भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

यज्ञस्य वा निशितिं वोदितिं वा तमित्पृणक्षि शवसोत राया.. (११) हे शूर एवं क्रांतदर्शी अग्नि! तुम उस व्यक्ति की रक्षा करते हो एवं अभिलाषाएं पूर्ण करते हो, जो तुम्हारी स्तुति करता है. जो यज्ञसाधन हव्य का संस्कार करता है अथवा उसे उत्तम बनाता है, तुम उस व्यक्ति को बल संपन्न करके धनों से पूर्ण करते हो. (११) त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्. सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहस्री.. (१२) हे अग्नि! शत्रु से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! पाप से हमारी रक्षा करो. हमारा दोषरहित हव्यान्र तुम्हारे समीप पहुंचे एवं तुम्हारा दिया हुआ हजारों प्रकार का धन हमें मिले. (१२) अग्निहौता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः. देवानामृत यौ मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा.. (१३) देवों को बुलाने वाले, गृह के स्वामी, दीप्तिशाली एवं सबको जानने वाले अग्नि सभी जन्मधारियों को जानते हैं. देवों एवं मानवों में अतिशय यज्ञकर्त्ता एवं सत्यशील अग्नि उत्तमरूप से देवों का यजन करें. (१३) अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होत: पावकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा. ऋता यजासि महिना वि यद्भूईर्व्या वह यविष्ठ या ते अद्य.. (१४) हे यज्ञ संपन्न करने वाले एवं पवित्रप्रकाश वाले अग्नि! इस समय तुम यजमान के कर्त्तव्य की कामना करो. तुम देवों के यज्ञकर्त्ता हो, इसलिए देवयजन करो. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अपने महत्त्व से सर्वव्यापक हुए हो. आज तुम्हें जो भी हव्य दिया जावे, उसे वहन करो. (१४) अभि प्रयांसि सुधितानि हि ख्यो नि त्वा दधीत रोदसी यजध्यै. अवा नो मघवन्वाजसातावग्ने विश्वानि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (१५) हे अग्नि! वेदी पर भली-भांति रखे हविरूप अन्नों को देखो. धरती-आकाश में यज्ञ करने के निमित्त तुम्हारी स्थापना की गई है. हे धनस्वामी अग्नि! अन्न निमित्तक युद्ध में हमारी रक्षा करो. तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम सभी पापों से छूट जावें. (१५) अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीद योनिम्. कुलायिनं घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु.. (१६) हे शोभन ज्वालाओं वाले एवं देवप्रमुख अग्नि! कंबलों से युक्त घोंसले के समान एवं घृतसंपन्न वेदी पर सभी देवों के साथ बैठो तथा यज्ञकर्त्ता यजमान के कल्याण के निमित्त ebook converter DEMO Watermarks*

उसका यज्ञ देवों के समीप ले जाओ. (१६) इममु त्यमथर्ववदग्निं मन्थन्ति वेधसः. यमङ् कूरयन्तमानयन्नमूरं श्याव्याभ्यः.. (१७) ऋत्विज् अथवा ऋषि के समान इस अग्नि का मंथन करते हैं एवं देवों के मध्य से निकलकर इधर-उधर भागते हुए बुद्धिसंपन्न अग्नि को अंधकार के मध्य से लाते हैं. (१७) जनिष्वा देववीतये सर्वताता स्वस्तये. आ देवान् वक्ष्यमृताँ ऋतावृधो यज्ञं देवेषु पिस्पृशः.. (१८) हे अग्नि! तुम देवों की कामना करने वाले यजमान के कल्याण के निमित्त यज्ञ में उत्पन्न होओ, यज्ञ बढ़ाने वाले देवों का यजन करो एवं हमारे यज्ञ को देवों के पास ले जाओ. (१८) वयमु त्वा गृहपते जनानामग्ने अकर्म समिध बृहन्तम्. अस्थूरि नो गार्हपत्यानि सन्तु तिग्मेन नस्तेजसा सं शिशाधि.. (१९) हे यज्ञपालनकर्त्ता अग्नि! मनुष्यों में हम ही तुमको समिधाओं द्वारा बढ़ाते हैं. हमारे गार्हपत्य-यज्ञ, पुत्र, पशुधन आदि से संपन्न हों. तुम हमें तीखे तेज से मिलाओ. (१९) सूक्त—१६ देवता—अग्नि त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः. देवेभिर्मानुषे जने.. (१) हे अग्नि! तुम समस्त यज्ञों को पूर्ण करने वाले हो. देवों ने मानवी प्रजाओं में तुम्हें होता बनाया है. (१) स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः. आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (२) हे अग्नि! तुम प्रसन्नता देने वाली ज्वालाओं द्वारा हमारे यज्ञ में देवों का यजन करो. तुम देवों को यहां लाओ एवं उन्हें हव्य दो. (२) वेत्था हि वेधो अध्वनः पथश्च देवाञ्जसा. अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो.. (३) हे यज्ञविधाता एवं शोभनयज्ञकर्मयुक्त अग्नि! तुम यज्ञ में देवों के छोटे एवं बड़े मार्गों को शीघ्रता से जानते हो. (३) त्वामीळे अध द्विता भरतो वाजिभिः शुनम्. ebook converter DEMO Watermarks*

ईजे यज्ञेषु यज्ञियम्.. (४) हे अग्नि! भरत ने सुख पाने के लिए ऋत्विजों के साथ मिलकर तुम्हारी स्तुति की थी एवं तुझ यज्ञयोग्य अग्नि का हव्यान्नों द्वारा यजन किया था. (४) त्वमिमा वार्या पुरु दिवोदासाय सुन्वते. भरद्वाजाय दाशुषे.. (५) हे अग्नि! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले दिवोदास को जिस प्रकार उत्तम धन अधिक मात्रा में दिए थे, उसी प्रकार हव्य देने वाले मुझ भरद्वाज को दो. (५) त्वं दूतो अमर्त्य आ वहा दैव्यं जनम्. शृण्वन्विप्रस्य सुष्टुतिम्.. (६) हे मरणरहित एवं देवदूत अग्नि! तुम मेधावी भरद्वाज की शोभन स्तुति को सुनते हुए इस यज्ञ में देवों को लाओ. (६) त्वामग्ने स्वाध्यो३ मर्तासो देववीतये. यज्ञेषु देवमीळते.. (७) हे अग्नि देव! शोभन चिंतन वाले मनुष्य देवों को प्रसन्न करने के हेतु यज्ञों में तुम्हारी स्तुति करते हैं. (७) तव प्र यक्षि सन्दृशमुत क्रतुं सुदानव:. विश्वे जुषन्त कामिन:.. (८) हे अग्नि! हम सब दानशील यजमान तुम्हारे दर्शनीय तेज की पूजा तथा सेवा करते हैं. (८) त्वं होता मनुर्हितो वह्निरासा विदुष्टर:. अग्ने यक्षि दिवो विश:.. (९) हे ज्वालाओं द्वारा हव्य वहन करने वाले एवं उत्तम विद्वान् अग्नि! मनु ने तुम्हें यज्ञ का होता नियुक्त किया है. तुम देवों का यजन करो. (९) अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१०) हे अग्नि! देवों को हव्य देने के लिए तुम्हारी स्तुति की जा रही है. तुम हव्य भक्षण के लिए आओ एवं बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१०) तं त्वा समिद्भीरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (११) हे अगांररूप अग्नि! हम समिधाओं एवं घृत द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अधिक दीप्त बनो. (११) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि देव! तुम हमें विस्तीर्ण प्रशंसनीय महान् शोभन व शक्ति से युक्त धन दो. (१२) त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत. मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः.. (१३) हे अग्नि! शीश के समान सारे जगत् को धारण करने वाले कमल पत्र पर अथर्वा ऋषि ने तुम्हारा मंथन किया था. (१३) तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः. वृत्रहणं पुरन्दरम्.. (१४) हे शत्रुहंता एवं असुर-नगरनाशक अग्नि! अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ् ने तुम्हें प्रज्वलित किया था. (१४) तमु त्वा पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्. धनञ्जयं रणेरणे.. (१५) हे शत्रुहंता एवं प्रत्येक युद्ध में धन जीतने वाले अग्नि! पाथ्यवृषा नामक ऋषि ने तुम्हें भली प्रकार प्रज्वलित किया था. (१५) एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः. एभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (१६) हे अग्नि! यहां आओ. हम तुम्हारे निमित्त उत्तम स्तुतियां बोलते हैं, उन्हें एवं इसी प्रकार की अन्य बातों को सुनो. तुम इस सोमरस द्वारा बढ़ो. (१६) यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्. तत्रा सदः कृणवसे.. (१७) हे अग्नि! जिस किसी यजमान के प्रति तुम्हारा मन अनुग्रहपूर्ण है, उसे तुम शक्तिदायक उत्तम अन्न देते हो एवं वहीं निवास करते हो. (१७) नहि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां वसो. अथा दुवो वनवसे.. (१८) हे अग्नि! तुम्हारा तेज हमारी दृष्टि को नष्ट करने वाला न हो. तुम थोड़े यजमानों को ही गृह देते हो. तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. (१८) आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः. दिवोदासस्य सत्पतिः.. (१९)

हम हव्य के स्वामी, दिवोदास राजा के शत्रुओं का नाश करने वाले अधिक ज्ञान वाले एवं यजमानों के पालक अग्नि से स्तुतियों के सहित मिलते हैं. (१९) स हि विश्वाति पार्थिवा रयिं दाशन्महित्वना. वन्वन्नवातो अस्तृतः.. (२०) काष्ठों को जलाने वाले, शत्रुओं के आक्रमण से रहित एवं अपराजित अग्नि अपनी महिमा से सभी सांसारिक संपत्तियां हमें दें. (२०) स प्रत्नवन्नवीयसाग्ने द्युम्नेन संयता. बृहत्ततन्थ भानुना.. (२१) हे अग्नि! तुम प्राचीन के समान ही नवीन तेज से युक्त होकर अपनी किरणों द्वारा आकाश का विस्तार करते हो. (२१) प्र वः सखायो अग्नये स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया. अर्च गाय च वेधसे.. (२२) हे मित्र ऋत्विजो! तुम यज्ञविधाता एवं शत्रुविनाशक अग्नि के प्रति यह स्तोत्र गाओ तथा हव्य दो. (२२) स हि यो मानुषा युगा सीदद्धोता कविक्रतुः. दूतश्च हव्यवाहनः.. (२३) देवों को बुलाने वाले, परम मेधावी, मानवों के यज्ञों के समय देवदूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में बिछाये हुए कुशों पर बैठें. (२३) ता राजाना शुचिव्रतादित्यान्मारुतं गणम्. वसो यक्षीह रोदसी.. (२४) हे निवास स्थान देने वाले अग्नि! तुम इस यज्ञ में दीप्तिसंपन्न एवं पवित्रकर्मा मित्र, वरुण, आदित्य मरुद्गण तथा धरती-आकाश का यजन करो. (२४) वस्वी ते अग्ने सन्दृष्टिरिषयते मत्र्याय. ऊर्जो नपादमृतस्य.. (२५) हे बलपुत्र एवं मरणरहित अग्नि! तुम्हारा प्रशंसायोग्य तेज यजमान को अन्न देता है. (२५) क्रत्वा दा अस्तु श्रेष्ठोऽद्य त्वा वन्वन्तसुरेक्णाः. मर्त आनाश सुवृक्तिम्.. (२६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! यज्ञकर्म द्वारा तुम्हारी सेवा करने वाला यजमान श्रेष्ठ एवं शोभन धन वाला हो तथा सदा तुम्हारी स्तुति करता रहे. (२६) ते ते अग्ने त्वोता इषयन्तो विश्वायुः. तरन्तो अर्यो अरातीर्वन्वन्तो अर्यो अराती:.. (२७) हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर एवं अन्न की इच्छा करते हुए समस्त अन्नों को प्राप्त करें, आक्रमणकारी शत्रुओं को हरावें एवं उन्हें मार डालें. (२७) अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वं. न्य१त्रिणम्. अग्निर्नो वनते रयिम्.. (२८) अग्नि अपने तीखे तेज द्वारा समस्त राक्षसों का विनाश करें एवं हमें धन दें. (२८) सुवीरं रयिमा भर जातवेदो विचर्षणे. जहि रक्षांसि सुक्रतो.. (२९) हे जातवेद एवं विशेषद्रष्टा अग्नि! तुम इसे शोभन पुत्रादि से युक्त धन दो. हे शोभन कर्म वाले! राक्षसों का नाश करो. (२९) त्वं नः पाह्यंहसो जातवेदो अघायतः. रक्षा णो ब्रह्मणस्कवे.. (३०) हे जातवेद अग्नि! तुम पाप से हमारी रक्षा करो. हे मंत्रों के रचयिता अग्नि! अहित चाहने वालों से हमारी रक्षा करो. (३०) यो नो अग्ने दुरेव आ मर्त्तो वधाय दाशति. तस्मान्नः पाह्यंहसः.. (३१) हे अग्नि! बुरे अभिप्राय वाला जो व्यक्ति हमें शस्त्र दिखाता है, उससे हमारी रक्षा करो एवं पाप से हमारी रक्षा करो. (३१) त्वं तं देव जिह्वया परि बाधस्व दुष्कृतम्. मर्तो यो नो जिघांसति.. (३२) हे अग्नि देव! उस दुष्ट व्यक्ति को तुम अपनी ज्वालाओं द्वारा भली प्रकार जलाओ, जो हमारी हिंसा करना चाहता है. (३२) भरद्वाजाय सप्रथः शर्म यच्छ सहन्त्य. अग्ने वरेण्यं वसु.. (३३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे शत्रुओं को पराजित करने वाले अग्नि! मुझ भरद्वाज को तुम विस्तृत सुख एवं चाहने योग्य धन दो. (३३) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया. समिद्धः शुक्र आहुतः.. (३४) प्रज्वलित शुक्लवर्ण एवं हव्य द्वारा बुलाए गए अग्नि स्तुतियां सुनकर स्तोताओं की कामना करते हुए शत्रुओं को नष्ट करें. (३४) गर्भे मातुः पितुष्पिता विविद्युतानो अक्षरे. सीदन्नृतस्य योनिमा.. (३५) पृथ्वीरूपी माता के गर्भ के समान, अविनाशी वेदी पर प्रज्वलित तथा हव्य द्वारा द्युलोकरूपी पिता का पालन करने वाले अग्नि यज्ञवेदी पर बैठकर शत्रुओं का विनाश करें. (३५) ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे. अग्ने यद्दीदयद्दिवि.. (३६) हे जातवेद एवं विशेषद्रष्टा अग्नि! जो अन्न देवों के मध्य स्वर्ग में दीप्त होता है, उसे संतान के साथ हमें दो. (३६) उप त्वा रण्वसन्दृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत. अग्ने ससृज्महे गिरः.. (३७) हे बलपुत्र एवं शोभनदर्शन वाले अग्नि! इव्यान्न धारण करने वाले हम तुम्हारे लिए स्तुतियां बोलते हैं. (३७) उपच्छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्. अग्ने हिरण्यऽसन्दृशः.. (३८) हे स्वर्ण के समान प्रकाशयुक्त तेज वाले एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि! इम छाया के समान तुम्हारी शरण में आते हैं. (३८) य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न वंसगः. अग्ने पुरो रुरोजिथ.. (३९) अग्नि शक्तिशाली धनुर्धारी के समान बाणों से शत्रुओं को मारने वाले एवं तेज सींगों वाले बैल के समान हैं. हे अग्नि! तुमने राक्षसों के नगरों को नष्ट किया है. (३९) आ यं हस्ते न खादिनं शिशुं जातं न बिभ्रति. ebook converter DEMO Watermarks*

विशामग्निं स्वध्वरम्.. (४०) हे ऋत्विजो! सुंदर यज्ञों को पूर्ण करने वाले अग्नि की सेवा करो. अध्वर्यु अग्नि को इस प्रकार हाथ से पकड़ते हैं, जैसे कोई बाघ आदि के बच्चे को पकड़ता है. (४०) प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम्. आ स्वे योनौ नि षीदतु.. (४१) हे अध्वर्युगण! तुम देवों को खिलाने के निमित्त द्योतमान एवं धनों को जानने वाले अग्नि में हव्य डालो. अग्नि अपनी वेदी पर बैठें. (४१) आ जातं जातवेदसि प्रियं शिशीतातिथिम्. स्योन आ गृहपतिम्.. (४२) हे अध्वर्युगण! उत्पन्न हुए, अतिथि के समान पूज्य एवं गृहस्वामी अग्नि को जातवेद नामक सुखकर अग्नि में स्थित करो. (४२) अग्ने युक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्ति मन्यवे.. (४३) हे अग्नि देव! अपने उन सुशील घोड़ों को रथ में जोड़ो, जो तुम्हें यज्ञों की ओर ठीक से ले जाते हैं. (४३) अच्छा नो याह्या वहाभि प्रयांसि वीतये. आ देवान्त्सोमपीतये.. (४४) हे अग्नि! तुम हमारे सामने आओ. तुम हव्यभक्षण एवं सोमपान करने के लिए देवों को बुलाओ. (४४) उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्. शोचा वि भाह्यजर.. (४५) हे हव्यवहन करने वाले अग्नि! तुम अपने तेज को बढ़ाते हुए प्रज्वलित होओ. हे युवा एवं परम दीप्तिसंपन्न अग्नि! तुम निर्बाध तेज द्वारा प्रकाशित बनो. (४५) वीती यो देवं मर्तो दुवस्येदग्निमीळीताध्वरे हविष्मान्. होतारं सत्ययजं रोदस्योरुत्तानहस्तो नमसा विवासेत्.. (४६) हव्यवाहक यजमान हव्यरूप शोभन अन्न द्वारा किसी भी देवता की सेवा करता है, उस यज्ञ में अग्नि बुलाए जाते हैं. यजमान हाथ जोड़कर एवं नमस्कार करता हुआ धरती-आकाश में वर्तमान देवों को बुलाने वाले हव्य द्वारा यजनयोग्य अग्नि की सेवा करें. (४६) आ ते अग्न ऋचा हविर्हृदा तष्टं भरामसि. ते ते भवन्तूक्षण ऋषभासो वशा उत.. (४७) हे अग्नि! हम हृदय द्वारा सुंदर बनाई गई ऋचाओं को हव्य के समान तुम्हें देते हैं. हमारा दिया हुआ हव्य तुम्हारे लिए गाय एवं बैल के रूप में परिवर्तित हो. (४७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१७ देवता—इंद्र

अग्निं देवासो अग्रियमिन्धते वृत्रहन्तमम्. येना वसून्याभृता तृळ्हा रक्षांसि वाजिना.. (४८) देवगण प्रमुख, वृत्र को भली प्रकार मारने वाले एवं राक्षसों से धन छीनने वाले अग्नि को प्रज्वलित करते हैं. (४८) सूक्त—१७ देवता—इंद्र पिबा सोममभि यमुग्र तर्द ऊर्वं गव्यं महि गृणान इन्द्र. वि यो धृष्णो वधिषो वज्रहस्त विश्वा वृत्रममित्रिया शवोभिः.. (१) हे उग्र इंद्र! तुमने अंगिरागोत्रीय ऋषियों की स्तुति सुनकर जिस सोमरस के उद्देश्य से पणियों द्वारा चुराई गई गायों को खोजा था, उस सोमरस को पिओ. हे हाथ में वज्रधारण करने वाले एवं शत्रुनाशक इंद्र! तुमने अपनी शक्तियों द्वारा सभी शत्रुओं को मारा था. (१) स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो यः शिप्रीवान् वृषभे यो मतीनाम्. यो गोत्रभिद्वज्रभृद्यो हरिष्ठाः स इन्द्र चित्राँ अभि तृन्धि वाजान्.. (२) हे सोमलता का फोक धारण करने वाले इंद्र! तुम शत्रुओं से रक्षा करने वाले, सुंदर ठोड़ी वाले एवं स्तोताओं की इच्छा पूरी करने वाले हो. हे इंद्र! तुम पर्वतों के भेदक, वज्रधारी एवं घोड़ों को रथ में जोड़ने वाले हो. तुम अपना विचित्र अन्न हम पर प्रकट करो. (२) एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः. आविः सूर्य कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि.. (३) हे इंद्र! प्राचीन काल के समान ही हमारा सोम पिओ. सोम तुम्हें प्रसन्न करें तुम हमारी स्तुतियों को सुनकर बढ़ो. तुम सूर्य को प्रकट करो. हमें अन्न प्राप्त कराओ, शत्रुओं को नष्ट करो एवं पणियों द्वारा चुराई गई गाएं खोजो. (३) ते त्वा मदा बृहदिन्द्र स्वधाव इमे पीता उक्ष्यन्त द्युमन्तम्. महामनूनं तवसं विभूतिं मत्सरासो जहृषन्त प्रसाहम्.. (४) हे अन्न के स्वामी इंद्र! पिया हुआ सोमरस तुझ तेजस्वी को बहुत प्रसन्न करे एवं सींच दे. तुम महान् सर्वगुणसंपन्न विभूतियुक्त एवं शत्रुपराजयकारी हो. (४) येभिः सूर्यमुषसं मन्दसानोऽवासयोऽप दृढ़हानि दर्दृत्. महामद्रिं परि गा इन्द्र सन्तं नुत्था अच्युतं सदसः परि स्वात्.. (५) हे इंद्र! जिस सोम से प्रसन्न होकर तुमने गाढ़े अंधकार को नष्ट करते हुए सूर्य एवं उषा को अपने-अपने स्थान पर स्थापित किया तथा उस पर्वत के टुकड़े कर दिए जो पणियों द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*

चुराई हुई गाएं छिपाए हुए था तथा अपनी शक्ति से स्थिर था. (५) तव क्रत्वा तव तद्दंसनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीथः. और्णोर्दुर उसियाभ्यो वि दृळ्होदूर्वाद्विगा असृजो अङ्गिरस्वान्.. (६) हे इंद्र! तुमने अपने कार्यों, बुद्धि और सामर्थ्य द्वारा कमजोर गायों को दुधारू बनाया है, गायों के बाहर जाने के लिए पर्वत में द्वार बनाए हैं एवं अंगिरागोत्रीय ऋषियों से मिलकर उन्हें घेरे से स्वतंत्र किया है. (६) पप्रथ क्षां महि दंसो व्यु१र्वीमुप द्यांमृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः. अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य.. (७) हे महान् इंद्र! तुमने अपने महान् कर्म द्वारा धरती को विशेष रूप से पूर्ण बनाया है, विस्तृत आकाश को स्थिर किया है एवं देवों के माता-पितारूप धरती-आकाश को धारण किया है. धरती-आकाश अति प्राचीन एवं उदक के जन्मदाता हैं. (७) अध त्वा विश्वे पुर इन्द्र देवा एकं तवसं दधिरे भराय. अदेवो यदभ्यौहिष्ट देवान्त्स्वर्षार्ता वृणत इन्द्रमत्र.. (८) जब वृत्र असुर ने संग्राम के लिए देवों को ललकारा तो उन्होंने तुम्हें ही अपने आगे चलने वाला बनाया. हे बलवान् इंद्र! मरुतों के युद्ध में भी तुम्हें वरण किया गया था. (८) अध द्यौश्चित्ते अप सा नु वज्राद्द्वितानमद्विद्यसा स्वस्य मन्योः. अहिं यदिन्द्रो अभ्योहसानं नि चिद्विश्वायुः शयथे जघान.. (९) हे अधिक अन्न के स्वामी इंद्र! जब तुमने आक्रमणकारी वृत्र को धरती पर सोने के लिए मार डाला था, तब तुम्हारे क्रोध एवं वज्र से आकाश भी कांप गया था (९) अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं ववृत्तच्छताश्रिम्. निकाममरमणसं येन नवन्तमहिं सं पिणग्ऋजीषिन्.. (१०) हे उग्र इंद्र! त्वष्टा ने तुम्हारे लिए हजार धार एवं सौ टुकड़ों वाला वज्र बनाया था. हे सोमलता का नीरस अंश ग्रहण करने वाले इंद्र! तुमने उस वज्र द्वारा निश्चित अभिलाषा वाले शत्रुओं से भिड़ने को उतावले एवं गर्जन करते हुए वृत्र को पीस डाला था. (१०) वर्धान्यं विश्वे मरुतः सजोषाः पचच्छतं महिषाँ इन्द्र तुभ्यम्. पूषा विष्णुस्त्रीणि सरांसि धावन्वृत्रहणं मदिरमंशुमस्मै.. (११) हे इंद्र! परस्पर समान प्रीति वाले मरुद्गण तुम्हें स्तोत्रों द्वारा बढ़ाते हैं. तुम्हारे लिए पूषा तथा विष्णु ने सौ भैंसे पकाए हैं तथा तीन पात्रों को नशीले एवं शत्रुनाशक सोम से भरा है. ebook converter DEMO Watermarks*

(११) आ क्षोदो महि वृतं नदीनां परिष्ठितमसृज ऊर्मिमपाम्. तासामनु प्रवत इन्द्र पन्थां प्रार्दयो नीचीरपसः समुद्रम्.. (१२) हे इंद्र! तुमने वृत्र द्वारा रोकी हुई सब ओर स्थित नदियों के जल को बंधनमुक्त किया था एवं जलसमूह की उत्पत्ति की थी. तुमने नदियों के मार्ग को नीचा बनाया है तथा उनके जल को सागर में पहुंचाया है. (१२) एवा ता विश्वा चकृवांसमिन्द्रं महामुग्रमजुर्यं सहोदाम्. सुवीरं त्वा स्वायुधं सुवज्रमा ब्रह्म नव्यमवसे ववृत्यात्.. (१३) हमारी नवीन स्तुतियां इस प्रकार सभी काम करने वाले, महान्, उग्र, नित्ययुवा, शक्तिदाता, शोभन वीरों वाले, शोभन वज्रधारी, उत्तम आयुधों के स्वामी इंद्र को रक्षा के लिए प्रेरित करें. (१३) स नो वाजाय श्रवस इषे च राये धेहि द्युमत इन्द्र विप्रान्. भरद्वाजे नृवत इन्द्र सूरीन्दिवि च स्मैधि पार्ये न इन्द्र.. (१४) हे इंद्र! तुम शक्तिशाली एवं बुद्धिमान् हम लोगों को बल, शक्ति, अन्न एवं धन प्रदान करो. हम भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों को सेवकों तथा स्तुति करने वाले पुत्र-पौत्रों से युक्त करो एवं भविष्य में हमारी रक्षा करो. (१४) अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (१५) इस स्तुति द्वारा हम इंद्र द्वारा दिया हुआ अन्न प्राप्त करें एवं शोभन संतान वाले होकर सौ वर्ष तक प्रसन्न हों. (१५) सूक्त—१८ देवता—इंद्र तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजा वन्वन्नवातः पुरुहूत इन्द्रः. अषाळ्हमुग्रं सहमानमाभिर्गीर्भिर्वर्ध वृषभं चर्षणीनाम्.. (१) हे भरद्वाज ऋषि! उस इंद्र की स्तुति करो जो शत्रुओं को पराजित करने वाले, तेज से युक्त, शत्रुहिंसक, अपराजित एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए हैं. तुम इन स्तुतिवचनों द्वारा अपराजित, ओजस्वी, शत्रुनाशक एवं प्रजाओं की इच्छा पूर्ण करने वाले इंद्र को बढ़ाओ. (१) स युध्मः सत्वा खजकृत्समद्वा तुविम्रक्षो नदनुमाँ ऋजीषी. बृहद्रेणुश्च्यवनो मानुषीणामेकः कृष्टीनामभवत्सहावा.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

इंद्र! योद्धा, दाता, धूल उड़ाने वाले, यजमानों के साथ प्रसन्न, वर्षा द्वारा बहुतों को प्रसन्न करने वाले, गर्जनयुक्त, तीनों सवनों में सोम पीने वाले, युद्धकर्त्ता प्रमुख एवं मनु की सभी प्रजाओं के रक्षक हैं. (२) त्वं ह नु त्यददमायो दस्यूर्रैकः कृष्टीरवनोरायर्याय. अस्ति स्विन्नु वीर्यं१ तत्त इन्द्र न स्विदस्तितदृतुथा वि वोचः.. (३) हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम यज्ञकर्मरहित लोगों को शीघ्र वश में करो. एकमात्र तुम्हीं ने यज्ञकर्त्ताओं को पुत्र, वासादि दिए हैं. तुम में वह शक्ति अब है या नहीं. समय-समय पर तुम शक्ति को प्रकट करो. (३) सदिद्धि ते तुविजातस्य मन्ये सहः सहिष तुरतस्तुरस्य. उग्रमुग्रस्य तवसस्तवीयोऽरध्रस्य रध्रतुरो बभूव.. (४) हे शक्तिशाली इंद्र! बहुत से यज्ञों में प्रकट होने वाले एवं हमारे शत्रुओं की हिंसा करने वाले तुम में अधिक बल है, ऐसा मैं मानता हूं. तुम्हारा बल उग्र शत्रुओं द्वारा वश में न होने वाला एवं शत्रुओं को वश में करने वाला है. (४) तन्नः प्रत्नं सख्यमस्तु युष्मे इत्था वदद्भिर्वलमङ्गिरोभिः. हन्नच्युतच्युद्दश्मेषयन्तमृणोः पुरो वि दुरो अस्य विश्वाः.. (५) हे दृढ़ पर्वतों को गिराने वाले एवं दर्शनीय इंद्र! तुम्हारे साथ हमारी मित्रता चिरकाल तक रहे. तुमने स्तुतिकर्त्ता अंगिरागोत्रीय ऋषियों के ऊपर शस्त्र चलाने वाले बल नामक असुर को मारा एवं उसके सभी नगरों तथा उनके द्वारों को नष्ट कर दिया. (५) स हि धीभिर्हव्यो अस्त्युग्र ईशानकृन्महति वृत्रतूर्ये. स तोकसाता तनये स वज्री वितन्तसाय्यो अभवत्समत्सु.. (६) हे ओजस्वी एवं स्तोताओं को समर्थ बनाने वाले इंद्र! तुम महान् संग्राम में स्तोताओं द्वारा बुलाए जाते हो. पुत्र एवं पौत्र प्राप्ति के लिए बुलाए जाने वाले वज्रधारी इंद्र विशेषरूप से वंदनीय हैं. (६) स मज्मना जनिम मानुषाणाममर्त्येन नाम्नाति प्र सर्स्रे. स द्युम्नेन स शवसोत राया स वीर्येण नृतमः समोकाः.. (७) इंद्र ने अपने अविनाशी एवं शत्रुओं को झुकाने वाले बल से मानवसमूहों पर अधिकार पाया है. इंद्र यश, बल, धन एवं वीर्य से नेताओं में श्रेष्ठ तथा साथ निवास करने वाले बनते हैं. (७) स यो न मुहे न मिथू जनो भूत्सुमन्तुनामा चुमुरिं धुनिं च. ebook converter DEMO Watermarks*

वृणक्पिप्रुं शम्बरं शुष्णमिन्द्रः पुरां च्यौत्नाय शयथाय नू चित्.. (८) वे इंद्र युद्ध में कभी कर्त्तव्य विमुख नहीं होते एवं मिथ्या वस्तुओं को जन्म नहीं देते. प्रसिद्ध नाम वाले इंद्र ने चुमुरि, पिप्रु, शंबर, शुष्ण एवं धुनि नामक राक्षसों को मारा है. वे उनके नगरों को गिराने एवं उन शत्रुओं को मारने के लिए शीघ्र काम करते हैं. (८) उदावता त्वक्षसा पन्यसा च वृत्रहत्याय रथमिन्द्र तिष्ठ. धिष्व वज्रं हस्त आ दक्षिणत्राभि प्र मन्द पुरुदत्रा माया:.. (९) हे उन्नतशील एवं शत्रुनाशक बल से युक्त इंद्र! तुम वृत्र को मारने के लिए रथ पर बैठो एवं अपने दाहिने हाथ में वज्र धारण करो. हे विशाल धन के स्वामी इंद्र! तुम असुरों की माया को समाप्त करो. (९) अग्निर्न शुष्कं वनमिन्द्र हेती रक्षो नि धक्ष्यशनिर्न भीमा. गम्भीरय ऋष्वया यो रुरोजाध्वानयद्दुरिता दम्भयच्च.. (१०) हे वज्र के समान भयानक इंद्र! अग्नि जिस प्रकार सूखे वन को जला देती है, उसी प्रकार तुम अपने वज्र से राक्षसों को जलाओ. इंद्र ने अपराजित एवं महान् वज्र द्वारा शत्रुओं को नष्ट किया. संग्राम में गर्जन करने वाले इंद्र शत्रुओं का भेदन करते हैं. (१०) आ सहस्रं पथिभिरिन्द्र राया तुविद्युम्न तुविवाजेभिरर्वाक्. याहि सूनो सहसो यस्य नू चिद्देव ईशे पुरुहू योतो:.. (११) हे बहुधनसंपन्न, बल के पुत्र एवं बहुतों द्वारा पुकारे गए इंद्र! कोई भी असुर तुम्हें बलरहित नहीं कर सकता. तुम धनयुक्त होकर हजारों सवारियों द्वारा शीघ्र हमारे सामने आओ. (११) प्र तुविद्युम्नस्य स्थविरस्य घृष्वेर्दिवो ररप्शे महिमा पृथिव्याः. नास्य शत्रुर्ना प्रतिमानमस्ति न प्रतिषिः पुरुमायस्य सह्योः.. (१२) परम यशस्वी, उन्नतिशील एवं शत्रुपराभवकारी इंद्र की महिमा धरती-आकाश से भी महान् है. अधिक बुद्धि वाले एवं शत्रुनाशक इंद्र को न कोई मारने वाला है, न समानता करने वाला है और न आश्रय है. (१२) प्र तत्ते अद्या करणं कृतं भूत्कुत्सं यदायुमतिथग्वमस्मै. पुरू सहस्रा नि शिशा अभि क्षामूर्त्तूर्वाणं धृषता निनेथ.. (१३) हे इंद्र! आज तुम्हारा वह कर्म प्रकाशित होता है. तुमने शुष्ण असुर से कुत्स को, शत्रुओं से आयु एवं दिवोदास को बचाया था. तुमने अतिथिग्व राजा को शंबर राक्षस का धन दिलाया. हे इंद्र! तुम्हारे पराभवकारी वज्र ने शंबर को मारकर धरती पर तेज चलने वाले ebook converter DEMO Watermarks*

दिवोदास को विपत्ति से बचाया. (१३) अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम्. करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वे गृणानः.. (१४) हे इंद्र! सभी स्तोता इस समय मेघ का भेदन करने के लिए तुझ परम मेधावी की स्तुति कर रहे हैं. तुम स्तुतियां सुनकर उसी समय दरिद्र तथा पीड़ित यजमान एवं उसकी संतान को धन देते हो. (१४) अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः. कृष्वा कृत्नो अकृतं यत्ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञैः.. (१५) हे इंद्र! धरती, आकाश एवं मरणरहित समस्त देव तुम्हारे बल को स्वीकार करते हैं. हे बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम अपना अनकिया काम करो. इसके बाद तुम यज्ञों में अधिक नवीन स्तोत्र को जन्म दो. (१५) सूक्त—१९ देवता—इंद्र महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः. अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१) जैसे राजा मनुष्यों की कामना पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं की इच्छा पूरी करने वाले इंद्र आवें. दोनों लोकों में पराक्रम दिखाने वाले एवं शत्रुसेनाओं द्वारा अपराजित इंद्र हमारे सामने वीरता के कार्यों के लिए बढ़ते हैं. विस्तृत शरीर एवं गुणों वाले इंद्र को यजमान भली प्रकार जानते हैं. (१) इन्द्रमेव धिषणा सातये धाद्बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्. अषाळ्हेन शवसा शूशुवांसं सद्यश्चिद्यो वावृधे असामि.. (२) हमारी स्तुति दान के निमित्त महान्, गमनशील, युवा एवं शत्रुओं द्वारा अपराजित बल से उन्नत इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र उत्पन्न होते ही अधिक मात्रा में बढ़ गए थे. (२) पृथू करस्ना बहुला गभस्ती अस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि. यूथेव पश्वः पशूपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या ववृत्स्वाजौ.. (३) हे शांत मन वाले इंद्र! तुम अन्न देने के लिए अपने विस्तीर्ण, कार्यकुशल एवं अधिक देने वाले हाथों को हमारे सामने करो. जिस प्रकार ग्वाला पशुओं के समूह को हांकता है, उसी प्रकार तुम युद्ध में हमारा संचालन करो. (३) तं व इन्द्रं चतिनमस्य शाकैरहि नूनं वाजयन्तो हुवेम. ebook converter DEMO Watermarks*

यथा चित्पूर्वे जरितार आसुरनेद्या अनवद्या अरिष्टाः.. (४) अन्न के अभिलाषी हम स्तोता इस यज्ञ में मरुतों सहित शत्रुनाशक एवं प्रसिद्ध इंद्र को बुलाते हैं. हे इंद्र! प्राचीन स्तोता जिस प्रकार निंदा, पाप एवं हिंसारहित उत्पन्न हुए थे, उसी प्रकार हम भी हों. (४) धृतव्रतो धनदाः सोमवृद्धः स हि वामस्य वसुनः पुरुक्षुः. सं जग्मिरे पथ्या३ रायो अस्मिन्त्समुद्रे न सिन्धवो यादमानाः.. (५) इंद्र यज्ञकर्मधारक, धन देने वाले, सोमरस द्वारा उन्नत, अभिलषित धन के स्वामी एवं अधिक अन्न वाले हैं. स्तोताओं का हित करने वाले धन उसी प्रकार इंद्र के समीप जाते हैं, जिस प्रकार बहती हुई नदियां सागर में मिलती हैं. (५) शविष्ठं न आ भर शूर शव ओजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम्. विश्वा द्युम्ना वृष्ण्या मानुषाणामस्मभ्यं दा हरिवो मादयध्यै.. (६) हे शूर इंद्र! हमें सर्वश्रेष्ठ बल दो. हे शत्रु पराजयकारी इंद्र! हमें असह्य एवं उत्तम ओज दो. हे हरि नामक अश्वों के स्वामी! हमें प्रसन्न करने के लिए मानवकामनाओं के पूरक सभी धन दो. (६) यस्ते मदः पृतनाषाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम्. येन तोकस्य तनयस्य सातौ मंसीमहि जिगीवांसस्त्वोताः.. (७) हे इंद्र! तुम्हारा जो उत्साह शत्रु-सेनाओं को नष्ट करने वाला एवं अपराजित है, उस बढ़े हुए उत्साह को हमें दो. हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर उसी उत्साह के कारण पुत्र एवं पौत्र के लाभ के लिए तुम्हारी स्तुति करेंगे. (७) आ नो भर वृषणं शुष्ममिन्द्र धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम्. येन वंसाम पृतनासु शत्रून्तवोतिभिरुत जामीँरजामीन्.. (८) हे इंद्र! हमें अभिलाषापूरक, धनपालक, उन्नत एवं परमदक्ष सैन्यशक्ति प्रदान करो. तुम्हारी रक्षाओं के कारण हम उस सैन्यशक्ति द्वारा बंधुओं एवं शत्रुओं का नाश करें. (८) आ ते शुष्मो वृषभ एतु पश्चादोत्तरादधरादा पुरस्तात्. आ विश्वतो अभि समेत्वर्वाङिन्द्र द्युम्नं संवद्वेह्यस्मै.. (९) हे इंद्र! तुम्हारा कामवर्षी बल पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं पूर्व दिशा से हमारे सामने आवे, वह बल सभी ओर से हमारे समीप आवे. तुम हमें सभी सुखों से युक्त धन दो. (९) नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वंसीमहि वामं श्रोमतेभिः. ebook converter DEMO Watermarks*

ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्धा रत्नं महि स्थूरं बृहन्तम्.. (१०) हे इंद्र! हम तुम्हारी उत्तम रक्षाओं द्वारा सेवकों एवं यशों से युक्त धन का उपभोग करें. हे राजन्! तुम दिव्य एवं पार्थिव धन के स्वामी हो. इसलिए हमें महान्, विपुल एवं गुणयुक्त धन दो. (१०) मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यं शासमिन्द्रम्. विश्वासहमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह तं हुवेम.. (११) हम नवीन रक्षा प्राप्त करने के लिए इस यज्ञ में मरुतों सहित, कामवर्षी उन्नत, शत्रुओं द्वारा अपमानरहित, तेजस्वी, शासक, सबको पराजित करने वाले उग्र एवं बलप्रद इंद्र को बुलाते हैं. (११) जनं वज्रिन्महि चिन्मन्यमानमेभ्यो नृभ्यो रन्धया येष्वस्मि. अधा हि त्वा पृथिव्यां शूरसातौ हवामहे तनये गोष्वप्सु.. (१२) हे वज्रधारी इंद्र! हम जिन लोगों में रहते हैं, उनकी अपेक्षा स्वयं को बड़ा समझने वाले व्यक्ति को तुम वश में करो. हम इस समय युद्ध में पुत्रों, गायों, एवं जल को पाने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (१२) वयं त एभिः पुरुहूत सख्यैः शत्रोः शत्रोरुत्तर इत्स्याम. घ्नन्तो वृत्राण्युभयानि शूर राया मदेम बृहता त्वोताः.. (१३) हे बहुतों द्वारा बुलाए हुए इंद्र! हम मित्रता के परिचायक इन स्तुति वचनों द्वारा तुम्हारी सहायता से अपने सभी शत्रुओं को मारते हुए उनसे श्रेष्ठ बनें. हे शूर इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर महान् धन से प्रसन्न हों. (१३) सूक्त—२० देवता—इंद्र द्यौर्न य इन्द्राभि भूमार्यस्तस्थौ रयिः शवसा पृत्सु जनान्. तं नः सहस्रभरमुर्वरासां दद्धि सूनो सहसो वृत्रतुरम्.. (१) हे बलपुत्र इंद्र! हमें ऐसा पुत्र दो जो संग्राम में शत्रुओं पर उसी प्रकार आक्रमण कर सके, जिस प्रकार सूर्य प्राणियों को आक्रांत करते हैं. वह हजारों धनों का स्वामी, उपजाऊ धरती का अधिकारी एवं शत्रुओं का नाशक हो. (१) दिवो न तुभ्यमन्विन्द्र सत्रासुर्यं देवोभिर्धायि विश्वम्. अहिं यद्वृत्रमपो वव्रिवांसं हन्नृजीषिन्विष्णुना सचानः.. (२) हे इंद्र! यह बात सत्य है कि स्तुतिकर्त्ताओं ने तुम में सूर्य के समान बल धारण किया है. ebook converter DEMO Watermarks*

हे ऋजीषी इंद्र! तुमने विष्णु के साथ मिलकर जल को रोकने वाले वृत्र का नाश किया. (२) तूर्वन्नोजियान्तवसस्तवियान्कृतब्रह्मेन्द्रो वृद्धमहाः. राजाभवन्मधुनः सोम्यस्य विश्वासां यत्पुरां दर्तृमावत्.. (३) हिंसकों के हिंसक, परम ओजस्वी, अतिशय बलशाली एवं स्तोताओं को अन्न देने वाले इंद्र ने सभी पुरियों को विदीर्ण करने वाला वज्र प्राप्त किया, तभी वे मधुर सोम के राजा बने. (३) शतैरपद्रन्पणय इन्द्रात्र दशोणये कवयेऽर्कसातौ. वधैः शुष्णस्याशुषस्य मायाः पित्वो नारिरेचीत्किं चन प्र.. (४) हे इंद्र! बहुत अन्न देने वाले एवं मेधावी कुत्स से युद्ध करने वाले सौ सेनाओं के साथ पणि तुम्हारी सहायता के कारण भाग गए. इंद्र ने समस्त शक्तियों वाले शुष्ण असुर के कपटों को समाप्त करके उसका सभी अन्न छीन लिया. (४) महो द्रुहो अप विश्वायु धयि वज्रस्य यत्पतने पादि शुष्णः. उरु ष सरथं सारथये करिन्द्रः कुत्साय सूर्यस्य सातौ.. (५) शुष्ण असुर जब वज्र लगने से धरती पर गिरा, तब उसकी सब शक्ति नष्ट हो गई. इंद्र ने सूर्य को प्राप्त करने के निमित्त अपने सारथि कुत्स द्वारा रथ आगे बढ़वाया. (५) प्र श्येनो न मदिरमंशुमस्मै शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन्. प्रावन्नमीं साप्यं ससन्तं पृणग्राया समिषा सं स्वस्ति.. (६) गरुड़ इंद्र के लिए नशीला सोम लाए. इंद्र ने भी उपद्रवी नमुचि का शिर मथ डाला एवं सय के पुत्र निमि नामक ऋषि की सोते समय प्राण रक्षा की. साथ ही उसे धन, अन्न एवं कल्याणों से युक्त किया. (६) वि पिप्रोरहिमायस्य दृळ्हाः पुरो वज्रिञ्छवसा न दर्दः. सुदामन्तद्रेक्णो अप्रमृष्यमृजिश्वने दात्रं दाशुषे दाः.. (७) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने अधिक माया वाले पिप्रु असुर के दृढ़ नगरों को अपने बल द्वारा तोड़ा था. हे शोभन दान वाले इंद्र! तुमने हव्य देने वाले ऋजिश्व्रा नामक राजा को बाधारहित धन दिया था. (७) स वेतसुं दशमायं दशोणिं तूतूजिमिन्द्रः स्वभिष्टिसुम्नः. आ तुग्रं शश्वदिभं द्योतनाय मातुर्र्न सीमुप सृजा इयध्यै.. (८) मनचाहा सुख देने वाले इंद्र ने अति धनी वेतसु, दशोणि, तूतूजि, तुग्र एवं इभ नामक ebook converter DEMO Watermarks*

असुरों को द्योतन राजा के समीप जाने को इस प्रकार विवश कर दिया था, जिस प्रकार पुत्र माता के पास जाने को विवश होता है. (८) स ईं स्पृधो वनते अप्रतीतो बिभ्रद्वज्रं वृत्रहणं गभस्तौ. तिष्ठद्धरी अध्यस्तेव गर्ते वचोयुजा वहत इन्द्रमृष्वम्.. (९) शत्रुओं द्वारा अपराजित इंद्र अपने हाथ में शत्रुमारक वज्र को धारण करके शत्रुओं का हनन करते हैं. शूर जिस प्रकार रथ में बैठता है, उसी प्रकार इंद्र अपने घोड़ों पर बैठते हैं. केवल वचन द्वारा चलने वाले वे घोड़े इंद्र को ढोवें. (९) सनेम तेऽवसा नव्य इन्द्र प्र पूरवः स्तवन्त एना यज्ञैः. सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्द्दून्दोसीः पुरुकुत्साय शिक्षन्.. (१०) हे इंद्र! तुम्हारी रक्षा के कारण हम नवीन धन का उपभोग करते हैं. स्तोता लोग इन स्तोत्रों वाले यज्ञों में तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुमने यज्ञकर्म में बाधा डालने वाली शत्रु प्रजाओं को मारकर पुरुकुत्स राजा को धन दिया. तुमने शरत असुर के सात नगरों को वज्र द्वारा तोड़ा था. (१०) त्वं वृध इन्द्र पूर्व्यो भूर्वरिवस्यन्नुशने काव्याय. परा नववास्त्वमनुदेयं महे पित्रो ददाथ स्वं नपातम्.. (११) हे इंद्र! प्राचीनकाल में तुमने कविपुत्र उशना को धन देने की इच्छा से स्तोताओं को बढ़ाया था एवं नववास्त्व नामक असुर को मारकर शत्रुओं द्वारा पकड़े हुए पुत्र को उशना के पास पहुंचाया (११) त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्ऋणोरपः सीरा न स्रवन्तीः. प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति.. (१२) हे इंद्र! तुम शत्रुओं को कंपाने वाले हो. तुमने ध्वनि नामक असुर द्वारा रोकी हुई नदियों को प्रवाहित बनाया. हे शूर इंद्र! जब तुम समुद्र लांघकर पार जाते हो, तब तुम यदु और तुर्वसु को सागर पार कराते हो. (१२) तव ह त्यदिन्द्र विश्वमाजौ सस्तो धुनीचुमुरी या ह सिष्वप्. दीदयदित्तुभ्यं सोमेभिः सुन्वन्दभीतिरिध्मभृतिः पक्थ्य१ कैः.. (१३) हे इंद्र! संग्राम में तुम्हारे ही कार्य प्रसिद्ध हैं. संग्राम में तुमने धुनि एवं चुमुरि नामक असुरों को सुलाया था. समिधाएं एकत्र करने वाले तथा हव्यान्न पकाने वाले दभीति राजा ने सोमरस निचोड़कर तुम्हें तेजस्वी बनाया था. (१३) सूक्त—२१ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

इमा उ त्वा पुरुतमस्य कारोर्हव्यं वीर हव्या हवन्ते. धियो रथेष्ठामजरं नवीयो रयिर्विभूतिरीयतो वचस्या.. (१) हे शूर इंद्र! अधिक यज्ञकर्म की अभिलाषा करने वाले भरद्वाज नामक स्तोता की प्रशंसनीय स्तुतियां तुझ बुलाने योग्य को बुलाती हैं. हे रथ में बैठे हुए, जरारहित एवं अतिशय नवीन इंद्र! श्रेष्ठ विभूतियां हव्यान्न के रूप में तुम्हें प्राप्त होती हैं. (१) तमु स्तुष इन्द्र यो विदानो गिर्वाहसं गीर्भिर्यज्ञवृद्धम्. यस्म दिवमति मह्ना पृथिव्याः पुरुमायस्य रिरिचे महित्वम्.. (२) हम उन इंद्र की स्तुति करते हैं जो सब कुछ जानते हैं, स्तुतियों द्वारा पाने योग्य हैं एवं यज्ञों द्वारा उन्नत हुए हैं. परम बुद्धिमान् इंद्र की महत्ता धरती और आकाश से भी अधिक है. (२) स इत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुनवच्चकार. कदा ते मर्ता अमृतस्य धामेयक्षन्तो न मिनन्ति स्वधावः.. (३) इंद्र ने ही ज्ञाननाशक एवं वृत्र द्वारा विस्तृत अंधकार को सूर्य के द्वारा प्रकाशवान् बनाया है. हे बलशाली एवं मरणरहित इंद्र! तुम्हारे स्वर्ग के उद्देश्य से यज्ञ करने के इच्छुक लोग किसी की हिंसा नहीं करते. (३) यस्ता चकार स कुह स्विदिन्द्रः कमा जनं चरति कासु विक्षु. कस्ते यज्ञो मनसे शं वराय को अर्क इन्द्र कतमः स होता.. (४) जिस इंद्र ने प्रसिद्ध कर्म किए हैं वे कहां हैं, किन लोगों के बीच घूमते हैं एवं किस दिशा में स्थित हैं? इंद्र! कौन सा यज्ञ तुम्हारे मन को सुख देता है? कौन सा मंत्र तुम्हारा वरण करता है? तुम्हें वरण करने वाला होता कौन सा है? (४) इदा हि ते वेविषतः पुराजाः प्रत्नास आसुः पुरुकुत्सखायः. ये मध्यमास उत नूतनास उतावमस्य पुरुहूत बोधि.. (५) हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! पूर्व काल में उत्पन्न होने वाले अंगिरा आदि प्राचीन ऋषियों ने वर्तमान काल के समान कार्य करके तुम्हारी मित्रता प्राप्त की थी. मध्यकालीन एवं नवीन ऋषियों ने भी तुम्हारी स्तुति की है. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम मुझ अर्वाचीन भरद्वाज की स्तुतियों को जानो. (५) तं पृच्छन्तोऽवरासः पराणि प्रत्ना त इन्द्र श्रुत्यानु येमुः. अर्चामसि वीर ब्रह्मवाहो यादेव विद्म तात्त्वा महान्तम्.. (६) हे शूर, मंत्रों द्वारा प्राप्त करने योग्य एवं उक्त गुणों से युक्त इंद्र! नवीन ऋषि तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*

स्तुति करते हुए तुम्हारे प्राचीन एवं उत्कृष्ट कार्यों को मंत्र वचनों के द्वारा बांधने का प्रयत्न करते हैं. हम जो बातें जानते हैं, उन्हीं के द्वारा तुझ महान् की पूजा करते हैं. (६) अभि त्वा पाजो रक्षसो वि तस्थे महि जज्ञानमभि तत्सु तिष्ठ. तव प्रत्नेन युज्येन सख्या वज्रेण धृष्णो अप ता नुदस्व.. (७) हे इंद्र! राक्षसों की सेना तुम्हारे सामने खड़ी होती है. तुम भी उस महान् एवं उन्नत सेना के सामने डट जाओ. हे शत्रु पराभवकारी इंद्र! तुम प्राचीन, साथ रखने योग्य एवं नित्य- सहायक वज्र द्वारा उन्हें दूर भगाओ. (७) स तु श्रुधीन्द्र नूतनस्य ब्रह्मण्यतो वीर कारुधायः. त्वं ह्या३ पिः प्रदिवि पितॄणां शश्वद्बभूथ सुहव एष्टौ.. (८) हे स्तोताओं के रक्षक एवं वीर इंद्र! आधुनिक एवं स्तुति करने के इच्छुक हम लोगों के वचनों को तुम सुनो. तुम्हीं यज्ञ में सुंदर आह्वान सुनकर अंगिरागोत्रीय ऋषियों के चिरकाल बंधु बने थें. (८) प्रोतये वरुणं मित्रमिन्द्रं मरुतः कृष्वावसे नो अद्य. प्र पूषणं विष्णुमग्निं पुरन्धिं सवितारमोषधीः पर्वतांश्च.. (९) हे भरद्वाज! हमारी रक्षा के लिए तुम इस समय वरुण, मित्र, मरुद्गण, पूषा, विष्णु, सर्वप्रमुख-अग्नि, सविता, ओषधियों एवं पर्वतों को स्तुति द्वारा प्रसन्न करो. (९) इम उ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरितारो अभ्यर्चन्त्यर्कैः. श्रुधी हवमा हुवतो हुवानो न त्वावाँ अन्यो अमृत त्वदस्ति.. (१०) हे परम शक्तिशाली एवं अतिशय यज्ञपात्र इंद्र! ये स्तोता लोग स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. हे मरणरहित इंद्र! स्तुति का विषय बनकर तुम मुझ स्तोता की पुकार सुनो. तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है. (१०) नू म आ वाचमुप याहि विद्वान् विश्वेभिः सूनो सहसो यजत्रैः. ये अग्निजिह्वा ऋतसाप आसुर्यं मनुं चक्रुरुपरं दसाय... (११) हे बलपुत्र एवं विद्वान् इंद्र! तुम सभी देवों के साथ शीघ्र मेरे स्तुति वचनों के सामने आओ. अग्नि उन देवों की जीभ है, जो यज्ञ का स्पर्श करते हैं एवं जिन्होंने शत्रुनाश के हेतु मनु को असुरों की अपेक्षा शक्तिशाली बनाया. (११) स नो बोधि पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानः. ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*