प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
( 77 ) राजा—क्या ? केवल मात्र रथ के साथ । (बेहोश होकर गिर जाते हैं) देवियाँ—महाराज, धैर्य धारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए । (अंगों का स्पर्श करती है) काञ्चुकीय—अरे, बड़ा दुःख है । इस प्रकार के महापुरुष भी जब ऐसी आपत्ति को प्राप्त करते हैं, तो यह सच है कि होनी किसी से नहीं टाली जा सकती । महाराज, धीरज रखिए, धीरज रखिए । राजा—(कुछ संभल कर) हे वाताकि, सुमन्त्र क्या अकेले ही आए हैं ? काञ्चुकीय—महाराज, और क्या । राजा—अरे, बड़ा दुःख है । यदि रथ सूना ही आया है, तो मेरे हृदय की इच्छा तो टूट गई । ऐसा लगता है कि सचमुच मे दशरथ को ले जाने के लिए ही यम ने रथ भेजा है । (११) तो उसे जल्दी से बुलाओ । काञ्चुकीय - जैसी महाराज की आज्ञा । (निकल जाता है) राजा—सरोवरों में चलने वाली वे वन की हवाएं सौभाग्यशालिनी हैं, जो वन में विचरण करने वाले राम को आनन्दपूर्वक छू लेती हैं । (इसके बाद सुमन्त्र का प्रवेश) सुमन्त्र—(चारो ओर देख कर, दुःखपूर्वक) ये सेवक राम में अनुराग होने के कारण अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, वेदना से दुःखी बने, कष्ट से तपे अंगों वाले होकर अपने कार्यों का परित्याग कर, रोते हुए राजा को कोस रहे हैं । (१३) (पास जाकर) महाराज की जय हो । राजा—हे भाई सुमन्त्र, मेरा बड़ा पुत्र राम कहां है— नही, नही, मैंने ठीक नहीं कहा । हे प्रियसुत सुमन्त्र, तुम्हारा बड़ा लड़का राम कहां है ? गुरुजनों पर अत्यधिक श्रद्धा रखने वाली, विदेहराज जनक की पुत्री, वह सीता कहां है ? अथवा सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण कहां है ? क्या उन्होंने सबके लिए शोकसामर को उपस्थित करने वाले, अब शीघ्र मरने वाले, मुझ अभागे पिता को भी कुछ कहा है । (१४)
( 78 ) सुमन्त्र—महाराज, इस प्रकार के अशुभ वाक्य मत कहिए। आप शीघ्र ही उन्हें देखेंगे ! राजा—सचमुच में मैंने अनुचित कहा है। यह तपस्वियों के योग्य प्रश्न नहीं है। अतः अब बताओ। क्या तपस्वियों का तप तो बढ़ रहा है। क्या वन में स्वेच्छा से घूमती हुई सीता दुःखी तो नहीं है। सुमित्रा—हे सुमन्त्र, बहुत से वल्कलों से आभूषित शरीर वाली, बाला होकर भी आदर्श आचरण वाली, पति के साथ धार्मिक कृत्य करने वाली सीता ने हमें और महाराज को क्या कुछ नहीं कहा है। (४) मूल सुमन्त्रः—सर्व एव महाराजम्— राजा—न न। श्रोत्ररसायनैर्मम हृदयातुरीषधैस्तेषां नामधेयैरेव श्रावय। सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः। आयुष्मान् रामः। राजा—राम इति। अयं रामः। तन्नामश्रवणात् स्पृष्ट इव मे प्रति- भाति। ततस्ततः। सुमन्त्रः—आयुष्मान् लक्ष्मणः। राजा—अयं लक्ष्मणः। ततस्ततः। सुमन्त्रः—आयुष्मती सीता जनकराजपुत्री। राजा—इयं वैदेही। रामो लक्ष्मणो वैदेहीत्ययमक्रमः। सुमन्त्रः—अथ × कः क्रमः ? राजा—रामो वैदेही लक्ष्मण इत्यभिधीयताम्। रामलक्ष्मणयोर्मध्ये तिष्ठत्वत्रापि मैथिली। बहुदोषान्यरण्यानि, सनाथैषा भविष्यति ॥ (१५) सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः। आयुष्माम् रामः। राजा—अयं रामः। सुमन्त्रः—आयुष्मती जनकराजपुत्री। राजा—इयं वैदेही। सुमन्त्रः—आयुष्मान् लक्ष्मणः। राजा—अयं लक्ष्मणः। राम ! वैदेहि ! लक्ष्मण ! परिष्वजध्वं मां पुत्रकाः !
सकृत् स्पृशामि वारामं, सकृत् पश्यामि वा पुनः । गतायुरमृतेनेव जीवामीति मतिर्मम ॥ (१६) सुमन्त्रः-शृङ्गवेरपुरे रथादवतीर्यायोध्याभिमुखाः स्थित्वा सर्व एव महाराज शिरसा प्रणम्य विज्ञापयितुमारब्धाः । कमप्यर्थम् चिरंध्यात्वा वक्तुं प्रस्फुरिताधराः । वाष्पस्तम्भितकण्ठत्वादनुक्त्वैव वनं गताः ॥ (१७) राजा-कथमनुक्त्वैव वनं गताः ? (इति द्विगुणं मोहमुपगतः) सुमन्त्रः- (ससम्भ्रमम्) बालाके ! उच्यताममात्येभ्यः- अप्रतीकारायां दशायां वर्तते महाराज इति । काञ्चुकीयः-तथा । (निष्क्रान्तः) शब्दार्थ - श्रोत्ररसायनैः = कर्ण प्रिय । हृदयातुरीषधैः = मानसिक व्यथा मे प्रशमन पटु । नामधेयैः = नामो के द्वारा । श्रावय = सुनाओ । आयु- ष्मान् = दीर्घायु । स्पृष्ट इव = छूने के समान । प्रतिभाति = प्रतीत होता है । अक्रमः = अनुचित क्रम या क्रमभङ्ग । अभिधीयताम् = कहा जाए । बहु- दोषाणि = अनेक विघ्नो वाले । अरण्यानि = वन । सनाथा = रक्षकयुक्त । परिष्वजध्वम् = भेंट करो । पुत्रकाः = पुत्रो । सकृत् = एक बार । गतायुः = मरणासन्न बना हुआ । शृङ्गवेरपुरे = गगा के तटवर्ती स्थान पर । विज्ञापयितुम् = सन्देश देने हेतु । अर्थम् = अभिप्राय को । ध्यात्वा = ध्यान करके । प्रस्फुरिता- धराः = फड़कते हुए ओष्ठो वाले । वाष्पस्तम्भितकण्ठत्वात् = आँसुओ से रुंधे हुए गले के कारण । अनुक्त्वा = बिना बोले हुए । द्विगुण = दुगुने । अप्रती- कारायाम् = ठीक न होने वाली । अन्वय-अत्र अपि मैथिली रामलक्ष्मणयोः मध्ये तिष्ठतु । अरण्यानि बहुदोषाणि, एषा सनाथा भविष्यति । (१५) अन्वय-सकृत् रामं स्पृशामि वा पुनः सकृत् पश्यामि। गतायुः अमृतेन इव जीवामि इति मम मतिः । (१६) अन्वय-चिर कम् अपि अर्थम् वक्तुं प्रस्फुरिताधराः वाष्पस्तम्भित- कण्ठत्वात् अनुक्त्वा एव वनं गताः (१७) हिन्दी अर्थ सुमन्त्र-सभी ने ही महाराज को-
( ४० ) राजा—नहीं, नही, कानो को आनन्द देने वाले तथा दुःखी हृदय को शान्त करने वाले उनके नाम लेकर ही सन्देश सुनाओ । सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । चिरजीवी राम । राजा—क्या राम । यह राम । इसका नाम सुनने से तो लगता है कि मैने उसे हृदय से लगा लिया है । इसके बाद । सुमन्त्र—दीर्घायु लक्ष्मण । राजा—यह लक्ष्मण । इसके आगे । सुमन्त्र—आयुष्मती जनकराजकुमारी सीता । राजा—यह सीता । राम, लक्ष्मण, सीता यह क्रम ठीक नही है । सुमन्त्र—तो फिर कौन सा क्रम उचित है । राजा—राम, सीता और लक्ष्मण, यो कहो । यहाँ नामोच्चारण में भी सीता राम और लक्ष्मण के बीच मे रहे । वन मे बहुत से भय हुआ करते हैं, अतः इस प्रकार वह सुरक्षित रहेगी । (१५) सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । दीर्घायु राम । राजा—यह राम । सुमन्त्र—आयुष्मती सीता । राजा—यह वैदेही । सुमन्त्र—चिरजीवी लक्ष्मण । राजा—यह लक्ष्मण । राम, सीते, लक्ष्मण । हे पुत्रो, तुम मेरा आलिङ्गन करो । मैं एक बार राम से मिलूँगा अथवा फिर एक बार राम को देखूँगा । इस सम्भावना से मैं उसी प्रकार जी रहा हूँ, जैसे मरणासन्न अमृत से । सुमन्त्र—शृङ्गवेरपुर में रथ से उतर कर, अयोध्या की ओर मुख किए हुए खड़े होकर, सभी ने महाराज को सिर झुका कर प्रणाम करके कुछ कहना प्रारम्भ किया । बहुत समय तक न जाने कौन सी बात को सोचते रहे । कुछ कहने के लिए उनके ओष्ठ फड़के । किन्तु अश्रुओं से गले के अवरुद्ध हो जाने के कारण वे बिना कुछ कहे हुए ही वन में चले गए । (१७)
( 81 ) राजा—क्या बिना कुछ कहे ही वन मे चले गए ? (इस प्रकार कह कर घोर मूर्च्छा मे पड जाते हैं) मन्त्र—(हडबडाहट के साथ) हे बालाकि, मन्त्रियो से कहो कि महाराज की हालत असाध्य हो चुकी है । कञ्चुकीय—जो आज्ञा । (निकल जाता है) ५) मूल देव्यौ—महाराज ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि । राजा—(किञ्चित् समाश्वस्य) अंगं मे स्पृश कौसल्ये ! न त्वां पश्यामि चक्षुषा । राम प्रति गता बुद्धिरद्यापि न निवर्तते ॥ (१८) पुत्र ! राम ! यत् खलु मया सन्ततं चिन्तितम्— राज्ये त्वामभिषिच्य सन्नरपतेर्लाभात् कृतार्थाः प्रजाः, कृत्वा, त्वत्सहजान् समानविभवान् कुर्वात्मनः सन्ततम् । इत्यादिश्य च ते, तपोवनमितो गन्तव्यमित्येतया कैकेय्या हि तदन्यथा कृतमहो निःशेषमेकक्षणे ॥ (१९) सुमन्त्र ! उच्यतां कैकेय्याः— गतो रामः प्रियं तेऽस्तु त्यक्तोऽहमपि जीवितैः । क्षिप्रमानीयतां पुत्रः पापं सफलमस्त्विति ॥ (२०) सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः । राजा—(ऊर्ध्वमवलोक्य) अये ! रामकथाश्रवणसन्दग्ध— हृदयं मामाश्वासयितुमागताः पितरः । कोऽत्र ? (प्रविश्य) काञ्चुकीयः—जयतु महाराजः । राजा—आपस्तावत् । काञ्चुकीयः—यदाज्ञापयति महाराजः । (निष्क्रम्य प्रविश्य) जयतु महाराजः । इमा आपः । राजा—(आचम्यावलोक्य) अयममरपते सखा दिलीपो
( 82 ) रघुरयमत्रभवानजः पिता मे । किमभिगमनकारणं भवद्भिः सह वसने समयो ममापि तत्र ॥ (२१) राम ! वैदेहि ! लक्ष्मण ! अहमितः पितॄणां सकाशं गच्छामि । हे पितरः ! अयमहमागच्छामि । (मूर्च्छया परामृष्टः) (काञ्चुकीयो यवनिकास्तरणं करोति) सर्वे—हा हा महाराजः । हा हा महाराजः । (निष्क्रान्ता सर्वे) द्वितीय अङ्कः । शब्दार्थ—निवर्तते = वापस लौटी है। सन्ततं - लगातार। अभिषिच्य = अभिषेक करके। सन्नरपतेः = अच्छे राजा के। कृतार्थाः = सफल मनोरथ वाली। सहजान् = भाइयो को। समानविभवान् = तुल्य ऐश्वर्य वाले। कुरु = करो। तदन्यथा = उसे विपरीत रूप में। निःशेषम् - सम्पूर्ण को। जीवितैः = प्राणो से। क्षिप्रं = जल्दी से। आनीयता = बुला लो। पापं = बुरा कार्य। अस्तु = होवे। श्रवणसन्दग्धहृदयं = सुनने से पीड़ित हृदय वाले। आश्वासयितु = धैर्य बंधाने के लिए। पितरः = पूर्वज। आप जल (आपः शब्द संस्कृत मे नित्य बहुवचनान्त होता है)। आचम्य - आचमन करके। अमरपतेः सखा = इन्द्र के मित्र। अभिगमनकारण = आने का प्रयोजन। सह वसने = साथ रहने मे। इतः = यहाँ से। सकाश = पास मे। परामृष्टः = युक्त होना (आक्रान्त)। यवनिकास्तरण = वस्त्र से ढकना। अन्वय—कौसल्ये, मे अङ्ग स्पृश, त्वाम् चक्षुषा न पश्यामि। रामं प्रति गता बुद्धिः अद्य अपि न निवर्तते। (१८) अन्वय—त्वां राज्ये अभिषिच्य, सन्नरपतेः लाभात् प्रजाः कृतार्थाः कृत्वा, त्वत् सहजान् सन्ततम् आत्मनः समानविभवान् कुरु इति च ते आदिश्य इतः तपोवनं गन्तव्यम् इति एतया हि कैकेय्या, अहो, तत् निःशेषम् एकपदे अन्यथा कृतम् (१६)
( 83 ) अन्वय—रामः गतः प्रियं ते अस्तु, जीवितैः अहम् अपि व्यक्तः । पुत्रः क्षिप्रम् आनीयताम् । पापम् सफलम् अस्तु । (२०) अन्वय—अयम् अमरपतेः सखा दिलीपः, अयं रघुः, अत्रभवान् मे पिता अजः । अभिगमनकारणं किम् ? तत्रभवद्भिः सह वसने ममापि समयः । (२१) हिन्दी अर्थ दोनो रानियां—महाराज, धीरज रखे, धीरज रखें । राजा—(कुछ संभल कर) कौसल्या, मेरे अंगों पर हाथ फेरो । मै तुम्हे नेत्रो से नही देख रहा हूँ । राम की ओर गया हुआ मेरा हृदय अभी भी नही लौट रहा है । (१८) हे पुत्र राम, मै सदा से सोचता आ रहा था कि— तुम्हे राजगद्दी पर बैठा कर, प्रजा को उत्तम राजा के लाभ से सफल मनोरथ कर, तुम्हे यह कह कर कि अपने भाइयो को सदा अपने समान ऐश्वर्य शाली बनाए रखना, मै छुटकारा प्राप्त कर, इस वृद्धावस्था को तपोवन में बिताऊँगा । किन्तु इन सब बातो को कैकेयी ने एक क्षण में पलट डाला । ( १६ ) सुमन्त्र, जाओ, कैकेयी से कह दो— राम वन चले गए । तुम अपना मनोरथ पूर्ण कर लो । मुझे भी मेरे प्राण छोड चले । अब तुम अपने पुत्र को जल्दी से बुलवा लो तुम्हारा पापमय कृत्य सफल हो जाए । (२०) सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । राजा—(ऊपर की ओर देख कर) अरे, राम के विवरण के सुनने से दुःखी हृदय वाले मुझे धैर्य बँधाने के लिये पितर लोग आ गए है । अरे, यहाँ कौन है ? (प्रवेश करके) काञ्चुकीय—महाराज की जय हो । राजा—जरा जल लाओ । काञ्चुकीय—जो महाराज की आज्ञा । (निकलकर और प्रवेश करके) महाराज की जय हो । ये जल है ।
( 84 ) राजा—(आचमन करके देखकर) ये देवराज इन्द्र के मित्र दिलीप हैं, ये रघु हैं, ये मेरे पूज्य पिता अ है । आप लोगों के यहाँ आने का क्या कारण है ? अब तो मेरे लि भी आपके साथ रहने का समय आ पहुँचा है । र म, सीता, लक्ष्मण, मैं अब यहाँ से पितरो के पास जा रहा हूं । पितरों, यह मैं आया । (संज्ञा हीन हो जाते हैं ।) (काञ्चुकीय पर्दा गिराता है) सब—हाय, हाय, महाराज । हाय, हाय, महाराज । (सब निकलते हैं) दूसरा अंक समाप्त ।
तृतीय अङ्क ) मूल (ततः प्रविशति सुधाकारः) सुधाकारः—(सम्मार्जनादीनि कृत्वा) भवतु इदानीं कृतमत्र कार्य- मार्यसम्भकस्याज्ञप्तम् । यावन् मुहूर्तम् स्वप्स्यामि । (स्वपिति) (प्रविश्य) भटः—(चेटमुपगम्य ताडयित्वा) अंश्चो दास्याः पुत्र ! किमिदानीं कर्म न करोषि ? (ताडयति) सुधाकारः—(बुद्ध्वा) ताडय मां ताडय माम् । भटः—ताडिते त्वं कि करिष्यसि । सुधाकारः—अधन्यस्य मम कार्तवीर्यस्येव बाहुसहस्रं नास्ति । भटः—बाहुसहस्रेण किं कार्यम् । सुधाकारः—त्वां हनिष्यामि । भटः—एहि दास्याः पुत्र ! मृते मोक्ष्यामि । (पुनरपि ताडयति) सुधाकारः—(रुदित्वा) शक्यमिदानी भर्तः ! मेऽपराधं ज्ञातुम् । भटः—नास्ति किलापराधो नास्ति । ननु मया सन्दिष्टो भर्तृदारकस्य रामस्य राज्यविभ्रष्टकृतसन्तापेन स्वर्गं गतस्य भर्तुर्दशरथस्य प्रतिमागेहं द्रष्टुमद्य कोसल्यापुरोगैः सर्वैरन्तःपुरैरिहागन्तव्य- मिति । अत्रेदानीं त्वया किं कृतम् ? सुधाकारः—पश्यतु भर्ता अपनीतकपोतसन्दानकं तावद् गर्भगृहम् । सौधवर्णकदत्तचन्दनपञ्चाङ्गुला भित्तयः । अवसक्तमाल्य- दामशोभीनि द्वाराणि । प्रकीर्णा वालुकाः । अत्रेदानीं मया किं न कृतम् ? भटः—यद्येवं विश्वस्तो गच्छ । यावदहमपि सर्वम् कृतमित्यमात्याय निवेदयामि ।
Here is the line-by-line transcription of the page:
( 84 ) राजा—(श्राचमन करके देखकर) ये देवराज इन्द्र के मित्र दिलीप हैं, ये रघु हैं, ये मेरे पूज्य पिता अज हैं । श्राप लोगो के यहाँ श्राने का क्या कारण है ? अब तो मेरे लिए भी श्रापके साथ रहने का समय श्रा पहुँचा है । र म, सीता, लक्ष्मण, मैं अब यहाँ से पितरों के पास जा रहा हूं । हे पितरों, यह मैं श्राया । (संज्ञा हीन हो जाते हैं ।) (काञ्चुकीय पर्दा गिराता है) सब—हाय, हाय, महाराज । हाय, हाय, महाराज । (सब निकलते हैं) दूसरा श्रंक समाप्त ।
पुरोगैः - कौसल्या जिनके आगे चल रही है, ऐसी । अन्तःपुरैः = रानियों के द्वारा । आगन्तव्यम् = आना चाहिये । अपनीत = हटाना । कपोतसन्द्वानकं = कबूतरो के घोसलो को । गर्भगृह = मध्यगृह अर्थात् बीच का भवन । सौध- [पार्श्व टिप्पणी: पदविज्ञात-] वर्णकदत्त = सुधामय (सफेद) रग से पोतना । चन्दनापञ्चाङ्गुला = चन्दन से [पार्श्व टिप्पणी: ज इति।] पाँचो अंगुलियो के निशान बनाना । भित्तयः = दीवारे । अवसक्त = संयोजित करना या लगाना । माल्यदामशोभीनि = फूलों की मालाओ से सुशोभित । प्रकीर्णाः = बिखेरी गई । बालुकाः = रेत । विश्वस्तः = पीटने के भय से रहित । प्रवेशकः = यह भी विष्कम्भक के समान ही आगे आने वाली घटनाओ के सक्षिप्त अर्थ का सूचक है । सावेगम् = पीड़ा के साथ । मातुलपरिचयात् = मामा युधाजित के पास रहने के कारण । अविज्ञातवृत्तान्तः = समाचारो को न जानने वाला । अस्मि = हूं । दृढम् = नितान्त । अकल्यशरीरः = रोगग्रस्त शरीर वाले । व्याधिः = रोग । हृदयपरितापः = आधि या मानसिक पीडा । आहुः = कहा है । भिषजः = वैद्य । भुङ्क्ते = खाते है । निरशनः = निराहार रहने वाले । दैवम् = कुछ भी नही कहा जा सकता है । स्फुरति = फड़क रहा है । वाहय = चलाओ । अन्वय—मे पितुः कः व्याधिः, खलु महान् हृदयपरितापः । वैद्याः तम् किम् आहुः, खलु तत्र निपुणाः भिषज. न । किम् आहारम् भुङ्क्ते शयनम् अपि (अनुभवति) । भूमौ निरशनः । किम् आशा स्यात् । दैवम् । हृदयम् स्फुरति, रथम् वाहय । (१) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुधाकार का प्रवेश) सुधाकार—(झाडू लगा कर) अच्छा, इस समय आर्य संभावक द्वारा बताए गए सभी कार्य तो कर लिए । अब थोड़ी देर तक सो लूँ । (सोता है) (प्रवेश करके) भट—(चेट के पास जाकर और पीट कर) अरे दासी-पुत्र, अब काम क्यों नहीं करता ? (पीटता है) सुधाकार—(जाग कर) मार लो, मुझे मार लो । भट—मारने पर तुम क्या करोगे ?
( 86 ) (निष्क्रान्तौ) (प्रवेशकः) (ततः प्रविशति भरतो रथेन सूतश्च) भरतः- (सावेगम्) सूत ! चिरं मातुलपरिचयादविज्ञातवृत्तान्तो ऽस्मि । श्रुतं मया दृढमकल्यशरीरो महाराज इति । तदुच्यताम्— पितुर्मे को व्याधिः सूतः--हृदयपरितापः खलु महान् भरतः--किमाहुस्त वैद्या' सूतः--न खलु भिषजस्तत्र निपुणाः । भरतः--किमाहारं भुङ्क्ते शयनमपि सूतः--भूमौ निरशनः भरतः-किमाशा स्याद सूतः--दैव भरत.---स्फुरति हृदयं वाहय रथम् ॥ (१) सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं वाहयति) शब्दार्थ—सुधाकार˙ = चूने की कलई आदि से सफेदी करने वाला सम्मार्जनादीनि = स्वच्छता आदि । कृत्वा = करके अर्थात् झाडू लगाकर भवतु = ठीक है । कृतम् = कर लिया है । आर्यसम्भपकस्य = पूज्य सम्भप- का (यह काञ्चुकीय का नाम है) । आज्ञप्तम् = आदेश दिया गया । मुहूर्तम् = थोडे समय के लिए । स्वप्स्यामि = सोऊँगा । भट˙ = सिपाही । चेटम् उपगम्य = सेवक के पास जाकर । ताडयित्वा = पीट कर । अंघो = अरे । दास्या पुत्र = दासी के लड़के (यह सभ्य समाज की गाली है, किसी को "दासी का पुत्र' कहना उसे गाली देना है, क्योकि इससे उसकी माँ का अपमान झलकता है) मृते = मरने पर । मोक्ष्यामि - छोड़ू गा । शक्यम् - समर्थ हूँ । भर्त˙ - स्वामि । अपराधे - दोष । सन्दिष्ट. - आज्ञा दिए गए हो । भर्तृदारकस्य = राजकुमार । विभ्रष्ट = हटना । कृत ~ होने वाले । प्रतिमागेह = मृत राजाओं की स्मृति मे जहाँ उनकी प्रतिमाएँ लगाई जाती हैं, उस स्थान को । कौसल्य.
पुरोगैः = कौसल्या जिनके आगे चल रही है, ऐसी । अन्तःपुरैः = रानियों के द्वारा। आगन्तव्यम् = आना चाहिये । अपनीत = हटाना । कपोतसन्दानकं = कबूतरों के घोंसलो को । गर्भगृह = मध्यगृह अर्थात् बीच का भवन । सोध- वर्णकदत्त = सुधामय (सफेद) रग से पोतना । चन्दनापञ्चाऽगुला = चन्दन से पांचों अंगुलियो के निशान बनाना । भित्तयः = दीवारे । अवसक्त = संयोजित करना या लगाना । माल्यदामशोभीनि = फूलों की मालाओ से सुशोभित । प्रकीर्णाः = बिखेरी गई । बालुकाः = रेत । विश्वस्तः = पीटने के भय से रहित । प्रवेशकः = यह भी विष्कम्भक के समान ही आगे आने वाली घटनाओं के संक्षिप्त अर्थ का सूचक है। सावेगम् = पीडा के साथ । मातुलपरिचयात् = मामा युधाजित के पास रहने के कारण । अविज्ञातवृत्तान्तः = समाचारो को न जानने वाला । अस्मि = हूं । बाढम् = नितान्त । अकल्यशरीरः = रोगग्रस्त शरीर वाले । व्याधिः = रोग । हृदयपरितापः = आधि या मानसिक पीडा । आहुः = कहा है। भिषजः = वैद्य । भुङ्क्ते = खाते हैं । निरशनः = निराहार रहने वाले। दैवम् = कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। स्फुरति = फडक रहा है। वाहय = चलाओ । अन्वय—मे पितुः कः व्याधिः, खलु महान् हृदयपरितापः । वैद्याः तम् किम् आहुः, खलु तत्र निपुणाः भिषजः न । किम् आहारम् भुङ्क्ते शयनम् अपि (अनुभवति) । भूमौ निरशनः । किम् आशा स्यात् । दैवम् । हृदयम् स्फुरति, रथम् वाहय । (१) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुधाकार का प्रवेश) सुधाकार--(झाडू लगा कर) अच्छा, इस समय आर्य संभावक द्वारा बताए गए सभी कार्य तो कर लिए । अब थोड़ी देर तक सो लूँ । (सोता है) (प्रवेश करके) भट--(चेट के पास जाकर और पीट कर) अरे दासी-पुत्र, अब काम क्यों नहीं करता ? (पीटता है) सुधाकार - (जाग कर) मार लो, मुझे मार लो । भट—मारने पर तुम क्या करोगे ?
( ८८ ) सुधाकार—मुझ अभागे के कार्तवीर्य के समान हजार भुजाएँ नहीं हैं । भट हजार भुजाओ के होने पर क्या करते ? सुधाकार—तुमको समाप्त कर देता । भट—अरे, दासीपुत्र, अब तो दम निकाल कर ही छोडूंगा । (फिर पीटता है) सुधाकार—(रोकर) हे स्वामी, क्या मैं इस समय मेरा दोष जान सकता हूँ भट—कुछ दोष नही, सचमुच तेरा कुछ दोष नही है । मैंने जो कहा था कि राजकुमार राम को राज्य न मिलने से उत्पन्न होने वाले दुःख से मृत्यु को प्राप्त होने वाले राजा दशरथ के प्रतिमा-गृह को देखने आज कौसल्या आदि के साथ समूचा रनिवास यहाँ आ रहा है । तो फिर तूने यहाँ क्या किया है ? सुधाकार—स्वामी देखिए । गर्भगृह मे बनाए गए कबूतरो के घोसलों को हटा दिया है । दीवारें सफेदी से पोत दी हैं और उन पर चन्दन से पचांगुलिका के आकार बना दिए गए हैं । दरवाजों को पुष्प- मालाओं से सजा दिया है । चारो ओर रेत बिछा दी गई हे । यहाँ अब मैंने क्या नहीं किया ? भट—यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर जाओ । मै भी मन्त्री जी को-पूरी तैयारी की सूचना दे देता हूँ । (दोनों निकल जाते है) (प्रवेशक) (इसके बाद रथ में बैठे भरत और सारथि का प्रवेश) भरत—(चिन्तापूर्वक) सारथि, बहुत समय तक मामाजी के यहाँ रहने के कारण मुझे घर के कोई समाचार नहीं मिले । मैंने सुना था कि महाराज अधिक रुग्ण है । अतः कहो—मेरे पिताजी को कौन सा रोग है ? सूत—दारुण मानसिक सन्ताप । भरत—उनको वैद्यो ने क्या कहा ? सूत—वहाँ कोई चतुर वैद्य नही, जो बता सके । भरत—उनके खाने और सोने की क्या व्यवस्था है ? सूत—पृथ्वी पर बिना भोजन किए रहते हैं ।
भरत—क्या उनके जीने की आशा है ? सूत—भगवान् ही जाने । भरत—मेरा हृदय धड़क रहा है, रथ चलाओ । (१) सूत—जैसी महाराज की आज्ञा । (रथ चलाता है) (२) मूल भरतः— (रथवेगं निरूप्य) अहो नु खलु रथवेगः । एते ते, द्रुमा धावन्तीव द्रुतरथगतिक्षीणविषया नदीवोद्वृत्ताम्बुर्निपतति मही नेमिविवरे । अरव्यक्तिर्नष्टा स्थितमिव जवाच्चक्रवलय रजश्चाश्वोद्धूतं पतति पुरतो नानुपतति ॥ (२) सूतः—आयुष्मन्, सोपस्नेहतया वृक्षाणामभितः खल्वयोध्या भवितव्यम् । भरतः—अहो नु खलु स्वजनदर्शनोत्सुकस्य त्वरता मे मनसः । सम्प्रति हि, पतितमिव शिरः पितुः पादयो. स्निह्यतेवास्मि राज्ञा समुत्थापित त्वरितमुपगता इव भ्रातर. क्लेदयन्तीव मामश्रुभिर्मातरः । सदृश इति महानिति व्यायतश्चेति भृत्यैरिवाह स्तुतः सेवया परिहसितमिवात्मनस्तत्र पश्यामि वेष भाषां च सौमित्रिणा ॥ (३) सूतः— (आत्मगतम्) भो ! कष्टम् यदयमविज्ञाय महाराजविनाश- मुदर्के निष्फलामाशां परिवहन्नयोध्यां प्रवेक्ष्यति कुमारः । जानद्भिरप्यस्माभिर्न निवेद्यते । कुतः, पितुः प्राणपरित्यागं मातुरैश्वर्यलुब्धताम् । ज्येष्ठभ्रातुः प्रवासं च त्रीन् दोषान् कोऽभिधास्यति ॥ (४) (प्रविश्य) भटः — जयतु कुमारः । भरतः—भद्र ! कि शत्रुघ्नो मामभिगत । भटः—अभिगतः ख वर्तते कुमारः । उपाध्यायास्तु भवन्तपाहुः ।
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भरतः—किमिति किमिति । भटः—एकनाडिकावशेषः कृत्तिकाविषयः । तस्मात् प्रतिपन्नायामेव रोहिण्यामयोध्यां प्रवेक्ष्यति कुमारः । भरतः—वाढमेवनम् । न मया गुरुवचनमतिक्रान्तपूर्वम् । गच्छ त्वम् । भटः—यदाज्ञापयति कुमारः । (निष्क्रान्तः) शब्दार्थ—रथवेगं = रथ की गति को । निरूप्य = देख कर । क्षीण- विषयाः = अल्पीभूत पदार्थ वाले । उद्वृत्ताम्बुः = उछलते हुए जल वाली । नेमिविवरे = पहिए के घेरे के रन्ध्र में । अरव्यक्तिः = पहिए के नाभि मध्य के अवयव अरों की स्फुट प्रतीति । स्थितम् = गति रहित । जवात् = वेग के कारण । चक्रवलयम् = पहिए का मण्डल । रजः = धूलि । अश्वोद्धूतं = घोड़ों के खुरों से उडी हुई । पुरतः = आगे । नानुTurnपतति = पीछे नही गिरती है । घोपस्नेहतया = घने और शीतल होने के कारण । अभितः = आगे । त्वरता = शीघ्रता । स्निह्यता = प्रेम प्रदर्शित करते हुए । समुत्थापितः = उठाते हुए । उपगता = पहुँचा हुआ । क्लेदयन्ति = सींच रही हैं । सदृशः = पहले के समान ही । व्यायतः = नियन्त्रित या बलवान् । आत्मनः = स्वयं के । सौमित्रिणा = लक्ष्मण के द्वारा । अविज्ञाय = नहीं जान कर । उदर्के = उत्तर काल में । निष्फलाम् = फलरहित । आशानाम् = मनोरथ को । परिवहन् = धारण करते हुए । प्रवेक्ष्यति = प्रवेश करेगा । जानद्भिः = जानते हुए भी । निवेद्यते = कहा जा रहा है । प्राणपरित्यागं = मृत्यु को । ऐश्वर्यलुब्धताम् = धन लोलुपता को । प्रवास = देशान्तरगमन को । दोषान् = दुःखपूर्ण समाचारों को । अभिधास्यति = कहेगा । अभिगतः = आया है । उपाध्यायाः = वसिष्ठ, वामदेव आदि ने । भवन्तम् = आपको । आहुः = कहा है । नाडिका = २४ मिनट का काल या आधे मुहूर्त का समय । कृत्तिकाविषय = कृत्तिका नक्षत्र का समय । प्रतिपन्ना- याम् = बीत जाने पर । गेहिण्याम् = रोहिणी नक्षत्र में । वाढम् = हाँ, ठीक है । अतिक्रान्तपूर्वम् = पहले उल्लंघन करना । अन्वय—द्रुतरयगतिक्षीणविषयाः द्रुमाः धावन्ति इव । मही उद्- वृत्ताम्बुः नदी इव नेमिविवरे निपतति । अरव्यक्तिः नष्टा । चक्रवलयम् जवात् स्थितम् इव । अश्वोद्धूतं रजः च पुरतः पतति न अनुपतति । (२)
( ९१ ) अन्वय— पितुः पादयोः शिरः पतितम् इव। स्निह्यता राज्ञा समुत्था- पितः इव अस्मि। भ्रातरः त्वरितम् उपगता इव। मातरः अश्रुभिः माम् क्लेदयन्ति इव। सदृशः इति, महान् इति, व्यायतः च इति भृत्यैः सेवया अहम् स्तुतः इव। तत्र आत्मनः वेषं च भाषां च सौमित्रिणा परिहसितम् इव पश्यामि। (३) अन्वय—पितुः प्राणपरित्यागम्, मातुः ऐश्वर्यलुब्धताम्, ज्येष्ठभ्रातुः प्रवासम्, त्रीन् दोषान् कः अभिधास्यति। (४) हिन्दी अर्थ भरत—(रथ की गति को देख कर) अहा। रथ किस तीव्रता से भागा जा रहा है। ये वृक्ष रथ की तेज गति के कारण आँखों से ओझल होते हुए मानो दौड़ रहे हैं। भँवर से युक्त जल वाली नदी की भाँति पृथ्वी धुरी के छिद्र में मानो गिर रही है। बड़ी तेजी से घूमने के कारण चक्र के आरे दीख नहीं रहे हैं। रथ का पहिया वेग से मानो गति हीन हो रहा है और धूलि घोड़ों के खुरों से उड़ कर सामने ही गिरती है पीछे नहीं। (२) सूत—हे दीर्घायु, वृक्षों की सघनता तथा शीतलता से जान पड़ता है कि अयोध्या पास में ही है। भरत—अहा, आत्मीय जनों को देखने के लिए मेरा मन कितना उतावला हो रहा है। क्योंकि, इस समय—ऐसा लग रहा है कि पिताजी के चरणों में मेरा सिर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे प्रेम से उठा सा लिया है। भाई शीघ्रता से आकर मुझे घेर से रहे हैं। जननियां आँसुओं से मुझे भिगो सी रही हैं। भरत पहले के समान ही है, पहले से बड़े हो गए हैं, इस प्रकार कहते हुए सेवक लोग मेरी सेवा करते हुए प्रशंसा कर रहे हैं और लक्ष्मण मेरी निम्न प्रकार की वेशभूषा तथा बोली पर परिहास कर रहा है। (३) सूत—(मन में) अरे, दुःख की बात है कि यह राजकुमार महाराज की मृत्यु को नहीं जान कर भावी मिथ्या आशा को लिए हुए अयोध्या में प्रवेश
( ९२ ) करेगा और मैं जानते हुए भी इसे नही बता पा रहा हूं । क्योकि, पिता दशरथ की मृत्यु, माता कैकेयी का राज्यलोभ और वडे भाई राम का वनवास इन तीनो दोषों को कौन कहेगा । (४) (प्रवेश करके) भट - राजकुमार की जय हो । भरत-भद्र, क्या शत्रुघ्न मेरे पास श्रा रहे हैं । भट- हां, राजकुमार तो श्रापके पास श्रा ही रहे हैं । किन्तु उपाध्यायों ने श्रापसे कहा है । भरत - क्या कहा है, क्या कहा है ? भट- कृत्तिका का एक दण्ड (६० पल या २४ मिनट का काल=नाडी या नाडिका) रह गया है । उसके बीत जाने पर रोहिणी मे कुमार श्रोयोध्या मे प्रवेश करे । भरत-बहुत अच्छा । मैंने गुरुजनो के वचन पहले कभी नही टाले । तुम चलो । भट - जैसा राजकुमार श्रादेश देते हैं। (निकल जाता है) (३) मूल भरतः- अथ कस्मिन् प्रदेशे विश्रमिष्ये । भवतु दृष्टम् । एतस्मिन् वृक्षान्तराविष्कृते देवकुले मुहूर्तम् विश्रमयिष्ये । तदुभयं भविष्यति-दैवतपूजा विश्रमश्च । अथ च उपोपविश्य प्रवेष्ट- व्यानि नगराणीति सत्समुदाचारः । तस्मात् स्थाप्यताम् रथः । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं स्थापयति) भरतः- (रथादवतीर्य) सूत ! एकान्ते विश्रामयाश्वान् । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (निष्क्रान्तः) भरतः- (किञ्चिद गत्वावलोक्य) साधुमुक्तपुष्पलाजाविष्कृता वलयः, दत्तचन्दनपञ्चाङ्गला भित्तयः, अवसक्तमाल्यदामशोभीनि द्वाराणि, प्रकीर्णा वालुकाः । किं नु खलु पार्वणोऽयं विशेषः श्रथवा आह्निक मास्तित्वयम् ? कस्य नु खलु दैवतस्य स्थानं भविष्यति । नेह किञ्चित् प्रहरणं ध्वजो वा बहिश्चिह्नं दृश्यते । भवतु प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविश्यावलोक्य) अहो
( 93 )
धुर्यम् पाषाणानाम् । अहो भावगतिराकृतीनाम् । दैवतोद्- दिष्टानापि मानुषविश्वासतासां प्रतिमानाम् । किन्नु खलु चतुर्देवतोऽय स्तोमः । अथवा यानि तानि भवन्तु । अस्ति तावन्मे मनसि प्रहर्षः । काम दैवतमित्येव युक्त नमयितुं शिरः । विफलस्तु प्रणाम. स्याद मन्त्रार्चितदैवतः ॥ (५) (प्रविश्य) देवकुलिकः—भोः ! नैत्यकावसाने प्राणिधर्ममनुतिष्ठति मयि को नु खल्वयमासा प्रतिमानामल्पान्तराकृतिरिव प्रतिमागृहं प्रविष्टः ? भवतु, प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविशति) भरतः—नमोऽस्तु । देवकुलिकः- न खलु न खलु प्रणामः कार्यः । भरतः—मा तावद् भो ! वक्तव्य किञ्चिदमासु विशिष्ट प्रतिपाल्यते । किं कृतः प्रतिषेधोऽय नियमप्रभविष्णुता ॥ (६) देवकुलिकः— य खल्वेतैः कारणैः प्रतिषेधयामि भवन्तम् । किन्तु दैवतशकया ब्राह्मणजनस्य प्रणामं परिहरामि । क्षत्रिया ह्यत्र- भवन्तः । भरतः—एवम् । क्षत्रिया ह्यत्रभवन्तः । अथ के नामात्रभवन्तः । देवकुलिकः- इक्ष्वाकवः । भरतः— (सहर्षम्) इक्ष्वाकव इति । एते ते ऽयोध्याभर्तारः । एते ते देवतानामसुरपुरवधे गच्छन्त्योऽभिसरीः— मेते ते शत्रुलोके सपुरजनपदा यान्ति स्वसुकृतैः । एते ते प्राप्नुवन्तः स्वभुजबुलजितां कृत्स्नां वसुमती मेने ते मृत्युना ये चिरमिवसिताश्छन्दं मृगयता ॥ (७) भोः ! यदृच्छया खलु मया महत् फलमासादितम् । अभिधीयता कस्तावदत्रभवान् ?
( ९४ ) शब्दार्थ—प्रदेशे=स्थान पर । विश्रमिष्ये=आराम करूंगा । वृक्षान्त राविष्कृते=पेडो के मध्य दीखने वाले । देवकुले=मन्दिर मे । मुहूर्तम्=थोडी देर तक । उभय=दोनो । उपोपविश्य = थोडी देर बैठकर । सत्समुदाचारः = शिष्टाचार । स्थाप्यताम् = रोको । विश्रामय=आराम कराओ । साधु- मुक्त पुष्पलाजाविष्कृताः=सज्जन व्यक्ति से विकीर्ण किए गए फूल व खीलों से प्रकट होने वाले । बलय. =प्रसाद या नैवेद्य । अवसक्त=लटकने वाली । पार्वणः =पूर्णिमा आदि विशेष तिथि पर होने वाला । आह्निकम्=प्रतिदिन किया जाने वाला । आस्तिक्यम् = ईश्वर भक्त का । दैवतस्य=देवता का । इह-यहाँ पर । प्रहरणम्=शक्ति आदि आयुध । बहिश्चिह्नं=बाहरी लक्षण । ज्ञास्ये= मालूम करूंगा । क्रियामाधुर्यम्= शिल्प चातुरी । भावगति = भावों की अभि- व्यक्ति । दैवतोद्दिष्टानां=देवताओ को प्रतिमा स सकल्पित । मानुषविश्वासातः =मनुष्यो की प्रतिमा की विश्वास योग्यता । चतुर्देवता=चार देवताओ का । स्तोम.=समूह । वार्षल = शूद्र सम्बन्धी । अमन्त्रार्चितदैवतः-देवता के मन्त्र और पूजा के बिना । देवकुलिक =पुजारी । नैत्यकावसाने=पूजा आदि नित्य कर्म की समाप्ति पर । प्राशणधमंम्=भोजन को । अनुतिष्ठति=कर लेने पर । अल्पान्तराकृति = बहुत कम भेद वाले आकार का । ज्ञास्ये=ज्ञात करूगा । नमोऽश्वरतु = नमस्कार होवे । मा तावद् भोः = ऐसा मत कहो । वक्तव्यम् = दूषण । विशिष्ट.= मुझ से अच्छे व्यक्ति की । प्रतिपाल्यते= प्रतीक्षा की जा रही है । नियमप्रभविष्णुता = स्वय के तपोनुष्ठान की प्रौढ़ता । दैवतशकया प्रतिमाओ के भ्रम मे । परिहरामि= मना कर रहा हूँ । असुरपरवधे - राक्षसों के नगर मे रहने वालो को समाप्त करने मे । अभिसरी=सहायता के लिए । शक्रलोके = इन्द्रलोक स्वर्ग मे । सुपरजनपदाः = नगर की प्रजाओं के साथ । यान्ति = जाते है । स्वसुकृतैः = अपने पुण्यो के द्वारा । स्वभुजवलजिता = अपने बाहुबल से जीती गई । कृत्स्नाम् सम्पूर्ण । वसुमतीम् = पृथ्वी को । अनवसिताः = नही समाप्त किये जाने वाले । छन्द = अभिप्राय को । मृगयता= ढूँढते हुए । यदृच्छया = अनायास ही । आसादितं = प्राप्त कर लिया है । अभिधीयताम् = कहो । अत्रभवान् = ये । अन्वय--दैवतम् इति इव शिरः नमयितुम् कामम् युक्तम् । प्रणामा तु अमन्त्रार्चितदैवत. वार्षलः स्यात् । (१५)