भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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विश्वनाथ की कुण्डली में योग देखकर लिख दिया था कि विकलांग होगा उसे लकवा मार

गया जिससे Ser हो गया । यह पदपुर के धनीराम लोधी के लड़के की कुण्डली में

लिख दिया था विकलांग होगा । वह लेंगड़ा हो गया । मंगली प्रसाद मास्टर के छड्के

जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास को कुण्डली में लिख दिया था संतान नहीं होगी संतान नहीं

हुई । और भी कइयों को जैसा रिख दिया वैसा हुआ । नरसिंहपुर संस्कृत पाठशाळा के

प्रधान अध्यापक पं० श्री नमंदाप्रसाद शास्त्री से श्रीत्र्यम्बक राय: वैद्य: वकील ने अपने घर

से गुमी हुई सोने की साँकल के सम्बन्ध में विचारने का प्रश्न पूछा । शास्त्रीजी ने बताया

कि घर के पश्चिम में जो दार है, उसको सोढ़ी के किनारे पड़ो मिलेगी । वहाँ देखा

तो नहीं मिली ! दुबारा फिर पूउने पर बताया वहाँ रेता मट्टी आदि हटाकर खोजो ।

वैसा क रने से रेत में दबी हुई मिल गई । नरसिंहपुर के श्री चन्द्रभान सर्राफ के यहाँ

बहुत बड़ी चोरी हो गई थी । पंडित जो ने प्रश्‍न कुण्डली पर से विचार कर बताया कि

लगभग ५ मील पदिचम में नदी के किनारे माल गड़ा है ओर ३६ दिन. के भीतर माल

मिल जायगा चोर पकड़ जायगा। लगभग ३०वें दिन पश्चिम में दारुरेवा नदी के

किनारे चोर पकड़ा गया और वहाँ माल गा हुआ मिल गया । चोर लोग मीना जाति

के राजपुताने के रहने वाले थे । '

ऐसी अनेक घटनायें हैं यदि ऐसी घटनाओं का संग्रह किया जाय तो एक बड़ा

पोथा बन जायगा । ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण देखकर ही लोग ज्योतिष विद्या का मान करते

हैं और उसकी ओर आकर्षित होते हैं। इन सर्व बातों से विश्‍वास कर लेना चाहिये

कि भविष्य फल अवश्य जाना जा सकता है। इसके विषय में शंका करना व्यर्थ दै ।

पाठक स्वतः जब अनेक कुंडलियों का अध्ययन करेंगे तो उनके प्रत्यक्ष फल देखकर इसमें

विश्वास अवश्य बढ़ेगा और ज्यो तिष शास्त्र के अध्ययन में आनन्द आयेगा और रुचि

बढ़ेगी । ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक रूप से अध्ययन की अत्यन्त आवद्यकता है। |

अध्ययन के निमित्त यहाँ एक प्रकार के विषय के योगों को एकत्र कर दिया है

जिससे वैसे मनुष्यों की कुण्डलियों में उन योगो के अध्ययन में सहायता मिले । विषय￾वार फल देने से कहीं-कहीं विषय बदलने से उस फल की पुनरावृत्ति हो गईहै।

ज्योषित शास्त्र में भी अनेक मतांतर हैं. कहीं उन मतांतरों को भी अध्ययन के

निमित्त दे गया दिया है । जिसका अध्ययन कर पाठक लाभ उठायेंगे । ज्योतिष के

योगो में कई ऐसे योग दिये हैं जो आजकल होना असम्भव है परन्तु अध्ययन हिताथं

उन्हें भी दे दिया है 1

इस पुस्तक के लिखने में या कापी करने में या छापने में अशुद्धियाँ हो जाना

सम्भव है । प्राथना है कि कोई अशुद्धियाँ या भूल जो दृष्टिगोचर हो कृपा कर सुधार

कर लेखक को सूचित करने का कष्ट करेंगे तो मैं बड़ा अनुगृहीत होऊँगा । मूल हो जाना

मानवीय है, पाठक इसके लिए क्षमा करेंगे । ज्योतिष शास्त्र $ फलित ज्ञान का विस्तार

करने के निमित्त यह पुस्तक लिखी गई है 1 जिससे फलित के अध्ययन करने में सहायता

( <)

«मिलेगी 1 इसके पहिले इस ग्रंथ का ज्ञान एवं गणित खंड. अवश्य अध्ययन कर लेना

चाहिये जिससे फळित खंड के समझने में सुगमता ' प्राप्त होगी । इस प्रकार इसके

अध्ययन द्वारा अपने ज्ञान. को विस्तीणं कर पाठकगण अपना अनुभव बढ़ाने के लिए

ज्योतिष शास्त्र रूपी सागर के पार जाने एवं कथन करने के लिये इसे नोका के रूप में

सहायक पायेंगे । र

ज्योतिष के ग्रन्य अधिकतर संस्कृत में होने से उनके अध्ययन में: कठिनाई होती है

.इस कारण सुगम बोध के विचार से यह राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखा गया है । इसके

अध्ययन से पाठको का प्रेम एवं झुकाव इस विद्या की ओर बढा तो मैं अपना उद्देश्य

सफल समझूंगा ।

भवदीय

विजयादशमी _ : बी० एल० ठाकुर

सं० २०१८ ` : ज्योतिषाचायं

दिनांक १९-१०-६१ सिंह-सदन

पो० नरसिंहपुर (म० प्र०)

विषय-सूची

अध्याय विषय

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. राशि एवं नक्षत्र गुणघमं

. भाव और उनके गुण-घम

« ग्रह उनके नाम और गुण-धमं

. मैत्री, दृष्टि आदि

ग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्र-क्रिया

ग्रह कारक

. गुलिक आदि विचार

ग्रहों का रदिम फल विचार

. फल का स्थूल विचार

. निषेक अध्याय

« युगसंवत्सरादि फलाध्याय

. कालांग विचार

. भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहों का फल

. द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल

. भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल

  • फलित में ग्रहों के फल का विचार

. भावेश का भिन्न-भिन्न भावो में फल

Page 12 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 12)

संकेत-सूची

यह फलित खंड अंग्रेजी, मराठी, हिन्दी और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों के अध्ययन

मान० = मानसागरी पद्धति

मध्य प० = मध्य पराशरी

सर्व चि० = सर्वाथे चितामणि

gá सं० = सर्वं संग्रह

शंमु० = शंमुहोरा प्रकाश

ज्यो० शा० = ज्योतिष शास्त्र

ज्यो० रत्ना० =ज्योतिष रत्नाकर

ज्यो० २० = ज्योतिष रहस्य

ज्यो० पा० = ज्योतिष पाठमाला

जैसिनी० = जैमिनी सुत्र

जा० सं० = जातक संग्रह

के पश्चात्‌ लिखा गया है 1 इसमें कुछ ग्रंथों का प्रमाण देकर उनमें नाम दिये हैं वे इस

प्रकार संकेत अक्षरों में है--

जा० भ० = जातका भरण

जा० So = जातकालंकार

श्री० qo =श्रीषर पद्धति

शीघ्र०5 शीघ्र बोघ

प्रा० यो० = प्रारब्ध योग

फल० = फल दीपिका

नील० = नोलकठी

go चं० = लग्नचंद्रिका

वृ० जा० = वृहज्जातक

qo पा० = वृहत्पाराशरी

जा० पारि० = जातक पारिजात

Page 14 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 14)

संकेत-सूची

यह फलित खंड अंग्रेजी, मराठी, हिन्दी और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों के अध्ययन

मान० = मानसागरी पद्धति

मध्य To = भच्य पराशरी

सर्व चि० = सर्वाथे चितामणि

सर्वे सं० = सवं संग्रह

शंभु० = शंभुहोरा प्रकाश

ज्यो० शा० = ज्योतिष शास्त्र

ज्यो० रत्ना० =ज्योतिष रत्नाकर

ज्यो० २० = ज्योतिष रहस्य

ज्यो० पा० = ज्योतिष पाठमाला

जैमिनी ० = जैमिनी सूत्र

जा० सं० = जातक संग्रह

के पश्चात्‌ लिखा गया है 1 इसमें कुछ ग्रंथों का प्रमाण देकर उनमें नाम दिये हैं वे इस

प्रकार संकेत अक्षरों में है--

जा० भ० = जातका भरण

जा० So = जातकालंकार

श्री qo «श्रीधर पद्धति

शीध्र०ञ्म्शीघ्र बोघ

प्राण यो० = प्रारब्ध योग

फल० = फल दीपिका

नील० = नीलकंठी

ल० चं० = लग्नचंद्रिका

वृ० जा० ७ वृहुज्जातक

qo पा० = वृहुत्पारादरी

जा० पारि० = जातक पारिजात

Page 16 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 16)

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श्री गणेशाय नमः

ज्योतिष-शिक्षा

तृतोय ( फलित } खण्ड

ध्याये पाये शक्ति जिन, पूवं ज्योतिषाचार॥

शिव शंकर सुमरन किये; कीना फलित विचार॥ १॥

उन्हीं भोलानाथ का, भजू गणप सह गौर ।।

सुमति शक्ति सामथं दो, होहु सहायक आर ॥ २॥

प्रबल तकंना-शक्ति दो, बढ़े त्रिकालिक : ज्ञान ॥

अनुभव और विचार से, बुद्धि होय बलवान॥ ३॥

दिव्य-दुष्टि दीजे प्रभू, धरूं तुम्हारा ध्यान॥

फित कथन प्रत्यक्ष हो, कुरा करो भगवान॥ ४॥

अध्याय १

राशि एवं नक्षत्र गुणघर्से

इस फित खण्ड का अध्ययन करने से पूवं इसका प्रथम ज्ञान खंड, एवं द्वितीय

गणित खंड अध्ययन कर लेना आवश्यक है जिसके पश्चात्‌ इस तृतीय फरित खंड के _

अध्ययन में सुगमता प्रतीत होगी ।

फलित ज्योतिष अध्ययन करने के लिये प्रारम्भ में जो बातें जानने योग्य हैं

यहाँ पहिले ही दे दी गई हैं और स्थूल रूप से फल का संक्षिप्त विचार भी पहले दै

दिया गया है ।

पृथक्‌-पृथक्‌ प्रसंग आने पर विषयों को समझाने के लिए कई स्थानों में पुनरा- र

वृत्ति भी हो गई है और कहीं-कहीं भिन्नता ( मतभेद ) भी जान पड़ेगी, परन्तु ये सब, . ह

बातें अध्ययन कर लेने पर आगे फल विचारने में बहुत सहायक होंगी। किसी-किसो —

प्रसंग में अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का फल बताया है, इस पर अच्छी परिस्थिति,मे |

अच्छा फळ, बुरी परिस्थिति में बुरा फल ग्रहण करना । >

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२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

सारांश यह है कि यहाँ बताये विषय आगे बताये जाने वाले विषयों के फल-निर्णय

में सहायक होंगे । इनसे उनका अच्छी प्रकार से विचार कर उपयोग करना ।

राशि के भिन्न-भिन्न नाम-क्षेत्र, गृह, वृक्ष, म, राशि

१ चेष-अज, वस्त, प्रथम, क्रिय, विदव, तुंबुर, आद्य ।

३ बृष-उद्षा, गो, ताबुरि, शुक्रम, गोकुल ।

३ सिथुन-बोध,नृयुग्म, जितुम, तृतीय, इन्द्र, यम, युग ।

४ फर्क-चान्द्र, कुलीर, चतुर्थ, कर्काटक, कर्कट

ष्‌ [सिह-कंठीरव, लेय, मुगेन्द्र 1

६ कत्या-पाथोन, षष्ठी, अबला, तन्वी, रमणी, तरुणी ।

७ तुला-जूक, वणिक, वोलि, सप्तम, घट ।

द बुश्चिक-कोप्यं, कौज, अलि, अष्टम, कीट ।

९ घनु-जैव, घनु, तौदिक, चाप, घन्वी, शरासन ।

१० मकर-आकेकर, चक्र, दशम, मृग, मृगास्य, नक्र ।

११ कुम्भ-ह॒द्गोग, घटे, तोयघर ।

) १२ मोन-रिष्फ, झष, अंतिम, अन्त्य, मत्स्य, पृथुरोम ।

राशियों का आकार

१ मेष-मेढ़ा ।

२ बुष-सांड ।

३ मिथुन-चोणा लिए स्त्री और गदा लिए पुरुष एक-दुसरे को हृदय छगाए ।

४ क्के-केकडा । ५ सिह-सिंह | .

६ कन्या-जल में तैरतो नाव पर बैठी कुमारो हाथ में घान और प्रकाश लिए

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हुए।

७ तुला-तुला लिए हुए मागं में बैठा पुरुष ।

द वृश्यिक-बिच्छू ।

९ घन-सामने की ओर घनुष-बाण लिए योद्धा, पीछे का भाग घोड़े का ।

१० मकर-पगर का शरोर, हिरन का मुख ।

११ कुष्म-पानो का घडा सिर पर लिए मनुष्य 1

१२ मोन-दो मछलियाँ प्रत्येक की पूंछ दूसरे के मुख में ।

राशि एवं नक्षत्र-गुणधमं : ३

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. ४: ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

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६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

राशियों का स्वभाव

१ श्रेष साहसी, अभिमानी, मित्रों पर कृपा रखने वाला । यह पहले नवांश में अपने

स्वभाव को विशेष रूप से प्रकट करता है 1 यह पाटल देश का स्वामी है ।

३ युष-स्वार्थी, समझ-वूझ कर काम करने वाला, परिश्रमी; सांसारिक कार्यों में दक्ष,

पंचम नवां में यह स्वभाव पूर्ण रूप से प्रगट होता है । कर्नाटक ( मैसूर)

आदि देशों का स्वामी ë ।

३ मिथुन-विद्याष्ययनी, शिल्पी, पंचम नवांश में पुर्ण प्रभाव प्रकट हो । यह चेरा

देश का स्वामी है ।

४ कर्को सांसारिक उन्नति में प्रवृत्ति, लज्जावान, कार्य करने में स्थिरता, समय

अनुयायी का सूचक है 1 पहले नवांश में पूर्ण प्रभाव हो। चोल देश का स्वामी ।

५ सिह-मेष के समान स्वभाव, परन्तु स्वतंत्रता प्रेमी और उदार चित्त । पंचम

नवांश में पूरा प्रभाव । पांड्य देश, त्रिचनापल्ली, मदुरा, तंजौर, विजगा-

पट्टम आदि का स्वामी । d

६ 'कन्या-मिथुन का-सा स्वभाव, परन्तु अपनी उन्नति और मान पर पुर्ण ध्यान,

नंबम नवांद में पूर्ण प्रभाव, केरल, (त्रावनकोर) देश का स्वामी ।

७ तुला-विचारशील, ज्ञानप्रिय, कार्यसम्पन्न और राजनीतिज्ञ । पहळे नवांश में पूर्ण

प्रभाव । कोल्लास देश का स्वामी ।

६ वृश्चिफ-दंभी, हठी, दृढ्-प्रतिज्ञ, स्पष्टवादी, निर्मल चित्त । पंचम नवांश में-पुरा

प्रभाव । मलय देश (त्रिचनापल्ली और कोयंबटूर) का स्वामी ।

९ घन-अघिकार-प्रिय, करुणामय, मर्यादा का इच्छुक । नवम नवांश में पूरा प्रभाव ।

सेंघव (सिंघ) देश का स्वामी ।

१० मकर-उच्च पदाभिलाषी । प्रथ तवांश में पूरा प्रभाव | पंचाल देश (उत्तर

प्रदेश का मध्य भाग) का स्वामी ।

११ कुम्भ-विचारशोल, शांत चित्त से नई बात पैदा करने वाला, घर्मारूढ़, पंचम

नवांश में पूर्ण प्रभाव । यवनदेश (कश्मीर से काबुल तक) का स्वामी 1

१२ मोन-स्वभाव उत्तम, दानी, कोमल चित्त । नवम नवांश में पुर्ण प्रभाव । कौशल

  • देश (संयुक्त प्रान्त का पुर्व भाग जिसकी राजधानी अयोध्या थी) का स्वामी ।

द्रव्य आदि के ज्ञान में राशियों का अंश

राशि-मेष वृष मिथुन ककं सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुंभ मीन

अंश-१० २४ २८ ३२ ३६ ४० ४० ३६ ३२ २८ २४ २० ये केवल नष्टादि द्रव्य चिता, द्रव्य परिज्ञान, पुरुष अवयव ज्ञान आदि के किये . हैं॥ इसे पूर्वाद्धे के ५-६-७-८-९-१० को ५४० पल = २००-२४०-२८०-३२०-३६०

“४०० पल लेना

राशि एवं नक्षत्र-गुणघर्म : ७

राशि मेष वृष मिथुन कर्के सिंह कन्या

१२ मीन कुम्भ मकर घन वृश्चिक तुला

पल २०० २४० २८० ३२० ३६० ¥oo

उपयोग :--राशि की छुटाई-बड़ाई के अनुसार शरीर के अंग की छुटाई बड़ाई

कालांग संबंध से अनुमान करना ।

चंद्र की राशि के अंशानुसार शुभाशुभ विचार

राझि-मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक घन मकर कुम्भ मीन

शुभ अंश-२१ १४ १८ ८ १९ ९ २४ ११ २३ १४ {९ ९

अशुभमंद्-८ २५ २२ २२ २१ १ ४ २३ १८ २० २० १०

चंद्र के अंश मुहूतं और जन्मकाल में जो अशुभ बताये हैं वे मरण तुल्य सूचक हुँ ! वे मुहुर्त पुष्कर नाम के हुँ जो जन्म ओर मुहूर्त में शुभसूचक हैं जैसे जन्म चन्द्र

मेष के ८वें अंश पर हो उसका ¿í वर्ष मरण या अरिष्ट विचारना । इसी प्रकार

दूसरी राशियों का भी विचारना ।

किसी राझि से ४-८-१२ की राशि अशुद्ध अर्थात्‌ खराब होती है । जैसे :--

इन राशि वालों को ये राशियाँ अशुद्ध हैं इन अशुम स्थानों में चन्द्र हो

१-५-९ ४-८- १२ तो उक्त राशि वालों को शुभ

२- ६- १० ५-९- १ कार्य करना वर्जित है। अर्थात्‌

३-० ७- ११ ६-१०- २ वह समय खराब समझना ।

४- ८- १२ ७-१ १- ३

शून्य राशि ( इन महीनों में ये राशियाँ हों तो अशुभ हैं )

राशि--कुम्भ, मीन, वृष, मिथुन, मेष कन्या

मास--चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भाद्रपद

राशि-वृश्चिक, तुला, घन, कर्क, मकर, सिंह

मास--आदिवन, कातिक मागे पौष माघ. फाल्गुन

शून्य लग्न ( इन तिथियों में ये लग्न अशुभ हैं )

तिथि--प्रतिपदा तृतीया पंचमी सप्तमी नवमी एकादशी त्रयोदशी

लग्न--'७-१० ५-१० ३-६ ४-९ ४-५ ९-१२ २-१२

तारक-मारक राशि

(१) मेष, सिंह, घन-ये परस्पर सहायक राशि हैं। इन राशियों में यदि बलवान्‌

ग्रह हो तो मनुष्य सत्ताघारी होता है । ये महत्त्वदर्शक, उत्कर्षदायक, उच्च-नीच

स्थिति निर्माण करने वाळी हैं 1

( २) वृष, कन्या, मकर-ये सामान्य राशि ë । इस राशियों वाळे स्वार्थी होते हैं । इस

राशि वाळे से उच्च कोटि के सार्वजनिक कार्य होना बहुघा असम्भव है ।

८: ज्योतिष-शिक्षा, तृयोय फलित खण्ड

(३) मिथुन, तुला, कुम्म-ये राशि बौद्धिक हैं। ये राशियाँ प्रगति की दृष्टि से

सामान्यतः स्थिर हैं परन्तु चिकित्सक एवं वाद-विवाद करने की दृष्टि से

उत्तम हैं ।

(४) कर्क, वृश्‍चिक, मोन-इन राशियों वाले सार्वजनिक आंदोलन में भाग छेने वाले,

समाज पर प्रभाव रखने वाले, नेता, मागंदर्शंक, सलाहकार, चतुर मनुष्यों

की अनुकूलता प्राप्त करने वाले, स्वतन्त्र वृत्ति वाले एवं मार्मिक ग्रन्थकर्ता

होते हैं ।

इन राशियों में चन्द्र स्थित हो और अन्य ग्रहों की युति या दृष्टि न हो तभी इनका

फल मिलना सम्भव है । अन्यथा कुछ अन्तर पड़ जाता ë!

अभिजित्‌ संज्ञक राशि-सूयं जिसमें हो उससे चौथी राशि अभिजित्‌ संज्ञक ë

हार राशि-जिस राशि को दशा वर्तमान हो वह द्वार राशि है 1

बाह्य भोग्य-प्रथम दशापति राशि से द्वार राशि जितनी संख्या पर वर्तमान हो द्वार से

उतनी संख्या गिनने पर जो राशि मिले वह बाह्य राशि है। बाह्य को भोग्य

राशि भी कहते हैं ।

जन्‍्मराशि-जन्म समय चन्द्र जिस राशि पर हो वह जन्म राशि कहलाती है ।

बक्काद्ध-१२ राशि का एक चक्र होता Š । इसके २ भाग पुर्वाद्ध और पराद्ध हैं ।

पूर्घाघं-मेष से कन्या तक उत्तरार्घ तुछा से मीन तक ।

विलोम-'गणना से-७ से १२- पूर्वार्ध, १ से ६-उत्तराघं ।

भसंघि-ऋक्ष संधि-वृश्चिक, मीन, ककं ।

राशि प्रभाव से रोग एवं विशेष परिस्थिति से मृत्यु

( १ ) बेष-उष्णता, जठराग्नि या पित्त ज्वर से मृत्यु ।

(२) वृष-त्रिदोष से, अग्नि या शस्त्र से 1

( ३ ) मिथुन-जुकाम, श्वास, शूल से ।

( ४ ) कर्क- पागलपन, वातरोग, अरुचि से ।

(५ ) खिह-जंगली पशु, ज्वर, व्रण या शत्रु से 1

( ६) कन्या-स्त्रियों द्वारा, वीर्य संबंधी रोग से, ऊँचे से पतन से ।

(७ ) तुला-सन्निपात, मस्तिष्क ज्वर से ।

( ८) वृश्चिक-पांडु रोग, संग्रहणी, तापतिल्ली के रोग से ।

( ९ ) घनु-वृक्ष, जळ, काष्ठ या शस्त्र से ।

(१०) मकर-पेटदर्द, मंदारिन, भ्रम से ।

(११) कुम्भ-कफ, ज्वर और क्षय से ।

(१२) भोन-जल में इब कर या कोई जल के रोग से ( जैसे जलोदर ) ।

लग्न से अष्टम गिनने पर जो राशि वहाँ हो उसके बुरे प्रभाव से उपरोक्त प्रकार से

मृत्यु हो या अष्टमेश के नवांश की राशि के बुरे प्रभाव से उपरोक्त फल हो ।

राशि एवं नक्षत्र-गुणघम : ९

नवांश के अनुसार सम-विषम विचार से राशि की धातु-जीव संज्ञा

'विबम राजि में-प्रथम नवांश से आरम्भ कर घातु मूल जीव क्रम से ३ आवृत्ति, सस राशिञे- ,, , ,, जीव मूल घातु इस क्रम से ३ आवृत्ति से

वर्तमान नवांश तक गिनना 1

चिषम राशि-क्रर और पुरुष राशि है-इसमें जन्मा-तेजस्वी होता है ।

ससर रावि-सौम्य और स्त्री ,, -,, ,; -मुदु होता है

<<= स्वामी को दिशा-कहने का तात्पर्य यह है कि लग्नेश जिस दिशा में बलवान्‌ हो

उसी दिशा में लाभ होता है या प्रश्न काल में नष्ट वस्तु भी उसी दिशा में

मिलती है ।

शास्त्रीय राशि-मिथुन तुला कुम्भ 1

शशि मेत्री-(१) अग्नि और वायु राशि आपस में मित्र हैं।

(R) भूमि और जछ॒ ,, „ #

(३) इसमें १ और २ की आपस में शत्रुता है ।

(४) पुरुष राशि की पुरुष और स्त्री राशि की स्त्री राशि से मित्रता है।

रानि बली राशि-पृष्ठोदय और मिथुन जिनका संबंध चन्द्र से है ।

पिभ घळी ,, -शेष ६ राशि जिनका संबंध सूर्य से है ।

गत सूर्य की राशि से ४ राशियाँ क्रम से गिनने पर

(१) ऊध्वं-ऊपर की ओर

(२ ) अघः-नीचे की ओर इसी प्रकार क्रम से शेष ८

(३) सम-वराबर जग्रह और राशियों को समझो ।

( ४ ) वक्र-नवी जगह

शीर्षोदय राशि सें प्राप्त ग्रहू--दद्या के आदि में फल देते हैं ।

पुष्ठोदय ,, ४ 72 अन्तमें , „,

उभयोदय ,, ७ 2) सदा ती. ७6)

नक्षत्र और उनके भिन्न भिन्न नाम

१ अश्विनी- तुरंग, दर, अच्वियुग, हय

२ भरणो--कृतांत, ग्राम्य

३ फुत्तिफा--हुताशन, अग्नि, बहुला

४ रोहिणी-विधि, विरिचि, शकट

'५ मुगशिर--सौम्य, चान्द्र, अग्रहायणी, उप

६ भाद्रा-तारका, रोद्र

७ पुनर्वसु--अदिति, सुरजननी

८ पुष्य--तिष्य, अम रेज्य

s झ्लेषा--आएलेषा, अहि, सुजग

१० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१० सघा--पितृ, जनक

११ पूर्वा फाल्गुनी--फल्गुनी, भाग्य

१२ उत्तरा फाल्गुनी--अयंमा, उत्तर, भग

१३ हस्त--भानु, अरुण, अकं

१४ चित्रा- त्वष्टा, सुरवर्धकि

१५ स्थाती--मरुत, वात, समीरण, वायु, समीर

१६ विश्ाखा-द्विदैवत, इन्द्राग्निक, शूपंक

१७ अनुराषा--मैत्र

१८ ज्येष्ठा--कुलिश तारा, शतमख, सुर स्वामी

१९ मूल--असुर, क्रतुभुज

२० पुर्वाषाढा--पयः, सलिल, जल, तोय

२१ उत्तराषाढा--विश्व

) २२ अवण--श्रोणा, विष्णु, हरि, श्रुति

२३ घनिष्ठा- श्रविष्ठा, वसु

२४ शतभिषा--प्रचेत:, शत तारका, वरुण

२५ पूर्व भाद्र पद--अजैकपाद, अजपात, पूर्व प्रोष्ठपद

२६ उत्तर भाद्रपद- अहिबु'घ्न्य, उत्तरा, प्रोष्ठपात्‌

२७,रेवती-पृषा, पोष्ण

नक्षत्र २७ हैं उनके १०८ चरण हैं ।

ज्योतिष चक्र दिन में एक बार पूर्व से पश्चिम घूमता है। इस चक्र गें रवि चंड

शनि आदि ग्रह पश्चिम से पूर्व को घूमते हैं ।

राशि एवं नक्षत्र-गुणधमं : ११

नक्षत्र स्वामी और भेद

_क्रम नक्षत्र | x चरादि| मुख योनि | वैर-योनि। गण | नाड़ी

१ अच्विनी x क्षिप्र | तिर्य अश्व x जैस | देव | आय कु मार २ भरणी | यमराज| क्रूर | अघो गज | सिंह |मनुष्य| मध्य ३ कृतिका | अग्नि | मिश्र | अघी मेढा | वानर |राक्षस| अत्य

४ रोहणो | ब्रह्मा | धुव | =£ सर्प मनुष्य| अंत्य

५ मृग चंद्र | मृदु | तियं

६ आदर | रुद्र | तीक्ष्ण| s=

७ पुनव्सु | अदिति| चर | त्यं

< पुष्य वृ. पति| क्षिप्र | उर्ध्व ९ लेपा [सर्प | तीक्षण | अघो

१० मघा |पितर | क्रूर | अधो

११ पृफा० | भग, | क्रूर | अघो

१६ gor. |अर्यमा | घव | ऊध्वं

१३ हस्त |सूयं | क्षिप्र | तिर्य १४ चित्रा | विदवक.| मृदु | तिर्य

१५ स्वाती |वायु | चर | तियं

१६ विशाखा | इन्द्र. अ! मिश्र | अधो

१७ अनु० [मित्र | मृदु | तियं

१८ ज्येष्ठा | इन्द्र | तीक्ष्ण | तियं

१९ मूल | राक्षस | मध्य

२० पु. षा. छ | क्रर अघो

२१ उ. षा. | बिषवेदे| घव | अघो

२२ अभ. | ब्रह्मा | क्षिप्र | ऊर्घ्व

२३ श्रवण | विष्णु | चर | »

२४ घनिष्ठा | वसु | चर | ऊ

२५ शत० वरुण | चर | ऊध्वं

२६ q. भा. | saq] क्रूर | ऊर्ध्व

२७ उभ्भा. |अहिंब',

२८ रेवती qar मृद्‌ ऊध्वं

[सुय]

नक्षत्र की धातु-मूल-जोव संज्ञा

नक्षत्रों को अश्‍विनी आदि नक्षत्र के क्रम से घातु मूल ओर जीव संज्ञा होती है ।

१ धुव च स्थिर नक्षत्र-उ. फा, उ. पा; उ. भा., रोहिणी ब रविवार । ये मृदु नक्षत्र

के बराबर हैं । इनमें नगर-प्रवेश, राज्याभिषेक, बगोचा आदि लगाना शुम है ।

२ चर च चल नक्षत्र-स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतमिष और सोमवार । wç

नक्षत्र भी इनके बराबर हैं । इनमें सब प्रकार के घोड़ा आदि वाहन, बाग-बगीचा

लगाना, पालकी-रथ आदि में बैठने का कार्य करता शुम है

१२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३ कूर घ उग्र-पु.फा; पू.षा., पू.भा. भरणी, मघा और मंगळवार । दारुण नक्षत्र भी

इनके बराबर हैं । इनमें शठत्व करना, नाश करना, विष देना, वंघन, उत्साह, शस्त्र

चलाना आदि कार्य होता हे ।

४ सिश्ष व साघारण-विशाखा, कृत्तिका और बुघवार । SW नक्षत्र भी इनके बरावर हैं ।

अभिषेक, खेत में बीज बोना, ग्राम, नगर-प्रवेश, बाग-वृक्ष लगाना, शान्ति कर्म

आदि इनमें होता ë ।

५ क्षिप्र व लघु-हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्‌, और गुरुवार । चर नक्षत्र भी इनके

बराबर हैं 1 व्यौहार, भूषणघारण, कलाकौशल; क्रीडा, औषधि देना-लेना, ज्ञानविद्या,

सुधारणपना, स्नान करना इनमें होता है ।

“६ मुदु व सेन्न-मृग, रेवती, चित्रा, अनुराधा और शुक्रवार। मित्राचारी, स्त्री-संग, वस्त्र￾धारण, गायन-वादन विद्या, नाना प्रकार का मंगल-कायं, सुखप्राप्ति इनमें करना ।

“७ तीक्ष्ण व दारण-मुल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आएलेषा और शनिवार । भूतादिक पीड़ा निवा-

रण करना, द्रव्य काढ़ना, मंत्र साधना, बंधन, भेद करना, बघ करना, ये कार्य इसमें- करना ।

अंधादि लोचन नक्षत्र

१ अन्य लोचन-घनिष्ठा, पुष्य, . रोहिणी पू.षा. विशाखा; उ.फा. रेवती-शीघ् मिले ।

र ही हत्त, उ.षा., अनुराधा, शतभिष, एलेषा, अश्विनी, मृग-घड़े उपाय ।

३ वथ मघा, पू.भा, चित्रा, ज्येष्ठा, अभिजित्‌, भरणो-दूर से सुन पड़े, I

४ सुलोचन-स्वातो, पुनर्वसु, श्रवण, कृतिका, उ.भा., पु.भा., मूल,पु. भा.-किसी प्रकार

. न मिले ।

१ अधोमुख नक्षत्र-मुल, कृत्तिका, मघा, विशाखा, भरणी, आइलेषा, पुर्वफाल०, पूषा.

पु. भा.---इनमें बावड़ी, आं, तालाव, खाई आदि खोदना,. द्रव्य काढ़ना

ओर रखना, जुआ खेलना, विलान्तःप्रवेश, गणितारंभ करना 1

२ तियंडमुख-ज्येष्ठा, पुनर्वसु, हस्त, अश्विनी, मृग, रेवती, अनुराधा, स्वाती, चित्रा ।

इसमें हाथी, बेल, घोडा आदि लेना, नाव पानी में डालना, यंत्र हल आदि

चलाना, धारण करना, गमन आदि करना ।

३ ऊध्वं मुख-पुष्य, आर्द्रा, श्रवण, उत्तराफा०, उ. षा., उ. भा, शतभिष, रोहिणी,

घनिष्ठा । इनमें देवस्थान, घ्वजा, मंडप, घर, कोट, भीति, तोरण, राज्या-

भिषेक आदि करना ।

'ताराविचार ( जन्म नक्षत्र से तारा विचारना )

जन्म नक्षत्र से दिन नक्षत्र तक ३ आवृत्ति से तारा सिद्ध होता है । जिस दिन

तारा विचारना हो जन्म नक्षत्र से उस दिन तक गिनकर ९ का भाग देना तो

शेषतारा इस प्रकार होगा»