रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
१९६ | रसरत्नसमुच्चये—
के लिये आरोग्य और सुख प्रद है और शरीर के या प्रकृति के लिये सात्म्य होता है ॥ २०७-२०८ ॥
अथ कांस्यशोधनम्—
तप्तं कांस्यं गवां मूत्रे वापितं परिशुध्यति ॥ २०९ ॥
कांसे को अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र में सातवार बुझानेसे वह शुद्ध होजाता है॥२०९॥
अथ कांस्यमारणम्—
म्रियते गन्धतालाभ्यां निरुत्थं पञ्चभिः पुटैः ॥ २१० ॥
कांस्य के पत्रोंपर निम्बूरस से घोटे हुए गन्धक और मनःशिला का लेपकर पांच पुट देने से उसको निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ २१० ॥
मतान्तरम्—
त्रिक्षारं पञ्चलवणं सप्तधाऽम्लेन भावयेत् ॥
कांस्याऽऽरकूटपत्राणि तेन कल्केन लेपयेत् ।
रुद्ध्वा गजपुटे पक्कं शुद्धभस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २११ ॥
इति कांस्याधिकारः ।
सजिखार, ज़वाखार, टङ्कण और पांचो नमक (सौवर्चल, सैन्धव, विड्, औद्भिद, सामुद्र) इनको किसी अम्लरस से सातवार भावित कर कांस्य तथा पीतल के पत्रों पर लेप करके सम्पुट में बन्द कर गज पुट में फूक देने से कांसे या पीतल की उत्तम भस्म हो जाती है॥ २११ ॥
अथ वर्तलोहम्—
वर्तलोहस्वरूपः—
कांस्यार्कर्रीतिलाहाऽहिजातं तद्वर्त्तलोहकम् ।
तदेव पञ्चलोहाख्यं लोहविद्भिरुदाहृतम् ॥ २१२ ॥
कांस्य, ताम्र, पित्तल, लोह, सीस इनको गला कर मिला देने से जो धातु बनती है उस को लोहके विशेषज्ञ वर्तलोह या लोहपञ्च या पञ्चलोह (भरत) कहते हैं॥२१२॥
अथ वर्तलोहगुणाः—
हिमाम्लं कटुकं रूक्षं कफपित्तविनाशनम् ।
रुच्यं त्वच्यं कृमिघ्नं च नेत्र्यं मलविशोधनम् ॥ २१३ ॥
तद्भाण्डे साधितं सर्वमन्नव्यञ्जनसूपकम् ।
पञ्चमोऽध्यायः । १९७
पञ्चमोऽध्यायः । १९७
अम्लेन वर्जितं चापि दीपनं पाचनं हितम् ॥ २१४ ॥
वर्तलोह ( भरत ) शीतवीर्य्य, अम्ल, कटु, रूक्ष, कफपित्त और कृमि को नष्ट करता है, त्वचा और नेत्र के विकारों में हितकर तथा रुचिकारक और मल-शोधक होता है तथा भरत के बने हुए पात्र में अम्ल पदार्थ के अतिरिक्त और अन्य सर्व प्रकार के अन्न, शाक, दाल इत्यादि बनाकर खाने से अग्नि अत्यन्त दीप्त होती है तथा पाचकशक्ति भी बढती है ॥ २१३-२१४ ॥
वर्तलोहशोधनम्— द्रुतमश्वजले क्षिप्तं वर्तलोहं विशुष्यति ॥ २१५ ॥
वर्तलोह को अग्नि पर पिघलाकर तुरन्त ही घोड़े के मूत्र में बुझाने से वह शुद्ध होजाता है ॥ २१५ ॥
वर्तलोहमारणम्— म्रियते गन्धतालाभ्यां पुटितं वर्तलोहकम् । तेषु तेष्विह योगेषु योजनीयं यथाविधि ॥ २१६ ॥ इति वर्तलोहाधिकारः ।
शुद्धवर्त लोह के छोटे २ पत्र या टुकड़े करके उन पर समानभाग गन्धक और शुद्ध हरताल को निम्बू के रस में घोटकर लेप कर देना चाहिए, पश्चात् सम्पुट में बन्द करके गजपुट में सात बार फूंक देना चाहिए, इस तरह बनी भस्म को यथाशास्त्र सर्वप्रयोगों में प्रयुक्त करनी चाहिए ॥ २१६ ॥
अथ रसोपरसलोहानां सूतसाधकत्वनिर्देशः— जातिमद्भिर्विशुद्धैश्च विधिना परिसाधितैः । रसोपरसलोहाद्यैः सूतः सिध्यति नान्यथा ॥ २१७ ॥
जो रस उपरस और लोह उत्तमजाति के हों तथा विधिपूर्वक शुद्ध और भस्म किये गये हों उन्हीं के संसर्ग से पारद सिद्ध होकर शरीर को अजर अमर बनाता है, इनके बिना पारद भी सिद्ध नहीं होता है ॥ २१७ ॥
रत्नादीनां सूतयोग्यत्वनिर्देशः— रत्नानि लोहानि वराटशुक्तिपाषाणजातं खुरशृङ्गशल्यम् । महारसाद्येषु कठोरदेहं भस्मीकृतं स्यात्खलु सूतयोग्यम् ॥२१८॥
सर्वप्रकार के रत्न, लोह (सप्त या अष्ट धातु) कौड़ी, शुक्ति, पाषाणजाति या
१९८ रसरत्नसमुच्चये—
'पाषाण से उत्पन्न होने वाले खनिज पदार्थ, खुर, सींग, शल्य (अस्थि) और महारसादियों में जो कठिन (दृढाङ्ग) पदार्थ वैक्रान्त, माक्षिक आदि हैं, उन्हें विधिपूर्वक शुद्ध करके भस्म के रूप में बनाने पर ही वे पारद के कार्य में उपयुक्त हो सकते हैं, अतः बुद्धिमान् को चाहिए कि यथाशास्त्र इनकी शुद्धि तथा भस्म करे' ॥ २१८ ॥
भूनागसत्त्वपातनम्—
वज्राणां द्रावणार्थाय सत्त्वं भूनागजं ब्रुवे ।
तदेव परमं तेजः सूतराजेन्द्रवज्रयोः ॥ २१९ ॥
धौतभूनागसम्भूतं मर्दयेद्भृङ्गजद्रवैः ।
निम्बूर्द्रवैश्च निर्गुण्ड्याः स्वरसैस्त्रिदिनं पृथक् ॥ २२० ॥
तद्द्रावणगणोपेतं सम्मर्द्य वटकीकृतम् ।
निरुध्य दृढमूषायां द्विण्डं प्रधमेद् दृढम् ॥ २२१ ॥
स्वतः शीतं समाहृत्य पट्टके विनिवेश्य तत् ।
रवकान् राजिकातुल्यानैशूनतिभरान्वितान् ॥ २२२ ॥
द्वादशांशार्कसंयुक्तानध्मित्वा रवकान्हरेत् ।
प्रक्षाल्य रवकानाशु समादाय प्रयत्नतः ॥ २२३ ॥
वज्रादिद्रावणं तेन प्रकुर्वीत यथेप्सितम् ।
खरसत्त्वमिदं प्रोक्तं रसायनमनुत्तमम् ।
द्वित्रिमूषासु चैकस्यां सत्त्वं भवति निश्चितम् ॥ २२४ ॥
भूनाग (केञ्चुआअर्थवर्म) का सत्त्व हीरकादि वज्रों के द्रावण करने में अत्यन्त उत्तम है तथा पारद और हीरक की शक्ति को बढाता है, इस लिये इस सत्त्व के पातन की विधि कहता हूं। जल से अच्छी प्रकार धोये हुए केञ्चुओं को सुखा कर उनका चूर्ण बना लेना चाहिए, फिर इस चूर्ण को भृङ्गराजरस (भांगरा), निम्बूरस और निर्गुण्डी स्वरस, से पृथक् २ तीन २ दिन तक मर्दनकरके द्रावक वर्ग के पदार्थ मिलाकर घोट लेना चाहिए। फिर टिकिया बनाकर एक मजबूत मूषा के अन्दर बन्द करके दो दण्ड (४८ मिनट) तक तेज अग्निद्वारा फूंकना चाहिए। स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से उनको निकाल कर किसो पट्ट (काष्ठपट्ट या वस्त्र) पर डाल कर या वस्त्र से छान करके राई के बराबर मोटे २ तथा वजनी सत्त्व
पञ्चमोऽध्यायः । १९९
कणों को एकत्र करके उनमें १२ वां भाग शुद्ध ताम्र का चूर्ण मिला कर मूषायन्त्र में बन्द करके फूंक दे', फिर उन सत्त्वकणों को निकाल के जल से धोकर रख लेना चाहिए । इन से वज्रादि का द्रावण करना चाहिए। यह सत्त्व अत्यन्त उत्तम रसायन है तथा इसे खर सत्त्व कहते हैं, इस सत्त्व को सम्पूर्ण निकालने के लिये दो या तीन मूषा लेकर विधिपूर्वक कार्य करना चाहिए। कभी २ एक ही मूषा के द्वारा सम्पूर्ण सत्त्व निकल जाता है ॥ २१९-२२४ ॥
मतान्तरम्—
भुजङ्गमानुपादाय चतुष्प्रस्थसमन्वितान् ।
सुवर्णरूप्यताम्रायस्कान्तसम्भूतिभूमिजान् ॥ २२५ ॥
प्रक्षाल्य रजनीतोयैः शीतलैश्च जलैरपि ।
उपोषितं मयूरं वा शूरं वा चरणायुधम् ॥ २२६ ॥
क्रमेण चारयित्वाथ तद्विष्ठां समुपाहरेत् ।
क्षाराम्लैः सह सम्पेष्य विशोष्य च खरातपे ॥ २२७ ॥
ततः खर्परके क्षिप्त्वा भर्जयित्वा मषीं चरेत् ।
मषीं द्रावणवर्गेण संयुक्तां सम्प्रमर्दिताम् ॥ २२८ ॥
निरुध्य कोष्ठिकामध्ये प्रधमेद्घटिकाद्वयम् ।
शीतलीभूतमूषायाः खोटमाहृत्य पेषयेत् ॥ २२९ ॥
प्रक्षाल्य रवकान् सूक्ष्मान् समादाय प्रयत्नतः ।
सुवर्णमानवद् ध्मात्वा रवं कृत्वा नियोजयेत् ॥ २३० ॥
सुवर्ण, रजत, ताम्र, कान्तलौह इत्यादि धातुएं जिन खानों से निकलती हैं उन खानों की मिट्टी में उत्पन्न होने वाले केंचुए ४ प्रस्थ ( २५६ या ३ सेर १६ तो० ) लेकर उन को हरिद्रा के स्वरस या क्वाथ से प्रथम अच्छी तरह धोकर दूसरी बार शीतल जल से धो कर साफ कर लेना चाहिए । फिर उन्हें एक भूखे मयूर या जवान कुक्कुट ( मुर्गा ) को खिला देवें । पश्चात् उस मयूर या मुर्गे की विष्ठा ( केंचुएं के खाने से निकली हुई ) को लेकर खल्व में क्षार और अम्ल वर्ग के पदार्थों के साथ घोटकर तेज धूप में सुखा ले', सूखने पर एक मिट्टी के खर्पर में उसे भुंजकर मषी अथवा कज्जली अथवा राख बनालेवे', फिर इस राख को द्रावकवर्ग की औषधियों के साथ घोटकर मूषायन्त्र में बन्दकर दो घड़ी तक
२०० | रसरत्नसमुच्चये—
अग्नि में फूके, स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से भूनाग सत्त्व को निकालकर खल्व में पीस करके धोकर छोटे २ सत्त्व के कणों को यत्नपूर्वक निकाल ले', पश्चात् उन्हें मूषायन्त्र में बन्दकर स्वर्णद्रावण की विधि के अनुसार गला कर निकाल ले', फिर -चूर्ण कर प्रयोग करना चाहिए ॥ २२५–२३० ॥
अथ भूनागमुद्रिका—
भूनागोद्भवसत्त्वमुत्तममिदं श्रीसोमदेवोदितं
दत्तं पादमितं द्विशाणकनकेनैकं गतेनोर्मिकाम् ।
तद्धौताम्बुविलेपितं स्थिरचराद्भूतं विषं नेत्ररूक्
शूलं मूलगदं च कर्णजरुजो हन्यात्प्रसूतिग्रहम् ॥ २३१ ॥
इति भूनागाधिकारः ।
श्रीसोमदेव के द्वारा कथित उत्तम भूनागसत्त्व चतुर्थांश ( २ मासा ) लेकर दो शाण ( ८ मासा ) स्वर्ण के साथ गलाकर दोनों को मिला कर एक अंगूठी बनवा लेनी चाहिए, फिर उस अंगूठी को पानी में डाल कर निकाल लें, वह अंगूठी का पानी स्थावर और जंगमविषवाधा, नेत्ररोग, शूल, अर्श, कर्णरोग और प्रसूति-रोग को स्पर्शमात्र से नष्ट कर देता है ॥ २३१ ॥
अथ तैलपातनविधिः ।
मूलान्युत्तरवारुण्या जर्जरीकृत्य काञ्जिके ।
क्षिपेदङ्कोल्लबीजानां पेषिकां जर्जरीकृताम् ॥
तत्तैलं घृतवत्स्त्यानं ग्राह्यं तत्तु यथाविधि ॥ २३२ ॥
तैल भी बीजों का सत्त्व होता है इस लिये सत्त्व पातन के प्रकरण में उनके निकालने की विधि लिखते हैं । इन्द्रवारुणी की जड़ को काञ्जी में पीसकर उसमें अंकोल के बीजों को पीस कर मिला देना चाहिए, फिर एक वस्त्र की बनी हुई पोटली में इनको रखकर तेज धूप में किसी लकड़ी के सहारे लटका देना चाहिए । जब पोटली से तैल नीचे रखे बर्तन में चूकर घी के समान ( गाढ़ा ) घनीभूत हो जाय तब किसी पात्र (शीशी) में ले लेना चाहिए ॥ २३२ ॥
मतान्तरम्—
सम्पेष्योत्तरवारुण्याः पेटकार्या दलान्यथ ।
काञ्जिकेन ततस्तेन कल्केन परिमर्दयेत् ॥ २३३ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । | २०१
रजश्चाङ्कोलबीजानां तद्बद्ध्वा विरलाम्बरे ।
तद्विलम्ब्याऽऽतपे तीव्रे तस्याधश्चषकं न्यसेत् ॥
तस्मिन्निपतितं तैलमादेयं श्वित्रनाशनम् ॥ २३४ ॥
अथवा इन्द्रायण के पत्ते तथा ज्योतिष्मती ( मालकंगुनी ) के पत्तों को काञ्जी में बारीक पीस कर कल्क बना लें, फिर इस कल्क के साथ अङ्कोल के बीजों के चूर्ण को पीस कर एक पतले वस्त्र में रख कर पोटली बनालें, फिर इस पोटली को तेज धूप में लटका करके नीचे एक काच का प्याला रख दें, फिर धूप के कारण पोटली से तैल चूकर प्याले में इकट्ठा हो जाता है, इस तैल को श्वेत कुष्ठ पर लगाने से वह अच्छा हो जाता है ॥ २३३-२३४ ॥
मतान्तरम्—
अङ्कोलबीजसम्भूतं चूर्णं सम्मर्द्य काञ्जिकैः ।
एकरात्रोषितं तत्तु पिण्डीकृत्य ततः परम् ॥ २३५ ॥
स्वेदयेत्कन्दुके यन्त्रे घटिकाद्वितयं ततः ।
तां च पिण्डीं दृढे वस्त्रे बद्ध्वा निष्पीड्य काष्ठतः ॥ २३६ ॥
अधः पात्रस्थितं तैलं समाहृत्य नियोजयेत् ।
एवं कन्दुकयन्त्रेण सर्वतैलान्युपाहरेत् ॥ २३७ ॥
अथवा अङ्कोल बीज के चूर्ण को काञ्जी से घोटकर रात्रिपर्यन्त रख दें, फिर उस चूर्ण का गोला बना कर के एक हण्डिका में पानी भर कर गले पर एक वस्त्र बांध देना चाहिए । उस वस्त्र के मध्य भाग में गोला रख कर ऊपर से एक सकोरे से ढक कर के बन्द कर देना चाहिए, पश्चात् उस यन्त्र (कन्दुकेनामक) को अग्नि पर चढाकर दो घड़ी तक स्वेदन करना चाहिए। बाद में उस स्वेदित गोले को मजबूत वस्त्र के अन्दर बांधकर दो काष्ठों के बीच दबाकर नीचे के पात्र में निकले हुए तैल को निकाल कर यथामति सर्वत्र प्रयोग करें, इसी प्रकार बनाये हुए कन्दुक नाम के यन्त्र से सर्व प्रकार के तैलों को निकालना चाहिए ॥ २३५-२३७ ॥
मतान्तरम्—
अङ्कोलस्यापि तैलं स्यात्काकतुण्ड्या समूलया ॥ २३८ ॥
अथवा जड़ के सहित श्वेत गुञ्जा को पीस कर उसके रस से अङ्कोल के बीजों
२०२ रसरत्नसमुच्चये—
को घोट कर कन्दुकनामक (१) यन्त्र से तैल निकालते हैं ॥ २३८ ॥
तैलपातनम्—
वाकुचीदेवदाल्याश्च कर्कोटीमूलतो भवेत् ॥ २३९ ॥
कर्कोटी (बांझककोड़ा) के जड़ के रस से वाकुची और वन्दाल के बीजों को पीस कर उपर्युक्तविधि से तैल निकालते हैं ॥ २३९ ॥
अथ विषमुष्टितैलपातनम्—
अपामार्गकषायेण तैलं स्याद्विषमुष्टिजम् ॥ २४० ॥
अपामार्ग के खरस से कुचले को घोट कर उपर्युक्तविधि से तैल निकालते हैं॥ २४०॥
अथ जैपालतैलपातनम्—
मूलक्वाथैः कुमार्याश्च तैलं जेपालजं हरेत् ॥ २४१ ॥
घृतकुमारी की जड़ के रस से जैपाल (जमालगोटा) बीज को पीसकर तैल निकालना चाहिए ॥ २४१ ॥
वाकुचीतैलाहरणविधिः—
क्वाथैरक्तापामार्गस्य बाकुचीतैलमाहरेत् ॥ २४२ ॥
लाल अपामार्ग (लालदण्डी घोंघा) के क्वाथ से बाकुची बीजों को घोट कर तैल निकालना चाहिए ॥ २४२ ॥
अथ कृष्णमिश्रश्वेतगुञ्जाबीजतैलपातनविधिः—
कृष्णायाः काकतुण्ड्याश्च बीजचूर्णानि कारयेत् । कान्तपाषाणचूर्णं च एकीकृत्य निरोधयेत् । धान्यराशिगतं पश्चादुद्धृत्य तैलमाहरेत् ॥ २४३ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये लोहशोध- नमारणादिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
पिप्पली, श्वेतगुञ्जा और कान्तपाषाण का चूर्ण, इन सब को बराबर २ लेकर जल से पीस लें। फिर इस कल्क को किसी पात्र में बन्दकर धान के ढेर में एक
( १ ) साम्बुस्थालीमुखे बद्धे वस्त्रे स्वेद्यं निधाय च ।
पिधाय पच्यते यत्र तद् यन्त्रं कन्दुकं स्मृतम् ॥
षष्ठोऽध्यायः । | २०३
पक्ष तक गाड़ देना चाहिए । फिर इस कल्क को दो काष्ठ के पट्टों के बीच में दबाकर तैल निकालना चाहिए ॥ २४३ ॥
इति श्रीकृष्णान्त्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायां
लोहशोधनमारणादिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः।
अथ षष्ठोऽध्यायः।
शिष्योपनयननिरूपणम्—
अथ क्रमयुक्तशास्त्रम्—
रसशास्त्राणि सर्वाणि समालोच्य यथाक्रमम् ।
साधकानां हितार्थाय प्रकटीक्रियतेऽधुना ॥ १ ॥
यथाक्रम से सब रस के शास्त्रों का उत्तम प्रकार से अवलोकन कर रस शास्त्र को जानने की इच्छा वाले साधकों के हित के लिये रसशास्त्र का वर्णन किया जाता है॥१॥
शास्त्रक्रमयोः परस्परापेक्षा—
न क्रमेण विना शास्त्रं न शास्त्रेण विना क्रमः ।
शास्त्रं क्रमयुतं ज्ञात्वा यः करोति स सिद्धिभाक् ॥ २ ॥
जिस शास्त्र में पौर्वापर्य्यरूप क्रम नहीं रहता है वह शास्त्र उत्तम शास्त्र नहीं है और शास्त्रप्रमाण से शून्य क्रम भी उत्तम क्रम नहीं है, इस कारण जो साधक क्रमानुसार शास्त्र को जान कर रसादिकर्म करने में प्रवृत्त होता है वही सिद्धि को प्राप्त करता है ॥ २ ॥
रसविद्यागुरुः—
आचार्यो ज्ञानवान्दक्षो रसशास्त्रविशारदः ।
मन्त्रसिद्धो महावीरो निश्चलः शिववत्सलः ॥ ३ ॥
देवीभक्तः सदा धीरो देवतायागतत्परः ।
सर्वाम्नायविशेषज्ञः कुशलो रसकर्मणि ।
२०४ रसरत्नसमुच्चये—
एवं लक्षणसंयुक्तो रसविद्यागुरुर्भवेत् ॥ ४ ॥
रसशास्त्र का उपदेशक आचार्य शास्त्र का पूर्णज्ञाता, रसनिर्माणक्रिया में चतुर, रसशास्त्र का पूर्ण विद्वान, मन्त्र की सिद्धि से युक्त, शूरवीर, गम्भीर चित्त वाला तथा शिव का भक्त, देवी का भक्त, सदा धैर्यता से काम करने वाला, देवता प्रसाधक, यज्ञ कर्म में संलग्न, प्रायः सर्व वेद दर्शनादि शास्त्रों का विशेषज्ञ, पारद तथा सर्व रस कर्म में निपुण, इतने लक्षणों से यदि सम्पन्न हो तो वह रसशास्त्र का आचार्य हो सकता है ॥ ३-४ ॥
अथ शिष्यगुणाः—
गुरुभक्ताः सदाचाराः सत्यवन्तो दृढव्रताः ।
निरालस्याः स्वधर्मज्ञाः सदाऽऽज्ञापरिपालकाः ॥ ५ ॥
दम्भमात्सर्यनिर्मुक्ताः कुलाऽऽचारेषु दीक्षिताः ।
अत्यन्तसाधकाः शान्ता मन्त्राऽऽराधनतत्पराः ॥
इत्येवं लक्षणैर्युक्ताः शिष्याः स्युः सूतसिद्धये ॥ ६ ॥
गुरु के भक्त, सदाचारसम्पन्न, सत्यवादी, अपने नियत (व्रत) में दृढ, आलस्य से रहित, स्वधर्म के जानने वाले, सर्वदा आप्त जनों की आज्ञा का पालन करने वाले और पाखण्ड तथा मात्सर्य से रहित, अपने कुलपरम्परा से प्राप्त आचार को मानने वाले, शान्तस्वभाव, रसादिविद्याग्रहण करने में अत्यन्त उत्साही और मन्त्रों के सिद्ध करने में प्रयत्नशील, इन लक्षणों से युक्त शिष्य सूत को सर्वसिद्धिप्रद बनाने में समर्थ हो सकते हैं तथा वे ही रसविद्या जानने के अधिकारी हैं ॥ ५-६ ॥
अथानुचरगुणाः—
सहायाः सोद्यमास्तत्र तथा शिष्यास्ततोऽधिकाः ।
कुलीनाः स्वामिभक्ताश्च कर्तव्या रसकर्मणि ॥ ७ ॥
जो सेवक उद्योगशील, शिष्य से भी अधिक गुण सम्पन्न तथा उत्तमकुल में उत्पन्न और स्वामीभक्त हों उन्हें रसकर्म में नियुक्त करना चाहिए ॥ ७ ॥
अथायोग्यशिष्याः—
नास्तिका ये दुराचाराश्चुम्बका गुरुतोऽपरात् ।
विद्यां ग्रहीतुमिच्छन्ति चौर्यच्छृङ्खलोत्सवात् ॥ ८ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
२०५
न तेषां सिध्यते किञ्चिन्मणिमन्त्रौषधादिकम् ।
कुर्वन्ति यदि मोहेन नाशयन्ति स्वकं धनम् ॥
इह लोके सुखं नास्ति परलोके तथैव च ॥ ९ ॥
तस्माद्भक्तिबलादेव सन्तुष्यति यदा गुरुः ।
तदा शिष्येण सा ग्राह्या रसविद्याऽऽत्मसिद्धये ।
हस्तमस्तकयोगेन वरं लब्ध्वा सुसाधयेत् ॥ १० ॥
जो शिष्य नास्तिक अर्थात् गुरु, शास्त्र, देव, धर्म, स्वर्गादि और पाप तथा पुण्य में विश्वास नहीं करते हों, दुष्ट आचार विचार वाले, गुरु को छोड़ कर अन्य से या गुरुही से चोरी, कपट और दुष्टता को छिपाकर विद्या की प्राप्ति के इच्छुक हों उनको मणि मन्त्र और औषध में से कुछ भी यथार्थ रूप से प्राप्त नहीं होता है और यदि वे मोह के वश से रसविद्या की सिद्धि में प्रवृत्त होते हैं तो स्वकीय धन का नाश कर इस लोक और परलोक में सुख से वञ्चित ही रहते हैं । इसलिये जब गुरु भक्तिभाव से प्रसन्न हो जायं तब उनसे आत्मसिद्धि के लिये रसविद्या ग्रहण करनी चाहिए। फिर गुरु को बद्धाञ्जलि होकर शिर से प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त कर रसकर्म का साधन करना चाहिए ॥ ८–१० ॥
अथ रससाधनरसशालारसमण्डपाः—
आतङ्करहिते देशे धर्मराज्ये मनोरमे ।
उमामहेश्वरोपेते समृद्धे नगरे शुभे ॥ ११ ॥
कर्त्तव्यं साधनं तत्र रसराजस्य धीमता ।
अत्यन्तोपवने रम्ये चतुर्द्वारोपशोभिते ॥ १२ ॥
तत्र शाला प्रकर्त्तव्या सुविस्तीर्णा मनोरमा ।
सम्यग्वातायनोपेता दिव्यचित्रैर्विचित्रिता ॥ १३ ॥
तत्समीपे समे दीप्ते कर्त्तव्यं रसमण्डपम् ।
अतिगुप्तं सुविस्तीर्णं कपाटार्गलशोभितम् ॥ १४ ॥
ध्वजछत्रवितानाढ्यं पुष्पमालाविलम्बितम् ।
भेरीकाहलघण्टादिशृङ्गीनादविनादितम् ॥ १५ ॥
भूः समा तत्र कर्त्तव्या सुदृढा दर्पणोपमा ।
तन्मध्ये वेदिका रम्या कर्त्तव्या लक्षणान्विता ॥ १६ ॥
२०६ रसरत्नसमुच्चये—
जो नगर रोग से रहित, धर्म पूर्वक राज्य से युक्त, मनोहर, शिव तथा पार्वती के निवास से पवित्र, देश के समृद्ध तथा शुभ हो ऐसे शहर में रस का साधन करना चाहिए और जहां पर अत्यन्त रमणीक तथा चार द्वार वाला उपवन बनवाकर उसमें अत्यन्त विस्तृत ( लम्बी, चौड़ी ) मनोहर तथा सुन्दर २ खिड़कियों और झरोखों से युक्त और जिस मेंअनेक धन्वन्तरि, सिद्धिरसायन, शास्त्र के प्रवर्तक आचार्य, देवता, तथा यन्त्रादिक उपकरणों के चित्र लगे हों ऐसी रसशाला बनवानी चाहिये। उसी रसशाला के समीप प्रकाशवाली समान भूमि में एक रसमण्डप बनाना चाहिए जो कि अत्यन्त शुभ, खूब लम्बा चौड़ा, सुन्दर किंवाड़ और अर्गला से युक्त हो और पताकाएं, छत्र, वितान ( चन्दोवा ) जिसमें लगे हों और चारों तरफ सुगन्धित पुष्पों की मालाओं के टांकने से सुशोभित तथा भेरी मृदङ्ग, शंख, घड़ियाल घण्टा आदि वाद्यों से शब्दायमान होना चाहिए। उसी मण्डप की भूमि समान, दृढ और दर्पण के समान चमकदार होनी चाहिए, और उसके बीचों बीच शास्त्रानुसार शुभ लक्षणों वाली अत्यन्त सुन्दर वेदिका का निर्माण कराना चाहिए॥११-१६॥
रसलिङ्गस्थापनादि—
निष्कत्रयं हेमपत्रं रसेन्द्रं नवनिष्ककम् ।
अम्लेन मर्दयेद्यामं तेन लिङ्गन्तु कारयेत् ॥ १७ ॥
दोलायन्त्रे सारनाले जम्बीरस्थं दिनं पचेत् ।
तल्लिङ्गं पूजयेत्तत्र सुशुभैरुपचारकैः ॥ १८ ॥
तीन निष्क ( १२ मासा ) शुद्ध स्वर्ण के पत्र और नौ निष्क ( ८ मा० ) पारद लेकर दोनों को निम्बू के रस से एक प्रहर तक घोट कर इनका शिवलिंग बनवा लेना चाहिये, फिर उस लिङ्ग को बड़े निम्बू के बीच में रख कर काञ्जी में दोलायन्त्र के द्वारा एक दिन तक पकाना चाहिये, पश्चात् उसका वेदिका के मध्य में स्थापन करा कर सुन्दर उपचारों से यथाशास्त्र पूजन करना चाहिये॥१७-१८॥
रसलिङ्गपूजनफलम्—
लिङ्गकोटिसहस्रस्य यत्फलं सम्यगर्च॑नात् ।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिङ्गार्चनाद्भवेत् ॥ १९ ॥
ब्रह्महत्यासहस्राणि गोहत्याश्चायुतानि हि ।
तत्क्षणाद्विलयं यान्ति रसलिङ्गस्य दर्शनात् ॥ २० ॥
षष्ठोऽध्यायः । २०७
षष्ठोऽध्यायः । २०७
स्पर्शानात्प्राप्यते मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम् ।
आग्नेय्यां श्रीअघोरेण मन्त्रराजेन चार्चयेत् ॥ २१ ॥
एक सहस्रकरोड़ शिवलिङ्गों की यथाविधि पूजन करने से जो फल होता है उससे भी करोड़ों गुना अधिक फल रसलिङ्ग की पूजन करने से प्राप्त होता है । हजारों ब्रह्महत्याओं से तथा लाखों गोहत्याओं से जो पाप उत्पन्न होता है वह केवल रसलिङ्ग के दर्शन कर लेने से क्षण भर में नष्ट हो जाता है । श्रीशिवजी ने कहा है कि इस लिङ्ग के स्पर्श करने से मुक्ति प्राप्त होती है, यह सत्य है । अग्निकोण में रसलिङ्ग की स्थापना करके सब मन्त्रों में प्रधान जो अघोरमन्त्र(१) है उससे उसकी पूजन करनी चाहिए ॥ १९-२१ ॥
ध्यानम्—
अष्टादशभुजं शुभ्रं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ।
प्रेतारूढं नीलकण्ठं रसलिङ्गं विचिन्तयेत् ॥ २२ ॥
तस्योत्सङ्गे महादेवीमेकवक्त्रां चतुर्भुजाम् ।
अक्षमालाङ्कुशं दत्ते वामे पाशाभयं शुभम् ॥
दधतीं तप्तहेमाभां पीतवस्त्रां विभावयेत् ॥ २३ ॥
रसलिङ्ग का ध्यान—जिनके १८ भुजाएं हैं और जिनका गौरवर्ण हैं तथा जिनके ५ मुख और तीन नेत्र हैं और प्रेत (मृतक) के ऊपर आरूढ़, नीलकण्ठ-वाले ऐसे महादेव जी का रसलिङ्ग में अपना ध्यान बैठाना चाहिए, अर्थात् यह रसलिङ्ग एक तरह से शिवस्वरूप ही है और शिवस्वरूप उस रसलिङ्ग की प्रतिमा की गोद में अद्वितीयमुखवाली तथा चार भुजाओं से शोभायमान, दक्षिणहस्त में रुद्राक्षमाला और अङ्कुश और वामहस्त में शुभ पाश धारण की हुई और एक हस्त से भक्तजनों को शुभ अभयप्रदान करती हुई, सन्तप्त सुवर्ण की कान्ति के समान दैदीप्यमान एवं पीतवस्त्र धारण की हुई महादेवी श्री पार्वती का ध्यान करना चाहिए ॥ २२-२३ ॥
देवीपूजनमन्त्रम् ।
"वाङ्मयी श्रीः कामराजशक्तिबीजं रसाङ्कुशा-
( १ ) अघोरमन्त्रः-अघोरेभ्योऽथघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च ।
सर्व्वतः सर्व्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ॥
२०८ रसरत्नसमुच्चये—
य नमो" द्वादशार्णेषा ज्ञेया विद्या रसाङ्कुशा ॥ २४ ॥
अनया पूजयेद्देवीं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ।
नन्दीभृङ्गीमहाकालकुलीरान्पूर्वदिक्क्रमात् ॥ २५ ॥
पूजयेन्नाममन्त्रैश्च प्रणवादिनमोन्तकैः ।
एवं नित्यार्चनं तत्र कर्तव्यं रससिद्धये ॥ २६ ॥
"ॐ वाग्वायीश्रीः" इत्यादि २४ वें श्लोक में कहे मन्त्र का उच्चारण करते हुए गन्ध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य, दीप आदि से श्री पार्वती देवी की पूजन करे पश्चात् यथाक्रम से रसलिङ्ग के पूर्व दिशा में नन्दी, पश्चिम में भृङ्गी, उत्तर में महाकाल और दक्षिण में कुलीर गण की स्थापना करके इनके नाम के आदि में ॐकार तथा अन्त में नमः-शब्द लगाकर (जैसे ॐ नन्दिने नमः) मन्त्र का उच्चारण करते हुए चारों की पूजन करनी चाहिए । इस तरह रससिद्धि की प्राप्ति के लिये उस रस मण्डप में सदा पूजन करनी चाहिए ॥ २४-२६ ॥
अथ कुम्भस्थापनादिशिष्यदीक्षादानविधिः—
रसविद्या शिवेनोक्ता दातव्या साधकाय वै ।
यथोक्तेन विधानेन गुरुणा मुदितात्मना ॥ २७ ॥
सुमुहूर्ते सुनक्षत्रे चन्द्रताराबलान्विते ।
कलशं तोयसम्पूर्णं हेमरत्नफलैर्युतम् ॥ २८ ॥
स्थापयेद्रसलिङ्गाग्रे दिव्यवस्त्रेण वेष्टितम् ।
गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपनैवेद्यश्च सुपूजयेत् ॥ २९ ॥
पूजान्ते हवनं कुर्याद्योनिकुण्डे सुलक्षणे ।
तिलाज्यैः पायसैः पुष्पैः शतपुष्पादिकैः पृथक् ॥ ३० ॥
अघोरेण रसाङ्कुश्या होमान्ते शिष्यमाह्वयेत् ।
कालिनीशक्तिसंयुक्तं रससिद्धिपरायणम् ॥ ३१ ॥
यह रसविद्या श्रीशिवजी ने कही है । इस विद्या को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले साधक को प्रसन्नचित्त गुरु द्वारा शास्त्रोक्तविधि के अनुसार शुभ मुहूर्त, शुभ नक्षत्र तथा शुभचन्द्रबल और शुभताराबल के समय में पूजन हवनादि करके प्रदान करनी चाहिए ।
**पूजनविधि—**उपर्युक्त शुभ दिन में जल से भरा हुआ और सुवर्ण,
षष्ठोऽध्यायः। २०९
रत्न, फल पुष्पों से युक्त दिव्यवस्त्र से वेष्टित (ढका हुआ) एक कलश रसलिङ्ग के सामने स्थापित करके उसको गन्ध, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से अच्छी प्रकार जन करनी चाहिए। फिर पूजन के पश्चात् योनि के समान आकार वाले उत्तम कुण्ड में तिल, घृत, क्षीरान्न, पुष्प, क्षौफ इत्यादि पृथक् २ पदार्थों के द्वारा अघोर रसाङ्कुशीमन्त्र का उच्चारण करते हुए अथवा श्रो अघोरमन्त्र से रसा-ङ्कुशी देवी के निमित्त हवन करना चाहिए। होम हो जाने के पश्चात् वक्ष्यमाण-लक्षणों से युक्त कालिनीशक्ति से युक्त और रस की सिद्धि करने में परायण शिष्य को समीप बुलाना चाहिए ॥ २७-३१ ॥
अथ कालिनीलक्षणम्— यस्यास्तु कुञ्चिताः केशाः श्यामा या पद्मलोचना । सुरूपा तरुणी भिन्ना विस्तीर्णजघना शुभा ॥ ३२ ॥ सङ्कीर्णहृदया पीनस्तनभारेण नम्निता । चुम्बनालिङ्गनस्पर्शकोमला मृदुभाषिणी ॥ ३३ ॥ अश्वत्थपत्रसदृशयोनिश्रदेशसुशोभिता । कृष्णपक्षे पुष्पवती सा नारी कालिनी स्मृता ॥ रसबन्धे प्रयोगे च उत्तमा सा रसायने ॥ ३४ ॥
जिस स्त्री के घुंघरीले बाल हों और जो श्याम अङ्ग की या सोलह वर्ष की हो तथा कमल के समान विशाल और मनोहर नेत्रों से शोभायमान, सुन्दर लावण्ययुक्त, युवती (यौवनमदोन्मत्त) और प्रस्फुटित योनिरवाली और विस्तीर्ण जंघाओं वाली, शुभलक्षणों से युक्त, संकीर्ण (प्रसन्न) हृदय वाली और जो बड़े २ स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई हो तथा चुम्बन, आलिङ्गन और स्पर्श में कोमल प्रतीत होने वाली, मधुर आलाप (भाषण) शील तथा जिस का योनि-प्रदेश पीपल के पत्ते की रचना के समान सुशोभित हो और जो कृष्णपक्ष में रजस्वला होती हो वह स्त्री कालिनी कहलाती है। कालिनी स्त्री रस के बन्धन करने में, प्रयोग में और रसायन में उत्तम होती है ॥ ३२-३४ ॥
अथ कालिन्यभावे तदनुकल्पविधिः— तदभावे सुरूपा तु या काचित्तरुणाङ्गना । तस्या देयं त्रिसप्ताहं गन्धकं घृतसंयुक्तम् ।
रस० १४
२१० रसरत्नसमुच्चये-
कर्षैकैकं प्रभाते तु सा भवेत्कालिनीसमा ॥ ३५ ॥
एवं शक्तियुतो योऽसौ दीक्षयेत्तं गुरुत्तमः ।
सुस्नातमभिषिञ्चेत् मन्त्रेण कलशोदकैः ॥ ३६ ॥
अघोरामङ्कुशीं विद्यां दद्याच्छिष्याय सद्गुरुः ।
यथाशक्त्या सुशिष्येण दातव्या गुरुदक्षिणा ॥ ३७ ॥
अथाज्ञया गुरोर्मन्त्रं लक्षं लक्षं पृथग्जपेत् ।
“ॐ ह्रां ह्रीं हम् अघोरतरप्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं हैं हौं हम् अघोराय फट्” इममघोरमन्त्रन्तु
“ओम् कामराजशक्तिवीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्यां रसाङ्कुशाम्” ॥
अनया पूजयेद्देवीं शक्तिमङ्कुशविद्यया ॥ ३८ ॥
यदि उपर्युक्त लक्षणों वाली कालिनी स्त्री न मिल सके तो सुन्दररूपवाली किसी भी तरुण स्त्री को २१ दिन तक एक २ कर्ष शुद्ध गन्धक घृत के साथ प्रातः सेवन कराने से वह स्त्री कालिनी के समान सर्व गुणों से युक्त हो जाती है जो शिष्य इस कालिनी स्त्री के साथ दीक्षाग्रहण करने के योग्य हो तो उत्तम गुरु उसको दीक्षित करे । प्रथम स्नान किये हुए शिष्य को गुरु कलश के जल से मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अभिषिक्त करे, फिर सद्गुरु शिष्य को अघोर और अङ्कुशी विद्या का उपदेश दे, और अपनी शक्ति के अनुसार दीक्षा के पश्चात् गुरू जी को दक्षिणा दे कर फिर गुरुजी की आज्ञा से दोनों मन्त्रों का पृथक २ एक लाख जप करना चाहिए। इस अंकुशी विद्या(१) के द्वारा शक्तिस्वरूप देवी का पूजन करे ॥ ३५-३८ ॥
तत्र होमविधिः—
दशांशं जुहुयात्कुण्डे त्रिकोणे हस्तमात्रके ।
जातिपुष्पं त्रिमध्वक्तं पूर्णान्ते कन्यकार्चनम् ॥ ३९ ॥
पूजन करने के पश्चात् एक हाथ चौड़ा त्रिकोण के आकार वाला एक हवन का
( १ ) मूलपाठ में मन्त्र का यह स्वरूप लिखा है । ॐ ह्रां ह्रीं हूम, अघोर तर प्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं ह्रौं हौं हूम, अघोराय फट् इममघोरमन्त्रन्तु ॐ कामराजशक्तिबीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्या रसाङ्कुशाम् ।
षष्ठोऽध्यायः। २११
षष्ठोऽध्यायः। २११
कुण्ड बनाकर उसमें शहद, घृत, खांड और चमेली के पुष्प इन्हें मिलाकर जप का दशांश (१० हजार) मन्त्र बोलते हुए हवन करके हवन के पश्चात् कन्याओं की पूजन करनी चाहिए ॥ ३९ ॥
अथ रससिद्धयर्थं संग्रहणीयपदार्थास्तत्पूजनादिकञ्च—
कृत्वाथ प्रविशेच्छालां शुद्धां लिप्तां संवेदिकाम् ।
षट्कोणं मण्डलं तत्र सिन्दूरेण द्विहस्तकम् ॥ ४० ॥
वेदिकायां लिखेत्सम्यक् तद्बहिश्चाष्टपत्रकम् ।
कमलं चतुरस्रं च चतुर्द्वारैः सुशोभितम् ॥ ४१ ॥
कर्णिकायां न्यसेत्खलं लोहजं स्वर्णलेखितम् ।
तन्मध्ये रसराजं तु पलानां शतमात्रकम् ॥
पञ्चाशत्पञ्चविंशद्वा पूजयेद्रसलिङ्गवत् ॥ ४२ ॥
इस तरह हवन का कार्य समाप्त कर पवित्र गोर्वर से लिप्त तथा बेदी जिस में बनी हो ऐसी शुद्ध शाला में प्रवेश करे । बाद में उस वेदी के ऊपर सिन्दूर से दो हाथ लम्बा और चौड़ा तथा छ कोनों वाला एक मण्डल बनाकर के उसके बाहर आठ दलों वाला एक कमल लिखना चाहिए और उसके चारों द्वारों पर एक चौकोर मण्डल बनाना चाहिए । कमल की कर्णिका के मध्य में एक लौह का खल्व रख कर उसमें स्वर्ण के द्वारा कुछ रेखाओं के चिन्ह बनाकर उस खल्व में १०० पल या ५० पल अथवा २५ पल पारद डाल कर रसलिंग के समान ही उस पारद की पूजन करनी चाहिए ॥ ४०-४२ ॥
तत्र रसशक्तयः—
वज्रवैक्रान्तवज्राभ्रकान्तपाषाणटङ्कणम् ।
भूनागः शक्तयश्चैताः षट्कोणे पूजयेत्क्रमात् ॥ ४३ ॥
हीरक, वैक्रान्त, वज्राभ्रक, कान्त पाषाण ( चुम्बक पत्थर ) सुहागा, भूनाग ( केञ्चुए ) ये शक्तियां हैं अर्थात् रस की शक्ति को ये ६ पदार्थ बढ़ाते हैं अत इन्हें रसशक्तियां कहते हैं । इनको षट्दल कमल में यथाक्रम रख ( स्थापन ) कर इन की पूजन करनी चाहिए ॥ ४३ ॥
तत्र उपरसाः—
गन्धतालककासीसशिलाकङ्कुष्ठभूषणम् ।
२१२ | रसरत्नसमुच्चये—
राजावर्तो गैरिकाश्चाख्याता उपरसा अमी ।
पूज्या अष्टदलेष्वेते पूर्वादीशामगङ्गरुमात् ॥ ४४ ॥
गन्धक, हरताल, कासीस, मैनशोल कङ्कुष्ठ, अञ्जन, राजावर्त तथा गैरिक ये आठ उपरस हैं । इनको अष्टदल कमल में क्रम से पूर्वदिशा से लेकर ईशान कोणतक स्थापन करके पूजन करनी चाहिए ॥ ४४ ॥
तत्र महारसाः—
रसकं विमला ताप्यं चपला तुत्थमञ्जनम् ।
हिङ्गुलं सस्यकं चैव ख्याता एते महारसाः ।
पूर्वादीशानपर्यन्तं पत्राग्रेषु प्रपूजयेत् ॥ ४५ ॥
खर्पर, विमल, सुवर्ण माक्षिक, चपल, तुत्थ, अञ्जन, हिङ्गुल, सस्यक ये आठ महारस हैं । इनको पूर्वदिशा से ईशान कोण तक अष्टदल मण्डल की पखड़ियों के अग्रभाग में स्थापन करके पूजन करनी चाहिए ॥ ४५ ॥
तत्र अष्टलोहपूजाक्रमः—
पूर्वद्वारे स्वर्णरौप्ये दक्षिणे ताम्रसीसके ।
पश्चिमे वङ्गकान्तौ च उत्तरे मुण्डतीक्ष्णके ।
सर्वमेतदघोरेण पूजयेदङ्कुशान्वितम् ॥ ४६ ॥
मण्डप की वेदी के चारप्रकार पहिले बताये हैं उन में से पूर्व के द्वारपर स्वर्ण और चांदी, दक्षिण के द्वार पर ताम्बा और सीसा, पश्चिम के द्वार पर वङ्ग और कौन्तलौह और उत्तर के द्वार पर मुण्ड तथा तीक्ष्णलौह की स्थापना करके उन की अंकुश विद्या के साथ अघोर मन्त्र को पढ़ते हुए पूजन करनी चाहिए ॥४६॥
तत्र उपकरणानां पूजाविधिः—
बिडं काञ्जिकयन्त्राणि क्षारमृल्लवणानि च ।
कोष्ठी मूषा वङ्कनालि तुषाङ्गारवनोपलाः ॥ ४७ ॥
भस्त्रिका दण्डिकानेका शिला खल्वान्युलूखलम् ।
स्वर्णकारोपकरणं समस्ततुलनानि च ॥ ४८ ॥
मृत्काष्ठताम्रलोहोत्थपात्राणि विविधानि च ।
दिव्यौषधीनां वर्गांश्च रञ्जकस्नेहनानि च ॥
एतानि द्वारबाह्ये तु मूलमन्त्रेण पूजयेत् ॥ ४९ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
षष्ठोऽध्यायः । २१३
वाङ्माया ह्रीं ततः क्षें च दमश्च पञ्चाक्षरो मनुः । अनेन मूलमन्त्रेण भैरवं तत्र पूजयेत् ॥ सर्वेषां रससिद्धानां नाम सङ्कीर्तयेत्तदा ॥ ५० ॥
विड् (रस के जारण के लिये क्षार पदार्थों से बनाया हुआ पदार्थ विशेष) काञ्जी, विविध यन्त्र, क्षार वर्गके आठों क्षार, पञ्चमृत्तिका, पाञ्चो लवण, कोष्ठियां, सब प्रकार की मूषा, वङ्क नाल, तुष, कोयले, जङ्गली कण्डे, धौंकनी, विविध प्रकार की औषधियां चलाने के दण्ड, कल्क पीसने की शिला, खरलें, ओखलियां, सुनार के विविध उपकरण, सब प्रकार की तुलाएं और सर्व प्रकार की मिट्टी, काष्ठ, ताम्बा और लौह के पात्र तथा आश्चर्यजनक गुण करने वाली दिव्य औषधियों के वर्ग (समूह) यथा जीवक, ऋषभक, ऋद्धि, वृद्धि, इत्यादि, तथा परदादि को रङ्गने वाले पदार्थ और स्नेह, इन को द्वार के बाहर स्थापन करके मूलमन्त्र के द्वारा पूजन करनी चाहिए । मूलमन्त्र का स्वरूप—वाङ्माया ह्रीं ततः क्षेञ्च क्ष्माश्च पञ्चाक्षरो मनुः । तथा इसी मन्त्र से भैरव का पूजन भी करें, पश्चात् सब रस के सिद्ध आचार्यो का भी वहां स्मरण करना चाहिए ॥ ४७–५० ॥
अथ रससिद्धेश्वरब्राह्मणादीनां पूजनम्—
व्यालाचार्यश्चंद्रसेनः सुबुद्धिर्नरवाहनः । नागार्जुनो रत्नघोषः सुरानन्दो यशोधनः ॥ ५१ ॥ इन्द्रधूमश्च माण्डव्यश्चर्पटी शूरसेनकः । आगमो नागबुद्धिश्च खण्डः कापालिको मतः ॥ ५२ ॥ कामारिस्तान्त्रिकः शम्भुर्लङ्कालम्पटशारदौ । बाणासुरो मुनिश्रेष्ठो गोविन्दः कपिलो बलिः ॥ ५३ ॥ एते सर्वे तु सूतेन्द्रा रससिद्धा महाबलाः । चरन्ति सर्वलोकेषु नित्या भोगपरायणाः ॥ ५४ ॥ सप्तविंशतिसङ्ख्याका रससिद्धिप्रदायकाः । वैद्याः पूज्याः प्रयत्नेन ततः कुर्याद्रसार्चनम् ॥ ५५ ॥ हर्षयन्द्विजदेवानां तर्पयेदिष्टदेवताः । कुमारीयोगिनीयोगीश्वरान्मेलकसाधकान् ॥ तर्पयेत्पूजयेद्भक्त्या यथाशक्त्यनुसारतः ॥ ५६ ॥
२१४ रसरत्नसमुच्चये—
इत्येवं सर्वसम्भारयुक्तं कुर्याद्रसोत्सवम् ।
सर्वविघ्नप्रशान्त्यर्थं सर्वैप्सितफलप्रदम् ॥ ५७ ॥
व्यालाचार्य, चन्द्रसेन, सुबुद्धि, नरवाहन, नागार्जुन रत्नघोष, सुरानन्द, यशोधन, इन्द्रधूम, माण्डव्य, चर्टी, शूरसेन, आगम, नागबुद्धि, खण्ड, कपालिक, कामारि, तान्त्रिक, शम्भु, लंक, लम्पक, शारद, बाणासुर, मुनिश्रेष्ठ, गोविन्द, कपिल और वलि ये २७ पारद के साधन में इन्द्रके समान श्रेष्ठ, रससिद्ध, और महान बल से सम्पन्न आचार्य हैं । ये भोगों में लिप्त हो कर सर्वदा सब लोकों में विचरण करते रहते हैं । ये २७ आचार्य रससिद्धि का प्रदान करते हैं तथा इनकी यथाविधि पूजन करके पारद की पूजन करनी चाहिए । ब्राह्मण और देवताओं को भोजन तथा पूजनादिक से प्रसन्न करके इष्ट देवी देवताओं का भी पूजन करे । फिर अपनी शक्ति के अनुसार छोटी २ कन्याएं, योगिनी, योगीश्वर तथा पारद का साधन करने वाले इत्यादि का भक्तिपूर्वक पूजन करके उन्हें प्रसन्न करें, इस प्रकार सर्व सामग्री से युक्त और सर्व प्रकार की मनोरथपूर्ति करने वाला, सर्वविघ्न शान्ति के लिये रसोत्सव करना चाहिए ॥ ५१-५७ ॥
अदीक्षितस्य रसविद्यासाधनवैफल्यनिर्देशः—
अन्यथा यो विमूढात्मा मन्त्रदीक्षाक्रमाद्विना ।
कर्तुमिच्छति सूतस्य साधनं गुरुवर्जितः ॥ ५८ ॥
नासौ सिद्धिमवाप्नोति यत्नकोटिशतैरपि ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शास्त्रोक्तां कारयेत्क्रियाम् ॥ ५९ ॥
जो मूर्ख मन्त्र और दीक्षा क्रम को छोड़ कर गुरु की सहायता के विना ही रस की सिद्धि करने की इच्छा करता है वह करोड़ों प्रयत्न करने पर भी सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता है, इस लिये शास्त्र के कथनानुसार यत्न पूर्वक प्रथम दीक्षा पूजादि क्रिया करनी चाहिए ॥ ५८-५९ ॥
अथ रससाधने सिद्धिलाभहेतुनिर्देशः—
सम्यक्साधनसोध्मा गुरुयुता राजाज्ञयाऽलङ्कृता
नानाकर्मपराङ्मुखा रसपराश्चाढ्या जनैश्चार्थिताः ।
मात्रायन्त्रसुपाककर्मकुशलाः सर्वौषधे कोविदाः
तेषां सिध्यति नान्यथा विधिबलाच्छ्रीपारदः पारदः ॥ ६० ॥
षष्ठोऽध्यायः । २९५
जो मनुष्य उद्योग शील, सब साधनों को प्राप्त किया हुआ तथा गुरु से शास्त्र पढा हो, जिसको राजा का आधार हो और दूसरे मनुष्यों से रस सिद्धि करने के लिये प्रार्थित हो तथा अन्य सांसारिक कार्यों में जो आसक्त न हो, धनी हो, औषधादियों की मात्रा, मन्त्र, पाकक्रिया और सब काष्ठादि औषधियों के पहचानने में जो कुशल हो, भाग्य से वही शोभा और देहसिद्धि करने वाले पारद को सिद्ध कर सकता है ॥ ६० ॥
अथ कस्मै किमर्थं रसविद्या दातव्या तन्निर्देशः— रसशास्त्रं प्रदातव्यं विप्राणां धर्महेतवे । राज्ञे वैश्याय वृद्ध्यर्थं दास्यार्थमितरस्य च ॥ ६१ ॥
रस शास्त्र ब्राह्मणों को चिकित्सा द्वारा परोपकारादि धर्म कार्य करने के लिये, राजा ( क्षत्रिय ) और वैश्य को उक्त शास्त्र की वृद्धि के लिये और अन्य श्रेष्ठ शूद्रादि मनुष्यों को तीनों वर्णों को सेवा करने के लिये पढ़ाना चाहिए ॥ ६१ ॥
अथ गुरुसन्तोषस्य सर्वसिद्धिहेतुत्वनिर्देशः— गुरौ तुष्टे शिवस्तुष्येच्छिवे तुष्टे रसस्तथा । रसे तुष्टे क्रियाः सर्वाः सिध्यन्त्येवं न संशयः ॥ ६२ ॥
सुश्रूषादिक से गुरू के प्रसन्न होने से महादेव जी प्रसन्न होते हैं, महादेवजी के प्रसन्न होने से पारद प्रसन्न होता है और पारद के प्रसन्न होने से प्रायः सब काम सफल हो जाते हैं । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ६२ ॥
अथ रसविद्याया अवश्यंगोप्यत्वनिर्देशः— रसविद्या दृढं गोप्या मातृगुह्यमिवध्रुवम् । भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशनात् ॥ ६३ ॥ न रोगिविदितं कार्यं बहुभिर्विदितं तथा । रोगिणां बहुभिर्ज्ञातं भवेन्निर्वीर्यमौषधम् ॥ ६४ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये शिष्योपनयनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
रसविद्या को माता के गोप्याङ्ग के समान गुप्त रखनी चाहिए, क्योंकि गुप्त रखने से वह वीर्य्यवती होती है, और प्रकाशित करने से निर्वीर्य हो जाती है ।