ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
एवं अभीष्ट फल देते हैं. वे दान करने वाले को उत्तम बल देते हैं. (४) त्वं दूतः प्रथमो वरेण्यः स हूयमानो अमृताय मत्स्व. त्वां मर्जयन्मरुतो दाशुषो गृहे त्वां स्तोमेभिर्भृगवो वि रुरुचुः.. (५) हे अग्नि! तुम दूत, सर्वश्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हो. तुम बुलाए जाने पर अमरता देने के लिए प्रसन्न बनो. दाता के घर में मरुद्गण तुम्हें सुशोभित करते हैं एवं भृगुवंशी ऋषि स्तोत्रों द्वारा तुम्हें दीप्तिशाली बनाते हैं. (५) इषं दुहन्त्सुदुघां विश्वधायसं यज्ञप्रिये यजमानाय सुक्रतो. अग्ने घृतस्नुस्त्रिर्ऋतानि दीद्यद्वर्तिर्यज्ञं परियन्त्सुकतूयसे.. (६) हे शोभन कर्म वाले अग्नि! यज्ञ में संलग्न यजमान के लिए विश्व को तृप्त करने वाली और यथेष्ट दूध देने वाली गाय से यज्ञफल को दुहो. तुम घृत की आहुति पाकर तीनों लोकों को प्रकाशित करते हुए यज्ञशाला में सर्वत्र वर्तमान हो, गतिशील हो एवं शोभन यज्ञ के समान आचरण करते हो. (६) त्वामिदस्या उषसो व्युष्टिषु दूतं कृण्वाना अयजन्त मानुषाः. त्वां देवा महयाय्याय वावृधुराज्यमग्ने निमृजन्तो अध्वरे.. (७) मनुष्य प्रातःकाल होते ही तुम्हें दूत बनाकर यज्ञ करते हैं. हे अग्नि! देवगण यज्ञ में तुम्हें घृत के द्वारा प्रज्वलित करके पूजा के लिए बढ़ाते हैं. (७) नि त्वा वसिष्ठा अह्वन्त वाजिनं गृणन्तो अग्ने विदथेषु वेधसः. रायस्पोषं यजमानेषु धारय यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे अग्नि! वसिष्ठपुत्र यज्ञों में अनुष्ठान आरंभ करके तुम्हारी स्तुति करते हैं एवं अन्न प्रदान करते हैं. तुम यजमानों के घरों में अधिक अन्न रखो एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (८) सूक्त—१२३ देवता—वेन अयं वेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने. इममपां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति.. (१) ज्योति द्वारा घिरे हुए वेन नामक देव आकाश में सूर्यकिरणों से उत्पन्न जल को धरती पर गिराते हैं. सूर्य के साथ जल के मिलन के समय स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा वेन की अर्चना इस प्रकार करते हैं, जिस प्रकार माता-पिता बच्चों को गीतों से प्रसन्न करते हैं. (१) समुद्रादूर्मिमुदियर्ति वेनो नभोजाः पृष्ठं हर्यतस्य दर्शि.
ऋतस्य सानावधि विष्टपि भ्राट् समानं योनिमभ्यनूषत व्राः.. (२) वेन आकाश से जल की लहरों को गिराते हैं. आकाश में उज्ज्वल मूर्ति वाले वेन की पीठ दिखाई देती है. वेन जल के ऊंचे स्थान आकाश में दीप्ति पाते हैं. वेन के अनुचरों ने उनके उत्पत्तिस्थान आकाश को शब्द से भर दिया है. (२) समानं पूर्वीरभि वावशानास्तिष्ठन्वत्सस्य मातरः सनीळाः. ऋतस्य सानावधि चक्रमाणा रिहन्ति मध्वो अमृतस्य वाणीः.. (३) चारों ओर शब्द करते हुए व बछड़े के समान विद्युत्-अग्नि की माता तुल्य जल वेन के साथ आकाश में स्थिर रहता है. जल के उत्पत्तिस्थान उच्च आकाश में बहते हुए मधुर जल का शब्द वेन को अलंकृत करता है. (३) जानन्तो रूपमकृपन्त विप्रा मृगस्य घोषं महिषस्य हि ग्मन्. ऋतेन यन्तो अधि सिन्धुमस्थुर्विदद्गन्धर्वो अमृतानि नाम.. (४) मेधावियों ने महान् पशु के समान शब्द सुनकर वेन के रूप की कल्पना की. उन्होंने यज्ञ से वेन को तृप्त करके जलसमूह को प्राप्त किया. जल के स्वामी वेन मरणरहित हैं. (४) अप्सरा जारमुपसिष्मियाणा योषा बिभर्ति परमे व्योमन्. चरत्प्रियस्य योनिषु प्रियः सन्तसीदत्पक्षे हिरण्यये स वेनः.. (५) विद्युतरूपी स्त्री ने वेनरूपी पुरुष को देखकर मुसकुराते हुए उनका अंतरिक्ष में आलिंगन किया. वेन ने प्रेमी के समान प्रेयसीरूपिणी बिजली की अभिलाषा पूरी करके सोने के कक्ष में शयन किया. (५) नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा. हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्.. (६) हे वेन! तुम सुनहरे पंखों वाले पक्षी के समान, स्वर्ग में उड़ने वाले, वरुण के दूत, विद्युत्- अग्नि के स्थान अंतरिक्ष में पक्षीरूप में वर्तमान एवं विश्व का भरण करने वाले हो. सब लोग हृदय में प्रेम रखते हुए तुम्हें देखते हैं. (६) ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्चित्रा बिभ्रदस्यायुधानि. वसानो अतकं सुरभिं दृशे कं स्वर्ण नाम जनत प्रियाणि.. (७) वेन जल धारण करने वाले एवं स्वर्ग के ऊंचे स्थान में रहते हैं एवं अपने चारों ओर विचित्र आयुध धारण करते हैं. वे सूर्य के समान अपने सुंदररूप में चमकते हैं एवं सबके अनुकूल जलों को उत्पन्न करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२४ देवता—अग्नि
द्रप्सः समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन्गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन्. भानुः शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (८) जलयुक्त वेन अपना कर्म पूरा करते समय गृद्ध पक्षी के समान दूर तक देखते हुए अंतरिक्ष की ओर जाते हैं. वे उज्ज्वल दीप्ति से प्रकाशित होकर तृतीय लोक अर्थात् आकाश में सबके प्रिय जल का निर्माण करते हैं. (८) सूक्त—१२४ देवता—अग्नि इमं नो अग्न उप यज्ञमेहि पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम्. असो हव्यवाळुत नः पुरोगा ज्योगेव दीर्घं तम आशयिष्ठाः.. (१) हे अग्नि! तुम हमारे पांच नियामकों वाले, तीन प्रकार से अनुष्ठित एवं तीन होताओं वाले यज्ञ में आओ. तुम हमारे हव्यवाहक बनो, हमारे पुरोगामी बनो एवं हमें छोड़कर अधिक समय तक गुफा के अंधेरे में सोओ. (१) अदेवाद्देवः प्रचता गुहा यन्प्रपश्यमानो अमृतत्वमेमि. शिवं यत्सन्तमशिवो जहामि स्वात्सख्यादरणीं नाभिमेमि.. (२) अग्नि ने कहा— मैं देवों की प्रार्थना से गुहा में वर्तमान दीप्तिहीन दशा से दीप्ति को प्राप्त करके सबको देखता हुआ अमरता प्राप्त करता हूं. भली प्रकार पूर्ण हुए यज्ञ को मैं प्रकाशित होकर छोड़ता हूं एवं अपने चिरसखा व उत्पत्तिस्थान अरणि में चला जाता हूं. (२) पश्यन्नन्यस्या अतिथिं वयाया ऋतस्य धाम वि मिमे पुरूणि. शंसामि पित्रे असुराय शेवमयज्ञियाद्यज्ञियं भागमेमि.. (३) मैं आकाश में गमन वाले सूर्य को देखता हुआ ऋतुओं के अनुरूप अनेक प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करता हूं. मैं शक्तिशाली पितरों के सुख के लिए होता बनकर मंत्र बोलता हूं तथा यज्ञ के अनुपयुक्त स्थान से उपयुक्त स्थान में जाता हूं. (३) बह्वीः समा अकरमन्तरस्मिन्निन्द्रं वृणानः पितरं जहामि. अग्निः सोमो वरुणस्ते च्यवन्ते पर्यावर्द्र्राष्ट्रं तदवाम्यायन्.. (४) मैंने इस यज्ञस्थान में अनेक वर्ष बिताए हैं. मैं यहां इंद्र का वरण करता हुआ अपने पिता अरणि को छोड़ता हूं. मेरे छिप जाने पर अग्नि, सोम एवं वरुण का पतन होता है तथा राष्ट्र में अव्यवस्था फैल जाती है. तब मैं आकर असुरों से रक्षा करता हूं. (४) निर्माया उ त्ये असुरा अभूवन्त्वं च मा वरुण कामयासे. ebook converter DEMO Watermarks*
ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि.. (५) मेरे आते ही राक्षस शक्तिहीन हो गए. हे वरुण! तुम भी मेरी अभिलाषा करते हो. हे राजन्! तुम सत्य से मिथ्या को अलग करते हुए मेरे राष्ट्र के अधिपति बनो. (५) इदं स्वरिदमीदास वाममयं प्रकाश उर्व१न्तरिक्षम्. हनाव वृत्रं निरेहि सोम हविष्त्वा सन्तं हविषा यजाम.. (६) हे सोम! देखो, यह स्वर्ग है. यह अत्यंत सुंदर था. यह प्रकाश एवं विस्तृत आकाश है. हे सोम! तुम आओ, जिससे हम वृत्र का वध कर सकें. तुम हवन के योग्य द्रव्य हो. हम अन्य होमसंबंधी द्रव्यों के साथ तुम्हारा यज्ञ करें. (६) कविः कवित्वा दिवि रूपमासजदप्रभूती वरुणो निरपः सृजत्. क्षेमं कृण्वाना जनयो न सिन्धवस्ता अस्य वर्णं शुचयो भरिभ्रति.. (७) क्रांतदर्शी मित्र ने अपने कवित्व से स्वर्ग में अपना तेज स्थिर किया है. वरुण ने बिना प्रयास के ही जल को बादलों से निकाला. जगत् का कल्याण करने वाली नदियां वरुण की पत्नी के समान दीप्तिशालिनी बनकर वरुण के उज्ज्वल रूप को धारण करती हैं. (७) ता अस्य ज्येष्ठमिन्द्रियं सचन्ते ता ईमा क्षेति स्वधया मदन्ती. ता ईं विशो न राजानं वृणाना बीभत्सुवो अप वृत्रादतिष्ठन्.. (८) जल वरुण के अत्यंत विशाल तेज को धारण करते हैं एवं अन्न पाकर प्रसन्न होते हैं. वरुण पत्नी के समान उन जलों के पास आते हैं. जिस प्रकार प्रजा राजा के पास जाती है, उसी प्रकार जल भयभीत होकर वृत्र के पास से वरुण के पास जाकर ठहरते हैं. (८) बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम्. अनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं नि चिक्युः कवयो मनीषा.. (९) उन भयभीत एवं दिव्य जलों का साथी बनकर मित्रता का आचरण करने वाला हंस कहलाता है. स्तुतियोग्य एवं बार-बार जल के पीछे जाने वाले इंद्र की प्रशंसा विद्वान् मंत्रों द्वारा करते हैं. (९) सूक्त—१२५ देवता—परमात्मा अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः. अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा.. (१) वाणी देवी कहती है— ebook converter DEMO Watermarks*
मैं रुद्रों, वसुओं, आदित्यों एवं सभी देवों के साथ विचरण करती हूं. मैं मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि एवं अश्विनीकुमारों को धारण करती हूं. (१) अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्. अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये३यजमानाय सुन्वते.. (२) मैं पत्थर से पीसे जाने वाले सोम, त्वष्टा, पूषा एवं भग को धारण करती हूं. मैं हव्य धारण करने वाले, देवों को शोभन हवि देने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन देती हूं. (२) अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्. तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्.. (३) मैं राष्ट्र की स्वामिनी, धन देने वाली, ज्ञान वाली एवं यज्ञोपयोगी वस्तुओं में सर्वोत्तम हूं. देवों ने मुझे अनेक स्थानों में धारण किया है. मेरा आधार विशाल है. मैं अनेक प्राणियों में आविष्ट हूं. (३) मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्. अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि.. (४) मेरी सहायता से ही प्राणी अन्न खाते हैं, देखते हैं, सांस लेते हैं एवं कही हुई बात सुनते हैं. मुझे न मानने वाले क्षीण हो जाते हैं. हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें श्रद्धा करने योग्य बात बताती हूं. (४) अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः. यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (५) जो व्यक्ति देवों एवं मानवों द्वारा सेवित है, उसे मैं ही उपदेश देती हूं. मैं जिसे चाहती हूं, उसे शक्तिशाली, स्तोता, ऋषि एवं बुद्धिमान् बना देती हूं. (५) अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ. अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (६) मैं ब्रह्मद्वेषी त्रिपुर राक्षस को मारने के लिए ही रुद्र के धनुष का विस्तार करती हूं. मैं ही लोगों के कल्याण के लिए युद्ध करती हूं एवं द्यावा-पृथिवी में व्याप्त हूं. (६) अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व१न्तः समुद्रे. ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७) मैं द्यौ को उत्पन्न करती हूं. आकाश परमात्मा का मस्तक है. मेरा स्थान सागर के जल ebook converter DEMO Watermarks*
में है. वहीं से मैं सारे संसार में विस्तृत होती हूं एवं अपने विशाल शरीर से इस द्युलोक का स्पर्श करती हूं. (७) अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा. परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव.. (८) मैं ही सब भुवनों का निर्माण करती हुई वायु के समान चलती हूं. मेरी महिमाएं ऐसी हैं कि धरती और द्युलोक से भी बड़ी हूं. (८) सूक्त—१२६ देवता—विश्वेदेव न तमंहो न दुरितं देवासो अष्ट मर्त्यम्. सजोषसो यमर्यमा मित्रो नयन्ति वरुणो अति द्विषः.. (१) हे देवो! उस पुरुष को कोई भी अमंगल एवं पाप प्राप्त नहीं करता, जिसे अर्यमा, मित्र एवं वरुण मिलकर शत्रु के हाथ से बचाते हैं. (१) तद्वि वयं वृणीमहे वरुण मित्रार्यमन्. येना निरंहसो यूयं पाथ नेथा च मर्त्यमति द्विषः.. (२) हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! हम तुमसे उसी रक्षा को मांगते हैं, जिससे तुम मानवों को निष्पाप करते हो एवं शत्रुओं से बचाते हो. (२) ते नूनं नोऽयमूतये वरुणो मित्रो अर्यमा. नयिष्ठा उ नो नेषणि पर्षिष्ठा उ नः पर्षण्यति द्विषः.. (३) वरुण, मित्र एवं अर्यमा निश्चय ही हमारी रक्षा करेंगे. तुम हमें आगे ले चलो, पापों से पार करो तथा शत्रु से बचाओ. (३) यूयं विश्वं परि पाथ वरुणो मित्रो अर्यमा. युष्माकं शर्मणि प्रिये स्याम सुप्रणीतयोऽति द्विषः.. (४) हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! तुम संसार की रक्षा करते हो. हे शोभन-नेतृत्व वाले देवो! हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अनुकूल सुख भोगें एवं शत्रुओं से बचें. (४) आदित्यासो अति सिधो वरुणो मित्रो अर्यमा. उग्रं मरुद्धी रुद्रं हुवेमेन्द्रमग्निं स्वस्तयेऽति द्विषः.. (५) आदित्य, वरुण, मित्र और अर्यमा हमें शत्रु से बचावें. हम शत्रु से बचने एवं कल्याण पाने के लिए उग्र रुद्र, मरुद्गण, इंद्र एवं अग्नि को बुलाते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
नेतार ऊ षु णस्तिरो वरुणो मित्रो अर्यमा. अति विश्वानि दुरिता राजानश्चर्षणीनामति द्विषः.. (६) वरुण, मित्र और अर्यमा कुशल नेता हैं. ये हमें पाप से दूर ले जावें. प्रजाओं के स्वामी उक्त देव हमें सभी पापों एवं शत्रुओं से बचावें. (६) शुनमस्मभ्यमूतये वरुणो मित्रो अर्यमा. शर्म यच्छन्तु सप्रथ आदित्यासो यदीमहे अति द्विषः.. (७) वरुण, मित्र और अर्यमा रक्षा के साथ ही हमें सुख दें. आदित्यगण हमें विस्तृत सुख दें एवं शत्रुओं से बचावें. (७) यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः. एवो ष्व१स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः.. (८) यज्ञ करते हुए वसुओं ने पैरों से बंधी हुई गाय को छुड़ा दिया था. हे अग्नि! हमें उसी प्रकार पाप से छुड़ाओ एवं उत्तम तथा विशाल आयु दो. (८) सूक्त—१२७ देवता—रात्रि रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्य१ क्षभिः. विश्वा अधि श्रियोऽधित.. (१) रात्रि देवी आती हुई चारों ओर विस्तृत हुईं एवं उन्होंने नक्षत्रों द्वारा संपूर्ण शोभा प्राप्त की. (१) ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्य१ द्वतः. ज्योतिषा बाधते तमः.. (२) मरणरहित व दिव्य रात्रि ने विस्तृत आकाश को व्याप्त किया तथा नीचे एवं ऊंचे रहने वाले पदार्थों को ढक लिया. रात्रि तारों के प्रकाश से अंधकार को बाधा पहुंचाती है. (२) निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती. अपेदु हासते तमः.. (३) रात्रि देवी ने आकर उषा को अपनी बहिन के रूप में स्वीकार किया तथा अंधकार को हानि पहुंचाई. (३) सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्षमहि. वृक्षो न वसतिं वयः.. (४) हमारे लिए वह रात्रि कल्याणकारिणी बने, जिसके आने पर हम पेड़ पर रहने वाले पक्षियों के समान सो जाते हैं. (४) नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वन्तो नि पक्षिणः. नि श्येनासश्चिदर्थिनः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
सारा गांव शांत है. पैरों से चलने वाले पक्षी एवं गतिशील बाज पक्षी सब सो रहे हैं. (५) यावया वृक्यं१वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये. अथा नः सुतरा भव.. (६) हे रात्रि! तुम भेड़िए, भेड़िए की पत्नी एवं चोर को हमसे दूर करो. तुम हमारे लिए विशेष रीति से सुखकारी बनो. (६) उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित. उष ऋणेव यातय.. (७) सब वस्तुओं को ढकने वाला काला आकार विशेष रूप से मेरे पास तक आ गया है. हे उषा! इस अंधकार को ऋण के समान हटाओ. (७) उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः. रात्रि स्तोमं न जिग्युषे.. (८) हे रात्रि! तुम आकाश की कन्या हो. मुझ शत्रुजयी का यह स्तोत्र तुम स्वीकार करो. मैं गाय के समान तुम्हें यह स्तोत्र भेंट कर रहा हूं. (८) सूक्त—१२८ देवता—विश्वेदेव ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम. मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१) हे अग्नि! संग्रामों में मेरा तेज उचित हो. हम तुम्हें प्रज्वलित करके अपने शरीर को पुष्ट करें. चारों दिशाएं मेरे लिए झुकें. तुम्हें अध्यक्ष बनाकर हम शत्रु सेनाओं को जीतें. (१) मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः. ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामे अस्मिन्.. (२) इंद्र सहित सब देव, मरुत्, विष्णु और अग्नि युद्ध में मेरा साथ दें. अंतरिक्ष के समान विस्तृत लोक मेरा हो तथा वायु मेरी अभिलाषा के अनुसार चलकर मुझे पवित्र करें. (२) मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः. दैव्या होतारो वनुषन्त पूर्वेऽरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (३) देवगण मुझ स्तोता को धन दें. मैं यज्ञफल प्राप्त करूं एवं देवों को बुलाऊं. प्राचीन काल में देवों के लिए हवन करने वाले मेरे अनुकूल हों. मैं शरीर से निरोग एवं शोभन संतान वाला बनूं. (३) मह्यं यजन्तु मम यानि हव्याकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु. एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवासो अधि वोचता नः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
मेरे ऋत्विज् मेरे हव्य आदि का यजन मेरे कल्याण के लिए करें. मेरा मनोरथ पूर्ण हो. मैं किसी भी पाप को न करूं. सभी देव मुझे आशीर्वाद दें. (४) देवीः षळुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह वीरयध्वम्. मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (५) छः विशाल देवियां मेरी उन्नति करें. हे सब देवो! मेरे यज्ञ में वीरता का कार्य करो. मैं शरीर और प्रजा संबंधी कोई हानि न उठाऊं. हे राजा सोम! हम शत्रु के सामने न हारें. (५) अग्ने मन्युं प्रतिनुदन्परेषामदब्धो गोपाः परि पाहि नस्त्वम्. प्रत्यञ्चो यन्तु निगुतः पुनस्तेऽमैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (६) हे अग्नि! तुम शत्रुओं का क्रोध व्यर्थ करके अपराजेय बनकर हमारी रक्षा करो. शत्रु अपने उद्देश्य में असफल होकर लौटे. यदि शत्रुओं के पास बुद्धि हो तो नष्ट हो जाए. (६) धाता धातॄणां भुवनस्य यस्पतिर्देवं त्रातारमभिमातिषाहम्. इमं यज्ञमश्विनोभा बृहस्पतिर्देवाः पान्तु यजमानं न्यर्थात्.. (७) मैं सृष्टिकर्त्ताओं के स्रष्टा, सकल भुवन के रक्षक, दिव्य, सब भयों से छुड़ाने वाले एवं शत्रुपराभवकारी सविता की स्तुति करता हूं. अश्विनीकुमार एवं बृहस्पति! इस यज्ञ तथा यजमान की पाप से रक्षा करें. (७) उरुव्यचा नो महिषः शर्म यंसदस्मिन्हवे पुरुहूतः पुरुक्षुः. स नः प्रजायै हर्यश्व मृळयेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८) परम विस्तृत, पूज्य, बहुतों द्वारा बुलाए गए व अनेक निवासस्थानों वाले इंद्र इस यज्ञ में हमें कल्याण दें. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! तुम हमारी संतान को सुखी करो, हमारी हिंसा मत करो और हमें मत त्यागो. (८) ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान्. वसवो रुद्रा आदित्या उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्.. (९) जो हमारे शत्रु हैं, वे दूर चले जावें. हम इंद्र और अग्नि की सहायता से उन्हें बाधा पहुंचावें. वसु, रुद्र और आदित्य मुझे सर्वश्रेष्ठ उन्नत शक्ति वाला चेतनायुक्त सर्वज्ञ एवं सबका स्वामी बनावें. (९) सूक्त—१२९ देवता—परमात्मा नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्. किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् था. उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था. न कोई आवरण था और न ढकने योग्य पदार्थ था. कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग था. उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था. (१) न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः. आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास.. (२) उस समय न मृत्यु थी और न अमृत था. न रात्रि थी और न दिन का ज्ञान था. उस समय एकमात्र ब्रह्मा ही स्वधा के साथ प्राणयुक्त था. उससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं था. (२) तम आसीत्तमसा गूळहमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्. तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्.. (३) प्रलय दशा में सब कुछ अंधकार से घिरा हुआ था एवं सब ओर अंधकार था. यह सारा दृश्यमान जगत् जल के रूप में अज्ञात था. सारा विश्व तुच्छ अंधकार से ढका था. महान् तप से कारणकार्यरूप विभाग से रहित ब्रह्म उत्पन्न हुआ. (३) कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्. सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा.. (४) परमेश्वर के मन में सबसे पहले सृष्टिरचना की इच्छा उत्पन्न हुई. वही सबसे पहले मन में सृष्टि का बीज बनी. विद्वानों ने बुद्धि से हृदय में विचार किया एवं असत् में सत् के कारण को खोजा. (४) तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्. रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्.. (५) आकाश आदि की सृष्टि करने वाले परमात्मा के तेज की किरणें क्या तिरछी थीं, नीचे की ओर थीं अथवा ऊपर की ओर थीं? बीजरूप कर्म को धारण करने वाले जीव थे एवं महान् आकाश आदि भोग्य थे. उस समय अन्न निकृष्ट एवं भोक्ता उत्कृष्ट था. (५) को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः. अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनैनाथा को वेद यत आबभूव.. (६) कौन संपूर्ण रूप से जानता है और कौन इस सृष्टि के विषय में कह सकता है? यह सृष्टि किन-किन कारणों से उत्पन्न हुई है? देवगण भूतसृष्टि के बाद उत्पन्न हुए हैं. यह विश्व जिससे उत्पन्न हुआ है, उसे कौन जानता है? (६) इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न. यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३० देवता—प्रजापति
यह विशेष सृष्टि जिससे उत्पन्न हुई है, पता नहीं वह इसे धारण करता है अथवा नहीं. विस्तृत आकाश में जो इस सृष्टि का अध्यक्ष है, पता नहीं वह उसे जानता है या नहीं जानता. (७) सूक्त—१३० देवता—प्रजापति यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः. इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते.. (१) आकाश आदि तंतुओं द्वारा जो सर्गरूप यज्ञ सब ओर विस्तृत है, वह सौ देव संबंधी कर्मों से व्याप्त है. प्रजापति के पालक देव जो सारी सृष्टि में व्याप्त हैं, वे इस प्रपंच का निर्माण करते हैं. वे ही इस विस्तृत विश्व के प्राण हैं. (१) पुमाँ एनं तनुत उत्कृणत्ति पुमान्वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्. इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुस्तसराण्योतवे.. (२) प्रजापति इस सृष्टिरूपी यज्ञ को विस्तृत करता है एवं वही इसे संकुचित करता है. वही धरती एवं स्वर्ग में इस सृष्टिरूपी यज्ञ का विस्तार करता है. प्रजापति की किरण के समान ये देव यज्ञस्थान में बैठे थे. इन्होंने यज्ञरूपी वस्त्र को बुनने के लिए तिरछे धागे के रूप में साममंत्रों का निर्माण किया. (२) कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्. छन्दः किमासीत्प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे.. (३) जिस समय सभी देवों ने प्रजापति का यज्ञ किया, उस समय क्या प्रमाण था? उस समय देवमूर्ति क्या थी? उस यज्ञ का फल, घृत, समिधाएं, छंद और उक्थमंत्र क्या थे? (३) अग्नेर्गायत्र्यभवत्सायुग्वोष्णिहया सविता सं बभूव. अनुष्टुभा सोम उक्थैर्महस्वान्बृहस्पतेर्बृहती वाचमावत्.. (४) गायत्री छंद अग्नि का तथा उष्णिक छंद सविता का सहायक हुआ. सोम अनुष्टुप् छंद से तथा तेजस्वी सूर्य उक्थ छंद से युक्त हुए. बृहती छंद ने बृहस्पति के वचनों का सहारा लिया. (४) विराण्मित्रावरुणयोरभिश्रीरिन्द्रस्य त्रिष्टुबिह भागो अह्नः. विश्वान्देवाञ्जगत्या विवेश तेन चाक्लृप्र ऋषयो मनुष्याः.. (५) विराट् छंद मित्र और वरुण का आश्रित हुआ. त्रिष्टुप् छंद एवं माध्यंदिन का सोमरस इंद्र के भाग में पड़ा. जगती छंद ने सभी देवों का आश्रय लिया. इन छंदों द्वारा ऋषियों और eBook converter DEMO Watermarks*
मनुष्यों ने यज्ञ की कल्पना की. (५) चाक्लृप्रे तेन ऋषयो मनुष्या यज्ञे जाते पितरो नः पुराणे. पश्यन्मन्ये मनसा चक्षसा तान् य इमं यज्ञमयजन्त पूर्वे.. (६) यज्ञ के उत्पन्न होने पर हमारे प्राचीन पितरों अर्थात् ऋषियों और मनुष्यों ने उक्त छंदों की सहायता से यज्ञ पूर्ण किया. जिन पूर्व पुरुषों ने इस यज्ञ को पूर्ण किया था, उन्हें मैं मन की आंखों से देख रहा हूं. मैं ऐसा मानता हूं. (६) सहस्तोमाः सहछन्दस आवृतः सहप्रमा ऋषयः सप्त दैव्याः. पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा अन्वालेभिरे रथ्यो३ न रश्मीन्.. (७) सात दिव्य ऋषियों ने यज्ञ के मंत्र, छंद एवं नियम एक साथ जानकर यज्ञ का अनुष्ठान किया. जिस प्रकार सारथि घोड़ों की लगाम पकड़ता है, उसी प्रकार धीर ऋषियों ने प्राचीन लोगों के मार्ग का अनुसरण किया. (७) सूक्त—१३१ देवता—अश्विनीकुमार व इंद्र अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व. अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन्मदेम.. (१) हे शत्रुपराभवकारी इंद्र! हमारे सामने, पीछे, उत्तर और दक्षिण में जो शत्रु हैं, उन्हें समाप्त करो. हे शूर इंद्र! तुम्हारे पास विशेष सुख पाकर हम प्रसन्न हों. (१) कुविद्वङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय. इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमोवृक्तिं न जग्मुः.. (२) हे इंद्र! जौ के खेत के मालिक जिस प्रकार उसे क्रमशः अनेक बार में काटते हैं, उसी प्रकार उन लोगों की भोजन सामग्री नष्ट करो जो ‘नमः’ शब्द का उच्चारण नहीं करते एवं यज्ञ का अनुष्ठान नहीं करते. (२) नहि स्थूर्युतुथा यातमस्ति नोत श्रवो विवदे सङ्गमेषु. गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः.. (३) एक पहिए वाली गाड़ी उचित समय पर कहीं नहीं पहुंच सकती. उससे युद्ध के समय भी अन्न नहीं मिल सकता. गौ, अश्व एवं अन्न की अभिलाषा करने वाले लोग इंद्र की मित्रता चाहते हैं. (३) युवं सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा. विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे उदक के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुमने नमुचि असुर के साथ इंद्र के युद्ध के अवसर पर सोमरस पीकर इंद्र के कार्य में सहायता दी थी. (४) पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दंसनाभिः. यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार माता-पिता पुत्र की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुमने सोमरस पीकर अपने प्रशंसनीय कर्मों एवं शक्तियों के साथ इंद्र की रक्षा की थी. हे इंद्र! सरस्वती तुम्हारे समीप थीं. (५) इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः. बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (६) उत्तम रक्षक, धनवान् एवं सर्वज्ञ इंद्र अपने रक्षासाधनों द्वारा सुख पहुंचाने वाले बनें. वे शत्रुओं को बाधा पहुंचावें एवं हमें भयरहित बनावें. हम उत्तम बल के स्वामी बनें. (६) तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम. स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (७) हम यज्ञ का भाग ग्रहण करने वाले इंद्र की कल्याणकारिणी कृपादृष्टि में रहें. वे शोभन रक्षक एवं धनी इंद्र हमारे समीपवर्ती एवं दूरवर्ती शत्रु को हमसे अलग करें. (७) सूक्त—१३२ देवता—मित्र व वरुण ईजानमिद् द्यौर्गूर्तावसुरीजानं भूमिरभि प्रभूषणि. ईजानं देवावश्विनावभि सुम्नैरवर्धताम्.. (१) स्वर्ग यज्ञकर्त्ता के लिए ही धन धारण करता है. भूमि उसीको संपत्ति वाला बनाती है. अश्विनीकुमार देवयज्ञकर्त्ता को ही नाना सुखसामग्री द्वारा बढ़ाते हैं. (१) ता वां मित्रावरुणा धारयत्क्षिती सुषुम्नेषितत्वता यजामसि. युवोः क्राणाय सख्यैरभि ष्याम रक्षसः.. (२) हे धरती को धारण करने वाले मित्र व वरुण! हम सुख के उत्तम साधन पाने के लिए तुम्हारी पूजा करते हैं. यज्ञकर्त्ता के प्रति तुम दोनों का जो मित्रता का भाव है, उसी के द्वारा हम राक्षसों को जीतें. (२) अधा चिन्नु यदिद्विषामहे वामभि प्रियं रेक्णः पत्यमानाः. दद्वाँ वा यत्पुष्यति रेक्णः सम्बारन्नकिरस्य मघानि.. (३)
हे मित्रवरुण! जिस समय हम तुम्हारे लिए हव्य धारण करने की इच्छा करते हैं, उसी समय हम प्रिय धन के पास पहुंच जाते हैं. तुम्हें हव्य देने वाला जो धन प्राप्त करता है, उसको कोई भी नष्ट नहीं कर सकता. (३) असावन्यो असुर सूयत द्यौस्त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा. मूर्धा रथस्य चाकन्नैतावतैनासान्तकध्रुक्.. (४) हे शक्तिशाली मित्र! स्वर्ग जिसे उत्पन्न करता है, वह सूर्य तुमसे भिन्न है. हे वरुण! तुम सबके राजा हो. तुम्हारे रथ का ऊपरी भाग इधर ही आ रहा है. यह यज्ञ राक्षसों को नष्ट करने वाला है. इसे पाप नहीं छू पाता. (४) अस्मिन्त्स्वे३ तच्छकपूत एनो हिते मित्रे निगतान्हन्ति वीरान्. अवोर्वा यद्द्वात्तनूष्ववः प्रियासु यज्ञियास्वर्वा.. (५) मित्र देव के हितैषी बन जाने के कारण मुझ शकपूत ऋषि में स्थित पाप नीच शत्रुओं को नष्ट करता है. मित्र देव आकर हमारे शरीरों की रक्षा करें तथा यज्ञों की प्रिय सामग्री को सुरक्षित करें. (५) युवोर्हि मातादितिर्विचेतसा द्यौर्न भूमिः पयसा पुपूतनि. अव प्रिया दिदिष्टन सूरो निनिक्त रश्मिभिः.. (६) हे विशिष्ट ज्ञान वाले मित्र एवं वरुण! अदिति तुम्हारी माता है. तुम धरती और आकाश को जल से भर दो. तुम नीचे वाले लोक में प्रिय वस्तुएं दो एवं सूर्य की किरणों द्वारा सारे संसार को पवित्र बनाओ. (६) युवं ह्यप्रराजावसीदतं तिष्ठद्रथं न धूर्षदं वनर्षदम्. ता नः कणूकयन्तीर्नृमेधस्तत्रे अंहसः सुमेधस्तत्रे अंहसः.. (७) हे मित्र व वरुण! तुम अपने-अपने कर्मों से दीप्तिशाली बनकर अपने स्थानों पर ठहरो. वन में घूमने वाला तुम्हारा रथ घोड़ों के मार्ग में स्थित है. तुम दोनों जोर से चिल्लाते हुए शत्रुओं को हराने के लिए रथ में बैठते हो. बुद्धिमान् ऋषि नृमेध से छूट चुके हैं. (७) सूक्त—१३३ देवता—इंद्र प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत. अभीके चिदु लोककृत्सङ्गे समत्सु वृत्रहास्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (१) हे स्तोताओ! इंद्र के रथ के आगे चलने वाली सेना की भली-भांति पूजा करो. इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
शत्रुसेनाओं के समीप आ जाने पर भी भागते नहीं. वे शत्रुओं का वध करते हैं. वे हमारे कार्यों को जानें. शत्रुओं के धनुषों पर चढ़ी हुई डोरियां नष्ट हों. (१) त्वं सिन्धूँरवासृजोऽधराचो अहन्नहिम. अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यं तं त्वा परि ष्वजामहे. नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (२) हे इंद्र! नीचे बहने वाली नदियों को तुम्हीं ने मुक्त किया है. तुम्हीं ने मेघ का नाश किया है. हे इंद्र! तुम शत्रुरहित बनकर जन्म लेते हो एवं विश्व का पालन करते हो. तुम्हें सर्वोत्तम जानकर हम तुम्हें स्तुतियों से वश में करते हैं. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (२) वि षु विश्वा अरातयोऽर्यो नशन्त नो धियः. अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघांसति या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (३) हे इंद्र! सभी दानरहित शत्रु नष्ट हों और तुम्हारी स्तुतियां प्रारंभ हों. जो हमें मारना चाहता है. उस शत्रु को तुम मारो. तुम्हारी दानशीलता हमें धन दे तथा शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (३) यो न इन्द्राभितो जनो वृकायुरादिदेशति. अधस्पदं तमीं कृधि विबाधो असि सासहिनर्भन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (४) हे इंद्र! जो आयुध लिए हमारे चारों ओर भेड़ियों के समान घूमते हैं, उन्हें तुम धराशायी करो. तुम शत्रुओं के बाधक एवं पराभवकारी हो. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (४) यो न इन्द्राभिदासति सनाभिर्यश्च निष्ट्यः. अव तस्य बलं तिर महीव द्यौरध त्मना नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (५) हे इंद्र! हमारे समान जन्म वाला जो नीच शत्रु हमें नष्ट करना चाहता है, उसकी शक्ति को इस प्रकार नीचा दिखाओ, जिस प्रकार आकाश धरती को अपने से नीचा रखता है. हमारे शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (५) वयमिन्द्र त्वायवः सखित्वमा रभामहे. ऋतस्य नः पथा नयाति विश्वानि दुरिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (६) हे इंद्र! हम तुम्हारी मित्रता की इच्छा करते हैं एवं तुम्हारी मित्रता के अनुकूल कार्य करते हैं. तुम हमें पुण्य कर्मों वाले मार्ग से आगे ले चलो. हम सभी पापों से पार हों. हमारे शत्रुओं के धनुष की डोरियां नष्ट हों. (६) अस्मभ्यं सु त्वमिन्द्र तां शिक्ष या दोहते प्रति वरं जरित्रे. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३४ देवता—इंद्र
अच्छिद्रोध्नी पीपयद्यथा नः सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (७) हे इंद्र! तुम हमारे लिए यह विद्या सिखाओ, जिससे स्तोता की अभिलाषा पूर्ण हो. यह धरित्रीरूपी बड़े थनों वाली गाय हजार धाराओं में दूध गिराकर हमें सुखी करे. (७) सूक्त—१३४ देवता—इंद्र उभे यदिन्द्र रोदसी आप्राथोषाइव. महान्तं त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनां देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (१) हे इंद्र! तुम उषा के समान धरती-आकाश दोनों को अपने तेज से पूर्ण करते हो. तुम अतिशय महान् एवं मानव प्रजाओं में राजा हो. देवी एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें उत्पन्न किया है. (१) अव स्म दुर्हणायतो मर्तस्य तनुहि स्थिरम्. अधस्पदं तमीं कृधि यो अस्माँ आदिदेशति देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (२) हे इंद्र! जो व्यक्ति हमारा हनन करना चाहता है, उसके स्थिर बल को भी तुम क्षीण करो. जो हमारा नाश करना चाहता है, उसे तुम अपने पैरों से कुचल दो. दिव्य गुण वाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (२) अव त्या बृहतीरिषो विश्वश्चन्द्रा अमित्रहन्. शचीभिः शक्र धूनुहीन्द्र विश्वाभिरूतिभि र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (३) हे शत्रुनाशक एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम अपनी शक्तियों द्वारा सर्वसुखकारी एवं विस्तृत अन्न को हमारी ओर भेजो और सभी साधनों से हमारी रक्षा करो. दिव्य गुणवाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (३) अव यत्त्वं शतक्रतविन्द्र विश्वानि धूनुषे. रयिं न सुन्वते सचा सहीस्रिणीभिरूतिभि र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (४) हे शतक्रतु इंद्र! जिस समय तुम सभी प्रकार के अन्न प्रेषित करोगे, उस समय सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को हजारों रक्षासाधनों से बचाओगे. दिव्य गुण वाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
अव स्वेदाइवाभितो विष्वक्पतन्तु दिद्यवः. दूर्वायाइव तन्तवो व्य१स्मदेतु दुर्मति र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (५) इंद्र के दीप्तिशाली आयुध पसीने की बूंदों के समान चारों ओर गिरें. वे दूध के तंतुओं के समान फैलें और दुर्बुद्धि हमसे दूर जावें. दिव्य गुण वाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (५) दीर्घ ह्याङ्कुशं यथा शक्तिं बिभर्षि मन्तुमः. पूर्वेण मघवन्पदाजो वयां यथा यमो देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (६) हे ज्ञानी एवं धनी इंद्र! तुम अपने शक्ति नामक आयुध को अंकुश के समान धारण करते हो. बकरा जिस प्रकार अपने अगले पैरों से पेड़ की शाखा को खींचता है, उसी प्रकार तुम अपनी शक्ति से शत्रुओं को खींचते हो. दिव्य गुण वाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (६) नकिर्देवा मिनीमसि नकिरा योपयामसि मन्त्रश्रुत्यं चरामसि. पक्षेभिरपिक्षेभिरत्राभि सं रभामहे.. (७) हे देवो! हम तुम्हारे कर्मों में कोई भूल नहीं करते. हम तुम्हारे किसी काम में उदासी नहीं बरतते. हम मंत्र और श्रुति के अनुसार चलते हैं एवं दोनों हाथों में यज्ञ सामग्री लेकर यज्ञ पूर्ण करते हैं. (७) सूक्त—१३५ देवता—यम यस्मिन्व्रक्षे सुपलाशे देवैः सम्पिबते यमः. अत्रा नो विशपतिः पिता पुराणाँ अनु वेनति.. (१) नचिकेता ने कहा—"जिस सुंदर पत्तों वाले वृक्ष पर यम देवों के साथ भोग करते हैं, प्रजाओं के पति हमारे पिता की इच्छा है कि मैं उसी वृक्ष पर जाकर अपने पूर्वजों से मिलूं. (१) पुराणाँ अनुवेनन्तं चरन्तं पापयामुया. असूयन्नभ्यचाकशं तस्मा अस्पृहयं पुनः.. (२) मेरे पिता ने निर्दयतापूर्वक आज्ञा दी कि मैं अपने पूर्वजों का साथी बनूं. मैंने निंदापूर्वक उनकी ओर देखा. अब मैं उनके प्रति अनुराग रखता हूं." (२) यं कुमार नवं रथमचक्रं मनसाकृणोः. एकेषं विश्वतः प्राञ्चमपश्यन्नधि तिष्ठसि.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
यम ने कहा—"हे कुमार नचिकेता! तुमने अपने ही मन से बिना पहियों वाला, एक दंड वाला, सब ओर जाने वाला व नवीन रथ चाहा था. बिना विचारे ही तुम उस पर बैठ गए हो. (३) यं कुमार प्रावर्तयो रथं विप्रेभ्यस्परि. तं सामानु प्रावर्तत समितो नाव्याहितम्.. (४) हे कुमार नचिकेता! तुमने मेधावियों से ऊपर आकाश में उस रथ को चलाया है. तुमने उस रथ को पिता की सलाह के अनुसार चलाया है. तुम्हारे पिता की उपदेश रूपी नौका पर चढ़ कर यह रथ यहां आया है." (४) कः कुमारमजनयद्रथं को निरवर्तयत्. कः स्वित्तदद्य नो ब्रूयादनुदेयी यथाभवत्.. (५) "इस बालक को किसने जन्म दिया एवं इस रथ को किसने यहां भेजा?" आज मुझे यह बात कौन बताएगा कि इसे किस प्रकार उपदेश देकर लौटाया जाए? (५) यथाभवदनुदेयी ततो अग्रमजायत. पुरस्ताद् बुध्न आततः पश्चान्निर्यणं कृतम्.. (६) यह बालक जिस बात को सुनकर जीवलोक में लौटेगा, वह इसे पहले ही बता दी गई थी. पहले यम के घर जाने का पिता का आदेश हुआ. इसके बाद लौटने की शर्त बताई गई." (६) इदं यमस्य सादनं देवमानं यदुच्यते. इयमस्य धम्यते नाळीरयं गीर्भिः परिष्कृतः.. (७) यम का यही निवासस्थान देवों द्वारा निर्मित बताया जाता है. यम की प्रसन्नता के लिए यह बांसुरी बजाई जाती है और इसे स्तुतियों से सुशोभित किया जाता है. (७) सूक्त—१३६ देवता—अग्नि, सूर्य, वायु केश्य१ग्निं केशी विषं केशी बिभर्ति रोदसी. केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरुच्यते.. (१) सूर्य अग्नि, जल और द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. सूर्य प्रकाश के द्वारा संसार को देखने योग्य बनाते हैं. इस प्रकाश का नाम ही सूर्य है. (१) मुनयो वातरशनाः पिशङ्गा वसते मला. वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद्देवासो अविक्षत.. (२) वातरशन के मुनिपुत्र पीले रंग के वल्कल धारण करते हैं. देवों ने देवत्व प्राप्त किया एवं वायु की गति से चलने लगे. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आ तस्थिमा वयम्. शरीरेदस्माकं यूयं मर्तासो अभि पश्यथ.. (३) हम सब लोक का व्यवहार त्यागकर मतवाले हो गए हैं और वायु के ऊपर स्थित हैं. हे मनुष्यो! तुम हमारा शरीर ही देख पाते हो. (३) अन्तरिक्षेण पतति विश्वा रूपावचाकशत्. मुनिर्देवस्य देवस्य सौकृत्याय सखा हितः.. (४) मुनि आकाश में उड़ते हैं एवं सारे रूपों को देखते हैं. देवों के प्रियमित्र मुनि उत्तम कार्य करने के लिए ही जीते हैं. (४) वातस्याश्वो वायोः सखाथो देवेषितो मुनिः. उभौ समुद्रावा क्षेति यश्च पूर्व उतापरः.. (५) मुनि वायु का भोजन करने वाले, वायु के मित्र एवं देवों द्वारा अभिलषित हैं. वे पूर्व और पश्चिम दोनों सागरों में निवास करते हैं. (५) अप्सरसां गन्धर्वाणां मृगाणां चरणे चरन्. केशी केतस्य विद्वान्सखा स्वादुर्मदिन्तमः.. (६) केशी अप्सराओं व गंधर्वों के विचरणस्थान अंतरिक्ष में तथा पशुओं के विचरणस्थल धरती पर घूमते हैं. वे सभी जानने योग्य बातों को जानते हैं, सब रसों के उत्पादक हैं एवं अतिशय आनंददाता है. (६) वायुरस्मा उपामन्थत्पिनष्टि स्मा कुनन्नमा. केशी विषस्य पात्रेण यद्रुद्रेणापिबत्सह.. (७) सूर्य रुद्रपुत्र मरुतों के साथ अपने किरण रूपी पात्रों द्वारा जब जल पीते हैं, उस समय वायु उस जल को हिलाकर माध्यमिका वाणी को पूर्ण कर देते हैं. (७) सूक्त—१३७ देवता—विश्वेदेव उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः. उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः.. (१) हे देवो! मुझ गिरे हुए को ऊपर उठाओ. मुझ पाप करने वाले की तुम रक्षा करो एवं मुझे चिरजीवी बनाओ. (१) द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः. दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातु यद्रपः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
दो प्रकार की वायु समुद्र तक एवं उससे भी आगे बहती हैं. हे स्तोता! एक वायु तुम्हें शक्ति दे और दूसरी तुम्हारा पाप नष्ट करे. (२) आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः. त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे.. (३) हे इधर जाने वाली वायु! तुम ओषधियां लाओ. हे उधर जाने वाली वायु! तुम पापों को ले जाओ. तुम सभी ओषधियों के समान हो एवं देवों की दूत बनकर चलती हो. (३) आ त्वागमं शन्तातिभिरथो अरिष्टतातिभिः. दक्षं ते भद्रमाभार्षं परा यक्ष्मं सुवामि ते.. (४) हे यजमान! मैं तुम्हारे लिए सुखकारी एवं कष्टविनाशक रक्षासाधन लेकर आया हूं. मैंने तुम में कल्याणकारी शक्ति भरी है. मैं अब तुम्हारे रोग को दूर करता हूं. (४) त्रायन्तामिह देवास्त्रायतां मरुतां गणः. त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत्.. (५) इस स्थान पर देव, मरुद्गण एवं सभी प्राणी रक्षा करें. इस प्रकार यह व्यक्ति रोगरहित बने. (५) आप इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः. आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (६) जल ही भेषज के समान रोगों को नष्ट करने वाले एवं सब प्राणियों के रोगनाशक हैं. वे ही जल तुम्हारे लिए ओषधि का कार्य करें. (६) हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी. अनामयित्नुभ्यां त्वा ताभ्यां त्वोप स्पृशामसि.. (७) हाथ की दस उंगलियों के साथ-साथ वचन के आगे-आगे जीभ चलती है. मैं अपने रोगनाशक हाथों द्वारा तुम्हें छूता हूं. (७) सूक्त—१३८ देवता—इंद्र तव त्य इन्द्र सख्येषु वह्नय ऋतं मन्वाना व्यदर्दिर्वलम्. यत्रा दशस्यन्नुषसो रिणन्नपः कुत्साय मन्मन्नह्याश्च दंसयः.. (१) हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता पाने के लिए हव्य वहन करने वाले एवं यज्ञ अनुष्ठानकर्त्ता लोगों ने बल राक्षस का नाश कर दिया है. उस समय स्तुति होने पर तुमने कुत्स को उषा का प्रकाश ebook converter DEMO Watermarks*