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रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

रोगों की पहचान

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व्यक्ति, क्षय रोगी, हृदय रोगी, तीव्र ज्वर से पीड़ित, रक्तचाप से पीड़ित लोग यह स्नान मत लें।

नेत्र स्नान

सुबह-शाम ठण्डे पानी से मुख भरकर ठण्डे पानी से ही आँखों में छीटे मारें।

नेत्र स्नान से मिलने वाला लाभ

आँखों की ज्योति बढ़ती है।

नासिका स्नान

❑ एक टॉंटीदार लोटा लें।

❑ लोटे में गुनगुना या शीतल जल डालें।

अब घुटनों के बल बैठ जाएँ और लोटे की टॉंटी नासिका के एक तरफ डालें। गर्दन को एक तरफ घुमा लें ताकि पानी आसानी से नाक में चला जाए। साथ ही पानी को दूसरी नासिका से बाहर निकालते जाएँ। यदि शुरू में ऐसा न हो सके तो मुँह से ही निकाल लें।

नोट

❑ यह स्नान आप रोज कर सकते हैं।

नासिका स्नान से मिलने वाला लाभ

नेत्र ज्योति बढ़ती है, याददाश्त में वृद्धि होती है, जुकाम ठीक होता है।

पैर का गर्म स्नान

❑ एक पतीले में गर्म पानी उबालें।

❑ एक बाल्टी में इतना गर्म पानी डालें, जिसमें आपके पैर पूरी तरह से डूब जाएँ। पानी इतना गर्म हो कि आपके पैर सह सकें।

अब एक कुर्सी पर बैठ बाल्टी सहित अपने को किसी कम्बल

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साहिब बन्दगी

से लपेट लें। और पैरों को बाल्टी में डाल दें। सिर पर ठंडे पानी में भिगोया हुआ तौलिया रख दें और समय-समय पर ठंडक कम होने से साथ-2 उसे बदलते रहना चाहिए। जैसे ही लगे कि पानी की गर्मी कम हो गयी है तो थोड़ा गर्म पानी और डाल लें। विशेष ध्यान रहे कि पानी पैरों पर सीधा न पड़े, जिससे पाँव न जलने पाएँ। 15 मिनट यह स्नान लेने के बाद पावों को ठण्डे पानी से धोकर पोछ लें।

पैर स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

हृदय-रोग, दमा, अनिद्रा, रक्तचाप, मासिक धर्म, जुकाम, लकवा, सिर दर्द आदि।

स्थानीय भाप स्नान

  • □ एक पतीले में पानी उबालें।
  • □ एक टॉंटीदार बर्तन में पानी को डालें। बर्तन का ढक्कन पूरी तरह से ढका हुआ हो।

अब जिस अंग में सूजन है, उसी अंग को भाप का यह स्नान दें। बाद में गीले कपड़े से पोंछ लें। फिर कोई गर्म कपड़ा 5 मिनट के लिए लपेट दें।

नोट

  • □ यह स्नान रोज़ लिया जा सकता है।

स्थानीय भाप स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभकारी है—

छाती, पेट, पीठ, मुँह, हाथ, पाँव आदि अंगों में सूजन हो तो उन अंगों को यह स्नान देना लाभकारी सिद्ध होता है।

गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान

नहाते समय आपके पास एक गर्म पानी की बाल्टी और दूसरी ठण्डे पानी की बाल्टी होनी चाहिए। अब अपने सिर पर थोड़ा ठण्डा जल फेंककर तौलिया बाँधें दें ताकि सिर पर गर्म पानी न गिरने पाए। फिर गर्म

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पानी के दो लोटे शरीर पर डालकर रगड़ें। इसके बाद ठण्डे जल का एक लोटा डालें और रगड़ें। ऐसा बार-बार करें। कोई 5 बार कर लें। अंत में जब ठण्डे पानी का लोटा डालें तो स्नान बंद कर दें और तौलिये से शरीर को पौछ लें। सिर पर बाँधा तौलिया भी उतार दें।

गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

कमर दर्द, पीठ में दर्द, कंधों में दर्द, टाँगों में दर्द और अन्य दर्दों में लाभकारी है।

गर्म सेंक

एक पतली में गर्म पानी करके रख लें। अब जिस अंग में रोग हो, उसपर नारियल का पानी लगाकर एक सूखा कपड़ा रख दें। फिर एक तौलिये को उस गर्म पानी में डालकर बाहर निकालें और निचोड़ लें। अब उस अंग पर रखें और ऊपर से कोई मोटा या ऊनी कपड़ा डाल दें। जब लगे कि कपड़े की गर्मी कम हो गयी है तो पुनः गर्म पानी में डालकर वैसा ही करें। बाद में ठंडे गीले तौलिये से उस अंग को मलें और कोई ऊनी कपड़ा लपेट दें।

नोट

□ यह सेंक 20-30 मिनट दें।

यह सेंक निम्नलिखित रोगों में लाभकारी है—

मोच, जिगर में पीड़ा, किसी भी अंग में दर्द।

धूप स्नान

सारे कपड़े खोलकर किसी एकांत स्थान में, जहाँ धूप पड़ती हो, बैठकर धूप-स्नान लिया जा सकता है। इसका समय सूर्य निकलने के बाद एक-डेढ़ घण्टे के अंदर ही होता है। कम-से-कम 15 मिनट तक यह स्नान लें।

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साहिब बन्दगी

नोट

यदि एकांत स्थान न मिले तो सफेद कपड़ा पहन लें।

साधारण स्नान

साधारण स्नान की भी वास्तव में एक विधि है। जब भी आप नहाएँ, पहले हाथों से या किसी तौलिये से अपने शरीर को अच्छी तरह रगड़ लें। यह रगड़ना ऊपर से शुरू करें और नीचे पैरों में ख़त्म।

नोट

साधारणतया ठण्डे पानी से नहाएँ, ताकि रक्त का संचालन ठीक रहे और चुस्ती बनी रहे।

हफ्ते में एक बार गर्म पानी से नहाएँ, ताकि आपके रोम छिद्र खुल जाएँ और गंदगी भी अच्छी तरह से साफ़ हो।

अधिक ठण्ड होने पर गुनगुने पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।

रोज़ गर्म पानी से मत नहाएँ। इससे पाचन-क्रिया कमजोरी होती है, शरीर में सुस्ती बढ़ती है।

साधारण स्नान भोजन के बाद करना हो तो कम-से-कम ढाई घण्टे बाद करें। अन्यथा साधारणतया भोजन के आधे से एक घण्टा पहले ही करें।

व्यायाम या शारीरिक श्रम से आई हुई थकान को दूर करने के बाद ही स्नान करना चाहिए।

सत्यनाम निज औषधि, सतगुरु देइ बताय।

औषध खाय अरू पथ रहै, ताकी वेदन जाये॥

बीमारियों से बचे रहने के सरल और बेहतरीन उपाय

बीमारियों से बचे रहने के सरल और बेहतरीन उपाय

कसरत

हररोज कम-से-कम आधा घण्टा व्यायाम करें। 27 डण्ड, 27 बैठक निकालें और इतने ही लेटकर सिटअप निकालें। अन्य व्यायाम भी कर सकते हैं। व्यायाम शुरू करने से पहले शरीर पर देसी तेल या घी की मालिश जरूर करें। यह कसरत सुबह-शाम दोनों समय भी कर सकते हैं। शाम के समय करें तो भोजन के कम-से-कम तीन घण्टे बाद ही करें।

प्राणायाम

शरीर में अधिकांश रोग वायु-विकार से ही होते हैं और प्राणायाम इस वायु-विकार को ठीक कर लेता है। इसलिए सुबह-सुबह यह प्राणायाम भी 5 मिनट कर लें।

उपवास

10 दिन में एक बार व्रत रखना चाहिए। यह व्रत कैसे रखना, ध्यान से समझें। पूरा दिन कुछ नहीं खाना; रात को भी नहीं खाना; केवल पानी पी लें। सुबह उठकर एक बड़ा गिलास पानी पीकर शौच जाना। बड़ा सख्त मल बाहर आयेगा; आँतें खुलेंगी। फिर मुँह-हाथ धोकर 4 लीटर पानी पीना। पेट में गैस होगी, इसलिए डकारते जाना, गैस बाहर निकालते जाना और पानी पीते जाना। ऐसे में दिल घबराने लगेगा। चिंता नहीं करना। शुरू-2 में मुश्किल आयेगी, फिर आसान हो जायेगा। इतना

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साहिब बंदगी

पानी पीना कि आँतों के नीचे उतर जाए। अब शौच जाने की इच्छा होगी। पहले तो रोटी के सड़े हुए अंश, काले-काले दाने, छिलके आदि, जो शरीर में फँसे होंगे, पानी के साथ बाहर आयेंगे। ये ही गैस बनाते हैं। फिर पीला-पीला पानी बाहर आयेगा। यदि पानी नीचे से उतरे तो थोड़ा हिलना-डुलना। तो तीसरी बार अब बची-खुची गंदगी के साथ थोड़ा-थोड़ा साफ पानी निकलेगा। चौथी बार नल की तरह साफ पानी बाहर आयेगा। फिर हाथ साफ करके मुँह में अंगुली डालकर बचा पानी भी बाहर निकाल लेना। इसके बाद अब हल्का भोजन करना। जब ऐसा व्रत होगा तो शरीर का वात, पित्त और कफ सब ठीक हो जायेगा, इसलिए रोग नहीं हो पायेंगे।

योगासन

योगासन भी शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए यह भी आधा घण्टा तक कर सकते हैं।

भोजन में सावधानी बरतें

  • □ भोजन करते समय पानी 1-2 घूँट करके ही पिएँ। बहुत अधिक पानी भोजन के साथ मत लें। भोजन के साथ घूँट-2 पानी अमृत समान है, लेकिन बहुत अधिक पानी ठीक नहीं। भोजन के तुरंत बाद पानी मत पिएँ, यह विष समान है।
  • □ एक बार भोजन करके दूसरी बार भोजन करने में पाँच-छः घण्टे का अंतर जरूर रखें।
  • □ भोजन को चबा-चबाकर तरल बनाकर खाएँ।
  • □ हो सके तो भोजन खुली-ताजी-स्वच्छ हवा और धूप में खाएँ। पर यदि कमरे में खाना हो तो ताजी हवा के आने का मार्ग बंद न करें।
  • □ भोजन का समय भी निश्चित होना चाहिए। असमय भोजन करना भी हानिकारक हो जाता है। यदि आप शाम को 6 बजे भोजन

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करते हैं तो ज्यादा-से-ज्यादा साढ़े छः ही होने दें।

  • ❑ सुबह पाचन-शक्ति तेज होती है, फिर यह शाम तक लगातार धीरे-धीरे कम होती जाती है, इसलिए भोजन का अधिक अंश सुबह ही कर लें। शाम को कम भोजन करना चाहिए और रात को सोते समय तो बिल्कुल भी नहीं खाना चाहिए।
  • ❑ शाम का भोजन सोने से कम-से-कम दो घण्टा पहले होना चाहिए। ऐसे में नींद भी अच्छी आयेगी।
  • ❑ चखो पर चरो मत, चरो तो फरो, न फरो तो मरो। किसी ने कितना प्यारा कहा है। भोजन के मामले में अल्प आहारी बनें। यानी कुछ भी खाना हो, बहुत ज्यादा नहीं खाएँ। यदि ज्यादा खा लिया तो फिर सैर कर लो। यदि खुराक बहुत है और सैर भी नहीं करते हो तो जल्दी मरने के लिए तैयार रहो।

पानी में सावधानी बरतें

जल को ऋग्वेद में परम औषधी कहा गया है।

सर्वेषाम् भेषजम् आपुं में॥

अर्थात-जल में सभी प्रकार की औषधियाँ हैं। अथर्ववेद भी कह रहा है-

अप्सवन्तर मुतमप्सु भेषजम्॥

अर्थात-जल में अमृत है, जल में औषधी है। पर हमें जल पीने का समय पता होना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है-

अजीर्णो भेषजं बारि, जीर्णो बारि बलप्रदम्।

भोजने चामृतो बारि, भोजनान्ते विषप्रदम्॥

जब भोजन न किया जाए, केवल जल का ही सेवन किया जाए, तब जल औषधी का काम करता है। जब भोजन पच जाए तब जल बल प्रदान करता है। जब भोजन के बीच में थोड़ा-2 जल पिया जाए, तब जल अमृत समान होता है। पर भोजन करने के ठीक बाद पिया हुआ जल

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साहिब बन्दगी

विष-तुल्य होता है।

इसलिए जल पीने के मामले में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए—

  • ❑ पानी पीने की मात्रा आयु और मौसम के अनुसार होनी चाहिए।
  • ❑ साधारणतया हररोज़ दो लीटर पानी ज़रूर पीना चाहिए।
  • ❑ सुबह उठकर एक बड़े गिलास पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पीना मल की सही सफाई के लिए बड़ा लाभाकारी होता है।
  • ❑ जल घूँट-2 करके पीना चाहिए। दो-तीन सैकेण्ड मुँह में रखने के बाद ही नीचे उतारना चाहिए।
  • ❑ जो जल आप पी रहे हैं, ध्यान रहे कि वो न अधिक गर्म हो और न अधिक ठण्डा। चाहे कितनी भी गर्मी हो, पर अधिक ठण्डे जल का सेवन मत करें। वो हानिकारक ही होता है।
  • ❑ भूख लगने पर पानी मत पिएँ, इससे जलोदर रोग हो सकता है।

पानी का पीना निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—

थोड़े-थोड़े समय के अंतराल में एक बड़ा गिलास ठण्डा पानी पीते रहना पत्थरी, उच्च रक्तचाप, ज्वर, कब्ज आदि रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है।

इसके अतिरिक्त यदि नींद न आए तो किसी खुले बर्तन में पानी डालें। 8 मिनट तक दोनों पैर उसमें डाले रखें। सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडे पानी का सहारा ले सकते हैं। फिर यदि पेशाब रुक-रुक कर आता हो तो ठंडे-ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर नाभि स्थान के नीचे रखें। इस तरह पानी के बहुत गुण हैं। पर सावधानी बरतें कि पानी स्वच्छ पिएँ। यदि पानी स्वच्छ न हो तो उबालकर उसे ठंडा करके पिएँ।

रोगों से बचे रहने के पाँच सर्वोत्तम फार्मूले

रोगों से बचे रहने के पाँच

सर्वोत्तम फार्मूले

पाँच चीजें स्वास्थ्य के मामले में अपनाओगे तो रोग आपके पास आयेंगे ही नहीं।

नाम-भजन करना

सर्व रोग की औषध नाम

नाम सभी प्रकार के रोगों की औषधी है। इतना ही नहीं, यह नाम जन्म-मरण रूपी महारोग का भी नाश करने वाला है।

सतगुरु शब्द सहाई।

निकट गये तन रोग न व्यापे, पाप ताप मिट जाई॥

शरीर के रोग भी नहीं आयेंगे। नाम रक्षा करता है। पर शर्त है कि गुरु के शब्द का उल्लंघन न हो।

यह नाम रोगों का नाश कैसे करता है, इसे समझते हैं। पहले समझना होगा कि रोगों का मुख्य कारण क्या है।

जैसे डाक्टर आँख के रोग में दूषित पदार्थ के जमाव को नहीं समझ पाते हैं, वो आँखों का इलाज करने लगते हैं। वो आँख के परे की गहराई में नहीं जा पाते, गंदे पदार्थ की तरफ उनका कोई ध्यान नहीं होता। ऐसे ही नजूरिया वैद्य भी केवल दूषित पदार्थ तक ही पहुँच पाते हैं। डॉ० आँख तक ही रहा, उसके लिए आँख ही रोग की जड़ है। अन्य-अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ अपनी-अपनी तरह से रोग की जड़ बताती हैं। आयुर्वेद शरीर में कफ, पित्त और वायु की मात्रा में असंतुलन को रोग की जड़ मानता है।

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साहिब बदरी

सभी अपने-अपने तरीके से रोग की जड़ बता रहे हैं, पर रोगों की असली जड़ को कोई भी नहीं जानता है। वो जड़ है-मन। यह एक परम रहस्य है।

मन के पाँच हाथ हैं-काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। ये पाँचों से ही भयंकर शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए जिसमें काम अधिक है, उसे टी.बी. होने की पूरी-पूरी संभावना रहती है। इन सबको काबू करने के लिए सदगुरु नाम देता है। इसलिए नाम ही वास्तव में सब रोगों का नाश करने वाला है। जो नाम करने वाला है, उसे रोग आयेंगे ही नहीं।

व्यायाम

व्यायाम जैसा पीछे कहा गया, वैसा ही करना। यह भी रोगों को पास में नहीं आने देता है, शरीर में मौजूद दूषित द्रव्य को पसीने के द्वारा बाहर कर देता है।

मूली पपीते का सेवन

यदि आप भोजन के द्वारा अपने स्वास्थ्य को ठीक रखना चाहते हैं तो सबसे पहले तो आप सुबह खाली पेट मूली, पपीते और खीरे का सेवन शुरू कर दें। लोगों को किसी चीज़ के खाने का सही समय भी मालूम नहीं है। अधिकतर लोग मूली और खीरा रात को ही खाते हैं। यह परम हानिकारक हो जाता है। इस फार्मूले को सदैव याद रखें-

खीरा सुबह हीरा दिन को खीरा रात को पीड़ा।

मूली सुबह पूली दिन को मूली रात को सूली।।

यानी खीरा सुबह के समय खायेंगे तो हीरे की तरह लाभकारी सिद्ध होगा, यदि दिन के समय खायेंगे तो केवल खीरा ही रह जायेगा और रात को सेवन करेंगे तो वो आपको पीड़ा देने वाला सिद्ध होगा। ऐसे ही मूली भी सुबह खायी तो उत्तम है, दिन के समय मध्यम और रात को खाना तो समझो कि अपने को सूली पर चढ़ाने के बराबर है।

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उपवास रखना

यह उपवास भी जैसा पीछे सरल उपाय में कहा गया है, वैसा ही रखना। जैसे किसी मशीन से काम लेने के बाद समय-समय पर आप उसकी सफाई करते हैं, ताकि वो ठीक से काम करती रहे, लंबे समय तक चले। आप उसकी सर्विस करवाते हैं। ऐसे ही इस शरीर में जो पाचन-क्रिया की मशीनें हैं, उन्हें भी सफाई की जरूरत पड़ती है। भोजन के अंश जहाँ-तहाँ फँस जाते हैं, जिन्हें निकालने के लिए पीछे बताई गयी विधि के अनुसार 10 दिन में एक बार व्रत रख लेना चाहिए।

हमारा च्यवनप्राश खाना

यह हमारा च्यवनप्राश खाना इसलिए कहा कि हमारे च्यवनप्राश की बात ही सबसे निराली है। जो च्यवनप्राश हम बनाते हैं, मेरा दावा है कि दुनिया में कोई नहीं बना पायेगा। जिस च्यवन ऋषि ने इसे सबसे पहले बनाया था, वो भी ऐसा नहीं बना पाया था। क्योंकि इसमें मैंने सांसारिक बूटियाँ ही नहीं मिलायी हैं, एक अलौकिक बूटी भी मिलायी है। इसलिए बोल रहा हूँ कि ऐसा च्यवनप्राश कोई नहीं बना पायेगा।

यह हर रोग की दवा है। यहाँ तक कि विरोधी रोगों को भी यह ठीक कर देगा। यानी यदि आपको उच्च रक्तचाप होगा तो कम कर देगा और यदि निम्न रक्तचाप होगा तो बढ़ा देगा। यह आपका स्टेमिना भी बढ़ायेगा। यह आपको आलसी भी नहीं बनने देगा। ऐसा है यह च्यवनप्राश। जोड़ों के दर्द में यह लाजवाब है, आँखों की नज़र से पक्का बढ़ायेगा, खाँसी को जड़ से मिटा देगा, साँस की बीमारी होगी तो उसका नामोनिशान भी नहीं रहेगा। सार यह है कि शरीर के रोम-रोम को यह च्यवनप्राश चेतन कर देता है। आप जल्दी बूढ़े भी नहीं होंगे। यह मत सोचना कि कहीं व्यवसाय के लिए है। नहीं, 100 के करीब डिब्बे तो महीने में ऐसे ही मुफ्त में बाँट देता हूँ और फिर है भी बहुत ही सस्ता। इतना सस्ता कहीं

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साहिब बन्दगी

नहीं होगा। फिर इसकी शुद्धता का क्या कहना! एक और बड़ी बात यह कि इसमें हम कोई केमिकलस भी नहीं डाल रहे हैं और न ही कोई मिलावट कर रहे हैं। आप हमारे बच्चे ही तो हैं। जैसे माता-पिता को बच्चों की फिकर होती है, ऐसे ही हमें भी आपकी फिकर है। इसलिए आपके लिए यह परम औषधी बनायी है। इसके सेवन में तीन बातें ध्यान में रखना—

  1. 1. भोजन के बाद एक चम्मच दिन में दो बार ले सकते हैं।
  2. 2. बच्चों और बूढ़ों को आधा चम्मच ही खिलाएँ।
  3. 3. च्यवनप्राश खाने के आधे घण्टे बाद तक पानी मत पिएँ।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर ॥

आयुर्वेद का महत्व

आयुर्वेद का महत्व

हमारे देश में पहले आयुर्वेद का बड़ा महत्व था। टीके नहीं थे। चेचक बगैरह से बचाने के लिए माताएँ बच्चों को घुट्टी पिलाती थीं। आज हम अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर हो गये हैं, इसलिए उम्र कम होती जा रही है, बीमारियाँ भी बढ़ती जा रही हैं।

मेडिकल साईंस ने बड़ी तरक्की की, वैज्ञानिक उन्नति पर हैं, पर वे कुछ बीमारियों की दवा नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं। उदाहरण के लिए एड्स। यह जानलेवा है। रोगी मरेगा-ही-मरेगा। आखिर क्या चीज़ है एड्स। शरीर के अंदर रोग-निरोधक शक्ति का ह्रास ही एड्स है। वो कीटाणु इतने ठीठ हैं कि आसानी से मरते भी नहीं हैं। यदि तेज दवा दी जाएगी तो पहले इंसान ही मर जायेगा। इसी तरह जितनी भी दवाएँ डॉ० देता है, वो रोग के कीटाणुओं की तो खबर लेती ही है, साथ में आपकी भी खबर लेती है। जैसे मच्छरों को भगाने के लिए जो आप गुड नाइट बगैरह का इस्तेमाल करते हैं, वो मच्छरों की खबर तो लेगा ही, साथ ही आपकी भी खबर ले लेगा। मैंने एक बार अखबार में पढ़ा कि यदि छोटे बच्चे को किसी बंद कमरे में सुलाकर गुड नाइट लगा दी जाए तो वो सुबह तक मर भी सकता है। इस तरह दवा भी आपको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाकर ही जाती है।

तो एड्स के कीटाणु जल्दी पनपते हैं। उनका हमला रक्त पर है। भाई, रक्त के ग्राहकी बहुत हैं। हम जो भी खा रहे हैं, उसी से तो रक्त बन रहा है। आदमी उत्तम खाता है। जो शेर एक बार नरभक्षी हो जाए, वो फिर किसी दूसरे जानवर का माँस खाना ही नहीं चाहता है। मनुष्य उत्तम पदार्थ खाता है। काजू, बादाम आदि कोई जानवर तो खाता नहीं है। इसलिए जो शेर आदमी का माँस खा लिया, वो बाकी जानवर की तरफ जाता ही नहीं है।

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साहिब बन्दगी

हरेक कीटाणु को हमला ही रक्त पर है। वो कीटाणु तो दवा से भी नहीं मरते हैं और बहुत तेज दवा इंसान को दी नहीं जा सकती, क्योंकि पहले इंसान ही मर जायेगा। हर दवा का तो साइड इफेक्ट है। ऐलोपैथी यहाँ फेल है। डॉ० लोगों के पास तो तीन चीजें रह गयी हैं— 1. एन्टिसेप्टिक 2. पेनिकिलर 3. कुत्रिम विटामिन

इनके बाद शल्य चिकित्सा है। पर ये तीनों चीजें हमारे शरीर का नाश ही करती हैं। कुत्रिम विटामिन लेते हैं तो जो हमारे शरीर में विटामिन बनाने वाली नाडियाँ हैं, वो काम करना बंद कर देती हैं, कमजोर हो जाती हैं। क्योंकि जैसे बना-बनाया मिल गया तो बनाने का आलस नहीं आ जाता है! दूसरा जो भी एन्टिसेप्टिक ले रहे हैं, वो कीटाणुओं के साथ-2 आपकी भी खबर ले रही है। आयुर्वेद साइड इफेक्ट से हटकर है।

एक तो हमारे चार मूल वेद हैं, फिर चार उपवेद भी हैं। एक है- आयुर्वेद, जिनके रचयिता प्रजापति ब्रह्मा हैं वैसे, लेकिन अश्विनी कुमार और धनवंत्री कहा जाता है। देवताओं का डॉ० अश्विनी कुमार तो मेडिकल से बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। नाक पर अश्विनी कुमार का वास है। कोई भी चीज खाने लगे तो यह बताता है कि खानी चाहिए कि नहीं। यह सृष्ठकर बताता है। इस शरीर में बड़ा जोरदार सिस्टम है। तो 14 देवताओं में अश्विनी कुमार का वास नाक पर है। यह अपनी ड्यूटी कर रहा है। आयुर्वेद पर 42 कामसूत्र के शास्त्र भी लिखे गये हैं। गुरुकुलों में ऋषि-मुनि इन चीजों की भी शिक्षा देते थे।

तो दूसरा है- धनुर्वेद। इसके रचयिता हैं- विश्वामित्र। सभी शस्त्रों का प्रयोग, शस्त्र चलाने की कला, राजनीति, प्रजा के साथ व्यवहार आदि का इसमें उल्लेख है। तलवार कैसे चलानी है, भाला कैसे चलाना है आदि इसमें बताया गया है।

तीसरा है-गन्धर्ववेद। इसमें गायन, शृंगार आदि का वर्णन है। गले का कैसे सजाना है, जूड़ा कैसे बाँधना है आदि। लोग कहते हैं कि

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ब्यूटी-पार्लर का कोर्स करके आई है। यह सब तो हमारे धर्म-शास्त्रों से चुराकर वो ले गये हैं। यहाँ तो पहले ही था।

तो चौथा उपवेद है—अर्थवेद। वो मूल वेद तो अथर्ववेद है, पर यह अर्थवेद है। इसमें धन-उपार्जन के फार्मूले बताए गये हैं। किस मौसम में क्या खरीद करनी चाहिए, यह भी बताया गया है। लोग कहते हैं बिजनेस एण्ड मैनेजमेंट। भाइयों, यह सब तो यहाँ से लिया गया है। यह सब यहाँ का मूल है। हमारा देश आगे था, आगे है। तो उसमें यह भी लिखा है कि आपका आवास कैसा हो। आज जो इंजीनियर बता रहे हैं, वो सब उसमें है। जैसे उत्तर दिशा में शोचाल्य नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वायुकोण की तरफ रखा तो दिन-भर हवा द्वारा वही गंद बदबू आती रहेगी।

...तो एड्स पर चिकित्सा विज्ञान फेल हो गया। वनस्पति जगत की पूरी-पूरी खबर उसे नहीं हुई। वनस्पति जगत में कई लाख किस्म के पौधे हैं। हरेक का बड़ा महत्व है। लोग नहीं जानते हैं, इसलिए आश्चर्यचकित हैं एड्स के मरीजों को पीड़ित देखकर।

मैंने एड्स पर शोध किया। मैंने उन जड़ी-बूटियों को देखा, जिन्हें कीड़ा नहीं लगता है। 27 लाख कीटों में से कोई भी कीड़ा उन पौधों में नहीं लग रहा था। उन बूटियों पर शोध किया। जैसे नीम, कनियारी आदि बूटियों पर कीड़ा नहीं लग रहा है। पपीते पर भी कीड़ा नहीं लग रहा है। ऐसे अन्य बूटियाँ भी हैं। मैंने प्रयोग किया। एक फौज के सूबेदार को मेरा शिष्य अरुणाचल प्रदेश से लाया। वो अंतिम स्टेज पर था। डॉ० तो ऐसा कर देगा, ऐसी दवा दे देगा कि यदि 3 साल में मरना होगा तो 5 पाँच साल में मरेगा। पर मरेगा। क्योंकि कीटाणु बढ़ते ही जायेंगे। उनका विकास रुकेगा नहीं।

एड्स के मरीज को यदि बुखार हुआ तो उतरेगा नहीं, यदि जुकाम हुआ तो चलता ही रहेगा, क्योंकि रोग-प्रतिरोधक शक्ति ही नहीं रहती है। फिर सभी कीटाणु हमला बोल देते हैं। कीटाणु बढ़ते जाते हैं, उसने तो मरना ही है।

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साहिब बन्दगी

तो जिन दवाओं को कीड़ा नहीं लगता, जब वो खून में पहुँचेंगी, उसी से तो माँस भी बनेगा। फिर उस माँस के पास कीड़ा आयेगा ही नहीं। इस तरह नयी पीढ़ी पनपेगी ही नहीं, विकास भी रुक जायेगा। मैंने पहले अपने पर शोध किया, सोचा कि यदि शरीर पर कुछ असर हुआ तो निपट लूँगा।

तो बड़ी औषधियाँ हैं, जिन्हें कोई भी कीड़ा नहीं लगता है। जोजड़े देखे, उनके चारों तरफ काँटे हैं। कनियारी में भी काँटे हैं। कीड़ा पहुँचता नहीं है। ये बड़ी संजीवनी-सी बूटियाँ हैं।

...तो मैंने तीन दिन उसे आश्रम में रखा, वो चीज़ दी। वो कहने लगा कि मुझे अब रोग नहीं है। ऐसे ही कुछ और लोगों को भी वो दवा दी। पाँच साल से भी ज्यादा हो गये, वे स्वस्थ हैं।

जब भी वो दवा रक्त में पहुँचेंगी तो उन कीटाणुओं का विकास रुक जायेगा, आगे भी नहीं होगी। तो कहने का भाव है कि बनस्पति जगत में बहुत कुछ है।

मेरे पास वैद्य भी आते हैं। पर मेरा लक्ष्य इससे हटकर है। यह इसलिए कि लोगों को शरीर का भी लाभ मिले। शरीर स्वस्थ होगा तो भक्ति-ध्यान भी ठीक हो पायेगा।

पहला स्वर्ग नीरोगी काया।

इसलिए सोचा कि यदि लोगों को लाभ मिल जाए तो अच्छा ही तो है। आप सोचें कि पहले ऋषि-मुनियों की आयु भी लंबी थी, उन्हें इन चीजों का ज्ञान था।

रोगों के उपचार में आयुर्वेद के फार्मूले

रोगों के उपचार में आयुर्वेद के फार्मूले

कुछ रोग होने पर

  • ▣ 22 ग्राम बाबची, 22 ग्राम हल्दी (दोनों), 12 ग्राम धमासा, 12 ग्राम शिंगरफ, 12 ग्राम हीरा कसीस, 12 ग्राम हरताल, 12 ग्राम मैनसिल, 12 ग्राम पारा-गंधक-सबको गाय के घी के साथ घोटे। जब लेप तैयार हो जाए तो इसे शरीर पर लगाकर 5 घण्टे धूप में बैठें। उसके बाद पानी में नीम का रस डालकर स्नान करें।
  • ▣ आक का दूध दें।
  • ▣ काले दाने (बेल) को अकरकरा के साथ पीसकर कोढ़ वाले स्थान पर लेप करें।
  • ▣ कनेर के फूल को तोड़कर ले आएँ और मीठे तेल में डाल दें। ऐसे 41 दिन तक पड़ा रहने देंगे तो वो गल जायेगा। अब जैतून का तेल भी मीठे तेल जितना ही उसमें डाल कर अच्छी तरह मिला लें। इस तेल की मालिश से सफेद दाग खत्म होते हैं।
  • ▣ त्रिफला, पीपल, अतीस, इलायची, बायबिडंग, चित्रक, जीरा, अजमोद, देवदारू, सोठ, नागरमोथा, कूट चव्च, बच, खुरासानी, संधा नमक, कलौंजी, मिर्च-सबको समान मात्रा में अच्छी तरह से कूट-पीस लें। अब इसे गाय के घी में मिलाकर 4-4 ग्राम की छोटी-2 गोलियाँ बना लें। यह गोली रोगी को हररोज खिलानी चाहिए।

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साहिब बन्दगी

सावधानी बरतें

  • ❑ खट्टी चीजें मत खाएँ।
  • ❑ दूध, दही मत खाएँ।

क्षय रोग

  • ❑ पीपल, भटकटैया का फल, नागरमोथा और दाख-सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को घी और घी से डबल की मात्रा में शहद के साथ चाटें।
  • ❑ शुद्ध भिलातक, काली मिर्च, सत गिलोय, छोटी इलायची-सब बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। अब 1 रत्ती यह दवा आधा पाव बकरी के दूध के साथ दें और प्रतिदिन दूध की मात्रा 20 ग्राम बढ़ाते जाएँ। बहुत लाभकारी है।
  • ❑ लहसुन की ढाई कलियों को छील-पीसकर पौन गिलास दूध में डालकर उबालें। जब अच्छी तरह से गाढ़ा हो जाए तो उतारकर गुनगुना हो जाने पर पी लें।
  • ❑ नहाने के बाद कुछ देर धूप का सेवन करें।

हैजा होने पर

इसमें बार-बार उलटी और दस्त का आना, प्यास का सताना आदि लक्षण सामने आते हैं।

  • ❑ पुदीने का रस रोगी को पिलाएँ।
  • ❑ 15 से 20 ग्राम छोटी इलायची का छिलका लेकर उसे गुलाबजल में अच्छी तरह से उबाल लें। यह जल रोगी को दें।
  • ❑ नींबू की शिकंजी बनाकर रोगी को पिलाएँ।

जुकाम होने पर

जुकाम मुख्य रूप से कफ, पित्त और वायु के कारण होता है।

रोगों की पहचान

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यदि कफ के कारण जुकाम होगा तो सिर तो भारी होगा ही, साथ ही नाक से सफेद कफ भी निकलेगा। यदि पित्त के कारण जुकाम होगा तो प्यास तो अधिक लगेगी ही, साथ में नाक से पीला पदार्थ भी निकलेगा और यदि वायु के कारण जुकाम हुआ तो गला तो बँठेगा ही, साथ ही नाक से पतला-पतला मवाद भी निकलेगा।

साधारणतया नाक का बहना, उसका एक या दोनों तरफ से बंद हो जाना, सिर में भारीपन महसूस होना और अधिक छँके आना आदि बताते हैं कि रोगी को जुकाम हो गया है।

  • ❑ अदरक का रस निकालकर गर्म कर लें। अब उसे शहद में मिलाकर रोगी को चाटने को दें।
  • ❑ चाय में तुलसी के पत्ते डालकर रोगी को पिलाएँ।
  • ❑ तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाएँ। मिठास के लिए थोड़ी मिश्री डाल सकते हैं।
  • ❑ अजवायन का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर रोगी को दें।
  • ❑ कफ के जुकाम में भुने हुए चने खाना भी लाभदायक होता है।

सावधानी बरतें

  • ❑ यदि कब्ज है तो पेट की सफाई के लिए व्रत रखें।
  • ❑ ठंडे जल से मत नहाएँ।
  • ❑ सोते समय सिर के नीचे तकिया मत रखें। यदि रखना ही है तो पतला-सा रखें, जिससे सिर ज्यादा ऊँचा न होने पाए।
  • ❑ दही और घी मत खाएँ।
  • ❑ भोजन हल्का करें, जो जल्दी पच सके।

आँखों से दिखना कम हो जाने पर

  • ❑ 5 ग्राम भीमसेनी कपूर लें, 5 ग्राम केसर और 260 ग्राम गुलाब जल को लेकर अच्छी तरह घोंट ले। अब अच्छी तरह छानकर

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साहिब बन्दगी

किसी बोटल में भर लें। इसका सेवन आँखों के लिए बहुत लाभकारी है।

पीपल, बहेड़े की गुठली का गूदा, बच, मिर्च, हर्र, शंखनाभि, कूठ, मनःशिला-सबको बकरी के दूध के साथ अच्छी तरह पीस लें। अब छोटी-2 बत्तियाँ बना लें। इन बत्तियों को शहद के साथ घिसकर आँख में लगाने से दृष्टि बढ़ती है।

बड़ा सौँफ, बादाम की गिरी, कूजे वाली मिश्री-सबको समान मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें और किसी शीशी में रख लें। 12 ग्राम यह चूर्ण रात को सोने के ठीक पहले पौन गिलास दूध के साथ प्रतिदिन डेढ़ महीने तक लें।

नीम कमल, मुलहटी, तमाल पत्र, कपूर, गेरू और नागकेशर-सबको पीसकर आँखों में अंजन की तरह लगाएँ।

ज्योतिष्मती के तेल की 3-4 बूँदों को मक्खन के साथ मिलाकर चाटना बड़ा ही हितकर होता है।

60 ग्राम कलमी शोरे को प्याज के रस में डालकर आग पर रखें। जब प्याज का रस जल जाए तो उसे उतार शीशी में बंद करके रख दें। यह नेत्रों का बेहतरीन सुरमा तैयार हो गया। इसे सुरमे की तरह ही लगाएँ।

आँख दुखने पर

सबसे पहले मँहदी की थैली बना लें। अब उस थैली में सुपारी, कपूर, फिटकरी, काठा और लोध डालकर थोड़ा पानी भी डाल दें, जिससे सब अच्छी तरह से तर हो जाएँ। अब उस थैली को आँखों में लगाएँ।

ग्वारपाटे का रस आँखों में लगाएँ।

बहेड़े को शहद में घिसकर लेप करें।

आमिया हल्दी और ग्वारपाटे का गूदा मिलाकर लेप बना लें।