रोगी रोग मुक्त बिना दवाई: योगासन एवं प्राणायाम
Rogi Rog Mukt Bina Dawai: Yogasan evam Pranayama
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Chikitsa & Yogasan Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
- • यह एक चक्र हुआ।
- • इस तरह से आप 5 चक्र करें।
शीर्षासन
- • सबसे पहले आप अपने योग मैट के आगे बैठ जाएं।
- • अब आप अपने अंगुलियों को इन्टर्लॉक करें और अपने सिर को उस पर रखें।
- • धीरे धीरे अपने पैरों को इन्टर्लॉक अंगुलियों का मदद लेते हुए ऊपर उठायें और इसे सीधा करने की कोशिश करें।
- • शरीर का पूरा भार अब आप इन्टर्लॉक किये हुए अंगुलियों और सिर पर लें।
- • इस अवस्था में कुछ देर तक रुकें और फिर धीरे धीरे घुटनों को मुड़ते हुए पैरों को नीचे लेकर आयें।
- • यह एक चक्र हुआ।
- • आप इसे 3 से 5 बार कर सकते हैं।
पश्चिमोत्तानासन
- • सबसे पहले आप जमीन पर बैठ जाएं।
- • अब आप दोनों पैरों को सामने फैलाएं।
- • पीठ की पेशियों को ढीला छोड़ दें।
- • सांस लेते हुए अपने हाथों को ऊपर लेकर जाएं।
- • फिर सांस छोड़ते हुए आगे की ओर झुके।
- • आप कोशिश करते हैं अपने हाथ से उँगलियों को पकड़ने का और नाक को घुटने से सटाने का।
- • धीरे धीरे सांस लें, फिर धीरे धीरे सांस छोड़ें
- • और अपने हिसाब से इस अभ्यास को धारण करें।
- • धीरे धीरे इस की अवधि को बढ़ाते रहे।
- • यह एक चक्र हुआ।
- • इस तरह से आप 3 से 5 चक्र करें।
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नौकासन
- • सबसे पहले आप पीठ के बल लेट जाएं।
- • आपके हाथ जांघ के बगल हों और आपकी शरीर एक सीध में हों।
- • अपने शरीर को ढीला छोड़ें और सांस पर ध्यान दें।
- • अब आप सांस लेते हुए अपने सिर, पैर, और पुरे शरीर को 30 डिग्री पर उठायें।
- • ध्यान रहे आपके हाथ ठीक आपके जांघ के ऊपर हों।
- • धीरे धीरे सांस लें और धीरे धीरे सांस छोड़ें, इस अवस्था को अपने हिसाब से बनाये रखें।
- • जब अपने शरीर को नीचे लाना हो तो लंबी गहरी सांस छोड़ते हुए सतह की ओर आयें।
- • यह एक चक्र हुआ और शुरुवाती दौड़ में 3 से 5 बार करें।
- • एक दूसरी तरीका नौकासन का है जिसमें आप अपने सिर और पैर को सांस लेते हुए 45 डिग्री पर उठाते हैं एवं शरीर को V आकर का बनाते हैं। इसको एडवांसड नौकासन में रखा जाता है।
- • अपने हिसाब से इस स्थिति को धारण करें।
- • फिर सांस छोड़ते हुए धीरे धीरे जमीन की ओर आयें।
हलासन
- • पीठ के बल लेट जाएं और हाथों को जांघों के निकट टिका लें।
- • अब आप धीरे-धीरे अपने पांवों को मोड़ें बगैर पहले 30 डिग्री पर, फिर 60 डिग्री पर और उसके बाद 90 डिग्री पर उठाएं।
- • सांस छोड़ते हुए पैरों को पीठ उठाते हुए सिर के पीछे लेकर जाएं और पैरों की अँगुलियों को जमीन से स्पर्श करायें।
- • अब योग मुद्रा हलासन का रूप ले चुका है।
- • धीरे धीरे सांस लें और धीरे धीरे सांस छोड़ें।
- • जहाँ तक संभव हो सके इस आसन को धारण करें।
- • फिर धीरे धीरे मूल अवस्था में आएँ।
- • यह एक चक्र हुआ।
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- • इस तरह से आप 3 से 5 चक्र कर सकते हैं।
सुप्त वज्रासन
- • सबसे पहले आप वज्रासन में बैठ जाएं।
- • कोहनियों (Elbows) का सहारा लेते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकें और कोहनियों को जमीन पर टिका दें।
- • हाथों को धीरे-धीरे सीधे फैलाएं और सिर के पीछे की ओर ले जाएं।
- • अब कंधों को जमीन पर टिकाते हुए एवं घुटनों को एक साथ रखते हुए पीठ के बल लेट जाएं।
- • हाथों को कैंची की आकृति बनाते हुए कंधों के नीचे लेकर आएं।
- • धीरे धीरे सांस लें फिर धीरे धीरे सांस छोड़ें।
- • अपने हिसाब से इस अवस्था को बनाएं रखें।
- • फिर धीरे धीरे अपने आरंभिक अवस्था आ जाएं।
- • यह एक चक्र हुआ।
- • इस तरह से आप 3 से 5 चक्र कर सकते हैं।
पद्मासन
- • जमीन पर बैठ जाएं।
- • दायां पांव मोड़ें तथा दाएं पैर को बाईं जांघ के ऊपर तथा कूल्हों के पास रखें।
- • ध्यान रहे दाईं एड़ी से पेट के निचले बाएं हिस्से पर दबाव पड़ना चाहिए।
- • बायां पांव मोड़ें तथा बाएं पैर को दाईं जांघ के ऊपर रखें।
- • यहां भी बाईं एड़ी से पेट के निचले दाएं हिस्से पर दबाव पड़ना चाहिए।
- • हाथों को ज्ञानमुद्रा में घुटनों के ऊपर रखें।
- • रीढ़ की हड्डी को सीधी रखें।
- • धीरे धीरे सांस लें और धीरे धीरे सांस छोड़ें।
- • अपने हिसाब से इस अवस्था को बनाएं रखें।
- • आप इसकी अवधि को 1 मिनट से लेकर 1 घंटे तक बढ़ा सकते हैं।
- • फिर धीरे धीरे आप अपनी आरंभिक अवस्था में आ जाएं।
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उद्घासन
- • सबसे पहले आप फर्श पर घुटनों के बल बैठ जाएं या आप वज्रासन में बैठें।
- • ध्यान रहे जांघों तथा पैरों को एक साथ रखें, पंजे पीछे की ओर हों तथा फर्श पर जमे हों।
- • घुटनों तथा पैरों के बीच करीब एक फुट की दूरी रखें।
- • अब आप अपने घुटनों पर खड़े हो जाएं।
- • सांस लेते हुए पीछे की ओर झुकें और अब दाईं हथेली को दाईं एड़ी पर तथा बाईं हथेली को बाईं एड़ी पर रखें।
- • ध्यान रहे कि पीछे झुकते समय गर्दन को झटका न लगे।
- • अंतिम मुद्रा में जांघें फर्श से समकोण बनाती हुई होंगी और सिर पीछे की ओर झुका होगा।
- • शरीर का वजन बांहों तथा पांवों पर समान रूप से होना चाहिए।
- • धीरे धीरे सांस ले और धीरे धीरे सांस छोड़े।
- • जहाँ तक हो सके अपने हिसाब से मुद्रा को मेन्टने करें।
- • और फिर लंबी गहरी सांस छोड़ते अपनी आरंभिक अवस्था में आएँ।
- • यह एक चक्र हुआ।
- • इस तरह से आप इसको पांच से सात बार कर सकते हैं।
धनुरासन
- • सबसे पहले आप पेट के बल लेट जाएं।
- • सांस छोड़ते हुए घुटनों को मोड़े और अपने हाथ से टखनों को पकड़ें।
- • सांस लेते हुए आप अपने सिर, चेस्ट एवं जांघ को ऊपर की ओर उठाएँ।
- • अपने शरीर के लचीलापन के हिसाब से आप अपने शरीर को और ऊपर उठा सकते हैं।
- • शरीर के भार को पेट निचले हिस्से पर लेने की कोशिश करें।
- • जब आप पूरी तरह से अपने शरीर को उठा लें तो पैरों के बीच की जगह को कम करने की कोशिश करें।
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- • धीरे धीरे सांस ले और धीरे धीरे सांस छोड़े। अपने हिसाब से आसन को धारण करें।
- • जब आप मूल स्थिति में आना हो तो लम्बी गहरी सांस छोड़ते हुए नीचे आएं।
- • यह एक चक्र पूरा हुआ।
- • इस तरह से आप 3-5 चक्र करने की कोशिश करें।
चंद्र नमस्कार
- • इसे करने के लिए चंद्र की तरफ मुख कर के खड़े हो जाएँ।
- • इसके बाद दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए कमर के ऊपर के हिस्से को जितना पीछे झुका सकते हैं, झुकाएं।
- • अब दोनों हाथ आकाश की ओर खुले रखें।
- • बीज मंत्र-: ऊँ चंद्राय नमः।
ताड़ासन
- • इसके लिए सबसे पहले आप खड़े हो जाएं और अपने कमर एवं गर्दन को सीधा रखें।
- • अब आप अपने हाथ को सिर के ऊपर करें और सांस लेते हुए धीरे धीरे पुरे शरीर को खींचें।
- • खिंचाव को पैर की अंगुली से लेकर हाथ की अंगुलियों तक महसूस करें।
- • इस अवस्था को कुछ समय के लिए बनाये रखें और सांस ले सांस छोड़े।
- • फिर सांस छोड़ते हुए धीरे धीरे अपने हाथ एवं शरीर को पहली अवस्था में लेकर आयें।
- • इस तरह से एक चक्र पूरा हुआ।
- • कम से कम इसे तीन से चार बार प्रैक्टिस करें।
यानासन
- • सावधान स्थिति में खड़े हो जाएं।
- • दोनों हाथों को पीछे की ओर रखें।
- • कमर को आगे की ओर झुकाएं।
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- • बायें पैर को पीछे की ओर उठाएं।
- • पैर का पंजा पीछे की ओर खींचा हुआ रहे।
- • जितना ज्यादा से ज्यादा पैर को पीछे से उठाएं, उतना उठाने की कोशिश करनी चाहिए।
- • सारे शरीर का वजन सीधे पैर पर रहेगा।
- • थट्टि सामने की ओर रखें।
- • एक बार श्वास को बाहर निकाल कर बाहर ही रोके।
- • जब श्वास लेने की इच्छा हो तब श्वास ले लें।
- • लेकिन आसन की अवस्था स्थिरता के साथ बनी रहे।
- • कुछ समय तथा रोके, उसके बाद पहले वाली स्थिति में आ जाएं।
- • एक आकृति से तीन आकृति तक करें।
- • तीस सेकेंड से एक मिनट तक करने का प्रयास करें।
- • वायुयान जैसी स्थिति होने से इस आसन का नाम यानासन है।
जानुशिरासन
- • इस आसन को नियमित रूप से करने से घुटने, पीठ, कमर और टांगों की नसें व मांसपेशियाँ मजबूत हो जाती हैं। पीठ व मेरुदंड में लचीलापन लाया जा सकता है जिससे उनमें होने वाले अनियमित दर्द खत्म हो जाते हैं।
- • इस आसन द्वारा श्वसन तंत्र निरोगी होता है।
- • इस आसन द्वारा वीर्य सम्बन्धी रोग या दोष ठीक किये जा सकते हैं।
- • मधुमेह के रोग भी दूर किये जा सकते हैं।
- • प्लीहा, यकृत, आंतों आदि के दोषों को खत्म किया जा सकता है साथ ही मोटापे की समस्या से भी छुटकारा पाया जा सकता है।
- • इस आसन द्वारा साइटिका का दर्द भी दूर किया जा सकता है।
- • उदर और आमाशय के रोग ठीक किये जा सकते हैं तथा पाचन तंत्र को मजबूत किया जा सकता है।
- • इस आसन द्वारा स्त्रियों में कामवासना को बढ़ाया जा सकता है तथा स्त्री पुरुष के गुसांगों को मजबूत बनाया जा सकता है।
- • रीढ़ की हड्डी से गुजरने वाली मूल रक्त नलिका के विकार दूर किये जा सकते हैं।
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सिद्धासन
- • सबसे पहले आप जमीन पर बैठ जाएं।
- • बाएं पैर की एड़ी को गुदा से सटाकर रखें तथा दाएं पैर की एड़ी को अंडकोष के नीचे रखें। दोनों पैरों के पंजे जांघों एवं पिंडलियों के बीच होने चाहिए। हाथों को घुटनों के ऊपर रखें।
- • ध्यान रहे इस योगाभ्यास के दौरान आपका पूरा शरीर एकदम सीधा होना चाहिए।
- • अपनी दृष्टि को नाक की नोक पर केंद्रित करें। शुरुवाती दौड़ में इसको आप कुछ समय के लिए प्रैक्टिस करें लेकिन धीरे धीरे इसकी अवधि को बढ़ाएं और 10 मिनट तक लेकर जाएं।
सर्पासन
- • पैरों के तलवें ऊपर की ओर तथा पैरों के अंगूठे आपस में मिलाकर रखें। दोनों हाथों को कोहनियों से मोड़कर दोनों हथेलियों को छाती के बगल में फर्श पर टिका कर रखें।
- • अब गहरी सांस लेकर सिर को ऊपर उठाएं, फिर गर्दन को ऊपर की ओर उठाएं, सीने को और फिर पेट को धीरे-धीरे ऊपर उठाने का प्रयास कीजिए।
- • सिर से नाभि तक का शरीर ही ऊपर उठना चाहिए तथा नाभि के नीचे से पैरों की अंगुलियों तक का भाग जमीन से समान रूप से सटा रहना चाहिए।
- • फिर गर्दन को तानते हुए सिर को धीरे-धीरे अधिक से अधिक पीछे की ओर उठाने की कोशिश कीजिए। आखें ऊपर की तरफ होनी चाहिए।
- • सर्पासन पूरा तब होगा जब आप के शरीर का कमर से ऊपर का भाग सिर, गर्दन और सीना सांप के फन के तरह ऊंचा उठ जाएंगे।
- • पीठ पर नीचे की ओर कूल्हे और कमर के जोड़ पर ज्यादा खिंचाव या जोर मालूम पड़ने लगेगा। ऐसी स्थिति में ऊपर की तरफ देखते हुए कुछ सेकेंड तक सांस को रोकिए।
- • इसके बाद सांस छोड़ते हुए पहले नाभि के ऊपर का भाग, फिर सीने को और माथे को जमीन पर टिकाएं तथा बाएं गाल को जमीन पर लगाते हुए शरीर को ढीला छोड़ दीजिए।
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हस्त मुद्रा योग
हस्त मुद्रा योग से पायें किसी भी बीमारी में तुरन्त ईलाज हठयोग पर आधारित इस ग्रंथ को महर्षि घेरण्ड ने लिखा था। मानव शरीर अनन्त रहस्यों से भरा हुआ है। शरीर की अपनी एक मुद्रामयी भाषा है।
यह शरीर पंच तत्वों के योग से बना है-
(1) पृथ्वी, (2) जल, (3) अग्नि, (4) वायु, एवं (5) आकाश
❖ ज्ञान मुद्रा :
- • ज्ञान-मुद्रा विधि: अंगूठे, तर्जनी (पहली) अंगुली के सिरे पर लगा दें। शेष तीनों अंगुलियां सीधी रहेंगी।
- • स्मरण-शक्ति का विकास होता है और ज्ञान की वृद्धि होती है,
- • पढ़ने में मन लगता है, मस्तिष्क के स्नायु मजबूत होते हैं,
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- • सिरदर्द दूर होता है तथा अनिद्रा का नाश, स्वभाव में परिवर्तन, अध्यात्म-शक्ति का विकास और क्रोध का नाश होता है।
❖ वायु मुद्रा :
वायु मुद्रा विधि – तर्जनी अंगुली के अग्र भाग अगूठे के अन्तिम छोर से लगाये और अगूठे से धीरे-धीरे दबाये।
वायु-मुद्रा का लाभ: वायु शांत होती है। लकवा, साइटिका, गठिया, संधिवात, घुटने के दर्द ठीक होते हैं।
गर्दन के दर्द, रीढ़ के दर्द तथा पार्किंसन्स रोग में फायदा
होता है।
❖ आकाश मुद्रा :
आकाश-मुद्रा विधि: मध्यमा अंगुली को अगूठे के अग्रभाग से मिलायें। शेष तीनों अंगुलियां सीधी रखें।
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आकाश-मुद्रा का लाभ - कान के सब प्रकार के रोग जैसे बहरापन आदि, हड्डियों की कमजोरी तथा हृदय रोग में अप्रत्याशित लाभ होता है।
सावधानी: भोजन करते समय एवं चलते-फिरते यह मुद्रा न करें।
❖ शून्य मुद्रा :
शून्य-मुद्रा विधि: मध्यमा अंगुली को मोड़कर अंगुष्ठ के मूल में लगायें एवं अंगूठे से दबायें।
शून्य-मुद्रा का लाभ: कान के सब प्रकार के रोग जैसे बहरापन आदि दूर होकर शब्द साफ सुनायी देता है,
मसूड़े की पकड़ मजबूत होती है तथा गले के रोग एवं थायरायड रोग में फायदा होता है।
❖ पृथ्वी मुद्रा :
पृथ्वी-मुद्रा विधि: अनामिका (तीसरी) अंगुली को अंगूठे से लगाकर रखें।
पृथ्वी-मुद्रा का लाभ: शरीर में स्फूर्ति, कांति एवं तेजस्विता आती है। दुर्बल व्यक्ति मोटा बन सकता है,
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वजन बढ़ता है, जीवनी शक्ति का विकास होता है।
यह मुद्रा पाचन-क्रिया ठीक करती है, सात्विक गुणों का विकास करती है, दिमाग में शांति लाती है तथा विटामिन की कमी को दूर करती है।
A close-up photograph of a right hand performing the Surya Mudra. The thumb is bent at the knuckle and pressed against the base of the ring finger. The other fingers are extended upwards. The hand is set against a light blue background.
❖ सूर्या मुद्रा :
सूर्य-मुद्रा विधि: अनामिका (तीसरी) अंगुली को अंगूठे के मूल पर लगाकर अंगूठे से दबायें।
सूर्य-मुद्रा का लाभ: शरीर संतुलित होता है, वजन घटता है, मोटापा कम होता है।
शरीर में उष्णता की वृद्धि, तनाव में कमी, शक्ति का विकास, खून का कोलेस्ट्रॉल कम होता है।
यह मुद्रा मधुमेह, जिगर के दोषों को दूर करती है। सावधानी: दुर्बल व्यक्ति इसे न करें। गर्मी में ज्यादा समय तक न करें।
A close-up photograph of a right hand performing the Surya Mudra. The thumb is bent at the knuckle and pressed against the base of the ring finger. The other fingers are extended upwards. The hand is set against a light grey background.
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❖ वरूण मुद्रा :
वरूण मुद्रा विधि: कनिष्ठा (छोटी) अंगुली को अंगूठे से लगाकर मिलायें।
वरूण मुद्रा का लाभ: यह मुद्रा शरीर में रूखापन नष्ट करके चिकनाई बढ़ाती है, चमड़ी चमकीली तथा मुलायम बनाती है।
चर्मरोग, रक्त विकार एवं जल-तत्व की कमी से उत्पन्न व्याधियों को दूर करती है।
मुंहासों को नष्ट करती है और चेहरे को सुंदर बनाती है। सावधानी: कफ-प्रकृतिवाले इस मुद्रा का प्रयोग अधिक न करें।
❖ अपान मुद्रा :
अपान-मुद्रा विधि: मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग से लगा दें।
अपान-मुद्रा का लाभ: शरीर और नाड़ी की शुद्धि तथा कब्ज दूर होता है। मल-दोष नष्ट होते हैं, बवासीर दूर होता है।
वायु-विकार, मधुमेह, मूत्रावरोध, गुर्दों के दोष, दांतों के दोष दूर होते हैं।
पेट के लिये उपयोगी है, हृदय-रोग में फायदा होता है तथा पसीना अधिक स्रावित होने से शरीर के अनावश्यक तत्व बाहर निकलते हैं।
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❖ अपानवायु या हृदय रोग मुद्रा :
हृदय-रोग-मुद्रा विधि: तर्जनी अंगुली को अंगूठे के मूल में लगायं तथा मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के आगे वाले हिस्से से लगा दें।
हृदय-रोग-मुद्रा का लाभ: जिनका दिल कमजोर है, उन्हें इसे प्रतिदिन करना चाहिये। दिल का दौरा पड़ते ही यह मुद्रा कराने पर आराम होता है। पेट में गैस होने पर यह उसे निकाल देती है। सिरदर्द होने तथा दमे की शिकायत होने पर लाभ होता है।
सीढ़ी चढ़ने से पांच-दस मिनट पहले यह मुद्रा करके चढ़ें।
❖ प्राण मुद्रा :
- • प्राण-मुद्रा विधि: कनिष्ठा तथा अनामिका अंगुलियों के अग्रभाग को अंगूठे से मिलायें।
- • प्राण-मुद्रा का लाभ: यह मुद्रा शारीरिक थकान दूर करती है, मन को शांत करती है, आंखों के दोषों को दूर करके ज्योति बढ़ाती है,
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- • शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाती है, विटामिनों की कमी को दूर करती है तथा थकान दूर करके नवशक्ति का संचार करती है।
- • लंबे उपवास-काल के दौरान भूख-प्यास नहीं सताती तथा चेहरे और आंखों एवं शरीर को चमकदार बनाती है। अनिद्रा में इसे ज्ञान-मुद्रा के साथ करें।
❖ सहज शंख मुद्रा :
- • दोनो हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर हथेलियां दबाएं। दोनो अंगूठों को मिलाकर तर्जनी उंगली को हल्के से दबाएं, 15 – 15 मिनट तीन बार करें।
- • इससे हकलाने और तुतलाने की समस्या दूर होगी।
❖ लिंग मुद्रा :
लिंग-मुद्रा विधि: चित्र के अनुसार मुट्ठी बाँधें तथा बायें हाथ के अंगूठे को खड़ा रखें, अन्य अंगुलियां बंधी हुई रखें।
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लिंग-मुद्रा का लाभ: शरीर में गर्मी बढ़ाती है। सर्दी, जुकाम, दमा, खांसी, साइनस, लकवा तथा निम्न रक्तचाप में लाभप्रद है, कफ को सुखाती है।
सावधानी: इस मुद्रा का प्रयोग करने पर जल, फल, फलों का रस, घी और दूध का सेवन अधिक मात्रा में करें। इस मुद्रा को अधिक लंबे समय तक न करें।
❖ योनि मुद्रा :
- • योनि मुद्रा विधि – दोनों हाथों की अंगुलियों का उपयोग करते हुए सबसे पहले दोनों कनिष्ठा अंगुलियों को आपस में मिलाएं और दोनों अंगूठे के प्रथम पोर को कनिष्ठा के अंतिम पोर से स्पर्श करें। फिर कनिष्ठा अंगुलियों के नीचे दोनों मध्यमा अंगुलियों को रखते हुए उनके प्रथम पोर को आपस में मिलाएं।
- • मध्यमा अंगुलियों के नीचे अनामिका अंगुलियों को एक-दूसरे के विपरीत रखें और उनके दोनों नाखूनों को तर्जनी अंगुली के प्रथम पोर से दबाएं। शरीर की सकरात्मक सोच का विकासकरती है और मस्तिष्क, हृदय और फेफड़े स्वस्थ बनते हैं।
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❖ शक्तिपान मुद्रा :
शक्तिपान मुद्रा विधि – दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी अंगुली को इस तरह से मिला लें कि पान की सी आकृति बन जाएं तथा दोनों हाथों की बची हुई तीनों अंगुलियों को हथेली से लगा ले।
ब्रेन की शक्ति में बहुत विकास होता है।
❖ माण्डुकी मुद्रा :
- • मुंह बंद करके जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर नीचे घुमाएं। तालू से टपकती हुई लार को पीये।
- • स्वास्थ्य सुधरता है इससे त्वचा चमकदार बनती है तथा इसके नियमित अभ्यास से वात-पित्त एवं कफ की समस्या दूर हो जाती है।
❖ पुष्पांजलि मुद्रा :
- • पुष्प अर्पण करते समय या भगवान से कुछ मांगते समय आपके हाथ जैसे रहते हैं वैसे ही यह मुद्रा बनती है –
- • दोनों खुली और सीधी हथेलियों को अगल – बगल सटा कर।
- • इसको निरंतर अभ्यास करने से नींद अच्छी तरह से आने लगती है। आत्मविश्वास बढ़ता है।
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हाथ की पांचों उंगलियों के दबाने के लाभ देखे -
(एक्यूप्रेशर पद्धति)
- • हमारे हाथ की पांचो उंगलिया शरीर के अलग अलग अंगों से जुडी होती है।
- • इसका मतलब आप को दर्द नाशक दवाइयां खाने की बजाए इस आसान और प्रभावशाली तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए।
(१.) अंगूठा
=====
हाथ का अंगूठा हमारे फेफड़ों से जुड़ा होता है। अगर आप की दिल की धड़कन तेज है तो हलके हाथो से अंगूठे पर मसाज करे और हल्का सा खिचे, इससे आप को आराम मिलेगा।
(२.) तर्जनी
=====
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ये उंगली आंतों gastro intestinal tract से जुड़ी होती है | अगर आप के पेट में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा रगड़े , दर्द गायब हो जायेगा।
(३.) बीच की उंगली
=====
ये उंगली परिसंचरण तंत्र तथा circulation system से जुड़ी होती है | अगर आप को चक्कर या आपका जी घबरा रहा है तो इस उंगली पर मालिश करने से तुरंत रहत मिलेगी |
(४.) तीसरी उंगली
=====
ये उंगली आपकी मनोदशा से जुड़ी होती है | अगर किसी कर्ण आपका मनोदशा अच्छा नहीं है या शांति चाहते हो तो इस उंगली को हल्का सा मसाज करे और खिचे, आपको जल्द ही इस के अच्छे नतीजे प्राप्त हो जयेगे, आप का मूड खिल उठेगा।
(५.) छोटी उंगली
=====
छोटी उंगली का किडनी और सिर के साथ सम्बन्ध होता है | अगर आप को सिर में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा दबाये और मसाज करे, आप का सिर दर्द गायब हो जायेगा | इसे मसाज करने से किडनी भी तंदुरुस्त रहती है |
एक्यूप्रेशर पद्धति के द्वारा कुछ उपचार
- 1. अंगूठा दबाने से सिर दर्द दूर हो जाता हैं और दिमाग की सारी दुर्बलताएं दूर होती हैं।
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- 2. चारो उंगली के ऊपर का हिस्सा दबाने से साइनस ठीक होता है जैसे - नाक बहना, सर्दी लगना, खाँसी जुकाम, माइग्रेन आदि
- 3. पहली उंगली (तर्जनी) के ठीक नीचे वाले पाइंट को दबाने से आँखों के रोग दूर होते हैं, ज्योति बढ़ती है, बंहगापन दूर होता है।
- 4. दूसरी उंगली के ठीक नीचे वाले पाइंट को दबाने से फेफड़े स्वस्थ होते हैं।
- 5. छोटी उंगली के नीचे वाले पाइंट को दबाने से कान के सभी रोग दूर होते हैं, जैसे कान से मवान आना, कम सुनाई देना, पर्द फट जाना, इससे थोड़ा और नीचे दबाने से हृदय रोग दूर होते हैं।
- 6. उससे और नीचे दबाने पर मधुमेह रोग दूर होता है।
- 7. हथेली के उभरे हुए भाग को दबाने से (अंगूठे के पास) थायराइड ठीक होता है।
- 8. दूसरी उंगली को मोड़कर जिस पाइंट पर लगेगी उस पाइंट को दबाने पर किडनी स्वस्थ होती है एवं किडनी के रोग दूर होते हैं।
- 9. हथेली की शुरुआत में , हाथ की कलाई के मध्य भाग को दबाने से मूत्र संबंधित रोग दूर होते हैं।
- 10. अंगूठे के दायी और बायी तरफ से दबाने पर , गर्दन में दर्द या कमर में दर्द रोग दूर होता है।
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- 11. छोटी उंगली के नीचे , हथेली के नीचे साईड की और पाइंट दबाने पर कन्धे के दर्द के रोग दूर होते हैं।
- 12. हथेली के बीचों बीच दबाने पर पेट स्वस्थ रहता है।
- 13. बड़ी उंगली के ऊपरी हिस्से को दबाने पर निम्न रक्तचाप संतुलित होता है।
- 14. अनामिका उंगली के ऊपरी भाग को दबाने पर हार्ड रक्तचाप संतुलित होता है।
- 15. घुटना के दर्द दूर करने के लिए, अनामिका उंगली को पीछे के तरफ से पूरी उंगली को दबाये।
- 16. छोटी उंगली के ऊपरी भाग को दबाने से , छोटे बच्चों का बिस्तर पर पेशाब करना छूट जाता है।
कुछ महत्वपूर्ण एक्यूप्रेशर बिन्दू
- 1. जॉइनिंग द वैली – यह प्वाइंट हमारे अंगूठे और इंडेक्स फिंगर (तर्जनी) के बीच में होता है। इस प्वाइंट पर दबाने से शरीर के कई प्रकार के दर्द जैसे कि सिर दर्द, दांत का दर्द, गर्दन का दर्द, कंधे का दर्द, अर्थराइटिस और कब्ज जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
- 2. पैरीकार्डियम – ये प्वाइंट हमारे हथेली से लगभग दो अंगुल नीचे की तरफ हमारी कलाई में मौजूद होता है। इस प्वाइंट पर दबाने से सिर दर्द, वॉर्मिंटिंग, सीने में दर्द, हाथों में दर्द और बैचेनी दूर हो जाती हैं।
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