प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७६ ग्रसमानास्ततो वन्दे देव विश्वं भवन्मयम् ॥’ इति ॥ १४ ॥ यदा पुनः करणेश्वरीप्रसरसंकोचं संपाद्य सर्गसंहारक्रमपरिशीलन- युक्तिम् आविशति तदा बललाभे विश्वमात्मसात्करोति ॥ १५ ॥ चितिरेव देहप्राणाद्याच्छादननिमज्जनेन स्वरूपम् उन्मग्नत्वेन स्फा- रयन्ती बलम्; यथोक्तं 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः.........। (अर्थात् सब ज्ञेय को ज्ञान का ही अंश बनाते रहते हैं) इसलिए हे देव मैं आप के रूप वाले विश्व की बन्दना करता हूँ । (शिवस्तो० २०, १७) (भाव यह है कि सभी जीव विषयों का आहार करते रहते हैं। आप विश्व अर्थात् सब कुछ का आहरण कर लेते हैं। इसलिए विश्व आपका स्वरूप ही है) । जब फिर (साधक) इन्द्रिय देवियों के प्रसार का सम्पादन करके क्रम से सर्ग (भावों वा पदार्थों की सृष्टि अर्थात् बहिःस्थापन) के अभ्यास के उपाय का आलम्बन करता है और संकोच का सम्पादन करके (अर्थात् इन्द्रियों को भीतर प्रतिसंहृत करके) संहार (भावों वा पदार्थों वा ज्ञेयों को ज्ञान में परा- वृत्ति या प्रतिसंहृति) के अभ्यास के उपाय का आलम्बन करता है, तब सूत्र १५--चिति (चित् शक्ति) के (स्वभावसिद्ध) बल को प्राप्त करने पर वह (साधक) विश्व को आत्मसात् कर लेता है (अपने स्वरूप में समीकरण कर लेता है) । भाष्य--चिति अर्थात् चित् शक्ति ही का देह, प्राण इत्यादि कोशों को दबाकर अपने उभार से अपने स्वरूप का उन्मेष 'बल' कहलाता है। जैसा कि कहा गया है (स्पन्दकारिका निः २ का० १० में) “तब उस (चिति) के बल को प्राप्त करके मन्त्र१३६ सर्वज्ञ के बल से सम्पन्न हो जाते हैं ई० ।”
६० प्रत्यभिज्ञाहृदय
इति। एवं च 'बललाभे'—उन्मग्नस्वरूपाश्रयणे' क्षित्यादि-सदा- शिवान्तं 'विश्वम् आत्मसात् करोति'—स्वस्वरूपाभेदेन निर्भासयति। तदुक्तं पूर्वगुरुभिः स्वभाषामयेषु क्रमसूत्रेषु 'यथा वह्निरुद्धोधितो दाह्यं दहति, तथा विषयपाशान् भक्षयेत्' इति। 'न चैवं वक्तव्यम्,—विश्वात्मसात्काररूपा समावेशभूः कादाचित्की। कथम् उपादेया इयं स्यात् इति; यतो देहाद्युन्मज्जननिमज्जनवशेन इदम् अस्याः कादाचित्क- त्वम् इव आभाति। वस्तुतस्तु चितिस्वातंत्र्यावभासि- तदेहाद्युन्मज्जनात् एव कादाचित्कत्वम्। एषा तु सदैव प्रकाशमाना; अन्यथा तत् देहादि अपि न प्रकाशेत। इस प्रकार जब (चिति का) बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् जब कोई अपने उस वास्तविक स्वरूप का आश्रय ग्रहण करता है जो कि अब आविर्भूत हो गया है, तब वह पृथिवी से लेकर सदाशिव तक सारे विश्व को आत्मसात् कर लेता है अर्थात् विश्व को अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में भासित करता है। यही बात पूर्व आचार्यों ने क्रमसूत्र में अपने निराले ढंग से कही है। "जैसे प्रज्वलित आग इन्धन को जला डालती है, वैसे ही साधक को विषय- बन्धनों को आत्मसात कर लेना चाहिए।" ऐसा नहीं कहना चाहिए वह समावेश भूमि जिसमें विश्व का आत्म- सात्कार हो जाता है कभी-कभी ही होती है। तो फिर यह कैसे ग्रहण करने योग्य मानी जा सकती है। (यह शंका ठीक नहीं है)—क्योंकि देह इत्यादि के आविर्भाव और तिरोभाव के कारण ही चिति की यह दशा कभी-कभी होनेवाली (अस्थायी) जैसी लगती है। वस्तुतः समावेशभूमि का कादाचित्कत्व (कभी-कभी होनेवाली अवस्था) देह इत्यादि के आविर्भाव के ही कारण है (जिस देह-इ० को) चिति अपने स्वातन्त्र्य से अवभासित करती है। सच बात तो यह है कि समावेशभूमि सदा प्रकाशमान है। यदि ऐसा न होता, तो देह
६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ८१ अत एव देहादिप्रमातृताभिमाननिमज्जनाय अभ्यासः, न तु सदा प्रथमानतासारप्रमातृताप्राप्त्यर्थम्, इति श्रीप्रत्यभिज्ञाकाराः ॥ १५ ॥ एवं च चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्य- प्रतिपत्तिदार्ढ्यञ्जीवन्मुक्तिः ॥ १६ ॥ विश्वात्मसात्कारात्मनि समावेशरूपे 'चिदानन्दे लब्धे' व्युत्थान- दशायां दलकल्पतया देहप्राणनीलसुखादिषु आभासमानेषु अपि, यत्स- मावेशसंस्कारबलात् प्रतिपादयिष्यमाणयुक्तिक्रमोपबृंहितात् 'चिदैकात्म्य- प्रतिपत्तिदार्ढ्यम्'-अविचला चिदेकत्वप्रथा, सैव 'जीवन्मुक्ति:'-जीवतः इत्यादि का भी प्रकाश न होता । इसलिए अभ्यास (साधना, योग का अभ्यास) प्रमाता का जो देह इत्यादि के साथ मिथ्या तादात्म्य है उसे हटाने के लिए है, उस प्रमातृता (प्रमाता के भाव) को प्राप्त करने के लिए नहीं है जिसका स्वभाव ही सदा प्रकाशमानता है । यही श्रीप्रत्यभिज्ञाकार का कहना है। इस प्रकार- सूत्र १६-चिदानन्द लाभ होने पर देह इत्यादि का अनुभव होने पर भी चित् से एकात्मता का बोध दृढ़ हो जाता है । यही अवस्था जीवन्मुक्ति (जीते हुए भी मुक्ति का बोध) कहलाती है । भाष्य-समावेश१५७ रूप चिदानन्द के प्राप्त होने पर जिसमें समस्त विश्व से एकात्मता का बोध होता है, व्युत्थानदशा१५८ में परत के समान देह, प्राण, नील, सुख१५९ इत्यादि का भान होते हुए भी समावेश के संस्कार- बल से और उस युक्तिक्रम से पुष्ट हो जाने से जिसका प्रतिपादन आगे किया जायगा जो चित् के साथ तादात्म्य के बोध की दृढ़ता हो जाती है वही जीवन्मुक्ति है । दृढ़ता का अर्थ है-चित् के साथ एकात्मता के बोध का अविचल हो जाना । जीवन्मुक्ति का अर्थ है जीते हुए अर्थात् प्राणों को धारण
८२ प्रत्यभिज्ञाहृदय प्राणान् अपि धारयतो मुक्तिः; प्रत्यभिज्ञातनिजस्वरूपविद्राविताशेष- पाशराशित्वात् । यथोक्तं स्पन्दशास्त्रे 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन्सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥' इति ॥ १६ ॥ अथ कथं चिदानन्दलाभो भवति ?-इत्याह मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः ॥ १७ ॥ सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् तद्भित्तिलग्नतां विना च कस्य- चित् अपि स्वरूपानुपपत्तेः संविदेव भगवती 'मध्यम्' । सा तु माया- दशायां तथाभूतापि स्वरूपं गृहयित्वा 'प्राक् संवित्प्राणे परिणता' इति नीत्या प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादि- करते हुए भी मुक्ति, क्योंकि उस समय अपने स्वरूप की पहिचान के द्वारा सभी बन्धन-समूह छिन्न हो जाता है । जैसा कि स्पन्दशास्त्र (वसुगुप्त की स्पन्द- कारिका नि० २.५) में कहा है "जिसको इस प्रकार का सम्यक् ज्ञान हो जाता है वह सब जगत् को शिव की क्रीड़ा के रूप में देखते हुए उससे (शिव से) युक्त रहने के कारण सदा जीते हुए भी मुक्त है । इसमें सन्देह नहीं ।" तो चिदानन्द का लाभ किस प्रकार होता है ? इसके विषय में सूत्रकार कहते हैं— सूत्र १७—मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है । भाष्य—भगवती संवित् (चित्-शक्ति) ही 'मध्य'१४० है क्योंकि यही सब कुछ के अन्तरतम रूप में विद्यमान है और क्योंकि किसी का भी स्वरूप ही नहीं सम्भव है जब तक कि वह संवित् रूप आश्रय से न लगा हो । उसने (संवित् ने) इस प्रकार होती हुई भी (अर्थात् सब कुछ का अन्तरतम तथ्य और आश्रय होते हुए भी) मायादशा में अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाते हुए 'पहले संवित् प्राण में परिणत हुई' इस नीति के अनुसार प्राणशक्ति१४१ भूमि को स्वीकार करके अवरोह क्रम से बुद्धि देह इत्यादि भूमियों में रहती
ष्ठुवम् अधिशयाना, नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । तत्रापि च पलाश- पर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्रात् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्ति- ब्रह्माश्चयमध्यमनाडीरूपतया प्राधान्येन स्थिता; तत एव सर्ववृत्तीनाम् उदयात्, तत्रैव च विश्रामात् । एवंभूतापि एषा पशूनां निमीलित- स्वरूपैव स्थिता । यदा तु उक्तयुक्तिक्रमेण सर्वान्तरतमत्वे मध्यभूता संविद्भगवती विकसति, यदि वा वक्ष्यमाणक्रमेण मध्यभूता ब्रह्मनाडी विकसति, तदा 'तद्विकासात् चिदानन्दस्य' उक्तरूपस्य 'लाभ:'-प्राप्ति- र्भवति । ततश्च प्रागुक्ता जीवन्मुक्तिः ॥ १७ ॥ मध्यविकासे युक्तिमाह विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकासवाहच्छेदाद्यन्त- कोटिनिभालनादय इहोपायाः ॥ १८ ॥ 'इह' मध्यशक्तिविकासे 'विकल्पक्षयादय उपायाः' । प्रागुपदिष्टपञ्च- हुई सहस्र नाड़ी के मार्ग का अवलम्बन किया । वहाँ भी (अर्थात् व्यक्ति में भी) वह मुख्यतः ब्रह्मरन्ध्र १४२ से अधोवक्त्र १४३ तक पलाशपत्र १४४ की मध्य तन्तुके समान मुख्यतः मध्यम नाड़ी १४५ के रूप में स्थित है जिसका आश्रय प्राणशक्ति रूपी ब्रह्म है। (उसको मध्यमनाड़ी इसलिए कहते हैं) क्योंकि सभी चित्त- वृत्तियों का वहीं से उदय होता है और वहीं लय होता है । इस प्रकार होते हुए भी वह पशुओं के लिए (अर्थात् अज्ञानी जीवों के लिए) अपने स्वरूप को छिपाये हुए स्थित है। जब कि सबके अन्तरतम में मध्यरूप से रहनेवाली भगवती संवित् का पहले कहे हुए युक्ति के क्रम से (पंचकृत्य १४६ के अभ्यास से) विकास होता है अथवा आगे बतलाये जानेवाले क्रम से जब मध्यरूपी ब्रह्म- नाड़ी १४७ का विकास १४८ होता है, तब उसके विकास से उक्त रूप चिदानन्द का लाभ अर्थात् प्राप्ति होती है। उसके अनन्तर पूर्ववर्णित जीवन्मुक्ति होती है। मध्य के विकास में उपाय बतलाते हैं :- सूत्र १८-विकल्प-क्षय, शक्ति का संकोच और विकास, बाहों का ध्वंस, आदि और अन्त कोटियों (अन्तों) का अभ्यास इत्यादि यहाँ (मध्य के विकास में) उपाय हैं। भाष्य-इह : यहाँ अर्थात् मध्यशक्ति के विकास में विकल्पक्षय आदि उपाय हैं। यह पहले कहा ही जा चुका है कि संविद् (चेतना) जो कि सब
८४ प्रत्यभिज्ञाहृदय विधकृत्यकारित्वाद्यनुसरणेन सर्वमध्यभूतायाः संविदो विकासो जायते- इति अभिहितप्रायम् । उपायान्तरम् अपि तु उच्यते;-प्राणायाम- मुद्राबन्धादिसमस्तयन्त्रणातंत्रत्रोटनेन सुखोपायमेव, हृदये निहितचित्तः, उक्तयुक्त्या स्वस्थितिप्रतिबन्धकं विकल्पम् अकिंचिच्चिन्तकत्वेन प्रशमयन्, अविकल्पपरामर्शेन देहाद्यकलुषस्वचित्प्रमातृतानिभालनप्रवणः, अचिरादेव उन्मिषद्विकासां तुर्य-तुर्यातीतसमावेशदशाम् आसादयति तथोक्तम् 'विकल्पहानेनैकाग्र्यात्क्रमेणेश्वरतापदम् ।' इति श्रीप्रत्यभिज्ञायाम्। श्रीस्पन्देऽपि 'यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥' कुछ का केन्द्र है—का विकास पहले बतलाये हुए पाँच प्रकार के कृत्यों के करने के अनुसरण से होता है । अब दूसरा उपाय भी बतलाया जा रहा है । एक सरल उपाय है जिसके द्वारा प्राणायाम१४९, मुद्रा१५०, बन्ध१५१ इत्यादि कष्टकर साधनाओं से छुटकारा पाया जा सकता है । (वह उपाय यह है)—जब साधक अपने चित्त को हृदय१५२ (संविद्) में स्थापित अर्थात् एकाग्र करके, बतलाये हुए उपाय से, अपनी वास्तविक दशा के बाधक विकल्प१५३ को, बिना अन्य किसी प्रकार के चिन्तन के, रोक कर, अविकल्प के आश्रय के द्वारा, जो देह इत्यादि से दूषित नहीं है ऐसी अपनी पारमार्थिक चेतना को प्रमाता (वास्तविक ज्ञाता) समझने का अभ्यास कर लेता है, तब वह शीघ्र ही विकास की ओर उन्मुख हुई तुर्य१५४ और तुर्यातीत१५५ में समावेश की दशा को प्राप्त कर लेता है जैसा कि श्री ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में कहा गया है :— “साधक विकल्प के त्याग से और एकाग्रता से, क्रमशः ईश्वरता पद को प्राप्त कर लेता है (दे० ई० प्र० च० अ०, प्र० आ०, का० ११, ।” श्री स्पन्द में भी कहा है :— “जब (मानसिक) क्षोभ लीन हो जाता है, तब परम पद की प्राप्ति होती है” (दे० स्पन्द का० नि० १ का० ६)
इति। श्रीज्ञानगर्भेऽपि 'विहाय सकलाः क्रिया जननि मानसीः सर्वतो विमुक्तकरणक्रियानुसृतिपारतन्त्र्योज्ज्वलम्। स्थितैस्तवदनुभावतः सपदि वेद्यते सा परा दशा नृभिरतन्द्रितासमसुखामृतस्यन्दिनी ॥' इति। अयं च उपायो मूर्धन्यत्वात् प्रत्यभिज्ञायां प्रतिपादितत्वात् आदौ उक्तः। शक्तिसंकोचादयस्तु यद्यपि प्रत्यभिज्ञायां न प्रतिपादिताः, तथापि आम्नायिकत्वात् अस्माभिः प्रसङ्गात् प्रदर्श्यन्ते; बहुषु हि प्रदर्शितेषु कश्चित् केनचित् प्रवेक्ष्यति इति। 'शक्तेः संकोच'-इन्द्रियद्वारेण प्रसरन्त्या एव आकुञ्चनक्रमेण उन्मुखीकरणम्। यथोक्तम् आथर्वणिकोपनिषत्सु कठवल्ल्यां चतुर्थ- वल्लीप्रथममन्त्रे। श्री ज्ञानगर्भ में भी (कहा गया हैं) : “हे जननी, जब लोग सारी मानसिक क्रियाओं को छोड़कर, इन्द्रियों की क्रियाओं की अनुसरण रूपी परतंत्रता से मुक्त होकर शुद्ध भाव में स्थित होते हैं जब तुम्हारे अनुग्रह से तत्काल उस उत्कृष्ट दशा की अनुभूति होती है जो कि अक्षुण्ण निरूपम सुख रूपी अमृत की वर्षा करती है।” यह उपाय सर्वप्रथम कहा गया है, क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ है और प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में प्रतिपादित हुआ है। शक्ति का संकोच इत्यादि उपाय यद्यपि प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में नहीं प्रतिपादित हुए हैं, तथापि वे आगम की परम्परा द्वारा विहित हैं, इसलिए प्रसंगवश हम उन्हें भी बतला देते हैं। बहुत से उपाय बतलाये जाने पर कोई किसी एक उपाय से समावेश दशा में प्रवेश कर सकेगा। शक्ति संकोच :- इसका अर्थ है शक्ति का संकोच। इसका भाव है “इन्द्रियों के द्वारा (विषयों की ओर) जाती हुई शक्ति का आकुंचन क्रम से (सिकोड़कर, समेट कर) प्रत्यागात्मा की ओर उन्मुख करना”। जैसा कि अर्थवेद की कठवल्ली-उपनिषद् की चतुर्थवल्ली के प्रथम मंत्र में कहा गया है :-
८६ प्रत्यभिज्ञाहृदय 'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभू- स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमश्नन् ॥' इति। प्रसृताया अपि वा कूर्माङ्गसंकोचवत् त्राससमये हृत्प्रवेशवच्च सर्वतो निवर्तनम् । यथोक्तम् । 'तदपोद्धृते नित्योदितस्थितिः ।' इति । 'शक्तेर्विकासः' अन्तर्निगूढाया अक्रममेव सकलकरणचक्रविस्फा- रणेन 'अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जितः ।' इति। भैरवीमुद्रानुप्रवेशयुक्त्या बहिः प्रसरणम् । यथोक्तं कक्ष्यास्तोत्रे "स्वयंभू (आप से आप होनेवाला अर्थात् प्रजापति) ने इन्द्रियों को बहिर्मुखी बना दिया। इसलिए जीव बाहर की ओर देखता है, अन्तरात्मा की ओर नहीं। कोई बुद्धिमान व्यक्ति अमृतत्व के अनुभव की इच्छा करता हुआ आंख को लौटा कर अन्तरात्मा को देखता है।" अथवा (शक्ति का संकोच हो सकता है) इन्द्रियों की बाहर फैली हुई शक्ति को चारों ओर से बटोर कर भीतर की ओर पलटना जैसे कछुआ भय के समय अपने अंगों को सिकोड़ कर भीतर की ओर पलट लेता है। जैसा कि कहा है "उसके पलटने पर नित्योदित१५७ को स्थिति होती है।" शक्ति विकास— शक्ति का विकास होता है भीतर छिपी हुई शक्तियों का एक साथ ही सब इन्द्रियों के प्रसार द्वारा । "लक्ष्य भीतर रहे, और दृष्टि बिना निमेष और उन्मेष के (अर्थात् आंख बिना बन्द या खोले हुए एक टक) बाहर की ओर रहे।" चित्त के भीतर अनुप्रवेश के साथ इन्द्रियों का बाहर फैलाव यह भैरवी मुद्रा है जैसा
प्रत्यभिज्ञाहृदय ५७ 'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विष्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तम्भभूत- स्तिष्ठन्विश्वाधार एकोऽवभासि ।" इति । श्रीभट्टकल्लटेनापि उक्तम् 'रूपादिषु परिणामात् तत्सिद्धिः ।' इति शक्तेश्च संकोचविकासौ, नासापुटस्पन्दक्रमोन्मिषत्सूक्ष्मप्राण- शक्त्या भ्रूभेदेन क्रमासादितोर्ध्वकुण्डलिनीपदे प्रसरविश्रान्तिदशापरि- शीलनम्; अधःकुण्डलिन्यां च षष्ठवक्त्ररूपायां प्रगुणीकृत्य शक्तिं, तन्मूल-तदग्र-तन्मध्यभूमिस्पर्शविशः । यथोक्तं विज्ञानभट्टारके 'बह्नेर्विषस्य मध्ये तु चित्तं सुखमयं क्षिपेत् । कि कक्ष्यास्तोत्र में कहा है—"हे (शिव) दृष्टि इत्यादि सारी शक्तियों को अपनी चेतना द्वारा अपने अपने विषय में एक साथ चारों ओर फेंक कर भीतर सुवर्ण स्तम्भ के समान (अचल रूप से) वर्तमान रहते हुए तुम्हीं एक विश्व के आधार प्रतीत होते हो।" भट्टकल्लट ने भी कहा है—"रूप इत्यादि के रहते हुए भी परिणाम द्वारा (अर्थात् रूप इत्यादि के अनुभव के समय जो चेतना बाहर की ओर जाती हुई प्रतीत होती है उसके विषय में यह बोध बनाये रखना कि यह वही है जो आन्तरिक चेतना है) उसकी (अर्थात् शक्ति विकास की) सिद्धि होती है।" शक्ति का संकोच-विकास इस प्रकार होता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी १५८ में प्रसर (फैलाव) और विश्रान्ति (रुकाव) दशा का (मानसिक) अभ्यास विकास है जो दशा कि सूक्ष्म प्राणशक्ति द्वारा भ्रूभेद से (अर्थात् भौंहों के बीच के प्राण के निरोध से) क्रमशः प्राप्त होती है और जो सूक्ष्मप्राणशक्ति नाक के भीतर के वायुस्पन्दन के नियमन से विकसित होती है और शक्ति का संकोच षष्ठवक्त्ररूपी १५९ (छठें अवयव रूपी) अर्थात् छठें अवयव मेढ्रकन्द में स्थित अधःकुण्डलिनी १६० में, प्राणशक्ति को पुष्टकर, उसके (अधःकुण्डलिनी के) मूल, मध्य और अग्रभाग में समावेश है। जैसा कि आदरणीय विज्ञान भैरव [६८वें श्लोक] में कहा है:—"सुखमय चित्त को 'केवल' रूप में [अर्थात्
८८ प्रत्यभिज्ञाहृदय केवलं वायुपूर्णं वा स्मरानन्देन युज्यते ॥' इति । अत्र वह्निः अनुप्रवेशक्रमेण संकोचभूः, विषस्थानम् प्रसरयुक्त्या विकासपदम्, 'विषॢव्याप्तौ' इति अर्थानुगमात् । 'बाह्वोः'–वामदक्षिणगतयोः 'छेदो'—हृदयविश्रान्तिपुरःसरम् । यथोक्तं ज्ञानगर्भे— 'अनच्चककृतायतिप्रसृतपार्श्वनाडीद्वय- च्छिदो विधृतचेतसो हृदयपङ्कजस्योदरे । उदेति तव दारितान्धतमसः स विद्याङ्कुरो य एष परमेशतां जनयितुं पशोरप्यलम् ॥ इति । विषय सम्बन्ध से रहित] अथवा वायु द्वारा पूर्ण रूप में [अर्थात् मध्य नाड़ी में स्थित बिना क्रम के उच्चार से स्वररहित व्यंजन मात्र रूप प्राणवायु से भरे हुए रूप में) वह्नि और विष१६१ के बीच में फेंकना चाहिए (अर्थात् एकाग्र करना चाहिए) (उस दशा में योगी) स्मरानन्द१६२ अर्थात् कामानन्द से युक्त होता है।" यहाँ पर (प्राण के मेढ़कन्द में) प्रवेश की प्रक्रिया से 'वह्नि' संकोचभूमि है। 'विषस्थान' प्रसर की युक्ति (उपाय) के द्वारा विकासपद है, क्योंकि 'विष' धातु का अर्थ ही है व्याप्त होना१६३ । बाह्वोः=दोनों बाहों का अर्थात् प्राण और अपान का जिनमें से अपान वामगत (सुषुम्ना की बाईं ओर) है, और प्राण दक्षिणगत (सुषुम्ना की दाहिनी ओर) है, छेद = हृदय में पहले रोककर अनच्क (स्वर रहित) ककार, हकार इत्यादि वर्णों के उच्चारण से विच्छेद । जैसा कि ज्ञानगर्भ में कहा है । "(हे जगदम्बे) उसके हृदयकमल के भीतर, जिसका चित्त स्थिर हो गया है, जिसकी दोनों (सुषुम्ना की दोनों ओर की) ओर फैली हुई नाड़ियाँ (अर्थात् सुषुम्ना की दोनों ओर की ईडा, पिंगला की वायु) बिना स्वर के उच्चरित ककार के नियंत्रण द्वारा निरुद्ध हो गई हैं, जिसका अंधकारकारक तम विदा- रित हो गया है, तुम्हारे ज्ञान का वह अंकुर उपजता है जो कि पशु में भी परमेशत्व उत्पन्न करने के लिए क्षमता रखता है। (अब सूत्र में जो आद्यन्तकोटिनिभालन पद है उसका अर्थ बतलाते हैं) ।
'आदिकोटिः' हृदयम्, 'अन्तकोटिः' द्वादशान्तः; तयोः प्राणो- ल्लासविश्रान्त्यवसरे 'निभालनं'-चित्तनिवेशनेन परिशीलनम्। यथोक्तं विज्ञानभैरवे 'हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसंपुटमध्यगः। अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥' इति। तथा 'यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् । प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥' इति। आदिपदात् उन्मेषदशानिषेवणम् । यथोक्तम् 'उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥' इति स्पन्दे । तथा रमणीयविषयचर्वणादयश्च संगृहीताः । यथोक्तं श्रीविज्ञानभैरवे एव आदि कोटि-हृदय। अन्तकोटि = द्वादश ( बारह अंगुलियों) का अन्तर। निभालन--इन दोनों (हृदय और द्वादशान्त) में प्राण के उमड़ने और समाप्त होने के अवसर पर चित्त को लगाने का अभ्यास। जैसा कि विज्ञान भैरव में कहा है :- "हे सुभगे (हे सुन्दरि) जिसकी इन्द्रियां हृदयाकाश में लीन हो गई हैं, जिसका चित्त हृदयकमल के भीतर प्रविष्ट हो गया है, जो और कुछ नहीं चिन्तन करता है (अर्थात जो एकाग्रचित्त हो गया है), वह परम सौभाग्य को प्राप्त होता है।" (वि० भै० श्लोक ४६) । इसी प्रकार (विज्ञानभैरव में ५१ वें श्लोक में कहा गया है) "जैसे कैसे भी और जहां कहीं भी यदि कोई अपने चित्त को द्वादशान्त में लगावे तो प्रतिक्षण उसकी चित्तवृत्ति क्षीण होती जायगी और थोड़े ही दिनों में वह औरों से विलक्षण हो जायगा ।" आदि शब्द से (अर्थात् सूत्र में जो आदि शब्द है उससे) उन्मेषदशा का अभ्यास (समझना चाहिए)। जैसा कहा है (स्प० का० नि० ३ का० ६) । "उसको उन्मेष १६७ समझना चाहिए; (कोई) स्वयं उसको देख ले (अर्थात् उसका स्वयं अनुभव कर ले)" इसी प्रकार रमणीय विषय का आस्वादन इत्यादि भी 'आदि' पद में संगृहीत है, जैसा कि श्री विज्ञानभैरव में ही कहा है :-
'जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद्भूरितावस्थां महानन्दमयो भवेत् ॥ गीतादिविषयास्वादासौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥ यत्र तत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं संप्रकाशते ।' इति । एवमन्यदपि आनन्दपूर्णस्वात्मभावनादिकम् अनुमन्तव्यम् । इत्येवमादयः अत्र मध्यविकासे उपायाः ॥१८॥ मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः, स एव च परमयोगिनः समावेश- समापत्त्यादिपर्यायः समाधिः, तस्य नित्योदितत्वे युक्तिमाह "जब कोई खान-पान से प्रकट होनेवाले आस्वाद के आनन्द के विस्तार का अनुभव करता है, तो उसे चाहिए कि वह उस आनन्द की पूर्णावस्था पर ध्यान करे । ऐसा करने से वह महानन्द से परिपूर्ण हो जायगा । जब गीतादिविषयों के अनुपम आनन्द से कोई योगी एकात्म हो जाता है, तब ऐसा एकाग्रचित्त योगी तन्मय होने के कारण उस आनन्द से तादात्म्य का अनुभव करता है । जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है, साधक को चाहिए कि उसी पर ध्यान लगावे । (ध्यान के अभ्यास से) उसे उसमें से ही परमानन्द के स्वरूप का भान होगा^{१६८} ।" (वि. भै. ७२, ७३, ७४ श्लोक) ऐसे ही आनन्दपूर्ण आत्मा की अन्य प्रकार की भावनाओं का अनुमान किया जा सकता है । सूत्र में जो आदयः (इत्यादि) शब्द आया है वह मध्य के विकास के लिए इसी प्रकार के उपायों को इंगित करता है ॥१८॥ मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है यही (चिदानन्द का का लाभ ही) परमयोगी का (वास्तविक) समाधि है जिसके समावेश^{१६९} समापत्ति इत्यादि समानार्थवाची शब्द हैं । उसके (समाधि के) नित्य प्रकट रहने का निम्नलिखित उपाय कहते हैं ।
प्रत्यभिज्ञाहृदय [६१] समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयो भूयश्चिदैक्या- मर्शान्नित्योदितसमाधिलाभः ॥१६॥ आसादितसमावेशो योगिवरो व्युत्थाने अपि समाधिरससंस्कारेण, क्षीब इव सानन्दं घूर्णमानो, भावराशिं शरदभ्रलवम् इव चिद्गगन एव लीयमानं पश्यन्, भूयो भूयः अन्तर्मुखताम् एव समवलम्बमानो, निमीलनसमाधिक्रमेण चिदैक्यमेव विमृशन् व्युत्थानाभिमतावसरे अपि समाध्येकरस एव भवति । यथोक्तं क्रमसूत्रेषु 'क्रममुद्रया अन्तःस्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः । तत्रादौ बाह्यात् अन्तः प्रवेशः, आभ्यन्तरात् बाह्यस्वरूपे प्रवेशः आवेशवशात् जायते;—इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः' इति । अत्रायमर्थः सृष्टि-स्थिति-संहृतिसंविच्चक्रात्मकं क्रमं मुद्रयति, सूत्र १६—समाधि के संस्कार से परिपूर्ण व्युत्थान में बार-बार चित् (पारमार्थिक चेतना) के साथ अपने ऐक्य का चिन्तन करते रहने से शाश्वत (सदा प्रकट) समाधि का लाभ होता है । भाष्य—श्रेष्ठ योगी जिसने समाधि प्राप्त कर लिया है, समाधि के आनन्द से संस्कार से मतवाले के समान आनन्द से झूमता हुआ, चिद्गगन में पदार्थों के समूह को शरदऋतु में बादल के टुकड़े के समान लीयमान देखता हुआ, बार-बार अन्तर्मुखता का अवलम्बन करता हुआ निमीलन १७० समाधि की प्रक्रिया द्वारा चित् (परमार्थ चेतना) से अपने ऐक्य का चिन्तन करता हुआ, जो व्युत्थान १७१ समझा जाता है उस अवसर पर भी, समाधिरस से अभिन्न ही रहता है । जैसा कि क्रमसूत्र में कहा है :— साधक अन्तःस्वरूप क्रम मुद्रा १७२ द्वारा बाहर की ओर देखते हुए भी समावेश की दशा में बना रहता है । इसमें (क्रम मुद्रा में) आवेश के प्रभाव से पहले चेतना का बाहर से भीतर की ओर प्रवेश होता है और फिर भीतर से बाहर की ओर प्रवेश होता है । इस प्रकार मुद्राक्रम बाह्य और आभ्यन्तर दोनों रूप का है । यहाँ पर (अर्थात् इस क्रमसूत्र का) यह अर्थ है :—क्रम = सृष्टि स्थिति और संहार रूपी चक्र अर्थात् फेरा (एक के बाद दूसरा निरन्तर होते रहना) । मुद्रा = मुद्रयति अर्थात् जो यह चित्शक्ति (पहले से ही) अपने भीतर स्थित
स्वाधिष्ठितम् आत्मसात् करोति येयं तुरीया चितिशक्तिः, तया 'क्रममुद्रया' ; 'अन्तरिति'—पूर्णाऽहन्तास्वरूपया; 'बहिर्मुख'—इति, विषयेषु व्याप्रुतः अपि; 'समाविष्टः'—साक्षात्कृतपरशक्तिस्फारः 'साधकः'—परमयोगी भवति। तत्र च 'बाह्याद्' ग्रस्यमानात् विषयग्रामात् 'अन्तः' परस्यां चिति भूमौ, ग्रसनक्रमेणैव 'प्रवेशः'— समावेशो भवति। 'आभ्यन्तरात् चितिशक्तिस्वरूपात् च साक्षा- त्कृतात् 'आवेशवशात्'—समावेशसामर्थ्यात् एव 'बाह्यस्वरूपे'— इदन्तानिर्भासे विषयग्रामे, वमनयुक्त्या 'प्रवेशः'—चिद्रसाश्यानता- प्रथनात्मा समावेशो जायते;—इति 'सबाह्याभ्यान्तरः अयं' नित्योदित- ( सृष्टिस्थितिसंहार रूपी क्रम ) को आत्मसात् कर लेती है । (मुद्रा = मुद्रयति इति मुद्रा अर्थात् आत्मसात् करती है = अपना लेती है) । तया क्रममुद्रया = उस क्रम मुद्रा द्वारा । उस क्रममुद्रा द्वारा का पूरा अर्थ यह हुआ कि उस तुरीया चितिशक्ति के द्वारा जो अपने भीतर स्थिति सृष्टि- स्थिति-संहार रूपी क्रम को मुद्रित कर लेती है अर्थात् (स्पष्ट रूप से) आत्म- सात् कर लेती है । अन्तःस्वरूपया = भीतरी स्वरूप से अर्थात् पूर्ण अहन्ता- रूपी स्वरूप से । बहिर्मुख = विषयों में लगे हुए रहने पर भी । समाविष्टः = परमशक्ति के विकास को साक्षात् कर लेनेवाला । साधकः = परम् योगी । क्रममुद्रया--भवति साधक :-इस पूरे वाक्य का यह अर्थ हुआ “साधक अर्थात् परमयोगी बहिर्मुख होते हुए भी अर्थात् विषयों में लगे रहने पर भी समाविष्ट रहता है अर्थात् परमशक्ति के विकास का अनुभव करता रहता है।” किसके द्वारा ? अन्तःस्वरूप रूपी क्रममुद्रा के द्वारा अर्थात् जो पूर्णाहन्ता स्वरूपवाली तुरीया चितिशक्ति क्रम को अर्थात् सृष्टिस्थिति-संहार रूपी क्रम को मुद्रित कर लेती है अर्थात् आत्मसात् कर लेती है, उसके द्वारा । इसमें (क्रममुद्रा में) 'बाहर से' अर्थात् उन विषयपुंजों से जो ग्रहण किये जा रहे हैं 'भीतर' अर्थात् परम चितिभूमि में ग्रहण के द्वारा प्रवेश अर्थात् समावेश होता है । 'भीतर से' अर्थात् साक्षात् किये हुए चिति शक्तिस्वरूप से 'आवेशवश से' अर्थात् समावेश के प्रभाव से ही बाह्यस्वरूप में अर्थात् विषयपुंज में जो कि 'यह' के रूप में भासित होता है, वमनयुक्ति से अर्थात् बाहर की ओर प्रक्षेपण की प्रक्रिया से, 'प्रवेश' अर्थात् चित् रस का घनीभूततारूपी समावेश होता है । इस प्रकार यह मुद्राक्रम अथवा क्रममुद्रा 'सबाह्यान्तर' (बाह्य और आन्तरिक दोनों एक साथ) होता है । सबाह्यान्तर का तात्पर्य
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६३ समावेशात्मा, 'मुदो'--हर्षस्य वितरणात्, परमानंद स्वरूपत्वात् पाश- द्रावणात्, विश्वस्य अन्तः तुरीयसत्तायां मुद्रणात् च मुद्रात्मा, क्रमः अपि सृष्ट्यादिक्रमाभासकत्वात् तत्क्रमाभासरूपत्वात् च 'क्रम' इति अभिधीयते इति ।। १९ ।। इदानीम् अस्य समाधिलाभस्य फलमाह तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मकपूर्णाहन्तावेशात्सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवताचक्रेश्वरताप्राप्ति र्भवतीति शिवम् ।। २० ।। नित्योदिते समाधौ लब्धे सति, 'प्रकाशानन्दसारा'--चिदा- यह है कि वह नित्य प्रकट समावेश रूपी मुद्राक्रम होता है । इसको मुद्रा निम्न कारणों से कहा है :- (१) परमानन्द स्वरूप होने से, 'मुद' अर्थात् आनन्द के वितरण के कारण (मुदं राति ददाति वितरति इति 'मुद्रा' इस व्युत्पत्ति से) (२) पाश (बन्ध) विलयन के कारण (मुम बन्धं द्रावयति इति मुद्रा-इस व्युत्पत्ति से) । (३) विश्व का भीतरी तुरीया सत्ता में मुद्रित अर्थात् मोहरबन्द होने के कारण (मुद्रयति इति मुद्रा-इस व्युत्पत्ति से) । [यहाँतक तो मुद्राका अर्थ हुआ । अब क्रम का अर्थ बतलाते हैं ।] यह क्रम इसलिए कहलाता है (१) क्योंकि वह सृष्टि इत्यादि (सृष्टि, स्थिति, संहार) के क्रम का प्रदर्शक है । (२) क्योंकि यह स्वयं सृष्टि इत्यादि क्रम में भासित होता है ।।१९।। अब इस समाधिलाभ का फल बतलाते हैं :- सूत्र २०-तब (क्रममुद्रा सिद्धि के अनन्तर) प्रकाश और आनन्द का सार, महामन्त्र वीर्यरूप पूर्ण अहन्ता में समावेश होने से, अपने उस संवित् देवता के समूह पर प्रभुत्व की प्राप्ति होती है जो समूह सारे विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है । यह सब शिव का स्वभाव है । नित्योदित (सदा प्रकट रहनेवाली) समाधि के प्राप्त होने पर जो यह पूर्ण परमोत्कृष्ट विमर्श रूपी अहन्ता¹⁰¹ अर्थात् स्वाभाविक
९४ प्रत्यभिज्ञाहृदय ह्लादैकघना 'महती मन्त्रवीर्यात्मिका' - सर्वमन्त्रजीवितभूता 'पूर्णा' पराभट्टारिकारूपा या इयम् 'अहन्ता' - अकृत्रिमः स्वात्मचमत्कारः, तत्र 'आवेशात्' 'सदा' कालान्यादेः चरमकलापर्यन्तस्य विश्वस्य यौ 'सर्गसंहारौ' - विचित्रौ सृष्टिप्रलयौ 'तत्कारि' यत् 'निजं संवि- द्वेवताचक्रं' 'तदैश्वर्यस्य' 'प्राप्तिः' - आसादनं 'भवति', प्राकरणिकस्य परमयोगिन इत्यर्थः; 'इति' एतत् सर्वं शिवस्वरूपमेव इति उप- संहारः - इति संगतिः । तत्र यावत् इदं किंचित् संवेद्यते, तस्य संवेदनमेव स्वरूपं ; तस्यापि अन्तर्मुखविमर्शमयाः प्रमातारः तत्त्वम् ; तेषामपि विगलितदेहाद्युपाधिसंकोचाभिमाना अशेषशरीरा सदा- शिवेश्वरतैव सारम् ; अस्या अपि प्रकाशैकसद्भावापादिताशेषविश्व- चमत्कारमयः श्रीमान् महेश्वर एव परमार्थः; - नहि पारमार्थिक- प्रकाशावेशं विना कस्यापि प्रकाशमानता घटते - स च परमेश्वरः स्वातन्त्र्यसारत्वात् आदि-क्षान्तामयीयशब्दराशिपरार्मशमयतवेनैव स्वात्मरूपी चमत्कार या आनन्द है, जो कि प्रकाशानन्द सार है अर्थात् जो सघन चिदानन्द का सार है, जो महामन्त्रवीर्यात्मक है अर्थात् जो सब मंत्रों का जीवन स्वरूप है उसमें समावेश होने से कालाग्नि से १७४ लेकर-अन्तिम कला तक विश्व का जो सर्गसंहार अर्थात् विचित्र सृष्टिप्रलय है उसका करनेवाला जो अपना संविद्देवता समूह १७५ है उस पर ऐश्वर्य या प्रभुत्व की प्राप्ति होती है । यह ऐश्वर्य उस परम योगो को प्राप्त होता है जिसका वर्णन इस प्रसंग में हुआ है ! यही इसका अर्थ है । सूत्र में जो 'इतिशिवम्' है उसका तात्पर्य यह है कि यह सब शिव का स्वरूप ही है। इति उपसंहार का द्योतक है । यही इन शब्दों का सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध में (यह ध्यान रखने की बात है कि) जो कुछ भी संवेद्य है अर्थात् जो कुछ भी प्रमेय है उसका स्वरूप संवेदन अर्थात् प्रमाण है और प्रमाण का भी तात्त्विक स्वरूप अन्तर्मुखी आत्मचेतनापूर्ण प्रमाता है। उन प्रमाताओं की भी सदाशिवेश्वरता सार है जिसमें देह इत्यादि संकुचित अनुबन्धों से तादात्म्य का भाव विगलित हो गया है और जिसका शरीर समस्त विश्व है। उस सदाशिवेश्वरता का भी परम सार महेश्वर है जो उस समस्त विश्व के चमत्कार १७६ से परिपूर्ण है जो कि प्रकाश के साथ एक सद्भाव १७७ (एक होने के भाव) से घटित होता है। पारमार्थिक प्रकाश के संचार के बिना कोई भी वस्तु प्रकाश (अभिव्यक्ति) में आही नहीं सकती।
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६५ एतत्स्वीकृतसमस्तवाच्य-वाचकमयाशेषजगदानन्दसद्भावापादनात् परं परिपूर्णत्वात् सर्वाकाङ्क्षाशून्यतया आनन्दप्रसरनिर्भरः; अत एव अनुत्तराकुलस्वरूपात् अकारात् आरभ्य शक्तिस्फाररूपहकलापर्यन्तं यत् विश्वं प्रसृतं, क्षकारस्य प्रसरशमनरूपत्वात्; तत् अकार-हकारा- भ्यामेव संपुटीकारयुक्त्या प्रत्याहारन्यायेन अन्तः स्वीकृतं सत् अवि- भागवेदनात्मकबिन्दुरूपतया स्फुरितम् अनुत्तर एव विश्राम्यति;--इति शब्दराशिस্বরূপ एव अयम् अकृतको विमर्शः । यथोक्तं 'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहं-भावो हि कीर्तितः । उक्ता च सैव विश्रान्तिःसर्वापेक्षानिरोधतः ॥ स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' वह परमेश्वर आनन्द के प्रसार से भरा हुआ है क्योंकि वह स्वातंत्र्य का सार है क्योंकि 'अ' से लेकर 'क्ष' तक अमायीय शब्द-राशि की स्मृति के कारण १७८ अपनाये हुए समस्त वाच्यवाचकमय सम्पूर्ण जगत् रूपी आनन्द १७९ के ऐक्यभाव से सम्पन्न होने से वह सर्वथा परिपूर्ण है और सब आकांक्षाओं से रहित है। इसलिए अ से लेकर जो अनुत्तर (परम) अकुल १८० का स्वरूप है, शक्ति के प्राचुर्य और फैलाव स्वरूप 'ह' कला तक जो विश्व फैला हुआ है-क्ष तो फैलाव की समाप्ति का द्योतक मात्र हैं-वह विश्व 'अ' और 'ह' के संयोजन द्वारा प्रत्याहार १८१ की तरह भीतर स्वीकार किया हुआ अविभाग (एकाकार) का द्योतक बिन्दु १८२ के रूप में फड़कता हुआ 'अनुत्तर' में (अर्थात् जिससे परे और कुछ नहीं है, परम शिव में) ही ठहरा हुआ है। इस प्रकार यह स्वाभा- विक विमर्श (अहं की आन्तरिक अनुभूति) शब्दपुञ्ज रूप ही है। जैसा कि कहा गया है (दे० उत्पलदेव की अजडप्रमातृसिद्धि श्लो० २२, २३) । “सभी वेद्य रूपी प्रकाश १८३ की अपने भीतर विश्रान्ति 'अहंभाव' (आत्म- प्रतीति) कहलाता है। इसी विश्रान्ति को समस्त अपेक्षाओं के निरसन होने पर स्वातंत्र्य, मुख्य कर्तृत्व और ईश्वरता कहते हैं।” यही अहन्ता महती शक्तिभूमि है (सब शक्तियों का महान् आधार) है, क्योंकि यही सभी मंत्रों के उदय और विश्रान्ति का स्थान हैं, क्योंकि इसी के बल से वे सारी क्रियाएँ होती हैं जिनसे किसी उद्देश्य की सिद्धि होती है।
३. तृतीय भाग (सूत्र १३-१६): शक्ति-विकास, मध्य-विकास एवं उन्मना दशा
६६ प्रत्यभिज्ञाहृदय इति। एषैव च अहन्ता सर्वमन्त्राणाम् उदयविश्रान्तिस्थानत्वात् एतद्बलेनैव च तत्तदर्थक्रियाकारित्वात् महती वीर्यभूमिः। तदुक्तम् 'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा... ...।' इत्यादि .... त एते शिवधर्मिणः ॥' इत्यन्तम् श्रीस्पन्दे। शिवसूत्रेषु अपि 'महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः, (१उ० २२ सू०) इति। तदत्र महामन्त्रवीर्यात्मिकायां पूर्णाहन्तायाम् 'आवेशो'--देह- प्राणादिनिमज्जनात् तत्पदावाप्त्यवष्टम्भेन देहादीनां नीलादीनामपि तद्रसाप्लावनेन तन्मयीकरणम्। तथा हि--देहसुखनीलादि यत् किंचित् प्रथते, अध्यवसीयते, स्मर्यते, संकल्प्यते वा, तत्र सर्वत्रैव भगवती चितिशक्तिमयी प्रथा भित्तिभूतैव स्फुरति;--तदस्फुरणे कस्यापि अस्फु- श्री स्पन्दकारिका में कहा गया है (स्प० का० द्वि० नि० १, १) “इसी बल को पहुँच कर" यहाँ से लेकर वे “सब शिवात्मक हैं" यहाँ तक। शिव सूत्र में भी कहा गया है :- “यही वह महासरोवर१८४ है जिससे सम्बन्ध स्थापित करने१८५ से मंत्रशक्ति का अनुभव होता है।" (१ उ०, २२ सूत्र) [यहाँ तक सूत्र के “प्रकाशानन्दसार” अंश पर भाष्य है। अब “महामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्ता- वेशात्” इ० अंश पर भाष्य प्रारम्भ होता है]। यहाँ पर (इस सूत्र में) महामन्त्रशक्तिरूपी पूर्ण अहन्ता में आवेश कहने का तात्पर्य है 'देहप्राण इत्यादि के उसमें निमज्जन से अर्थात् उस पद की प्राप्ति की स्थिरता से देह, नील इत्यादि वेद्यों (ज्ञेयों) को उसके (पूर्ण अहन्ता के) रस में निमग्न कर तन्मय कर देना।' देह, सुख नील इत्यादि जो कुछ प्रकाश में आ रहा है, अथवा जो कुछ (बुद्धि के द्वारा) निश्चय किया जा रहा है, (मन के द्वारा) स्मरण किया जा रहा है अथवा संकल्प किया जा रहा है—इस सत्र में भगवती चितिशक्ति का प्रकाश पृष्ठभूमि होकर स्फुरण करता रहता है। यह ठीक ही कहा गया है कि बिना उसके (चितिशक्ति के) स्फुरण के कुछ भी प्रकाश में
७ प्रत्यभिज्ञाहृदय ६७ रणात् इति उक्तत्वात् । केवलं तथा स्फुरन्त्यपि सा तन्मायाशक्त्या अवभासितदेहनीलाद्युपरागदत्ताभिमानवशात् भिन्न-भिन्नस्वभावा इव भान्ती ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिरूपतया मायाप्रमातृभिः अभिमन्यते; वस्तुतस्तु एकैव असौ चितिशक्तिः । यथोक्तम् 'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥' इति । तथा 'मायाशक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा । कथिता ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥' इति । एवम् एषा सर्वदशासु एकैव चितिशक्तिः विजृम्भमाणा यदि तदनुप्रवेश- तदवष्टम्भयुक्त्या समासाद्यते, तत् तदावेशात् पूर्वोक्तयुक्त्या करणोन्मीलननिमीलनक्रमेण सर्वस्य सर्वमयत्वात् तत्तत्संहारादौ अपि नहीं आ सकता है। केवल इस प्रकार से स्फुरण करती हुई भी वह अपनी मायाशक्ति द्वारा जो देह, नील इत्यादि भासित हो रहे हैं उनके प्रभाव से वैसे ही मान बैठने के कारण भिन्न-भिन्न स्वभाववाली प्रकाशित होती हुई मायाप्रमाताओं (जीवों) के द्वारा ज्ञान, संकल्प, निश्चय इत्यादि रूप में समझी जाती है। वस्तुतः यह चितिशक्ति एक ही है। जैसा कि कहा गया है—" "यह जो संविद् भिन्न-भिन्न पदार्थों के क्रम से रञ्जित है वह (वस्तुतः) क्रम रहित (कालरहित) अनन्त (देशरहित) चित् रूप श्रेष्ठ प्रमाता महेश्वर ही है।" (ई० प्र० ज्ञानाधिकरण, ७ आ० १)। वैसे ही (उसी भाव का निम्नलिखित श्लोक भी है) "प्रभु की मायाशक्ति के द्वारा, वही (चित् शक्ति ही) जिसके भिन्न-भिन्न ज्ञेय विषय हैं, ज्ञान, संकल्प, अध्यवसाय (निश्चय) इत्यादि नामों से कही जाती है।" इस प्रकार सभी दशाओं में वही एक ही चित् शक्ति है जो प्रकट होती हुई यदि अनुप्रवेश और स्थिरता की युक्ति से (जिसका वर्णन अठारहवें सूत्र में हो चुका है) उपलब्ध होती है, तब उसमें प्रवेश होने से पूर्व कथित युक्ति से, इन्द्रियों के उन्मीलन (खोलने) और निमीलन (बन्द करने) के क्रम से— सब कुछ सर्वमय होने के कारण-सब के संहार इत्यादि में भी—सदासृष्टि और
६८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
'सदा सर्वसर्गसंहारकारि' यत् 'सहजसंवित्तिदेवताचक्रम्'--अमायो- यान्तर्बहिष्करणमरीचिपुञ्जः, तत्र 'ईश्वरता'--साम्राज्यं परभैरवा- त्मता, तत्प्राप्तिः भवति परमयोगिनः । यथोक्तम् 'यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ । नियच्छन्भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥' इति । अत्र एकत्र इति 'एकत्रारोपयेत्सर्वम्... ...।' इति । चित्सामान्यस्पन्दभूः उन्मेषात्मा व्याख्यातव्या । तस्य इति अनेन 'पुर्यष्टकेन संरुद्ध... ...।' इति उपक्रान्तं पुर्यष्टकम् एव पराम्रष्टव्यम्; न तु यथा विवरणकृतः 'एकत्र सूक्ष्मे स्थूले शरीरे वा' इति व्याकृतवन्तः । स्तुतं च मया
संहार करनेवाला जो स्वाभाविक ज्ञानरूपी देवता का समूह है अर्थात् जो कुछ भी अमायीय आन्तर और बाह्य इन्द्रियों का प्रभापुञ्ज है उस सब पर परम योगी को ईश्वरता अर्थात् साम्राज्य या परभैरवात्मता प्राप्त हो जाती है । जैसा कि कहा गया है । "जब कोई एक ही स्थान में (अर्थात् पूर्णाहन्ता के स्पन्दतत्त्व में) समाविष्ट हो जाता है, तब उसके (अर्थात् पुर्यष्टक के और निमीलन और उन्मीलन समावेश से उसके द्वारा विश्व का भी) लय (संहार) और उद्भव (सर्ग) को वश में करता हुआ (वास्तविक) भोक्तृता को प्राप्त होता है और चक्र (इंद्रिय देवताओं के समूह) का अधिपति हो जाता है।" (स्प० का० ३, १६) । यहाँ पर 'एकत्र' निम्नलिखित कारिका में समझाया गया है । "एकत्र (एक ही स्थान में) सब कुछ स्थापित करना चाहिए" (स्प० का० ३, १२) । इसमें 'एकत्र' की व्याख्या करनी चाहिए "चित् का सामान्यस्पन्द उन्मेष- स्वरूप" । 'तस्य' अर्थात् 'उसके' से 'पुर्यष्टक' ही समझना चाहिए क्योंकि इसके पूर्व में कहा गया है "पुर्यष्टकेन संरुद्ध" (स्प० का० ३, १७) (अर्थात् पुर्यष्टक से आबद्ध) । इसको वैसा नहीं समझना चाहिए जैसा कि विवरण- कार१८६ ने व्याख्या की है "एकत्र अर्थात् सूक्ष्म या स्थूल शरीर में।" जैसा कि मैंने एक स्तुति में कहा है :-