भारतकोश
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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

[ २२ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ शंख द्राव २६० | अपर प्रकार ३०१ शंखद्राव का गुण २६१ | गुण और मात्रा ,, द्वितीय शंख द्राव २६२ | वराटिका का आमयिक प्रयोग ३०२ द्वितीय शंख द्राव का गुण ,, | शृङ्ग का नाम ,, तृतीय शंख द्राव २६३ | ग्राह्य शृङ्ग का स्वरूप ३०३ चतुर्थ सजल शंख द्राव ,, | शृङ्ग का मारण ,, चतुर्थ सजल शंख द्राव की मात्रा २६४ | शृंगभस्म का आमयिक प्रयोग ,, क्षुद्र शंख ( घोंघा ) का नाम ,, | समुद्रफेन का नाम ३०४ क्षुद्र शंख का शोधन ,, | समुद्रफेन का शोधन ,, क्षुद्र शंख का मारण ,, | समुद्रफेन के गुण और मात्रा ३०५ क्षुद्र शंख का गुण ,, | समुद्रफेन का आमयिक प्रयोग ,, क्षुद्र शंख का आमयिक प्रयोग २६५ | समुद्र फेन की उत्पत्ति ३०६ शुक्ति का नाम २६५ | त्रयोदशतरङ्ग शुक्ति का शोधन ,, | यवक्षार का नाम ३०७ शुक्ति का द्वितीय शोधन २६६ | यवक्षार का निर्माण ,, शुक्ति का मारण ,, | यवक्षार का गुण ३०८ शुक्ति भस्म की मात्रा ,, | यवक्षार की मात्रा ,, शुक्ति भस्म का आमयिक प्रयोग २६७ | यवक्षार का आमयिक प्रयोग ,, जल शुक्ति का नाम २६८ | निम्बूकाम्लीय यवक्षार का नाम ३११ जल शुक्ति का शोधन मारण ,, | निम्बूकाम्लीय यवक्षार का निर्माण ३१२ जल शुक्ति का गुण ,, | निम्बूकाम्लीय यवक्षार का गुण ,, वराट का नाम २६६ | निम्बूकाम्लीय यवक्षार की मात्रा ३१३ वराट के भेद ,, | निम्बूकाम्लीय यवक्षार का आमयिक प्रयोग ,, ग्राह्य वराटिका स्वरूप ,, | सज्जीखार का नाम ,, वराटिका शोधन ३०० | सज्जीखार का निर्माण ,, द्वितीय शोधन ,, | सज्जीखार का गुण ३१४ तृतीय शोधन ,, | सज्जीखार की मात्रा ,, चतुर्थ शोधन ,, वराटिका मारण ,,

[ २३ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ सज्जीखार का आमयिक प्रयोग ३१४ | नवसादर की मात्रा ३३० निम्बूकाम्लीय सज्जी का निर्माण ३१५ | नवसादर सत्व प्रयोग विधि ,, निम्बूकाम्लीय सज्जीखार का गुण ३१६ | सोरक नाम ,, निम्बूकाम्लीय सज्जीखार की | सोरक गुण ३३१ मात्रा ३१६ | सोरक निर्मलीकरण ,, निम्बूकाम्लीय का आमयिकप्रयोग ३१७ | सोरक की निर्माण विधि ३३२ टंकण का नाम ३१८ | सोरक शोधन ,, टंकण निर्मलीकरण ,, | शुद्ध सोरक गुण ३३३ टंकण शोधन ,, | सोरक की मात्रा ,, टंकण का गुण ३१६ | सोरक का आमयिक प्रयोग ,, टंकण का आमयिक प्रयोग ,, | सोरक द्राव का नाम ३३५ टंकणामृत मलहर ३२१ | सोरक द्राव का निर्माण ,, टंकणाम्ल का नाम ३२२ | मजलसोरक द्राव का निर्माण ,, टंकणाम्ल का निर्माण ,, | सोरक द्राव का गुण ३३६ टंकणाम्ल का गुण ३२३ | सजल सोरक द्राव का गुण ,, टंकणाम्ल की मात्रा ,, | सजलसोरक द्राव की मात्रा ३३७ टंकणाम्ल का आमयिक प्रयोग ,, | क्षार का सामान्य निर्माण ,, टंकणाम्ल मलहर ३२४ | सामान्यतः क्षार का गुण ३३८ टंकणाम्ल का गुण ,, | सामान्यतः क्षार की मात्रा ,, टंकणाम्लद्रव का निर्माण ,, | अपामार्ग क्षार का नाम ३३६ टंकणाम्ल द्रवका आमयिक प्रयोग ,, | अपामार्ग क्षार का गुण ,, चतुर्दश तरङ्ग | अपामार्ग क्षार का आमयिक नवसादर का नाम ३२५ | प्रयोग ३३६ नवसादर का शोधन ३२६ | अर्क क्षार का नाम ३४० नवसादर का गुण ,, | अर्क क्षार का गुण ,, नवसादर की मात्रा ३२७ | अर्कक्षार का आमयिक प्रयोग ३४१ नवसादर का आमयिक प्रयोग ,, | तिल क्षार का नाम ,, नवसादर का सत्वपातन ३२६ | तिल क्षार का गुण ,, नवसादर का गुण ,, | तिल क्षार का आमयिक प्रयोग ३४२

[ २४ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ स्नुही क्षार का नाम ३४३ | सौवर्चल लवण का गुण ३५४ स्नुही क्षार का गुण ,, | सौवर्चल लवण का निर्माण ३५५ स्नुही क्षार का आमयिक प्रयोग ,, | रोमक लवण का नाम ३५५ पलास क्षार का नाम ३४४ | रोमक लवण का उत्पत्ति स्थान ३५५ पलास क्षार का गुण ,, | रोमक लवण का गुण ३५६ पलास क्षार का आमयिक प्रयोग ३४५ | लवण द्राव का नाम ३५६ चिञ्चा क्षार का नाम ,, | लवण द्राव का निर्माण ३५६ चिञ्चा क्षार का गुण ३४६ | सजल लवण द्राव का निर्माण ३५७ चिञ्चा क्षार का आमयिक प्रयोग ,, | सजल लवण द्राव का गुण ३५८ सैन्धव का नाम ३४७ | सजल लवण द्राव की मात्रा ३५८ सैन्धव का गुण ,, | सजल लवण द्राव का आमयिक सैन्धव का उत्पत्ति स्थान ३४८ | प्रयोग ३५६ सैन्धव का आमयिक प्रयोग ,, | पञ्चदश तरंग नारिकेल लवण ,, | धातुओं की संख्या ३६१ नारिकेल लवण का गुण ३४६ | सब धातुओं का सामान्य नारिकेल लवण का आमयिक | शोधन ३६२ प्रयोग ३५० | द्वितीय शोधन ३६३ अर्क लवण ३५० | धातुओं का सामान्य मारण ३६३ अर्क लवण का गुण ,, | सुवर्ण का नाम ३६३ अर्क लवण का आमयिक | ग्राह्य सुवर्ण का स्वरूप ३६३ प्रयोग ,, | ग्राह्य सुवर्ण का २ रा लक्षण ३६४ सामुद्र लवण का नाम ३५१ | अग्राह्य सुवर्ण का स्वरूप ,, सामुद्र लवण का गुण ,, | सुवर्ण शुद्धि का प्रयोजन ३६५ सामुद्र लवण का परिचय ,, | सुवर्ण का प्रथम शोधन ,, विड् लवण का नाम ३५२ | सुवर्ण द्वितीय शोधन प्रकार ,, विड् लवण का गुण ,, | सुवर्ण तृतीय शोधन ३६६ विड् लवण का १ ला निर्माण ,, | शुद्ध सुवर्ण प्रयोग ३६७ विड् लवण २ रा निर्माण ३५४ | घिसे हुए शुद्ध सुवर्ण का गुण ३६७ सौवर्चल लवण का नाम ,, | सुवर्ण पन्नी का नाम ३६७

[ २५ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ सुवर्ण पन्नी का गुण ३६८ | तृतीय मारण ३६० सुवर्ण पन्नी की प्रयोग विधि ३६८ | चतुर्थ मारण ३६१ सुवर्ण लवण का नाम ३६८ | पञ्चम मारण ३६१ सुवर्ण लवण का निर्माण ३६६ | छठा मारण ३६२ सुवर्ण लवण का गुण ३७० | सातवाँ मारण ३६३ सुवर्ण लवण की मात्रा ३७० | रजत भस्म गुण ३६४ सुवर्ण लवण का प्रयोग क्रम ३७० | विशिष्ट गुण ३६५ सुवर्ण लवण का प्रथम मारण ३७१ | रजत भस्म की मात्रा ३६६ सुवर्ण लवण का द्वितीय मारण ३७२ | रजत भस्म का आमयिक प्रयोग ३६६ सुवर्ण लवण का तृतीय मारण ३७३ | सोरकाम्लीय रजत का निर्माण ३६६ सुवर्ण लवण का चतुर्थ मारण ३७४ | नवसादर बाष्पद्रव निर्माण ४०२ सुवर्ण लवण का पञ्चम मारण ३७४ | नवसादर बाष्पद्रव का गुण ४०३ मृत सुवर्ण का गुण ३७५ | नवसादर बाष्पद्रव का आमयिक मृत सुवर्ण का विशेष गुण ३७६ | प्रयोग ४०४ सुवर्ण भस्म की मात्रा ३७६ | सोरकाम्लीय रजत का गुण ४०५ सुवर्ण भस्म का आमयिक प्रयोग ३७६ | सोरकाम्लीय रजत द्रव का निर्माण ४०६ षोडश तरङ्ग | आमयिक प्रयोग ४०६ रजत का नाम ३८५ | द्वितीय सोरकाम्लीय रजत द्रव ४०७ ग्राह्य रजत का स्वरूप ३८५ | प्रयोग विधि ४०७ त्याज्य रजत का स्वरूप ३८६ | तृतीय सोरकाम्लीय रजतद्रव ४०७ रजत शोधन का फल ३८६ | प्रयोग विधि ४०८ रजत शोधन का प्रथम प्रकार ३८७ | सप्तदश तरङ्ग रजत शोधन द्वितीय विधि ३८७ | ताम्र का नाम ४०८ रजत का तृतीय शोधन ३८८ | ग्राह्य ताम्र स्वरूप ४०८ रजत पन्ना का नाम ३८८ | त्याज्य ताम्र स्वरूप ४०६ रजत पन्नी का गुण ३८८ | ताम्र के दो भेद ,, रजत पन्नी का प्रयोग ३८६ | नेपाल ताम्र का लक्षण ४१० रजत मारण ३८६ | म्लेच्छ ताम्र का लक्षण ,, द्वितीय मारण ३६० | ताम्र शोधन का फल ,,

[ २६ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ ताम्र शोधन ४११ | भूनाग सत्व का आमयिक प्रयोग ४३४ द्वितीयताम्र शोधन ,, | मयूर पिच्छ का सत्व पातन ,, तृतीय शोधन ४१२ | अष्टादश तरङ्ग चतुर्थ शोधन ,, | वङ्ग (रांगा) का नाम ४३५ पञ्चम शोधन ,, | वङ्ग के दो भेद ,, छठा शोधन ,, | खुरक का लक्षण ,, ताम्र मारण ४१३ | मिश्रक का लक्षण ४३६ द्वितीय ताम्र मारण ,, | ग्राह्य और हेय वङ्गका स्वरूप ,, तृतीय मारण ४१४ | वङ्ग शोधन का फल ,, चतुर्थ मारण ,, | वङ्ग शोधन ४३७ पञ्चम मारण ४१५ | द्वितीय वङ्ग शोधन ,, छठा मारण ४१६ | तृतीय शोधन ४३८ अमृतीकरण का फल ,, | चतुर्थ शोधन ,, ताम्र के आठ दोष ४१७ | वङ्ग मारण ,, अमृतीकरण ,, | द्वितीय वङ्ग मारण ४३६ द्वितीय अमृतीकरण ४१८ | तृतीय वंग मारण ४४० तृतीय अमृतीकरण ४१६ | चतुर्थ वंग मारण ४४१ ताम्रभस्म का गुण ,, | क्षार शून्य की परीक्षा ४४२ विशेष गुण ४२२ | पञ्चम मारण ,, ताम्र भस्म की मात्रा ,, | वंग भस्म का गुण ४४३ ताम्र भस्म का आमयिक प्रयोग ,, | विशेष गुण ४४४ रविताण्डव रस ४२६ | वंग भस्म के शीत उष्ण होने हृदयार्णव रस ४३० | में हेतु ४४५ त्र्यम्बकेश्वर रस ,, | वंग भस्म की मात्रा ,, सूर्यावर्त रस ४३१ | वंग भस्म का आमयिक प्रयोग ४४६ शूलेभकेशरी रस ४३२ | स्वर्ण वंग का मारण ४४८ भूनाग सत्व पातन ४३३ | द्वितीय मारण प्रकार ४५१ भूनाग सत्व मारण ४३३ | स्वर्ण वङ्ग का गुण ,, भूनाग सत्व का गुण ४३४ | स्वर्ण वंग की मात्रा ४५२

[ २७ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ स्वर्णवङ्ग का आमयिक प्रयोग ४५२ | सजलारनालीयक का आमयिक सुवर्णवङ्गपञ्चक रसायन ४५४ | प्रयोग ४७२ एकोनविंशस्तरंगः | सजलारनालीयक के प्रयोग का सीसे का नाम ४५५ | निषेध ४७३ ग्राह्य सीसा का रूप ४५६ | सजलारनालीयक विकार हेय सीसा ४५७ | उपचार ४७३ सीसा शोधन फल ,, | यशद का नाम ,, प्रथम सीसा शोधन ,, | ग्राह्य यशद का स्वरूप ४७४ द्वितीय शोधन ४५८ | हेय यशद का स्वरूप ,, सीसा मारण ,, | यशद शोधन का प्रयोजन ,, द्वितीय सीसा मारण ४६० | यशद का शोधन ४७५ तृतीय मारण ,, | यशद का द्वितीय शोधन ,, चतुर्थ मारण ४६१ | तृतीय शोधन ,, पञ्चम मारण प्रकार ४६२ | चतुर्थ शोधन ४७६ छठा मारण ४६३ | यशद का मारण ,, सप्तम मारण ,, | द्वितीय मारण ४७७ सीसा भस्म का गुण ४६४ | तृतीय मारण ,, सीसा भस्म की मात्रा ४६६ | चतुर्थ मारण ४७८ सीसा भस्म का आमयिक प्रयोग ,, | सुमृत यशद का गुण ४७६ आन्त्रशोपांतकरस ४६७ | यशद का विशेष गुण ,, आन्त्रशोपान्तक रस का गुण ४६८ | यशद भस्म की मात्रा ४८० आरनालीय सीसा का नाम ४६६ | यशद भस्म का आमयिक प्रयोग ,, आरनालीय सीसा का निर्माण ४६६ | यशदामृत मलहर ४८३ आरनालीय सीसा द्रव निर्माण ४७० | यशदामृत मलहर का गुण ,, तीव्रकाञ्जिकाऽम्ल का निर्माण ४७१ | गन्धकाम्लीय यशद निर्माण ४८४ सजलारनालीयक सीसा द्रव का | गन्धकाम्लाय यशद का गुण ,, निर्माण ,, | गन्धकाम्लीय यशद द्रव का सजलारनालीयक सीसा द्रव का | निर्माण ४८५ प्रकार क्रम ४७२ | गन्धकाम्लीय यशद द्रवका गुण ४८५

[ २८ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ गन्धकाम्लीय यशद का आमयिक | भानुपाक विधान ४१६ प्रयोग ४८६ | स्थाली पाक लक्षण ४६७ द्वितीय गन्धकाम्लीय यशद द्रव का | स्थाली पाक विधान ,, निर्माण ४८६ | पुट पाक लक्षण ४६८ गन्धकाम्लीय यशद द्रव और गुण ४८६ | पुटपाक विधान ,, गन्धकाम्लीय यशद द्रव प्रयोग | पुटपाक में द्रव्य मान ५०० विधि ४८६ | लोह मारक गण ,, यशदामृत द्रव निर्माण ४८७ | वातहर गण ५०१ यशदामृत द्रव का गुण ,, | पित्तनाशक गण ,, आमयिक प्रयोग ,, | कफ नाशक गण ,, विंशस्तरङ्गः | लोह मारक गण में विशेषता ५०२ लोह का भेद ,, | लोह मारण का अन्य प्रकार ,, मुण्ड लोह का नाम ४८८ | लोह मारण का तृतीय प्रकार ५०३ तीक्ष्ण लोह का नाम ,, | चतुर्थ मारण ५०४ कान्त लोह का नाम ,, | पञ्चम मारण ,, मुण्ड लोहों का परिचय ,, | छठा मारण ५०५ मारणयोग्य लोह ४८६ | सातवाँ मारण ५०६ ग्राह्यतीक्ष्ण लोह ४६१ | लोह निरुत्थीकरण ,, कान्त लोह लक्षण ,, | निरुत्थ लोह की परीक्षा ५०७ लोह शोधन प्रयोजन ४६३ | लौह भस्म का गुण ,, शोधन में उचित लौह ,, | विशेष गुण ५११ शोधन लौह का मान ४६४ | लोह की मात्रा ,, लौह शोधन ,, | लोहभस्म का आमयिक प्रयोग ५१३ जल क्वाथ का मान ,, | प्रदरान्तक लोह ५१५ द्वितीय शोधन ४६५ | मंडूर का स्वरूप ,, तृतीय शोधन ,, | मंडूर का नाम ५१६ चतुर्थ शोधन ४६६ | श्रेष्ठ मंडूर ,, शुद्धि बाद पाकक्रम ,, | मंडूर शोधन ,, भानुपाक लक्षण ,, | अन्य शोधन विधि ५१७

[ २६ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ मण्डूर मारण ५१७ | शोधन का फल ५३१ मण्डूर भस्म का गुण ५१७ | प्रथम शोधन ५३१ मण्डूर भस्म की मात्रा ५१८ | द्वितीय शोधन ५३२ मण्डूर भस्म का आमयिक प्रयोग ५१८ | तृतीय शोधन ५३२ | मारण ५३२ एकविंशतरंग | सामान्य मारण ५३३ सुवर्ण माक्षिक का नाम ५१६ | गुणादि निरूपण ५३३. ग्राह्य सुवर्णमाक्षिक ५२० | सत्व पातन ५३३ हेय सुवर्णमाक्षिक ५२० | तूतिये का नाम ५३३ स्वर्णमाक्षिक शोधन ५२० | ग्राह्य तूतिया ५३४ प्रथम शोधन ५२१ | शोधन ५३४ द्वितीय शोधन ५२१ | शुद्ध तूतिया का गुण ५३४ तृतीय शोधन ५२२ | तुत्थ द्रव का निर्माण ५३५ चतुर्थ शोधन ५२२ | आमयिक प्रयोग ५३५ प्रथम मारण ५२३ | तुत्थोदया वटी ५३६ द्वितीय मारण ५२३ | तुत्थकोदया वर्ति ५३६ तृतीय मारण ४२४ | तुत्थकादि वर्ति ५३७ स्वर्णमाक्षिक भस्म का गुण ५२४ | शिखिग्रीवादि वर्ति ५३७ स्वर्णमाक्षिक भस्म की मात्रा ५२५ | तुत्थामृत मलहर ५३८ आमयिक प्रयोग ५२६ | तुत्थकाद्य मलहर ५३६ स्वर्णमाक्षिक सत्व पातन ५२८ | शुद्ध तूतिया का प्रयोग ५३६ द्वितीय विधि ५२८ | अन्तः प्रयोगार्थ शोधन ५४० तृतीय विधि ५२८ | द्वितीय शोधन ५४० स्वर्ण माक्षिक सत्व मारण ५२६ | तृतीय शोधन ५४० स्वर्ण माक्षिक सत्व का गुण ५२६ | चतुर्थ शोधन ५४१ आमयिक प्रयोग ५२६ | तुत्थामृत वटी ५४१ रजत माक्षिक नाम ५३० | तुत्थक मारण ५४२ श्रेष्ठ रजत माक्षिकलक्षण ५३० | द्वितीय मारण ५४२ हेय रजतमाक्षिक लक्षण ५३१ | तृतीय मारण ५४३

[ ३० ] विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ तुत्थभस्म का गुण | ५४३ | द्वितीय मारण | ५५६ तुत्थभस्म की मात्रा | ५४३ | खर्पर भस्म का गुण | ,, आमयिक प्रयोग | ५४४ | खर्पर भस्म की मात्रा | ५५७ तुत्थसत्त्व पातन | ५४५ | आमयिक प्रयोग | ,, द्वितीय सत्त्व पातन | ५४५ | सत्त्व पातन | ५५८ तृतीय सत्त्व पातन | ५४६ | द्वितीय सत्त्व पातन | ५५६ तुत्थसत्त्वका मारण गुण और फल | ५४६ | खर्पर सत्त्व मारण | ,, नकली तुत्थ निर्माण | ५४६ | खर्पर सत्त्व भस्म गुण | ,, सिन्दूर का नाम | ५४६ | खर्पर भस्म की मात्रा | ५६० श्रेष्ठ सिन्दूर | ५४७ | कान्तपाषाण नाम | ,, सिन्दूर का गुण | ५४८ | कान्तपाषाण शोधन | ,, सिन्दूर का आमयिक प्रयोग | ५४८ | द्वितीय शोधन | ५६१ सिन्दूराद्य मलहर | ५४८ | कान्तपाषाण मारण | ,, द्वितीय सिन्दूराद्य मलहर | ५४६ | कान्तपाषाण भस्म गुण | ,, सिन्दूराद्य तैल | ५४६ | कान्तपाषाण भस्म की मात्रा | ५६२ मुर्दा शंख का नाम | ५५० | कान्तपाषाण भस्म का आमयिक | मुर्दा शंख का स्वरूप | ५५१ | प्रयोग | ५६२ मुर्दा शंख का शोधन | ५५१ | काशीस का नाम | ,, मुर्दा शंख का गुण | ५५१ | काशीस के दो भेद | ५६३ शुद्ध आमयिक प्रयोग | ५५२ | काशीस का स्वरूप | ,, मृद्दारशृङ्गाद्य मलहर | ५५२ | काशीस का शोधन | ५६४ द्वितीय मृद्दारशृङ्गाद्य मलहर | ५५३ | काशीस का गुण | ,, खर्पर नाम | ५५३ | काशीस का निर्माण | ,, खपर का लक्षण | ५५३ | काशीस द्रव निर्माण | ५६५ खर्पर के दो भेद | ५५४ | काशीस की मात्रा | ५६६ खर्पर का शोधन | ५५५ | काशीस का आमयिक प्रयोग | ,, द्वितीय शोधन | ५५५ | काशीस मारण | ५६८ तृतीय शोधन | ५५५ | द्वितीय मारण | ५६६ खर्पर मारण | ५५६ | काशीस भस्म का गुण | ,,

[ ३१ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ द्वाविंश तरङ्ग | शोधन प्रकार ५७७ पित्तल का नाम ५६६ | द्वितीय शोधन ,, पित्तल का निर्माण ,, | तृतीय शोधन ५७८ ग्राह्य पित्तल ५७० | स्रोतोऽञ्जन का गुण ५७८ हेय पित्तल ,, | सौवीराञ्जन का गुण ,, पित्तल का शोधन ,, | स्रोत सौवीराञ्जन की मात्रा ५७६ पित्तल का द्वितीय शोधन ५७१ | पुष्पाञ्जन का परिचय ,, पित्तल मारण ,, | पुष्पाञ्जन का गुण ५८० पित्तल का द्वितीय मारण ,, | अञ्जन त्रितय का बाह्य प्रयोग ,, पित्तल का तृतीय मारण ५७२ | तिमिरहराञ्जन ,, पित्तल भस्म का गुण ,, | तुहिनाञ्जन ५८१ पित्तल भस्म की मात्रा ,, | शिलाजीत का नाम ,, पित्तल रसायन ५७३ | शिलाजीत का परिचय ५८२ कांस्य का नाम ,, | शिलाजीत के भेद ५८३ कांस्य का निर्माण ,, | शिलाजीत का स्वरूप ,, ग्राह्य कांस्य का लक्षण ,, | शिलाजीत शोधन ५८४ हेय कांस्य का लक्षण ५७४ | द्वितय शोधन ५८६ कांस्य शोधन ,, | तृतीय शोधन ,, कांस्य द्वितीय शोधन ,, | शुद्ध शिलाजीत की परीक्षा ५८७ कांस्य मारण ,, | शुद्ध शिलाजीत का गुण ५८८ द्वितीय मारण ५७५ | शिलाजीत की मात्रा ५६१ तृतीय मारण ,, | शिलाजीत का आमयिक प्रयोग ,, कांस्य भस्म का गुण ,, | गेरु का नाम ५६५ कांस्य भस्म का प्रयोग ,, | गेरु के दो भेद :• अञ्जन का नाम और भेद ५७६ | गेरु का स्वरूप ', स्रोतोऽञ्जन का नाम ,, | गेरु का शोधन ५६६ सौवीराञ्जन का नाम ५७७ | द्वितीय शोधन ,, स्रोतोऽञ्जन का स्वरूप ,, | शुद्ध गेरु का गुण ,, सौवीराञ्जन का स्वरूप ,, | शुद्ध गेरु की मात्रा ५६७

१. तरंग १-५: पारद-शोधन, अष्टसंस्कार, मूच्छर्ना व बन्ध विधान

[ ३२ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ शुद्ध गेरु का आमयिक प्रयोग ५६७ | माणिक्य मारण ६०६ गैरिकाद्य मलहर ५६८ | द्वितीय मारण ६१० त्रयोविंश तरङ्ग | माणिक्य भस्म का गुण ,, रत्न शब्द की व्युत्पत्ति ५६६ | माणिक्य भस्म की मात्रा ६११ नव महारत्न ,, | माणिक्य मिहिरोदय रसायन ,, नवग्रहों के रत्न ,, | मोती का नाम ,, हीरा का नाम ६०० | उत्तम मोती ६१२ उत्तम हीरा ,, | हेय मोती ,, हेय हीरा ६०१ | मोती शोधन ,, हीरा की परीक्षा ,, | द्वितीय शोधन ६१३ अशुद्ध हीरा का दोष ,, | तृतीय शोधन ,, हीरा का शोधन ,, | मोती का मारण ,, द्वितीय शोधन ६०२ | द्वितीय मारण ,, तृतीय शोधन ,, | मोतीभस्म का गुण ६१४ चतुर्थ शोधन ,, | मोतीभस्म की मात्रा ६१५ हीरा का मारण ,, | मोतीभस्म का आमयिक प्रयोग ,, द्वितीय मारण ६०३ | मुक्तापञ्चामृत रसायन ६१६ तृतीय मारण ६०४ | पुष्पराग का नाम ६१७ हीरा भस्म का गुण ,, | उत्तम पुष्पराग ,, हीरा भस्म की मात्रा ६०५ | हेय पुष्पराग (पुखराज) ,, हीरा भस्म का मात्रा निर्माण ,, | पुष्पराग शोधन ६१८ हीरा भस्म का आमयिक प्रयोग ,, | पुष्पराग का मारण ,, कन्दर्प कोकिल रस ६०६ | पुष्पराग भस्म का गुण ,, हीरक रसायन ६०७ | पुष्पराग भस्म की मात्रा ,, माणिक्य नाम ६०८ | नीलमणि का नाम ६१६ उत्तम माणिक्य ,, | उत्तम नील ,, हेय माणिक्य ,, | हेय नील ,, माणिक्य शोधन ६०६ | नील शोधन ,, द्वितीय शोधन ,, | नील मारण ,,

[ ३३ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ नील भस्म का गुण ६२० | प्रवाल मारण ६२७ नील भस्म की मात्रा ,, | द्वितीय मारण ६२८ मरकत का नाम ,, | तृतीय मारण ,, उत्तम मरकत ,, | चतुर्थ मारण ६२९ हेय मरकत ६२१ | प्रवाल भस्म का गुण ,, मरकत शोधन ,, | प्रवाल भस्म की मात्रा ६३० मरकत मारण ,, | प्रवाल भस्म का आमायिक प्रयोग ,, मरकत भस्म का गुण ,, | क्षुद्र रत्न गण ६३२ मरकत भस्म की मात्रा ६२२ | वैक्रान्त का नाम ,, वैदूर्य का नाम ,, | वैक्रान्त का निर्वचन ६३३ उत्तम वैदूर्य ,, | उत्तम वैक्रान्त ६३४ हेय वैदूर्य ,, | वैक्रान्त शोधन ,, वैदूर्य शोधन ६२३ | द्वितीय शोधन ६३५ वैदूर्य मारण ,, | तृतीय शोधन ,, वैदूर्य भस्म का गुण ,, | वैक्रान्त मारण ,, वैदूर्य भस्म की मात्रा ६२४ | द्वितीय मारण ,, गोमेद का नाम ,, | वैक्रान्त भस्म का गुण ६३६ उत्तम गोमेद ,, | वैक्रान्त भस्म की मात्रा ६३७ हेय गोमेद ,, | वैक्रान्त भस्म का आमायिक प्रयोग ,, गोमेद शोधन ६२५ | वैक्रान्त रसायन ६३८ गोमेद मारण ,, | सूर्यकान्त का नाम ६३९ गोमेद भस्म का गुण ,, | उत्तम सूर्यकान्त ,, गोमेद भस्म की मात्रा ,, | सूर्यकान्त की परीक्षा ,, प्रवाल का नाम ६२६ | सूर्यकान्त का गुण ६४० उत्तम प्रवाल ,, | सूर्यकान्त मारण ,, हेय प्रवाल ६२७ | चन्द्रकान्त का नाम ,, प्रवाल शोधन ,, | उत्तम चन्द्रकान्त ,, द्वितीय शोधन ,, | चन्द्रकान्त का गुण ६४१ तृतीय शोधन ,, | चन्द्रकान्त मारण ,,

( ३४ ) विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ राजवर्त का नाम ६४१ | उत्तम वत्सनाभ ६५१ उत्तम राजवर्त ,, | वत्सनाभ शोधन का फल ,, राजवर्त शोधन ६४२ | वत्सनाभ का शोधन ,, द्वितीय शोधन ,, | द्वितीय शोधन ६५२ तृतीय शोधन ,, | तृतीय शोधन ,, राजवर्त मारण ,, | वत्सनाभ का गुण ६५३ राजवर्त भस्म का गुण ६४३ | वत्सनाभ का विशिष्ट गुण ६५४ राजवर्त भस्म का आमयिक | विष प्रयोग का निषेध ६५६ प्रयोग ६४३ | विष की मात्रा ६६० राजवर्त का सत्त्व पातन ६४४ | मृत्युञ्जय रस ,, पेरोज का नाम और मारण ,, | मृत्युञ्जय रस का आमयिक प्रयोग ६६१ पेरोज का शोधन मारण ,, | हिङ्गुलेश्वर रस ६६२ पेरोज भस्म का गुण ६४५ | हिङ्गुलेश्वर रस का आमयिक स्फटिकमणि का नाम ,, | प्रयोग ६६३ उत्तम स्फटिक ,, | पञ्चामृत रस ,, स्फटिक का शोधन मारण ६४६ | शिव ताण्डव रस ६६४ स्फटिक भस्म का गुण ,, | आनन्द भैरव रस ६६५ चतुर्विंशस्तरङ्गः | जया वटी ६६६ विष का निर्वचन ६४६ | कफकेतु रस ६६७ विष का नाम और भेद ६४७ | विष रसायन ६६८ स्थावर जङ्गम विष का स्वरूप ,, | अमृत रसायन ६६६ स्थावर विष का भेद ६४८ | विष का प्रयोग ६७१ स्थावर विष का अधिष्ठान ,, | विष का बाह्य प्रयोग ६७२ स्थावर विष का रूपान्तर से भेद ,, | विष प्रभा वर्तिका ६७४ विष के नव भेद ,, | उपविषों का नाम ६७५ वत्सनाभ का परिचय ६४८ | कुचिला का नाम ६७६ वत्सनाभ विष का परिचय ६५० | कुचिला का परिचय ६७६ वत्सनाभ के भेद ,, | कुचला का शोधन ६७८ वत्सनाभ का नाम ६५१ | द्वितीय शोधन ६७८

[ ३५ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ तृतीय शोधन ६७६ | मङ्गलोदया वटी ७०२ कुचिला का गुण ,, | वेदनान्तक मलहर ,, कुचिला की मात्रा ६८४ | जयपाल का नाम ७०३ नवजीवन रस ,, | जयपाल का परिचय ,, अग्नि तुण्डी रस ६८५ | जयपाल शोधन ७०४ लक्ष्मी विलास रस ६८६ | द्वितीय शोधन ,, शूल निर्मूलन रस ६८७ | तृतीय शोधन ७०५ सुप्ति वातारि रस ,, | जयपाल का गुण ७०६ सारमेय विषापह योग ६८८ | जयपाल की मात्रा ,, विष तिन्दुक तेल ,, | इच्छा भेदी रस ,, अहिफेन का नाम ६८६ | जलोदरारि रस ७०७ अहिफेन का परिचय ,, | ज्वरारि रस ७०८ खस्तिलनिर्यास का निर्मलीकरण ६६१ | अञ्जन भैरव ७०६ खस्तिलनिर्यास निर्मलीकरण का | वृश्चिक विषहर लेप ,, फल ६६२ | जयपाल युक्त योगों का निषेध ,, अहिफेन शोधन ,, | धत्तूरा का नाम ७१० अहिफेन का गुण ,, | धत्तूरा का परिचय ,, अहिफेन का निषेध ६६५ | धत्तूरा बीजों का शोधन ७११ बाह्य प्रयोग में अहिफेन का गुण ६६६ | द्वितीय शोधन ,, अहिफेन की मात्रा ६६७ | शुद्ध धत्तूरा का गुण ,, अहिफेन का आमयिक प्रयोग ,, | धत्तूरा का विशेष गुण ७१२ वेदनान्तक रस ,, | धत्तूर की मात्रा ७१५ निद्रोदय रस ६६८ | धत्तूर का आमयिक प्रयोग ,, सिन्दूर भूषण रस ६६६ | प्रलापान्तक रस ७१७ इर्षोदया वटी ,, | उन्माद गजांकुश ,, अहिफेनासव ७०० | ग्रन्थिशोथ निवारिका वर्तिका ७१८ अहिफेनासव का गुण ७०१ | भांग का नाम ,, अहिफेनासव मात्रा ,, | भांग का परिचय ७१६ अहिफेनासव का आमयिक प्रयोग ,, | भांग का शोधन ७२०

[ ३६ ] विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ द्वितीय शोधन ७२० करवीर का नाम ७३८ भांग का विशेष गुण ,, करवीर का परिचय ,, भांग की मात्रा ७२३ करवीर का बाह्य प्रयोग ,, भांग का आमयिक प्रयोग ,, करवीराद्य तैल ७३६ मदनोदय मोदक ४२३ लाङ्गली का नाम ,, त्रैलोक्य विजया वटी ७२५ लाङ्गली का परिचय ७४० त्रैलोक्य संमोहन रस ७२६ लाङ्गलोका अन्तः प्रयोग में दोष ७४१ गुञ्जा का नाम ७२७ लाङ्गलो का गुण ,, गुञ्जा का परिचय ७२८ लाङ्गली का बाह्य प्रयोग ,, गुञ्जा शोधन फल ,, अर्क क्षीर का नाम ७४२ गुञ्जा शोधन ,, अर्क क्षीर का गुण ,, द्वितीय शोधन ७२६ अर्क क्षीर का बाह्य प्रयोग ,, शुद्ध गुञ्जा का गुण ,, स्नुही क्षीर का नाम ७४३ गुञ्जाबीज की मात्रा ७३० स्नुही क्षीर का शोधन ७४४ गुञ्जा का आमयिक प्रयोग ,, स्नुही क्षीर का गुण ,, गुञ्जाद्य तैल ७३१ स्नुही क्षीर का आमयिक प्रयोग ,, द्वितीय गुञ्जाद्य तैल ,, क्षार वर्तिका ,, गुञ्जाजीवन रस ७३२ क्षार सूत्र ७४५ गुञ्जा भद्र रस ७३३ कृष्णसर्प विष का नाम ७४६ भेलावे का नाम ,, कृष्णसर्प विष की आहार्य विधि ,, भेलावे का परिचय ७३४ कृष्णसर्प विष का शोधन ७४७ भेलावे का स्वरूप ,, कृष्णसर्प विष का गुण ,, भेलावे का शोधनफल ,, कृष्णसर्प विष का निषेध ७४६ भेलावे का शोधन ७३५ सूचिकाभरण रस ,, द्वितीय शोधन ,, सूचिकाभरण रस का गुण ७५० भेलावे का गुण ७३६ द्वितीय सूचिकाभरण रस ७५१ भेलावे की मात्रा ७३७ विसूचीध्वंसन रस ७५२ भेलावे का आमयिक प्रयोग ,, मृत संजीवन रस ,, भल्लातक रसायन ,, रक्त चित्रक शोधन ७५३

[ ३७ ] विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ वृद्धदारक बीज शोधन | ७५३ | विड लवणादि नस्य | ७६२ निम्बू बीज का शोधन | ७५४ | चतुर्मुख रस | ,, हींग का शोधन | ,, | बाल चन्द्र रस | ७६३ गुग्गुल का शोधन | ,, | सूत शेखर रस | ,, ग्रन्थ समाप्ति काल | ७५५ | कुमुदेश्वर रस | ७६४ परिशिष्ट | | आरोग्य वर्द्धिनी गुटिका | ,, वृश्चिक हारी गुटिका | ७५६ | सूर्याञ्जन | ७६५ पञ्चामृत रस | ,, | स्वप्नमेहान्तक वटी | ,, स्मृति सागर रस | ,, | वृहदङ्केश्वर रस | ७६६ शिलाञ्जन | ७५७ | पुष्पधन्वारस | ,, द्वितीय शिलाञ्जन | ,, | गुल्म कुठार रस | ७६७ वृश्चिक विषनाशक गुटिका | ७५८ | शूल वज्रिणी वटी | ,, तन्द्राहरी गुटिका | ,, | पुनर्नवा मण्डूर | ७६८ वातेभकेशरी रस | ,, | कासीसाञ्जन | ,, नयनामृत द्रव | ७५९ | सौवीराञ्जन चूर्ण | ७६९ टङ्कणादि वटी | ,, | प्रमेह गज केशरी रस | ,, शूलाद्रि भञ्जन चूर्ण | ,, | गैरिकादि प्रलेप | ७७० वह्नि प्रदीपन चूर्ण | ,, | नख दन्त विषहर प्रयोग | ,, कफ निःसारक वटी | ७६० | लघु सूत शेखर रस | ,, नवसादर चूर्ण | ,, | प्रवाल पञ्चामृत रस | ,, सुधांशु द्रव | ,, | नवजीवन मलहर | ७७१ कर्ण पाकज वेदनाहर योग | ७६१ | कर्ण मूल हर लेप | ,, सैन्धवादि नस्य | ,, | अहिफेन तैल | ७७२ खर्जूर विषहर योग | ,, | भल्लातकादि कषाय | ,, सर्प विषहर योग | ,, | भल्लातकादि गुटिका | ,, आखू विषहर योग | ७६२ | भल्लातकादि लेप | ,, बरटै विषहर योग | ,, | भल्लातक रसायन | ,,

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ॐ रसतरङ्गिणी श्रीकंसमर्द्दिन्यै नमः अथ रसशालाविज्ञानीयः प्रथमस्तरंगः गणेशमुखचुम्बिनी सुरकदम्बकादम्बिनी दयारसतरङ्गिणी दनुजसङ्घसंहारिणी । अघव्रजविडम्बिनी हरकुटुम्बिनी सन्ततं भवत्वमरवन्दिता मम हृदन्तरालम्बिनी ॥ १ ॥ प्रसादिनी ध्रुवोऽखिलनमस्कृतः स्थिरतनुश्च यत्साधकः समस्तगुणमण्डितो जगति यन्नियुक्तो बलिः ॥ यवोऽतनुरपि स्मरस्तनुयुतोऽनिरुद्धस्थितिः स नोऽवतु समंततो मुरहरः सदा पारदः ॥ १ ॥ अथ खलु रसतन्त्रविविदिषामुह्यन्मनुजमानसमलमोषिणीं रसतरङ्गिणी- माविष्करिष्यन्नाचार्यः सम्भावितप्रत्यूहन्यूहापोहाय शिष्टाचारानुमितस्मृत्यनुमित- श्रुतिबोधितकर्तव्यताकम्मङ्गलमाचरन् स्वेष्टदेवतामुपश्लोकयति—गणेशमुखचुम्बि- नीत्यादिना पृथ्वीवृत्तेन । गणेशो विघ्नहरः, तस्य मुखं चुम्बतीति, सुतवत्सल- तया, गणेशः पार्वतीसुतः इति पौराणिकस्मरणात् । अत्र चादौ गणेशनाम- कीर्तनमपि माङ्गलिकमित्यपि रहस्यम् । सुरकदम्बः = देवसमूहः तत्र काद- म्बिनी = सामूहिका प्रधानभूतेति यावत्, दया = करुणा एव रसस्तस्य तरङ्गि- णीव अत्यन्तदयायुक्तेति यावत्, दनुजसङ्घां = दैत्यसमूहस्तस्य संहारिणी = विनाशिका, अघव्रजः=पापसमूहः तस्य विडम्बिना=अपहरणशीला, अमर- वंदिता=देवैः स्तुता, नमस्कृता च, हरकुटुम्बिनी=शिवस्यार्धाङ्गिनो, संततं = निर- न्तरं मम हृदंतरालम्बिनी = मानसमध्यस्थायिनी भवतु इत्याशीः प्रार्थनम् ॥१॥ भा.टी.—गणेशजी के मुख को प्यार करनेवाली, देवसमूह में प्रथम पूजनीया, अत्यन्त दयावाली, दैत्य समूह को विनाश करनेवाली, पाप समूह

को नष्ट करनेवाली, शिव के आधे भाग में विराजमान और देवसमूह से पूजनीया श्रीपार्वती देवी मेरे हृदय में वास करें ॥ १ ॥ ज्योतिःशास्त्रमहाम्भोधिकर्णधारं नमाम्यहम् । जीवानन्दं तु पितरं मातरञ्च सरस्वतीम् ॥२॥ ज्योतिःशास्त्रेत्यादिना पित्रोर्नमस्कारः ॥२॥ भा.टी.—ज्योतिष शास्त्ररूपी समुद्र में नाविक स्वरूप पिता श्री पं० जीवानन्दजी, एवं माता सरस्वतीदेवी को नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ क्वाहं विमूढधिषणाः क्व च सूततन्त्र- माकुण्ठितामलधियामपि यत्र बुद्धिः । सत्यं तदेतदपि तत्र तथापि यत्नः साफल्यमेष्यति गुरोरनुकम्पयाऽयम् ॥ ३ ॥ गुर्वानुकम्पासामर्थ्यं प्रकटयन् स्वाभिमानमपाकरोति क्वाह्मिति—विमूढधि- षणाः मुग्धबुद्धिः अहं क्व ? अमलधियां निर्मलमतीनामपि यत्र सूततन्त्रे बुद्धिः आकुण्ठिता स्यादिति शेषः, तादृशं सूततंत्रं पारदसाधनशास्त्रं च क्व ? अहो वैषम्यम् । अपि यद्यप्यर्थे, यद्यपि तदेतत् वैषम्यं सत्यं, तथापि तत्रायं यत्नः रस- तरङ्गिणीनिर्माणरूपः गुरोरनुकम्पया साफल्यमेष्यति ॥३॥ भा.टी.—स्वच्छ एवं पवित्र बुद्धिमान् वैद्यों की बुद्धि भी जिस रसशास्त्र में कुंठित हो जाती है उसमें मेरे जैसे अल्पज्ञ की बुद्धि कुंठित हो तो यह स्वाभाविक है फिर भी गुरु की कृपा से यह परिश्रम मेरा सफल होगा ऐसा विश्वास है॥३॥ य इह गुरुसमीपे यत्नतोऽब्दान्त्रयेण रसनिगमनिगूढग्रन्थितत्त्वावबोधः । अपि च गुरुरहस्यः कर्ममार्गोऽप्यकारि सरलमधुरपद्यैर्ग्रन्थ्यते वै स एव ॥ ४ ॥ ननु क्रियमाणोऽयं भवद्यत्नो रसयोगसंग्रहफल एवेति कृतं प्रयत्नेन, तादृश- संग्रहाणां बाहुल्यात् इति चेत्तत्राह, य इहेति—यत्नतः शिष्यधर्मपालनपरतया रसनिगमे रसशास्त्रे निगूढा यत्नलभ्याः ये ग्रंथयः आवरणसामान्याद् गुप्तरह- स्यस्थलानि, तेषां यः तत्त्वावबोधो मर्मज्ञानं गुरुसमीपे मया अकारि, अपि च गुरुणा बोधितं रहस्यं यस्य तादृशः, कर्ममार्गः, रचनात्मकः क्रमोऽपि अकारि स एव सरलमधुरपद्यैः सुखेनैवार्थज्ञापकैः मधुरैश्च श्लोकैः ग्रध्यते, नतु संग्रह- मात्रमिति भावः ॥४॥

प्रथमस्तरङ्गः ३ आ.टी.--तीन वर्षों तक गुरु की सेवा कर रसशास्त्र के गूढ़ तत्त्वों का और गुरूपदेश से कर्म मार्ग का जो हमने ज्ञान प्राप्त किया है-उन्हीं ज्ञानों को सरल एवं मधुर पद्यों द्वारा इस ग्रंथ में ग्रथित कर रहा हूँ ॥ ३ ॥ प्राचीनेषु दुरूहेषु रसतन्त्रेषु मुह्यताम् । सन्दिग्धास्वतिकष्टासु रसपाकक्रियासु च ॥५॥ पदे पदे विशेषेण नित्यं व्यामोहितात्मनाम् । ग्रन्थसम्पद्विहीनानां स्वल्पाध्ययनसम्पदाम् ॥६॥ इदानींतनबालानां स्वल्पेन समयेन तु । सुखतः प्रतिपत्त्यर्थं प्रयत्नोऽयं कृतो मया ॥७॥ घिल्डियालोपसंज्ञेन सदानन्देन शर्मणा । निबध्यते महायतनादियं रसतरङ्गिणी ॥८॥ अथ ग्रन्थानूबन्धचतुष्टयं दर्शयति विशेषकेण — प्राचीनेष्विति । दुरूहेषु कष्टलभ्यतत्त्वेषु = रसहृदयतन्त्रादिषु, मुह्यतामाकुलानाम् , सन्दिग्धासु स्फुटनि- श्चायकवर्णनरहितासु अत एव अतिकष्टासु बहुसमारम्भाल्पफलासु रसपाकक्रि- यासु = पारदादिजारणमारणव्यापारेषु,पदे पदे इति बाहुल्याभिप्रायेण स्वल्पेन समयेन तु इति तुर्विशेषार्थे, यदयमेव प्राक्तनतन्त्रेभ्यो रसतरङ्गिण्यां विशेषो यावता परिमितकालमप्येतदध्ययनं जिज्ञासुमनःसु रसरहस्यमाधातुमलमलमिति । तदेतदाह-सुखतः प्रतिपत्त्यर्थमिति प्रतिपत्तिः ज्ञानम् , महायत्नात् गुर्वनुकम्पास- हायविशिष्टाद् यत्नात् इत्यर्थः ॥५-८॥ एतेन स्वगुरूणां श्रीनरेन्द्रनाथ-मित्रम- होदयानां रसतरङ्गिणीनिर्माणे साहाय्यं ध्वनितम् । भा.टी.—अत्यन्त दुरूह रसशास्त्र में और संदिग्ध एवं अतिकष्टकारी रस- पाकक्रिया में व्यामोह प्राप्त वैद्यों के लिए, ग्रन्थ की कमी के कारण, स्वल्प अध्ययन करनेवाले, आजकल के अल्पज्ञ वैद्यों को स्वल्प समय में सुखपूर्वक ज्ञान कराने के लिए घिल्डियालोपाधियुक्त सदानन्द शर्मा ने रसतरंगिणी नामक ग्रंथ रचने का प्रयास किया है ॥ ५-८ ॥ रसतरंगिण्याः परिचयः सशिलापि निराघाता सनागापि भ्योज्झिता । सुखावगाहा बोभूयादियं रसतरङ्गिणी ॥९॥ ससत्त्वापि निराबाधा सघोषापि स्थिरक्रिया । सुखावगाह। जयति भृशं रसतरङ्गिणी ॥१०॥