ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
संवननं नाश्यं तष्टेवानपच्युतम्.. (१२) देवशत्रुओं के भली-भांति विनाश के समान मेरा स्तोत्र ऋत्विज् इस प्रकार बढ़ावें, जिस प्रकार सूर्य अपनी विस्तृत रश्मियों को बढ़ाता है. बढ़ई जिस प्रकार घोड़ों से खींचने योग्य रथ बनाता है, उसी प्रकार मैंने यह स्तोत्र बनाया है. (१२) वावर्त येषां राया युक्तैषां हिरण्ययी. नेमधिता न पौंस्या वृथेव विष्टान्ता.. (१३) हम जिन देवों से धन पाना चाहते हैं, उनकी स्तुति बार-बार पढ़ते हैं. यह स्तुति सोने के गहनों के समान प्रसन्नता देने वाली है. युद्ध में सैनिक जिस प्रकार आगे बढ़ते हैं अथवा रहट के घड़े आगे चलते हैं, उसी प्रकार हमारे स्तोत्र बढ़ें. (१३) प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु. ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्राव्येषाम्.. (१४) जो देव पांच सौ रथों को घोड़ों से युक्त करके हमारे समीप आने की अभिलाषा से यज्ञ के मार्ग में आते हैं. उन देवों से संबंधित स्तोत्र मैंने दुःसीम, पृथवान्, वेन एवं शक्तिशाली राम के समीप बोले हैं. ये सभी राजा धनसंपन्न हैं. (१४) अधीन्वत्र सप्ततिं च सप्त च. सद्यो दिदिष्ट तान्वः सद्यो दिदिष्ट पार्थ्यः सद्यो दिदिष्ट मायवः.. (१५) इन राजाओं से नान्व, पार्थ्य एवं मायव ऋषियों ने शीघ्र ही सतहत्तर गाएं मांगीं. (१५) सूक्त—९४ देवता—सोम निचोड़ने के पत्थर प्रैते वदन्तु प्र वयं वदाम ग्रावभ्यो वाचं वदता वदद्भ्यः. यदद्रयः पर्वताः साकमाशावः श्लोकं घोषं भरथेन्द्राय सोमिनः.. (१) ये पत्थर शब्द करें, हम इन पत्थरों की स्तुति करें. हे ऋत्विजो! तुम शब्द करने वाले पत्थरों की स्तुति करो. हे आदरणीय दृढ़ एवं सोमरस निचोड़ने में शीघ्रता करने वाले पथरो! तुम एक इंद्र के लिए सुनने योग्य शब्द करो. हे सोमरसयुक्त पत्थरो! तुम सोम से तृप्त बनो. (१) एते वदन्ति शतवत्सहस्रवदभि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः. विष्ट्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत.. (२) ये पत्थर सैकड़ों अथवा हजारों लोगों के समान शब्द करते हैं. ये सोमलता के कारण eBook converter DEMO Watermarks*
हरे पत्थर अपने मुखों से देवों को बुलाते हैं. ये शोभन कर्म-वाले पत्थर यज्ञ को पाकर देवों को बुलाने वाले अग्नि से पहले ही हव्य भक्षण करते हैं. (२) एते वदन्त्यविदन्नना मधु न्यूङ्खयन्ते अधि पक्व आमिषि. वृक्षस्य शाखामरुणस्य बप्सतस्ते सूभर्वा वृषभाः प्रेमराविषुः.. (३) ये पत्थर लाल रंग के पेड़ की शाखा को खाने वाले सुभक्षण बैलों के समान शब्द करते हैं. मांसभक्षी मांस पकने पर जैसी हर्षध्वनि करते हैं, उसी प्रकार का शब्द ये पत्थर नशीला सोम सुख से पीते समय करते हैं. (३) बृहद्वदन्ति मदिरेण मन्दिनेन्द्रं क्रोशन्तोऽविदन्नना मधु. संरभ्या धीराः स्वसृभिरनर्तिपुराघोषयन्तः पृथिवीमुपब्दिभिः.. (४) नशा करने वाले एवं निचोड़े जाते हुए सोम के द्वारा इंद्र को पुकारने वाले ये पत्थर महान् शब्द करते हैं. ये पत्थर अपने मुख से नशीला सोमरस प्राप्त करते हैं. ये पत्थर निचोड़ने के काम में चंचल होकर भी धीर रहते हैं एवं अपने शब्दों से धरती को गुंजित करते हुए उंगलियों के साथ नाचते हैं. (४) सुपर्णा वाचमक्रतोप द्यव्याखरे कृष्णा इषिरा अनर्तिषुः. न्य१ङ्नि यन्त्युपरस्य निष्कृतं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्चितः.. (५) इन पत्थरों का शब्द सुनकर ऐसा लगता है, जैसे आकाश में उड़ने वाले पक्षी शब्द कर रहे हों. ये पत्थर जंगल में घूमने वाले कृष्णसार हरिण के समान नाचते हैं. ये पत्थर पिसे हुए सोम को नीचे गिराते हैं एवं सूर्य के समान श्वेत वर्ण के जल को अधिक मात्रा में धारण करते हैं. (५) उग्राइव प्रवहन्तः समायमुः साकं युक्ता वृषणो बिभ्रतो धुरः. यच्छ्वसन्तो जग्रसाना अराविषुः शृण्व एषां प्रोथथो अर्वतामिव.. (६) जिस प्रकार शक्तिशाली घोड़े मिलकर रथ के जुए को धारण करके आगे बढ़ाते हैं एवं अपना शरीर लंबा करते हैं. उसी प्रकार यज्ञ का भार वहन करने वाले ये पत्थर विशाल बनकर सोमरस टपकाते हैं. ये सोमलता को कुचलने में नीचे-ऊपर होने के बहाने सांस लेते हुए सोम को निगलते एवं शब्द करते हैं. घोड़े के मुख से निकले शब्द के समान मैं इन पत्थरों का शब्द सुनता हूं. (६) दशावनिभ्यो दशकक्ष्येभ्यो दशयोक्त्रेभ्यो दशयोजनेभ्यः. दशाभीशुभ्यो अर्चताजरेभ्यो दश धुरो दश युक्ता वहद्भ्यः.. (७) हे ऋत्विजो! सोमरस निचुड़ते समय दस उंगलियों द्वारा ग्रहण किए गए, दस उंगलियों द्वारा प्रदर्शित, दस उंगलियों द्वारा बद्ध, दस उंगलियों रूपी लगामों से घोड़ों के समान ebook converter DEMO Watermarks*
वशीभूत, जरारहित एवं दस रस्सियों से बंधे घोड़ों के समान यज्ञ को वहन करने वाले पत्थरों की स्तुति करो. (७) ते अद्रयो दशयन्त्रास आशवस्तेषामाधानं पर्येति हर्यतम्. त ऊ सुतस्य सोम्यस्यान्धसोंऽशोः पीयूषं प्रथमस्य भेजिरे.. (८) ये पत्थर दस उंगलियों रूपी रस्सियों का बंधन पाकर जल्दी-जल्दी काम करते हैं. इनके द्वारा निर्मित सोमरस हरे रंग का होकर निकलता है. ये पत्थर ही निचोड़े गए सोम के रसमय अंश को अमृत अन्न के समान पहले ग्रहण करते हैं. (८) ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निसंतेंडशुं दुहन्तो अध्यासते गवि. तेभिर्दुग्धं पपिवान्त्सोम्यं मध्विन्द्रो वर्धते प्रथते वृषायते.. (९) सोमरस का भक्षण करने वाले ये पत्थर इंद्र के घोड़ों को प्राप्त करते हैं. इनका रस निकलकर गोचर्म के ऊपर जाता है. इन पत्थरों द्वारा निकाले हुए मधुर सोमरस को पीकर इंद्र बढ़ते हैं, विस्तृत होते हैं एवं सांड़ के समान शक्ति दिखाते हैं. (९) वृषा वो अंशुर्न किला रिषाथनेळावन्तः सदमित्स्थनाशिताः. रैवत्येव महसा चारवः स्थान यस्य ग्रावाणो अजुषध्वमध्वरम्.. (१०) हे पत्थरो! सोमलता का खंड तुम्हें यज्ञ में रस देगा. तुम निराश मत बनो. तुम अन्न वालों के समान सदा भोजन प्राप्त करो. तुम धनी लोगों के समान सदा तेजयुक्त होकर कल्याणकारी बनो एवं यजमान के यज्ञ का सेवन करो. (१०) तृदिला अतृदिलासो अद्रयोऽश्रमणा अश्रथिता अमृत्यवः. अनातुरा अजराः स्थामविष्णवः सुपीवसो अतृषिता अतृष्णजः.. (११) हे पत्थरो! तुम स्वयं श्रमरहित होकर दूसरों को थकाने वाले, थकान से रहित, दूसरों द्वारा शिथिल न होने वाले, मरणरहित, रोगहीन, उठने-गिरने की गति से युक्त, शोभन शक्ति वाले तृषारहित एवं निस्पृह बनो. (११) ध्रुवा एव वः पितरो युगेयुगे क्षेमकामासः सदसो न युञ्जते. अजुर्यासो हरिषाचो हरिद्रव आ द्यां रवेण पृथिवीमशुश्रवुः.. (१२) हे पत्थर! तुम्हारे पूर्वज पर्वत युगों से स्थिर हैं. वे पूर्णकाम पर्वत कभी भी अपना स्थान नहीं छोड़ते. ये जरारहित पर्वत सोम का भोग करने वाले, हरे वृक्षों वाले एवं अपने शब्द से धरती-आकाश को पूर्ण करने वाले हैं. (१२) तदिद्वदन्त्यद्रयो विमोचने यामन्नञ्जस्पाइव घेदुपब्दिभिः. वपन्तो बीजमिव धान्याकृतः पृञ्चन्ति सोमं न मिनन्ति बप्सतः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
रथचालक मार्ग में रथ चलाता हुआ जिस प्रकार शब्द करता है उसी प्रकार सोमलता का रस निचोड़ने में ये पत्थर शब्द करते हैं. किसान जिस प्रकार बीज बोते हैं, उसी प्रकार ये पाषाण सोमरस को विस्तृत करते हैं. नष्ट नहीं करते हैं. (१३) सुते अध्वरे अधि वाचमक्रता क्रीळयो न मातरं तुदन्तः. वि षू मुञ्चा सुषुवुषो मनीषां वि वर्तन्तामद्रयश्वायमानाः.. (१४) बच्चे खेलते समय जिस प्रकार अपनी माताओं को धक्का देते हुए हल्ला मचाते हैं, उसी प्रकार ये पूज्य पत्थर यज्ञ में सोमरस निचोड़ते समय शब्द करते हैं. हे स्तोताओ! सोमरस निचोड़ने वाले पत्थरों की स्तुति करो. पत्थर घूमते हुए शब्द करें. (१४) सूक्त—९५ देवता—उर्वशी व पुरूरवा हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्रा कृणवावहै नु. न नौ मन्त्रा अनुदितास एते मयस्करन्परतरे चनाहन्.. (१) पुरूरवा ने कहा—“हे दुःख देने वाली पत्नी! अनुरागपूर्ण मन से क्षण भर मेरे समीप ठहरो. हम आज शीघ्र ही कथोपकथन करें. आज यदि हमारी बातें अनकही रह गईं तो आने वाले दिन सुखकारक नहीं होंगे.” (१) किमेता वाचा कृणवा तवाहं प्राक्रमिषमुषसामग्रियेव. पुरूरवः पुनरस्तं परेहि दुरापना वातइवाहमस्मि.. (२) उर्वशी ने कहा—“केवल बातों से क्या होगा? पूर्ववर्ती उषाओं के समान मैं तुम्हारे पास से चली गई हूं. हे पुरूरवा! तुम अपने घर को पुनः चले जाओ. मैं वायु के समान दुष्प्राप्य हूं.” (२) इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः. अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः.. (३) पुरूरवा ने कहा—“तुम्हारे बिना मैं विजय पाने के लिए तरकस से बाण नहीं निकाल पाता और न सैकड़ों गायों को वेगपूर्वक शत्रुओं से छीन पाता हूं. वीरविहीन राज्यव्यवस्था में मेरा सामर्थ्य प्रकाशित नहीं होता. शत्रु को कंपित करने वाले मेरे वीर संग्राम में सिंहनाद नहीं करते. (३) सा वसु दधती श्वशुराय वय उषो यदि वष्ट्यन्तिगृहात्. अस्तं ननक्षे यस्मिञ्चाकन्दिवा नक्तं श्रथिता वैतसेन.. (४) उर्वशी ने कहा—“हे उषा! यह उर्वशी यदि पतिगृह में अपने ससुर को भोजन देना ebook converter DEMO Watermarks*
चाहती तो समीपवर्ती कक्ष से पति के रात में सोने वाले कमरे में जाती तथा रात-दिन अपने पति के साथ रमणसुख भोगती।” (४) त्रिः स्म माह्नः श्नथयो वैतसेनोत स्म मेऽव्यत्यै पृणासि. पुरूरवोऽनु ते केतमायं राजा मे वीर तन्व१स्तदासीः.. (५) हे पुरूरवा! तुम दिन में तीन बार पुरुष इंद्रिय द्वारा ताडित करते थे. किसी सौत के साथ मेरी होड़ नहीं थी. मैं प्रतिदिन तुम्हारे शयनकक्ष में आती थी. हे वीर राजा! तुम मेरे शरीर को सुख देते थे.” (५) या सुजूर्णिः श्रेणिः सुम्नआपिर्ह्र्देचक्षुर्न ग्रन्थिनी चरण्युः. ता अज्ज्योऽरुणयो न सस्रुः श्रिये गावो न धेनवोऽनवन्त.. (६) पुरूरवा ने कहा—“मेरे महल में तुम्हारे आने के बाद सुजूर्णि, श्रेणि, सुम्न, आपि, हृदेचक्षु, ग्रन्थिनी, चरण्यू आदि अप्सराएं गोष्ठ में जाने वाली गायों के समान शब्द करती हुई नहीं आती थीं.” (६) समस्मिञ्जायमान आसत ग्ना उतेमवर्धनन्नद्य१ः स्वगूर्ताः. महे यत्त्वा पुरूरवो रणायावर्धयन्दस्युहत्याय देवाः.. (७) उर्वशी ने कहा—“पुरूरवा के जन्म के समय देखने के लिए देवपत्नियां भी एकत्रित हुईं तथा स्वयं बहने वाली नदियों ने भी उसे आश्रित बनकर बढ़ाया. देवों ने युद्ध में शत्रुहनन करने के लिए तुम्हारी अत्यंत वृद्धि की.” (७) सचा यदासु जहतीष्वत्कममानुषीषु मानुषो निषेवे. अप स्म मत्तरसन्ती न भुज्युस्ता अत्रसन्न्रथस्पृशो नाश्वाः.. (८) पुरूरवा ने कहा—“मानव रूपधारी पुरूरवा जब अमानुष रूपधारिणी अप्सराओं के सामने गए, तब वे इस प्रकार भाग गईं, जिस प्रकार हिरनी व्याध से दूर भागती है अथवा रथ में जुते हुए घोड़े भागते हैं. (८) यदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः ऋतुभिर्न पृङ्क्ते. ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीळयो दन्दशानाः.. (९) जब मानव पुरूरवा ने मरणरहित अप्सराओं को विशेषरूप से स्पर्श करते हुए वचन और कर्म से उनके साथ संपर्क स्थापित किया, तब वे क्रीड़ारत अश्वों के समान शब्द करके भाग गईं और दिखाई नहीं दीं. (९) विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्भरन्ती मे अप्या काम्यानि. जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोर्वशी तिरत दीर्घमायुः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
जो उर्वशी आकाश से गिरने वाली बिजली के समान शुभ्र बनी तथा मेरी विस्तृत अभिलाषाओं को पूर्ण किया, उसके गर्भ से मानवहितकारी पुत्र उत्पन्न हुआ. उस समय उर्वशी ने मुझे दीर्घ आयु प्रदान की. (१०) जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरूरवो म ओजः. अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि.. (११) उर्वशी ने कहा—“हे पुरूरवा! धरती की रक्षा के लिए तुम पुत्ररूप में उत्पन्न हुए थे. इसी हेतु तुमने मेरे उदर में अपना तेज गर्भरूप में धारण किया था. उस समय मैंने तुम्हें बता दिया था कि किसी परिस्थिति में तुम्हारे पास नहीं रहूंगी. उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी. इस समय व्यर्थ बातें क्यों कर रहे हो?” (११) कदा सूनुः पितरं जात इच्छाच्चक्रन्नाश्रु वर्तयद्विजानन्. को दम्पती समनसा वि यूयोधद यदग्निः श्वशुरेषु दीदयत्.. (१२) पुरूरवा ने कहा—“तुम्हारे उदर से उत्पन्न पुत्र मुझे कब चाहेगा? मुझे पितारूप में जानकर क्या वह आंसू नहीं बहाएगा? एक-दूसरे को चाहने वाले पति-पत्नी को कौन अलग करना चाहेगा? इस समय तुम्हारे उदर से उत्पन्न पुत्ररूपी अग्नि तुम्हारे ससुर के घर में प्रज्वलित हो.” (१२) प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्ये शिवायै. प्र तत्ते हिनवा यत्ते अस्मे परेह्यस्तं नहि मूर मापः.. (१३) उर्वशी ने कहा—“मैं तुम्हारी बात का उत्तर दे रही हूं. मेरा पुत्र तुम्हारे पास जाकर कभी आंसू नहीं बहाएगा. मैं सदा उसके कल्याण का ध्यान रखूंगी. मैं तुम्हारे पुत्र को तुम्हारे पास पहुंचा दूंगी. हे ज्ञानरहित पुरूरवा! अब अपने घर लौट जाओ. तुम मुझे नहीं पा सकोगे.” (१३) सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत्परावतं परमां गन्तवा उ. अधा शयीत निर्ऋतेरुपस्थेऽधैनं वृका रभसासो अद्युः.. (१४) पुरूरवा ने कहा—“तुम्हारे साथ क्रीड़ा करने वाला तुम्हारा प्रेमी मैं आज ही गिर पडूंगा. फिर कभी नहीं उठूंगा. मैं बहुत दूर चला जाऊंगा. मैं उस दुर्दशा में ही मर जाऊंगा एवं वेगशील भेड़िए मुझे खा जाएंगे.” (१४) पुरूरवो मा मृथा मा प्र पप्तो मा त्वा वृकासो अशिवास उ क्षन्. न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता.. (१५) उर्वशी ने कहा—“हे पुरूरवा! तुम मत मरो. तुम धरती पर मत गिरो. अशुभ भेड़िए तुम्हें न खाएं. स्त्रियों की मैत्री वास्तविक नहीं होती. स्त्रियों का हृदय भेड़ियों के हृदय के ebook converter DEMO Watermarks*
समान होता है।” (१५) यद्विरूपाचरं मर्त्येष्ववसं रात्रीः शरदश्चतस्रः. घृतस्य स्तोकं सकृदह्न आश्रां तादेवेदं तात्पाणा चरामि.. (१६) “मैंने अनेक रूप धारण करके मानवों में भ्रमण किया है. मैं चार वर्ष तक रात के समय मानवों के बीच रही हूं. मैं दिन में एक बार घी पीकर तृप्त हो गई हूं और विचरण करती रही हूं.” (१६) अन्तरिक्षप्रां रजसो विमानीमुप शिक्षाम्युर्वशीं वसिष्ठः. उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्नि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे.. (१७) पुरूरवा ने कहा—“अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाली एवं जल का निर्माण करने वाली उर्वशी को अतिशय वासदाता पुरूरवा (मैं) वश में करता हूं. शोभन कर्म वाला पुरूरवा तुम्हारे पास रहे. मेरा हृदय तप्त हो रहा है. तुम लौट आओ. (१७) इति त्वा देवा इम आहुरैळ यथेमेतद्भवसि मृत्युबन्धुः. प्रजा ते देवान्हविषा यजाति स्वर्ग उ त्वमपि मादयासे.. (१८) उर्वशी ने कहा—“हे इड़ा के पुत्र पुरूरवा! ये सारे देव कह रहे हैं कि तुम मृत्यु को वश में करने वाले बनोगे. तुम हव्य द्वारा देवों का उत्तम यज्ञ करोगे एवं स्वर्ग में आनंद पाओगे.” (१८) सूक्त—९६ देवता—इंद्र के घोड़े प्र ते महे विदथे शंसिषं हरी प्र ते वन्वे वनुषो हर्यतं मदम्. घृतं न यो हरिभिश्चारु सेचत आ त्वा विशन्तु हरिवर्पसं गिरः.. (१) हे शत्रुहिंसक इंद्र! मैं यज्ञ में तुम्हारे घोड़ों की विशेष प्रशंसा करता हूं एवं तुमसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूं. तुम अपने हरि नामक घोड़ों द्वारा आकर हमें घी से सींचो. हे शुभ्रवर्ण इंद्र! मेरी स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. (१) हरिं हि योनिमभि ये समस्वरन्हिन्वन्तो हरी दिव्यं यथा सदः. आ यं पृणन्ति हरिभिर्न धेनव इन्द्राय शूंषं हरिवन्तमर्चत.. (२) हे स्तोताओ! पुराने स्तोताओं ने इंद्र को यज्ञगृह की ओर प्रेरित किया तथा इंद्र के घोड़ों को यज्ञ में बुलाया. गाएं जिस प्रकार दूध से भिगोती हैं, उसी प्रकार उन्होंने इंद्र को सोमरस से तृप्त किया. तुम भी इंद्र एवं उनके घोड़ों की शक्ति की प्रशंसा करो. (२) सो अस्य वज्रो हरितो य आयसो हरिनिकामो हरिborder/रा गभस्त्योः. ebook converter DEMO Watermarks*
द्युम्नी सुशिप्रो हरिमन्युसायक इन्द्रे नि रूपा हरिता मिमिक्षिरे.. (३) इंद्र का वज्र लोहे का बना हुआ, सुंदर, शत्रुनाशक एवं हाथों में धारण करने योग्य है. धनी, शोभन नासिका वाले, क्रोध में भरकर बाण द्वारा शत्रुनाश करने वाले इंद्र को हरे रंग के सोम द्वारा सींचा गया. (३) दिवि न केतुरधि धायि हर्यतो विव्यचद्वज्रो हरितो न रंह्या. तुददहिं हरिशिप्रो य आयसः सहस्रशोका अभवद्धरिम्भरः.. (४) स्तोताओं ने आकाश में सूर्य के समान इंद्र के वज्र को स्थिर किया. उस वज्र ने अपने वेग से सारी दिशाओं को व्याप्त कर लिया. हरी नासिका वाले एवं सोमपानकर्त्ता इंद्र ने वज्र से शत्रु को मारते समय हजारों प्रकार की दीप्ति धारण की. (४) त्वंतमहर्यथा उपस्तुतः पूर्वेभिरिन्द्र हरिकेश यज्वभिः. त्वं हर्यसि तव विश्वमुक्थ्य१मसाभि राधो हरिजात हर्यतम्.. (५) हे हरे केशों वाले इंद्र! तुम प्राचीन यजमानों द्वारा प्रशंसित होकर हवि की कामना करते थे. हे हरे रंग वाले इंद्र! तुम्हारा समस्त अन्न व्याप्त, प्रशंसनीय, असाधारण एवं सुंदर है. (५) ता वज्रिणं मन्दिनं स्तोम्यं मद इन्द्रं रथे वहतो हर्यता हरी. पुरूण्यस्मै सवनानि हर्यत इन्द्राय सोमा हरयो दधन्विरे.. (६) वे गतिशील घोड़े वज्रधारी, प्रसन्न व स्तुतियोग्य इंद्र को रथ में बैठाकर हमारे यज्ञ में लाते हैं. इस कांत इंद्र के लिए यज्ञों में हरे रंग का सोमरस अधिक मात्रा में निचोड़ा जाता है. (६) अरं कामाय हरयो दधन्विरे स्थिराय हिन्वन्हरयो हरी तुरा. अर्वद्भियों हरिभिर्जोषमीयते सो अस्य कामं हरिवन्तमानशे.. (७) स्थिर इंद्र के लिए रखा हुआ पर्याप्त सोमरस इंद्र के शीघ्रगामी अश्वों को यज्ञ के प्रति प्रेरित करता है. जो रथ हरे रंग के घोड़ों द्वारा संग्राम में ले जाया जाता है, वही रथ इंद्र द्वारा अभिलषित एवं सोमरस से पूर्ण यज्ञ में स्थित होता है. (७) हरिश्च्मशारुर्हरिकेश आयसस्तुरस्पेये यो हरिपा अवर्धत. अर्वद्भियों हरिभिर्वाजिनीवसुरति विश्वा दुरिता पारिषद्धरी.. (८) हरे रंग की दाढ़ी एवं केशों वाले तथा लौहमय हृदय वाले इंद्र शीघ्र पीने योग्य हरे रंग के सोमरस को पीकर बढ़ते हैं. यज्ञरूपी संपत्ति वाले इंद्र को हरे रंग के घोड़े यज्ञ में ले जाते हैं. इंद्र घोड़ों को रथ में जोड़कर हमारी सब दुर्दशा दूर करें. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
स्रुवेव यस्य हरिणी विपेततुः शिप्रे वाजाय हरिणी दविध्वतः. प्र यत्कृते चमसे मर्मृजद्धरी पीत्वा मदस्य हर्यतस्यान्धसः.. (९) जिस प्रकार स्रुवा होम के लिए नीचे गिरता है, उसी प्रकार इंद्र की हरे रंग की आंखें यज्ञ पर पड़ीं. इंद्र सोमरूप अन्न का भक्षण करने के लिए अपने हरे रंग के जबड़ों को गति देते हैं. शुद्ध चमस में वर्तमान नशीले एवं सुंदर सोमरस को पीकर घोड़े अपने शरीर को सचेत बनाते हैं. (९) उत स्म सद्भ हर्यतस्य पस्त्यो३ रत्यो न वाजं हरवाँ अचिक्रदत्. मही चिद्धि धिषणाहर्यदोजसा बृहद्वयो दधिषे हर्यतश्चिदा.. (१०) कमनीय इंद्र का घर द्यावा-पृथिवी है. वे घोड़ों से युक्त होकर तीव्र गति से युद्ध में जाते हैं. विशाल स्तुति बलशाली इंद्र की कामना करती है. तुम यजमान को विशाल अन्न देते हो. (१०) आ रोदसी हर्यमाणो महित्वा नव्यंनव्यं हर्यसि मन्म नु प्रियम्. प्र पस्त्यमसुर हर्यतं गोराविष्कृधि हरये सूर्याय.. (११) हे अभिलाषायुक्त इंद्र! तुम अपने महत्त्व से द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हो एवं अत्यंत नवीन तथा प्रिय स्तोत्रों की कामना करते हो. हे शक्तिशाली इंद्र! गायों के सुंदर स्थान को जल हरण करने वाले सूर्य के लिए प्रकट करो. (११) आ त्वा हर्यन्तं प्रयुजो जनानां रथे वहन्तु हरिशिप्रमिन्द्र. पिबा यथा प्रतिभृतस्य मध्वो हर्यन्यज्ञं सधमादे दशोणिम्.. (१२) हे हरे रंग के जबड़ों वाले इंद्र! तुम्हारे घोड़े रथ में जुतकर तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हें यजमानों के यज्ञ में ले जावें. तुम अपने लिए रखा हुआ मधुर सोमरस पिओ. तुम युद्ध में यज्ञ के साधन एवं दस उंगलियों द्वारा निचोड़े गए सोम को पिओ. (१२) अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते. ममद्धि सोमं मधुमन्तामिन्द्र सत्रा वृषण्जठर आ वृषस्व.. (१३) हे अश्वों के स्वामी इंद्र! तुमने प्रातः सवन में तैयार किया गया सोमरस पिया है. यह माध्यंदिन सवन केवल तुम्हारे लिए है. इस मधुर सोम का तुम स्वाद लो. हे अधिक वर्षा करने वाले इंद्र! सोमरस से तुम अपना उदर सींचो. (१३) सूक्त—९७ देवता—ओषधि या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा.
मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च.. (१) जो ओषधियां प्राचीन काल में तीन युगों में देवों से उत्पन्न हुई हैं, मैं मानता हूं कि वे पीले रंग की ओषधियां एक सौ सात स्थानों में स्थित हैं. (१) शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमुत वो रुहः. अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत.. (२) हे माता के समान ओषधियो! तुम्हारे जन्म सौ एवं तुम्हारे प्ररोहण हजार हैं. हे सौ कर्मों वाली ओषधियो! तुम मुझे निरोग करो. (२) ओषधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः. अश्वाइव संजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्ण्वः.. (३) हे फूल और फल वाली ओषधियो! तुम इस रोगी के प्रति प्रसन्न बनो. तुम अश्वों के समान जयशील, उत्पन्न होने वाली एवं रोगियों को रोगों से पार करने वाली हो. (३) ओषधीरिरिति मातरस्तद्द्वो देवीरुप ब्रुवे. सनेयमश्वं गां वास आत्मानं तव पूरुष.. (४) हे माता के समान दिव्य ओषधियो! मैं तुम्हारे संबंधी वैद्य से इस प्रकार कहता हूं— “हे चिकित्सक! मैं तुम्हें घोड़ा, गाय, वस्त्र एवं स्वयं को दे सकता हूं.” (४) अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता. गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्.. (५) हे ओषधियो! तुम पीपल के वृक्ष पर रहती हो एवं पलाश वृक्ष पर तुम्हारा निवासस्थान है. जब तुम रोगी पुरुष पर कृपा करती हो, तब तुम गाय पाने की अधिकारिणी बनती हो. (५) यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव. विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षोहामीवचातनः.. (६) युद्ध में एकत्र होने वाले राजा लोगों के समान जिस व्यक्ति के पास सभी ओषधियां होती हैं, उसे ब्राह्मण या भिषक् कहते हैं. वह रोगों का नाश करता है. (६) अश्वावतीं सोमावतीमूर्जयन्तीमुदोजसम्. आवित्सि सर्वा ओषधीरस्मा अरिष्टतातये.. (७) मैं इस रोग का विनाश करने के लिए अश्वावती, सोमवती, ऊर्जयंती, उदोजस आदि सभी ओषधियों की स्तुति करता हूं. (७) उच्छुष्मा ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते. धनं सनिष्यन्तीनामान्मानं तव पूरुष.. (८) हे रोगी पुरुष! ओषधियों से बल उसी प्रकार बाहर निकलता है, जिस प्रकार गोशाला से गाएं बाहर जाती हैं. ये ओषधियां तुम्हें स्वास्थ्यरूपी धन देती हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूयं स्थ निष्कृतीः. सीराः पतत्रिणीः स्थन यदामयति निष्कृथ.. (९) हे ओषधियो! तुम्हारी माता का नाम इष्कृति अर्थात् रोगविनाशिका है, इसलिए तुम भी इष्कृति हो. तुम रोग को बाहर निकालने वाली एवं पतनयुक्त हो. तुम रोगी को स्वस्थ करो. (९) अति विश्वाः परिष्ठाः स्तेनइव व्रजमक्रमः. ओषधीः प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो३ रपः.. (१०) सर्वत्र व्याप्त एवं सब ओर स्थित ओषधियां रोगों को इस प्रकार लांघ जाती हैं, जिस प्रकार चोर गोशाला को लांघ जाता है. शरीर में जो भी व्याधि होती है, उसे ओषधियां नष्ट करती हैं. (१०) यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त आदधे. आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा.. (११) जब मैं रोगी को शक्तिशाली बनाता हुआ इन ओषधियों को हाथ में लेता हूं, तब रोग की आत्मा उसी प्रकार नष्ट होती है, जैसे मृत्यु से जीव नष्ट हो जाता है. (११) यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः. ततो यक्ष्मं वि बाधध्व उग्रो मध्यमशीरिव.. (१२) हे ओषधियो! तुम जिसके अंगअंग एवं गांठगांठ में आश्रय लेती हो, उसके शरीर से रोग इस प्रकार दूर कर देती हो, जिस प्रकार शक्तिशाली राजा चोर को देश से निकाल देता है. (१२) साकं यक्ष्म प्र पत चाषेण किकिदीविना. साकं वातस्य ध्राज्या साकं नश्य निहाकया.. (१३) हे व्याधि! तुम नीलकंठ, बाज, वायु अथवा गोह के समान रोगी के शरीर से जल्दी दूर चली जाओ. (१३) अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या उपावत. ताः सर्वाः संविदाना इदं मे प्रावता वचः.. (१४) हे ओषधियो! तुम में से पहली दूसरी के और दूसरी तीसरी के पास जावे. इस प्रकार सब ओषधियां मिलकर मेरे वचन की रक्षा करें. (१४) याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः. बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहस्पति से उत्पन्न फलसहित, फलरहित, पुष्परहित एवं पुष्पयुक्त ओषधियां हमें रोग से बचावें. (१५) मुञ्चन्तु मा शपथ्या३दथो वरुण्यादुत. अथो यमस्य पड्बीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात्. (१६) ओषधियां मुझे झूठी कसम खाने के पाप से, वरुण के पाश से, यम की बेड़ी से एवं सभी देवों के पाश से बचावें. (१६) अवपतन्तीरवदन्दिव ओषधयस्परि. यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः. (१७) ओषधियों ने स्वर्ग से नीचे उतरते समय कहा था कि हम जिस जीवित व्यक्ति में प्रवेश कर जाती हैं, वह नष्ट नहीं होता. (१७) या ओषधीः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः. तासां त्वमस्युत्तमारं कामाय शं हृदे.. (१८) हे ओषधि! जो ओषधियां सोम राजा की प्रजा हैं, अगणित एवं अति कुशल हैं, तुम उन में उत्तम हो. तुम अभिलाषा को पूर्ण करके मन को शांति दो. (१८) या ओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु. बृहस्पतिप्रसूता अस्यै सं दत्त वीर्यम्.. (१९) जो ओषधियां! सोम राजा की प्रजा हैं, स्वर्ग से आकर धरती पर फैली हैं एवं वृहस्पति से उत्पन्न हैं, वे इस रोगी को शक्ति दें. (१९) मा वो रिषत्खनिता यस्मै चाहं खनामि वः. द्विपच्चतुष्पदस्माकं सर्वमस्त्वनातुरम्.. (२०) हे ओषधियो! मैं तुम्हारा खोदने वाला हूं. तुम मुझे नष्ट मत करना. मैं जिनके लिए तुम्हें खोदता हूं, उसे भी नष्ट मत करना. हमारे दो पैर एवं चार पैरों वाले जीव रोगरहित हों. (२०) याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः. सर्वाः सङ्गत्य वीरुधोऽस्यै सं दत्त वीर्यम्.. (२१) जो ओषधियां मेरा यह स्तोत्र सुन रही हैं अथवा जो दूर चली गई हैं, वे सब एकत्र होकर इस रोगी को शक्ति दें. (२१) ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा. यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि.. (२२) ओषधियां राजा सोम के साथ इस प्रकार बातचीत करती हैं—"हे राजा! स्तोता ब्राह्मण ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—९८ देवता—अनेक
जिसका इलाज करता है, हम उसीको बचाती हैं।” (२२) त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा उपस्तयः. उपस्तिरस्तु सोऽस्माकं यो अस्माँ अभिदासति.. (२३) हे ओषधियो! तुम सबसे श्रेष्ठ हो. सभी वृक्ष तुमसे निम्न हैं. जो हमें हानि पहुंचाता है, वह हमसे नीचा बने. (२३) सूक्त—९८ देवता—अनेक बृहस्पते प्रति मे देवतामिहि मित्रो वा यद्वरुणो वासि पूषा. आदित्यैर्वा यद्वसुभिर्मरुत्वान्तस पर्जन्यं शन्तनवे वृषाय.. (१) हे बृहस्पति! तुम मेरे कल्याण के लिए सब देवों के पास जाओ. तुम मित्र, वरुण, पूषा, आदित्यों तथा वसुओं के साथ इंद्र हो. तुम राजा शांतनु के लिए जल बरसाओ. (१) आ देवो दूतो अजिरश्चिकित्वान्त्वद्देवापे अभि मामगच्छत्. प्रतीचीनः प्रति मामा ववृत्स्व दधामि ते द्युमतीं वाचमासन्.. (२) हे देवापि! कोई ज्ञानी एवं गतिशील देवदूत बनकर तुम्हारे पास से मेरे समीप आवे. हे बृहस्पति! तुम मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे पास आओ. मैं तुम्हारे लिए दीप्तियुक्त स्तुति अपने मुख में धारण करता हूं. (२) अस्मे धेहि द्युमतीं वाचमासन् बृहस्पते अनमीवामिषिराम्. यया वृष्टिं शन्तनवे वनाव दिवो द्रप्सो मधुमाँ आ विवेश.. (३) हे बृहस्पति! तुम एक दीप्तिशालिनी, दोषरहित एवं गमनशील स्तुति को मेरे मुख में धारण करो. उसी स्तुति द्वारा शांतनु के लिए आकाश से वर्षा आवे तथा मधुयुक्त रस टपके. (३) आ नो द्रप्सा मधुमन्तो विशन्त्विन्द्र देह्यधिरथं सहस्रम्. नि षीद होत्रमृतुथा यजस्व देवान्देवापे हविषा सपर्य.. (४) माधुर्ययुक्त वर्षा हमें भली प्रकार व्याप्त करे. हे इंद्र! अपने रथ पर स्थित हजारों प्रकार का धन हमें दो. हे देवापि! हमारे यज्ञ में बैठो, ऋतु के अनुसार होम करो एवं हवि द्वारा देवों को प्रसन्न करो. (४) आर्ष्टिषेणो होत्रमृषिर्निषीदन् देवापिर्देवसुमतिं चिकित्वान्. स उत्तरस्मादधरं समुद्रमपो दिव्या असृजद्वर्ष्या अभि.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
ऋष्टिषेण के पुत्र देवापि ऋषि देवों के प्रति शोभन वृद्धि से युक्त स्तुति करके यज्ञ करने बैठे. उस समय वे ऊपर वाले समुद्र अर्थात् अंतरिक्ष से नीचे वाले सागर में जल ले आए एवं दिव्य जल चारों ओर बरसा. (५) अस्मिन्त्समुद्रे अध्युत्तरस्मिन्नापो देवेभिर्निवृता अतिष्ठन्. ता अद्रवन्नार्ष्टिषेणेन सृष्टा देवापिना प्रेषिता मृक्षिणीषु.. (६) जिस ऊपर वाले सागर अर्थात् आकाश में देवों ने जल को रोक रखा है, उस जल को ऋष्टिषेण के पुत्र देवापि ने बरसाया. वह जल स्वच्छ स्थानों पर बहने लगा. (६) यद्देवापिः शन्तनवे पुरोहितो होत्राय वृतः कृपयन्नदीधेत्. देवश्रुतं वृष्टिवनिं रराणो बृहस्पतिर्वाचमस्मा अयच्छत्.. (७) जब देवापि ने शांतनु का पुरोहित बनकर एवं अग्निहोत्र के लिए वरण प्राप्त करके मेघों द्वारा सुनने योग्य एवं वर्षायाचक स्तोत्र बोला, तब बृहस्पति ने उन्हें बोलने की शक्ति दी. (७) यं त्वा देवापिः शुशुचानो अग्न आर्ष्टिषेणो मनुष्यः समीधे. विश्वेभिर्देवैरनुमद्यमानः प्र पर्जन्यमीरया वृष्टिमन्तम्.. (८) हे अग्नि! ऋष्टिषेण के पुत्र देवापि मनुष्य ने पवित्र होकर तुम्हें भली प्रकार जलाया. तुम सभी देवों से प्रेरित होकर वर्षा वाले बादल को प्रेरणा दो. (८) त्वां पूर्व ऋषयो गीर्भिरायन्त्वामध्वरेषु पुरुहूत विश्वे. सहस्राण्यधिरथान्यस्मे आ नो यज्ञं रोहिदश्वोप याहि.. (९) हे अग्नि! पूर्ववर्ती ऋषि स्तुतियां बोलते हुए तुम्हारे समीप आए हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए अग्नि! इस समय सब यजमान यज्ञों में तुम्हारे पास जाते हैं. राजा शांतनु ने यज्ञ में मुझे हजारों प्रकार की संपत्ति दक्षिणा के रूप में दी. हे रोहित अश्व वाले अग्नि! तुम यहां आओ. (९) एतान्यग्ने नवतिर्नव त्वे आहुतान्यधिरथा सहस्रा. तेभिर्वर्धस्व तन्वः शूर पूर्वीर्दिवो नो वृष्टिरिषितो रीरिहि.. (१०) हे अग्नि! रथ में स्थित निन्यानवे हजार पदार्थ तुम्हें आहुतिरूप से दिए गए. हे शूर अग्नि! उनसे तुम अपना शरीर बढ़ाओ और आकाश से हमारे लिए वर्षा करो. (१०) एतान्यग्ने नवतिं सहस्रा सं प्र यच्छ वृष्ण इन्द्राय भागम्. विद्वान्पथ ऋतुशो देवयानानप्यौलानं दिवि देवेषु धेहि.. (११) हे अग्नि! इन निन्यानवे हजार प्रकार के पदार्थों में से वर्षा करने वाले इंद्र को हिस्सा दो. ebook converter DEMO Watermarks*
तुम देवों के गमन के सभी मार्ग जानते हो. तुम समयानुसार कौरववंशी शांतनु को स्वर्ग में स्थित करो. (११) अग्ने बाधस्व वि मृधो वि दुर्गाहापामीवामप रक्षांसि सेध. अस्मात्समुद्राद् बृहतो दिवो नोऽपां भूमानमुप नः सृजेह.. (१२) हे अग्नि! तुम शत्रुओं की दुर्गम नगरियों को बाधा पहुंचाओ तथा रोगों व राक्षसों को दूर करो. तुम इस द्युलोकरूपी विशाल सागर से हमारे लिए अधिक जल बरसाओ. (१२) सूक्त—९९ देवता—अग्नि कं नश्चित्रमिषण्यसि चिकित्वाम्पृथुग्मानं वाश्रं वावृधध्यै. कत्तस्य दातु शवसो व्युष्टौ तक्षद्वज्रं वृत्रतुरमपिन्वत्.. (१) हे इंद्र! तुम ठीक से जानबूझकर हमें विचित्र धन देते हो. तुम हमारी वृद्धि के लिए वृद्धिशील एवं प्रशंसनीय संपत्ति देते हो. इंद्र के बल की वृद्धि के लिए हमें क्या देना पड़ेगा? त्वष्टा ने इंद्र के लिए वृत्रनाशक वज्र बनाया और उन्होंने वर्षा की है. (१) स हि द्युता विद्युता वेति साम पृथुं योनिमसुरत्वा ससाद. स सनीळेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्य मायाः.. (२) इंद्र दीप्तिशाली आयुध से युक्त होकर यज्ञ में गाए जाते सामगीत सुनने जाते हैं एवं बलपूर्वक अनेक स्थानों पर बैठते हैं. आदित्यों के सातवें भाई एवं सदा साथ रहने वाले मरुतों के सहयोग से शत्रु को हराने वाले इंद्र को छोड़कर कोई कार्य होना संभव नहीं है. (२) स वाजं यातापदुष्पदा यन्त्स्वर्षता परि षदत्सनिष्यन्. अनर्वा यच्छतदुरस्य वेदी घञ्जिञ्छ्रदेवाँ अभि वर्पसा भूत्.. (३) संग्राम में जाने वाले के लिए इंद्र स्खलनरहित गति से जाते हैं एवं शत्रुओं का धन अपने भक्तों में बांटने की इच्छा से संग्राम में स्थित होते हैं. युद्ध में स्थिर इंद्र शत्रु की सौ द्वारों वाली नगरी में स्थित धन को जानकर अपने बल से लाते हैं एवं इंद्रियपरायण दुरात्माओं को हराते हैं. (३) स यह्व्योऽवनीर्गोष्वर्वा जुहोति प्रधन्यासु ससिः. अपादो यत्र युज्यासोऽरथा द्रोण्यश्वास ईरते घृतं वाः.. (४) मेघों में गतिशील एवं चलने में कुशल इंद्र उत्तम धन वाली धरती में महान् जलों को बिखेरते हैं. वहां चरणरहित एवं रथविहीन अर्थात् छोटी-छोटी नदियां एकत्र होकर बिना नावों के घृत के समान जल बहाती हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
स रुद्रेभिरशस्तवार ऋभ्वा हित्वी गयमारॆअवद्य आगात्. वम्रस्य मन्ये मिथुना विवव्री अन्नमभीत्यारोदयन्मुषायन्.. (५) स्तोताओं के बिना मांगे ही धन देने वाले एवं महान् इंद्र मरुतों के साथ अपना स्थान छोड़ कर आवें. मैं समझता हूं कि मुझ वम्र ऋषि के माता-पिता रोगरहित हो गए हैं. मैं शत्रुओं का धन छीनकर उन्हें रुलाता हूं. (५) स इद्वासं तुवीरवं पतिर्दन्-ष्ळक्षं त्रिशीर्षाणं दमन्यत्. अस्य त्रितो न्वोजसा वृधानो विपा वराहमयोअग्रया हन्.. (६) स्वामी इंद्र ने हल्ला मचाने वाले दासों का दमन किया था तथा तीन सिर वाले एवं छः आंखों वाले विश्वरूप को मारा था. त्रित ने इंद्र की शक्ति से बढ़कर लोहे के समान उंगलियों से वराह का नाश किया था. (६) स द्रुह्वणे मनुष ऊर्ध्वसान आ साविषदर्शसानाय शरुम्. स नृतमो नहुषोऽस्मत्सुजातः पुरोऽभिनदर्हन्दस्युहत्ये.. (७) इंद्र शत्रुओं द्वारा युद्ध के लिए ललकारे गए अपने भक्त को शौर्य आदि गुणों से युक्त करके शत्रुनाश में समर्थ बना देते हैं एवं उसे मारने के लिए शस्त्र प्रदान करते हैं. मनुष्यों के सर्वश्रेष्ठ नेता एवं हमारे लिए उत्पन्न इंद्र पूज्य बनकर युद्ध में शत्रुनगरियों को भेदते हैं. (७) सो अभ्रियो न यवस उदन्यन्क्षयाय गातुं विद्नन्नो अस्मे. उप यत्सीददिन्दुं शरीरैः श्येनोऽयोपाष्टिर्हन्ति दस्यून्.. (८) वे इंद्र मेघ समूह के समान घास पैदा होने के लिए जल गिराना चाहते हैं तथा हमारे निवासस्थान के लिए हमें मार्ग बताते हैं. वे जब अपने शरीर के सभी अंगों से सोम प्राप्त करते हैं, तब बाज पक्षी के समान लोहमय पीठ वाले बनकर शत्रुओं को मारते हैं (८) स व्राधतः शवसानेभिरस्य कुत्साय शुष्णं कृपणे परादात्. अयं कविमनयच्छस्यमानमत्कं यो अस्य सनितोत नृणाम्.. (९) इंद्र महान् शत्रुओं को आयुधों द्वारा भगा देते हैं. उन्होंने कुत्स के स्तोत्र के कारण शुष्ण असुर को मारा था. इंद्र ने स्तुति करने वाले उशना कवि के विरोधियों को वश में किया था. वे उशना एवं अन्य मानवों को दान देने वाले हैं. (९) अयं दशस्यन्नर्योभिरस्य दस्मो देवेभिर्वरुणो न मायी. अयं कनीन ऋतुपा अवेद्यामिमीतारुं यश्चतुष्पात्.. (१०) इंद्र ने स्तोताओं को धन देने की इच्छा से मरुतों के साथ धन भेजा. इंद्र अपने तेज के कारण वरुण के समान शक्तिशाली हैं. सुंदर इंद्र समय पर रक्षा करने वाले जाने जाते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
उन्होंने चार पैरों वाले अररू नामक असुर को मारा. (१०) अस्य स्तोमेभिरौशिज ऋजिश्व्रा व्रजं दरयद्वृषभेण पिप्रोः. सुत्वा यद्यजतो दीदयद्गीः पुर इयानो अभि वर्पसा भूत्.. (११) उशिज के पुत्र ऋजिश्व्रा ने इंद्र की स्तुतियों की सहायता से वज्र द्वारा विप्रु की गोशाला तुड़वाई थी. जब सोमरस निचोड़ने वाले तथा यज्ञकर्त्ता उशिज ने स्तुतियां कीं, तब इंद्र ने आगे बढ़ते अपने रूप द्वारा शत्रुनगरों को पराजित किया. (११) एवा महो असुर वक्षथाय वम्रकः पद्भिरुप सर्पदिन्द्रम्. स इयानः करति स्वस्तिमस्मा इषमूर्जं सुक्षितिं विश्वमाभाः.. (१२) हे शक्तिशाली इंद्र! मैं वज्र ऋषि तुम्हें महान् हवि देने की इच्छा से पैदल चलकर तुम्हारे पास आया हूं. तुम मेरे समीप आकर मेरा कल्याण करो तथा मुझे अन्न, रस, शोभन-निवास आदि सभी वस्तुएं दो. (१२) सूक्त—१०० देवता—विश्वेदेव इन्द्र दृह्य मघवन्त्वावदिद्ध्रुज इह स्तुतः सुतपा बोधि नो वृधे. देवेभिर्नः सविता प्रावतु श्रुतमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (१) हे धनस्वामी इंद्र! तुम हमारी भोगप्राप्ति के लिए अपने समान बली शत्रु को मारो. तुम इस यज्ञ में स्तुतियां सुनकर एवं सोमरस पीकर हमारी उन्नति का निश्चय करो. प्रेरक इंद्र अन्य देवों के साथ हमारे यज्ञ की रक्षा करें. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (१) भराय सु भरत भागमृत्वियं प्र वायवे शुचिपे क्रन्ददिष्टये. गौरस्य यः पयसः पीतिमानश आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (२) हे ऋत्विजो! तुम समय-समय पर सबके पोषक इंद्र का भोग भली प्रकार पूरा करो. तुम सोमरस पीने वाले एवं शब्दसहित गमन वाले वायु के लिए भाग दो. वायु देव गौरवर्ण वाले पशु का दूध पीते हैं. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (२) आ नो देवः सविता साविषद्ध्वय ऋजूयते यजमानाय सुन्वते. यथा देवान्प्रतिभूषेम पाकवदा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (३) सविता देव हमारे ऋजुकामी एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को पका हुआ अन्न सामने से प्रस्तुत करें. उससे हम देवों को भूषित करें. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रो अस्मे सुमना अस्तु विश्वहा राजा सोमः सुवितस्याध्येतु नः. यथायथा मित्रधितानि संदधुरा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (४) इंद्र हमारे प्रति अनुग्रहपूर्ण चित्त वाले बनें. सब दिनों में दीप्तिशाली सोम हमारे स्तोत्र को प्राप्त करें. इंद्र ऐसी कृपा करें कि हम मित्रों में निहित धन पा सकें. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (४) इन्द्र उक्थेन शवसा परुर्दधे बृहस्पते प्रतरीतास्यायुषः. यज्ञो मनुः प्रमतिर्नः पिता हि कमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (५) ये इंद्र प्रशंसनीय बल द्वारा हमारे यज्ञ को धारण करते हैं. हे बृहस्पति! तुम मेरी आयु बढ़ाने वाले बनो. मानयुक्त एवं उत्तम बुद्धिवाला यज्ञ हमारा पालक बनकर हमें सुख प्रदान करे. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (५) इन्द्रस्य नु सुकृतं दैव्यं सहोऽग्निर्गृहे जरिता मेधिरः कविः. यज्ञश्च भूद्धिदथे चारुरन्तम आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (६) देवों का बल इंद्र भली प्रकार संपादित करके एवं हमारी यज्ञशाला में वर्तमान है. अग्नि देवों को बुलाने वाले बुद्धिमान्, विद्वान् व यज्ञ के पात्र एवं यज्ञ में हमारे सेव्य हैं. (६) न वो गुहा चकृम भूरि दुष्कृतं नाविष्यं वसवो देवहेळनम्. माकिर्नो देवा अनृतस्य वर्पस आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (७) हे देवो! हम तुम्हारे प्रच्छन्न स्थान में पाप न करें. हे वासदाता देवो! हम तुम्हारे क्रोध के निमित्त द्रोह न करें. हमें झूठे रूप की प्राप्ति न हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (७) अपामीवां सविता साविषन्य१ग्वरीय इदप सेधन्त्वद्रयः. ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (८) सविता देव हमारे रोगों को दूर करें तथा शक्तिशाली पाप को नीचे गिरावें. जिस स्थान पर सोमरस निचोड़ा जाता है, उस स्थान पर पाप नष्ट हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (८) ऊर्ध्वो ग्रावा वसवोऽस्तु सोतरि विश्वा द्वेषांसि सनुतर्युयोत. स नो देवः सविता पायुरुीड्य आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (९) हे देवो! मुझ सोमरस निचोड़ने वाले का पत्थर ऊंचा हो. तुम उसी पत्थर से सब छिपे हुए शत्रुओं को हमसे अलग करो. वे सविता देव हमारे पालक एवं प्रशंसनीय हैं. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्जां गावो यवसे पीवो अत्तन ऋतस्य याः सदने कोशे अङ्ध्वे. त्नूरेव तन्वो अस्तु भेषजमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (१०) हे गायो! तुम घास वाले स्थान में बढ़ा हुआ रस भक्षण करो. जो घास यज्ञशाला अथवा दुहने के स्थान में उगी हुई हो, उसे तुम खाओ. तुम्हारा दूध ही हमारे शरीर की ओषधि हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (१०) ऋतुप्रावा जरिता शश्वतामव इन्द्र इद्ध्रद्रा प्रमतिः सुतावताम्. पूर्णमूर्धदिव्यं यस्य सिक्तय आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (११) यज्ञकर्मों के पूरक, स्तोता एवं सबको बूढ़ा बनाने वाले इंद्र ही सोमरस निचोड़ने वाले यजमानों के रक्षक हैं. उनकी बुद्धि प्रशंसनीय है. इंद्र के पीने के लिए ऊंचा द्रोणकलश सोमरस से भरा जाता है. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (११) चित्रस्ते भानुः ऋतुप्रा अभिष्टिः सन्ति स्पृधो जरणिप्रा अधृष्टाः. रजिष्या रज्या पश्व आ गोस्तूतूर्षति पर्यग्रं दुवस्युः.. (१२) हे इंद्र! तुम्हारा प्रकाश विचित्र यज्ञों को पूर्ण करने वाला एवं चाहने योग्य है. तुम्हारी स्तुतियां स्तोताओं को धन देने वाली एवं अपराजेय हैं. ऋतु के अनुकूल बनी रस्सी से दुवस्यु ऋषि गाय की गर्दन को खींचते हैं. (१२) सूक्त—१०१ देवता—विश्वेदेव उद्बुध्यध्वं समनसः सखायः समग्निमिन्ध्वं बहवः सनीळाः. दधिक्रामग्निमुषसं च देवीमिन्द्रावतोऽवसे नि ह्वये वः.. (१) हे सखा ऋत्विजो! समान मन वाले बनकर जागो. तुम अनेक होकर भी एक स्थान में रहने वालों के समान अग्नि को प्रज्वलित करो. मैं अपनी रक्षा के लिए दधिका, उषा, अग्नि एवं इंद्र को बुलाता हूं. (१) मन्द्रा कृणुध्वं धिय आ तनुध्वं नावमरित्रपरणीं कृणुध्वम्. इष्कृणुध्वमायुधारं कृणुध्वं प्राञ्चं यज्ञं प्र णयता सखायः.. (२) हे मित्र स्तोताओ! तुम मादक स्तुतियां करो, कृषि आदि कर्मों का विस्तार करो, डांड के द्वारा पार लगाने वाली नाव बनाओ, हल एवं जुए आदि उपकरणों को सजाओ तथा यज्ञपात्र अग्नि को भली प्रकार लाओ. (२) युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्. ebook converter DEMO Watermarks*
गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (३) हे मित्र ऋत्विजो! हलों में बैल जोड़ो, जुओं को विस्तृत करो व यहां प्रस्तुत खेत में बीज बोओ. हमारी स्तुतियों के साथ अन्न पर्याप्त मात्रा में हो. हमारा हंसिया समीप की पकी हुई फसल पर गिरे. (३) सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (४) बुद्धिमान् ऋत्विज् हल जोड़ते हैं एवं जुआ हल से अलग करते हैं. धीर पुरुष देवों का स्तोत्र बोलते हैं. (४) निराहावान्कृणोतन सं वरत्रा दधातन. सिञ्चामहा अवतमुद्रिणं वयं सुषेकमनुपक्षितम्.. (५) हे मित्रो! पशुओं के लिए प्याऊ एवं चमड़े की रस्सी बनाओ. हम जलयुक्त सींचने में समर्थ एवं क्षीण न होने वाले गड्ढे से पानी लेकर सींचते हैं. (५) इष्कृताहावमवतं सुवरत्रं सुषेचनम्. उद्रिणं सिञ्चे अक्षितम्.. (६) हम चमड़े की शोभन रस्सियों से युक्त भली प्रकार सिंचित, जल से भरे हुए एवं न सूखने वाले गड्ढे से जल लेकर सींचते हैं. (६) प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम्. द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं सिञ्चता नृपाणम्.. (७) हे ऋत्विजो! बैलों को घास आदि खिलाकर तैयार करो, खेतों को जोतो एवं सरलता से धान्य ढोने वाला रथ तैयार करो. पशुओं की प्याऊ में एक द्रोण जल आता है. पत्थरों के घेरे से घिरे हुए दुर्भिक्ष के समय जल की रक्षा करने वाले तथा मानवों के जलपान के आधार अर्थात् कुएं को पानी से भरो. (७) व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्म सीव्यध्वं बहुला पृथूनि. पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (८) हे ऋत्विजो! गोशाला बनाओ. वही मानवों के जल पीने का स्थान है. तुम मानवों के कवचों को सिओ, जो अनेक एवं विस्तृत हों. तुम लोहे के मजबूत बरतन बनाओ तथा चमस को दृढ़ करो, जिससे पानी न टपके. (८) आ वो धियं यज्ञियां वर्त ऊतये देवा देवीं यजतां यज्ञियामिह. सा नो दुहीयद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (९) हे ऋत्विजो! मैं अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*