श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
(१) दृष्ट कर्मफल —वर्तमानमें किये जानेवाले नये कर्मोंका फल, जो तत्काल प्रत्यक्ष मिलता हुआ दीखता है; जैसे—भोजन करनेसे तृप्ति होना आदि।
(२) अदृष्ट कर्मफल —वर्तमानमें किये जानेवाले नये कर्मोंका फल, जो अभी तो संचितरूपसे संगृहीत होता है, पर भविष्यमें इस लोक और परलोकमें अनुकूलता या प्रतिकूलताके रूपमें मिलेगा।
(३) प्राप्त कर्मफल —प्रारब्धके अनुसार वर्तमानमें मिले हुए शरीर, जाति, वर्ण, धन, सम्पत्ति, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आदि।
(४) अप्राप्त कर्मफल —प्रारब्ध-कर्मके फल-रूपमें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें मिलनेवाली है।
उपर्युक्त चार प्रकारके कर्मफलोंमें दृष्ट और अदृष्ट कर्मफल 'क्रियमाण-कर्म' के अधीन हैं तथा प्राप्त और अप्राप्त कर्मफल 'प्रारब्ध-कर्म' के अधीन हैं। कर्मफलका त्याग करनेका अर्थ है—दृष्ट कर्मफलका आग्रह नहीं रखना तथा मिलनेपर प्रसन्न या अप्रसन्न न होना; अदृष्ट कर्मफलकी आशा न रखना; प्राप्त कर्मफलमें ममता न करना तथा मिलनेपर सुखी या दुःखी न होना और अप्राप्त कर्मफलकी कामना न करना कि मेरा दुःख मिट जाय और सुख हो जाय।
साधारण मनुष्य किसी-न-किसी कामनाको लेकर ही कर्मोंका आरम्भ करता है और कर्मोंकी समाप्तिपर उस कामनाका चिन्तन करता रहता है। जैसे व्यापारी धनकी इच्छासे व्यापार आरम्भ करता है तो उसकी वृत्तियों धनके लाभ और हानिकी ओर ही रहती हैं कि लाभ हो जाय, हानि न हो। धनका लाभ होनेपर वह प्रसन्न होता है और हानि होनेपर दुःखी होता है। इसी तरह सभी मनुष्य स्त्री, पुत्र, धन, मान, बड़ाई आदि कोई-न-कोई अनुकूल फलकी इच्छा रखकर ही कर्म करते हैं। परन्तु कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके कर्म करता है।
यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि अगर कोई इच्छा ही न हो तो कर्म करें ही क्यों? इसके उत्तरमें सबसे पहली बात तो यह है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा त्याग नहीं कर सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। यदि ऐसा मान भी लिया जाय कि मनुष्य बहुत अंशोंमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर सकता है, तो भी
मनुष्यके भीतर जबतक संसारके प्रति राग है, तबतक वह शान्तिसे (कर्म किये बिना) नहीं बैठ सकता। उससे विषयोंका चिन्तन अवश्य होगा, जो कि कर्म है। विषयोंका चिन्तन होनेसे वह क्रमशः पतनकी ओर चला जायगा (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। इसलिये जबतक रागका सर्वथा अभाव नहीं हो जाता, तबतक मनुष्य कर्मोंसे छूट नहीं सकता। कर्म करनेसे पुराना राग मिटता है और निःस्वार्थभावसे केवल परहितके लिये कर्म करनेसे नया राग पैदा नहीं होता।
विचारपूर्वक देखा जाय तो कर्मफलकी इच्छा रखकर कर्म करना बड़ी बेसमझी है। पहली बात तो यह है कि जब प्रत्येक कर्म आरम्भ और समाप्त होनेवाला है, तब उसका फल नित्य कैसे होगा? फल भी प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कर्म और कर्मफल—दोनों ही नाशवान् हैं या तो फल नहीं रहेगा या हमारा कहलाने-वाला शरीर नहीं रहेगा। दूसरी बात, इच्छा रखें या न रखें, जो फल मिलनेवाला है, वह तो मिलेगा ही। इच्छा करनेसे अधिक फल मिलता हो और इच्छा न करनेसे कम फल मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। अतः फलकी कामना करना बेसमझी ही है।
निष्कामभावसे अर्थात् फलकी कामना न रखकर लोकहितार्थ कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। कर्मयोगीके कर्म उद्देश्यहीन अर्थात् पागलके कर्मकी तरह नहीं होते, प्रत्युत परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका महान् उद्देश्य रखकर ही वह लोकहितार्थ सब कर्म करता है। उसके कर्मोंका लक्ष्य परमात्मतत्त्व रहता है, सांसारिक पदार्थ नहीं। शरीरमें ममता न रहनेसे उसमें आलस्य, अकर्मण्यता आदि दोष नहीं आते, प्रत्युत वह कर्मोंको सुचारुरूपसे और तत्परताके साथ करता है।
मामिक बात
जिन कर्मोंको करनेसे नाशवान् पदार्थोंकी प्राप्ति होती है, वे ही कर्म निष्कामभावपूर्वक एकमात्र परमात्मतत्वकी प्राप्तिका उद्देश्य रखकर लोकहितार्थ करनेसे नित्यसिद्ध परमात्मतत्वकी अनुभूतिमें हेतु बन सकते हैं। तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें कहा गया है कि कर्मोंके द्वारा ही जनकादि कर्मयोगियोंको परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि मिली; और छठे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहा गया है कि योगमें आरूढ़ होनेके लिये कर्म करना आवश्यक है। इन सब
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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बातोंसे यह अर्थ निकलता है कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर्मसे होती है। पार्वती, मनु-शतरूपा आदिको भी तप रूप कर्मसे भगवत्प्राप्ति हुई। यह बात भी आती है कि जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय, श्रवण, मनन आदि साधनोंसे तत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है। इसके विपरीत ऐसी बात भी आती है कि तप आदि कर्मोंसे भगवत्प्राप्ति नहीं होती (गीता—ग्यारहवें अध्यायका तिरपनवॉ श्लोक), परमात्मा किसी कर्मका फल नहीं हैं आदि। इन दोनों बातोंमें सामंजस्य कैसे हो?
इसका समाधान है कि वास्तवमें परमात्माकी प्राप्ति किसी कर्मसे नहीं होती। वे किसी कर्मका फल नहीं हैं। परमात्मा प्रत्येक देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें सदा-सर्वदा विद्यमान हैं। वे सदा-सर्वदा सबको प्राप्त हैं और सभी प्राणियोंकी सदा-सर्वदा उन्हींमें स्थिति हैं। परमात्मासे कोई भी मनुष्य कभी अलग था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। परन्तु जड़ प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिसे अहंता-ममतापूर्वक अपना सम्बन्ध मानते रहनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो जाता है और जो वास्तवमें अपने हैं, उन परमात्माको अपना न मानकर जो अपने हैं ही नहीं, उन नाशवान् पदार्थोंको अपना मानने लग जाता है। अतः जड़ पदार्थोंके साथ जीवका जो रागयुक्त सम्बन्ध है, उसे मिटानेमें ही सम्पूर्ण साधनोंकी सार्थकता है।
जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है। अतः तप आदि साधन करते-करते जब जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है तभी परमात्मप्राप्ति होती है। वही सम्बन्ध-विच्छेद तब बहुत सुगमतासे हो जाता है, जब निष्कामभावसे केवल लोकहितके लिये कर्तव्य-कर्म किये जायें।
परमात्मा किसी साधनसे खरीदे नहीं जा सकते; क्योंकि प्रकृतिके सम्पूर्ण पदार्थ एक साथ मिलकर भी चिन्मय और अविनाशी परमात्माकी किंचिन्मात्र भी समानता नहीं कर सकते। दूसरी बात, मूल्य देकर जो वस्तु मिलती है, वह उस मूल्यसे कमजोर (कम मूल्यवाली) ही होती है। यदि कर्मोंसे परमात्मा मिल जायें तो वे कर्मोंसे कमजोर ही सिद्ध होंगे।
यहाँ एक मार्मिक बात समझनेकी है कि प्रायः साधक
जिन शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे साधन करते हैं, उनका सम्बन्ध, महत्त्व और आश्रय रखते हुए ही साधन करते हैं। जबतक इन शरीरादिसे यत्किंचित् भी सम्बन्ध है; तबतक जड़तासे सम्बन्ध बना हुआ है। जड़तासे सम्बन्ध रखते हुए परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता। परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति जड़ताके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है।
जिस जातिका संसार है, उसी जातिके ये शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि हैं। अतः इन्हें संसारका ही मानकर, संसारकी ही सेवामें लगा दे (जो कर्मयोग है)। परन्तु इन शरीरादिसे किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न माने, इन्हें महत्त्व न दे, इनका आश्रय न रखे; क्योंकि असत्से सम्बन्ध रखते हुए असत्की सर्वथा निवृत्ति नहीं हो सकती। असत्से सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये निष्कामभावसे किये हुए सब कर्म (साधन) सहायक होते हैं। असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही परमात्मासे जो विमुखता हो रही थी, वह मिट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है।
‘शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्’ —यह बात अनुभव-सिद्ध है कि सांसारिक पदार्थोंकी कामना और ममताके त्यागसे शान्ति मिलती है। सुषुप्तिमें जब संसारकी विस्मृति हो जाती है, तब उसमें भी शान्तिका अनुभव होता है। यदि जाग्रत्में ही संसारका सम्बन्ध-विच्छेद (कामना-ममताका त्याग) हो जाय, तो फिर कहना ही क्या है! ऐसे ही नींद आने, किसी कार्यके पूरा होने, लड़कीका विवाह होने आदिसे भी एक शान्ति मिलती है। तात्पर्य है कि सांसारिक कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करते ही शान्ति प्राप्त होती है। परन्तु इस शान्तिका उपभोग करनेसे अर्थात् इसमें सुख लेनेसे और इसे ही लक्ष्य मान लेनेसे साधक इस शान्तिके फलस्वरूप मिलनेवाली ‘नैष्ठिकी शान्ति’* अर्थात् परमशान्तिसे वंचित रह जाता है। कारण कि यह शान्ति ध्येय नहीं है, प्रत्युत परमशान्तिका कारण है—‘योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)।
संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे होनेवाली शान्ति सत्त्व-गुणसे सम्बन्ध रखनेवाली सात्त्विकी शान्ति है। जबतक साधक इस शान्तिका भोग करता है और इस शान्तिसे ‘मुझमें शान्ति है’ इस प्रकार अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक
- यह ‘नैष्ठिकी शान्ति’ परमात्मप्राप्तिरूप ही है। इसे ही गीतामें कहीं ‘शशवच्छान्तिम्’ (९।३१) पदसे, कहीं ‘परां शान्तिम्’ (४।३९;१८।६२) पदोंसे और कहीं ‘शान्तिम्’ (५।२९;२।७०-७१) पदोंसे भी कहा गया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५
परिच्छिन्नता रहती है (गीता-चौदहवें अध्यायका छठा
श्लोक) और जबतक परिच्छिन्नता रहती है, तबतक
अखण्ड एकरस रहनेवाली वास्तविक शान्तिका अनुभव
नहीं होता।
'अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते' - जो
कर्मयोगी नहीं है, प्रत्युत कर्मी है, ऐसे सकाम पुरुषके लिये
यहाँ 'अयुक्तः' पद आया है।
सकाम पुरुष नयी-नयी कामनाओंके कारण फलमें
आसक्त होकर जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है।
कामनामात्रसे कोई भी पदार्थ नहीं मिलता, अगर मिलता
भी है तो सदा साथ नहीं रहता - ऐसी बात प्रत्यक्ष होनेपर
भी पदार्थोंकी कामना रखना प्रमाद ही है। तुलसीदासजी
महाराज कहते हैं-
अंतहुँ तोहि तजैंगे पामर तू न तजै अबही ते ॥
(विनय-पत्रिका १९८)
इसका अर्थ यह नहीं कि पदार्थोंको स्वरूपसे छोड़ दें।
अगर स्वरूपसे छोड़नेपर ही मुक्ति होती तो मरनेवाले (शरीर
छोड़नेवाले) सभी मुक्त हो जाते। पदार्थ तो अपने-आप
ही स्वरूपसे छूटते चले जा रहे हैं। अतः वास्तवमें उन
पदार्थोंमें जो कामना, ममता और आसक्ति है, उसीको छोड़ना
है; क्योंकि पदार्थोंसे कामना-ममता-आसक्तिपूर्वक माना हुआ
सम्बन्ध ही जन्म-मरणरूप बन्धनका कारण है। कर्मयोगके
आचरणसे (कर्मोंका प्रवाह केवल परहितके लिये होनेसे)
यह माना हुआ सम्बन्ध सुगमतासे छूट जाता है।
परिशिष्ट भाव-वास्तवमें मुक्तिके लिये अथवा परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना भी फलासक्ति है। मनुष्यकी
आदत पड़ी हुई है कि वह प्रत्येक कार्य फलकी कामनासे करता है, इसीलिये कहा जाता है कि मुक्तिके लिये, परमात्मप्राप्तिके
लिये साधन करे। वास्तवमें साधन केवल असाधनको मिटानेके लिये है। मुक्ति स्वतःसिद्ध है। परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
परमात्मप्राप्ति किसी क्रियाका फल नहीं है। अतः कुछ करनेसे परमात्मप्राप्ति होगी-ऐसी इच्छा रखना भी फलेच्छा है।
साधकको यह नहीं देखना चाहिये कि मैं यह साधन करूँगा तो इसका यह फल होगा। फलको देखना ही फलासक्ति
है, जिससे वर्तमानमें साधन ठीक नहीं होता। अतः फलको न देखकर अपने साधनको देखना चाहिये, साधन तत्पर होकर
करना चाहिये, फिर सिद्धि अपने-आप आयेगी। अगर साधक फलकी ओर देखता रहेगा तो सिद्धि नहीं होगी।
हम निर्विकल्प, निष्काम हो जायँगे तो बड़ा सुख मिलेगा-इस प्रकार मूलमें सुख लेनेकी जो इच्छा रहती है,
यह भी फलेच्छा है, जो साधकको निर्विकल्प, निष्काम नहीं होने देती।
सम्बन्ध-कर्मयोगका वर्णन करके अब भगवान् पुनः सांख्ययोगका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
वशी
= जिसकी इन्द्रियाँ
और मन वशमें
हैं, (ऐसा)
देही
= देहधारी पुरुष
नवद्वारे
= नौ द्वारोंवाले
पुरे
= (शरीररूपी) पुरमें
सर्वकर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंका
मनसा
= (विवेकपूर्वक)
मनसे
संन्यस्य
= त्याग करके
एव
= निःसन्देह
न
= न
कुर्वन्
= करता हुआ (और)
न
= न
कारयन्
= करवाता हुआ
सुखम्
= सुखपूर्वक (अपने
स्वरूपमें)
आस्ते
= स्थित रहता है।
व्याख्या-'वशी देही'-इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें
ममता-आसक्ति होनेसे ही ये मनुष्यपर अपना अधिकार
जमाते हैं। ममता-आसक्ति न रहनेपर ये स्वतः अपने वशमें
रहते हैं। सांख्ययोगीकी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-
आसक्ति न रहनेसे ये सर्वथा उसके वशमें रहते हैं। इसलिये
यहाँ उसे 'वशी' कहा गया है।
जबतक किसी भी मनुष्यका प्रकृतिके कार्य (शरीर,
इन्द्रियों आदि) के साथ किंचिन्मात्र भी कोई प्रयोजन रहता
है, तबतक वह प्रकृतिके 'अवश' अर्थात् वशीभूत रहता
है-'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (गीता
३।५)। प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है। अतः
प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहनेके कारण मनुष्य कर्मरहित हो
ही नहीं सकता। परन्तु प्रकृतिके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और
कारण-तीनों शरीरोंसे ममता-आसक्तिपूर्वक कोई सम्बन्ध
श्लोक १३ ] * साधक-संजीवनी * ३८१
न होनेसे सांख्ययोगी उनकी क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता।
यद्यपि सांख्ययोगीका शरीरके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध
नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह शरीरधारी ही
दीखता है। इसलिये उसे 'देही' कहा गया है।
'नवद्वारे पुरे'—शब्दादि विषयोंका सेवन करनेके
लिये दो कान, दो नेत्र, दो नासिकाछिद्र तथा एक मुख—
ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं, और मल-मूत्रका
त्याग करनेके लिये गुदा और उपस्थ—ये दो द्वार शरीरके
निचले भागमें हैं। इन नौ द्वारोंवाले शरीरको 'पुर' अर्थात्
नगर कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे नगर और उसमें
रहनेवाला मनुष्य—दोनों अलग-अलग होते हैं, ऐसे ही यह
शरीर और इसमें रहनेका भाव रखनेवाला जीवात्मा—दोनों
अलग-अलग हैं। जैसे नगरमें रहनेवाला मनुष्य नगरमें
होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता, ऐसे ही
सांख्ययोगी शरीरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ
नहीं मानता।
'सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य'—इसी अध्यायके
आठवें-नवें श्लोकोंमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और
प्राणोंके द्वारा होनेवाली जिन तेरह क्रियाओंका वर्णन हुआ
है, उन सब क्रियाओंका बोधक यहाँ 'सर्वकर्माणि' पद है।
यहाँ 'मनसा सन्न्यस्य' पदोंका अभिप्राय है—
विवेकपूर्वक मनसे त्याग करना। यदि इन पदोंका अर्थ
केवल मनसे त्याग करना माना जाय तो दोष आता है;
क्योंकि मनसे त्याग करना भी मनकी एक क्रिया है और
गीता मनसे होनेवाली क्रियाको 'कर्म' मानती है—
'शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः' (१८। १५)।
शरीरसे होनेवाली क्रियाओंके कर्तापनका मनसे त्याग
करनेपर भी मनकी (त्यागरूप) क्रियाका कर्तापन तो रह
ही गया! अतः 'मनसा सन्न्यस्य' पदोंका तात्पर्य है—
विवेकपूर्वक मनसे क्रियाओंके कर्तापनका त्याग करना
अर्थात् कर्तापनसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करना। जहाँसे
कर्तापनका सम्बन्ध माना है, वहींसे उस सम्बन्धका त्याग
करना है। सांख्ययोगी अपनेमें कर्तापन न मानकर उसे
शरीरमें ही छोड़ देता है अर्थात् कर्तापन शरीरमें ही है,
अपनेमें कभी नहीं।
'नैव कुर्वन्न कारयन्'—सांख्ययोगीमें कर्तृत्व और
कारयितृत्व— दोनों ही नहीं होते अर्थात् वह करनेवाला भी
नहीं होता और करवानेवाला भी नहीं होता।
शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे किंचिन्मात्र भी
अहंता-ममताका सम्बन्ध न होनेके कारण सांख्ययोगी उनके
द्वारा होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको कैसे मान सकता
है? अर्थात् कभी नहीं मान सकता। इसी अध्यायके आठवें
श्लोकमें भी 'नैव किञ्चित् करोमि' पदोंसे यही बात कही
गयी है। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने
'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति' पदोंसे कहा है कि
शरीरमें रहते हुए भी यह अविनाशी आत्मा कुछ नहीं करता।
यहाँ शंका होती है कि जीवात्मा स्वयं कोई कर्म नहीं
करता; किन्तु वह प्रेरक बनकर कर्म तो करवा सकता
है? इसका समाधान यह है कि जैसे सूर्यभगवान्का उदय
होनेपर सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा जाता है, लोग अपने-
अपने कामोंमें लग जाते हैं, कोई खेती करता है, कोई
वेदपाठ करता है, कोई व्यापार करता है आदि। परन्तु
सूर्यभगवान् विहित या निषिद्ध किसी भी क्रियाके प्रेरक
नहीं होते। उनसे सबको प्रकाश मिलता है, पर उस
प्रकाशका कोई सदुपयोग करे या दुरुपयोग, इसमें
सूर्यभगवान्की कोई प्रेरणा नहीं है। यदि उनकी प्रेरणा होती
तो पाप या पुण्य-कर्मोंका भागी भी उन्हींको होना पड़ता।
ऐसे ही चेतनतत्त्वसे प्रकृतिको सत्ता और शक्ति तो प्राप्त
होती है, पर वह किसी क्रियाका प्रेरक नहीं होता। यही
बात भगवान्ने यहाँ 'न कारयन्' पदोंसे कही है।
'आस्ते सुखम्'—मनुष्यमात्रकी स्वरूपमें स्वाभाविक
स्थिति है; परन्तु वे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन,
बुद्धि, प्राण आदिमें मान लेते हैं, जिससे उन्हें इस
स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। परन्तु सांख्ययोगीको
निरन्तर स्वरूपमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव
होता रहता है। स्वरूप सदा-सर्वदा सुख-स्वरूप है। वह
सुख अखण्ड, एकरस और परिच्छिन्नतासे रहित है।
एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें जैसी स्थिति होती है,
स्वरूपमें वैसी स्थिति नहीं होती। कारण कि स्वरूप ज्यों-
का-त्यों विद्यमान रहता है। उस स्वरूपमें मनुष्यकी स्थिति
स्वतः-स्वाभाविक है; अतः उसमें स्थित होनेमें कोई श्रम,
उद्योग नहीं है। स्वरूपको पहचाननेपर एक स्वरूप-ही-
स्वरूप रह जाता है। पहचानमात्रको समझानेके लिये ही
यहाँ 'आस्ते' पदका प्रयोग हुआ है। इसे ही चौदहवें
अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें 'स्वस्थः' पदसे कहा गया है।
यहाँ 'आस्ते' क्रिया जिस तत्त्वकी सत्ताको प्रकट कर
रही है, वह सब आधारोंका आधार है। समस्त उत्पन्न तत्त्व
उस अनुत्पन्न तत्त्वके आश्रित हैं। उस सर्वाधिष्ठानरूप
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
तत्त्वको किसी आधारकी आवश्यकता ही क्या है? उस स्वतःसिद्ध तत्त्वमें स्वाभाविक स्थितिको ही यहाँ ‘आस्ते’
पढ़से कहा गया है। इसे ही आगे बीसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः’ पढ़ोंसे कहा गया है।
परिशिष्ट भाव—‘नैव कुर्वन् कारयन्’ —तत्त्वप्राप्तिमें करनेका भाव ही बाधक है। करनेके भावसे ही कर्तृत्व आता है और कर्तृत्वसे व्यक्तित्व आता है। क्रिया प्रकृतिमें है, स्वरूपमें स्वतः अक्रियता है। अतः करनेसे प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और कुछ नहीं करनेसे स्वरूपमें स्वतः स्थिति होती है। मेरेको कुछ नहीं करना है—यह भाव भी ‘करने’ के ही अन्तर्गत है। अतः करनेसे भी मतलब नहीं होना चाहिये और न करनेसे भी मतलब नहीं होना चाहिये—‘नैव तस्य कृतेनाथो नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३।१८)। स्वरूप करने और न करने—दोनोंसे रहित अर्थात् निरपेक्ष तत्त्व है।
वशी —गुणोंके संगसे ही जीव ‘अवश’ अर्थात् पराधीन होता है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे अवशता मिट जाती है और जीव ‘वशी’ अर्थात् स्वाधीन, निरपेक्ष जीवन हो जाता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि सांख्ययोगी न तो कर्म करता है और न करवाता ही है; किन्तु भगवान् तो कर्म करवाते होंगे? इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
प्रभुः = परमेश्वर लोकस्य = मनुष्योंके न = न कर्तृत्वम् = कर्तापनकी, न = न
कर्माणि = कर्मोंकी (और) न = न कर्मफल- संयोगम् = कर्मफलके साथ संयोगकी
सृजति = रचना करते हैं; तु = किन्तु स्वभावः = स्वभाव (ही) प्रवर्तते = बरत रहा है।
व्याख्या—‘न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः’ —सृष्टिकी रचनाका कार्य सगुण भगवान्का है, इसलिये ‘प्रभुः’ पद दिया है। भगवान् सर्वसमर्थ हैं और सबके शासक, नियामक हैं। सृष्टिरचनाका कार्य करनेपर भी वे अकर्ता ही हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
किसी भी कर्मके कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ नहीं है। मनुष्य स्वयं ही कर्मोंके कर्तापनकी रचना करता है। सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके द्वारा किये जाते हैं; परन्तु मनुष्य अज्ञानवश प्रकृतिसे तादात्म्य कर लेता है और उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका कर्ता बन जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। यदि कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता, तो भगवान् इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें ‘नैव किञ्चित्कारोमीति युक्तो मन्येत तत्त्वचित्’—ऐसा कैसे कहते? तात्पर्य यह है कि कर्तापन भगवान्का बनाया हुआ नहीं है, अपितु जीवका अपना माना हुआ है। अतः जीव इसका त्याग कर सकता है।
भगवान् ऐसा विधान भी नहीं करते कि अमुक जीवको अमुक शुभ अथवा अशुभ कर्म करना पड़ेगा। यदि
ऐसा विधान भगवान् कर देते तो विधि-निषेध बतानेवाले शास्त्र, गुरु, शिक्षा आदि सब व्यर्थ हो जाते, उनकी कोई सार्थकता ही नहीं रहती और कर्मोंका फल भी जीवको नहीं भोगना पड़ता। ‘न कर्माणि’ पढ़ोंसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है।
‘न कर्मफलसंयोगम्’—जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल उसे भोगना पड़ता है। जड़ होनेके कारण कर्म स्वयं अपना फल भुगतानेमें असमर्थ हैं। अतः कर्मोंके फलका विधान भगवान् करते हैं—‘लभते च ततः कामान्मयैव विहिताहि तान्’ (गीता ७।२२)। भगवान् कर्मोंका फल तो देते हैं, पर उस फलके साथ सम्बन्ध भगवान् नहीं जोड़ते, प्रत्युत जीव स्वयं जोड़ता है। जीव अज्ञानवश कर्मोंका कर्ता बनकर और कर्मफलमें आसक्त होकर कर्मफलके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और इसीसे सुखी-दुःखी होता है। यदि वह कर्मफलके साथ स्वयं अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो वह कर्मफलके सम्बन्धसे मुक्त रह सकता है। ऐसे कर्मफलसे सम्बन्ध न जोड़नेवाले पुरुषोंके लिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ‘सन्त्यासिनाम्’ पद आया है। उन्हें कर्मोंका फल
श्लोक १४]
- साधक-संजीवनी *
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इस लोक या परलोकमें कहीं नहीं मिलता। यदि कर्मफलका सम्बन्ध भगवान्ने जोड़ा होता तो जीव कभी कर्मफलसे मुक्त नहीं होता।
दूसरे अध्यायके सैतालीसवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—‘मा कर्मफलहेतुर्भूः ’ अर्थात् कर्मफलका हेतु भी मत बन। तात्पर्य हुआ कि सुखी-दुःखी होना अथवा न होना और कर्मफलका हेतु बनना अथवा न बनना मनुष्यके हाथमें है। यदि कर्मफलका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता, तो मनुष्य कभी सुख-दुःखमें सम नहीं हो पाता और निष्कामभावसे कर्म भी नहीं कर पाता, जिसे करनेकी बात भगवान्ने गीतामें जगह-जगह कही है (जैसे चौथे अध्यायका बीसवाँ, पाँचवें अध्यायका बारहवाँ और चौदहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक आदि)।
शंका—श्रुतिमें आता है कि भगवान् जिसकी ऊर्ध्वगति करना चाहते हैं, उससे तो शुभ-कर्म करवाते हैं और जिसकी अधोगति करना चाहते हैं, उससे अशुभ-कर्म करवाते हैं। जब भगवान् ही शुभाशुभ कर्म करवाते हैं, तो फिर ‘भगवान् किसीके कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल-संयोगकी रचना नहीं करते’—ऐसा कहना तो श्रुतिके साथ विरोध हुआ!
समाधान—वास्तवमें श्रुतिके उपर्युक्त कथनका तात्पर्य शुभाशुभ कर्म करवाकर मनुष्यकी ऊर्ध्वगति और अधोगति करनेमें नहीं है, प्रत्युत प्रारब्धके अनुसार कर्मफल भुगताकर उसे शुद्ध करनेमें है। अर्थात् मनुष्य शुभाशुभ कर्मोंका फल जैसे भोग सके, भगवान् कृपापूर्वक उसे कर्मबन्धनसे मुक्त करके अपना वास्तविक प्रेम प्रदान करनेके लिये (उसके प्रारब्धके अनुसार) वैसी ही परिस्थिति और बुद्धि बना देते हैं। जैसे, जिस मनुष्यको प्रारब्धके अनुसार धनकी प्राप्ति होनेवाली है, उसे व्यापार आदिमें वैसी ही (खरीदने आदिकी) प्रेरणा कर देते हैं अर्थात् उस समय उसकी वैसी ही बुद्धि बन जाती है और जिसे प्रारब्धके अनुसार हानि
परिशिष्ट भाव —कर्तापन, कर्म और कर्मफलका संयोग परमात्माकी सृष्टि नहीं है, प्रत्युत जीवकी सृष्टि है। इसलिये जीवपर ही इनके त्यागकी जिम्मेवारी है।
‘स्वभावस्तु प्रवर्तते’ —वास्तवमें संसारके साथ सम्बन्ध-विच्छेद स्वाभाविक है; परन्तु अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकता देखनेके कारण संसारका सम्बन्ध स्वाभाविक दीखने लग गया। यह स्वभाव स्वतः नहीं है, प्रत्युत बनाया हुआ (कृत्रिम) है।
होनेवाली है, उसे व्यापार आदिमें वैसी ही प्रेरणा कर देते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस प्रकारसे अपने शुभाशुभ कर्मोंका फल भोग सके, भगवत्प्रेरणासे वैसी ही परिस्थिति और बुद्धि बन जाती है।
यदि श्रुतिका यही अर्थ लिया जाय कि भगवान् जिसकी ऊर्ध्वगति और अधोगति करना चाहते हैं, उससे शुभ और अशुभ-कर्म करवाते हैं, तो मनुष्य कर्म करनेमें सर्वथा पराधीन हो जायगा और शास्त्रों, सन्त-महात्माओं आदिका विधि-निषेध, गुरुकी शिक्षा आदि सभी व्यर्थ हो जायेंगे। अतः यहाँ श्रुतिका तात्पर्य कर्मोंका फल भुगताकर मनुष्यको शुद्ध करना ही है।
‘स्वभावस्तु प्रवर्तते’ —कर्तापन, कर्म और कर्मफलका सम्बन्ध—इन तीनोंको मनुष्य अपने स्वभावके वशमें होकर करता है। यहाँ ‘स्वभावः ’ पद व्यष्टि प्रकृति-(आदत) का वाचक है, जिसे स्वयं जीवने बनाया है। जबतक स्वभावमें राग-द्वेष रहते हैं, तबतक स्वभाव शुद्ध नहीं होता। जबतक स्वभाव शुद्ध नहीं होता, तबतक जीव स्वभावके वशीभूत रहता है।
तीसरे अध्यायके तैत्तीसवें श्लोकमें ‘प्रकृतिं यान्ति भूतानि ’ पदोंसे भगवान्ने कहा है कि मनुष्योंको अपनी प्रकृति अर्थात् स्वभावके वशीभूत होकर कर्म करने पड़ते हैं। यही बात भगवान् यहाँ ‘तु स्वभावः प्रवर्तते ’ पदोंसे कह रहे हैं।
जबतक प्रकृति अर्थात् स्वभावसे जीवका सम्बन्ध माना हुआ है, तबतक कर्तापन, कर्म और कर्मफलके साथ संयोग—इन तीनोंमें जीवकी परतन्त्रता बनी रहेगी, जो जीवकी ही बनायी हुई है।
उपर्युक्त पदोंसे भगवान् यह कह रहे हैं कि कर्तृत्व, कर्म और कर्मफलसंयोग (भोक्तृत्व)—तीनों जीवके अपने बनाये हुए हैं, इसलिये वह स्वयं इनका त्याग करके निलिप्तताका अनुभव कर सकता है।
१-‘एष होव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष होवासाम्ना कर्म कारयति तं यमधो निनीषते।’ (कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ३।८)
२-मूलमें शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप) कर्म मनुष्य कामनाके वशीभूत होकर ही करता है (गीता ३।३७), जिनका फल क्रमशः ऊर्ध्वगति (स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति) और अधोगति (नरकोंकी प्राप्ति) होता है। मनुष्य मुक्तिके लिये भगवान्की दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके ही कामना करता है।
३८४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
सम्बन्ध—जब भगवान् किसीके कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल-संयोगकी रचना नहीं करते, तो फिर वे किसीके कर्मोंके फलभागी कैसे हो सकते हैं?—इस बातको आगेके श्लोकमें स्पष्ट करते हैं।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
| विभुः | = सर्वव्यापी | न | = न | ज्ञानम् | = ज्ञान |
|---|---|---|---|---|---|
| परमात्मा | सुकृतम् | = शुभ-कर्मको | आवृतम् | = ढका हुआ है, | |
| न | = न | एव | = ही | तेन | = उसीसे |
| कस्यचित् | = किसीके | आदत्ते | = ग्रहण करता है; | जन्तवः | = सब जीव |
| पापम् | = पापकर्मको | (किन्तु) | मुह्यन्ति | = मोहित हो | |
| च | = और | अज्ञानेन | = अज्ञानसे | रहे हैं। |
व्याख्या —'नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः'—पूर्वश्लोकमें जिसको 'प्रभुः' पदसे कहा गया है, उसी परमात्माको यहाँ 'विभुः' पदसे कहा गया है।
कर्मफलका भागी होना दो प्रकारसे होता है—जो कर्म करता है, वह भी कर्मफलका भागी होता है और जो दूसरेसे कर्म करवाता है, वह भी कर्मफलका भागी होता है। परन्तु परमात्मा न तो किसीके कर्मको करनेवाला है और न कर्म करवानेवाला ही है; अतः वह किसीके भी कर्मका फलभागी नहीं हो सकता।
सूर्य सम्पूर्ण जगत्को प्रकाश देता है और उस प्रकाशके अन्तर्गत मनुष्य पाप और पुण्य-कर्म करते हैं; परन्तु उन कर्मोंसे सूर्यका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। इसी प्रकार परमात्मत्वसे प्रकृति सत्ता पाती है अर्थात् सम्पूर्ण संसार सत्ता पाता है। उसीकी सत्ता पाकर प्रकृति और उसका कार्य संसार-शरीरादि क्रियाएँ करते हैं। उन शरीरादिसे होनेवाले पाप-पुण्योंका परमात्मत्वसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। कारण कि भगवान्ने मनुष्यमात्रको स्वतन्त्रता दे रखी है; अतः मनुष्य उन कर्मोंका फलभागी अपनेको भी मान सकता है और भगवान्को भी मान सकता है अर्थात् सम्पूर्ण कर्म और कर्मफलोंको भगवान्के अर्पण भी कर सकता है। जो भगवान्की दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता अपनेको मान लेता है, वह बन्धनमें पड़ जाता है। उसके कर्म और कर्मफलको भगवान् ग्रहण नहीं करते। परन्तु जो मनुष्य उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके कर्म और कर्मफल भगवान्के अर्पण करता है, वह मुक्त हो जाता है। उसके कर्म और कर्मफलको भगवान् ग्रहण करते हैं।
जैसे सातवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें 'सर्वस्य'
पदसे और छब्बीसवें श्लोकमें 'कश्चन' पदसे सामान्य मनुष्योंको बात कही गयी है, ऐसे ही यहाँ 'कस्यचित्' पदसे अपनेको कर्ता और भोक्ता मानकर कर्म करनेवाले सामान्य मनुष्योंको बात कही गयी है, न कि भक्तोंको। कारण कि भावग्राही होनेसे भगवान् भक्तोंके द्वारा अर्पण किये हुए पत्र, पुष्प आदि पदार्थोंको और सम्पूर्ण कर्मोंको ग्रहण करते हैं (गीता—नवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ श्लोक)।
'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्'—स्वरूपका ज्ञान सभी मनुष्योंमें स्वतःसिद्ध है; किन्तु अज्ञानके द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है। उस अज्ञानके कारण जीव मूढ़ताको प्राप्त हो रहे हैं। अपनेको कर्मोंका कर्ता मानना मूढ़ता है (गीता—तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान्के द्वारा मनुष्य-मात्रको विवेक दिया हुआ है, जिसके द्वारा इस मूढ़ताका नाश किया जा सकता है। इसलिये इस अध्यायके आठवें श्लोकमें कहा गया है कि सांख्ययोगी कभी भी अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने और तेरहवें श्लोकमें कहा गया है कि सम्पूर्ण कर्मोंके कर्तापनको विवेकपूर्वक मनसे छोड़ दे।
शरीरादि सम्पूर्ण पदार्थोंमें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। स्वरूपमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। स्वरूपसे अपरिवर्तनशील होनेपर भी अपनेको परिवर्तनशील पदार्थोंसे एक मान लेना अज्ञान है। शरीरादि सब पदार्थ बदल रहे हैं—ऐसा जिसे अनुभव है वह स्वयं कभी नहीं बदलता। इसलिये स्वयंके बदलनेका अनुभव किसीको नहीं होता। अतः मैं बदलनेवाला नहीं हूँ—इस प्रकार परिवर्तनशील पदार्थोंसे अपनी असंगताका अनुभव कर लेनेसे अज्ञान मिट जाता है और तत्त्वज्ञान स्वतः प्रकाशित हो जाता है। कारण
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
३८५
कि प्रकृतिके कार्यसे अपना सम्बन्ध मानते रहनेसे ही तत्त्वज्ञान ढका रहता है।
‘अज्ञान’ शब्दमें जो ‘नञ्’ समास है, वह ज्ञानके अभावका वाचक नहीं है, प्रत्युत अल्पज्ञान अर्थात् अधूरे ज्ञानका वाचक है। कारण कि ज्ञानका अभाव कभी होता ही नहीं, चाहे उसका अनुभव हो या न हो। इसलिये अधूरे ज्ञानको ही अज्ञान कहा जाता है। इन्द्रियोंका और बुद्धिका ज्ञान ही अधूरा ज्ञान है। इस अधूरे ज्ञानको महत्त्व देनेसे, इसके प्रभावसे प्रभावित होनेसे वास्तविक ज्ञानकी ओर दृष्टि जाती ही नहीं—यही अज्ञानके द्वारा ज्ञानका आवृत होना है।
इन्द्रियोंका ज्ञान सीमित है। इन्द्रियोंके ज्ञानकी अपेक्षा बुद्धिका ज्ञान असीम है। परन्तु बुद्धिका ज्ञान मन और इन्द्रियोंके ज्ञान—(जानने और न जानने—)को ही प्रकाशित करता है अर्थात् बुद्धि अपने विषय-पदार्थोंको ही प्रकाशित करती है। बुद्धि जिस प्रकृतिका कार्य है और जिस बुद्धिका कारण प्रकृति है, उस प्रकृतिको बुद्धि प्रकाशित नहीं करती। बुद्धि जब प्रकृतिको भी प्रकाशित नहीं कर सकती, तब प्रकृतिसे अतीत जो चेतन-तत्त्व है, उसे कैसे प्रकाशित कर सकती है! इसलिये बुद्धिका ज्ञान अधूरा ज्ञान है।
‘तेन मुह्यन्ति जनत्वः’—भगवान्ने ‘जनत्वः’ पद देकर मानो मनुष्योंकी ताड़ना की है कि जो मनुष्य अपने
परिशिष्ट भाव—जैसे अन्धकारमें सूर्यको ढकनेकी सामर्थ्य नहीं है, ऐसे ही अज्ञानमें ज्ञानको ढकनेकी सामर्थ्य नहीं है। अस्वाभाविकको स्वाभाविक मान लिया—यही अज्ञान है, जिससे मनुष्य मोहित हो जाता है। अतः अज्ञानके द्वारा ज्ञानको ढकनेकी बात केवल मूढ़तावश की गयी मान्यता है, वास्तविकता नहीं है। मनुष्य चाहे तो अपने विवेकको महत्त्व देकर इस मूढ़ताको मिटा सकता है (गीता—पाँचवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।
वास्तवमें ज्ञान नहीं ढकता, प्रत्युत बुद्धि ही ढकती है। परन्तु मनुष्यको ज्ञान ढका हुआ दीखता है, इसलिये यहाँ ‘आवृत’ शब्द दिया है। यही बात तीसरे अध्यायके उनालीसवें श्लोकमें भी ‘आवृतं ज्ञानमेतेन’ पदोंसे कही गयी है। अज्ञान अभावरूप है, उसकी सत्ता नहीं है। जिसका अभाव है, उससे आवरण नहीं हो सकता। अतः उलटा ज्ञान अर्थात् अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकताका आरोप ही अज्ञान है। अगर अस्वाभाविकता मिटकर स्वाभाविकता हो जाय तो सर्वव्यापी परमात्माके साथ एकताका अनुभव हो जायगा। व्यक्तित्व ही पाप-पुण्यको, सुकृत-दुष्कृतको ग्रहण करता है; अतः सर्वव्यापी परमात्माके साथ एकताका अनुभव होनेपर अर्थात् व्यक्तित्व मिटनेपर फिर पाप-पुण्यका ग्रहण नहीं होता।
अज्ञान अर्थात् उलटे ज्ञान (अस्वाभाविकमें स्वाभाविक बुद्धि) के कारण मनुष्य ‘जन्तु’ हो जाता है—‘तेन मुह्यन्ति जनत्वः।’ इसी तरह जड़से सम्बन्ध माननेके कारण जीव ‘जगत्’ (जड़) हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका
विवेकको महत्त्व नहीं देते, वे वास्तवमें जन्तु अर्थात् पशु ही हैं; क्योंकि उनके और पशुओंके ज्ञानमें कोई अन्तर नहीं है। आकृतिमात्रसे कोई मनुष्य नहीं होता। मनुष्य वही है, जो अपने विवेकको महत्त्व देता है। इन्द्रियोंके द्वारा भोग तो पशु भी भोगते हैं; पर उन भोगोंको भोगना मनुष्य-जीवनका लक्ष्य नहीं है। मनुष्य-जीवनका लक्ष्य सुख-दुःखसे रहित तत्त्वको प्राप्त करना है। जिनको अपने कर्तव्य और अकर्तव्यका ठीक-ठीक ज्ञान है, वे मनुष्य साधक कहलानेयोग्य हैं।
अपनेको कर्मोंका कर्ता मान लेना तथा कर्मफलमें हेतु बनकर सुखी-दुःखी होना ही अज्ञानसे मोहित होना है। पाप-पुण्य हमें करने पड़ते हैं, इनसे हम कैसे छूट सकते हैं? सुखी-दुःखी होना हमारे कर्मोंका फल है, इनसे हम अतीत कैसे हो सकते हैं?—इस प्रकारकी धारणा बना लेना ही अज्ञानसे मोहित होना है।
जीव स्वरूपसे अकर्ता तथा सुख-दुःखसे रहित है। केवल अपनी मूर्खताके कारण वह कर्ता बन जाता है और कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता है। इस मूढ़ता—(अज्ञान—) को ही यहाँ ‘तेन’ पदसे कहा गया है। इस मूढ़तासे अज्ञानी मनुष्य सुखी-दुःखी हो रहे हैं, इस बातको यहाँ ‘तेन मुह्यन्ति जनत्वः’ पदोंसे कहा गया है।
१-आहारनिद्राभयमैश्वनानि समानि चैतानि नृणां पशूनाम्।
ज्ञानं नराणामधिको विशेषो ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (चाणक्यनीति १७।१७)
‘आहार, निद्रा, भय और मैथुन—ये मनुष्यों और पशुओंमें समान ही हैं। मनुष्योंमें विशेषता यही है कि उनमें विवेक रहता है। विवेकसे शून्य मनुष्य तो पशुके समान है।’
२-अनित्याशुचिदुःखानात्समु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या। (योगदर्शन २।५)
‘अनित्यमें नित्य, अपवित्रमें पवित्र, दुःखमें सुख और अनात्मामें आत्मभावको अनुभूति अविद्या है।’
३८६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
तेरहवाँ श्लोक ) ।
जो हमसे घुला-मिला हुआ है, उस परमात्माको तो अपनेसे अलग मान लिया और जो हमसे अलग है, उस शरीरको अपनेसे घुला-मिला मान लिया—यह अज्ञान है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि अज्ञानके द्वारा ज्ञान ढका जानेके कारण सब जीव मोहित हो रहे हैं। अपने विवेकके द्वारा उस अज्ञानका नाश कर देनेपर जिस ज्ञानका उदय होता है, उसकी महिमा आगेके श्लोकमें कहते हैं।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
| तु | = परन्तु | अज्ञानम् | = अज्ञानका | आदित्यवत् | = सूर्यकी तरह |
|---|---|---|---|---|---|
| येषाम् | = जिन्होंने | नाशितम् | = नाश कर दिया है, | परम् | = परमतत्त्व |
| आत्मनः | = अपने जिस | तेषाम् | = उनका | परमात्माको | |
| ज्ञानेन | = ज्ञानके द्वारा | तत् | = वह | प्रकाशयति | = प्रकाशित कर |
| तत् | = उस | ज्ञानम् | = ज्ञान | देता है। |
व्याख्या—‘ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः’—पौछेके श्लोकमें कही बातसे विलक्षण बात बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पदका प्रयोग किया गया है।
पौछेके श्लोकमें जिसको ‘अज्ञानेन’ पदसे कहा था, उसको ही यहाँ ‘तत् अज्ञानम्’ पदसे कहा गया है।
अपनी सत्ताको और शरीरको अलग-अलग मानना ‘ज्ञान’ है और एक मानना ‘अज्ञान’ है।
उत्पत्ति-विनाशशील संसारके किसी अंशमें तो हमने अपनेको रख लिया अर्थात् मैं-पन (अहंता) कर लिया और किसी अंशको अपनेमें रख लिया अर्थात् मेरापन (ममता) कर लिया। अपनी सत्ताका तो निरन्तर अनुभव होता है और मैं-मेरापन बदलता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है; जैसे—पहले मैं बालक था और खिलौने आदि मेरे थे, अब मैं युवा या वृद्ध हूँ और स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि मेरे हैं। इस प्रकार मैं-मेरेपनके परिवर्तनका ज्ञान हमें है, पर अपनी सत्ताके परिवर्तनका ज्ञान हमें नहीं है—यह ज्ञान अर्थात् विवेक है।
मैं-मेरेपनको जड़के साथ न मिलाकर साधक अपने विवेकको महत्त्व दे कि मैं-मेरापन जिससे मिलाता हूँ, वह सब बदलता है; परन्तु मैं-मेरा कहलानेवाला मैं (मेरी सत्ता) वही रहता हूँ। जड़का बदलना और अभाव तो समझमें आता है, पर स्वयंका बदलना और अभाव किसीकी समझमें नहीं आता; क्योंकि स्वयंमें किंचित् भी परिवर्तन और अभाव कभी होता ही नहीं—इस विवेकके द्वारा मैं-मेरेपनका त्याग कर दे कि
शरीर ‘मैं’ नहीं और बदलनेवाली वस्तु ‘मेरी’ नहीं। यही विवेकके द्वारा अज्ञानका नाश करना है। परिवर्तनशीलके साथ अपरिवर्तनशीलका सम्बन्ध अज्ञानसे अर्थात् विवेकको महत्त्व न देनेसे है। जिसने विवेकको जाग्रत् करके परिवर्तनशील मैं-मेरेपनके सम्बन्धका विच्छेद कर दिया है, उसका वह विवेक सच्चिदानन्दधन परमात्माको प्रकाशित कर देता है अर्थात् अनुभव करा देता है।
‘तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्’—विवेकके सर्वथा जाग्रत् होनेपर परिवर्तनशीलकी निवृत्ति हो जाती है। परिवर्तनशीलकी निवृत्ति होनेपर अपने स्वरूपका स्वच्छ बोध हो जाता है, जिसके होते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्व प्रकाशित हो जाता है अर्थात् उसके साथ अभिन्नताका अनुभव हो जाता है।
यहाँ ‘परम्’ पद परमात्मतत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है। दूसरे अध्यायके उनसठवें श्लोकमें तथा तेरहवें अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भी परमात्मतत्त्वके लिये ‘परम्’ पद आया है।
‘प्रकाशयति’ पदका तात्पर्य है कि सूर्यका उदय होनेपर नयी वस्तुका निर्माण नहीं होता, प्रत्युत अन्धकारसे ढके जानेके कारण जो वस्तु दिखायी नहीं दे रही थी, वह दीखने लग जाती है। इसी प्रकार परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध है, पर अज्ञानके कारण उसका अनुभव नहीं हो रहा था। विवेकके द्वारा अज्ञान मिटते ही उस स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका अनुभव होने लग जाता है।
श्लोक १७]
- साधक-संजीवनी *
३८७
परिशिष्ट भाव —अज्ञानका नाश विवेकसे ही होता है, उद्योगसे नहीं—‘यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्य-चेतसः’ (गीता १५।११)। कारण कि अज्ञानका नाश क्रियासाध्य, परिश्रमसाध्य नहीं है। परिश्रम करनेसे शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहता है; क्योंकि शरीरसे सम्बन्ध जोड़े बिना परिश्रम नहीं होता। दूसरी बात, अज्ञानको हटानेका उद्योग करनेसे अज्ञान दूद होता है; क्योंकि उसकी सत्ता मानकर ही उसको हटानेका उद्योग करते हैं।
अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकताकी विपरीत भावना (अज्ञान) अपनेमें ही है। अतः विवेकका आदर करनेसे उसका निराकरण हो जाता है।
सम्बन्ध—जिस स्थितिमें सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है, उस स्थितिकी प्राप्तिके लिये आगेके श्लोकमें साधन बताते हैं।
तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्पषाः ॥ १७ ॥
तदात्मानः | = जिनका मन तदाकार हो रहा है, | परमात्मतत्त्वमें है, (ऐसे) | पापरहित होकर ---|---|---|--- तदबुद्धयः | = जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, | तत्परायणाः = परमात्मपरायण साधक | अपुनरावृत्तिम् = अपुनरावृत्ति (परमगति)को तन्निष्ठाः | = जिनकी स्थिति | ज्ञाननिर्धूतकल्पषाः = ज्ञानके द्वारा | गच्छन्ति = प्राप्त होते हैं।
व्याख्या —[परमात्मतत्त्वका अनुभव करनेके लिये दो प्रकारके साधन हैं—एक तो विवेकके द्वारा असत्का त्याग करनेपर सत्यमें स्वरूप-स्थिति स्वतः हो जाती है और दूसरा, सत्का चिन्तन करते-करते सत्की प्राप्ति हो जाती है। चिन्तनसे सत्की ही प्राप्ति होती है। असत्की प्राप्ति कर्मोंसे होती है, चिन्तनसे नहीं। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु कर्मोंसे मिलती है और नित्य परिपूर्ण तत्त्व चिन्तनसे मिलता है। चिन्तनसे परमात्मा कैसे प्राप्त होते हैं—इसकी विधि इस श्लोकमें बताते हैं।]
‘तदबुद्धयः’ —‘निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम ‘बुद्धि’ है। साधक पहले बुद्धिसे यह निश्चय करे कि सर्वत्र एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। संसारके उत्पन्न होनेसे पहले भी परमात्मा थे और संसारके नष्ट होनेके बाद भी परमात्मा रहेंगे। बीचमें भी संसारका जो प्रवाह चल रहा है, उसमें भी परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं। इस प्रकार परमात्माकी सत्ता-(होनेपन-) में अटल निश्चय होना ही ‘तदबुद्धयः’ पदका तात्पर्य है।
‘तदात्मानः’ —‘यहाँ ‘आत्मा’ शब्द मनका वाचक है। जब बुद्धिमें एक परमात्मतत्त्वका निश्चय हो जाता है, तब मनसे स्वतः-स्वाभाविक परमात्माका ही चिन्तन होने लगता है। सब क्रियाएँ करते समय यह चिन्तन अखण्ड रहता है कि सत्तारूपसे सब जगह एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। चिन्तनमें संसारकी सत्ता आती ही नहीं।
‘तन्निष्ठाः’ —‘जब साधकके मन और बुद्धि परमात्मामें लग जाते हैं, तब वह हर समय परमात्मामें अपनी (स्वयंकी) स्वतः-स्वाभाविक स्थितिका अनुभव करता है। जबतक मन-बुद्धि परमात्मामें नहीं लगते अर्थात् मनसे परमात्माका चिन्तन और बुद्धिसे परमात्माका निश्चय नहीं होता, तबतक परमात्मामें अपनी स्वाभाविक स्थिति होते हुए भी उसका अनुभव नहीं होता।
‘तत्परायणाः’ —‘परमात्मासे अलग अपनी सत्ता न रहना ही परमात्माके परायण होना है। परमात्मामें अपनी स्थितिका अनुभव करनेसे अपनी सत्ता परमात्माकी सत्तामें लीन हो जाती है और स्वयं परमात्मस्वरूप हो जाता है।
जबतक साधक और साधनकी एकता नहीं होती, तबतक साधन छूटता रहता है, अखण्ड नहीं रहता। जब साधकपन अर्थात् अहंभाव मिट जाता है, तब साधन साध्यरूप ही हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें साधन और साध्य—दोनोंमें नित्य एकता है।
‘ज्ञाननिर्धूतकल्पषाः’ —‘ज्ञान अर्थात् सत्-असत्के विवेककी वास्तविक जागृति होनेपर असत्की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। असत्के सम्बन्धसे ही पाप-पुण्यरूप कल्पष होता है, जिनसे मनुष्य बँधता है। असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर पाप-पुण्य मिट जाते हैं।
‘गच्छन्त्यपुनरावृत्तिम्’ —‘असत्का संग ही पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म-) का कारण है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य
३८८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ५
सदसद्योनिजन्मसु' (गीता १३।२१)। असत्का संग
सर्वथा मिटनेपर पुनरावृत्तिका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।
जो वस्तु एकदेशीय होती है, उसीका आना-जाना होता
है। जो वस्तु सर्वत्र परिपूर्ण है, वह कहाँसे आये और कहाँ
जाय ? परमात्मा सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, परिस्थिति आदिमें
एकरस परिपूर्ण रहते हैं। उनका कहीं आना-जाना नहीं होता।
इसलिये जो महापुरुष परमात्मस्वरूप ही हो जाते हैं, उनका
भी कहीं आना-जाना नहीं होता। श्रुति कहती है—
'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति'
(बृहदारण्यक० ४। ४। ६)
'उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही
होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।'
उसके कहलानेवाले शरीरको लेकर ही यह कहा जाता
है कि उसका पुनर्जन्म नहीं होता। वास्तवमें यहाँ 'गच्छन्ति'
पदका तात्पर्य है—वास्तविक बोध होना, जिसके होते ही
नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव—अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकताकी भावना मिटनेपर एक परमात्माके सिवाय अन्य किसीकी
स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती और साधक परमात्मस्वरूप ही हो जाता है, जो कि वास्तवमें स्वतःसिद्ध है। अतः उसके
पुनः संसार-बन्धनमें आनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता—'सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' (गीता १४। २)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित साधनद्वारा सिद्ध हुए महापुरुषका ज्ञान व्यवहारकालमें कैसा रहता है—इसे आगेके
श्लोकमें बताते हैं।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
पण्डिताः = ज्ञानी महापुरुष
विद्याविनय-
सम्पन्ने = विद्या-
विनययुक्त
ब्राह्मणे = ब्राह्मणमें
च = और
श्वपाके = चाण्डालमें
च = तथा
गवि = गाय,
हस्तिनि = हाथी (एवं)
शुनि = कुत्तेमें
एव = भी
समदर्शिनः = समरूप
परमात्माको
देखनेवाले होते हैं।
व्याख्या—'विद्याविनयसम्पन्ने ................. पण्डिताः
समदर्शिनः'—यहाँ ब्राह्मणके लिये दो विशेषण दिये गये
हैं—विद्यायुक्त और विनययुक्त अर्थात् ऐसा ब्राह्मण जो
विद्वान् भी है और विनम्र स्वभाववाला (ब्राह्मणपनके
अभिमानसे रहित) भी है। ब्राह्मण होनेसे वह जातिसे तो
ऊँचा है ही, साथ-ही-साथ विद्या और विनयसे भी सम्पन्न
है—यह ब्राह्मणत्वकी पूर्णता है। जहाँ पूर्णता होती है, वहाँ
अभिमान नहीं रहता। अभिमान वहीं रहता है, जहाँ पूर्णता
नहीं होती।
ब्राह्मण और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें
व्यवहारकी विषमता अनिवार्य है। इनमें समान बर्ताव शास्त्र
भी नहीं कहता, उचित भी नहीं और कर सकते भी नहीं।
जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है,
न कि चाण्डालका; दूध गायका ही पीया जाता है, न कि
कुतियाका; सवारी हाथीकी ही हो सकती है, न कि
कुत्तेकी। इन पाँचों प्राणियोंका उदाहरण देकर भगवान् यह
कह रहे हैं कि इनमें व्यवहारकी समता सम्भव न होनेपर
भी तत्त्वतः सबमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है।
महापुरुषोंकी दृष्टि उस परमात्मतत्त्वपर ही सदा-सर्वदा
रहती है। इसलिये उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती।
यहाँ एक शंका हो सकती है कि दृष्टि विषम हुए
बिना व्यवहारमें भिन्नता कैसे होगी ? इसका समाधान यह
है कि अपने शरीरके सब अंगों (मस्तक, पैर, हाथ, गुदा
आदि) में हमारी दृष्टि अर्थात् अपनेपन और हितकी
भावना समान रहती है, फिर भी हम उनके व्यवहारमें भेद
रखते हैं; जैसे—किसीको पैर लग जाय तो क्षमा-याचना
करते हैं, पर किसीको हाथ लग जाय तो क्षमा-याचना नहीं
करते। प्रणाम मस्तक और हाथोंसे करते हैं, पैरोंसे नहीं।
गुदासे हाथ लगनेपर हाथ धोते हैं, हाथसे हाथ लगनेपर
नहीं। इतना ही नहीं, एक हाथकी अँगुलियोंमें भी व्यवहारमें
भेद रहता है। किसीको तर्जनी अँगुली दिखाने और अँगूठा
दिखानेका भेद तो सब जानते ही हैं। इस प्रकार शरीरके
भिन्न-भिन्न अंगोंके व्यवहारमें तो भेद होता है, पर
आत्मीयतामें भेद नहीं होता। इसलिये शरीरके किसी भी
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
३८९
पीड़ित अंगकी उपेक्षा नहीं होती। व्यवहारमें भेद होनेपर भी पीड़ा मिटानेमें हम समानताका व्यवहार करते हैं। शरीरके सभी अंगोंके सुख-दुःखमें हमारा एक ही भाव रहता है (गीता—छठे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। इसी प्रकार प्राणियोंमें खान-पान, गुण, आचरण, जाति आदिका भेद होनेसे उनके साथ ज्ञानी महापुरुषोंके व्यवहारमें भी भेद होता है और होना भी चाहिये। परन्तु उन सब प्राणियोंमें एक ही परमात्मत्त्व परिपूर्ण होनेके कारण महापुरुषकी दृष्टिमें भेद नहीं होता। उन प्राणियोंके प्रति महापुरुषकी आत्मीयता, प्रेम, हित, दया आदिके भावमें कभी फर्क नहीं पड़ता। उनके अन्तःकरणमें राग-द्वेष, ममता, आसक्ति, अभिमान, पक्षपात, विषमता आदिका सर्वथा अभाव होता है। जैसे अपने शरीरके किसी अंगका दुःख दूर करनेकी चेष्टा स्वाभाविक होती है, ऐसे ही पता लगनेपर दूसरे प्राणीका दुःख दूर करनेकी और उसे सुख पहुँचानेकी चेष्टा भी उनके द्वारा स्वाभाविक होती है। यही कारण है कि भगवान्ने यहाँ महापुरुषोंको समदर्शी कहा है, न कि समवर्ती। गीतामें दूसरी जगह भी सम देखनेकी या समबुद्धिकी ही बात आयी है, जैसे—‘समबुद्धिविशिष्यते’ (६।९); ‘सर्वत्र समदर्शनः’ (६।२९); ‘आत्मीपम्येन सर्वत्र समं पश्यति’ (६।३२); ‘सर्वत्र समबुद्धयः’ (१२।४); ‘समं सर्वेषु भूतेषु’ ‘यः पश्यति स पश्यति’ (१३।२७); और ‘समं पश्यन् हि सर्वत्र’ (१३।२८)।
श्रीशंकराचार्यजी महाराज कहते हैं—
भावाद्भैतं सदा कुर्यात् क्रियाद्भैतं न कुरञ्चित्।
(तत्त्वोपदेश)
भावमें ही सदा अद्भैत होना चाहिये, क्रिया (व्यवहार) में कहीं नहीं।
समता-सम्बन्धी विशेष बात
आजकल समतापर विशेष चर्चा चल रही है। सबके साथ समताका बर्ताव करो—ऐसा प्रचार किया जा रहा है। परन्तु वास्तवमें समता किसे कहते हैं और वह कब आती है—इसे समझनेकी बड़ी आवश्यकता है।
समता कोई खेल-तमाशा नहीं है, प्रत्युत परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। जिनका मन समतामें स्थित हो जाता है, वे यहाँ जीते-जी ही संसारपर विजय प्राप्त कर लेते हैं और परब्रह्म परमात्माका अनुभव कर लेते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। यह समता तब आती है, जब दूसरोंका दुःख अपना दुःख और दूसरोंका सुख
अपना सुख हो जाता है। गीतामें भगवान् कहते हैं कि ‘हे अर्जुन! जो पुरुष अपने शरीरकी तरह मेरेको सब जगह सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सब जगह सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है (छठे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)।’
जैसे शरीरके किसी भी अंगमें पीड़ा होनेपर उसको दूर करनेकी लगन लग जाती है, ऐसे ही किसी प्राणीको दुःख, सन्ताप आदि होनेपर उसको दूर करनेकी लगन लग जाय, तब समता आती है। सन्तोंके लक्षणोंमें भी आया है—
‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३८।१)
जबतक अपने सुखकी लालसा है, तबतक चाहे जितना उद्योग कर लें, समता नहीं आयेगी। परन्तु जब हृदयसे यह लगन लग जायगी कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे? उनको आराम कैसे हो? उनको लाभ कैसे हो? उनका कल्याण कैसे हो? तब समता स्वतः आ जायगी। इसका आरम्भ सर्वप्रथम अपने घरसे करना चाहिये। हृदयमें ऐसा भाव हो कि किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख या कष्ट न पहुँचे, किसीका कभी अनिष्ट न हो। चाहे मैं कितना ही कष्ट पाऊँ, पर मेरे माता-पिता, स्त्री-पुत्र, भाई-भौजाई आदिको सुख होना चाहिये। घरवालोंको सुख पहुँचानेसे अपने हृदयमें शान्ति आयेगी ही। जहाँ अपने घरका भी सम्बन्ध नहीं है, वहाँ सुख पहुँचायेंगे तो विशेष आनन्दकी लहरें आने लग जायँगी। परन्तु ममतापूर्वक सुख पहुँचानेसे हमारी उन्नति नहीं होगी। जहाँ हमारी ममता न हो, वहाँ सुख पहुँचायें अथवा जहाँ हम ममतापूर्वक सुख पहुँचाते हैं, वहाँसे अपनी ममता हटा लें— दोनोका परिणाम एक ही होगा।
चित्रकूटमें लक्ष्मणजी भगवान् राम और सीताकी सेवा कैसे करते हैं, यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरिरीहि॥
(मानस २।१४२।१)
अर्थात् लक्ष्मणजी भगवान् राम और सीताजीकी वैसे ही सेवा करते हैं, जैसे अज्ञानी मनुष्य अपने शरीरकी सेवा करता है। अपने शरीरकी सेवा करना, उसे सुख पहुँचाना समझदारी नहीं है। अपने शरीरकी सेवा तो पशु भी करते हैं। जैसे, बँदरीकी अपने बच्चेपर इतनी ममता रहती है कि उसके मरनेके बाद भी वह उसके शरीरको पकड़े हुए चलती है, छोड़ती नहीं। परन्तु जब कोई वस्तु खानेके लिये मिल
३९०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
जाती है, तब वह स्वयं तो खा लेती है, पर बच्चेको नहीं खाने देती। बच्चा खानेकी चेष्टा करता है तो उसे ऐसी घुड़की मारती है कि वह चीं-चीं करते भाग जाता है। अतः ममताके रहते हुए समताका आना असम्भव है।
जिससे हमें कुछ लेना नहीं है, जिससे हमारा कोई स्वार्थ नहीं है, ऐसे व्यक्तिके साथ भी हम प्रेमपूर्वक अच्छा-से-अच्छा बर्ताव करें, जिससे उसका हित हो। कोई व्यक्ति मार्गमें भटक गया है, उसे मार्गका पता नहीं है और वह हमसे पूछता है। हम उसे बड़ी प्रसन्नतासे मार्ग बतायें अथवा कुछ दूरतक उसके साथ चलें तो हमें हृदयमें प्रत्यक्ष सुखका, शान्तिका अनुभव होगा। परन्तु यदि हम जानते हुए भी उसे मार्ग नहीं बतायेंगे, तो हमारे हृदयमें सुख नहीं होगा। यह अनुभवकी बात है, कोई करके देख ले। किसीको प्यास लगी है तो उसे बता दे कि भाई, इधर आओ, इधर ठण्डा जल है। फिर हम अपना हृदय देखें। हमारे हृदयमें प्रसन्नता आयेगी, सुख आयेगा। यह सुख हमारा कल्याण करनेवाला है। दूसरा दुःख पाये, पर मैं सुख ले लूँ—यह सुख पतन करनेवाला है। इससे न तो व्यवहारमें हमारी उन्नति होगी और न परमार्थमें। हम सत्संगका आयोजन करते हैं। उसमें आनेवाले व्यक्तियोंके बैठनेकी व्यवस्था करते हैं तो उनसे प्रेमपूर्वक कहें कि आइये, यहाँ बैठिये। उन्हें वहाँ बैठायें, जहाँसे वे ठीक तरहसे सुन सकें। वे आरामसे कैसे बैठ सकें? ठीक तरहसे कैसे सुन सकें—ऐसा भाव रखकर उनसे बर्ताव करें। ऐसा करनेसे हमारे हृदयमें प्रत्यक्ष शान्ति आयेगी। पर वहाँ हुक्म चलायें कि क्या करते हो? इधर बैठो, इधर नहीं, तो बात वही होनेपर भी हृदयमें शान्ति नहीं आयेगी। भीतरमें जो अभिमान है, वह दूसरोंको चुभेगा, बुरा लगेगा। ऐसा बर्ताव करें और चाहें कि समता आ जाय, तो वह कभी आयेगी नहीं।
सबके हितमें जिसकी प्रीति हो गयी है, उन्हें भगवान् प्राप्त हो जाते हैं—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः’ (गीता १२।४)। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। वे प्राणिमात्रका पालन-पोषण करनेवाले हैं। आस्तिक-से-आस्तिक हो अथवा नास्तिक-से-नास्तिक, दोनोंके लिये भगवान्का विधान बराबर है। एक व्यक्ति बड़ा आस्तिक है, भगवान्को बहुत मानता है और उन्हें
पानेके लिये साधन-भजन करता है और एक व्यक्ति ऐसा नास्तिक है कि संसारसे भगवान्का खाता उठा देना चाहता है। भगवान्को माननेसे और भगवान्के कारण ही दुनिया दुःख पा रही है, भगवान् नामकी कोई चीज है ही नहीं—ऐसा उसके हृदयमें भाव है और ऐसा ही प्रचार करता है। ऐसे नास्तिक-से-नास्तिक व्यक्तिकी भी प्यास जल मिटाता है और यही जल आस्तिक-से-आस्तिक व्यक्तिकी भी प्यास मिटाता है। जलमें यह भेद नहीं है कि वह आस्तिककी प्यास ठीक तरहसे शान्त करे और नास्तिककी प्यास शान्त न करे। वह समान रीतिसे सबकी प्यास मिटाता है। ऐसे ही सूर्य समान रीतिसे सबको प्रकाश देता है, हवा समान रीतिसे सबको श्वास लेने देती है, पृथ्वी समान रीतिसे सबको रहनेका स्थान देती है। इस प्रकार भगवान्की रची हुई प्रत्येक वस्तु सबको समान रीतिसे मिलती है।
समताका अर्थ यह नहीं है कि समान रीतिसे सबके साथ रोटी-बेटी (भोजन और विवाह) का बर्ताव करें। व्यवहारमें समता तो महान् पतन करनेवाली चीज है। समान बर्ताव यमराजका, मौतका नाम है; क्योंकि उसके बर्तावमें विषमता नहीं होती। चाहे महात्मा हो, चाहे गृहस्थ हो, चाहे साधु हो, चाहे पशु हो, चाहे देवता हो, मौत सबकी बराबर होती है। इसलिये यमराजको ‘समवर्ती’ (समान बर्ताव करनेवाला) कहा गया है*। अतः जो समान बर्ताव करते हैं, वे भी यमराज हैं।
पशुओंमें भी समान बर्ताव पाया जाता है। कुत्ता ब्राह्मणकी रसोईमें जाता है तो पैर धोकर नहीं जाता। ब्राह्मणकी रसोई हो अथवा हरिजनकी, वह तो जैसा है, वैसा ही चला जाता है; क्योंकि यह उसकी समता है। पर मनुष्यके लिये यह समता नहीं है, प्रत्युत महान् पशुता है। समता तो यह है कि दूसरेका दुःख कैसे मिटे, दूसरेको सुख कैसे हो, आराम कैसे हो? ऐसी समता रखते हुए बर्तावमें पवित्रता, निर्मलता रखनी चाहिये। बर्तावमें पवित्रता रखनेसे अन्तःकरण पवित्र, निर्मल होता है। परन्तु बर्तावमें अपवित्रता रखनेसे, खान-पान आदि एक करनेसे अन्तःकरणमें अपवित्रता आती है, जिससे अशान्ति बढ़ती है। केवल बाहरका बर्ताव समान रखना शास्त्र और समाजकी मर्यादाके विरुद्ध है। इससे समाजमें संघर्ष पैदा होता है।
- ‘समवर्ती परेतारद्’ (अमरकोष १।१।५८)
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
३११
वर्णोंमें ब्राह्मण ऊँचे हैं और शूद्र नीचे हैं—ऐसा शास्त्रीका सिद्धान्त नहीं है। ब्राह्मण उपदेशके द्वारा, क्षत्रिय रक्षाके द्वारा, वैश्य धन-सम्पत्ति, आवश्यक वस्तुओंके द्वारा और शूद्र शरीरसे परिश्रम करके सभी वर्णोंकी सेवा करे। इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे अपने कर्तव्यपालनमें परिश्रम न करें, प्रत्युत अपने कर्तव्यपालनमें समान रीतिसे सभी परिश्रम करें। जिसके पास जिस प्रकारकी शक्ति, विद्या, वस्तु, कला आदि है, उसके द्वारा चारों ही वर्ण चारों वर्णोंकी सेवा करें, उनके कार्यमें सहायक बनें। परन्तु चारों वर्णोंकी सेवा करनेमें भेदभाव न रखें।
आजकल वर्णाश्रमको मिटाकर पार्टीबाजी हो रही है। आज वर्णाश्रममें इतनी लड़ाई नहीं है, जितनी लड़ाई पार्टीबाजीमें हो रही है—यह प्रत्यक्ष बात है। पहले लोग चारों वर्णों और आश्रमोंकी मर्यादामें चलते थे और सुख-शान्तिपूर्वक रहते थे। आज वर्णाश्रमकी मर्यादाको मिटाकर अनेक पार्टियाँ बनायी जा रही हैं, जिससे संघर्षको बढ़ावा मिल रहा है। गाँवोंमें सब लोगोंको पानी मिलना कठिन हो रहा है। जिनके अधिकारमें कुआँ है, वे कहते हैं कि तुमने उस पार्टीको वोट दिया है, इसलिये तुम यहाँसे पानी नहीं भर सकते। माँ, बाप और बेटा—तीनों अलग-अलग पार्टियोंको वोट देते हैं और घरमें लड़ते हैं। भीतरमें वैर बाँध लिया कि तुम उस पार्टीके और हम इस पार्टीके। कितना महान् अनर्थ हो रहा है!
यदि समता लानी हो तो दूसरा व्यक्ति किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय, मत आदिका क्यों न हो, उसे सुख देना है, उसका दुःख दूर करना है और उसका वास्तविक हित करना है। उनमें यह भेद हो सकता है कि आप राम-राम कहते हैं, हम कृष्ण-कृष्ण कहेंगे; आप वैष्णव हैं, हम शैव हैं; आप मुसलमान हैं, हम हिन्दू हैं, इत्यादि। परन्तु इससे कोई बाधा नहीं आती है। बाधा तब आती है, जब यह भाव रहता है कि वे हमारी पार्टीके नहीं हैं, इसलिये उनको चाहे दुःख होता रहे, पर हमें और हमारी पार्टीवालोंको सुख हो जाय। यह भाव महान् पतन करनेवाला है। इसलिये कभी किसी वर्ण आदिके मनुष्योंको कष्ट हो तो उनके हितकी चिन्ता समान रीतिसे होनी
चाहिये और उन्हें सुख हो तो उससे प्रसन्नता समान रीतिसे होनी चाहिये। जैसे, ब्राह्मणों और हरिजनोंमें संघर्ष हुआ। उसमें हरिजनोंकी हार और ब्राह्मणोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें प्रसन्नता हो अथवा ब्राह्मणोंकी हार और हरिजनोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें दुःख हो, तो यह विषमता है, जो बहुत हानिकारक है। ब्राह्मणों और हरिजनों—दोनोंके प्रति ही हमारे मनमें हितकी समान भावना होनी चाहिये। किसीका भी अहित हमें सहन न हो। किसीका भी दुःख हमें समान रीतिसे खटकना चाहिये। यदि ब्राह्मण दुःखी है तो उसे सुख पहुँचायें और यदि हरिजन दुःखी है तो उसे सुख न पहुँचायें—ऐसा पक्षपात नहीं होना चाहिये, प्रत्युत हरिजनको सुख पहुँचानेकी विशेष चेष्टा होनी चाहिये। हरिजनोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करते हुए भी ब्राह्मणोंके दुःखकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिये। इस प्रकार किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय आदिको लेकर पक्षपात नहीं होना चाहिये। सभीके प्रति समान रीतिसे हितका बर्ताव होना चाहिये। यदि कोई निम्नवर्ग है और उसे हम ऊँचा उठाना चाहते हों, तो उस वर्गके लोगोंके भावों और आचरणोंको शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना चाहिये; उनके पास वस्तुओंकी कमी हो तो उसकी पूर्ति करनी चाहिये; उनकी सहायता करनी चाहिये; परन्तु उन्हें उकसाकर उनके हृदयोंमें दूसरे वर्गके प्रति ईर्ष्या और द्वेषके भाव भर देना अत्यन्त ही अहितकर, घातक है तथा लोक-परलोकमें पतन करनेवाला है। कारण कि ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान आदि मनुष्यका महान् पतन करनेवाले हैं। यदि ऐसे भाव ब्राह्मणोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा और हरिजनोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा। उत्थान तो सद्भावों, सद्गुणों, सदाचारोंसे ही होता है।
भोजन, वस्त्र, मकान आदि निर्वाहकी वस्तुओंकी जिनके पास कमी है, उन्हें ये वस्तुएँ विशेषतासे देनी चाहिये, चाहे वे किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय आदिके क्यों न हों। सबका जीवनयापन सुखपूर्वक होना चाहिये। सभी सुखी हों, सभी नीरोग हों, सभीका हित हो, कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न हो*—ऐसा भाव रखते हुए यथायोग्य बर्ताव करना ही समता है, जो सम्पूर्ण मनुष्योंके लिये हितकर है।
परिशिष्ट भाव —ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी और कुत्ता—ये सभी तो हरदम बदल रहे हैं और अभावमें जा रहे हैं, पर उनमें रहनेवाला जो भावरूप सत्-तत्त्व है, वह कभी बदलता नहीं, प्रत्युत नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता
- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभागभवेत्॥
३९२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
है। ज्ञानीलोग उस सत्-तत्त्वको ही देखते हैं। जैसे चींटी रेतमें मिली हुई चीनीके दानेको पकड़कर निकाल लेती है, ऐसे ही ज्ञानियोंकी विवेकवती सूक्ष्म दृष्टि असत् संसारमें व्याप्त सत्-तत्त्वको पकड़ लेती है। तात्पर्य है कि ब्राह्मण हो या चाण्डाल, गाय हो या कुत्ता, हाथी हो या चींटी, विषम-से-विषम प्राणियोंमें भी उनकी दृष्टि सदा सम ही रहती है। व्यवहार विषम (यथायोग्य) होते हुए भी उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती।
सम्बन्ध—अब भगवान् पूर्वश्लोकमें वर्णित समताकी विशेष महिमा कहते हैं।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
| येषाम् | = जिनका | एव | = ही | ब्रह्म | = ब्रह्म |
|---|---|---|---|---|---|
| मनः | = अन्तःकरण | सर्गः | = सम्पूर्ण संसारको | निर्दोषम् | = निर्दोष (और) |
| साम्ये | = समतामें | जितः | = जीत लिया है | समम् | = सम है, |
| स्थितम् | = स्थित है, | अर्थात् वे | तस्मात् | = इसलिये | |
| तैः | = उन्होंने | जीवन्मुक्त | ते | = वे | |
| इह | = इस जीवित- | हो गये हैं; | ब्रह्मणि | = ब्रह्ममें (ही) | |
| अवस्थामें | हि | = क्योंकि | स्थिताः | = स्थित हैं। |
व्याख्या—'येषां साम्ये स्थितं मनः' —परमात्मतत्त्व अथवा स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होनेपर जब मन-बुद्धिमें राग-द्वेष, कामना, विषमता आदिका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब मन-बुद्धिमें स्वतः-स्वाभाविक समता आ जाती है, लानी नहीं पड़ती। बाहरसे देखनेपर महापुरुष और साधारण पुरुषमें खाना-पीना, चलना-फिरना आदि व्यवहार एक-सा ही दीखता है, पर महापुरुषोंके अन्तःकरणमें निरन्तर समता, निर्दोषता, शान्ति आदि रहती है और साधारण पुरुषोंके अन्तःकरणमें विषमता, दोष, अशान्ति आदि रहती है।
जैसे, पूर्वमें और पश्चिममें—दोनों ओर पर्वत हों, तो पूर्वमें सूर्यका उदय होना नहीं दीखता; परन्तु पश्चिममें स्थित पर्वतकी चोटीपर प्रकाश दीखनेसे सूर्यके उदय होनेमें कोई सन्देह नहीं रहता। कारण कि सूर्यका उदय हुए बिना पश्चिमके पर्वतपर प्रकाश दीखना सम्भव ही नहीं। ऐसे ही जिनके मन-बुद्धिपर मान-अपमान, निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख आदिका कोई असर नहीं पड़ता तथा जिनके मन-बुद्धि राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंसे सर्वथा रहित हैं, उनकी स्वरूपमें स्वाभाविक स्थिति अवश्य होती है। कारण कि स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिके बिना मन-बुद्धिमें अटल और एकरस समताका रहना सम्भव ही नहीं है।
'इहैव तैर्जितः सर्गः' —'यहाँ 'तैः' पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य यह है कि सभी मनुष्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति
कर सकते हैं और सम्पूर्ण संसारपर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
'इह एव' पदोंका तात्पर्य है कि मनुष्य जीते-जी वर्तमानमें ही, यहीं संसारको जीत सकता है अर्थात् संसारसे मुक्त हो सकता है।
शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदि सब 'पर' हैं और जो इनके अधीन रहता है, उसे 'पराधीन' कहते हैं। इन शरीरादि वस्तुओंमें महत्त्वबुद्धि होना तथा इनकी आवश्यकताका अनुभव करना अर्थात् इनकी कामना करना ही इनके अधीन होना है। पराधीन पुरुष ही वास्तवमें पराजित (हारा हुआ) है। जबतक पराधीनता नहीं छूटती, तबतक वह पराजित ही रहता है।
जिसके मनमें सांसारिक वस्तुओंकी कामना है, वह मनुष्य अगर दूसरे प्राणी, राज्य आदिपर विजय प्राप्त कर ले तो भी वह वास्तवमें पराजित ही है। कारण कि वह उन पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि रखता है और अपने जीवनको उनके अधीन मानता है। शरीरसे विजय तो पशु भी प्राप्त कर लेता है, पर वास्तविक विजय हृदयसे वस्तुकी अधीनता दूर होनेपर ही प्राप्त होती है।
पराजित व्यक्ति ही दूसरेको पराजित करना चाहता है, दूसरेको अपने अधीन बनाना चाहता है। वास्तवमें अपनेको पराजित किये बिना कोई दूसरेको पराजित कर ही नहीं
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
३१३
सकता; जैसे—कोई राजा या विद्वान् किसी दूसरेपर विजय प्राप्त करना चाहता है तो उसे सबसे पहले अपनी सेना, सामर्थ्य, बुद्धि, विद्या आदिका सहारा लेना ही पड़ता है।
कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य पराधीन हो जाता है। यह पराधीनता कामनाकी पूर्ति न होनेपर अथवा पूर्ति होनेपर—दोनों ही अवस्थाओंमें ज्यों-की-त्यों रहती है। कामनाकी पूर्ति न होनेपर मनुष्य वस्तुके अभावके कारण पराधीनताका अनुभव करता है और कामनाकी पूर्ति होनेपर अर्थात् वस्तुके मिलनेपर वह उस वस्तुके पराधीन हो जाता है; क्योंकि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुमात्र 'पर' है। कामनाकी पूर्ति न होनेपर तो मनुष्यको पराधीनताका अनुभव होता है, पर कामनाकी पूर्ति होनेपर बुद्धिमें ऐसा अंधेरा छा जाता है कि पराधीन रहते हुए भी मनुष्यको पराधीनताका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत स्वाधीनताका अनुभव होता है!
ज्ञानी महापुरुषमें कामनाका सर्वथा अभाव होनेसे वह पूर्णतः स्वाधीन हो जाता है। स्वाधीन पुरुष ही विजयी होता है। परन्तु स्वाधीन पुरुषके मनमें कभी किसीको पराजित करनेका भाव नहीं आता। वह संसारकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकताका अनुभव नहीं करता, प्रत्युत संसार ही उसकी आवश्यकताका अनुभव करता है।
जिसने संसारको जीत लिया है, ऐसे समदर्शी महापुरुषको संसारका बड़ा-से-बड़ा सुख (प्रलोभन) भी आकृष्ट नहीं कर सकता और बड़ा-से-बड़ा दुःख भी विचलित नहीं कर सकता (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
उसके मनमें संसारके किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी किंचिन्मात्र भी कामना, वासना, स्मृहा, तृष्णा आदि नहीं रहती। यद्यपि उसे अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होता है तथा उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी होती है, तथापि अनुकूलता-प्रतिकूलताका उसके अन्तःकरणपर कोई असर नहीं पड़ता।
'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'—परमात्मतत्त्वमें दोष, विकार या विषमता है ही नहीं। जितने भी दोष या विषमताएँ आती हैं, वे सब प्रकृतिसे रागपूर्वक सम्बन्ध माननेसे ही आती हैं। परमात्मतत्त्व प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा निर्लिप्त है, इसलिये उसमें किंचिन्मात्र भी दोष या विषमता नहीं है।
'तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः'—परमात्मतत्त्व निर्दोष
होता, प्रत्युत बुद्धि ही स्थित होती है। मन ध्यानमें स्थित होता
और सम है, इसलिये जिन महापुरुषोंका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो गया है, वे परमात्मतत्त्वमें ही स्थित हैं।
असत्के संगसे ही सम्पूर्ण दोषों और विषमताओंकी उत्पत्ति होती है। संसार असत् है। असत् उसे कहते हैं, जो प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मूलमें जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। असत्से सम्बन्ध (तादात्म्य) रहते हुए दोषों और विषमताओंसे बचना असम्भव है। महापुरुषोंके अन्तःकरणमें असत्का महत्त्व न रहनेसे उनपर असत्का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। असत्का कोई प्रभाव न पड़नेसे उनका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो जाता है। निर्दोष और सम होनेसे उनकी परमात्मतत्त्वमें स्वतः-स्वाभाविक स्थिति हो जाती है, जो कि पहलेसे ही है। जैसे जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि अवश्य है; क्योंकि अग्निके बिना धुआँ सम्भव ही नहीं, ऐसे ही जिनके अन्तःकरणमें समता है, वे अवश्य ही परमात्मतत्त्वमें स्थित हैं; क्योंकि परमात्मतत्त्वमें स्थिति हुए बिना पूर्ण समता आनी सम्भव ही नहीं।
अपनी (स्वयंकी) स्थिति परमात्मतत्त्वमें अथवा समतामें होनेके कारण ही अन्तःकरणमें समता आती है। इसलिये अन्तःकरणमें समता आनेपर ही उन महापुरुषोंकी यह पहचान होती है कि वे परमात्मतत्त्वमें अथवा समतामें स्थित हैं। इसी समताको गीताने 'योग' कहा है—'समत्वं योग उच्यते' (२।४८), और इसकी प्राप्तिको ही गीता मनुष्य-जन्मकी पूर्णता मानती है।
ज्ञानयोगका यह प्रकरण तेरहवें श्लोकसे चला है। पंद्रहवें श्लोकके अन्तमें आये 'जन्तवः' पदसे बहुवचनका प्रयोग आरम्भ हुआ है, जो इस उन्नीसवें श्लोकतक चला है। सबमें बहुवचन आनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य मोहित हो रहे थे, वे सब-के-सब परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु प्रस्तुत श्लोकमें 'ब्रह्मणि' पदमें एकवचन आया है, जिसका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण मनुष्योंको एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। मुक्ति चाहे ब्राह्मणकी हो अथवा चाण्डालकी, दोनोंको एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती है। भेद केवल शरीरोंको लेकर है, जो उपादेय है। तत्त्वको लेकर कोई भेद नहीं है। पहले जितने सनकादिक महात्मा हुए हैं, उनको जो तत्त्व प्राप्त हुआ है, वही तत्त्व आज भी प्राप्त होता है।
वाचक समझना चाहिये; क्योंकि समतामें मन स्थित नहीं है। यह प्रकरण भी स्थिरबुद्धिका है। मनकी स्थिरता केवल
३९४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
ध्यानावस्थामें रहती है, व्यवहारमें नहीं; परन्तु बुद्धिकी स्थिरता निरन्तर रहती है। कल्याण मनकी स्थिरतामें नहीं होता, प्रत्युत बुद्धिकी स्थिरतासे होता है। मनकी स्थिरतासे सिद्धियाँ पैदा होती हैं। अतः मनकी स्थिरता इतनी ऊँची नहीं है, जितनी बुद्धिकी स्थिरता। भगवान्ने भी दूसरे अध्यायमें स्थितप्रज्ञ (स्थिरबुद्धि) होनेकी महिमा कही है। अगले श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है—‘स्थिरबुद्धिरसम्भूतो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः’।
साधक भूलसे अपनेको तत्त्वज्ञ न मान ले, इसलिये यह पहचान बतायी है कि अगर बुद्धिमें समता नहीं आयी है तो समझ लेना चाहिये कि अभी तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, केवल वहम हुआ है! बुद्धिकी समताका स्वरूप है—राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि न होना। तत्त्वप्राप्ति होनेपर बुद्धिमें निरन्तर समता रहती है। इस समतासे बुद्धिका कभी व्युत्थान अथवा वियोग नहीं होता।
जिनकी बुद्धि समतामें स्थित है, उनमें राग-द्वेष नहीं रहते। उनकी यह समबुद्धि स्वतः अटल बनी रहती है कि सब कुछ एक परमात्मा ही हैं। जब एक परमात्मतत्त्वे सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं, तो फिर कौन द्वेष करे और किससे करे? जब एक ही सत्ता अटल अनुभवमें आ जाती है, तब कोई कामना नहीं रहती और अशान्ति भी नहीं रहती।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिस स्थितिका वर्णन हुआ है, उसकी प्राप्तिका साधन तथा सिद्धके लक्षणोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्भूतो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
प्रियम् = (जो) प्रियको प्राप्य = प्राप्त होकर न, प्रहृष्येत् = हर्षित न हो च = और अप्रियम् = अप्रियको
प्राप्य = प्राप्त होकर न, उद्विजेत् = उद्विग्न न हो, स्थिरबुद्धिः = (वह) स्थिरबुद्धिवाला,
असम्भूतः = मुद्भूतारहित (ज्ञानी) ब्रह्मविद् = (तथा) ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्मणि = ब्रह्ममें स्थितः = स्थित है।
व्याख्या—‘न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्’—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, शास्त्र आदिके अनुकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होना ही ‘प्रिय’ को प्राप्त होना है।
शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, शास्त्र आदिके प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होना ही ‘अप्रिय’ को प्राप्त होना है।
प्रिय और अप्रियको प्राप्त होनेपर भी साधकके अन्तःकरणमें हर्ष और शोक नहीं होने चाहिये। यहाँ प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिका यह अर्थ नहीं है कि साधकके हृदयमें अनुकूल या प्रतिकूल प्राणी-पदार्थोंके प्रति राग या द्वेष है, प्रत्युत यहाँ उन प्राणी-पदार्थोंकी प्राप्तिके ज्ञानको ही प्रिय और अप्रियकी प्राप्ति कहा गया है। प्रिय या अप्रियकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिका ज्ञान होनेमें कोई दोष नहीं है। अन्तःकरणमें उनकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिका असर पड़ना अर्थात् हर्ष-शोकादि विकार होना ही दोष है।
प्रियता और अप्रियताका ज्ञान तो अन्तःकरणमें होता है, पर हर्षित और उद्विग्न कर्ता होता है। अहंकारसे मोहित
अन्तःकरणवाला पुरुष प्रकृतिके करणोंद्वारा होनेवाली क्रियाओंको लेकर ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मान लेता है तथा हर्षित और उद्विग्न होता रहता है। परन्तु जिसका मोह दूर हो गया है, जो तत्त्ववेत्ता है, वह ‘गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’—ऐसा जानकर अपनेमें (स्वरूपमें) वास्तविक अकर्तृत्वका अनुभव करता है (गीता—तीसरे अध्यायका अष्टादिसर्वा श्लोक)। स्वरूपका हर्षित और उद्विग्न होना सम्भव ही नहीं है।
‘स्थिरबुद्धिः’—स्वरूपका ज्ञान स्वयंके द्वारा ही स्वयंको होता है। इसमें ज्ञाता और ज्ञेयका भाव नहीं रहता। यह ज्ञान करण-निरपेक्ष होता है अर्थात् इसमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि किसी करणकी अपेक्षा नहीं होती। करणोंसे होनेवाला ज्ञान स्थिर तथा सन्देहरहित नहीं होता, इसलिये वह अल्पज्ञान है। परन्तु स्वयं-(अपने होनेपन-) का ज्ञान स्वयंको ही होनेसे उसमें कभी परिवर्तन या सन्देह नहीं होता। जिस महापुरुषको ऐसे करण-निरपेक्ष ज्ञानका अनुभव हो गया है, उसकी कही जानेवाली बुद्धिमें यह ज्ञान इतनी दृढ़तासे उत्तर आता है कि उसमें कभी
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
३९५
विकल्प, सन्देह, विपरीत भावना, असम्भावना आदि होती ही नहीं। इसलिये उसे 'स्थिरबुद्धिः' कहा गया है।
'असम्भूहः'—जो परमात्मतत्त्व सदा-सर्वत्र विद्यमान है, उसका अनुभव न होना और जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, उस उत्पत्ति-विनाशशील संसारको सत्य मानना—ऐसी मूढ़ता साधारण मनुष्यमें रहती है। इस मूढ़ताका जिसमें सर्वथा अभाव हो गया है, उसे ही यहाँ 'असम्भूहः' कहा गया है।
'ब्रह्मवित्'—परमात्मासे अलग होकर परमात्माका अनुभव नहीं होता। परमात्माका अनुभव होनेमें अनुभविता, अनुभव और अनुभाव्य—यह त्रिपुटी नहीं रहती, प्रत्युत त्रिपुटीरहित अनुभवमात्र (ज्ञानमात्र) रहता है। वास्तवमें ब्रह्मको जाननेवाला कौन है—यह बताया नहीं जा सकता। कारण कि ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मसे अभिन्न हो जाता है*, इसलिये वह अपनेको ब्रह्मवित् मानता ही नहीं अर्थात् उसमें 'मैं ब्रह्मको जानता हूँ' ऐसा अभिमान नहीं रहता।
परिशिष्ट भाव— सुषुप्त और मूच्छाओं मनुष्यका शरीरसे अज्ञानपूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद होता है अर्थात् मन अविद्यामें लीन होता है; अतः इन अवस्थाओंमें मनुष्यको प्रिय और अप्रियका, शारीरिक पीड़ा आदिका ज्ञान ही नहीं होता। परन्तु जीवनमुक्त महापुरुषका शरीरसे ज्ञानपूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद होता है। इसलिये उसको प्रिय और अप्रियका, शरीरकी पीड़ा आदिका ज्ञान तो होता है, पर उनसे वह हर्षित-उद्विग्न, सुखी-दुःखी नहीं होता। उसकी शरीर-इन्द्रियां-मन-बुद्धिकी परवशता मिट जाती है।
ब्रह्मको जानना और उसमें स्थित होना—दोनों एक ही हैं।
सम्बन्ध—ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव किस प्रकार होता है, इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।
बाह्यस्पर्शेष्बसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
बाह्यस्पर्शेषु | = बाह्यस्पर्श (प्राकृत वस्तुमात्रके सम्बन्ध) में | आत्मनि | = अन्तःकरणमें | ब्रह्मयोगयुक्तात्मा | = ब्रह्ममें ---|---|---|---|---|--- असक्तात्मा | = आसक्तिरहित | यत् | = जो | | अभिन्नभावसे | अन्तःकरणवाला | सुखम् | = (सात्त्विक) सुख है, (उसको) | | स्थित मनुष्य | साधक | विन्दति | = प्राप्त होता है। (फिर) | अक्षयम् | = अक्षय | | सः | = वह | सुखम् | = सुखका | | | | अश्नुते | = अनुभव करता है।
व्याख्या— 'बाह्यस्पर्शेष्बसक्तात्मा'—परमात्माके अतिरिक्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिमें तथा शब्द, स्पर्श आदि विषयोंके संयोगजन्य सुखमें जिसकी आसक्ति मिट गयी है, ऐसे साधकके लिये यहाँ ये पद
प्रयुक्त हुए हैं। जिन साधकोंकी आसक्ति अभी मिटी नहीं है, पर जिनका उद्देश्य आसक्तिको मिटानेका हो गया है, उन साधकोंको भी आसक्तिरहित मान लेना चाहिये। कारण कि उद्देश्यकी दृढ़ताके कारण वे भी शीघ्र ही आसक्तिसे
- 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्डक० ३।२।९); 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' (बृहदारण्यक० ४।४।६)
३९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
छूट जाते हैं।
पूर्वश्लोकमें वर्णित ‘प्रियको प्राप्त होकर हर्षित और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न नहीं होना चाहिये’—ऐसी स्थितिको प्राप्त करनेके लिये बाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित होना आवश्यक है।
उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुमात्रका नाम ‘बाह्यस्पर्श’ है, चाहे उसका सम्बन्ध बाहरसे हो या अन्तःकरणसे। जबतक बाह्यस्पर्शमें आसक्ति रहती है, तबतक अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता। बाह्यस्पर्श निरन्तर बदलता रहता है, पर आसक्तिके कारण उसके बदलनेपर दृष्टि नहीं जाती और उसमें सुखका अनुभव होता है। पदार्थोंको अपरिवर्तनशील, स्थिर माननेसे ही मनुष्य उनसे सुख लेता है। परन्तु वास्तवमें उन पदार्थोंमें सुख नहीं है। सुख पदार्थोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही होता है। इसीलिये सुषुप्तिमें जब पदार्थोंके सम्बन्धकी विस्मृति हो जाती है, तब सुखका अनुभव होता है।
वहम तो यह है कि पदार्थोंके बिना मनुष्य जी नहीं सकता, पर वास्तवमें देखा जाय तो बाह्य पदार्थोंके वियोगके बिना मनुष्य जी ही नहीं सकता। इसीलिये वह नींद लेता है; क्योंकि नींदमें पदार्थोंको भूल जाते हैं। पदार्थोंको भूलनेपर भी नींदसे जो सुख, ताजगी, बल, नीरोगता, निश्चिन्तता आदि मिलती है, वह जाग्रतमें पदार्थोंके संयोगसे नहीं मिल सकती। इसलिये जाग्रतमें मनुष्यको विश्राम पानेकी, प्राणी-पदार्थोंसे अलग होनेकी इच्छा होती है। वह नींदको अत्यन्त आवश्यक समझता है; क्योंकि वास्तवमें पदार्थोंके वियोगसे ही मनुष्यको जीवन मिलता है।
नींद लेते समय दो बातें होती हैं—एक तो मनुष्य बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहता है और दूसरी, उसमें यह भाव रहता है कि नींद लेनेके बाद अमुक कार्य करना है। इन दोनों बातोंमें पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद चाहना तो स्वयंकी इच्छा है, जो सदा एक ही रहती है; परन्तु कार्य करनेका भाव बदलता रहता है। कार्य करनेका भाव प्रबल रहनेके कारण मनुष्यकी दृष्टि पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेदकी तरफ नहीं जाती। वह पदार्थोंका सम्बन्ध रखते हुए ही नींद लेता है और जागता है।
यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी तो नहीं रहता, पर सम्बन्ध रह जाता है! इसका कारण यह है कि स्वयं (अविनाशी चेतन) जिस सम्बन्धको अपनेमें मान लेता है, वह मिटता नहीं। इस माने हुए सम्बन्धको
मिटानेका उपाय है—अपनेमें सम्बन्धको न माने। कारण कि प्राणी-पदार्थोंसे सम्बन्ध वास्तवमें है नहीं, केवल माना हुआ है। मानी हुई बात न माननेपर टिक नहीं सकती और मान्यताको पकड़े रहनेपर किसी अन्य साधनसे मिट नहीं सकती। इसलिये माने हुए सम्बन्धकी मान्यताको वर्तमानमें ही मिटा देना चाहिये। फिर मुक्ति स्वतःसिद्ध है।
बाह्य पदार्थोंका सम्बन्ध अवास्तविक है, पर परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तविक है। मनुष्य सुखकी इच्छासे बाह्य पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, पर परिणाममें उसे दुःख-ही-दुःख प्राप्त होता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अनुभव करनेसे बाह्य पदार्थोंकी आसक्ति मिट जाती है।
‘विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्’—बाह्य पदार्थोंकी आसक्ति मिटनेपर अन्तःकरणमें सात्त्विक सुखका अनुभव हो जाता है। बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धसे होनेवाला सुख राजस होता है। जबतक मनुष्य राजस सुख लेता रहता है, तबतक सात्त्विक सुखका अनुभव नहीं होता। राजस सुखमें आसक्तिरहित होनेसे ही सात्त्विक सुखका अनुभव होता है।
‘स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा’—संसारसे राग मिटते ही ब्रह्ममें अभिन्न भावसे स्वतः स्थिति हो जाती है। जैसे अन्धकारका नाश होना और प्रकाश होना—दोनों एक साथ ही होते हैं, फिर भी पहले अन्धकारका नाश होना और फिर प्रकाश होना माना जाता है। ऐसे ही रागका मिटना और ब्रह्ममें स्थित होना—दोनों एक साथ होनेपर भी पहले रागका नाश ‘बाह्यस्पर्शोव्वसक्तात्मा’ और फिर ब्रह्ममें स्थिति ‘ब्रह्मयोगयुक्तात्मा’ मानी जाती है। जैसे तेरहवें अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रज्ञ-(जीवात्मा-) के द्वारा अपनेको क्षेत्र-(शरीर-)से सर्वथा अलग अनुभव करनेकी बात आयी है और फिर दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञके द्वारा अपनेको परमात्मत्वसे सर्वथा अभिन्न अनुभव करनेकी बात आयी है। ऐसे ही यहाँ पहले ‘बाह्यस्पर्शोव्वसक्तात्मा’ पदसे शरीर-संसारसे अपनेको सर्वथा अलग अनुभव करनेकी बात बताकर फिर ‘ब्रह्मयोगयुक्तात्मा’ पदसे अपनेको परमात्मत्वसे सर्वथा अभिन्न अनुभव करनेकी बात बतायी गयी है।
भोगोंसे विरक्ति होकर सात्त्विक सुख मिलनेके बाद ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं ज्ञानी हूँ’, ‘मैं निर्विकार हूँ’, ‘मेरे लिये कोई कर्तव्य नहीं है’ इस प्रकार ‘अहम्’ का सूक्ष्म अंश शेष रह जाता है। उसकी निवृत्तिके लिये एकमात्र परमात्मत्वसे अभिन्नताका अनुभव करना आवश्यक है। कारण कि
श्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
३९७
परमात्मतत्त्वसे सर्वथा एक हुए बिना अपनी सत्ता, अपने
व्यक्तित्व (परिच्छिन्नता या एकदेशीयता) का सर्वथा
अभाव नहीं होता।
'सुखमक्षयमश्नुते' - जबतक साधक सात्त्विक सुखका
उपभोग करता रहता है, तबतक उसमें सूक्ष्म 'अहम्',
सूक्ष्म परिच्छिन्नता रहती है। सात्त्विक सुखका भी उपभोग
न करनेसे 'अहम्' का सर्वथा अभाव हो जाता है और
साधकको परमात्मस्वरूप, चिन्मय और नित्य एकरस
रहनेवाले अविनाशी सुखका अनुभव हो जाता है। इसी
अक्षय सुखको 'आत्यन्तिक सुख' (छठे अध्यायका इक्कीसवाँ
श्लोक), 'अत्यन्त-सुख' (छठे अध्यायका अट्ठाईसवाँ
श्लोक), 'ऐकान्तिक सुख' (चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ
श्लोक) आदि नामोंसे कहा गया है। इसका अनुभव होनेपर
उस परमात्मतत्त्वमें स्वाभाविक ही एक आकर्षण होता है,
जिसे प्रेम कहते हैं (गीता- अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ
श्लोक)। इस प्रेममें कभी कमी नहीं आती, प्रत्युत यह
उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहता है। उस तत्त्वका प्रसंग चलनेपर,
उसपर विचार करनेपर पहलेसे कुछ नयापन दीखता है-
यही प्रेमका प्रतिक्षण बढ़ना है। इसमें एक समझनेकी बात
यह है कि प्रेमके प्रतिक्षण बढ़नेपर भी यदि 'पहले कमी
थी और अब पूर्ति हो गयी' ऐसा प्रतीत होता है, तो यह
साधन-अवस्था है, यदि नयापन दीखनेपर भी 'पहले कमी
थी और अब पूर्ति हो गयी' ऐसा प्रतीत नहीं होता, तो
यह सिद्ध-अवस्था है।
सम्बन्ध-पूर्वश्लोकमें भगवान्ने विषयोंसे विरक्त पुरुषको अक्षय सुखकी प्राप्ति बतायी। अब विषयोंसे विरक्ति
कैसे हो-इसका आगेके श्लोकमें विवेचन करते हैं।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
हि
कौन्तेय
ये
संस्पर्शजाः
= क्योंकि
= हे कुन्तीनन्दन !
= जो
= इन्द्रियों और
विषयोंके संयोगसे
भोगाः
ते
आद्यन्तवन्तः
पैदा होनेवाले
= भोग (सुख) हैं,
= वे
= आदि-अन्तवाले
(और)
दुःखयोनयः, एव = दुःखके ही
कारण हैं। (अतः)
बुधः
तेषु
न, रमते
= विवेकशील मनुष्य
= उनमें
= रमण नहीं करता।
व्याख्या-'ये हि संस्पर्शजा भोगाः'-शब्द, स्पर्श,
रूप, रस और गन्ध-इन विषयोंसे इन्द्रियोंका रागपूर्वक
सम्बन्ध होनेपर जो सुख प्रतीत होता है, उसे 'भोग' कहते
हैं। सम्बन्ध-जन्य अर्थात् इन्द्रिय-जन्य भोगमें मनुष्य कभी
स्वतन्त्र नहीं है। सुख-सुविधा और मान-बड़ाई मिलनेपर
प्रसन्न होना भोग है। अपनी बुद्धिमें जिस सिद्धान्तका आदर
है, दूसरे व्यक्तिसे उसी सिद्धान्तकी प्रशंसा सुनकर जो
प्रसन्नता होती है, सुख होता है, वह भी एक प्रकारका भोग
ही है। तात्पर्य यह है कि परमात्माके सिवाय जितने भी
प्रकृतिजन्य प्राणी, पदार्थ, परिस्थितियाँ, अवस्थाएँ आदि हैं,
उनसे किसी भी प्रकृतिजन्य करणके द्वारा सुखकी अनुभूति
करना भोग ही है।
शास्त्रनिषिद्ध भोग तो सर्वथा त्याज्य हैं ही, शास्त्र-
विहित भोग भी परमात्मप्राप्तिमें बाधक होनेसे त्याज्य ही
हैं। कारण कि जडताके सम्बन्धके बिना भोग नहीं होता,
जब कि परमात्मप्राप्तिके लिये जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद
करना आवश्यक है।
'आद्यन्तवन्तः'-सम्पूर्ण भोग आने-जानेवाले हैं,
अनित्य हैं, परिवर्तनशील हैं (गीता-दूसरे अध्यायका
चौदहवाँ श्लोक)। ये कभी एकरूप रह सकते ही नहीं।
तात्पर्य है कि इन भोगोंकी स्वयंके साथ किसी भी अंशमें
एकता नहीं है। भोग आने-जानेवाले हैं और स्वयं सदा
रहनेवाला है। भोग जड हैं और स्वयं चेतन है। भोग
विकारी हैं और स्वयं निर्विकार है। भोग आदि-अन्तवाले
हैं और स्वयं आदि-अन्तसे रहित है। इसलिये स्वयंको
भोगोंसे कभी सुख नहीं मिल सकता। जीव परमात्माका
अंश है-'ममैवांशो जीवलोके' (गीता १५। ७),
इसलिये उसे परमात्मासे ही अक्षय सुख मिल सकता है-
'स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते' (गीता ५। २१)।
भोग आने-जानेवाले हैं-इस तरफ ध्यान जाते ही सुख-