण होजाते हैं ॥ २७३ ॥
तथाच-
और देखो-
भाषाटीकासमेतम् । (११९)
असतां संगदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम् ।
दुर्योधनप्रसंगेन भीष्मो गोहरणे गतः ॥ २७४ ॥
असत् पुरुषोंकी संगतिके दोषसे महात्माभी विकारको प्राप्त होते हैं, दुर्योधनकी संगतिसे भीष्म गोहेरनेको गयेथे ॥ २७४ ॥
अत एव सन्तो नीचसङ्गं वर्जयन्ति । उक्तञ्च–
इसीकारण महात्मा नीच संगति नहीं करते हैं। कहा है–
“न ह्यविज्ञातशीलस्य प्रदातव्यः प्रतिश्रयः ।
मत्कुणस्य च दोषेण हता मन्दाविसर्पिणी ॥ २७५ ॥”
जिसका शीलस्वभाव न जाना हो उसे आश्रय नदे खटमलके दोषसे मन्दविसर्पिणी मारीगई ॥ २७५ ॥”
पिंगलक आह–“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्–
पिंगलक बोला,–“यह कैसी कथा है ?” वह बोला–
कथा ९.
अस्ति कस्यचिन्महीपतेः कस्मिंश्चित् स्थाने मनोरमं शयनस्थानम् । तत्र शुक्लतरपटयुगलमध्यसंस्थिता मन्दविसर्पिणी नाम श्वेता यूका प्रतिवसति स्म । सा च तस्य महीपते रक्तमास्वादयन्ती सुखेन कालं नयमाना तिष्ठति । अन्येद्युश्च तत्र शयने कचिद्भ्राम्यन् अग्निमुखोनाम मत्कुणः समायातः । अथ तं दृष्ट्वा सा विषण्णवदना प्रोवाच–“भो अग्निमुख ! कुतस्त्वमत्र अनुचितस्थाने समायातः ? १ तद्यावत् न कश्चिद्वेत्ति तावच्छीघ्रं गम्यताम्” इति । स आह–“भगवति ! गृहागतस्य असाधोरपि नैतद्युज्यते वक्तुम् । उक्तञ्च–
किसी राजाके किसी स्थानमें मनोहर शयनस्थानहै वहां अत्यन्त शुक्ल वस्त्रमें मदविसर्पिणी नाम श्वेत जूं रहती थी वह उस राजाका रुधिरपान करती हुई सुखसे समय बितातीथी । दूसरे दिनमें उस शयनपर भ्रमता हुआ अग्निमुखनाम खटमल आया । उसे देखकर दुःखी हुई वह जूं बोली,–“भो अग्निमुख ! तुम कैसे अनुचित स्थानमें आये हो ? सो जबतक कोई नहीं जाने, तबतक
१ देखो विराटपर्व ।
( ११६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
शीघ्र जाओ।” वह बोला,-“भगवति ! घरमें आये असाधुसेभी कोई ऐसा नहीं कहताहै। कहाहै-
एह्यागच्छ समाश्वसासनमिदं कस्माच्चिराद्दृश्यसे
का वार्त्तान्वतिदुर्बलोऽसि कुशलं प्रीतोऽस्मि ते दर्शनात् ।
एवं नीचजनेऽपि युज्यति गृहं प्राप्ते सतां सर्व्वदा
धर्मोऽयं गृहमेधिनां निगदितः स्मार्त्तैर्लघुः स्वर्गदः ॥२७६॥
यहां आओ, यह सुन्दर आसनहै, बहुत दिनोंमे देखा, कहां थे, क्या बात है, बहुत कमजोर होगये, कुशल है ? हम आपके दर्शनसे प्रसन्नहुए, इस प्रकार सत्पुरुष नीचके प्राप्त होनेमें भी कहा करते हैं यह गृहस्थी स्मृतिकारोंका स्वर्ग देनेवाला सामान्य धर्म है ॥ २७६ ॥
अपरं मया अनेकमानुषाणामनेकविधानि रुधिराणि आस्वादितानि आहारदोषात् कटुतिक्तकषायाम्लरसास्वादानि न च मया कदाचिन्मधुररक्तं समास्वादितम् । तद्यदि त्वं प्रसादं करोषि तदस्य नृपतेर्विविधव्यञ्जनान्नपानचोष्यलेह्यस्वाद्वाहारवशादस्य शरीरे यत् मिष्टं रक्तं सञ्जातं तदास्वादनेन सौख्यं सम्पादयामि जिह्वया इति । उक्तञ्च-
मैने अनेक मनुष्योंके अनेक विधि रुधिर आस्वादन किये हैं । आहार दोषसे कटु, तिक्त, कसैले अम्ल रसका आस्वाद देखा, परन्तु मैने कभी मधुर रसका आस्वादन नहीं किया । सो यदि तू प्रसन्नता करे तो इस राजाके विविध अन्नपान चोष्य लेह्य स्वादु आहारके वशसे इसके शरीरमें जो मीठा रस है उसके आस्वादनसे जिह्वाका सौख्य सम्पादन करूंगा । कहाहै-
रङ्कस्य नृपतेर्वापि जिह्वासौख्यं समं स्मृतम् ।
तन्मात्रञ्च स्मृतं सारं यदर्थं यतते जनः ॥ २७७ ॥
रंक ( कंगाल ) और राजाको जिह्वाका सौख्य समान कहा है, जिसके निमित्त मनुष्य यत्न करता है वही इसमे सार है ॥ २७७ ॥
यद्येवं न भवेल्लोके कर्म जिह्वाप्रतुष्टिदम् ।
तन्न भृत्यो भवेत्कश्चित्कस्यचिद्वशगोऽथवा ॥ २७८ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ११७ )
जो जिह्वाकी तृप्ति देनेवाला कर्म लोकमे नहो तो कोई किसीका भृत्य वा वशीभूत न होता ॥ २७८ ॥
यदसत्यं वदेन्मर्त्यो यद्वासेव्यञ्च सेवते ।
यद्गच्छति विदेशञ्च तत्सर्वमुदरार्थतः ॥ २७९ ॥
जो मनुष्य असत्य कहता है वा असेव्यको सेवन करता है वा जो विदेशको जाता है वह सब उदरहीके निमित्त है ॥ २७९ ॥
तत् मया गृहागतेन बुभुक्षया पीड्यमानेन त्वत्सकाशाद्भोजनमर्थनीयं तन्न त्वया एकाकिन्या अस्य भूपतेः रक्तभोजनं कर्तुं युज्यते” । तच्छ्रुत्वा मन्दविसर्पिणी आह-“भो मत्कुण ! अहमस्य नृपतेर्निद्रावशं गतस्य रक्तमास्वादयामि, पुनस्त्वम् अग्निमुखः चपलश्च, तत् यदि मया सह रक्तपानं करोषि तत्तिष्ठ । अभीष्टतरं रक्तमास्वादय” । सोऽब्रवीत्,-“भगवति ! एवं करिष्यामि, यावत्त्वं न आस्वादयसि प्रथमं नृपरक्तं तावत् मम देवगुरुकृतः शपथः स्याद् यदि तत् आस्वादयामि” । एवं तयोः परस्परं वदतोः स राजा तच्छयनमासाद्य प्रसुप्तः । अथ असौ मत्कुणो जिह्वालौल्यप्रकृष्टोत्सुक्यात् जाग्रतमपि तं महीपतिमदशत् । अथवा साधु चेदमुच्यते-
सो घरमे आये हुए भूखसे पीडित मुझे आपसे केवल भोजनकी इच्छा है, सो इकलेही तुमको इस राजाका रक्त भोजन करना मुनासिव नहीं है” । यह सुनकर मन्दविसर्पिणी बोली,-“भो खटमल ! मैं निद्राको प्राप्त हुए इस राजाका रक्तपान करती हूं तू अग्निमुख और चपल है, सो यदि मेरे साथ रक्तपान करेगा तो स्थितहो, यथेष्ट रक्तको आस्वादन करना” । वह बोला-“भगवति ! ऐसाही करूंगा, जबतक तू पहले राजाका रक्त नहीं आस्वादन करेगी, तबतक मुझे देव गुरुकी शपथ है, यदि मै आस्वादन करूं”। इस प्रकार उन दोनोके परस्पर कहनेमें वह राजा खाटपर आनकर सोगया । तब यह खटमल जिह्वाकी चंचलता और बडी उत्कण्ठासे जागते ही हुए उस राजाको काटता भया । अथवा सत्य कहा है-
( ११८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥ २८० ॥
उपदेशसेही कोई किसीका स्वभाव अन्यथा नहीं कर सकता है तपाया हुआभी पानी फिर शीतल होजाता है ॥ २८० ॥
यदि स्याच्छीतलो वह्निः शीतांशुर्दहनात्मकः ।
न स्वभावोऽत्र मर्त्यानां शक्यते कर्तुमन्यथा ॥ २८१ ॥
चाहैं अग्नि शीतल होजाय, चन्द्रमा जलाने लगे, तथापि मनुष्योका स्वभाव कोई अन्यथा नहीं कर सकता है ॥ २८१ ॥
अथ असौ महीपतिः सूच्यग्रविद्ध इव तच्छयनं त्यक्त्वा तत्क्षणादेव उत्थितः । "अहो ! ज्ञायतामत्र प्रच्छादनपटे मत्कुणो यूका वा नूनं तिष्ठति येन अहं दष्ट इति" । अथ ये कञ्चुकिनस्तत्र स्थितास्ते सत्वरं प्रच्छादनपटं गृहीत्वा सूक्ष्मदृष्ट्या वीक्षांचक्रुः । अत्रान्तरे स मत्कुणः चापल्यात् खट्टान्तं प्रविष्टः सा मन्दविसर्पिणी अपि वस्त्रसन्ध्यन्तर्गता तैर्दृष्टा व्यापादिता च, अतोऽहं ब्रवीमि, "न ह्यविज्ञातशीलस्य" इति । एवं ज्ञात्वा त्वया एष वध्यः । नो चेत् त्वां व्यापादयिष्यति । उक्तञ्च-
तब यह राजा सूचीके अग्र भागकी समान विद्ध हुआ खाट छोडकर उसी समय उठबैठा । "अहो ! देखो तो इस चादरमें खटमल वा लीं जू अवश्य है जिसने मुझे काट लिया" । तब जो कंचुकी वहां स्थित थे वह बहुत शीघ्र चादरको ले सूक्ष्म दृष्टिसे देखने लगे । इसी समय वह खटमल चपलतासे खाटके नीचे गया और मन्दविसर्पिणी वस्त्रकी सलवटमें बैठी हुई उन्होने देखी और मारडाली, इससे मैं कहता हूं "जिसका शील स्वभाव न देखा हो उसे न टिकावे" । ऐसा जानकर तुम्हें इसको मारना ही उचित है, नहीं तो यह आपको मार डालेगा । कहा है-
त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा येन बाह्याश्चाभ्यन्तरीकृताः ।
स एव मृत्युमाप्नोति यथा राजा ककुद्द्रुमः ॥ २८२ ॥”
भाषाटीकासमेतम् । (११९)
जिसने आभ्यन्तर जनोंको त्याग दियाहै और बाहरी जनोंको अन्तरंगमे लिया है वह ककुद्द्रुम राजाकी तरह नाश होजाता है ॥ २८२ ॥"
पिङ्गलक आह—"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्—
पिंगलक बोला,—"यह कैसी कथा ?" वह बोला—
कथा १०.
कस्मिंश्चित वनप्रदेशे चण्डरवो नाम शृगालः प्रतिवसतिस्म । स कदाचित् क्षुधाविष्टो जिह्वालौल्यात नगरान्तरे प्रविष्टः । अथ तं नगरवासिनः सारमेया अवलोक्य सर्वतः शब्दायमानाः परिधाव्य तीक्ष्णदंष्ट्राग्रैर्भक्षयितुमारब्धाः । सोऽपि तैर्भक्ष्यमाणः प्राणभयात् प्रत्यासन्नरजकगृहं प्रविष्टः । तत्र च नीलीरसपरिपूर्णमहाभाण्डं सज्जीकृतमासीत् । तत्र सारमेयैराक्रान्तो भाण्डमध्ये पतितः । अथ यावत् निष्क्रान्तस्तावन्नीलीवर्णः सञ्जातः । तत्र अपरे सारमेयास्तं शृगालमजानन्तो यथाभीष्टदिशं जग्मुः चण्डरवोऽपि दूरतरं प्रदेशमासाद्य काननाभिमुखं प्रतस्थे न च नीलवर्णेन कदाचित निजरङ्गस्त्यज्यते । उक्तञ्च—
किसी वनके निकट चण्डरव नामवाला शृगाल रहताथा वह कभी भूखसे व्याकुल हुआ जिह्वाके लालचसे नगरान्तरमें प्रविष्ट भया । तब उसे नगरके रहनेवाले कुत्ते देख सब ओरसे भोंकते हुए दौड़े और तीक्ष्ण डाढोंसे खाने लगे । वहभी उनसे काटा हुआ प्राणभयसे निकटके धोबीके घरमें घुसगया वहां नीलके रससे पूर्ण महापात्र (नाद) तयार रक्खीथी। सो कुत्तोंसे आक्रान्त हुआ उस भाण्डमें गिरपडा । जब उसमेंसे निकला तो नीला होगया तब कुत्ते उसको गीदड न जानकर यथेष्ट चले गये । चण्डरवभी दूरदेशको प्राप्तहो वनके सन्मुख चला, नीलवर्ण कभी त्यागा नहीं जाता है। कहाहै—
वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च ।
एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोर्यथा ॥ २८३ ॥
वज्रलेप मूर्ख, नारी और कर्कट (कुलीरक) और मछली इनका नील और मद्यपान करनेवालेकी समान एकही आग्रह है (वज्र लेपकी कदाचित् मुक्ति
( १२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
होजाय-परन्तु कर्कटमीनके दांतसे ग्रहण करनेसे तथा नीलवर्णके संगमें मुक्ति कठिन है) ॥ २८३ ॥
अथ तं हरगलगरलतमालसमप्रभमपूर्व सत्त्वमवलोक्य-सर्वे सिंहव्याघ्रद्वीपिवृकप्रभृतयोऽरण्यनिवासिनो भयव्याकुलितचित्ताः समन्तात् पलायनक्रियां कुर्वन्ति, कथयन्ति च “न ज्ञायतेऽस्य-कीदृग्विचेष्टितं पौरुषञ्च । तद्दूरतरं गच्छामः उक्तञ्च-
तब उसको शिवजीके गलेकी विषकी समान कान्तिमान् अपूर्व जीव देखकर सब सिंह व्याघ्र गेंडे वनवासी भयसे व्याकुल हो सब ओरसे पलायन करने लगे और कहने लगे,—“नहीं जानते इसकी कैसी चेष्टा और पराक्रम है सो दूरचलें । कहाहै-
न यस्य चेष्टितं विद्यान्न कुलं न पराक्रमम् । न तस्य विश्वसेत्प्राज्ञो यदीच्छेच्छ्रियमात्मनः ॥ २८४ ॥
जिसके चेष्टा कुल पराक्रमको न जाने यदि अपना मंगल चाहे तो बुद्धिमान् उसका विश्वास न करे ॥ २८४॥
चण्डरवोऽपि तान् भयव्याकुलितान् विज्ञाय इदमाह-“भोः भोः श्वापदाः ! किं यूयं मां दृष्ट्वैव सन्त्रस्ता व्रजथ ? तन्न भेतव्यम्, अहं ब्रह्मणा अद्य स्वयमेव सृष्ट्वाभिहितः-“यत् श्वापदानां मध्ये कश्चिद्राजा नास्ति, तत्त्वं मया अद्य सर्वश्वापदप्रभुत्वेऽभिषिक्तः ककुद्द्रुमाभिधस्ततो गत्वा क्षितितले तान् सर्वान् परिपालय” इति-ततोऽहमत्रागतः । तन्मम छत्रच्छायायां सर्वैरेव श्वापदैर्वर्तितव्यम् । अहं ककुद्द्रुमो नाम राजा त्रैलोक्येऽपि सञ्जातः” । तच्छ्रुत्वा सिंहव्याघ्रपुरःसराः श्वापदाः-“स्वामिन् ! प्रभो ! समादिश” इति वदन्तस्तं परिवव्रुः । अथ तेन सिंहस्य अमात्यपदवी प्रदत्ता, व्याघ्रस्य शय्यापालत्वं, द्वीपिनः ताम्बूलाधिकारो, वृकस्य द्वारपालकत्वम्, ये च आत्मीयाः शृगालाः तैः सह आलापमात्रमपि न करोति । शृगालाः सर्वेऽपि अर्द्धचन्द्रं
भाषाटीकासमेतम् । ( १२१ )
दत्त्वा निःसारिताः । एवं तस्य राज्यक्रियायां वर्त्तमानस्य ते सिंहादयो मृगान् व्यापाद्य तत्पुरतः प्रक्षिपन्ति । सोऽपि प्रभुधर्मेण सर्वेषां तान् प्रविभज्य प्रयच्छति । एवं गच्छति काले कदाचित् तेन सभागतेन दूरदेशे शब्दायमानस्य शृगालवृन्दस्य कोलाहलोऽश्रावि । तं शब्दं श्रुत्वा पुलकिततनुरा-नन्दाश्रुपरिपूर्णनयनः उत्थाय तारस्वरेण विरोतुमारब्धवान् । अथ ते सिंहादयस्तं तारस्वरमाकर्ण्य शृगालोऽयमिति मत्वा सलज्जमधोमुखाः क्षणमेकं स्थित्वा मिथः प्रोचुः-‘‘भो वाहिता वयमनेन क्षुद्रशृगालेन तद्वध्यताम्’’ इति ! सोऽपि तदाकर्ण्य पलायितुमिच्छन् तत्र स्थाने एव सिंहादिभिः खण्डशः कृतो मृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि ‘‘त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा येन’’ इति ।
चण्डरवभी उनको भयसे व्याकुल जानकर यह बोला-‘‘भो भो जीवो ! क्यों तुम मुझे देखकर सब ओरको भागे जाते हो ? सो मतडरो, ब्रह्माने आज स्वयंही मुझको निर्माणकर कहा है कि,-‘‘श्वापदोंके मध्यमें कोई राजा नहीं है, सो तुझे मैने आज सब जीवोंके आधिपत्यमें अभिषिक्त किया है, ककुद्द्रुम तेरा नाम है, सो जाकर पृथ्वीपर सबकी पालना करना,’’ इस कारण मैं आया हूं, सो मेरी छत्र छायामें सम्पूर्ण वनके जीवोंको वर्तना चाहिये । मैं ककुद्द्रुम राजा त्रिलोकीका अधिपतिहू’’ । यह सुन सिंह व्याघ्रादिजीव स्वामिन् ! प्रभो ! आज्ञादो ऐसा सब ओरसे कहने लगे । तब उसने सिंहको अमात्य पदवी दी, व्याघ्रको शय्यापालक, गेंडेको ताम्बूलाधिकारी, भेडियेको द्वारपालकत्व दिया और जो अपनी जातिके शृगाल थे उनसे वार्त्ताभी नहीं कीता, सब शृगाल गलवाही देकर निकाले गये, इस प्रकार उसके राजक्रियामें वर्तमान होनेसे वे सिंहादिक मृगोंको मारकर उसके आगे फेंकतेथे और वहभी प्रभुधर्मसे उन सबको विभाग कर उनके आगे डालता । इस प्रकार समय बीतनेपर कभी उसने आये हुए दुर देशमे शब्द करनेवाले शृगालसमूहका शब्द सुना । उस शब्दको सुन पुलकित शरीर अश्रुपूर्णनेत्र होकर उठ ऊचे स्वरसे शब्द करना आरभकिया । तब वे सिंहादिक उसके उच्च स्वरको जानकर ‘‘अरे ! यह शृगाल है’’ ऐसा
( १२२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जानकर लज्जासे नीचा मुखकर एकक्षण स्थित हो परस्पर बोले,-“भो ! इस क्षुद्र शृगालने हमको ठगलिया, सो इसे मार डालो,” वह भी यह वचन सुन भागनेकी इच्छा करता हुआ उस स्थानमें सिंहादिसे टुकडे किया हुआ मरगया। इससे मैं कहता हूं “जिसने आभ्यन्तर त्याग दिये है इत्यादि”
तदाकर्ण्य पिंगलक आह-“भो दमनक ! कः प्रत्ययोऽत्र विषये यत् स ममोपरि दुष्टबुद्धिः” । स आह,-“यदय ममाग्रे तेन निश्चयः कृतो यत्प्रभाते पिंगलकं वधिष्यामि तदत्रैव प्रत्ययः । प्रभातेऽवसरवेलायाम् आरक्तमुखनयनः स्फुरिताधरो दिशोऽवलोकयन् अनुचितस्थानोपविष्टस्त्वां क्रूरदृष्ट्या विलोकयिष्यति । एवं ज्ञात्वा यदुचितं तत्कर्त्तव्यम् ” इति । कथयित्वा सञ्जीवकसकाशं गतः । तं प्रणम्य उपविष्टः, सञ्जीवकोऽपि सोद्वेगाकारं मन्दगत्या समायान्तं तमुद्वीक्ष्य सादरतरमुवाच,-“भो मित्र ! स्वागतम्, चिराद्दृष्टोऽसि, अपि शिवं भवतः ? तत्कथय येनादेयमपि तुभ्यं गृहागताय प्रयच्छामि । उक्तञ्च-
यह सुनकर पिंगलक बोला,-“भो दमनक ! इसमें क्या प्रमाण है कि, वह मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि है" वह बोला-“कि आजही मेरे आगे उसने निश्चय किया है कि, प्रातःकाल पिंगलकको मारूंगा, यही इसमें प्रमाण है। प्रातःकाल आपके पास आनेके समयमें लाल मुख नेत्र किये स्फुरायमान अधर इधर उधर देखता अनुचित स्थानमे बैठा तुमको क्रूर दृष्टिसे देखेगा । ऐसा जानकर जो उचित हो सो करो" यह कह सजीवकके निकट गया, उसको प्रणाम कर बैठा । संजीवकभी उद्वेगके आकार मन्दगतिसे आते हुए उसको देख आदरसे बोला,-“भो मित्र ! तुमको चिरकालमें देखा कुशल तो हो ? सो कहो जिससे अदेय वस्तुभी तुम घरमें आये हुएके निमित्त प्रदान करूं। कहाहै-
ते धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले ।
आगच्छन्ति गृहे येषां कार्यार्थ सुहृदो जनाः ॥ २८५ ॥"
वे धन्य, वेही विवेकज्ञ, सभ्य इस भूतलमें है जिनके यहां कार्यार्थी सुहृद जन नित्य आते हैं ॥ २८५ ॥"
भाषाटीकासमेतम् । ( १२३ )
दमनक आह–“भोः ! कथं शिवं सेवकजनस्य ।
दमनक बोला–“भो सेवक जनोंको कुशल कहां ।
सम्पतयः परायत्ताः सदा चित्तमनिर्वृतम् ।
स्वजीवितेऽप्याविश्वासस्तेषां ये राजसेवकाः ॥ २८६ ॥
सम्पत्ति पराये आधीन, चित्त अशान्त, अपने जीनेमेंभी उनको अविश्वास रहता है जो राजसेवक हैं ॥ २८६ ॥
तथाच–
औरभी–
सेवया धनमिच्छाद्भिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् ।
स्वातन्त्र्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम् ॥ २८७ ॥
सेवासे धनकी इच्छा करनेवाले सेवकोंने जो किया है सो देखो कि शरीरकी जो स्वतंत्रता थी सोभी मूर्खोंने नष्ट करदी ॥ २८७ ॥
तावज्जन्मातिदुःखाय ततो दुर्गतता सदा ।
तत्रापि सेवया वृत्तिरहो दुःखपरम्परा ॥ २८८ ॥
प्रथम तो जन्मही दुःखके निमित्त फिर दरिद्रता फिर उसमें सेवावृत्ति अहो दुःखकी परम्परा है ॥ २८८ ॥
जीवन्तोऽपि मृताः पञ्च श्रूयन्ते किल भारते ।
दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः ॥ २८९ ॥
महाभारतमें पांच जीते हुए मरे सुने गये हैं दरिद्र, रोगी, मूर्ख, प्रवासी और नित्य सेवक ॥ २८९ ॥
नाश्नाति स्वेच्छयौत्सुक्याद्विनिद्रो न प्रबुध्यते ।
न निःशङ्कं वचो ब्रूते सेवकोऽप्यत्र जीवति ॥ २९० ॥
उत्कंठित रहनेसे स्वेच्छासे नहीं खाता (प्रभुके भयसे) विनिद्र होकर भी नहीं जागता निश्शंक वचन नहीं बोलता क्या सेवकभी जीताहै ॥ २९० ॥
सेवा श्ववृत्तिराख्याता यैस्तैर्मिथ्या प्रजल्पितम् ।
स्वच्छन्दं चरति श्वात्र सेवकः परशासनात् ॥ २९१ ॥
जिन्होंने सेवा श्ववृत्ति (कुत्तेकी वृत्ति) कहीहै उन्होने मिथ्याजल्पना की है कुत्ता स्वच्छन्द फिरता है और सेवकका फिरना आज्ञासे है ॥ २९१ ॥