ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
अयमुशानः पर्यद्रिमुस्रा ऋतधीतिभिर्ऋतयुग्युजानः. रुजदरुग्णं वि वलस्य सानुं पर्णीर्वचोभिरभि योधदिन्द्रः.. (२) इन इंद्र ने पर्वत के द्वारा घिरी हुई गायों के उद्धार की इच्छा से यज्ञ करने वाले अंगिरागोत्रीय ऋषियों की सच्ची स्तुतियों से प्रभावित होकर असुर को सहायता करने वाले पर्वत को तोड़ा एवं अपने प्रसिद्ध आयुधों से पणियों से युद्ध किया. (२) अयं द्योतयदद्युतो व्य१क्तून्दोषा वस्तोः शरद इन्दुरिन्द्र. इमं केतुमदधुर्नू चिदह्नां शुचिजन्मन उषसश्चकार.. (३) हे इंद्र! इस सोमरस ने दीप्तिरहित रात, दिन, वर्ष आदि को प्रकाशित किया था. देवों ने पहले सोम को दिवसों के झंडे के रूप में स्वीकार किया था. इसी सोमरस ने उषाओं को शोभनजन्म वाली बनाया था. (३) अयं रोचयदरुचो रुचानो३यं वासयदव्यृ१ तेन पूर्वीः. अयमीयत ऋतयुग्भिरश्वैः स्वर्विदा नाभिना चर्षणिप्राः.. (४) इन्हीं दीप्तिशून्य इंद्र ने सूर्य के रूप में प्रकाशित होकर सब लोकों को प्रकाशयुक्त एवं तेज के द्वारा उषाओं को तेजपूर्ण किया था. प्रजाओं की अभिलाषाएं पूरी करने वाले इंद्र ने स्तुतियों के अनुसार चलने वाले घोड़ों से खींचे गए एवं धन प्राप्त करने वाले रथ पर बैठकर गमन किया था. (४) नू गृणानो गृणते रत्न राजन्निषः पिन्व वसुदेयाय पूर्वीः. अप ओषधीरविषा वनानि गा अर्वतो नॄन्चसे रिरीहि.. (५) हे प्राचीन एवं तेजस्वी इंद्र! तुम स्तुति सुनकर धन के पात्र स्तोता को अधिक अन्न दो. तुम उसे जल, ओषधियां, विषहीन वन, गाएं, घोड़े एवं सेवक प्रदान करो. (५) सूक्त—४० देवता—इंद्र इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायाव स्य हरी वि मुचा सखाया. उत प्र गाय गण आ निषद्याथा यज्ञाय गृणते वयो धाः.. (१) हे इंद्र! यह सोम तुम्हारा नशा बढ़ाने के लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ. अपने मित्ररूप घोड़ों को रथ में जोतो एवं यात्रा के बाद उन्हें छोड़ दो. तुम स्तोताओं के बीच बैठकर स्तुतियां गाओ एवं अपने स्तोता को अन्न दो. (१) अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्. तमु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समह्वन्पीतये समस्मै.. (२)
हे महान् इंद्र! तुमने जन्म लेते ही जिस प्रकार सोमरस पिया था, उसी प्रकार प्रसन्नता पाने के लिए यह सोम पिओ. तुम्हारे पीने के लिए गाएं, जल, पत्थर एवं सोमलता एकत्र की गई हैं. (२) समिद्धे अग्नौ सुत इन्द्र सोम आ त्वा वहन्तु हरयो वहिष्ठाः. त्वायता मनसा जोहवीमीन्द्रा याहि सुविताय महे नः.. (३) हे इंद्र! अग्नि प्रज्वलित एवं सोमरस निचुड़ जाने पर तुम्हारे वहनकुशल घोड़े तुम्हें इस यज्ञ में लावें. हम अपना मन तुम में लगाकर बार-बार बुलाते हैं. तुम हमारी विशाल समृद्धि के लिए आओ. (३) आ याहि शश्वदुशता ययाथेन्द्रा महा मनसा सोमपेयम्. उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽथा ते यज्ञस्तन्वे३ वयो धात्.. (४) हे इंद्र! तुम पहले सोमरस पीने के लिए कई बार आए थे. सोमपान करने की महती अभिलाषा वाले मन से इस समय भी आओ एवं हमारी इन स्तुतियों को सुनो. यजमान तुम्हारे शरीर को पुष्ट बनाने के लिए तुम्हें सोमरस प्रदान करें. (४) यदिन्द्र दिवि पार्ये यद्ध्यग्यद्वा स्वे सदने यत्र वासि. अतो नो यज्ञमवसे नियुत्वानत्सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः.. (५) हे स्तुतिपात्र एवं अश्वों के स्वामी इंद्र! तुम दूरवर्ती स्वर्ग में, किसी अन्य स्थान में अथवा अपने घर में कहीं भी होओ, मरुतों के साथ हमारी रक्षा के लिए इस यज्ञ में आओ. (५) सूक्त—४१ देवता—इंद्र अहेळमान उप याहि यज्ञं तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः. गावो न वज्रिन्त्स्वमोको अच्छेन्द्रा गहि प्रथमो यज्ञियानाम्.. (१) हे इंद्र! तुम क्रोधरहित होकर इस यज्ञ में आओ. तुम्हारे निमित्त ही पवित्र सोमलता को निचोड़ा गया है. गाएं जिस प्रकार गोशाला में प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार सोमरस कलश में रखा है. हे यज्ञपात्रों में श्रेष्ठ इंद्र! तुम यहां आओ. (१) या ते काकुत्सुकृता या वरिष्ठा यया शश्वत्पिबसि मध्व ऊर्मिम्. तया पाहि प्र ते अध्वर्यु्रस्थात्सं ते वज्रो वर्ततामिन्द्र गव्युः.. (२) हे इंद्र! तुम अपनी सुनिर्मित एवं लंबी जीभ के द्वारा जिस तरह अब तक सोमरस पीते रहे हो, उसी प्रकार आज भी पिओ. सोमरस लेकर अध्वर्यु तुम्हारे सामने खड़ा है. हे इंद्र! शत्रुओं की गायों को जीतने का इच्छुक तुम्हारा वज्र शत्रुओं का नाश करे. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः. एतं पिब हरिवः स्थातरुग्र यस्येशिषे प्रदिवि यस्ते अन्नम्.. (३) यह तरल, अभिलाषापूरक एवं विविध रूपों वाला सोमरस मनोवांछित फल देने वाले इंद्र के लिए तैयार किया गया है. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी, सबके अधिपति एवं दृढ़ इंद्र! तुम उस सोम को पिओ, जिसके ऊपर तुम्हारा अधिकार है एवं जो तुम्हारा भोजन है. (३) सुतः सोमो असुतादिन्द्र वस्यान्वयं श्रेयाञ्चिकितुषे रणाय. एतं तितिर्व उप याहि यज्ञं तेन विश्वास्तविषीरा पृणस्व.. (४) हे इंद्र! निचोड़ा हुआ सोमरस बिना निचुड़ी हुई सोमलता से उत्तम है. हे विचारशील इंद्र! सोमरस तुम्हारे लिए प्रसन्न करने वाला है. हे शत्रुविजयी इंद्र! तुम यज्ञ के साधनरूप सोम के समीप आओ तथा इसे पीकर अपनी शक्तियों को पूर्ण करो. (४) ह्वयामसि त्वेन्द्र याह्यर्वाङ्डरं ते सोमस्तन्वे भवाति. शतक्रतो मादयस्वा सुतेषु प्रास्माँ अव पृतनासु प्र विक्षु.. (५) हे इंद्र! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारे सामने आओ. हमारा यह सोमरस तुम्हारी शरीर वृद्धि के लिए पर्याप्त है. हे शतक्रतु इंद्र! तुम यह निचुड़ा हुआ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो एवं युद्धों में सभी ओर से हमारी रक्षा करो. (५) सूक्त—४२ देवता—इंद्र प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर. अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चाद्दध्वने नरे.. (१) हे अध्वर्युगण! पीने के इच्छुक, सब कुछ जानने वाले, अधिक गतिशील, यज्ञों में उपस्थित रहने वाले, सबसे आगे चलने वाले एवं युद्ध के नेता इंद्र को सोमरस दो. (१) एमेनं प्रत्येतन सोमेभिः सोमपातमम्. अमत्रेभिर्ऋजीषिणमिन्द्रं सुतेभिरिन्दुभिः.. (२) हे अध्वर्युगण! तुम सोमरस लेकर अति अधिक सोम पीने वाले इंद्र के पास जाओ. तुम निचोड़े हुए सोम से भरे पात्र को लेकर शत्रुजयी इंद्र के पास जाओ. (२) यदि सुतेभिरिन्दुभिः सोमेभिः प्रतिभूषथ. वेदा विश्वस्य मेधिरो धृषत्तन्तमिदेषते.. (३) हे अध्वर्युगण! निचोड़े हुए एवं दीप्तिशाली सोमरस के साथ तुम इंद्र के सामने जाओ. मेधावी इंद्र तुम्हारी सभी इच्छाएं जानते हैं एवं शत्रुओं का नाश करते हुए अभिलाषाएं पूरी करते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
अस्माअस्मा इदन्धसोऽध्वर्यो प्र भरा सुतम्. कुवित्समस्य जेन्यस्य शर्धतोऽभिशस्तेरवस्परत्.. (४) हे अध्वर्युगण! एकमात्र इंद्र को ही निचोड़े हुए सोमरस को हव्य के रूप में दो. इंद्र सभी जीतने योग्य एवं उत्साह भरे शत्रुओं के द्वेष से हमारी रक्षा करें. (४) सूक्त—४३ देवता—इंद्र यस्य त्यच्छम्बरं मदे दिवोदासाय रन्धयः. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (१) हे इंद्र! जिस सोमरस को पीने से उत्पन्न मद के कारण तुमने राजा दिवोदास के कल्याण के लिए शंबर असुर को मारा था, वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ. (१) यस्य तीव्रसुतं मदं मध्यमन्तं च रक्षसे. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (२) हे इंद्र! सोमलता का नशीला रस प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या के यज्ञों में निचोड़ा जाता है. तुम उसे पीते हो. वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ. (२) यस्य गा अन्तरश्मनो मदे दृळ्हा अवासृजः. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (३) हे इंद्र! जिस सोमरस के नशे में तुमने पर्वत के घेरे में दृढ़तापूर्वक बंद गायों को छुड़ाया था, वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. इसे तुम पिओ. (३) यस्य मन्दानो अन्धसो माघोनं दधिषे शवः. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (४) हे इंद्र! जिस सोमरसरूप अन्न के कारण प्रसन्न होकर तुम अतिशय बल धारण करते हो, वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. इसे तुम पिओ. (४) सूक्त—४४ देवता—इंद्र यो रयिवो रयिन्तमो यो द्युम्नैर्द्युम्नवत्तमः. सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः.. (१) हे धन के स्वामी एवं स्वधारूप सोम के रक्षक इंद्र! जो सोमरस धन से अत्यंत युक्त एवं दीप्त यशों के कारण परम तेजस्वी है, वह सोमरस निचुड़ने पर तुम्हें प्रसन्नता दे. (१) यः शग्मस्तुविशग्म ते रायो दामा मतीनाम्. सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः.. (२)
हे अतिशय सुखदाता एवं स्वधारूप सोमरस के रक्षक इंद्र! जो सोम तुम्हें परम सुखकारक एवं स्तोताओं को धन देने वाला है, वही सोमरस निचुड़ने पर तुम्हें प्रसन्नता दे. (२) येन वृद्धो न शवसा तुरो न स्वाभिरूतिभिः. सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः.. (३) हे सोमरूप अन्न के रक्षक इंद्र! तुम जिस सोमरस को पीकर परम बलवान् बनते हो एवं अपने रक्षक मरुतों के साथ मिलकर शत्रुओं का नाश करते हो, वही सोमरस निचुड़ने पर तुम्हें प्रसन्नता प्रदान करे. (३) त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम्. इन्द्रं विश्वासाहं नरं मंहिष्ठं विश्वचर्षणिम्.. (४) हे यजमानो! हम तुम्हारे कल्याण के निमित्त भक्तों पर अनुग्रह करने वाले, शक्ति के स्वामी, सभी शत्रुओं को हराने वाले, यज्ञकर्म के नेता, अतिशय दाता एवं सबको देखने वाले इंद्र की स्तुति करते हैं. (४) यं वर्धयन्तीद्गिरः पतिं तुरस्य राधसः. तमिन्वस्य रोदसी देवी शुष्मं सपर्यतः.. (५) इंद्र संबंधी स्तुतियों द्वारा इंद्र का शत्रुधनहर्त्ता बल बढ़ता है. दिव्य धरती-आकाश उसी बल की सेवा करते हैं. (५) तद्व उक्थस्य बर्हणेन्द्रायोपस्तृणीषणि. विपो न यस्योतयो वि यद्रोहन्ति सक्षितः.. (६) हे स्तोताओ! इंद्र के लिए अपने स्तोत्र की महत्ता बढ़ाओ. इंद्र सर्वकार्य कुशल व्यक्ति के समान सदा तुम्हारी रक्षा करते हैं. (६) अविदद्दक्षं मित्रो नवीयान्यपानो देवेभ्यो वस्यो अचैत्. ससवान्त्स्तौलाभिर्धौतरीभिरुष्या पायुरभवत्सखिभ्यः.. (७) इंद्र यज्ञकर्म में कुशल यजमान को जानते हैं. मित्र एवं अत्यंत ताजा सोमरस पीने वाले इंद्र स्तोताओं के लिए श्रेष्ठ धन देते हैं. हव्यरूप अन्न से युक्त एवं धरती को कंपित करने वाले मरुतों के साथ रहने वाले इंद्र स्तोताओं की रक्षा की अभिलाषा से आते हैं एवं उनकी रक्षा करते हैं. (७) ऋतस्य पथि वेधा अपायि श्रिये मनांसि देवासो अक्रन्. दधानो नाम महो वचोभिर्वपुर्दृशये वेन्यो व्यावः.. (८) यज्ञ के मार्ग में सबको देखने वाला सोमरस पिया गया है. इंद्र का मन अपनी ओर खींचने के लिए सोम ऋत्विजों द्वारा तैयार किया गया है. इंद्र शत्रुपराभवकारी एवं महान् ebook converter DEMO Watermarks*
शरीर धारण करते हुए हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर आविर्भूत हों. (८) द्युमत्तमं दक्षं धेह्यस्मे सेधा जनानां पूर्वीररातीः. वर्षीयो वय कृणुहि शचीभिर्धनस्य सातावस्माँ अविड्ढि.. (९) हे इंद्र! हमें अत्यंत दीप्तिशाली बल दो. हम स्तोता लोगों के बहुत से शत्रुओं को हमसे दूर करो, अपनी श्रेष्ठ बुद्धियों द्वारा हमें उत्तम धन दो एवं धन का भोग करने के लिए हमारी रक्षा करो. (९) इन्द्र तुभ्यमिन्मघवन्नभूम वयं दात्रे हरिवो मा वि वेनः. नकिरापिर्ददृशे मर्त्यत्रा किमङ्ग रध्रचोदनं त्वाहुः.. (१०) हे धनस्वामी इंद्र! हम तुम्हारे लिए ही हैं. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम हव्यदाताओं के प्रतिकूल मत होना. तुम्हारे अतिरिक्त मनुष्यों में हमारा कोई भी बंधु नहीं है. हे प्रिय इंद्र! इसीलिए प्राचीन लोगों ने तुम्हें धन का प्रेरक कहा है. (१०) मा जस्वने वृषभ नो रीरीथा मा ते रेवतः सख्य रिषाम. पूर्वीष्ट इन्द्र निष्षिधो जनेषु जह्यसुष्वीन्प्र वृहापृणतः.. (११) हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमें हानिकारक राक्षसों को मत सौंपना. तुझ धनस्वामी की मित्रता पाकर हम दुःखी न हों. शत्रुओं तक तुम्हारी रस्सियां फैली हुई हैं. तुम सोम न निचोड़ने वालों को मारो एवं हव्य न देने वालों को समाप्त करो. (११) उद्भ्राणीव स्तनयन्नियर्तीन्द्रो राधांस्यश्व्यानि गव्या. त्वमसि प्रदिवः कारुधाया मा त्वादामान आ दभन्मघोनः.. (१२) गरजते हुए पर्जन्य जिस प्रकार मेघों को जन्म देते हैं, उसी प्रकार इंद्र होताओं को देने के लिए घोड़े एवं गो-हितकारी धन उत्पन्न करते हैं. तुम प्राचीन काल से स्तोताओं के रक्षक हो. धनी लोग दानहीन बनकर हमें कष्ट न दें. (१२) अध्वर्यो वीर प्र महे सुतानामिन्द्राय भर स ह्यस्य राजा. यः पूर्वार्याभिरुत नूतनाभिर्गीर्भिर्वावृधे गृणतामृषीणाम्.. (१३) हे वीर अध्वर्युगण! महान् इंद्र को सोमरस भेंट दो. वे सोम के राजा हैं. ये स्तुतिकर्त्ता ऋषियों की प्राचीन एवं नवीन स्तुतियों से वृद्धि को प्राप्त हुए हैं. (१३) अस्य मदे पुरु वर्पांसि विद्वानिन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघान. तमु प्र होषि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै.. (१४) विद्वान् एवं अद्वितीय इंद्र ने इस सोमरस के नशे में अनेक विरोधी शत्रुओं को मार ebook converter DEMO Watermarks*
डाला. हे अध्वर्युगण! इसी शोभन हनु वाले एवं वीर इंद्र को वह माधुर्ययुक्त सोमरस पीने को दो. (१४) पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं हन्ता वृत्रं वज्रेण मन्दसानः. गन्ता यज्ञं परावतश्चिदच्छा वसुर्धीनामविता कारुधायाः.. (१५) इंद्र इस निचोड़े हुए सोमरस को पिएं एवं प्रसन्न होकर वज्र द्वारा वृत्र को मारें. सबको घर देने वाले, स्तोताओं के यज्ञकर्म के रक्षक एवं यजमानों के पालक इंद्र दूर देश से भी हमारे यज्ञ में आवें. (१५) इदं त्यत्पात्रमिन्द्रपानमिन्द्रस्य प्रियममृतमपायि. मत्सद्यथा सौमनसाय देवं व्य१स्मद्द्वेषो युयवद्वयंहः.. (१६) सोमरस इंद्र का प्रिय, अनुकूल एवं पीने योग्य है. इस अमृतरूप सोमरस को पीकर इंद्र प्रसन्न हों तथा हमारे ऊपर कृपा करके हमारे शत्रुओं एवं पापों को दूर भगावें. (१६) एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्. अभिषेणाँ अभ्या३ देदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च.. (१७) हे धनस्वामी इंद्र! इस सोमरस को पीकर तुम प्रसन्न बनो एवं हमारे निकटवर्ती एवं दूरवर्ती शत्रुओं को नष्ट करो. हे इंद्र! जो शत्रु सैनिक हमारे सामने आकर बार-बार हथियार डाल देते हैं, उन्हें हमसे दूर करके नष्ट करो. (१७) आसु ष्मा णो मघवन्निन्द्र पृत्स्व१ स्मभ्यं महि वरिवः सुगं कः. अपां तोकस्य तनयस्य जेष इन्द्र सूरीन्कृणुहि स्मा नो अर्धम्.. (१८) हे धनस्वामी इंद्र! इन सभी संग्रामों में हमें महान् धन की प्राप्ति सरल बनाओ. तुम हम स्तोताओं को जल, पुत्र, पौत्र की जय के निमित्त समृद्ध बनाओ एवं शत्रुनाश की शक्ति दो. (१८) आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः. अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु.. (१९) हे इंद्र! तुम्हारे अभिलाषापूरक अपने आप रथ में जुड़ने वाले, अभिलाषापूरक रथ को ढोने वाले, ढीली लगामों वाले, नित्यगतिशील, हमारे सामने आने वाले, सदायूवा, वज्र ढोने वाले एवं भली प्रकार रथ में जुड़े हुए घोड़े नशीले सोम को पीने के लिए तुम्हें यहां लावें. (१९) आ ते वृषन्वृषणो द्रोणमस्थुर्धृतपृषो नोर्मयो मदन्तः. इन्द्र प्र तुभ्यं वृषभिः सुतानां वृष्णे भरन्ति वृषभाय सोमम्.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे जल बरसाने वाले युवा घोड़े पानी फैलाने वाली सागर तरंगों के समान प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ में जुड़े हुए हैं. हे कामवर्षी एवं युवा इंद्र! अध्वर्युगण तुम्हें पत्थरों की सहायता से निचोड़ा गया सोमरस भेंट करते हैं. (२०) वृषासि दिवो वृषभः पृथिव्या वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्. वृष्णे ते इन्दुर्वृषभ पीपाय स्वादू रसो मधुपेयो वराय.. (२१) हे इंद्र! तुम हव्यों द्वारा स्वर्ग को तृप्त करने वाले, धरती के अभिलाषापूरक, वर्षा द्वारा नदियों को भरने वाले एवं स्थावरजंगम सकल विश्व के कामपूरक हो. हे अभिलाषापूरक एवं वर्षाकारक इंद्र! तुम्हारे लिए ही मधुर सोमरस तैयार किया गया है. (२१) अयं देवः सहसा जायमान इन्द्रेण युजा पणिमस्तभायत्. अयं स्वस्य पितुरायुधानीन्दुरमुष्णादशिवस्य माया:.. (२२) दीप्तिशाली सोम ने अपने मित्र इंद्र के साथ जन्म लेकर पणि को बलपूर्वक रोक लिया था. इसी सोमरस ने गोरूप धन को पर्वतों में छिपाकर रखने वाले अकल्याणकारी पणियों की माया एवं आयुध बेकार किए थे. (२२) अयमकृणोदुषसः सुपत्नीरयं सूर्ये अदधाज्ज्योतिरन्तः. अयं त्रिधातु दिवि रोचनेषु त्रितेषु विन्ददमृतं निगूळ्हम्.. (२३) इसी सोमरस ने उषाओं के शोभनपालक सूर्य को सुशोभित किया था एवं सूर्य मंडल के बीच में ज्योति की स्थापना की थी. तीनों सवनों में तीन प्रकार से वर्तमान इसी सोमरस ने तेजस्वी तीनों लोकों के बीच छिपे हुए अमृत को पाया था. (२३) अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्. अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दशयन्त्रामुत्सम्.. (२४) इसी सोमरस ने धरती-आकाश को अपने स्थान पर स्थित किया था. इसी ने सात किरणों वाला रथ तैयार किया था. इस सोम ने ही गायों के मध्य अपने आप निर्मित होने वाले एवं अनेक धाराओं वाले दूध को धारण किया था. (२४) सूक्त—४५ देवता—इंद्र व बृहस्पति य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्. इन्द्रः स नो युवा सखा.. (१) जो इंद्र! अपनी उत्तम नीति द्वारा तुर्वश एवं यदु नामक राजाओं को दूर से लाए, वे युवा इंद्र हमारे मित्र हों. (१) अविप्रे चिद्ध्यो दधदनाशुना चिदर्वता. इन्द्रो जेता हितं धनम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र स्तुति न करने वाले को भी अन्न देते हैं एवं धीमी चाल वाले घोड़े पर चढ़कर शत्रुओं के छिपे धन को जीतते हैं. (२) महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः. नास्य क्षीयन्त ऊतयः.. (३) इंद्र की उत्तम नीतियां महान् एवं स्तुतियां अनेक हैं. इंद्र के रक्षासाधन कभी समाप्त नहीं होते. (३) सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत. स हि नः प्रमतिर्मही.. (४) हे मित्ररूप स्तोताओ! मंत्रों द्वारा बुलाने योग्य इंद्र की पूजा एवं स्तुति करो. वे हमें उत्तम बुद्धि देते हैं. (४) त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि. उतेदृशे यथा वयम्.. (५) हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम एक या दो स्तोताओं के रक्षक हो. हमारे जैसे लोगों की तुम्हीं रक्षा करते हो. (५) नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः. नृभिः सुवीर उच्यसे.. (६) हे इंद्र! द्वेष करने वालों को हमसे दूर करो एवं हम स्तोताओं को समृद्ध बनाओ. मनुष्य शोभनपुत्र देने वाले इंद्र की स्तुति करते हैं. (६) ब्रह्माणं ब्रह्मवाहसं गीर्भिः सखायमृग्मियम्. गां न दोहसे हुवे.. (७) मैं गाय के समान अभिलाषारूप दूध दुहने के लिए इंद्र को स्तुतियों द्वारा बुलाता हूं. इंद्र महान्, स्तुतियां स्वीकार करने वाले एवं मित्र हैं. (७) यस्य विश्वानि हस्तयोरूचुर्वसूनि नि द्विता. वीरस्य पृतनाषहः.. (८) ऋषि लोगों ने कहा था कि शत्रुसेना को हराने वाले वीर इंद्र के दोनों हाथों में सभी प्रकार की संपत्तियां हैं. (८) वि दृळ्हानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते. वृह माया अनानत.. (९) हे वज्रधारी एवं यज्ञ के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुओं के दृढ़ नगरों को भग्न करो. हे न झुकने वाले इंद्र! तुम शत्रुओं की माया को समाप्त करो. (९) तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द्र वाजानां पते. अहुमहि श्रवस्यवः.. (१०) हे सत्यस्वभाव, सोम पीनेवाले एवं धनों के स्वामी इंद्र! हम अन्न की अभिलाषा से तुम्हें बुलाते हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
तमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने. हव्यः स श्रुधी हवम्.. (११) हे इंद्र! तुम प्राचीन काल में पुकारने योग्य थे एवं वर्तमान काल में शत्रुओं के छिपे हुए धन को पाने के लिए बुलाए जाते हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारी पुकार सुनो. (११) धीभिर्विद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्. त्वया जेष्म हितं धनम्.. (१२) हे इंद्र! हमारी स्तुतियां सुनकर तुम प्रसन्न होते हो. तुम्हारी कृपा से हम अपने घोड़ों द्वारा शत्रुओं के घोड़ों, उत्तम अन्नों एवं छिपे हुए धन को जीतने योग्य बनते हैं. (१२) अभूरू वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते. भरे वितन्तसाय्यः.. (१३) हे वीर, स्तुति योग्य एवं महान् इंद्र! तुम शत्रुओं के छिपे हुए धन के निमित्त होने वाले युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले हो. (१३) या त ऊतिरमित्रहन्मक्षूजवस्तमासति. तया नो हिनुही रथम्.. (१४) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम अपनी अतिशय तीव्रगति से हमारे रथ को शत्रुविजय के निमित्त आगे बढ़ाओ. (१४) स रथेन रथीतमॊऽस्माकेनाभियुग्वना. जेषि जिष्णो हितं धनम्.. (१५) हे रथ स्वामियों में श्रेष्ठ एवं जयशील इंद्र! तुम हमारे शत्रुपराजयकारी रथ द्वारा शत्रुओं के छिपे धन को जीतते हो. (१५) य एक इत्तम ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः. पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः.. (१६) उन्हीं एकमात्र इंद्र की स्तुति करो जो प्रजाओं के स्वामी, विशेष द्रष्टा एवं वर्षा करने वाले के रूप में उत्पन्न हुए थे. (१६) यो गृणतामिदासिखापिरूती शिवः सखा. स त्वं न इन्द्र मृळय.. (१७) हे रक्षा द्वारा सुखदाता एवं सखा इंद्र! प्राचीन काल में तुम हम स्तोताओं के बंधु थे. तुम अब भी हमें सुखी करो. (१७) धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः. सासहीष्ठा अभि स्पृधः.. (१८) हे वज्रधारी इंद्र! तुम राक्षसों को मारने के हेतु वज्र धारण करते हो एवं विरोध करने वाली असुर सेनाओं को हराते हो. (१८) प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोदनम्. ब्रह्मवाहस्तमं हुवे.. (१९) मैं सबके आदि, धन प्राप्त करने वाले, सखा, स्तोताओं को प्रोत्साहित करने वाले एवं ebook converter DEMO Watermarks*
मंत्रों के द्वारा बुलाने योग्य इंद्र को बुलाता हूं. (१९) स हि विश्वानि पार्थिवाँ एको वसूनि पत्यते. गिर्वणस्तमो अध्रिगुः.. (२०) अतिशय स्तुतिपात्र एवं अबाध गति वाले इंद्र ही धरती के सब धनों के एकमात्र स्वामी हैं. (२०) स नो नियुद्भि पृण कामं वाजेभिरश्विभिः. गोमद्भिर्गोपते धृषत्.. (२१) हे गोपालक इंद्र! तुम घोड़ियों के साथ आकर हमारी अभिलाषा अन्न, घोड़ों एवं गायों से भली-भांति पूरी करो. (२१) तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद्गवे न शाकिने.. (२२) हे स्तोताओ! गाय को जैसे घास सुख देती है, उसी प्रकार सोमरस इंद्र को सुखी बनाता है. सोमरस निचुड़ जाने पर यह स्तोत्र बहुतों द्वारा बुलाए गए, शत्रुनाशक एवं दानशील इंद्र के लिए सुखकर होता है. तुम लोग इंद्र को बुलाओ. (२२) न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत्सीमुप श्रवद्गिरः.. (२३) निवासस्थान देने वाले इंद्र तब हमें अनेक गायों सहित अन्न देते हैं, जब वे हमारी स्तुतियां सुनते हैं. (२३) कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत्. शचीभिरप नो वरत्.. (२४) दस्युवधकर्त्ता इंद्र कुवित्स की अनगिनत गायों वाली गोशाला में गए. इंद्र ने अपनी बुद्धि से उन छिपी हुई गायों को प्रकट किया. (२४) इमा उ त्वा शतक्रतोऽभि प्र णोनुवुर्गिरः. इन्द्र वत्सं न मातरः.. (२५) हे सैकड़ों प्रकार के यज्ञ करने वाले इंद्र! जिस प्रकार गाएं बछड़ों के पास बार-बार जाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. (२५) दूणाशं सख्यं तव गौरसि वीर गव्यते. अश्वो अश्वायते भव.. (२६) हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता नष्ट नहीं हो सकती. तुम गाय चाहने वाले को गाय देने वाले एवं घोड़ा चाहने वालों को घोड़ा देने वाले बनो. (२६) स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे. न स्तोतारं निदे करः.. (२७) हे इंद्र! महान् धन के उद्देश्य से दिए हुए सोमरस से तुम प्रसन्न बनो तथा अपने स्तोता को निंदक के अधिकार में मत करो. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः. वत्सं गावो न धेनवः.. (२८) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय इंद्र! प्रत्येक बार सोमरस निचुड़ जाने पर हमारी स्तुतियां उसी प्रकार तुम्हारे पास पहुंचती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाएं बछड़ों के पास जाती हैं. (२८) पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि. वाजेभिर्वाजयताम्.. (२९) हे अनेक शत्रुओं के नाशक इंद्र! विविध स्तुतियों वाले यज्ञ में हम स्तोताओं की स्तुतियां हव्यान्नों द्वारा तुम्हें बलवान् बनावें. (२९) अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः. अस्मान्प्रये महे हिनु.. (३०) हे इंद्र! हमारी परम उन्नतिकारक स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. तुम हमें महान् धन पाने के लिए प्रेरित करो. (३०) अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्. उरुः कक्षो न गाङ्गयः.. (३१) बृबु पणियों के बीच इतने ऊंचे स्थान पर बैठा था, जितना ऊंचा गंगा का तट होता है. (३१) यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः सहस्रिणी. सद्यो दानाय मंहते.. (३२) बृबु ने मुझ धन चाहने वाले को एक हजार गाएं हवा के समान तेज गति से प्रदान की थीं. (३२) तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारवः. बृबुं सहस्रदातमं सूरिं सहस्रसातमम्.. (३३) हम स्तोता सदा उन्हीं श्रेष्ठ बृबु की स्तुति करते हैं. वे हमें हजार गाएं देने वाले, विद्वान् एवं हजारों स्तुतियों के पात्र हैं. (३३) सूक्त—४६ देवता—इंद्र त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः. त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१) हे इंद्र! हम स्तोता अन्न प्राप्ति के कारण तुम्हें बुलाते हैं. अन्य लोग तुझ सज्जन पालक को घोड़ों वाले संग्राम में विजय पाने के लिए बुलाते हैं. (१) स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः. गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे विचित्र, हाथ में वज्र धारण करने वाले, वज्र के स्वामी, शत्रुनाशक एवं महान् इंद्र! युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले को तुम जिस प्रकार बहुत सा अन्न देते हो, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें गाएं व रथ खींचने में कुशल घोड़े दो. (२) यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्. सहस्रमुष्क तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे.. (३) जो इंद्र प्रबल शत्रुओं को मारने वाले एवं सबको देखने वाले हैं, उन्हें हम बुलाते हैं. हे हजार शेपों (लिंगों) वाले, बहुधनसंपन्न एवं सज्जन पालक इंद्र! युद्धों में तुम हमें समृद्ध बनाओ. (३) बाधसे जनान् वृषभेव मन्युना घृषौ मीळ्ह ऋचीषम. अस्माकं बोधयविता महाधने तनूष्वप्सु सूर्ये.. (४) हे ऋचाओं के अनुकूल रूप वाले इंद्र! तुम शत्रुबाधक युद्ध में बैल के समान क्रोध में भरकर हमारे शत्रुओं को पीड़ित करो. धन-निमित्तक महायुद्ध में तुम हमारे रक्षक बनो. हम संतान, जल एवं सूर्यदर्शन प्राप्त करें. (४) इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः. येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्रा:.. (५) हे विचित्र, हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! जिस अन्न के द्वारा तुम स्वर्ग एवं धरती का पोषण करते हो, हमें वही अधिक प्रशंसनीय, परम बलकारक एवं पुष्टिकारक अन्न दो. (५) त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन्देवेषु हूमहे. विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान्सुसहान्कृधि.. (६) हे तेजस्वी, देवों में सर्वाधिक उग्र एवं शत्रुओं को हराने वाले इंद्र! हम अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हें बुलाते हैं. हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! तुम सब राक्षसों को दूर भगाओ एवं हमारे शत्रुओं को सरलता से हराने योग्य बनाओ. (६) यदिन्द्र नाहुषीष्वाँ ओजो नृम्णं च कृष्टिषु. यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्या.. (७) हे इंद्र! मानव प्रजाओं में जो बल एवं धन है अथवा पांच वर्णों में जो अन्न है, वह सब महान् शक्तियों के साथ हमें दो. (७) यद्वा तुक्षौ मघवन् द्रुह्यावा जने यत्पूरौ कच्च वृष्ण्यम्. अस्मभ्यं तद्रिरीहि सं नृषाह्येऽमित्रान्पृत्सु तुर्वणे.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे धनस्वामी इंद्र! तुम हमें तृक्षु, द्रुह्यु एवं पुरु नामक राजाओं का समस्त बल दो. इस प्रकार हम युद्ध आरंभ होने पर शत्रुओं को जीत सकेंगे. (८) इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्. छर्दियच्छ मघवद्द्रयश्व मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः.. (९) हे इंद्र! हव्यरूप धन वाले लोगों तथा हमारे लिए तीन धातुओं से बना हुआ, तीन कष्टों से बचाने वाला, विनाशरहित एवं छाया करने वाला घर दो. शत्रुओं के आयुध हमसे दूर करो. (९) ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया. अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव.. (१०) हे धनस्वामी एवं स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! जिन शत्रुओं ने हमारी गाएं छीनने की इच्छा से आक्रमण किया है अथवा जो बलपूर्वक हम पर प्रहार करते हैं, तुम उनसे हमारे एकमात्र रक्षक बनो. (१०) अध स्मा नो वृधे भवेन्द्र नायमवा युधि. यदन्तरिक्षे पतयन्ति पर्णिनो दिद्यवस्तिग्ममूर्धानः.. (११) हे इंद्र! इस समय तुम हमारे वृद्धिकर्त्ता बनो. जब आकाश में पंखों वाले, तेज नोक वाले एवं चमकीले बाण गिरते हैं, उस समय जो हमारी रक्षा करता है, तुम उसकी रक्षा करो. (११) यत्र शूरासस्तन्वो वितन्वते प्रिया शर्म पितॄणाम्. अध स्मा यच्छ तन्वे३ तने च छर्दिरचित्तं यावय द्वेषः.. (१२) जब युद्ध में शूर शत्रुओं को अपने शरीर का बल दिखाते हैं एवं शत्रुओं से उनके पूर्वजों के प्रिय स्थान को छीनते हैं, उस समय तुम हमारी और हमारी संतान की शरीर-रक्षा के लिए आयुध-रक्षक कवच चुपचाप दे देना. तुम हमारे शत्रुओं को भगाओ. (१२) यदिन्द्र सर्गे अर्वतश्चोदयासे महाधने. असमने अध्वनि वृजिने पथि श्येनाँ इव श्रवस्यतः.. (१३) हे इंद्र! महान् धन के निमित्त संग्राम आरंभ होने पर हमारे घोड़ों को ऊंचे-नीचे रास्ते पर इस प्रकार आगे बढ़ाना, जिस प्रकार कुटिल पथ पर मांस का इच्छुक बाज बढ़ता है. (१३) सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो यदि क्लोशमनु ष्वणि. आ ये वयो न वर्वृत्तत्यामिषि गृभीता बाह्वोर्गवि.. (१४) हे इंद्र! जब हमारे घोड़े भय के कारण जोर से हिनहिनाएं, उस समय तुम भुजाओं द्वारा eBook converter DEMO Watermarks*
लगाम के सहारे पकड़े हुए हमारे घोड़ों को प्रेरित करो. जिससे वे गो निमित्तक संग्राम में नीचे बहने वाली सरिताओं अथवा मांस के अभिलाषी बाज के समान आगे बढ़ें. (१४) सूक्त—४७ देवता—सोम, पृथ्वी आदि स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्. उतो न्व१स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (१) यह निचोड़ा हुआ सोमरस स्वादिष्ट, मधुर, तीव्र एवं रसवाला है. इसे पीने वाले इंद्र के सामने युद्धों में कोई ठहर नहीं सकता. (१) अयं स्वादुरिह मदिष्ठ आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद. पुरूणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्यो३ हन्.. (२) यह सोमरस इस यज्ञ में बहुत मदकारक था. वृत्रहनन के समय इंद्र इसी से मदमत्त हुए थे. इसी ने शंबर की निन्यानवे नगरियों तथा सेनाओं का नाश किया था. (२) अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः. अयं षळुर्वीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे.. (३) यह सोमरस पीने पर मेरी वाणी को तेज करता है एवं मनचाही बुद्धि प्रदान करता है. इसी धीर सोमरस ने छः अवस्थाओं को बनाया है. कोई भी प्राणी इससे दूर नहीं रह सकता. (३) अयं स यो वरिमाणं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः. अयं पीयूषं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्व१न्तरिक्षम्.. (४) इस सोमरस ने धरती का विस्तार और स्वर्ग की दृढ़ता की है. इसी ने ओषधि, जल और गो—तीन उत्तम आधारों में रस धारण किया है. यही विस्तृत आकाश को धारण करता है. (४) अयं विदच्चित्रदृशीकमर्णः शुक्रसद्मनामुषसामनीके. अयं महान्महता स्कम्भनेनोद् द्यामास्तभ्नाद् वृषभो मरुत्वान्.. (५) उज्ज्वल आकाश में रहने वाली उषाओं से पहले सोमरस ही विचित्र प्रकाश वाले सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है. यह जल बरसाने वाला सोम मरुतों से मिलकर महान् बल के द्वारा मजबूत खंभों के सहारे स्वर्ग को धारण करता है. (५) धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्. माध्यन्दिने सवन आ वृषस्व रयिस्थानो रयिमस्मासु धेहि.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शूर इंद्र! तुम कलश में रखा हुआ सोमरस पिओ और धन निमित्तक युद्ध में शत्रुओं का नाश करो. हे धनपात्र इंद्र! दोपहर के यज्ञ में सोमरस से अपना पेट भरो एवं हमें धन दो. (६) इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ. भवा सुपारो अतिपारयो नो भवा सुनीतिरुत वामनीतिः.. (७) हे इंद्र! आगे चलने वाले मार्गदर्शक के समान हमको देखो, हमारे सामने उत्तम धन लाओ तथा हमें दुःखों एवं शत्रुओं से पार करो. तुम उत्तम नेता बनकर हमें धन की ओर चलाओ. (७) उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति. ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणां बृहन्ता.. (८) हे विद्वान् इंद्र! हमें विस्तीर्ण स्वर्ग में ले चलो. वह स्वर्ग प्रकाशपूर्ण एवं भयरहित है. हे शक्तिशाली इंद्र! हम तुम्हारी सुंदर एवं दृढ़ भुजाओं पर अपनी रक्षा के लिए भरोसा करते हैं. (८) वरिष्ठे न इन्द्र वन्धुरे धा वहिष्ठयोः शतावन्नश्वयोरा. इषमा वक्षीषां वर्षिष्ठां मा नस्तारीन्मघवन्नायो अर्यः.. (९) हे सैकड़ों संपत्तियों के स्वामी इंद्र! वहन करने में कुशल घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले विस्तृत रथ पर हमें बैठाओ. तुम हमारे लिए भांति-भांति के अन्नों में से उत्तम अन्न दो. हे धनस्वामी इंद्र! धन के विषय में कोई भी हमसे आगे न निकल सके. (९) इन्द्र मृळ मह्यं जीवातुमिच्छ चोदय धियमयसो न धाराम्. यत्किञ्चाहं त्वायुरिदं वदामि तज्जुषस्व कृधि मा देववन्तम्.. (१०) हे इंद्र! मुझे सुखी बनाओ, मेरे दीर्घ जीवन की इच्छा करो एवं मेरी बुद्धि को तलवार की धार के समान तेज करो. तुम्हें अपना बनाने के लिए मैं जो कुछ कर रहा हूं, उसे समझो एवं मुझे देवरूपी रक्षकों से युक्त करो. (१०) त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्. ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः.. (११) मैं शत्रुओं से रक्षा करने वाले तथा अभिलाषापूरक इंद्र को बुलाता हूं. मैं शोभन आह्वान वाले एवं शूर इंद्र को बुलाता हूं. मैं सर्वकार्यसमर्थ एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र को बुलाता हूं. धनस्वामी इंद्र मुझे कल्याण दें. (११) इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः. ebook converter DEMO Watermarks*
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (१२) भली-भांति रक्षा करने वाले एवं धनस्वामी इंद्र अपने रक्षा-साधनों से मुझे सुखदाता हों. सब कुछ जानने वाले इंद्र हमारे शत्रुओं को मारें एवं हमें अभय बनावें. हम इंद्र की कृपा से शोभन वीरों के स्वामी बनें. (१२) तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम. स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (१३) हम यज्ञपात्र इंद्र की शोभन-अनुग्रह-बुद्धि एवं कल्याणकारी-मित्रता-भाव के पात्र बनें. शोभन, रक्षक और धनवान् इंद्र द्वेष करने वालों को हमसे दूर करें. (१३) अव त्वे इन्द्र प्रवतो नोर्मिर्गिरो ब्रह्माणि नियुतो धवन्ते. ऊरू न राधः सवना पुरूण्यपो गा वज्रिन्युवसे समिन्दून्.. (१४) हे इंद्र! जलसमूह जिस प्रकार निचले स्थान की ओर बहता है, उसी प्रकार स्तोताओं की स्तुतियां, सोमरूप स्तोत्र विशाल धन व विस्तृत सोमरस तुम्हारे पास जाते हैं. हे वज्रधारी इंद्र! तुम सोमरस में गोरस एवं जल भली प्रकार मिलाते हो. (१४) क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत्. पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः.. (१५) कौन इंद्र की स्तुति कर सकता है, कौन इन्हें प्रसन्न कर सकता है एवं कौन इनका यज्ञ कर सकता है? इंद्र अपने को सदा उग्र जानते हैं. इंद्र मार्ग में आगेपीछे पड़ने वाले पैरों के समान स्तोता को अपनी बुद्धि द्वारा कभी अपने आगे और कभी अपने पीछे रखते हैं. (१५) शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमयन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः. एधमानद् विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्.. (१६) इंद्र प्रबलशत्रु का दमन करते हुए एवं स्तोताओं के लिए बार-बार स्थान बदलते हुए वीर के रूप में प्रसिद्ध होते हैं. सोमरस न निचोड़ने वाले उन्नत लोगों के द्वेषी तथा दिव्य-पार्थिव दोनों संपत्तियों के स्वामी इंद्र अपने सेवकों को रक्षा के लिए बार-बार बुलाते हैं. (१६) परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति. अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति.. (१७) इंद्र प्राचीन यज्ञकर्त्ताओं की मित्रता त्याग देते हैं एवं उनकी हिंसा करते हुए साधारण यज्ञकर्त्ताओं के मित्र बनते हैं. इंद्र परिचर्यरहित प्रजाओं को छोड़कर स्तोताओं के साथ अनेक वर्ष तक रहते हैं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय. इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश.. (१८) इंद्र देवों के प्रतिनिधि बनकर भिन्न-भिन्न देवों का रूप धारण करते हैं. इनका एक रूप अन्य देवों के दर्शन के लिए होता है. इंद्र माया द्वारा अनेक रूप बनाकर यजमानों के सामने आते हैं. इंद्र के रथ में एक हजार घोड़े जोड़े जाते हैं. (१८) युजानो हरिता रथे भूरि त्वष्टेह राजति. को विश्वाहा द्विषतः पक्ष आसत उतासीनेषु सूरिषु.. (१९) इंद्र अपने रथ में घोड़े जोड़ते हुए तीनों लोकों में अनेक जगह शोभा पाते हैं. इंद्र के अतिरिक्त ऐसा कौन है जो स्तोताओं के बीच जाकर इनके शत्रुओं के पास खड़ा रह सके. (१९) अगव्यूति क्षेत्रमागन्म देवा उर्वी सती भूमिरंहूरणाभूत्. बृहस्पते प्र चिकित्सा गविष्टावित्था सते जरित्र इन्द्र पन्थाम्.. (२०) हे देवो! हम घूमतेघूमते गो-संचाररहित स्थान में आ गए हैं. यहां की विस्तृत धरती दस्युजनों को आनंद देती है. हे बृहस्पति! तुम गायों को खोजने में हमें प्रेरणा दो. हे इंद्र! इस प्रकार दुःख अनुभव करते हुए स्तोता को मार्ग बताओ. (२०) दिवेदिवे सदृशीरन्यमर्धं कृष्णा असेधदप सद्मनो जाः. अहन्दासा वृषभो वसन्यन्तोद्व्रजे वर्चिनं शम्बरं च.. (२१) इंद्र आकाश के एक भाग से सूर्य रूप में प्रकट होकर बाद वाला आधा भाग प्रकाशित करने के लिए प्रतिदिन समानरूप वाली काली रात को समाप्त करते हैं. वर्षा करने वाले इंद्र ने 'उदवज्र' नामक स्थान में धन चाहने वाले दासों—शंबर एवं वर्ची को मारा था. (२१) प्रस्तोक इन्नु राधसस्त इन्द्र दश कोशयीर्दश वाजिनोऽदात्. दिवोदासादतिथिग्वस्य राधः शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म.. (२२) हे इंद्र! प्रस्तोक ने तुम्हारे स्तोताओं अर्थात् हमें दस घोड़े और सोने से भरे दस कोश दिए थे. अतिथिग्व ने शंबर को जीतकर जो धन पाया था, वही हमने दिवोदास से ग्रहण किया. (२२) दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना. दशो हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम्.. (२३) मैंने दिवोदास से दस घोड़े, सोने के दस कोश, दस प्रकार के भोजन, वस्त्र एवं सोने के दस पिंड प्राप्त किए थे. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*
दश रथान्प्रष्टिमतः शतं गा अथर्वभ्यः. अश्वथः पायवेऽदात्.. (२४) अश्वत्थ ने वायु को घोड़ों सहित दस रथ एवं अथर्व गोत्र वाले ऋषियों को सौ गाएं दी थीं. (२४) महि राधे विश्वजन्यं दधानान्. भरद्वाजान्तसार्ज्यो अभ्ययष्ट.. (२५) सबकी भलाई के लिए महान् धन धारण करने वाले भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों की सृंजयपुत्र पुस्तोक ने पूजा की थी. (२५) वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः. गोभिः सन्नद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (२६) हे काष्ठ द्वारा निर्मित रथ! तुम दृढ़ अवयवों वाले बनो. तुम हमारे मित्र उन्नतिकारक एवं शोभन वीरों से युक्त बनो. तुम गोचर्म से बंधे हो, हमें दृढ़ बनाओ. तुम्हारा भरोसा करने वाले रथी वीर शत्रुओं को जीतें. (२६) दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भुतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः. अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज.. (२७) हे अध्वर्युगण! स्वर्ग एवं धरती पर साररूप अंश से बने हुए, वनस्पति के दृढ़ अंश से निर्मित, जल की गति से युक्त, गाय के चमड़े से ढके हुए एवं इंद्र के वज्र के समान रथ को लक्ष्य करके यज्ञ करो. (२७) इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः. सेमां ना हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (२८) हे दिव्य रथ! तुम इंद्र के वज्र, मरुतों के आगे चलने वाले, मित्र के गर्भ एवं वरुण की नाभि हो. इस यज्ञ में तुम यज्ञक्रिया देखते हुए हव्य स्वीकार करो. (२८) उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्. स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्.. (२९) हे दुंदुभि! धरती और आकाश को शब्दपूर्ण कर दो. चर और अचर प्राणी तुम्हारे शब्द को जान लें. तुम इंद्र तथा अन्य देवों के साथ मिलकर हमारे शत्रुओं को बहुत दूर भगाओ. (२९) आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि सुरिता बाधमानः. अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व.. (३०) हे दुंदुभि! हमारे शत्रुओं को रुलाओ एवं हमें ओज तथा बल दो. तुम शत्रुओं को बाधा ebook converter DEMO Watermarks*
पहुंचाते हुए शब्द करो. हमारा दुःख जिनके सुख का कारण है, ऐसे लोगों को भगाओ. तुम इंद्र की मुष्टिका हो. तुम हमें दृढ़ता दो. (३०) आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद् दुन्दुभिर्वावदीति. समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु.. (३१) हे इंद्र! शत्रुओं द्वारा रोकी गई हमारी गायों को ले आओ. सबको ज्ञान कराने के लिए यह दुंदुभि बार-बार बज रही है. हमारे सैनिक घोड़ों पर चढ़कर घूम रहे हैं. हे इंद्र! हमारे रथ पर बैठे सैनिक जय पावें. (३१) सूक्त—४८ देवता—अग्नि यज्ञाज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे. प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम्.. (१) हे स्तोताओ! तुम सभी यज्ञों में प्रवृद्ध अग्नि की स्तोत्रों द्वारा बार-बार प्रशंसा करो. हम मरणरहित, जातवेद व मित्र के समान प्रिय अग्नि की बार-बार प्रशंसा करते हैं. (१) ऊर्जो नपातं स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये. भुवद् वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम्.. (२) हम अपने ऊपर वास्तव में प्रसन्न एवं बलपुत्र अग्नि की प्रशंसा करते हैं. देवों के लिए हव्यवहन करने वाले अग्नि को हम हव्य देते हैं. अग्नि युद्ध में हमारे रक्षक, उन्नतिकारक एवं हमारे पुत्रों के त्राणकर्त्ता हों. (२) वृषा ह्यग्ने अजरो महान्विभास्यर्चिषा. अजस्रेण शोचिषा शोशुचच्छुचे सुदीतिभिः सु दीदिहि.. (३) हे अभिलाषापूरक, जरारहित एवं महान् अग्नि! तुम दीप्ति से प्रकाशित होते हो. हे तेजस्वी एवं नित्यदीप्ति से दीप्तियुक्त अग्नि! तुम अपनी शोभन दीप्तियों द्वारा हमें प्रकाशित करो. (३) महो देवान्यजसि यक्ष्यानुषक्तव क्रत्वोत दंसना. अर्वाचः सीं कृणुह्यग्नेऽवसे रास्व वाजोत वंस्व.. (४) हे अग्नि! तुम महान् देवों का यज्ञ करने वाले हो, इसलिए हमारे यज्ञ में भी देवों की सतत पूजा करो तथा हमारी रक्षा के लिए देवों को हमारे सामने लाओ. तुम हमें हव्य अन्न दो एवं हमारा दिया हुआ हव्य स्वीकार करो. (४) यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति. ebook converter DEMO Watermarks*