सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६५ भौमात्तृतीयाराशिस्थफलैर्भ्रातृगणं वदेत् । बुधात्सुखफलैर्बन्धुगणं वा मातुलस्य च ॥६॥ मंगल के अष्टक वर्ग में—मंगल जिस राशि में है उससे तृतीय राशि में मंगल के अष्टकवर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं यह देखिये । उतने ही भाई उस जातक के होंगे। बुध के अष्टक वर्ग में बुध जिस राशि में है उससे चौथी राशि में कितने शुभ बिन्दु हैं ? जितने शुभ बिन्दु हों उतने ही मामा या बन्धु होंगे ॥९॥ गुरुस्थितसुतस्थाने यावतां विद्यते फलम् । शत्रु नीचग्रहं त्यक्त्वा शेषास्तस्यात्मजाः स्मृताः ॥१०॥ बृहस्पति के अष्टकवर्ग में बृहस्पति जिस राशि में है—उससे पंचम राशि में जितने शुभ बिन्दु होंगें उतने ही पुत्र होंगे । किन्तु यदि किसी शत्रु या नीच ग्रह ने इस राशि में बिन्दु प्रदान किया हो—ऐसे शत्रु, नीच ग्रह के बिन्दु कम कर दीजिये ॥१०॥ गुरोरष्टकवर्गे तु शोध्यशिष्टफलानि वै । क्रूरराशिफलं त्यक्त्वा शेषास्तस्यात्मजाः स्मृताः ॥११॥ बृहस्पति के अष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या आवे—उसमें से क्रूर राशियों में जो बिन्दु हों उन्हें कम कर दीजिये । शेष जितने बचें उतने ही पुत्र होंगे ॥११॥ फलाधिकं भृगोर्यत्र तत्र भार्याजनिर्यदि । तस्यां वंशाभिवृद्धिः स्यादल्पे क्षीणार्थसंततिः ॥१२॥ शुक्र के अष्टक वर्ग में जिन राशियों में अधिक शुभ बिन्दु हैं उस

५६६ फलदीपिका राशि में जिस कन्या का जन्म है (कन्या की चन्द्र राशि हो या जन्म लग्न हो) उससे विवाह होने से वंश की वृद्धि होगी। यदि जातक की कुंडली में शुक्र के अष्टक वर्ग में जिस राशि में थोड़े शुभ बिन्दु हों— उस जन्म लग्न या चन्द्र राशि वाली कन्या से विवाह हो तो सन्तान थोड़ी होगी। टीकाकारों ने इस श्लोक का अर्थ निम्न प्रकार से भी किया है— जिस राशि में—जातक के शुक्र के अष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु हों—उस राशि की दशा में जिस कन्या का जन्म हुआ हो, उस कन्या से विवाह विशेष सन्तानप्रद होती है और जातक के शुक्राष्टक वर्ग में जिस राशि में कम शुभ बिन्दु हों—उस दिशा में जन्म लेने वाली कन्या से विवाह करने से कम सन्तान होती है ॥१२॥ शोध्यपिण्डं शनेर्लग्नाद्धत्वा रन्ध्रफलैः सुखैः । हृत्वावशेषभं याते मन्दे जीवेऽपि वा मृतिः ॥१३॥ शनि के अष्टक वर्ग में जो शोध्यपिंड की संख्या हो—उसे शनि के अष्टक वर्ग में लग्न से अष्टम राशि में जितने शुभ बिन्दु हों उनसे गुणा कीजिये। २७ का भाग दीजिये। जो शेष आवे उस संख्या के नक्षत्र में जब गोचर से बृहस्पति या शनि जावे तो जातक की मृत्यु हो सकती है। (जब मारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा हो तभी यह फल होता है) ॥१३॥ लग्नादिमन्दान्तफलक्यसंख्या- वर्षे विपत्तिस्तु तथार्कपुत्रात् । यावद्विलग्नान्तफलानि तस्मिन्- नाशो हि तद्योगसमानवर्षे ॥१४॥

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६७ लग्न से लेकर शनि राशि जिस राशि में है उस राशि तक (जन्म लग्न तथा शनि जिस राशि में हैं दोनों को शामिल करना चाहिये और बीच की सारी राशियाँ भी शामिल होंगी) — शनि के अष्टक वर्ग में जितने शुभ बिन्दु हैं—जोड़िये। यह जो संख्या आवे जातक के जीवन में इस वर्ष में विपत्ति होगी। इसी प्रकार शनि जिस राशि में है—उससे लग्न तक (शनि जिस राशि में है तथा लग्न दोनों को बीच की राशियों के साथ शामिल कीजिये)—शनि के अष्टक वर्ग में कितने बिन्दु हैं—इनको जोड़िये। यह जो जोड़ आवे इसके बराबर वाले वर्ष में—(जैसे जोड़ १५ आया तो १५वें वर्ष में) कष्ट होगा ॥१५॥ अष्टमस्थफलैर्लग्नात्पिण्डं हत्वा सुखैर्भजेत् । फलमायुर्विजानीयात्प्राग्वद्धेलां तु कल्पयेत् ॥१५॥ शनि के अष्टक वर्ग में जो शोध्यपिण्ड आवे उसे लग्न से अष्टम में जितने शुभ बिन्दु हों उनसे गुणा कीजिये। जो गुणनफल आवे उसमें २७ का भाग दीजिये। जो लब्धि आवे—उतने वर्ष की आयु जातक की होगी। मृत्यु का समय पूर्वलिखित नियमों के अनुसार निश्चित करे ॥१५॥ त्रिकोणेषु तु यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत् । एकस्मिन् भवने शून्ये तत्तत्रिकोणं न शोधयेत् ॥१६॥ भवनद्वयशून्ये तु शोधयेदन्यमन्दिरम् । समत्वे सर्वगेहेषु सर्वं संशोधयेत्तदा ॥१७॥ त्रिकोण शोधन : अब त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन बताया जावेगा। यह अष्टक वर्ग का एक आवश्यक अंग है। मन्त्रेश्वर का इस सम्बन्ध में

५६८ फलदीपिका क्या विचार है यह बताने से पहिले इस विषय का थोड़ा सा परिचय दे देना जरूरी है जिससे पाठकों को श्लोकों को समझने में कठिनता न हो । (i) मेष, सिंह और धनु एक त्रिकोण बनाते हैं क्योंकि मेष से सिंह पाँचवीं राशि, सिंह से धनु पाँचवीं और धनु से मेष पाँचवीं राशि होती है । (ii) इसी प्रकार वृष कन्या और मकर यह दूसरा त्रिकोण हुआ । (iii) मिथुन, तुला, कुंभ यह तीसरा त्रिकोण हुआ । (iv) कर्क, वृश्चिक, मीन यह चौथा त्रिकोण हुआ । पहिले अष्टक वर्ग बनाने का प्रकार बता चुके हैं । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि इन सातों ग्रहों के सात अष्टक वर्ग बने । प्रत्येक अष्टक वर्ग का अलग-अलग त्रिकोण शोधन होता है । मान लीजिये आपको सूर्य अष्टक वर्ग का त्रिकोण शोधन करना है तो देखिये मेष, सिंह तथा धनु तीनों राशियों में कितने बिन्दु हैं : मेष में ३, सिंह में ५ तथा धनु में ४ हैं । अब संस्कृत के आचार्यों में—ज्योतिष के मनीषियों में—विविध उद्भट विद्वानों में मतभेद है कि त्रिकोण शोधन किस प्रकार किया जावे : (१) प्रथम मत यह है कि त्रिकोण की तीनों राशियों में—जिसमें सबसे कम संख्या हो उसे अन्य त्रिकोण की बाकी जो दो राशियाँ हैं—उनमें जो संख्या है—उनमें से घटाइये । उदाहरण के लिये सूर्य के अष्टक वर्ग में मेष में ३, सिंह में ५ तथा धनु में ४ हैं । इन तीनों में सबसे कम संख्या ३ है तो इस ३ को सिंह राशि में जो ५ संख्या है उसमें से घटा कर सिंह राशि के नीचे ५—३ = २ स्थापित

  • आगे के पृष्ठ पर सर्वाष्टक वर्ग दिया जा रहा है जिसकी त्रिकोण शोधन में आवश्यकता पड़ेगी ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६९ सर्वाष्टक वर्ग

ग्र०/रा०मे०वृ०मि०क०सिं०क०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०योग
सू०३७४४५३४५४३५१४८
चं०४५४४६३३१३६३४४९
मं०४४३२५४४२२४३२३९
बु०४५४२५७४५५४४४५४
बृ०५५४४७७२५६५३३५६
शु०४३६५५४५४३४६३५२
श०२४३१७६४३१३३२३९
योग२६३३२८२४४०३६२६२५२४२९२३१९३३७

५७० फलदीपिका कीजिये । इसी प्रकार ३ को—धनु राशि में जो ४ संख्या है उसमें से घटाकर धनु राशि के नीचे ४-३=१ यह संख्या स्थापित कीजिये । मेष में ३-३=० रहेगा । इसी प्रकार सूर्याष्टक वर्ग में वृष, कन्या, मकर—इन तीनों त्रिकोण राशियों को लीजिये—वृष में ७ संख्या है, कन्या में ३ तथा मकर में ३ । इन तीनों में अर्थात् ७ तथा ३ तथा ३ में—३ सबसे कम है । इस कारण ३ को ७ में से घटाकर वृष में ४ तथा कन्या में ३-३ =० एवं मकर में ३-३=० रखिये यह सामान्य नियम होना चाहिये । अब मिथुन, तुला तथा कुंभ राशियों में सूर्याष्टक वर्ग में कितने बिन्दु हैं यह देखिये । मिथुन में ४, तुला में ४ तथा कुंभ में ५ हैं। उपर्युक्त नियम के अनुसार सब से कम संख्या ४ है, इसलिये इस ४ को—तीनों राशि की संख्याओं में से-प्रत्येक में से घटाकर मिथुन में ४-४=०, तुला में ४-४=० तथा कुंभ में ५-४=१ स्थापित करना चाहिये यह सामान्य नियम हुआ । अब चौथा त्रिकोण लीजिये अर्थात् सूर्याष्टक वर्ग की कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ । कर्क में ४ संख्या है, वृश्चिक में ५ तथा मीन में १ । इनमें सबसे कम संख्या १ है । इसलिये इस १ को कर्क वाली ४ संख्या में से घटाकर कर्क में ४-१=३ रखिये तथा वृश्चिक में ५-१=४ स्थापित कीजिये । मीन में तो १-१=० हो ही जावेगा । इस नियम को जिसे "प्रथम-मत" के नाम से ऊपर समझाया गया है—हम निम्नलिखित प्रकार से निर्दिष्ट कर सकते हैं: (क) त्रिकोण की तीन राशियों में—जिसमें सबसे कम संख्या है—उस सबसे कम वाली संख्या को--त्रिकोण की दोनों राशियों में से अलग-अलग घटाकर जो शेष बचें, उन-उन शेष को--उन-उन राशियों के नीचे स्थापित करे ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७१ (ख) यदि त्रिकोण की एक राशि में शून्य हो तो उस शून्य को त्रिकोण की अन्य दो राशियों को घटाने से कोई अन्तर नहीं पड़ेगा और त्रिकोण की अन्य दो राशियों में जो संख्या पहिले से थी वह वैसी की वैसी रहेगी । (ग) यदि त्रिकोण की तीनों राशियों में समान संख्या हो तो -उस संख्या को त्रिकोण की तीनों राशियों में से घटाने से-तीनों ही जगह ० शेष रहेगा । उदाहरण के लिये आपको मंगल के अष्टक वर्ग में त्रिकोण शोधन करना है और वृष, कन्या, मकर इस त्रिकोण का शोधन करना है; तो देखिये मंगल के अष्टक वर्ग में वृष में ४ संख्या है, कन्या में भी ४ है तथा मकर में भी ४ । अब इस '४' को वृष के ४ में से घटाया तो ४-४ = ० शेष रहा । इसी प्रकार कन्या में ४-४ = ० और मकर में भी ४-४ = ० शेष हुआ । यह ऊपर जो प्रथम मत बताया गया है वह पराशर का है । दूसरा मत : अब दूसरा मत दिया जाता है । मान लीजिये आप को सूर्याष्टक वर्ग का त्रिकोण शोधन करना है । मेष में ३ है, सिंह में ५ तथा धनु में ४ । इन तीनों में सब से कम संख्या ३ है । इसलिये मेष में ३, सिंह में भी ३ रखिये तथा धनु में भी ३ । वृषभ में ७ है, कन्या में ३ तथा मकर में ३ तो, इनमें न्यून संख्या ३ है । इस कारण वृष में भी ३ रखिये, कन्या में ३ तथा मकर में ३ तो रहेंगी ही । सूर्याष्टक वर्ग में मिथुन में ४, तुला में ४ तथा कुंभ में ५ है। सबसे कम ४ है—इसलिये कुंभ में ४ स्थापित कीजिये । मिथुन तथा तुला में तो—प्रत्येक में ४ रहेंगी ही । कर्क में ४, वृश्चिक में ५ तथा मीन में १ है। सबसे कम '१'

५७२ फलदीपिका है । इसलिये सूर्याष्टक वर्ग के त्रिकोण शोधन के उपरान्त कर्क में १, वृश्चिक में १ तथा मीन में १ रखिये । यह द्वितीय मत "होरा-रत्न" के लेखक बलभद्रजी का है । पराशर का मत उत्तर भारत में विशेष प्रचलित है । बलभद्रजी का दक्षिण भारत में : मूल ग्रंथ का संस्कृत श्लोकांश निम्नलिखित है :— त्रिकोणेषु तु यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत् अर्थात् त्रिकोणों में जो कम है उसके बराबर तीनों में शोधन करे । एक मत कहता है कि इसका अर्थ हुआ उस न्यून संख्या को तीनों में से कम करे । दूसरा मत कहता है—उस न्यून संख्या के बराबर—तीनों में रखें । मन्त्रेश्वर का मत : मंत्रेश्वर महाराज ने अपनी फलदीपिका में संस्कृत के वही शब्द दिये हैं जो पराशर जी या बलभद्र जी के ग्रंथों में मिलते हैं अर्थात् श्लोक १६ और १७ । अर्थात् (१) सूर्य या किसी अन्य ग्रह के अष्टक वर्ग में त्रिकोण शोधन करना हो तो—त्रिकोण की तीनों राशियों में से जिसमें सबसे कम संख्या हो उसके समान तीनों में शोधन करे । प्रश्न उठता है कि उसके समान संख्या तीनों में घटा कर शोधन करे—अर्थात् घटाकर शेष स्थापित करे या उसके समान संख्या शोधन करे अर्थात् उसके समान संख्या स्थापित करे । उपर्युक्त श्लोकों के दो अर्थ हो सकते हैं। पराशर जी के टीका- कार जो अर्थ करते चले आये हैं—वह प्रथम मत के नाम से ऊपर समझाया गया है। बलभद्र जी इसी श्लोक की जो व्याख्या होरारत्न में करते हैं—और जो दक्षिण भारत में प्रचलित है वह द्वितीय मत के नाम से ऊपर कह चुके हैं ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७३ (२) यदि त्रिकोण की दो राशियों में शून्य हो तो तीसरी राशि का शोधन करें। अर्थात् तीसरी राशि में भी शून्य स्थापित करे। (इस मत से बलभद्रजी के मत की पुष्टि होती है। क्योंकि पराशरजी के टीकाकारों के अनुसार तो—न्यून को अधिक में से घटाकर—शेष को अधिक के स्थान में रखना। शून्य को अधिक में से घटाया तो जैसी संख्या थी वैसी ही रहनी चाहिये। परन्तु फलदीपिकाकार लिखते हैं कि उसे शोधन करे तो इसका अर्थ यही हुआ कि वहाँ भी ० स्थापित करे। (३) यदि तीनों राशियों में समान संख्या हो तो तीनों को शोधन करे। अर्थात् तीनों राशियों में ० रखें। *जातक पारिजात का भी मत है कि (१) त्रिकोण की तीनों राशियों में—जिसमें सबसे कम वाली संख्या हो—वही सबसे कम वाली संख्या अन्य दोनों राशियों में स्थापित कर, (२) यदि तीनों राशियों में से एक में शून्य हो तो बाकी दोनों का शोधन न करे,(३) यदि तीनों में समान संख्या हो तो सबके स्थान में ० रख दे। प्रश्न मार्ग का मत है कि भूचक्रे निहतेऽष्टवर्गजफले भेषु त्रिकोणेषु यन्न्यूनं तेन समं त्यजेत्त्रिषु च यद्येकत्र न स्यात् फलम् । जह्यात् सर्वमथान्ययोर्यदि फलान्येकत्र चेत्केवलं जह्यात्तानि यदा समं त्रिषु तदा सर्वं विशोध्यं ततः ॥ इस मत के अनुसार यदि त्रिकोण की एक अथवा दो राशियों में कोई संख्या न हो तो—तो त्रिकोण की तीनों राशियों में ० स्थापित करे। यदि तीनों में समान संख्या हो तो भी तीनों राशियों में ० रखे। *देखिये जातक पारिजात अध्याय १० श्लोक ३८।

५७४ फलदीपिका

मेषवृषमिथुनकर्कसिंहकन्यातुलावृ.धनमकरकुं.मी.योग
३७४४५३४५४३५१४८
घटाइये३३४१३३४१३३४१३३
शेष०४०३२००४२०१०१५
यह

?) * Wait, look at row 2! * "घटाइये" * What are the numbers in row 2? * मे: ३ * वृ: ५ (wait, row 1 is ५, row 2 is ५) * मि: ३? Wait, under मि., row 2 is ३! (Wait, look at the glyph in col 3 row 2: it is a ३, but slightly slanted? No, in col 3 row 2, it is a ३. But wait, why is row 3 a २? Wait, row 1 is ५? If row 1 is ५, and row 2 is ३, then 5 - 3 = 2!) * Wait! Look at col 3 (मि.): Row 1 is ५? Wait, look at col 1 (४) vs col 3: col 3 row 1 is ४. Col 1 row 1 is ४. Col 4 row 1 is ४. Col 12 row 1 is ४. * Wait, let's look at the Mangal table first, because Mangal is crystal clear! * मंगल का अष्टक वर्ग (त्रिकोण शोधन) * Row 1: मे ४ | वृ ४ | मि ३ | क २ | सिं ५ | क ४ | तु ४ | वृ

५७६ फलदीपिका बुध का अष्टक वर्ग (त्रिकोण शोधन)

मे.वृ.मि.क.सिं.कन्यातु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
४५४४५६४५५४४४५४
घटाइये४४४४४४४४४४४४
शेष०१००१२०११०००
बृहस्पति का अष्टक वर्ग (त्रिकोण शोधन)
मे.वृ.मि.क.सिं.कन्यातु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
:---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---:
५५४४७७२५६५३३५६
घटाइये५५२३५५२३५५२३
शेष००२१२२०२१०१०

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७७ शुक्र का अष्टक वर्ग (त्रिकोण शोधन)

मे.वृ.मि.क.सिं.कन्यातु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
४३६५५४५४३४६३५२
घटाइये३३५३३३५३३३५३४२
शेष१०१२२१०१०११०१०
शनि का अष्टक वर्ग (त्रिकोण शोधन)
मे.वृ.मि.क.सिं.कन्या

५७८ फलदीपिका त्रिकोण शोधन के बाद मेष, वृश्चिक, वृष-तुला मिथुन-कन्या, धनु-मीन, मकर-कुंभ इन दो दो राशियों में निम्नलिखित १४ प्रकार की परिस्थिति हो सकती है । एक राशि दूसरी राशि ग्रहयुक्त ग्रहयुक्त १. समान बिन्दु समान बिन्दु २. अधिक " कम " ३. अधिक " शून्य " ४. शून्य " शून्य " —————————————— —————————————— ग्रहयुक्त ग्रहहीन ५. समान बिन्दु समान बिन्दु ६. अधिक " कम " ७. अधिक " शून्य " ८. कम " अधिक " ९. शून्य " अधिक " १०. शून्य " शून्य " —————————————— —————————————— ग्रहहीन ग्रहहीन ११. समान बिन्दु समान बिन्दु १२. अधिक " कम " १३. अधिक " शून्य " १४. शून्य " शून्य "

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७९ शून्य बिन्दु का अर्थ है कि कोई बिन्दु नहीं हो । एकाधिपत्य शोधन के नियम नीचे दिये जाते हैं । (क) १, २, ३, ४, ७, ९, १०, १३, १४ की परिस्थिति (हालत) में कोई शोधन नहीं होता। जैसी संख्या बिन्दुओं की है वैसी ही रहने दी जाती है । (ख) यदि उपर्युक्त नं० ५ या ६ की परिस्थिति हो तो दूसरी राशि (जिसमें ग्रह नहीं है) में से सब बिन्दु हटा दीजिये । ग्रह युक्त राशि की संख्या वैसी ही रहेगी । (ग) यदि नं० ८ में वर्णित हालत हो तो इस दूसरी राशि में से उतने ही बिन्दु कर दीजिये जितने पहली राशि (ग्रह युक्त राशि) में हों । पहली राशि (ग्रहयुक्त) में जितनी संख्या थी उतनी ही रहेगी । (घ) यदि नं० ११ की परिस्थिति हो तो—दोनों राशियों में संख्या हटा कर ० लिख दीजिये । (ङ) यदि नं० १२ में वर्णित हालत हो तो—जितनी कम बिन्दु वाली राशि में संख्या हो उतनी दोनों में कर दीजिये । संस्कृत के मूल इलोकों की भाषा इस प्रकार की है कि कई प्रकरणों में दो पृथक्-पृथक् (अलग, अलग) अर्थ हो सकते हैं—ऐसी स्थिति में पाठकों की सुविधा के लिये उन अर्थों को अंगीकार किया गया है जो पराशर से अधिक मेल खाते हैं, जिनमें स्पष्ट पराशर से मतभेद है वहाँ मंत्रेश्वर का ही मत दिया गया है । यह दर्शनशास्त्र तो है नहीं कि अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर भिन्न भिन्न शाखाओं की व्याख्या कर उस विषय को वहीं छोड़ दिया जावे—जैसे भगवद् गीता में सन्यास परक, निष्काम कर्म परक, भक्ति परक सांख्य, योग आदि के सिद्धान्तों को प्रतिपादन करने वाले भिन्न-भिन्न अर्थों की टीका-भाष्य बड़े-बड़े विद्वानों ने की है—कोई विद्वान् कम नहीं— अब जिसकी जैसी रुचि हो वैसे सिद्धान्त को ग्रहण करे—यह ज्योतिष

५८० फलदीपिका का विषय तो गणित का विषय है। एक सिद्धान्त पर आना पड़ेगा कि इस कोष्ठ में २ रखा जावे या ३, या ४ इत्यादि । जो विद्वान् पाठक तुलनात्मक अध्ययन करना चाहें वे विविध मूल ग्रंथों के वाक्यों का समन्वय या तारतम्य कर सकते हैं—पर इस हिन्दी पुस्तक का उद्देश्य तो नवीन पाठकों को निश्चयात्मक रूप से एक पद्धति या क्रम बताने का है—जिससे वे इसमें बताये गये नियम लागू कर किसी जन्म कुण्डली का त्रिकोण शोधन, एकाधिपत्य शोधन कर सकें। अब उदाहरण कुण्डली का एकाधिपत्य शोधन नीचे दिया जाता है :— त्रिकोणशोधनां कृत्वा पश्चादैकाधिपत्यकम् । क्षेत्रद्वये फलानि स्युस्तदा संशोध्येत्सुधीः ॥१८॥ ग्रहयुक्ते फलैर्हीने ग्रहाभावे फलाधिके । ऊनेन सहशन्त्वस्मिन् शोधयेद्ग्रहवर्जिते ॥१९॥ फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् । सग्रहाग्रहतुल्यत्वे सर्वं संशोध्यमग्रहात् ॥२०॥ उभाभ्यां ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् । उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यं कदाचन ॥२१॥ एकस्मिन् भवने शून्ये न संशोध्यं कदाचन । द्वावग्रहौ चेद्यन्न्यूनं तत्तुल्यं शोधयेद्द्वयोः ॥२२॥ शोध्यावशिष्टं संस्थाप्य राशिमानेन वर्द्धयेत् । ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्द्धयेत् ॥२३॥

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८१ सूर्य का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सि.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
०४०३२००४१०१०
शोधन के बाद०४०३२००४१०१०१५
चन्द्रमा का एकाधिपत्य शोधन
मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
:---:---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---:
१०१३३१०००१०३३
शोधन के बाद१००३३००००१०३११

५८२ फलदीपिका मंगल का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
२०००३०१०००००
शोधन के बाद२०००३०१०००००६
बुध का एकाधिपत्य शोधन
मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
:---:---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---::---:
०१००१२०११०००
शोधन के बाद०१००१२०११०००६

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५८३

बृहस्पति का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
००२१२२०२१११०
शोधन के बाद०००१२००२१०००७

शुक्र का एकाधिपत्य शोधन

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
१०१२२१०१०११०
शोधन के बाद१००२२००१००००६

५८४ फलदीपिका गोसिंहौ दशगुणितौ वसुभिर्मिथुनालिभे । वणिङ्ऽमेषो च मुनिभिः कन्यकामकरे शरैः ॥२४॥ शेषाः स्वमानगुणिताः कर्किचापघटीझषाः । एते राशिगुणाः प्रोक्ताः पृथग्ग्रहगुणाः पृथक् ॥२५॥ जीवारशुक्रसौम्यानां दशवसुसप्तेन्द्रियैः क्रमाद्गुणिता । बुधसंख्या शेषारणां राशिगुणाद्ग्रहगुणः पृथक्कार्यः ॥२६॥ शोध्यपिंड अब एकाधिपत्य शोधन के बाद जो प्रत्येक अष्टक वर्ग में योग आया वह शोध्यपिंड हुआ :—पृष्ठ ५८१-५८५ देखिये । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि १५ ११ ६ ६ ७ ५ १४ यह इस उदाहरण कुंडली का शोध्य पिंड है। भिन्न-भिन्न कुंडलियों में भिन्न-भिन्न शोध्यपिंड आवेगा। मंत्रेश्वर ने शोध्य पिंड की परिभाषा ऊपर श्लोक में यह की है कि दोनों शोधन (त्रिकोण और एकाधि- पत्य) के बाद जो बचे उनका जोड़ शोध्य पिंड कहलाता है । परा- शर के मत से राशिगुणक के बाद जो गुणनफल आवे और ग्रह गुणक के बाद जो गुणनफल आवे दोनों के योग (जोड़) को शोध्यपिंड कहते हैं । राशिगुणक और ग्रहगुणक एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या प्रति राशि के नीचे प्राप्त हो उसको राशिगुणक (प्रति राशि के लिए नीचे बताया गया है कि किस संख्या से गुणा करें—उस संख्या को राशिगुणक कहते हैं) से गुणा करे । इसी प्रकार एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या बचे उसे ग्रह