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प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७


संवत्सरः कालात्मा प्रजापतिः चन्द्रादित्यलक्षणोऽपि जगतः कारणम् ॥ ११ ॥चन्द्रमा और सूर्यरूपसे भी कालस्वरूप संवत्सरात्मक प्रजापति ही जगत्का कारण है ॥ ११ ॥
यस्मिन्निदं श्रितं विश्वं स एव प्रजापतिः संवत्सराख्यः स्वावयवे मासे कृत्स्नः परिसमाप्यते ।जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् आश्रित है वह संवत्सर नामक प्रजापति ही अपने अवयवरूप मासमें पूर्णतया परिसमाप्त हो जाता है—

मासादिमें प्रजापति आदि दृष्टि

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

मास ही प्रजापति है । उसका कृष्णपक्ष ही रयि है और शुक्लपक्ष प्राण है । इसलिये ये [ प्राणोपासक ] ऋषिगण शुक्लपक्षमें ही यज्ञ किया करते हैं तथा दूसरे [ अन्नोपासक ] दूसरे पक्षमें यज्ञ करते हैं ॥ १२ ॥

| मासो वै प्रजापतिर्यथोक्तलक्षण एव मिथुनात्मकः । तस्य मासात्मनः प्रजापतेरेको भागः कृष्णपक्षो रयिरन्नं चन्द्रमाः । अपरो भागः शुक्लपक्षः प्राण आदित्योऽत्ताग्निः । यस्माच्छुक्लपक्षात्मानं प्राणं सर्वमेव पश्यन्ति तस्मात्प्राणदर्शिन एत ऋषयः | मास ही उपर्युक्त लक्षणोंवाला मिथुनात्मक प्रजापति है । उस मासस्वरूप प्रजापतिका एक भाग—कृष्णपक्ष तो रयि—अन्न अथवा चन्द्रमा है तथा दूसरा भाग—शुक्लपक्ष ही प्राण—आदित्य अर्थात् भोक्ता अग्नि है । क्योंकि वे शुक्लपक्षस्वरूप प्राणको सर्वात्मक देखते हैं और उन्हें कृष्णपक्ष भी प्राणसे भिन्न दिखलायी नहीं देता इसलिये ये प्राणदर्शी |

१८ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


कृष्णपक्षेऽपीष्टं यागं कुर्वन्ति प्राणव्यतिरेकेण कृष्णपक्षस्तैर्न दृश्यते यस्मात् । इतरे तु प्राणं न पश्यन्तीत्यदर्शनलक्षणं कृष्णात्मानमेव पश्यन्ति । इतरस्मिन् कृष्णपक्ष एव कुर्वन्ति शुक्ले कुर्वन्तोऽपि ॥ १२ ॥ऋषिलोग कृष्णपक्षमें भी [ उसे शुक्लपक्षरूप समझकर ही ] अपना इष्ट—याग किया करते हैं । तथा दूसरे ऋषि प्राणका दर्शन नहीं करते; इसलिये वे सब‌को अदर्शनात्मक कृष्णपक्षरूप ही देखते हैं और शुक्लपक्षमें यागानुष्ठान करते हुए भी इतर यानी कृष्णपक्षमें ही करते हैं ॥ १२ ॥

दिन-रातका प्रजापतित्व

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

दिन-रात भी प्रजापति हैं । उनमें दिन ही प्राण है और रात्रि ही रयि है । जो लोग दिनके समय रतिके लिये [ स्त्रीसे ] संयुक्त होते हैं वे प्राणकी ही हानि करते हैं और जो रात्रिके समय रतिके लिये [ स्त्रीसे ] संयोग करते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥

सोऽपि मासात्मा प्रजापतिः स्वावयवेऽहोरात्रे परिसमाप्यते । अहोरात्रो वै प्रजापतिः पूर्ववत् । तस्याप्यहरेव प्राणोऽत्ताग्नी रात्रिरेव रयिः पूर्ववत् । प्राणमहरात्मानं वा एते प्रस्कन्दन्ति निर्गमयन्ति शोषयन्तिवह मासात्मक प्रजापति भी अपने अवयवरूप दिन-रात्रिमें समाप्त हो जाता है । पहलेकी तरह अहोरात्रि भी प्रजापति है—उसका भी दिन ही प्राण—भोक्ता यानी अग्नि है और पूर्ववत् रात्रि ही रयि है । वे लोग दिनरूप प्राणको ही क्षीण करते—निकालते—सुखाते अथवा अपनेसे पृथक् करके

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९


वा स्वात्मनो विच्छिद्यापनयन्ति; के ? ये दिवाऽहनि रत्या रति-कारणभूतया सह स्त्रिया संयुज्यन्ते मिथुनं मैथुनमाचरन्ति मूढाः। यत एवं तस्मात्तन्न कर्तव्यमिति प्रतिषेधः प्रासङ्गिकः। यद्रात्रौ संयुज्यन्ते रत्या ऋतौ ब्रह्मचर्यमेव तदिति प्रशस्तत्वादृतौ भार्यागमनं कर्तव्यमित्ययमपि प्रासङ्गिको विधिः। प्रकृतं तूच्यते—सोऽहोरात्रात्मकः प्रजापतिर्व्रीहियवाद्यन्नात्मना व्यवस्थितः ॥ १३ ॥नष्ट करते हैं । कौन ? जो कि मूढ होकर दिनके समय रति—रतिकी कारणस्वरूपा स्त्रीसे संयुक्त होते हैं, अर्थात् मिथुन यानी मैथुन करते हैं । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये ऐसा नहीं करना चाहिये—यह प्रासङ्गिक प्रतिषेध प्राप्त होता है । तथा ऋतुकालमें जो रात्रिके समय रतिसे संयुक्त होते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है; अतः प्रशस्त होनेके कारण ऋतु रात्रिमें स्त्री-गमन करना चाहिये—यह भी प्रासङ्गिक विधि ही है, अब प्रकृत विषय [ अगले मन्त्रसे ] कहा जाता है । वह अहोरात्रात्मक प्रजापति [ इस प्रकार क्रमशः परिणामको प्राप्त होकर ] व्रीहि और यव आदि अन्नरूपसे स्थित हुआ है ॥ १३ ॥

एवं क्रमेण परिणम्य तत्इस प्रकार क्रमशः परिणामको प्राप्त होकर वह

अन्नका प्रजापतित्व

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥१४॥

अन्न ही प्रजापति है; उसीसे वह वीर्य होता है और उस वीर्य-हीसे यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है ॥ १४ ॥

२०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न १
अन्नं वै प्रजापतिः। कथम् ? ततस्तस्माद्ध वै रेतो नृबीजं तत्प्रजाकारणं तत्साद्योषित्ति सिक्तादिमा मनुष्यादिलक्षणाः प्रजाः प्रजायन्ते ।अन्न ही प्रजापति हैं । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं—] उस अन्नसे ही प्रजाका कारणरूप रेत—पुरुषका वीर्य उत्पन्न होता है; और स्त्रीकी योनिमें सींचे गये उस वीर्यसे ही यह मनुष्यादिरूप प्रजा उत्पन्न होती है ।
यत्पृष्टं कुतो ह वै प्रजाः प्रजायन्त इति । तदेवं चन्द्रादित्यमिथुनादिक्रमेणाहोरात्रान्तेनान्नासृग्रेतोद्वारेणेमाः प्रजाः प्रजायन्त इति निर्णीतम् ॥ १४ ॥हे कबन्धिन् ! तूने जो पूछा था कि यह सम्पूर्ण प्रजा कहाँसे उत्पन्न होती है ? सो चन्द्रमा और आदित्यरूप मिथुनसे लेकर अहोरात्रपर्यन्त क्रमसे अन्न, रक्त एवं वीर्यके द्वारा ही यह सारी प्रजा उत्पन्न होती है—ऐसा निर्णय हुआ ॥ १४ ॥

प्रजापतिव्रतका फल

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

इस प्रकार जो भी उस प्रजापतिव्रतका आचरण करते हैं वे [ कन्या-पुत्ररूप ] मिथुनको उत्पन्न करते हैं । जिनमें कि तप और ब्रह्मचर्य है तथा जिनमें सत्य स्थित है उन्हींको यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ १५ ॥

तत्तत्रैवं सति ये गृहस्थाः— <br> 'ह वै' इति प्रसिद्धस्मरणार्थौऐसी स्थिति होनेके कारण जो गृहस्थ उस प्रजापतिव्रत—प्रजापतिके व्रतका आचरण करते हैं, यानी

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१


निपातौ—तत्प्रजापतेर्व्रतं प्रजापतिव्रतमृतौ भार्यागमनं चरन्ति कुर्वन्ति तेषां दृष्टफलमिदम् । किम् ? ते मिथुनं पुत्रं दुहितरं चोत्पादयन्ते । अदृष्टं च फलमिष्टापूर्तदत्तकारिणां तेषामेव एष यश्चान्द्रमसो ब्रह्मलोकः पितृयाणलक्षणो येषां तपः स्नातकव्रतादीनि, ब्रह्मचर्यम्—ऋतौ अन्यत्र मैथुनासमाशरणं ब्रह्मचर्यम्, येषु च सत्यमनृतवर्जनं प्रतिष्ठितमव्यभिचारितया वर्तते नित्यमेव ॥ १५ ॥ऋतुकालमें स्त्रीगमन करते हैं—यहाँ 'ह' और 'वै' ये निपात प्रसिद्धका स्मरण दिलानेके लिये हैं—उन (ऋतुकालाभिगामियों) को यह दृष्ट फल मिलता है। क्या फल मिलता है ? वे मिथुन यानी पुत्र और कन्या उत्पन्न करते हैं। [इस दृष्ट फलके सिवा] उन इष्ट पूर्त और दत्त कर्मकर्ताओंको, जिनमें कि स्नातकव्रतादि तप, ऋतुकालसे अन्य समय स्त्रीगमन न करनारूप ब्रह्मचर्य और असत्यत्यागरूप सत्य अव्यभिचरितरूपसे प्रतिष्ठित है यह अदृश्य फल मिलता है जो कि चन्द्रलोकमें स्थित पितृयाणरूप ब्रह्मलोक है ॥ १५ ॥

यस्तु पुनरादित्योपलक्षित उत्तरायणः प्राणात्मभावो विरजः शुद्धो न चन्द्रब्रह्मलोकवद्रजस्वलो वृद्धिक्षयादियुक्तोऽसौ तेषां केषामित्युच्यते—किन्तु जो चन्द्रलोकसम्बन्धी ब्रह्मलोकके समान मलयुक्त और वृद्धिक्षय आदिसे युक्त नहीं है बल्कि सूर्यसे उपलक्षित उत्तरायणसंज्ञक विरज—विशुद्ध प्राणात्मभाव है वह उन्हें प्राप्त होता है; किन्हें प्राप्त होता है ? इसपर कहा जाता है—

उत्तरमार्गावलम्बियोंकी गति

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥

३२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


जिनमें कुटिलता अनृत और माया (कपट) नहीं है उन्हें यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ १६ ॥

यथा गृहस्थानामनेकविरुद्ध-संव्यवहारप्रयोजनवत्त्वाज्जिह्मं कौटिल्यं वक्रभावोऽवश्यंभावि तथा न येषु जिह्मम् । यथा च गृहस्थानां क्रीडानर्मादिनिमित्तम् अनृतमवर्जनीयं तथा न येषु तत् । तथा माया गृहस्थानामिव न येषु विद्यते । माया नाम बहिरन्यथात्मानं प्रकाश्यान्यथैव कार्यं करोति सा माया मिथ्याचाररूपा । मायेत्येवमादयो दोषा येष्वधिकारिषु ब्रह्मचारिवानप्रस्थभिक्षुषु निमित्ताभावान्न विद्यन्ते तत्साधनानुरूपेणैव तेषाम् असौ विरजो ब्रह्मलोक इत्येषा ज्ञानयुक्तकर्मवतां गतिः। पूर्वोक्तस्तु ब्रह्मलोकः केवलकर्मिणां चन्द्रलक्षण इति ॥ १६ ॥जिस प्रकार अनेकों विरुद्ध व्यवहाररूप प्रयोजनवाला होनेसे गृहस्थमें जिह्म—कुटिलता यानी वक्रता होना निश्चित है उस प्रकार जिनमें जिह्म नहीं है, गृहस्थोंमें जिस प्रकार क्रीडादि-निमित्तसे होनेवाला अनृत अनिवार्य है वैसा जिनमें अनृत नहीं है तथा जिनमें गृहस्थोंके समान मायाका भी अभाव है । अपने-आपको बाहरसे अन्य प्रकार प्रकट करते हुए जो अन्यथा कार्य करना है वही मिथ्याचाररूपा माया है । इस प्रकार जिन एकान्तनिष्ठ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ और भिक्षुओंमें, कोई निमित्त न रहनेके कारण, माया आदि दोष नहीं हैं उन्हें उनके साधनोंकी अनुरूपतासे ही यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है । इस प्रकार यह ज्ञान (उपासना) सहित कर्मानुष्ठान करनेवालोंकी गति कही । पूर्वोक्त चन्द्रमारूप ब्रह्मलोक तो केवल कर्मठोंके लिये ही कहा है ॥ १६ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये प्रथमः प्रश्नः ॥ १ ॥

द्वितीय प्रश्न (प्राणका प्राधान्य व सर्वाश्रयत्व)

द्वितीय प्रश्न


प्राणोऽत्ता प्रजापतिरित्युक्तम्। तस्य प्रजापतित्वमत्तृत्वं च अस्मिञ्शरीरेऽवधारयितव्यमिति अयं प्रश्न आरभ्यते—प्राण भोक्ता प्रजापति है—यह पहले कहा। उसका प्रजापतित्व और भोक्तृत्व इस शरीरमें ही निश्चित करना चाहिये—इसीलिये यह प्रश्न आरम्भ किया जाता है—

भार्गवका प्रश्न—प्रजाके आधारभूत कौन-कौन देवगण हैं ?

अथ हैनँ भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन्कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे विदर्भदेशीय भार्गवने पूछा—‘भगवन् ! इस प्रजाको कितने देवता धारण करते हैं ? उनमेंसे कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं ? और कौन उनमें सर्वश्रेष्ठ है ?’ ॥ १ ॥

अथानन्तरं ह किलैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । हे भगवन् कत्येव देवाः प्रजां शरीरलक्षणां विधारयन्ते विशेषेण धारयन्ते । कतरे बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियविभक्तानामेतत्प्रकाशनं स्वमाहात्म्यप्रख्यापनं प्रकाशयन्ते । कोऽसौ पुनरेषां वरिष्ठः प्रधानः कार्यकारणलक्षणानामिति ॥ १ ॥तदनन्तर उनसे विदर्भदेशीय भार्गवने पूछा—‘हे भगवन् ! इस शरीररूप प्रजाको कितने देवता विधारण करते यानी विशेषरूपसे धारण करते हैं, तथा ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंमें विभक्त हुए उन देवताओंमेंसे कौन इसे प्रकाशित करते हैं—अपने माहात्म्यको प्रकट करना ही प्रकाशन है—और इन भूत एवं इन्द्रिय देवताओंमेंसे कौन सर्वश्रेष्ठ यानी प्रधान है ?’ ॥१॥

२४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न २


शरीरके आधारभूत—आकाशादि

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्द्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

तब उससे आचार्य पिप्पलादने कहा—वह देव आकाश है। वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, वाक् (सम्पूर्ण कर्मेन्द्रियाँ), मन (अन्तः-करण) और चक्षु (ज्ञानेन्द्रियसम्मूह) [ये भी देव ही हैं]। वे सभी अपनी महिमाको प्रकट करते हुए कहते हैं—‘हम ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करते हैं’ ॥ २ ॥


एवं पृष्टवते तस्मै स होवाच । आकाशो ह वा एष देवो वायुः अग्निः आपः पृथिवीत्येतानि पञ्च महाभूतानि शरीरारम्भकाणि वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रमित्यादीनि [कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियाणि च । कार्यलक्षणाः करणलक्षणाश्च ते देवा आत्मनो माहात्म्यं प्रकाश्याभिवदन्ति स्पर्धमाना अहं.श्रेष्ठतायै ।<br><br>कथं वदन्ति ? वयमेतद्द्बाणं कार्यकारणसंघातमवष्टभ्य प्रासादम्इस प्रकार पूछते हुए उस भार्गवसे पिप्पलादने कहा—निश्चय आकाश ही वह देव है तथा [उसके सहित] वायु, अग्नि, जल और पृथिवी—ये शरीरको आरम्भ करनेवाले पाँच भूत एवं वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियाँ—ये कार्य (पञ्चभूत) और करण (इन्द्रिय) रूप देव अपनी महिमाको प्रकट करते हुए अपनी-अपनी श्रेष्ठताके लिये परस्पर स्पर्धापूर्वक कहते हैं।<br><br>किस प्रकार कहते हैं ? [सो बतलाते हैं—] इस कार्यकारणके संघातरूप शरीरको, जिस प्रकार

प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५


इव स्तम्भादयोऽविशिथिलीकृत्य विधारयामो विस्पष्टं धारयामः। मयैवैकेनायं संघातः ध्रियत इत्येकैकस्याभिप्रायः॥ २ ॥महलोंको स्तम्भ धारण करते हैं उसी प्रकार, आश्रय देकर उसे शिथिल न होने देकर हम स्पष्टरूपसे धारण करते हैं। उनमेंसे प्रत्येकका यही अभिप्राय रहता है कि इस संघातको अकेले मैंने ही धारण किया है॥२॥

प्राणका प्राधान्य बतलानेवाली आख्यायिका

तान्वरिष्ठः प्राण उवाच । मा मोहमापद्यथाऽहमेवैत-
त्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति
तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

[ एक वार ] उनसे सर्वश्रेष्ठ प्राणने कहा—‘तुम मोहको प्राप्त मत होओ; मैं ही अपनेको पाँच प्रकारसे विभक्त कर इस शरीरको आश्रय देकर धारण करता हूँ ।’ किन्तु उन्होंने उसका विश्वास न किया ॥ ३ ॥

तानेवमभिमानवतो वरिष्ठो मुख्यः प्राण उवाचोक्तवान् । मा मैवं मोहमापद्यथ अविवेकतया अभिमानं मा कुरुत यस्मादहमेव एतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामि पञ्चधात्मानं प्रविभज्य प्राणादि-वृत्तिभेदं स्वस्य कृत्वा विधार-यामीत्युक्तवति च तस्मिंस्ते-ऽश्रद्दधाना अप्रत्ययवन्तो बभूवुः कथमेतदेवमिति ॥ ३ ॥इस प्रकार अभिमानयुक्त हुए उन देवोंसे वरिष्ठ—मुख्य प्राणने कहा—'इस प्रकार मोहको प्राप्त मत होओ अर्थात् अविवेकके कारण अभिमान मत करो, क्योंकि अपने-को पाँच भागोंमें विभक्त कर—अपने प्राणादि पाँच वृत्तिभेद कर मैं ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करता हूँ ।' उसके ऐसा कहनेपर वे उसके कथनमें अश्रद्धालु—अविश्वासी ही रहे कि ऐसा कैसे हो सकता है ? ॥ ३ ॥

२६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न २


सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

तब वह अभिमानपूर्वक मानो ऊपरको उठने लगा । उसके ऊपर उठनेके साथ और सब भी उठने लगे, तथा उसके स्थित होनेपर सब स्थित हो जाते । जिस प्रकार मधुकरराजके ऊपर उठनेपर सभी मक्खियाँ ऊपर चढ़ने लगती हैं और उसके बैठ जानेपर सभी बैठ जाती हैं उसी प्रकार वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि भी [ प्राणके साथ उठने और प्रतिष्ठित होने लगे ] । तब वे सन्तुष्ट होकर प्राणकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥

स च प्राणस्तेषामश्रद्दधानतामालक्ष्याभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इवेदुत्क्रान्तवानिव सरोषान्निरपेक्षस्तस्मिन्नुत्क्रामति यद्वृत्तं तद्दृष्टान्तेन प्रत्यक्षीकरोति । तस्मिन्नुत्क्रामति सत्यथानन्तरम् एवेतरे सर्व एव प्राणाश्चक्षुरादय उत्क्रामन्त उच्चक्रमिरे । तस्मिंश्च प्राणे प्रतिष्ठमाने तूष्णीं भवति अनुत्क्रामति सति सर्व एव प्रातिष्ठन्ते तूष्णीं व्यवस्थिता अभूवन् ।तब वह प्राण उनकी अश्रद्धालुताको देखकर क्रोधवश निरपेक्ष हो अभिमानपूर्वक मानो ऊपरको उठने लगा । उसके ऊपर उठनेपर जो कुछ हुआ उसे दृष्टान्तसे स्पष्ट करते हैं—उसके ऊपर उठनेके अनन्तर ही चक्षु आदि अन्य सभी प्राण ( इन्द्रियाँ ) उत्क्रमण करने यानी उठने लगे । तथा उस प्राणके ही स्थित होने—चुप होने यानी उत्क्रमण न करनेपर वे सभी स्थित हो जाते—चुपचाप बैठ जाते थे, जैसे कि इस लोकमें

प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७


तत्तत्र यथा लोके मक्षिका मधुकराः स्वराजानं मधुकरराजानम् उत्क्रामन्तं प्रति सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्ते प्रतितिष्ठन्ति । यथायं दृष्टान्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं चेत्यादयस्त उत्सृज्याश्रद्दधानतां बुद्ध्वा प्राणमाहात्म्यं प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति स्तुवन्ति ४मधुमक्षिकाएँ अपने सरदार मधुकरराजके उठनेके साथ ही सबकी सब उठ जाती हैं और उसके बैठनेपर सबकी सब बैठ जाती हैं। जैसा यह दृष्टान्त है वैसे ही वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि भी हो गये। तब वे वागादि अपने अविश्वासको छोड़कर और प्राणकी महिमाको जानकर सन्तुष्ट हो प्राणकी स्तुति करने लगे ॥४॥

कथम्—किस प्रकार [स्तुति करने लगे, सो बतलाते हैं—]

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः ।
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥

यह प्राण अग्नि होकर तपता है, यह सूर्य है, यह मेघ है, यही इन्द्र और वायु है तथा यह देव ही पृथिवी, रयि और जो कुछ सत् असत् एवं अमृत है, वह सब कुछ है ॥ ५ ॥

एष प्राणोऽग्निः संस्तपति ज्वलति, तथैष सूर्यः सन् प्रकाशते, तथैष पर्जन्यः सन् वर्षति । किं च मघवानिन्द्रः सन् प्रजाः पालयति, जिघांसत्यसुररक्षांसि । एष वायुःयह प्राण अग्नि होकर तपता—प्रज्वलित होता है । तथा यह सूर्य होकर प्रकाशित होता है और मेघ होकर बरसता है । यही मघवा—इन्द्र होकर प्रजाका पालन करता तथा असुर और राक्षसोंका वध करना चाहता है । यही आवह-
२८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न २
आवहप्रवहादिभेदः । किं चैष पृथिवी रयिर्देवः सर्वस्य जगतः सन्मूर्तमसदमूर्तं चामृतं च यद्देवानां स्थितिकारणं किं बहुना ॥५॥प्रवह आदि भेदोंवाला वायु है । अधिक क्या यह देव ही पृथिवी और रयि (चन्द्रमा) रूपसे सम्पूर्ण जगत्का धारक और पोषक है । सत्—स्थूल, असत्—सूक्ष्म और देवताओंकी स्थितिका कारणरूप अमृत भी यही है ॥ ५ ॥

प्राणका सर्वाश्रयत्व

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

जैसे रथकी नाभिमें अरे लगे रहते हैं उसी तरह ऋक्, यजुः, साम, यज्ञ तथा क्षत्रिय और ब्राह्मण—ये सब प्राणमें ही स्थित हैं ॥ ६ ॥

अरा इव रथनाभौ श्रद्धादिनामान्तं सर्वं स्थितिकाले प्राण एव प्रतिष्ठितम् । तथर्चो यजूंषि सामानीति त्रिविधा मन्त्राः तत्साध्यश्च यज्ञः क्षत्रं च सर्वस्य पालयितृ ब्रह्म च यज्ञादिकर्मकर्तृत्वेऽधिकृतं चैवैष प्राणः सर्वम् ॥ ६ ॥जिस प्रकार रथकी नाभिमें अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जगत्के स्थितिकालमें [ प्रश्न० ६ । ४ में बतलाये जानेवाले ] श्रद्धासे लेकर नामपर्यन्त सम्पूर्ण पदार्थ प्राणमें ही स्थित हैं । तथा ऋक्, यजुः और साम—तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे निष्पन्न होनेवाला यज्ञ, सबका पालन करनेवाले क्षत्रिय और यज्ञादिकर्मोंके अधिकारी ब्राह्मण—ये सब भी प्राण ही हैं ॥ ६ ॥

प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९


किं च— | तथा—

प्राणकी स्तुति

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण
प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

हे प्राण ! तू ही प्रजापति है, तू ही गर्भमें सञ्चार करता है, और तू ही [माता-पिताके समान आकृतिवाला होकर] जन्म ग्रहण करता है। यह [मनुष्यादि] सम्पूर्ण प्रजा तुझे ही बलि समर्पण करती है, क्योंकि तू समस्त इन्द्रियोंके साथ स्थित रहता है ॥ ७ ॥

यः प्रजापतिरपि स त्वमेव गर्भे चरसि, पितुर्मातुश्च प्रतिरूपः सम्प्रतिजायसे; प्रजापतित्वादेव प्रागेव सिद्धं तव मातृपितृत्वम् । सर्वदेहदेह्याकृतिच्छद्मनैकः प्राणः सर्वात्मासीत्यर्थः । तुभ्यं त्वदर्थं या इमा मनुष्याद्याः प्रजास्तु हे प्राण चक्षुरादिद्वारैर्बलिं हरन्ति । यस्त्वं प्राणैश्चक्षुरादिभिः सह प्रतितिष्ठसि सर्वशरीरेष्वतस्तुभ्यं बलिं हरन्तीति युक्तम्; भोक्ता हि यतस्त्वं तवैवान्यत्सर्वं भोज्यम् ॥ ७ ॥जो प्रजापति है वह भी तू ही है; तू ही गर्भमें सञ्चार करता है और माता-पिताके अनुरूप होकर तू ही जन्म लेता है । प्रजापति होनेके कारण तेरा माता-पितारूप होना तो पहलेसे ही सिद्ध है । तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण देह और देहीके मिषसे एक तू प्राण ही सर्वात्मा है । ये जो मनुष्यादि प्रजाएँ हैं, हे प्राण ! वे चक्षु आदि इन्द्रियोंके द्वारा तुझे ही बलि समर्पण करती हैं, जो तू कि चक्षु आदि इन्द्रियोंके साथ समस्त शरीरोंमें स्थित है; अतः वे तुझे ही बलि समर्पण करती हैं; उनका ऐसा करना उचित ही है, क्योंकि भोक्ता तू ही है, और अन्य सब तेरा ही भोज्य है ॥ ७ ॥

३० प्रश्नोपनिषद् [प्रश्न २


किं च—तथा—

देवानामासि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

तू देवताओंके लिये वह्नितम है, पितृगणके लिये प्रथम स्वधा है और अथर्वाङ्गिरस ऋषियों [ यानी चक्षु आदि प्राणों ] के लिये सत्य आचरण है ॥ ८ ॥

देवानामिन्द्रादीनामसि भवसि त्वं वह्नितमो हविषां प्रापयितृतमः । पितॄणां नान्दीमुखे श्राद्धे या पितृभ्यो दीयते स्वधान्नं सा देवप्रधानमपेक्ष्य प्रथमा भवति । तस्या अपि पितृभ्यः प्रापयिता त्वमेवेत्यर्थः । किं चर्षीणां चक्षुरादीनां प्राणानामङ्गिरसामङ्गिरसभूतानामथर्वणां तेषामेव "प्राणो वाथर्वा" इति श्रुतेः, चरितं चेष्टितं सत्यमवितथं देहधारणाद्युपकारलक्षणं त्वमेवासि ॥ ८ ॥तू इन्द्रादि देवताओंके लिये वह्नितम—हवियोंको पहुँचानेवालोंमें श्रेष्ठ है, पितृगणकी प्रथम स्वधा है—नान्दीमुख श्राद्धमें पितरोंको जो अन्नमयी स्वधा दी जाती है वह देवप्रधान कर्मकी अपेक्षासे प्रथम है, उस प्रथम स्वधाको भी पितरोंको प्राप्त करानेवाला तू ही है—ऐसा इसका भावार्थ है। तथा ऋषियों यानी चक्षु आदि प्राणोंका, जो कि "प्राणो वाथर्वा" इस श्रुतिके अनुसार अंगिरस्—अंगके रसस्वरूप* अथर्वा हैं, उनका सत्य—अवितथ अर्थात् देहधारणादिमें उपकारी चरित—आचरण भी तू ही है ॥ ८ ॥

* प्राणोंके अभावमें शरीरको सूखते देखा गया है; अतः उन्हें अङ्गका रस कहते हैं ।

प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

हे प्राण ! तू इन्द्र है, अपने [ संहारक ] तेजके कारण रुद्र है, और [ सौम्यरूपसे ] सब ओरसे रक्षा करनेवाला है। तू ज्योतिर्गणका अधिपति सूर्य है और अन्तरिक्षमें सञ्चार करता है ॥ ९ ॥

इन्द्रः परमेश्वरस्त्वं हे प्राण तेजसा वीर्येण रुद्रोऽसि संहरञ्जगत् । स्थितौ च परिसमन्ताद्रक्षिता पालयिता परिरक्षिता त्वमेव जगतः सौम्येन रूपेण । त्वमन्तरिक्षेऽजस्रं चरसि उदयास्तमयाभ्यां सूर्यस्त्वमेव च सर्वेषां ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥हे प्राण ! तू इन्द्र—परमेश्वर है; तू अपने तेज—वीर्यसे जगत्‌का संहार करनेवाला रुद्र है तथा स्थितिके समय अपने सौम्यरूपसे तू ही सब ओरसे संसारकी रक्षा—पालन करनेवाला है। तू ही उदय और अस्तके क्रमसे निरन्तर आकाशमें गमन करता है और तू ही समस्त ज्योतिर्गणोंका अधिपति सूर्य है ॥ ९ ॥

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥

हे प्राण ! जिस समय तू मेघरूप होकर बरसता है उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा यह समझकर कि 'अब यथेच्छ अन्न होगा' आनन्दरूपसे स्थित होती है ॥ १० ॥

यदा पर्जन्यो भूत्वाभिवर्षसि त्वमथ तदान्नं प्राप्येमाः प्रजाः प्राणते प्राणचेष्टां कुर्वन्तीत्यर्थः ।जिस समय तू मेघ होकर बरसता है उस समय यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न पाकर प्राणन यानी प्राणक्रिया करती है—यह इसका
३२प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न २:

| अथवा प्राण ते तवेमाः प्रजाः स्वात्मभूतास्त्वदन्नसंवर्धितास्त्वदभिवर्षणदर्शनमात्रेण चानन्दरूपाः सुखं प्राप्ता इव सत्यः तिष्ठन्ति कामायेच्छातोऽन्नं भविष्यतीत्येवमभिप्रायः ॥१०॥ | भावार्थ है। अथवा [ यों समझो कि ] हे प्राण ! 'ते'—तेरी स्वात्मभूत यह सम्पूर्ण प्रजा तेरे [ दिये हुए ] अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होकर तेरी वृष्टिके दर्शनमात्रसे आनन्दरूपा-अर्थात् सुखको प्राप्त हुईके समान स्थित होती है । उसके आनन्दरूप होनेमें यह अभिप्राय है कि [ उस वृष्टिसे उसे ऐसी आशा हो जाती है कि ] 'अत्र यथेच्छ अन्न उत्पन्न होगा' ॥ १० ॥ |

किं च—इसके सिवां—

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥११॥

हे प्राण ! तू व्रात्य (संस्कारहीन), एकर्षि नामक अग्नि, भोक्ता और विश्वका सत्पति है, हम तेरा भक्ष्य देनेवाले हैं । हे वायो ! तू हमारा पिता है ॥ ११ ॥

प्रथमजत्वादन्यस्य संस्कर्तुरभावादसंस्कृतो व्रात्यस्त्वं स्वभावत एव शुद्ध इत्यभिप्रायः । हे प्राणैकर्षिस्त्वमाथर्वणानां प्रसिद्ध एकर्षिनामाग्निः सन्नत्ता सर्वहविषाम् । त्वमेव विश्वस्य सर्वस्यहे प्राण ! सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे किसी अन्य संस्कारकर्ताका अभाव होनेके कारण तू व्रात्य (संस्कारहीन) है, तात्पर्य यह है कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है। तू आथर्वणोंका एकर्षि यानी एकर्षिनामक प्रसिद्ध अग्नि होकर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता है । तथा

प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


सतो विद्यमानस्य पतिः सत्पतिः।तू ही समस्त विद्यमान जगत्का पति है इसलिये, अथवा [ सत्का ] साधु पति होनेके कारण तू सत्पति है ।
साधुर्वा पतिः सत्पतिः ।
वयं पुनराद्यस्य तवादनीयस्य हविषो दातारः । त्वं पिता मातरिश्व हे मातरिश्वन्नोऽस्माकम् । अथ वा मातरिश्वनो वायोस्त्वम् । अतश्च सर्वस्यैव जगतः पितृत्वं सिद्धम् ॥ ११ ॥हम तो तेरे आद्य—भक्ष्य हविके देनेवाले हैं । हे मातरिश्वन् ! तू हमारा पिता है । अथवा [ यों समझो कि ] तू 'मातरिश्वनः'—वायुका पिता है । अतः तुझमें सम्पूर्ण जगत्का पितृत्व सिद्ध होता है ॥ ११ ॥

किं बहुना— । अधिक क्या—

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥

तेरा जो स्वरूप वाणीमें स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और मनमें व्याप्त है उसे तू शान्त कर । तू उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥

या ते त्वदीया तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता वक्तृत्वेन वदनचेष्टां कुर्वती, या श्रोत्रे या च चक्षुषि या च मनसि संकल्पादिव्यापारेण सन्तता समनुगता तनूस्तां शिवां शान्तां कुरु मोत्क्रमीरुत्क्रमणेन अशिवां मा कार्षीरित्यर्थः ॥१२॥तेरा जो स्वरूप वक्तारूपसे बोलनेकी चेष्टा करता हुआ वाणीमें स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और सङ्कल्पादि व्यापारसे मनमें व्याप्त है उसे शिव—शान्त कर । उत्क्रमण न कर, अर्थात् उत्क्रमण करके उसे अशिव—अमङ्गलमय न कर ॥ १२ ॥

किं बहुना । बहुत क्या—

३४ : प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न २


प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥

यह सब तथा स्वर्गलोकमें जो कुछ स्थित है वह प्राणके ही अधीन है। जिस प्रकार माता पुत्रकी रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा हमें श्री और बुद्धि प्रदान कर ॥ १३ ॥

अस्मिँल्लोके प्राणस्यैव वशे सर्वमिदं यत्किञ्चिदुपभोगजातं त्रिदिवे तृतीयायां दिवि च यत्प्रतिष्ठितं देवाद्युपभोगलक्षणं तस्यापि प्राण एवेशिता रक्षिता। अतो मातेव पुत्रानस्मान् रक्षस्व पालयस्व । त्वन्निमित्ता हि ब्राह्मयः क्षात्रियाश्च श्रियस्तास्त्वं श्रीश्च श्रियश्च प्रज्ञां च त्वत्स्थिति-निमित्तां विधेहि नो विधत्स्व इत्यर्थः ।इस लोकमें यह जो कुछ उपभोगकी सामग्री है वह सब प्राणके ही अधीन है तथा त्रिदिव अर्थात् तीसरे द्युलोक (स्वर्ग) में भी देवता आदिका उपभोगरूप जो कुछ वैभव है उसका भी ईश्वर—रक्षक प्राण ही है। अतः माता जिस प्रकार पुत्रोंकी रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारा पालन कर । ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी श्री—विभूतियाँ भी तेरे ही निमित्त-से हैं। वह श्री तथा अपनी स्थिति-के निमित्तसे ही होनेवाली प्रज्ञा तू हमें प्रदान कर—ऐसा इसका भावार्थ है ।
इत्येवं सर्वात्मतया वागादिभिः प्राणैः स्तुत्या गमितमहिमा प्राणः प्रजापतिरत्तेत्यवधृतम् ॥१३॥इस प्रकार वागादि प्राणोंके स्तुति करनेसे जिसकी महिमा सर्वात्मरूपसे बतलायी गयी है वह प्राण ही प्रजापति और भोक्ता है—यह निश्चय हुआ ॥ १३ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये द्वितीयः प्रश्नः ॥ २ ॥

तृतीय प्रश्न (प्राणोत्पत्ति, स्थिति, लय व पञ्चप्राण)

तृतीय प्रश्न

कौसल्यका प्रश्न—प्राणके उत्पत्ति, स्थिति और लय आदि किस प्रकार होते हैं ?

अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्छरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥

तदनन्तर, उन (पिप्पलाद मुनि) से अश्वलके पुत्र कौसल्यने पूछा—'भगवन् ! यह प्राण कहाँसे उत्पन्न होता है ? किस प्रकार इस शरीरमें आता है ? तथा अपना विभाग करके किस प्रकार स्थित होता है ? फिर किस कारण शरीरसे उत्क्रमण करता है और किस तरह बाह्य एवं आभ्यन्तर शरीरको धारण करता है ?' ॥ १ ॥

अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । प्राणो ह्येवं प्राणैर्निर्धारिततत्त्वैरुपलब्धमहिमापि संहतत्वात्स्यादस्य कार्यत्वमतः पृच्छामि भगवन्कुतः कस्मात्कारणादेष यथावधृतः प्राणो जायते । जातश्च कथं केन वृत्तिविशेषेणतदनन्तर, उन (पिप्पलाद मुनि) से अश्वलके पुत्र कौसल्यने पूछा—'पूर्वोक्त प्रकारसे चक्षु आदि प्राणों (इन्द्रियों) के द्वारा जिसका तत्त्व निश्चय हो गया है तथा जिसकी महिमाका भी अनुभव हो गया है वह प्राण संहत (सावयव) होनेके कारण कार्यरूप होना चाहिये । इसलिये हे भगवन् ! मैं पूछता हूँ कि जिस प्रकारका पहले निश्चय किया गया है वैसा यह प्राण किससे—किस कारणविशेषसे

३६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ३


आयात्यस्मिञ्शरीरे। किंनिमित्तकमस्य शरीरग्रहणमित्यर्थः । प्रविश्य शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य प्रविभागं कृत्वा कथं केन प्रकारेण प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति । केन वा वृत्तिविशेषेणास्माच्छरीरादुत्क्रमत उत्क्रामति । कथं बाह्यमधिभूतमधिदैवतं चाभिधत्ते धारयति कथमध्यात्मम् इति, धारयतीति शेषः ॥ १ ॥उत्पन्न होता है ? तथा उत्पन्न होनेपर किस वृत्तिविशेषसे इस शरीरमें आता है ? अर्थात् इसका शरीरग्रहण किस कारणसे होता है ? और शरीरमें प्रविष्ट होकर अपनेको विभक्त कर—अपने अनेकों विभाग कर किस प्रकार उसमें स्थित होता है ? फिर किस वृत्तिविशेषसे इस शरीरसे उत्क्रमण करता है ? और किस प्रकार बाह्य यानी अधिभूत और अधिदैव विषयोंको धारण करता है ? तथा किस प्रकार अध्यात्म (देहेन्द्रियादि) को [धारण करता है ?] 'धारण करता है' यह वाक्य शेष है ॥१॥
एवं पृष्टः—[कौसल्यद्वारा ] इस प्रकार पूछे जानेपर—

पिप्पलाद मुनिका उत्तर

तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥

उससे पिप्पलाद आचार्यने कहा—'तू बड़े कठिन प्रश्न पूछता है। परन्तु तू [बड़ा] ब्रह्मवेत्ता है; अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ' ॥२॥