ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हें न देवता व्याप्त कर सकते हैं और न मनुष्य, तुम अपनी शक्ति द्वारा सभी प्राणियों को पराजित करते हो. देवगण तुम्हें व्याप्त नहीं कर सकते. (९) विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरं सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे. क्रत्वा वरिष्ठं वर आमुरिमुताग्रमोजिष्ठं तवसं तरस्विनम्.. (१०) सभी सेनाएं मिलकर शत्रुपरभवकारी एवं सबके नेता इंद्र को आयुध आदि द्वारा शक्तिशाली बनाते हैं तथा स्तोता अपने यज्ञ को प्रकाशपूर्ण बनाने के लिए सूर्यरूप इंद्र को उत्पन्न करते हैं. स्तोता कर्मों द्वारा बलशाली, अभिमुख होकर शत्रुहंता उग्र, अतिशय तेजस्वी, उन्नतिशील एवं वेगशाली इंद्र की स्तुति धन पाने के लिए करते हैं. (१०) समीं रेभासो अस्वरन्निन्द्रं सोमस्य पीतये. स्वर्पतिं यदीं वृधे धृतव्रतो ह्योजसा समूतिभिः.. (११) रेभ ऋषि ने सोमरस पीने के लिए इंद्र की भली-भांति स्तुति की थी. जब लोग हवि बढ़ाने के लिए स्वर्गरक्षक इंद्र की स्तुति करते हैं, तब व्रतधारी इंद्र शक्ति और रक्षासाधन लेकर उनसे मिलते हैं. (११) नेमिं नमन्ति चक्षसा मेशं विप्रा अभिश्वरा. सुदीतयो वो अद्रुहोऽपि कर्णे तरस्विनः समृक्वभिः.. (१२) स्तोता नमनशील इंद्र को देखते ही नमस्कार करते हैं. मेधावी ब्राह्मण मेघ के समान उपकारी इंद्र को देखकर स्तुतियां बोलते हैं. हे शोभन दीप्ति वाले, द्रोहरहित एवं शीघ्रता करने वाले स्तोताओ! तुम इंद्र के कान के पास ऋग्वेद के पूजामंत्र बोलो. (१२) तमिन्द्रं जोहवीमि मघवानमुग्रं सत्रा दधानमप्रतिष्कुतं शवांसि. मंहिष्ठो गीर्भीरा च यज्ञियो ववर्त्तद्राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री.. (१३) मैं उस शक्तिशाली, धनस्वामी, सच्चा बल धारण करने वाले एवं शत्रुओं द्वारा न रोके जाने वाले इंद्र को बुलाता हूं. अतिशय पूज्य एवं यज्ञ के योग्य इंद्र हमारी स्तुतियां सुनकर सामने आवें. वज्रधारी इंद्र सभी मार्गों को हमारी धनप्राप्ति के लिए शोभन बनावें. (१३) त्वं पुर इन्द्र चिकिदेना व्योजसा शविष्ठ शक्र नाशयध्यै. त्वद्विश्वानि भुवनानि वज्रिन् द्यावा रेजेते पृथिवी च भीषा.. (१४) हे अतिशय बलशाली एवं शत्रुमारणसमर्थ इंद्र! तुम शंबर की इन नगरियों को शक्ति द्वारा नष्ट करना जानते हो. हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारे भय से सभी प्राणी एवं द्यावा-पृथिवी कांपते हैं. (१४) तन्म ऋतमिन्द्र शूर चित्र पात्वपो न वज्रिन्दुरिताति पर्षि भूरि. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—८७ देवता—इंद्र
कदा न इन्द्र राय आ दशस्येर्विश्वप्स्न्यस्य स्पृहयाय्यस्य राजन्.. (१५) हे शूर एवं विविध रूपधारी इंद्र! तुम्हारा प्रसिद्ध सत्य मेरी रक्षा करे. हे वज्रधारी इंद्र! नाविक जिस प्रकार जल से पार करता है, उसी प्रकार तुम हमें महान् पाप से पार करो. हे राजा इंद्र! तुम विविध रूप वाला एवं अभिलाषा करने योग्य धन हमें कब दोगे? (१५) सूक्त—८७ देवता—इंद्र इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्. धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे.. (१) हे उद्गाताओ! मेधावी, महान्, यज्ञकर्मकर्त्ता, विद्वान् एवं स्तोत्रों के अभिलाषी इंद्र को बृहत् साम गाकर सुनाओ. (१) त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचय:. विश्वकर्मा विश्वदेवो मवाँ असि.. (२) हे इंद्र! तुम शत्रुओं को हराने वाले हो. तुमने सूर्य को तेजस्वी बनाया है. तुम विश्वकर्मा, विश्वदेव एवं महान् हो. (२) विभ्राजञ्ज्योतिषा स्वर्अगच्छो रोचनं दिव:. देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे.. (३) हे इंद्र! तुम अपनी ज्योति द्वारा सूर्य के प्रकाशक बनकर स्वर्ग को दीप्तिशाली बनाने गए थे. देवों ने तुम्हारी मित्रता के लिए प्रयत्न किया था. (३) एन्द्र नो गधि प्रिय: सत्राजिदगोह्य:. गिरिनं विश्वतस्पृथु: पतिर्दिव:.. (४) हे प्रियतम, महान् लोगों को जीतने वाले, किसी के द्वारा न छिपने वाले, पर्वत के समान चारों ओर विस्तृत एवं स्वर्ग के स्वामी इंद्र! तुम हमारे पास आओ. (४) अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी. इन्द्रासि सुन्वतो वृध: पतिर्दिव:.. (५) हे सत्यरूप वाले एवं सोमपानकर्त्ता इंद्र! तुमने द्यावा-पृथिवी को पराजित किया है. तुम सोमरस निचोड़ने वाले के वर्धक एवं स्वर्ग के स्वामी हो. (५) त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि. हन्ता दस्योर्मनोर्वृध: पतिर्दिव:.. (६) हे इंद्र! तुम शत्रुओं की अनेक नगरियों को तोड़ने वाले हो. तुम दस्युजनों के हंता, मनुष्यों को बढ़ाने वाले और स्वर्ग के स्वामी हो. (६) अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान्मह: ससृज्महे. उदेव यन्त उदभि:.. (७) हे स्तुति-योग्य इंद्र! जिस प्रकार जलक्रीड़ा करते हुए लोग दूसरों पर जल उछालते हैं, ebook converter DEMO Watermarks*
उसी प्रकार हम महान् एवं चाहने योग्य स्तोत्र तुम्हारी ओर भेजते हैं. (७) वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वान्सं चिदद्रिवो दिवेदिवे.. (८) हे शूर एवं वज्रधारी इंद्र! जिस प्रकार नदियां जल से सागर को बढ़ाती हैं, उसी प्रकार स्तोता तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम स्तोत्रों द्वारा बढ़ने वाले हो. (८) युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे. इन्द्रवाहा वचोयुजा.. (९) स्तोता गतिशील इंद्र के विशाल जुए वाले महान् रथ में इंद्र को ढोने वाले एवं आज्ञा मात्र से जुड़ जाने वाले हरि नामक अश्वों को स्तोत्रों के साथ जोड़ते हैं. (९) त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे. आ वीरं पृतनाषहम्.. (१०) हे बहु कर्म करने वाले, विशेषरूप से देखने वाले, शक्तियुक्त एवं सेना को पराजित करने वाले इंद्र! हम तुमसे शक्ति और बल मांगते हैं. (१०) त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ. अधा ते सुम्नमीमहे.. (११) हे निवासस्थान देने वाले एवं बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम हमारे पिता एवं माता बनो. हम तुमसे सुख की याचना करेंगे. (११) त्वां शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो. स नो रास्व सुवीर्यम्.. (१२) हे शक्तिशाली, बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम बल की इच्छा करने वाले हो. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें शोभन संतान वाला धन दो. (१२) सूक्त—८८ देवता—इंद्र त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन्भूर्णयः. स इन्द्र स्तोमवाहसामिह श्रुध्युप स्वसरमा गहि.. (१) हे वज्रधारी इंद्र! हवि धारण करने वाले यजमानों ने तुम्हें आज और कल सोमरस पिलाया था. तुम हम स्तोत्रधारियों की स्तुतियां सुनो एवं हमारे घर के पास आओ. (१) मत्स्वा सुशिप्र हरिवस्तदीमहे त्वे आ भूषन्ति वेधसः. तव श्रवांस्युपमान्युक्थ्या सुतेष्विन्द्र गिर्वणः.. (२) हे शोभन साफा वाले, घोड़ों के स्वामी एवं स्तुतियोग्य इंद्र! सेवक तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ते हैं. तुम उसे पीकर प्रसन्न बनो, हम तुमसे यही याचना करते हैं. सोमरस निचुड़ जाने पर तुम्हारे अन्न उपमायोग्य एवं प्रशंसनीय हों. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
श्रायन्तइव सूर्य्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत. वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. (३) हे सेवको! सूर्य की किरणें जिस प्रकार सूर्य से मिली रहती हैं, उसी प्रकार तुम सूर्य के सभी धनों का भोग करो. इंद्र ने शक्ति द्वारा धन उत्पन्न किए हैं. भविष्य में भी वह धन उत्पन्न करेंगे. हम उनका धन पैतृक भाग के समान लेंगे. (३) अनर्शरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः. सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्.. (४) हे स्तोता! इंद्र की स्तुति करो. वह पापरहित को धन देते हैं एवं दानशील हैं. इंद्र का दान कल्याणकारी है. इंद्र यजमान के लिए धन देने को अपने मन को प्रेरित करते हैं, उसकी अभिलाषाओं में बाधा नहीं डालते. (४) त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः. अशास्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (५) हे इंद्र । तुम युद्धों में सभी शत्रुसेनाओं को पराजित करते हो. हे शत्रुबाधक इंद्र! तुम दैत्यहंता, असुरों के शत्रुओं को उत्पन्न करने वाले एवं समस्त शत्रुओं के हिंसक हो. (५) अनु ते शुष्मं तुरयन्तमियतूः क्षोणी शिशुं मातरा. विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार माता पुत्र के पीछे चलती है, उसी प्रकार द्यावा-पृथिवी तुम्हारी शत्रुनाशक बल के पीछे चलती हैं. हे इंद्र! जब तुम वृत्र का वध करते हो, तब तुम्हारे क्रोध को देखकर सभी सेनाएं छिन्न होती हैं. (६) इत ऊती वो अजरं प्रहेतारमप्रहितम्. आशुं जेतारं हेतारं रथीतममतूर्तं तुग्र्यावृधम्.. (७) हे सेवको! तुम अपनी रक्षा के लिए जरारहित, शत्रुओं को भगाने वाले, किसी से प्रभावित न होने वाले, शीघ्रगामी, शत्रुजयी व जल को बढ़ाने वाले इंद्र को आगे करो. (७) इष्कर्तारमनिष्कृतं सहस्कृतं शतमूर्तिं शतक्रतुम्. समानमिन्द्रमवसे हवामहे वसवानं वसूजुवम्.. (८) हम शत्रुविनाशक, दूसरों द्वारा नष्ट न होने वाले, अनेक रक्षासाधनों से युक्त, अनेक कर्मों वाले, सबके प्रति समान, धनों को घेरने वाले एवं यजमानों के पास धन भेजने वाले इंद्र को अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—८९ देवता—इंद्र
सूक्त—८९ देवता—इंद्र अयं त एमि तन्वा पुरस्ताद्विश्वे देवा अभि मा यन्ति पश्चात्. यदा मह्यं दीधरो भागमिन्द्रादिन्मया कृणवो वीर्याणि.. (१) हे इंद्र! मैं अपने पुत्र को साथ लेकर तुम्हारे आगे-आगे शत्रु को जीतने के लिए चलता हूं. सब देव मेरे पीछे चलते हैं. तुम शत्रुओं के हिस्से का धन मेरे लिए धारण करते हो, इसलिए मेरे साथ पौरुष दिखाओ. (१) दधामि ते मधुनो भक्षमग्रे हितस्ते भागः सुतो अस्तु सोमः. असश्च त्वं दक्षिणतः सखा मेऽधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि.. (२) हे इंद्र! मैं तुम्हारे लिए नशीले सोमरस का भाग सबसे पहले रखता हूं. निचोड़ा हुआ सोम तुम्हारे हृदय में स्थान पावे. तुम मित्र बनकर मेरी दाहिनी ओर बैठो. इसके बाद हम दोनों बहुत से राक्षसों को मारेंगे. (२) प्र सु स्तोमं भरत वाजयन्त इन्द्राय सत्यं यदि सत्यमस्ति. नेन्द्रो अस्तीति नेम उ त्व आह क ईं ददर्श कमभि ष्टवाम.. (३) हे युद्ध के इच्छुक लोगो! यदि इंद्र का होना सच्ची बात है तो उनके लिए सत्यरूप- स्तुतियां अर्पित करो. भृगु गोत्र वाले नेम ऋषि का कहना है कि इंद्र नहीं हैं. इंद्र को किसने देखा है? हम किसकी स्तुति करें? (३) अयमस्मि जरितः पश्य मेह विश्वा जातान्यभ्यस्मि मह्ना. ऋतस्य मा प्रदिशो वर्धयन्त्यादर्दिरो भुवना दर्दरीमि.. (४) इंद्र नेम के पास जाकर बोले—“हे स्तुति करने वाले नेम! मैं यहां हूं. यहां खड़े हुए मुझको देखो. मैं अपनी महिमा से संसार के सभी प्राणियों को पराजित करता हूं. यज्ञ का उपदेश करने वाले विद्वान् मुझे स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. विदीर्ण करने की आदत वाला मैं सब लोगों को विदीर्ण करता हूं.” (४) आ यन्मा वेना अरुहन्नृतस्यँ एकमासीनं हर्यतस्य पृष्ठे. मनश्चिन्मे हृद आ प्रत्यवोचदचिक़्रदञ्छिशुमन्तः सखायः.. (५) यज्ञ की कामना करने वाले लोगों ने सुंदर अंतरिक्ष की पीठ पर बैठे हुए मुझको जब उन्नत बनाया था, तब उन लोगों के मन ने मेरे हृदय से कहा था कि मेरे बच्चों वाले मित्र मेरे लिए रो रहे हैं. (५) विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या या चकर्थ मघवन्निन्द्र सुन्वते. ebook converter DEMO Watermarks*
पारावतं यत्पुरुसम्भृतं वस्वपावृणोः शरभाय ऋषिबन्धवे.. (६) हे धनस्वामी इंद्र! तुमने यज्ञों में सोमरस निचोड़ने वालों के लिए जो कुछ किया है, वे अनंत कर्म कहने योग्य हैं. परावत द्वारा एकत्र किया गया जो बहुत सा धन था, उसे तुमने ऋषियों के मित्र शरभ के लिए प्रकट किया था. (६) प्र नूनं धावता पृथङ्नेह यो वो अवावरीत्. नि षीं वृत्रस्य मर्मणि वज्रमिन्द्रो अपीपतत्.. (७) इस समय जो शत्रु दौड़ता है, जो यहां अलग स्थित नहीं है एवं जो तुम्हें आवृत नहीं करता, उस शत्रु के मर्मस्थान में इंद्र अपना वज्र मारते हैं. (७) मनोजवा अयमान आयसीमतरतत्पुरम्. दिवं सुपर्णो गत्वाय सोमं वज्रिण आभरत्.. (८) मन के समान वेगवाले गरुड़ चलते हुए लोगों से बनी नगरियों को पार कर गए. वे स्वर्ग में जाकर वज्रधारी इंद्र के लिए सोम लाए. (८) समुद्रे अन्तः शयत उदना वज्रो अभीवृतः. भरन्त्यस्मै संयतः पुरःप्रस्रवणा बलिम्.. (९) जो वज्र समुद्र के बीच में सोता है एवं जो जल से घिरा हुआ है, संग्राम में आगे चलने वाले शत्रु उसी वज्र का उपहार पाते हैं. (९) यद्वाग् वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा. चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम.. (१०) देवों को प्रसन्न करने वाली तेजपूर्ण वाणी न जाने हुए अर्थों को प्रकट करती हुई जिस समय यज्ञ में स्थित होती है, उस समय चारों दिशाएं इसके लिए अन्न और जल दुहती हैं. पता नहीं इसका श्रेष्ठ धन कहां जाता है? (१०) देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति. सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु.. (११) देवगण जिस दीप्ति वाली मध्यमा वाणी को उत्पन्न करते हैं, उसीको सब पशु बोलते हैं. प्रसन्न करने वाली वह वाणी अन्न एवं रस बरसाती हुई हमारे द्वारा स्तुत होकर गाय के समान हमारे पास आए. (११) सखे विष्णो वितरं वि क्रमस्व द्यौर्देहि लोकं वज्राय विष्कभे. हनाव वृत्रं रिणचाव सिन्धूनिन्द्रस्य यन्तु प्रसवे विसृष्टाः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मित्र विष्णु! तुम अधिक पराक्रम दिखाओ. हे द्युलोक! तुम वज्र को जाने के लिए स्थान दो. तुम और मैं दोनों वृत्र को मारेंगे व नदियों को सागर की ओर ले जाएंगे. नदियां इंद्र की आज्ञा के अनुसार बहें. (१२) सूक्त—९० देवता—मित्र व वरुण ऋधगित्था स मर्त्यः शशमे देवतातये. यो नूनं मित्रावरुणावभिष्ट्य आचक्रे हव्यदातये.. (१) जो मनुष्य यजमान की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए मित्र व वरुण को अपने सामने करता है, वह इस प्रकार यज्ञ के लिए हवि तैयार करता है, यह सत्य है. (१) वर्षिष्ठक्षत्रा उरुचक्षसा नरा राजाना दीर्घश्रुत्तमा. ता बाहुता न दंसना रथर्यतः साकं सूर्यस्य रश्मिभिः.. (२) अत्यंत बढ़े हुए बल वाले, देखने में विशाल, यज्ञकर्मों के नेता, दीप्तिशाली व अतिशय विद्वान् वे मित्र व वरुण दोनों भुजाओं के समान सूर्य की किरणों के साथ कर्म करते हैं. (२) प्र यो वां मित्रावरुणाजिरो दूतो अद्रवत्. अयःशीर्षा मदेरघुः.. (३) हे मित्र व वरुण! जो गतिशील यजमान तुम्हारे सामने जाता है, वह देवों का दूत होता है, उसका सिर सोने से सुशोभित होता है एवं नशीला सोम प्राप्त करता है. (३) न यः संपृच्छे न पुनर्हवीतवे न संवादाय रमते. तस्मान्नो अद्य समृतेरुरुष्यतं बाहुभ्यां न उरुष्यतम्.. (४) हे मित्र व वरुण! जो शत्रु भली प्रकार पूछने पर भी प्रसन्न नहीं होता और जो बार-बार बुलाने एवं बातचीत करने पर भी आनंदित नहीं होता, आज हमें उसके साथ युद्ध से बचाओ. हमें उसकी भुजाओं से बचाओ. (४) प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो. वरूथ्यं१ वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रं राजसु गायत.. (५) हे यज्ञरूपी धन वाले उद्गाताओ! तुम मित्र एवं अर्यमा के लिए सेवा करने योग्य एवं यज्ञशाला में उत्पन्न स्तुतियां सुनाओ. तुम वरुण के लिए प्रसन्नता देने वाले गीत गाओ एवं दीप्तिशाली मित्र, अर्यमा और वरुण की प्रशंसा करो. (५) ते हिन्विरे अरुणं जेन्यं वस्वेकं पुत्रं तिसृणाम्. ते धामान्यमृता मर्त्यानामदब्धा अभि चक्षते.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
वे देव पृथ्वी, अंतरिक्ष तथा द्युलोक तीनों को लाल रंग वाला, जय का साधन व निवासस्थान देने वाला एक सूर्यरूपी पुत्र देते हैं. वे मरणरहित एवं अपराजेय देवगण मनुष्यों के स्थानों को देखते हैं. (६) आ मे वचांस्युद्यता द्युमत्तमानि कत्वा. उभा यातं नासत्या सजोषा प्रति हव्यानि वीतये.. (७) हे सत्ययुक्त अश्विनीकुमारो! तुम दोनों एक साथ मेरे द्वारा कहे गए एवं परम दीप्तिशाली वचन सुनने के लिए, यज्ञकर्म देखने के लिए एवं हव्य खाने के लिए आओ. (७) रातिं यद्धामरक्षसं हवामहे युवाभ्यां वाजिनीवसू. प्राचीं होत्रां प्रतिरन्तावतं नरा गृणाना जमदग्निना.. (८) हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारा राक्षसों को न मिलने वाला दान जिस समय हम मांगेंगे, उस समय तुम जमदग्नि की पूर्व की ओर मुंह वाली स्तुति सुनकर उसे बढ़ाते हुए यज्ञ के नेता के रूप में आओ. (८) आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः. अन्तः पवित्र उपरि श्रीणानोऽयं शुक्रो अयामि ते.. (९) हे वायु! तुम हमारी शोभन स्तुतियां सुनकर हमारे स्वर्ग को छूने वाले यज्ञ में आओ. घी, वेदमंत्र, कुश आदि पवित्र वस्तुओं के बीच में स्थित यह उज्ज्वल सोम तुम्हारे लिए निश्चित है. (९) वेत्यध्वर्युः पथिभी रजिष्ठैः प्रति हव्यानि वीतये. अधा नियुत्व उभयस्य नः पिब शुचिं सोमं गवाशिरम्.. (१०) हे नियुत नाम अश्वों वाले वायु! अध्वर्यु अतिशय सरल मार्गों से जाता है एवं तुम्हारे खाने के लिए हव्य ले जाता है. तुम हमारे शुद्ध एवं गोदग्ध आदि से मिश्रित दोनों प्रकार के सोमरस को पिओ. (१०) बण्महाँ असि सूर्य बळादित्य महाँ असि. महस्ते सतो महिमा पनस्यतेऽद्धा देव महाँ असि.. (११) हे सूर्य! यह सत्य है कि तुम महान् हो. हे आदित्य! तुम महान् हो, यह सत्य है. तुम महान् हो इसलिए स्तोता तुम्हारी महिमा की प्रशंसा करते हैं. हे दीप्तिशाली सूर्य! तुम महान् हो, यह सत्य है. (११) बट् सूर्य श्रवसा महाँ असि सत्रा देव महाँ असि. मह्ना देवानामसूर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सूर्य! यह सत्य है कि तुम यश के कारण महान् हो. हे दीप्तिशाली सूर्य! यह सत्य है कि तुम महत्त्व वाले देवों में महान्, असुरों के हंता व देवों को हित का उपदेश देने वाले हो. तुम्हारा तेज महान् और किसी से हिंसित होने वाला नहीं है. (१२) इयं या नीच्यर्किणी रूपा रोहिण्या कृता. चित्रेव प्रत्यदर्शयत्यन्तर्दशसु बाहुषु.. (१३) सूर्य ने यह जो नीचे को मुख वाली, स्तुतियुक्त, रूप वाली एवं प्रकाशयुक्त उषा उत्पन्न की है, वह चितकबरी गाय के समान ब्रह्मांड के बीच में अनेक स्थानों वाली दसों दिशाओं में देखी जाती है. (१३) प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्य१न्या अर्कमभितो विविश्रे. बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेश.. (१४) तीन प्रजाएं अग्नि को पार करके चली गई हैं. अन्य प्रजाएं स्तुतियोग्य अग्नि के चारों ओर आश्रय लिए हुए हैं. महान् आदित्य भुवनों में स्थित हैं एवं वायु ने दिशाओं में प्रवेश किया है. (१४) माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः. प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट.. (१५) हे मनुष्यो! जो गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री आदित्यों की बहिन, दूध का निवासस्थान, अपराधरहित एवं हीनताहीन है, उस गाय का वध मत करो. यह बात मैंने बुद्धिमान् लोगों से कही थी. (१५) वचोविदं वाचमुदीरयन्तीं विश्वाभिर्धीभिरुपतिष्ठमानाम्. देवीं देवेभ्यः पर्येयुषीं गामा मावृक्त मर्त्यो दभ्रचेताः.. (१६) बोलने की शक्ति देने वाली, वचन उच्चारण करने वाली, सभी वचनों के साथ उपस्थित होने वाली, दीप्तिशालिनी एवं देवों के हित के लिए मुझे जानने वाली गाय का त्याग अल्प बुद्धि वाले लोग ही करते हैं. (१६) सूक्त—९१ देवता—अग्नि त्वमग्ने बृहद्वयो दधासि देव दाशुषे. कविर्गृहपतिर्युवा.. (१) हे दीप्तियुक्त, क्रांतकर्म वाले, गृहपालक व नित्ययुवा अग्नि! तुम इव्य देने वाले यजमान को अधिक अन्न देते हो. (१) स न ईळानया सह देवाँ अग्ने दुवस्युवा. चिकिद्भिभानवा वह.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे विशिष्ट दीप्ति वाले अग्नि! तुम जानने वाले बनकर हमारे सेवापूर्ण एवं स्तुतियुक्त वचनों से देवों को यहां लाओ. (२) त्वया ह स्विद्युजा वयं चोदिष्ठेन यविष्ठ्य. अभि षमो वाजसातये.. (३) हे अतिशय युवा एवं धनप्रेरकों में श्रेष्ठ अग्नि! हम तुम्हें सहायक के रूप में पाकर अन्न पाने के लिए शत्रुओं को पराजित करेंगे. (३) और्वभृगुवच्छुचिमप्रवानवदा हुवे. अग्निं समुद्रवाससम्.. (४) मैं समुद्र में रहने वाले एवं शुद्ध अग्नि को और्व, भृगु और अप्रवान ऋषियों के साथ बुलाता हूं. (४) हुवे वातस्वनं कविं पर्जन्यक्रन्दं सहः. अग्निं समुद्रवाससम्.. (५) मैं वायु के समान शब्द करने वाले, कवि, मेघ के समान गर्जन करने वाले, बली एवं समुद्र में निवास करने वाले अग्नि को बुलाता हूं. (५) आ सवं सवितुर्यथा भगस्येव भुजिं हुवे. अग्निं समुद्रवाससम्.. (६) मैं सागर में रहने वाले अग्नि को सूर्य के जन्म एवं भग नामक देव के भाग के समान बुलाता हूं. (६) अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम्. अच्छा नप्त्रे सहस्वते.. (७) हे ऋत्विजो! तुम शक्तिशालियों के बंधु, बलवान्, ज्वालाओं द्वारा बढ़ते हुए व अतिशय विशाल अग्नि के समीप जाओ. (७) अयं यथा न आभुवत्त्वष्टा रूपेव तक्ष्या. अस्य क्रत्वा यशस्वतः.. (८) हे ऋत्विजो! अग्नि के समीप इस प्रकार जाओ कि अग्नि हमारे कर्त्तव्यों को बढ़ावें. हम अग्नि संबंधी यज्ञकर्मों से अन्न वाले बनेंगे. (८) अयं विश्वा अभि श्रियोऽग्निर्देवेषु पत्यते. आ वाजैरुप नो गमत्.. (९) जो अग्नि देवों के समीप जाकर मनुष्यों की सभी संपत्तियां प्राप्त करते हैं, वही अग्नि अन्नों के साथ हमारे समीप आवें. (९) विश्वेषामिह स्तुहि होतॄणां यशस्तमम्. अग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (१०) हे स्तोता! इस यज्ञ में सभी होताओं में परम यशस्वी एवं यज्ञों में प्रधान अग्नि की स्तुति करो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
शीरं पावकशोचिषं ज्येष्ठो यो दमेष्वा. दीदाय दीर्घश्रुत्तमः.. (११) देवों में प्रमुख एवं विद्वानों में श्रेष्ठ अग्नि यज्ञकर्त्ताओं के घरों में प्रज्वलित होते हैं. हे स्तोताओ! पवित्र प्रकाश वाले एवं यज्ञशाला में सोने वाले अग्नि की स्तुति करो. (११) तमर्वन्तं न सानसिं गृणीहि विप्र शुष्मिणम्. मित्रं न यातयज्जनम्.. (१२) हे मेधावी स्तोता! तुम घोड़े के समान सेवा करने योग्य, शक्तिशाली एवं मित्र के समान शत्रुनाश करने वाले अग्नि की स्तुति करो. (१२) उप त्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः. वायोरनीके अस्थिरन्.. (१३) हे अग्नि! यजमान के निमित्त बोली गई स्तुतियां सगी बहनों के समान तुम्हारे गुण दिखाती हुई सेवा करती हैं एवं वायु के समीप स्थापित करती हैं. (१३) यस्य त्रिधात्ववृतं बर्हिस्तस्थावसन्दिनम्. आपश्चिन्नि दधा पदम्.. (१४) अग्नि के तीन कुश बंधनहीन एवं बिना ढके हैं. अग्नि में जल की भी स्थिति है. (१४) पदं देवस्य मीळ्हुषोऽनाधृष्टाभिरूतिभिः. भद्रा सूर्य इवोपदृक्.. (१५) अभिलाषापूरक एवं दीप्तियुक्त अग्नि का स्थान शत्रुओं द्वारा आक्रमण न करने योग्य एवं रक्षाओं से युक्त है. अग्नि की दृष्टि सूर्य के सदृश सेवा योग्य है. (१५) अग्ने घृतस्य धीतिभिस्तेपानो देव शोचिषा. आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (१६) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम घृत के खजानों से तृप्त होकर देवों को बुलाओ एवं उनका यजन करो. (१६) तं त्वाजनन्त मातरः कविं देवासो अङ्गिरः. हव्यवाहममर्त्यम्.. (१७) हे कवि, मरणरहित, हव्य वहन करने वाले एवं प्रसिद्ध अंगिरा अग्नि! जिस प्रकार माताएं बच्चों को जन्म देती हैं, उसी प्रकार देवों ने तुम्हें उत्पन्न किया है. (१७) प्रचेतसं त्वा कवेऽग्ने दूतं वरेण्यम्. हव्यवाहं नि षेदिरे.. (१८) हे कवि, उत्तम बुद्धि वाले, वरण करने योग्य, देवों के दूत एवं इव्य वहन करने वाले अग्नि! देवगण तुम्हारे चारों ओर बैठते हैं. (१८) नहि मे अस्त्यघ्न्या न स्वधितिर्वनन्वति. अथैतादृग्भरामि ते.. (१९) हे अग्नि! मेरे पास गाय नहीं है. मेरे पास लकड़ियां काटने वाला कुठार भी नहीं है. ऐसा ebook converter DEMO Watermarks*
साधनहीन मैं तुम्हें धारण करता हूं. (१९) यदग्ने कानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि. ता जुषस्व यविष्ठ्य.. (२०) हे युवा-अग्नि! तुम्हारे लिए मैं जो भी कुछ लकड़ियां धारण करता हूं, तुम उन्हें स्वीकार करो. (२०) यदत्त्युपजिह्विका यद्वम्रो अतिसर्पति. सर्वं तदस्तु ते घृतम्.. (२१) हे अग्नि! जिन काष्ठों को तुम्हारी ज्वाला खाती है एवं जिनको लांघकर जाती है, वह सब काठ तुम्हारे लिए घी के समान हों. (२१) अग्निमिन्धानो मनसा धियं सचेत मर्त्यः. अग्निमीधे विवस्वभिः.. (२२) मनुष्य लकड़ियों की सहायता से अग्नि को प्रज्वलित करता हुआ मन की श्रद्धा के साथ यज्ञकर्म करता है. वह ऋत्विजों द्वारा अग्नि को बढ़ाता है. (२२) सूक्त—९२ देवता—मरुद्गण व अग्नि अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः. उपो षु जातमार्थस्य वर्धनमग्निं नक्षन्त नो गिरः.. (१) यजमान जिन अग्नि में यज्ञकर्मों का आह्वान करता है, वे ही मार्ग को जानने वालों में श्रेष्ठ उत्पन्न हुए हैं. आर्यों को बढ़ाने वाले एवं उत्पन्न अग्नि के समीप हमारी स्तुतियां जाती हैं. (१) प्र दैवोदासो अग्निर्दैवाँ अच्छा न मज्मना. अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य सानवि.. (२) दिवोदास के द्वारा बुलाए हुए अग्नि ने पृथ्वी माता के सामने यज्ञ में देवों के लिए हव्य वहन नहीं किया, क्योंकि दिवोदास ने अग्नि को बलपूर्वक बुलाया था. अग्नि स्वर्ग के ऊंचे स्थान पर ही रहे. (२) यस्माद्रेजन्त कृष्टयश्चर्कृत्यानि कृण्वतः. सहस्रसां मेधसाताविव त्मनाऽग्निं धीभिः सपर्यत.. (३) हे मनुष्यो! कर्त्तव्य यज्ञकर्म करने वाले लोगों से अन्य प्रजाएं कांपती हैं, इसलिए हजारों संपत्तियों के देने वाले अग्नि की सेवा तुम स्वयं अपने कर्मों द्वारा करो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
प्र यं राये निनीषसि मर्तो यस्ते वसो दाशत्. स वीरं धत्ते अग्न उक्थशंसिनं त्मना सहस्रपोषिणम्.. (४) हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! तुम अपने जिस स्तोता को धन देने के हेतु सबका नेता बनाना चाहते हो, एवं जो स्तोता तुम्हारे लिए हव्य देता है, वह अपने आप ही उक्थमंत्रों का बोलने वाला, हजारों का पोषण करने वाला एवं वीर पुत्र प्राप्त करता है. (४) स दृळ्हे चिदभि तृणत्ति वाजमर्वता स धत्ते अक्षिति श्रवः. त्वे देवत्रा सदा पुरूवसो विश्वा वामानि धीमहि.. (५) हे विशाल धन वाले अग्नि! जो यजमान तुम्हें हव्य देता है, वह शत्रु की दृढ़ नगरी में भी स्थित अन्न को अपने घोड़ों द्वारा नष्ट करता है तथा क्षीण न होने वाला अन्न धारण करता है. हम भी तुम में स्थित सभी उत्तम धनों को प्राप्त करेंगे. (५) यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्. मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्यग्नये.. (६) देवों को बुलाने वाले व प्रसन्न, जो अग्नि मनुष्यों को अन्न देते हैं, उन्हीं अग्नि को नशीले सोमरस के प्रथम पात्र प्राप्त होते हैं. (६) अश्वं न गीर्भी रथ्यं सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः. उभे तोके तनये दस्म विशपते पर्षि राधो मघोनाम्.. (७) हे दर्शनीय एवं प्रजाओं के पालक अग्नि! शोभनदान वाले एवं देवों की अभिलाषा करने वाले यजमान स्तुतियों द्वारा उसी प्रकार तुम्हारी सेवा करते हैं, जिस प्रकार रथ खींचने वाले घोड़े की सेवा की जाती है. तुम यजमानों के पुत्रों और पौत्रों को धन वालों का धन दो. (७) प्र मंहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे. उपस्तुतासो अग्नये.. (८) हे स्तोताओ! तुम दाताओं में श्रेष्ठ, यज्ञस्वामी, महान् व दीप्त तेज वाले अग्नि की स्तुति करो. (८) आ वंसते मघवा वीरवद्यशः समिद्धो द्युम्न्याहुतः. कुविन्नो अस्य सुमतिर्नवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत्.. (९) धन वाले व यशस्वी अग्नि यजमानों को यश देने वाला अन्न प्रदान करते हैं. इन अग्नि की नवीनतम अनुग्रहबुद्धि अन्नों के साथ हमारे पास बहुत बार आवे. (९) प्रेष्ठमु प्रियार्णा स्तुह्यासावातिथिम्. अग्निं रथानां यमम्.. (१०) हे स्तोता! प्रियों में अतिशय प्रिय, अतिथि एवं रथों का नियमन करने वाले अग्नि की ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुति करो. (१०) उदिता यो निदिता वेदिता वस्वा यज्ञियो ववर्त्तति. दुष्टरा यस्य प्रवणे नोर्मयो धिया वाजं सिषासतः.. (११) हे स्तोता! जो जानने वाले व यज्ञयोग्य अग्नि उत्पन्न एवं प्रसिद्ध धनों को लाते हैं, जो कर्म द्वारा युद्ध की इच्छा करते हैं एवं जिस अग्नि की ज्वालाएं नीचे मुख करके बहने वाली सागर तरंगों के समान कठिनाई से पार की जा सकती हैं, उसी अग्नि की स्तुति करो. (११) मा नो हृणीतामतिथिर्वसुरग्निः पुरुप्रशसत एषः. यः सुहोता स्वध्वरः.. (१२) निवासस्थान देने वाले, अतिथि, अनेक जनों द्वारा स्तुत, देवों के शोभन आह्वानकर्त्ता व शोभन-यज्ञ वाले अग्नि को हमारे पास आने से कोई भी न रोके. (१२) मो ते रिषण्ये अच्छोक्तिभिर्वसोऽग्ने केभिश्चिद्देवैः. कीरिश्चिद्धि त्वामीट्टे दूत्याय रातहव्यः स्वध्वरः.. (१३) हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! जो स्तोता स्तुतियों एवं सुखकर अनुगमनों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं, उनकी कोई हिंसा न करे. हव्य देने वाला स्तोता भी हव्यवहन आदि दूतकर्म के लिए तुम्हारी स्तुति करता है. (१३) आग्ने याहि मरुत्सखा रुद्रेभिः सोमपीतये. सोभर्या उप सुष्टुतिं मादयस्व स्वर्णरे.. (१४) हे मरुतों के सखा अग्नि! तुम हमारे शोभन यज्ञ में रुद्रपुत्र मरुतों के साथ सोमरस पीने के लिए आओ. तुम मुझ सौभरि ऋषि की शोभन-स्तुति के समीप आओ एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (१४)
सूक्त—१ देवता—पवमान सोम
नवम मंडल सूक्त—१ देवता—पवमान सोम स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (१) हे सोम! इंद्र के पीने के लिए तुम्हें निचोड़ा गया है. तुम अतिशय मादक और मादक धारा से निचुड़ो. (१) रक्षोहा विश्वचर्षणिरभि योनिमयोहतम्. द्रुणा सधस्थमासदत्.. (२) राक्षसों के हंता और सबके दर्शक सोम स्वर्ण द्वारा चोट खाकर एवं द्रोणकलश में स्थित होकर यज्ञवेदी पर बैठते हैं. (२) वरिवोधातमो भव मंहिष्ठो वृत्रहन्तमः. पर्षि राधो मघोनाम्.. (३) हे सोम! तुम धनों के अतिशय दाता, दाताओं में श्रेष्ठ एवं शत्रुओं का सर्वदा वध करने वाले बनो. तुम धनी शत्रुओं का धन हमें दो. (३) अभ्यर्ष महां देवानां वीतिमन्धसा. अभि वाजमुत श्रवः.. (४) हे सोम! तुम अन्न लेकर महान् देवों के यज्ञ के समीप आओ. तुम हमें बल और अन्न दो. (४) त्वामच्छा चरामसि तदिदर्थं दिवेदिवे. इन्दो त्वे न आशसः.. (५) हे सोम! हम प्रतिदिन तुम्हारी भली प्रकार सेवा करते हैं. हमारा यही काम है. हमारी आशा तुम्हारे अतिरिक्त दूसरी जगह नहीं है. (५) पुनाति ते परिस्रुतं सोमं सूर्यस्य दुहिता. वारेण शश्वता तना.. (६) हे सोम! सूर्य की पुत्री श्रद्धा तुम्हारे निचुड़े हुए रस को विस्तृत तथा नित्य दशापवित्र से शुद्ध करती है. (६) तमीमण्वीः समर्य आ गृभ्णन्ति योषणो दश. स्वसारः पार्ये दिवि.. (७)
यज्ञ में सोमरस निचोड़ने वाले दिन सभी बहिनों के समान दस उंगलियां सोम को भली प्रकार ग्रहण करती हैं. (७) तमीं हिन्वन्त्यग्रुवो ध्मन्ति बाकुरं दृतिम्. त्रिधातु वारणं मधु.. (८) उंगलियां ही सोम को निचोड़ने वाले स्थान पर ले जाती हैं एवं निचोड़ती हैं. सोमरूप मधु तीन स्थानों में रहता है तथा शत्रुओं का नाश करने वाला है. (८) अभी३ ममघ्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्. सोममिन्द्राय पातवे.. (९) हिंसा के अयोग्य गाएं इस बछड़ेरूपी सोम को इंद्र के पीने के लिए अपने दूध का मिश्रण करके शुद्ध बनाती हैं. (९) अस्येदिन्द्रो मदेष्वा विश्वा वृत्राणि जिघ्नते. शूरो मघा च मंहते.. (१०) शूर इंद्र इसी सोम के नशे में मतवाले होकर सभी शत्रुओं का नाश करते हैं तथा यजमानों को धन देते हैं. (१०) सूक्त—२ देवता—पवमान सोम पवस्व देववीरति पवित्रं सोम रंह्या. इन्द्रमिन्दो वृषा विश.. (१) हे सोम! तुम देवाभिलाषी बनकर वेग से निचुड़ो तथा पवित्र बनो. हे अभिलाषापूरक सोम! तुम इंद्र में प्रवेश करो. (१) आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेंदो द्युम्नवत्तमः. आ योनिं धर्णसिः सदः.. (२) हे महान्! अभिलाषापूरक, अतिशय यशस्वी तथा सबको धारण करने वाले सोम! तुम जल के रूप में हमारे पास आओ एवं अपने स्थान पर बैठो. (२) अधुक्षत प्रियं मधु धारा सुतस्य वेधसः. अपो वसिष्ट सुक्रतुः.. (३) निचोड़े हुए एवं अभिलाषापूरक सोमरस की प्रिय उंगलियां मधु को दुहती हैं. शोभनकर्म वाले सोम जल को ढकते हैं. (३) महान्तं त्वा महीरन्वापो अर्षन्ति सिन्धवः. यद्गोभिर्वासयिष्यसे.. (४) हे महान् सोम! यज्ञ में जिस समय तुम्हें गोदुग्ध की धाराएं ढकती हैं, उस समय बहने वाले महान् जल तुम्हारी ओर आते हैं. (४) समुद्रो अप्सु मामृजे विष्टम्भो धरुणो दिवः. सोमः पवित्रे अस्मयुः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
रसक्षरण करने वाले एवं स्वर्ग के धारणकर्त्ता सोम संसार को धारण करते हुए हमें चाहते हैं एवं जल में शुद्ध होते हैं. (५) अचिक्रदद्वृषा हरिमहान्मित्रो न दर्शंत:. सं सूर्येण रोचते.. (६) कामवर्षक हरितवर्ण, महान् एवं मित्र के समान दर्शनीय सोम क्रंदन करते एवं सूर्य के समान चमकते हैं. (६) गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः. याभिर्मदाय शुम्भसे.. (७) हे इंद्र! यज्ञकर्म की इच्छा संबंधी वे ही स्तुतियां तुम्हारे बल द्वारा शुद्ध होती हैं, जिन स्तुतियों द्वारा तुम प्रमत्त बनने के लिए सुशोभित होते हो. (७) तं त्वा मदाय घृष्वय उ लोककृत्नुमीमहे. तव प्रशस्तयो महीः.. (८) हे सोम! तुम्हारी प्रशंसाएं महान् हैं. तुमने शत्रुओं को पराजित करने वाले यजमानों के लिए उत्तम लोगों की रचना की है. हम पद पाने के लिए तुम्हारी याचना करते हैं. (८) अस्मभ्यमिन्दविन्द्रयुर्मध्वः पवस्व धारया. पर्जन्यो वृष्टिमॉँ इव.. (९) हे इंद्र की अभिलाषा करने वाले सोम! तुम वर्षा करने वाले मेघ के समान हमारे सामने मादक अमृत की धाराओं के समान गिरो. (९) गोषा इन्दो नृषा अस्यश्वसा वाजसा उत. आत्मा यज्ञस्य पूर्व्यः.. (१०) हे यज्ञ की प्राचीन आत्मा सोम! तुम गाएं, संतान, घोड़े एवं अन्न देने वाले हो. (१०) सूक्त—३ देवता—पवमान सोम एष देवो अमर्त्यः पर्णवीरिव दीयति. अभि द्रोणान्यासदम्.. (१) ये मरणरहित एवं दीप्तिशाली सोम स्थित होने के लिए कलश की ओर पक्षी के समान जाते हैं. (१) एष देवो विपा कृतोऽति ह्ररांसि धावति. पवमानो अदाभ्यः.. (२) उंगलियों द्वारा निचोड़ा गया सोमरस टपकता हुआ शत्रुओं को मारने के लिए जाता है. सोमरस को कोई पराजित नहीं कर सकता. (२) एष देवो विपन्युभिः पवमान ऋतायुभिः. हरिर्वाजाय मृज्यते.. (३) टपकने वाला दीप्तिशाली सोमरस यज्ञाभिलाषी स्तोताओं द्वारा इस तरह सजाया जाता ebook converter DEMO Watermarks*
है, जैसे युद्ध के लिए घोड़े को सजाया जाता है. (३) एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्वभिः. पवमानः सिषासति.. (४) ये शूर सोम अपनी शक्तियों द्वारा सभी संपत्तियों को लाकर हमें बांटना चाहते हैं. (४) एष देवो रथर्यति पवमानो दशस्यति. आविष्कृणोति वग्वनुम्.. (५) टपकते हुए सोमदेव हमारे यज्ञ में आने के लिए रथ चाहते हैं, हमारी अभिलाषाएं पूरी करते हैं एवं शब्द प्रकट करते हैं. (५) एष विप्रैरभिष्टुतोऽपो देवो वि गाहते. दधद्रत्नानि दाशुषे.. (६) स्तोताओं द्वारा स्तुत ये सोमदेव हव्यदाता यजमान को रत्न देते हुए जलों में प्रवेश करते हैं. (६) एष दिवं वि धावति तिरो रजांसि धारया. पवमानः कनिक्रदत्.. (७) ये टपकने वाले सोम शब्द करते हुए सारे संसार को तिरस्कृत करते हुए स्वर्ग को जाते हैं. (७) एष दिवं व्यासर्त्तरो रजांस्यस्पृतः. पवमानः स्वध्वरः.. (८) शोभन यज्ञ वाले एवं अपराजित पवमान सोम सभी लोकों को तिरस्कृत करते हुए स्वर्ग को जाते हैं. (८) एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः. हरिः पवित्रे अर्षति.. (९) हरे रंग वाले एवं दीप्तिशाली सोम पुराने जन्मों से ही देवों के लिए निचुड़ कर दशापवित्र में रहने के लिए जाते हैं. (९) एष उ स्य पुरुव्रतो जज्ञानो जनयन्निषः. धारया पवते सुतः.. (१०) ये अनेक कर्मों वाले सोम उत्पन्न होते ही अन्नों को जन्म देते हुए निचुड़कर धारारूप में गिरते हैं. (१०) सूक्त—४ देवता—पवमान सोम सना च सोम जेषि च पवमान महि श्रवः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (१) हे महान्, अन्न एवं पवमान सोम! हमारे यज्ञ में देवों की सेवा करो, शत्रुओं को जीतो एवं हमें श्रेय प्रदान करो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सना ज्योतिः सना स्व१र्विश्वा च सोम सौभगा. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (२) हे सोम! हमें ज्योति, स्वर्ग, समस्त-सौभाग्य एवं कल्याण दो. (२) सना दक्षमृत क्रतुमप सोम मृधो जहि. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (३) हे सोम! हमें बल एवं ज्ञान दो. शत्रुओं को मारो तथा हमें सौभाग्य दो. (३) पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (४) हे सोमरस निचोड़ने वालो! इंद्र के पीने के लिए सोमरस निचोड़ो एवं हमारे लिए कल्याण प्रदान करो. (४) त्वं सूर्ये न आ भज तव क्रत्वा तवोतिभिः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (५) हे सोम! अपने कार्यों एवं रक्षणों द्वारा तुम हमें सूर्य के समीप पहुंचाओ एवं हमें मंगल प्रदान करो. (५) तव क्रत्वा तवोतिभिर्ज्योक्पश्येम सूर्यम्. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (६) हे सोम! हम तुम्हारे यज्ञों एवं रक्षाओं के कारण चिरकाल तक सूर्य को देखें. तुम हमारा कल्याण करो. (६) अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसं रयिम्. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (७) हे शोभन आयुधों वाले सोम! तुम द्युलोक एवं धरती पर बढ़ने वाला धन हमें दो एवं हमारा कल्याण करो. (७) अभ्य१र्षणपच्युतो रयिं समत्सु सासहिः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (८) हे संग्रामों में शत्रुओं द्वारा अपराजित तथा शत्रुपराभवकारी सोम! तुम हमें धन दो तथा हमारा कल्याण करो. (८) त्वां यज्ञैरवीवृधन् पवमान विधर्मणि. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (९) हे पवमान सोम! लोगों ने अपनी वृद्धि के लिए तुम्हें यज्ञों के द्वारा बढ़ाया था. तुम हमें कल्याण दो. (९) रयिं नश्चित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (१०) हे सोम! तुम हमें घोड़ों के समान सर्वत्र जाने वाला तथा विचित्र धन दो एवं हमारा कल्याण करो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५ देवता—आप्री
सूक्त—५ देवता—आप्री समिद्धो विश्वतस्पतिः पवमानो वि राजति. प्रीणन् वृषा कनिक्रदत्.. (१) भली प्रकार दीप्ति वाले, सबके स्वामी एवं अभिलाषापूरक सोम शब्द करते हैं एवं देवों को प्रसन्न करते हुए विराजमान हैं. (१) तनूनपात् पवमानः शृङ्गे शिशानो अर्षति. अन्तरिक्षेण रारजत्.. (२) जल के नाती पवमान सोम ऊंचे स्थान में बढ़ते हुए अंतरिक्ष से कलश की ओर बढ़ते हैं. (२) ईळेन्यः पवमानो रयिर्वि राजति द्युमान्. मधोर्धाराभिरोजसा.. (३) स्तुतियोग्य, अभीष्टदाता और दीप्तिशाली सोम जल की धाराओं के साथ गिरते हुए अपने तेज से सुशोभित होते हैं. (३) बर्हिः प्राचीनमोजसा पवमानः स्तृणन् हरिः. देवेषु देव ईयते.. (४) हरे रंग के एवं दीप्तिशाली सोम यज्ञों में पूर्व की ओर कुश बिछाते हुए अपने तेजरूपी बल से जाते हैं. (४) उदातैर्जिहते बृहद् द्वारो देवीर्हिरण्ययीः. पवमानेन सुष्टुताः.. (५) स्वर्णमयी द्वारदेवियां पवमान सोम के साथ स्तुत होकर विस्तृत दिशाओं में ऊपर की ओर चढ़ती हैं. (५) सुशिल्पे बृहती मही पवमानो वृषण्यति. नक्तोषासा न दर्शते.. (६) इस समय पवमान सोम शोभनरूप वाली, विशाल, महान् और दर्शन करने योग्य दिवस निशा की अभिलाषा करते हैं. (६) उभा देवा नृचक्षसा होतारा दैव्या हुवे. पवमान इन्द्रो वृषा.. (७) मैं दोनों प्रकार के देवों—मानवद्रष्टा और देवों का होम करने वालों को बुलाता हूं. पवमान सोम दीप्त और अभिलाषापूरक हैं. (७) भारती पवमानस्य सरस्वतीळा मही. इमं नो यज्ञमा गमन्तिस्रो देवीः सुपेशसः.. (८) हमारे सोम-संबंधी यज्ञ में भारती, सरस्वती एवं महती इडा नामक तीन शोभनरूप वाली देवियां आवें. (८)