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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

नीरोगता : ३२९

५--सप्तमेश लग्नेश युक्त चतुर्थं में हो और दशमेश से दुष्ट हो तो कुआँ तांछाब

जदी आदि में गिरे ।

६---चतुर्थेश का नवांश स्वामी सप्तमेश या चतुर्थेश युक्त या दृष्ट हो तो भी उप￾रोक्त फल हो ( स० चिं० ) ।

७--कन्या राशि में सूर्य चन्द्र दोनों हों ओर पाप ग्रह से दुष्ट हों तो जल में

डूबने से मरण हो ( जा० सं० ) ।

८--कर्क पर शनि और मकर पर चंद्र हो तो उपरोक्त फल ( जा० स० )।

६--चतुरस्थ ग्रह नीच राशि में या अस्त हो तो कूप ताळाब आदि में गिरे

( जा० पा०) 1

१०--चतुर्थेश नीच का, अस्त, चतुर्थ भाव में शत्रुगृढी जल राशि का हो

चतुर्थेश हीन बल हो तो कुआँ के किनारे जल समूह में गिरे ( स० चि० ) ।

१ --तृतीयेश गुरु युक्त लग्न में हो ओर जल राश का लग्न हो तो जल से

भय हो ( स० चि० ) ।

१२--धन भाव में चन्द्र हो तो जळ से भय हो ( शंभु० ) ।

१३--छमग्नेश और षष्ठेश चन्द्र के साथ हो तो जल से भय हो ( स० चि० ) ।

१४ -व्यय में चन्द्रमा से युक्त शनि व राहु या केतु हो तो जळ से पीड़ा हो

( जा० सं० ) ।

१५--शनि मंगल राहु से युक्त हो या शनि चतुर्थ भाव में हो तो जल से भय

हो (स० चि० ) ,

१६--लग्न में चन्द्र पाप राशि का पाप ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो जछ से भय हो

(शंभु० )।

१७--जलचर लग्न हो तो जल भें डूबने का भय हो ( जा० पारि० ) ।

१८--चतुर्थ में शनि राहु हो तो वाँध व जछ से व ऊपर से गिरने से व अपने

शरीर से मृत्यु ( जा० सं० ) । ;

१९--यदि शनि अष्टम में क्षीण चन्द्र युक्त हो तो पिशाच पीड़ा हो और पानी

में बहने का भय हो ।

२०--६ या ८ भाव में सूर्य हो और उससे १२वें चन्द्र हो तो ५ और ९ वर्ष में

जल भय हो ( वृ० पा० ) ।

अग्नि भय या विष आदि भय १--छाभ में मंगळ सूर्य हो तो वह अग्नि विष या

अस्त्र चोट से युक्त या पीड़ित हो ( शंभु? ) ।

२--मंगल नवम हो तो अग्नि व विष से पीड़ित हो ( शंभु० )।

३--व्यय में सूर्य व मंगल हो तो अग्नि पीड़ा हो ।

४---गुरु षष्ठ भाव में, शनि अष्टम हो सूयं कक में हो जित पर मंगल की दृष्टि

हो तो अग्नि भय हो ( जा० सं० ) ।

५--लगन में पाप ग्रह पाप राशि का पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अग्नि से दग्ध हो (शंभु)।

३४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

६--लर्त द्रेष्काण के विभाग में सिर स्थान में राहु मंगल या शनि होवे तो सिर स्थान में अग्नि, शस्त्र व काष्ठ से भय हो ( शंभु० ) ।

७--९,७,८,२ भाव में सूर्य से युक्त द्वितीयेश हो मंगल से दुष्ट हो या पाप ग्रह मंगल उपरोक्त राशि में होकर सूर्य से दृष्ट हो तो विस्फोट (ब्रण) या अग्नि का भय हो ( स० चि० ) ।

८--तीसरे भाव में सूर्य या मंगल हो तो हड्डी ट्टे, विष का भय, अग्नि दाह आदि का भय हो।

यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस स्थान के चर्म में भिन्नता कर देता है (शंभु.) ।

९--पंचम मंगल हो तो अग्नि व शस्त्र की पीड़ा हो संतान वराबर मरती रहे, मनुष्य दुःखित रहे ( शंभु० ) ।

१०--नवमेश षष्ठ में हो, षष्ठेश से दृष्ट हो, और षष्ठेश के साथ शनि व मंगल हो तो चोर व अग्नि से पीड़ित रहे ( स० चिं० )। ११--१ ओर ६ के स्वामी राहु युक्त या केन्द्रमै हो तो सिर ददं भय, सिर में चक्कर आने की शिकायत या चोर अग्नि या दाँत का भय हो ( स० चि० )1

१२--छग्नेश शनि से युक्‍त या दृष्ट हो तो अग्नि शस्त्र का या गिरने से सिर में ब्रण हो ( स० चि० )।

पत्थर की चोट शस्त्र आदि से पीड़ित १--नवम में सूर्य चन्द्र हो तो काष्ठ से पत्थर से तथा शस्त्र से पीड़ा हो (शंभु० )।

२-चतुर्थेश सूर्यं और शनि युक्त हो मंगल से दृष्ट हो, शुभ दृष्ट न हो तो पत्थर से चोट लगने का योग है ( स० चिं० ) 1

३--लग्नेश मंगल लग्न में पाप युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर की चोट या खंड ` आदि से सिर में ब्रण हो (स० चि० )। ४ व्यय भाव बुध से युक्त हो तो शत्रु से व पत्थर काष्ट, लोह, श्वूग वाले जीव या पवन आदि से वाधा हो ( जा० सं० )1 चोर ठग या राज भय १--लग्नेश शनि से युक्‍त य! दृष्ट हो तो निश्चय ठग चोर व राजा से भय हो ।

२--छग्न में राहु शनि मंगल युक्त हो । ३-- लग्नेश अष्टम में राहु या केतु युक्त हो । ४-लग्न में राहु त्रिकोण में गुलिक और अष्टम में मंगल केतु युक्त या मंगल शनि युक्त हो या इसमें वृहज्जीव हो या अष्टमेश स्थित राश्यंशेश राहु युक्त हो तो ठग चोर या राजा से भय हो । (वृहज्जीव-शनि मंगल युत राहु को कहते हैं) ( स० चि० ) । ५-- द्वितीयेश के साथ पाप युवत सूर्य हो तो राजा के कोप का भय हो (सर्णच) ७- लग्नेश पाप युक्त हो रून में राहु हो तो ठग चोरों से भय हो।

_ नीरोगता : ३४१

| ८--छग्न में पाप ग्रह गुलिक त्रिकोण में हो या लग्न व लग्नेश गुलिक युक्त हो

तो ठग और चोरों से भय हो (स चिं)।

चोर दुःख--लग्नेश, बुध, गुरु, शुक्र व चन्द्र यदि नीच के, अस्तंगत, पराजित,

पापाक्रांत, वक्री, अनुवक्री, आगे वक्री होने वाला हो और त्रिक में हो तो चोर दुःख,

पीड़ा, दरिद्र, रोग, भ्रमण, शत्र भय, वस्त्रहीन आदि अपनी दशा में करें । चोर और प्रेत भय १--लग्न में बुध केतु हो पाप दृष्टि हो तो चोर और प्रेत

आत्माओं से भय हो (स० चिं०) ।

पिशाच पीड़ा १--राहु और शनि यें पिशाच के सूचक हैं जिस पर पिशाच हो

वह उदास बलहीन, भयानक स्वप्न से पीडित, लगातार मानसिक भय, उत्तेजना,

अजीर्ण कभी-कभी दस्त और चक्कर आते हैं।

२-ण्लग्त में शनि राहु हो तो पिशाच की पीड़ा हो (स० चि०) ।

३--द्वितीय में शमि व राहु हो तो भूत पिशाच आदि कृत रोग हो (जा०स०) । ४--पष७ठ में राहु केतु पाप दृष्ट होकर क्रूर नवांश में हो तो पिशाच पीड़ा हो (स० चिं०) ।

५--चन्द्र लगन में हो और राहु ग्रस्त हो (ग्रहण का समथ हो) और त्रिकोण में

पाप ग्रह शनि मंगल हो तो उस पर पिशाच की वाधा लगी रहे (वृ० जा०) ।

६--अष्टम में निवळ चन्द्र, शनि सहित होवे तो पिशाच और जल से उत्पन्न

पीड़ा हो ।

७--क्षोण चन्द्र अष्टम में मंगल, राहु य! शनि में से किसी से युक्‍त हो तो भी

उपरोक्त फल हो (स० चि०) ।

८--उपरोक्त प्रकार से क्षीण चन्द्र दुष्ट स्थान में हो तो पिशाच की पीड़ा हो

और मृत्यु हो ( स० चि० ) ।

अर्थात्‌ क्षीण चन्द्र मंगल राहु या शनि युक्त होकर ६-८*१२स्थान में हो तो

पिशाच पीडा या पागलपन से मृत्यु हो ।

९--क्षीण चन्द्र अष्टम में राहु युक्त हो और दूसरा भाव पाप युक्त हो तो

पिशाच पीड़ा से मरे ( स० चि० ) 1

अध्याय ११

राजयोग

राज योग का अर्थ--राज कुल में या . दुसरे कुल में जन्मा मनुष्य राज्य करे

अर्थात्‌ अधिकार प्राप्त करे या राज्य का कारवार करे अति द्रव्यवान्‌ हो ।

राजा का अर्थ--मुखिया या अधिकारी, कई मनुष्यों के ऊपर जिसका राजा के

समान अधिकार प्राप्त हो, शक्ति धन बल आदि जिसके पास हो ।

राज योग का अभि प्राय--राज योग का यह अभिप्राय नहीं है कि वह अवश्य ही

राजा हो जाएगा । परन्तु राज योग का अर्थ यह है कि जिसके जन्म काल में राजयोग

पड़ा है वह भाग्यवान्‌ होता है ।

जो भाग्य भाव फल कहे हैं वह सब ऐश्वयं आदि का निश्चय राज्य योग से होता

है । उन योगों के कारण जन्म की सफलता होती है ऐसे योग राज योग में वतलाये हैं।

राज योग कारक ग्रहों का जेसा वल हो उसी योग्यतानुसार अधिकार या सरकारी

अधिकार या राज घराने में नोकर या व्यापारी होगा ।

किसी दरिद्र के घर में जन्मे किसी बालक को राज योग हो तो उसका आशय यह नहीं है कि वह राजा ही होगा परन्तु वह भाग्यवान होगा खाने पीने से तंग न रहेगा अपने कुल में श्रेष्ठ होगा । राजा का अर्थ यहाँ अधिकारी लेना चाहिये । राजा तो

अब होते ही नहीं परन्तु राज्य के बड़े-बड़े अधिकारी होते हैं ।

यवनाचार्य का मत है कि किसी गरीब के घर में किसी सन्तान को राजयोग हो तो उसे अरिष्ट होगा नहीं जीवेगा । यदि वच गया तो राजा के समान अधिकारी होगा ।

यवन एवं इतर आचायो ने कई राजयोग कहे हैं जिनमें राजा के समान अधिकार और शक्ति मिलती है । वह केवल उन्हीं लोगों को मिलती है जो राज घराने के हैं । परन्तु यदि ऐसा राजयोग पाप ग्रहों का ऐसे लोगो को प्राप्त हो जो राज घराने के नहीं हैं, उनकी मृत्यु होती है ।

जीवशर्मा का कहना है कि पाप ग्रह उच्चवर्ती होने से राजा नहीं होता किन्तु धनवान्‌ होता है।

राज योग कई प्रकार के हँ । राजयोग कारकांश और जन्म लग्न दोनों से विचा- रना, एक आत्मकारक और पुत्र कारक से दूसरा लग्नेश और पंचमेश ते । इन दोनों के परस्पर सम्वन्ध और बल के अनुपार ही पूर्ण आधा या चतुर्थांश फल होता है । १ उच्च के ग्रह का फल

१ ग्रह उच्च का--कदयं ।

२ ग्रह उच्च का--बड़ा उत्कट काम करता है ।

राजयोग : ३४३

३ ग्रह उच्च का--राजा के समान ।

३ग्रह उच्च का--राजपुत्र राजा. हो अन्य मंत्री हो ( शंभु० ) ।

३ पाप ग्रह उच्च के- क्रूर बुद्धि राजा।

३ शुभ ग्रह उच्च के--सत बुद्धि राजा ।

मिश्र ग्रह से--मिश्र स्वभाव वाला हो ( वृ० जा० ) ।

३ ग्रह उच्च, स्वक्षेत्रीय मूल त्रिकोण के--राज्य कुल में उत्पन्न राजा, अन्य

कुल में उत्पन्न मंत्री हो ( जा० भ० ) ।

४ ग्रह उच्च के--राजा हाथियों युक्त पुल बाँधने में समभं बड़ी कीति (जा.भ.)।

४ ग्रह उच्च के और कुंभ नवांश में शुक्र हो--पृथ्वी का राजा (स०चि$) ।

पाप नवांश या कूर नवांश में न हो तब राजा होता है। '

४ ग्रह उच्च के हों कुंभ लग्न में शनि हो तो पृथ्वी का राजा हो (आा०प।रि०)

४ से अधिक ग्रह उच्च के हों तो दिव्य पुरुष हो ( शंभु० )। -

५ ग्रह उच्च के--सावे भौम राजा ( जा० भ०)।

५ ग्रह उच्च के गुरु लग्न में हो--समस्त जन समुदाय का राजा (जा०पारि०) 1

६ ग्रह उच्च के--सब राजाओं का सम्राट्‌ (जो० पारि०) 1

६ ग्रह चन्द्र सहित उच्च के हों वृष लग्न में चन्द्र हो--राजा हो (स० चि०) |

समस्त ग्रह उच्च के--निश्चय राजा ( शंभु० ) ।

२--३२ प्रकार के राजयोग

१--शनि, मंगल, सूर्ये, गुरु ये चारों उच्च के हों तो--४ भेद हुए ।

२--३ ग्रह उच्च के हो ओर इनमें से १ ग्रह लग्न में हों तो--१२ भेद होंगे ।

३--कर्क में चन्द्र और मंगल सूर्य शनि गुरु में से २ ग्रह उच्च के हो तो--१२

भेद होंगे ।

४- इन्ही में से १ ग्रह उच्च राशि में लग्न गत हो तो--४ भेद होंगे ।

सव ३२ प्रकार के योग हुए :

उदाहरण १--मेष का सूरय, ककं का गुरु, तुला का शनि, मकर का मंगल इनकेः

१,४,७,१० से ४ भेद हुए ।

(१)

३४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२--जब ३ ग्रह उच्च के हों इनमें से एक ग्रह रूग्न में हो तो लग्न भेद से १२ अकार के हुए।

अ--लग्न में सूर्य, तुळा का शनि, कर्क का गुरु--ठग्न १,४,७ से ३ भेद हुए ।

राजयोग : ३४५

मेष लग्न में सूर्य, ककं का गुरु, मकर का मंगल-छग्त १,४,७ से ३ भेद हुए

(४)

३४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स--कक में गुरु, तुला में शनि, मकर का मंगल--४,७,१० लग्न से ३ भेद ।

(९) (१०)

३--अब २ ग्रह स्त्रगृही उच्चगत केन्द्र में हों और ककं का चन्द्र हो तो १२ राज

. योग । मेष में सूये, १ ककं में चन्द्र गुरु, लग्न १,४ से २ भेद ।

'राजयोग : ३४७

२--मेष का सूयं, कर्के का चन्द्र तुला का शनि लग्न १,७ से २ भेद ।

३ ४

४--कर्क का चन्द्र और गुरु, तुला का शनि लग्न ४,७ से २ भेद ।

छ |

३४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फॉलित खण्ड

` ५--कर्क का चन्द्र गुर, मकर का मंगळ लग्त ४७ से २ भेद ।

६, तुला का शनि, मकर का मंगल कर्क का गुरु, छर्न ७,१० से २ भेद ।

११ १२

४--छग्न १, चंद्र सूर्य लग्न (गुरु चंद्र) लग्न शनि चंद्र लग्न मंगल चंद्र

४ १४ ४ ७७४१० १० ४

२ क

राजयोग ! ३४९.

३--जन्म लग्न में वर्गोत्तम हो ( जो लग्न हो वही नवांश में भी हो ) और चन्द्र को छोड़कर ४,५ या ६ ग्रह देखें तो २२ प्रकार के राजयोग होते हैं । इसी प्रकार चन्द्र वर्गोत्तम हो और ४ आदि ग्रहों से दृष्ट हो तो २२ प्रकार के राजयोग होते हैं । इस प्रकार ४४ प्रकार के राजयोग हो जाते हैं । द्रष्टा ग्रहों की संख्या के अनुसार भेद नीचे दिये हैं :-- |

(अ) ४ द्रष्टा ग्रह के १५ भेद (१) सूर्य, मंगळ, बुध, गुरु (६) सूर्य मंगळ शुक्र शनि (११) मंगळ बुध गुरु शुक्र

(२) सूयं, मंगल, वुध, शुक्र (७) सूर्य बुध गुरु शुक्र (२२) मंगल बुध गुरु शनि (३) सूर्य, मंगल, बुध, शनि (८) सूर्य बुध गुरु शनि (१३) मंगल बुध शुक्र शनि (४) सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र (९) सूर्य बुध शुक्र शनि (१४) मंगल गुरु शुक्र शनि (५) सूर्य, मंगल, गुरु, शनि(१०) सूयं गुरु शुक्र शनि (१५) बुध गुरु शुक्र शनि

ब__५ द्रष्टा ग्रह के ६ भेद

१-सू्यं मंगल बुध गुरु शुक्रः २-सूयं मंगल बुध शुक्र शनि ५-सूर्यं बुध गुरु शुक्र शनि २-सूर्य मंगल बुध गुरु शनि ३-सूर्यं मंगल गुरु शुक्र शनि 5-मंगल, बुध गुरु शुक्र शनि क--६ द्रष्टा ग्रह का १ भेद

१- सूर्य, मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि ।

इस प्रकार १५य- ६+ १=२२ भेद हुए ।

इसका उदाहरण आगे दिया है।

३५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

Page 361 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 361)

३५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जब चन्द्रमा लग्न में न हो और लग्न को न देखता हो और ४,५ या ६ ग्रह लग्न

को देखते हों तो इसी प्रकार के और २२ योग (राजयोग) होते हैं ।

४--शनि | सूर्य हि | बुध [गुरु | मंगल |भौर सूयं चन्द्र में सेलग्न ३ भेद

अ--हुंभ । मेष विष मिथुन [सिह |वृश्चिकएक ग्रह लग्न में हो ria

R isn nen aps dy

राजयोंग:. ३५३

ब--शनि चन्द्र | सूर्य बुध | शुक्र | मंगल | गुरु | लग्न २,७ से २ भेद उच्च | कन्या में। तुला | मेष | कर्के राजयोगके

इस प्रकार के ५ राजयोग हुए ।

उच्चादि ग्रह से राजयोग १--एक भी ग्रह उच्च का मित्र ग्रह से दुष्ट हो तो

राजा हो, बहुत धन एवं मित्र मण्डली से युक्त और अच्छी ख्याति हो (स? चि०) |

२-पाप ग्रह उच्च का हो तो पाप बुद्धि राजा हो, जीव शर्मा के मत से वह राजा

नहीं होता धनवान्‌ होता है (वृ. जा.) ।

३-यदि एक या दो ग्रह अपने उच्च या मूक त्रिकोण में हों तो धनवान्‌ हो.

(जा० सं०) ।

४-एक ग्रह उच्च का हो और अन्य सब ग्रह स्वगृही या मित्र गृही हों तो उसका

भाग्य राजा के समान हो (जा० पारि०)।

ए-अकेला ग्रह परमोच्च में हो और मित्र ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो राजा हो

(फल दीप०)। .

६-नीच स्थित ग्रह, उच्च नवांश में हो तो राजा के समान भाग्य हो (जैमिनि),

यदि उच्च राशि में होकर नीच नवांश में हो तो छाभ कारक नहीं होते ।

३५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

७--कोई ग्रह नीच में हो उसके उच्च राशि का स्वामी या वह जिस राशि में

बैठा हो उत्तका स्वामी ठग्न से केन्द्र में हो तो वह धामिक चक्रवर्ती राजा हो

स० चिं० ू

2071 में नीच ग्रह पड़ा हो उस राशि का स्वामी उच्च राशि का स्वामी हो

और केन्द्र या त्रिकोण में हो तो धर्मवान्‌ चक्रवर्ती राजा हो ( छ० चं० ) ।

९--जन्म समय गुरु नीच में और नीच राशि का स्वामी या ग्रह के उच्च राशि

का स्वामी चन्द्र से या लग्न से केन्द्र में हो तो चक्रवर्ती राजा हो ( फल० ) ।

१०--जो ग्रह नीच में हो परन्तु उस राशि से दृष्ट हो तो प्रसिद्ध और पृथ्वी

पति बना देता है ( फछ० ) ।

११--अकेला ग्रह नीच का हो और उसकी किरणें तेज हों और गति में वक्री हो

यह ६,८,१२ घर छोड़कर और कहीं शुभ स्थान में हो तो राजा के तुल्य हो, यदि

२-३ ऐसे ग्रह हों तो राजा हो । यदि ऐसे कोई ग्रह न हों और शुभ राशि या अंश में

हो तो राज चिह्न सूचक जैप्ते मुकुट छत्र चौरी आदि से परिपूर्ण हो ( फछ० )।

१२--जन्म में केन्द्रवर्ती ग्रह नीच राशि में हो, उस राशि का स्वामी जो ग्रह है

यदि उसका उच्च राशि का स्वामी केन्द्र में हो तो राज कुल का उत्पन्न राजा होता

है ( जा० भ० ) ।

१३--नीच ग्रह जिस घर में हो उस राशि का स्वामी या ग्रह जो उसी स्थान में

उच्च का हो यदि चन्द्र से केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग होता है । वह रानी

और राजा का आदरपात्र होता है ( स० चिं० ) ।

१४--नीच गत का अंश स्वामी ग्रह केन्द्र त्रिकोण में होवे लग्न में चर राशि हो

लग्नेश चर राशि या चरांशक में हो तो राजा हो ( स० चिं० ) ।

१५--६.८,१२ भाव के स्वामी भी नीच में होकर छग्न को देखते हों तो राज￾योग होता है ( वृ० पा० ) । १६--३,६,८,११ भाव में नीच का ग्रह हो लग्न को देखता हो तो राजयोग होता है ( वृ पा० ) ।

१७--जब २, ३ या ४ ग्रह नीच में होकर शुभ षष्ठ्यंश में हों और सूर्य उच्च नवांश में हो तो राजा के बराबर हो ( स० चिं० ) ।

१८--एक भी शुभ ग्रह केन्द्र में उच्च का होकर बैठा हो जिस पर बलवान्‌ सूर्य

की दृष्टि हो और पंचम भाव में गुरु हो तो वह मनुष्यों का नायक हो (जा० भ०) । अन्यमत--उच्च का एक भी शुभ ग्रह तथा केन्द्रमै बली सूयं पर पंचम स्वामी

` गुदकी दृष्टि हो तो नायक हो ।

१९--शुभ ग्रह उच्च के केन्द्र में हों तो राज लक्ष्मी का स्वामी, यदि पाप ग्रह

उचव के केन्द्र में हों तो क्यो के घर में राजा हो ( ल० च॑० ) ।

२०--२-३ ग्रह उच्च में हों चंद्र कक राशि का हो और छून पूर्ण बली हो तो

सवंत्र पूज्य राजा हो ( जा० पारि० ) ।

राजयोग : १५५

२१--मूछ त्रिकोण या मित्र राशि में या वक्री ग्रह किसी भाव में शेष ग्रह उच्च

राशि में हों परन्तु नीचांशक में न हों तो राजा के तुल्य हो ( स० चिं० ) |

२२--उच्च या मूल त्रिकोण के ३-४ ग्रह बलवान्‌ हों तो राजवंशी राजा हो

ठ 21301 हो। ग्रह यदि बलहीन हों तो राजा नहीं होता धनवान्‌ होता है

(वृ जा० ||

२३--तीन या अधिक ग्रह उच्च या स्वगृही हों तो प्रसिद्ध राजा हो (फल०) ।

२४--४ या ५ ग्रह स्वोच्च यां मूल त्रिकोण में हों तो हीन कुल का भी राजा

हो ( वृ० पा० )।

२५--५ या अधिक ग्रह उच्च या मूल त्रिकोण में हों तो अन्य वंशी भी राजा

हो परन्तु ग्रह बलहीन हों तो राजा के तुल्य हो ( वृ० जा० ) ।

८ २६--५ या अधिक ग्रह उच्च के या स्वगृही केन्द्र में हों तो चक्रवर्ती राजा हो

बु० पा० ) ।

२७--तीन या अधिक ग्रह उच्च स्वगृही या मूल त्रिकोण में हों तो राजवंशी

राजा हो अन्य राज कारवार में श्रेष्ठ अधिकारी हो ( प्रो० मो० ) ।

२८--नवम भाव में सब शुभ या अशुभ ग्रह उच्च में हों ओर शुभग्रह से दृष्ठ

हों तो शत्रु को जीतने वाला सुन्दर कांति वाला राजा हो ( जा० सं० ) ।

२९--वृष लग्न हो उच्च स्वगृही या मूल त्रिकोण में हो परन्तु नीय नवांश में

न हो तो राजा हो ( स० चिं० )।

३०--उच्छ या स्वक्षेत्री ३-४ ग्रह केन्द्र में हों अस्त न हों और कोई दुर्योग न

हो तो राज कुल में उत्पन्न मनुष्य राजा हो ( फल०)।

३१--३ या अधिक ग्रह स्वक्षेत्री या मूल त्रिकोण में हों तो राजवंश में उत्पन्न

राजा हो ( जैमिनी ) ।

३२--२३ ग्रह स्वगुही हों तो मंत्री हो ( मा० ) ।

३३--सभी ग्रह स्वक्षेत्री हों तो राजा के तुल्य हो ( स० चिं० ) ।

३४--वृष लग्न में चन्द्र हो और ७ ग्रह स्वगृही हों तो राजा के बराबर हो

{ स० चिं० ) । ८

३४--उच्च के ग्रह राजयोग करते हैं परन्तु वे नीचांशक क्रूर आदि षष्ठ्यंश में

न हों। उच्च के ग्रह पाप नवांश और पाप षष्ठ्यंश में हों तो राजशक्ति को नष्ट

कर नीचा करते हैं. साधारण फल देते हैं। इसी से राशि की अपेक्षा अंश अधिक

बलवान्‌ हे । इसी से बलवान्‌ ग्रह शुम षष्ठयंश में अधिक राजयोग करते हैं।

३४--ज्योतिष चक्र के पूर्वाढ में उच्च के एवं बलवान्‌ ग्रह हों तो जीवन के पूर्व

भाग में राजा के समान शक्ति और धन देते हैं। यदि पश्‍चिमादध में हों तो जीवन के

अन्तिम भाग में शक्ति और सफलता देते हैं। यदि दोनों भाग में हों तो जीवन भर

शक्ति और उन्नति देते हैं । खसन से ७ भाव तक पूर्वार्द पश्चात्‌ शेष पश्चिमार्द है या जीवन को ३ भाग में

३५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बाँटो तो जिस खंड में अधिक उच्च के बलवान्‌ ग्रह या शुभ ग्रह हों वहाँ शक्ति और

सफलता मिले पाप ग्रह एवं बलहीन ग्रहों से दुःख शोक हानि मिले ।

(१) खंड--१२,१,२, रे भाव, (२) खंड-४,५,६,७ भाव, (३) खंड-८,९,१०,११

भाव समझना । न

३७---लरन या अन्य भाव से क्रम से ही जिसके सब ग्रह हों इध एकावली योग

में महाराजा होता है ( ० चं० )।

३८--लग्न से २,३,४,५,६ और १० इन्हीं घरों में सब ग्रह हों तो छोटे कुल का

भी राजा हो ( मान० ) ।

३९--दशम भाव से तीसरे भाव तक सब शुभ ग्रह हों तो राजा के समान हो

(स० चि० ) ।

४०--१२,११,१,२,३,१० इन भावों में शुभ ग्रह हों तो राजा के समान हो

( जा० पारि० ) ।

४१--५,६,८, ९,१२ स्थान में शुभ और ग्रह हों तो वह राजाओं में पूज्य हो पर: दुष्ट हो ( छ० चं० ) । ४२--५,६,९,१२ घर में शुभ और पाप ग्रह हों तो राज मान्य, शत्रु का नाशक

हो परन्तु साथ में झगड़े भी बहुत लगे रहें ( मान० ) ।

४३--१,५,६,७,११ राशि में सब ग्रह हों तो राजा हो ( जा० पारि० ) ।

४४---१,२,७,१२ राशियों में सब ग्रह हों तो भूमण्डल का स्वामी हो (जा.पारि.)

४५--२,३,५,६,९,११,१२ राशि में सब ग्रह हों तो सेना हाथी युक्त राजा हो

( जार पारि० ) ।

४६--१,२,३,१०,११,१२ राशियों में सब ग्रह हों तो हाथी आदि से युक्त विख्यात

राजा हो ( मान० )। *

४७--२,९,१२ राशि में सब ग्रह केन्द्र में हों तो राजा हो ( जा० पारि० )।

४८--१,२,३,४,५,७,९ भाव में सब ग्रह हों इन प्रत्येक भाव में ग्रह हो तो

घामिक हो ( जा० पारि० ) ।

४९--१,२,४,५,७,९,१०,१९ थर में गुरु शुक्र स्वगृही या उच्च में हों तो धन युक्त राज्यमान्य हो ( जैमिनि ) ।

५०--चन्द्र से ३,६,१०,११ घर में सब ग्रह हों तो धन वाहन युक्त राज्यमाभ्य हो ( जा० भ० ) ।

५१--छग्न या चन्द्र वर्गोत्तम हो, चन्द्र को छोड़कर ४,७.१० स्थान में सब ग्रह

हों तो राजा हो ( जा० पारि० ) । 4

५२--१,३,५,९ भाव में कहीं भी ४ ग्रह एकत्र हों यदि वह दासी पुत्र भी हो तो

भी राजा के समान हो ( मान० ) ।

५३--१,२,३,५,९,११ भाव में कहीं पाप या शुभ ४ ग्रह हों तो राजयोग हो ( जैमिनि० ) ।

राजयोग : ३५७

५४--३,४,५ भाव में सब ग्रह हों तो बहुत घन हो और देश का स्वामी हो

{ जा० पारि० ) ।

५५--४,५,९ भाव में सब ग्रह हों उसके पहिले हुए बाळक मर जायें पीछे के

जिये, दूसरी स्त्री से युक्त हो और जातक विख्यात दानी दीर्घायु राजा हो ( मान. ) ।

५६--२,६,८,१२ भाव में सब ग्रह हों तो सिंहासन प्राप्त हो (लू. चं, )।

५७--१,५,७,९ भाव में सब ग्रह हों यह हंस योग है अपने वंश का पालन कर्ता

हो ( ल. चं.)॥।

भ्ू८ध--राशि चक्र में ६ घर ग्रह रहित हों तो वह राजा हो या राजा के समान

हो अंत में स्वर्ग जाता है ।

केन्द्र त्रिकोण आदि के योग

५९--एक भी ग्रह जो अस्तंगत न हो स्वराशि या मित्र राशि में हो षडवगं

शुद्धि हो और केन्द्र त्रिकोण में हो तो चक्रवर्ती राजा हो ( शंभु ) ।

६०--पूर्वोक्त रीति से २ ग्रह षड वर्ग में शुद्धि होकर बैठ हों तो उस राजा का

आधिपत्य द्वीपान्तरों में पृथ्वी तक होता है ( जा. भ. ) शंभु ।

६१--३ ग्रह उच्च और मूल त्रिकोण के अधिकार से हीन होकर षड़वर्ग में शुद्ध

होकर बैठे हों तो वह राजा का मंत्री हो ( जा. भ. ) ।

६२--पूर्वोक्त रीति से ४ ग्रह हों तो राजा होता है ( जा. भ. ) 1

६३--यदि ५, ६ ग्रह षड़वर्ग में शुद्ध बैठे हों वह सावंभोम राजा हो (जा. भ.)

६४-न्रिकोण लक्ष्मी का स्थान है, केन्द्र विष्णु का स्थान है इन दोनों स्वामियों के

सम्बन्ध होने से चक्रवर्ती राजा हो ( म० परा० ) ।

६५-चारों केन्द्र में शुभ ग्रह हों और पाप ग्रह ६ या १२ भाव में हो तो संसार

अ विख्यात ध्वजा और छत्र से शोभित राजा होता है ( छ० चं० ) ।

६६-केन्द्र गत ग्रह पाप राशियों में होवे या सोम्य, राशियों में पाप ग्रह होवे तो

-वह शबर और चोरों का राजा होता है और धनवान्‌ होता है ( वृ० जा० ) ।

६७-शुभ ग्रह सम्बन्धी राशि वलवान्‌ होकर केन्द्र में हो और पाप ग्रह पाप

राशियों में हो तो भी उपरोक्त फल हो ( जा० सं० ) 1

६८-जिसका एक भी ग्रहं पंचम नवांश में हो वह भी राजा होता है (जा०भ०)।

६९-जन्म में कोई एक ग्रह पंचवर्गी शुद्ध हो तो राजा हो (शंभु०) ।

७०-सब शुभ ग्रह॒ केन्द्र त्रिकोण में हों पाप ग्रह ३, ६, ११ में हों तो राजा हो

{( बु० पा० )। ७१ ४254 भी पूर्ण बली ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हो तो दीर्घायु निरोग हो सब दोष

'दूर हों ( मान० ) ।. |

७२-सब शुभ ग्रह शुभ क्षेत्र में होकर केन्द्र में हों तो सदा शुभ कर्म करने वाल ।

हो ( मान० ) । ७३-शुस ग्रह की राशि में बलिष्ठ ग्रह केन्द्र में हों इसी प्रकार पाप ग्रह की राशि

३५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

के पाप ग्रह बलवान्‌ हों तो वह फौज का स्वामी, पुलिस कप्तान या जेल का ओहदे-

दार या चोर आदि का स्वामी होकर बड़ी सम्पत्ति वाळा हो ( प्रा० यो० )।

७४-उदय को प्राप्त स्वोच्च का ग्रह केन्द्र में हो तो राजा के समान प्रतापी हो

( जा० लं० ) ।

५37० में शुभ ग्रह और अष्टम में पाप ग्रह हो तो सवं सिद्धि प्राप्त हो राजाओं

में मान हो (जा० ळ॑० ) 1

७६-केन्द्र या त्रिकोण के स्वामियों का योग एक ही भाव में हो तो राजयोग

होता है । या वे परस्पर एक दुसरे से सम्बन्ध स्थापित करते हों या वे परस्पर स्थान

में हों तो राजयोग होता है परन्तु ३,११ या ६,८,१२ भाव के भावेश से इनका

सम्बन्ध न हो । यदि इनके भावेश केन्द्र में हों तो हानि नहीं है (ज्यो० रह०)।

७७-चारों केन्द्र में शुभ और पाप ग्रह दोनों हों तो राज्य और धन देते हैं

(ल० चं०) । र

गुरु ;

७८-उच्च का गुरु हो मेष लग्न में बुध हो तो राजा हो ( जा० पारि० ) ।

७९-उच्च का गुरु, केन्द्र में हो, दशम में शुक्र हो तो चक्रवर्ती राजा हो जिसका

सिक्का चले (शंभु०) ॥

८०-उच्चराशि में या स्वगृही गुरु शुक्र केन्द्र या त्रिकोण में हों तो राज कुछ:

का राजा हो अन्य कुल में उत्पन्न मंत्री हो (जा०भ०) ।

८१-गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र में से एक भी उच्च का हो पर द्वितीय भाव में हो

तो राजयोग होता है (वृ० जा०) ।

८२-उच्च का गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो चन्द्र बुध शुक्र इनसे युक्त या दृष्ट हो

तो शत्रु को जीतने वाला चक्रवर्ती राजा हो (जा० सं०) ।

८३-उच्च का गुरु लग्न में हो, मेष को सूर्य हो और शनि बुध शुक्र ग्यारहवेँ

भाव में हों तो वह बलवान्‌ राजा होता है (जा० भ०) ।

घ४-उच्च का गुरु शुक्र सूर्यं हो चन्द्र भी उच्च राशि गत शनि से दुष्ट हो तो

राजा हो (जा० भ०) ।

८५-गुरु शुक्र या बुध इनमें एक भी उच्च में हो और अन्य शुभ ग्रह केन्द्र में हों

तो निश्चय राजा हो (बु० पा०) ।

८६-नीच का गुरु लग्न या अष्टम में हो और नवमेश पारावतांश में हो तो राजाओं का राजा कुवेर सम होवे (स० चि०) ।

८७-छरन में नीच का गुरु हो अष्टम भाव पाप ग्रह युक्त हो और उस अष्टम भाव के नवांश से युक्त हो तो राजाधिराज हो जंसे.मकर लग्न में तृतीय नवांश में गुरु हो, अष्टम भाव में तृतीय नवांश गत सूर्य हो तो वह राजयोग होगा (जा.पारि.)। : ८८-गुरु नीचांश में न हो, चन्द्रमा उत्तरांश में हो, सूर्यं शुभ षष्ठ्धंश मे हो तो , राजा के तुल्य हो (स० चि०)।